Wednesday, July 15, 2026
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कहीं आप भी तो नहीं छुपाते यें बातें

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आप भले ही अपने साथी को कितना भी प्यार करें मगर हर बात आप उनके साथ शायद हर एक राज साझा नहीं करते होंगे। कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिनको आप जाहिर नहीं करना चाहते होंगे। ऐसा आप करते होंगे, ये तो आप ही जानते हैं –

अधिकतर पुरुष महिला ड्राइवर से डरते हैं। उन्हें लगता है कि महिलाएं ड्राइविंग के मामले में जीरो होती हैं। आप चाहें कितना भी कहे कि आपको अपने साथी पर भरोसा है लेकिन इस डर से आप खुद को दूर नहीं कर पाते। उसका साथ दें और आगे बढ़ने दें। महिलाएं सहारा चाहती हैं, साथ चाहती हैं मगर बैसाखी नहीं। उसे इतना सक्षम बनाइए कि वह जब सफल हो तो आपकी याद अनायास आ जाए…प्यार यही है।

किसी भी मर्द को अपनी साथी या महिला मित्र का उसके सेलेब्रिटी क्रश के साथ समय बिताना बिलकुल भी पसंद नहीं होता। हो सकता है कि आपको अपनी पार्टनर के इस व्यवहार से जलन होती है मगर आप ये बात उसे नहीं बताना चाहते होंगे।  छुपाकर रखिए इस बात को। प्यार को प्यार ही रहने दीजिए, उसे बंधन मत बनाइए। हर रिश्ते में स्पेस होना जरूरी है, तभी वह साँस ले सकेगा। एक – दूसरे की पसन्द को सम्मान देकर भी रिश्ता निभाया जा सकता है।

हर किसी के जिंदगी में दुख के पल जरूर आते हैं जिसमें उसका रोने का मन करता है। आप भी रोते हैं लेकिन वो इसे किसी के सामने भी जाहिर नहीं होने देते। इस स्थिति को आप महिलाओं से बेहतर तरीके से छिपाते हैं मगर यह सही नहीं है, आपको अपने अहसास जताने का पूरा हक है। अगर आप उसे दिल की बात बताएंगे तो यह आपके रिश्ते को मजबूत बनाएगा क्योंकि तब उसे अहसास होगा कि वह आपकी जिन्दगी में कितना महत्व रखती है।

कहा जाता है कि जो लड़का किसी लड़की को दिलोजान से चाहता है वो उसके सोशल मीडिया प्रोफाइल और उसके अपडेट्स को नियमित चेक करता है। यहां तक कि जो मर्द शादीशुदा होते हैं वो भी अपने पार्टनर की प्रोफाइल चेक करते हैं। लेकिन कहीं उसकी पार्टनर को ऐसा न लगे कि वो उसके पर्सनल लाइफ में दखलंदाजी कर रहा है इसलिए ये बात भी वो किसी के सामने भी जाहिर नहीं होने देते। अब यह कितना सही है, यह तय आपको करना है।

आप चाहते हैं कि आपकी साथी आपकी तारीफ करे लेकिन आप ये बात उसे नहीं कह पाते।  आप अपने रिलेशनशिप को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं और आप  चाहते हैं कि आपकी साथी आपसे  कहे कि वो हमेशा आपकी रहेगी। आप अपने लुक्स पर भी अपनी साथी की राय चाहते हैं। अगर ऐसा हैै तो कहने में कोई बुराई नहीं है, कह डालिए….आपको समझना आपकी साथी को भी अच्छा लगेगा।

 कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी, जो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गईं

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आपको 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले का दिन याद होगा। कैसे इस घटना के बाद देश में एक गुस्सा फूट पड़ा था। इस हमले में आतंकवादी नाकाम हो गए। हमारे सुरक्षा बलों ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और उनके मकसद को कामयाब नहीं होने दिया। इस हमले में 13 जवान और 1 माली की मौत हो गई लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसने इन आतंकवादियों का सामना सबसे पहले किया वो कौन था? वो थीं कमलेश कुमारी, एक महिला कॉन्स्टेबल।

जिस वक़्त ये आतंकवादी संसद परिसर में दाखिल हुए, सबसे पहले कमलेश कुमारी ने ही उन्हें देखा। कमलेश सीआरपीएफ़ की महिला कॉन्स्टेबल थीं। उस वक़्त महिला कॉन्स्टेबल को कोई राइफल या हथियार नहीं दिया जाता था। कमलेश के पास उस समय सिर्फ़ एक वॉकी-टॉकी था। कमलेश बिना हथियार के कुछ नहीं कर सकती थीं ऐसे में उन्होंने तुरंत ही अपने साथी सिपाही सुखवीर सिंह को ज़ोर से आवाज़ लगाई और उन्हें आगाह कर दिया। लेकिन तब तक उनके पेट में गोली लग चुकी थी जिस वजह से कमलेश की मौके पर ही मौत हो गई।

इससे पहले उप राष्ट्रपति की कार ने इन आतंकवादियों का रास्ता रोका था। उस वक़्त उसमें राष्ट्रपति नहीं थे। आतंकवादियों ने उनकी कार उस कार से टकरा दी थी। इस वजह से मजबूरन उन्हें अपनी गाड़ी को छोड़कर पैदल ही आगे बढ़ना पड़ा।  चार में से पांच आतंकवादी ऐसे एके-47 लेकर बाहर आए और एक ने अपने शरीर पर बम लगा रखे थे। ये फिदाइन रास्ते में ही गिर गया और बम फट गया जिससे कि एक बड़ा हादसा होने से बच गया। वैसे तो संसद को 40 मिनट पहले ही स्थगित कर दिया गया था लेकिन इसके बावजूद अन्दर कई बड़े नेता मौजूद थे। इनमें एल. के. आडवाणी, जसवंत सिंह और कई एमपी थे। कमलेश कुमारी ने अपनी बहादुरी से कई नेताओं की जान बचाई। कमलेश अपने पीछे 2 बच्चियों को छोड़ गईं। कमलेश को उनकी बहादुरी के लिए अशोक चक्र से नवाज़ा गया। कमलेश इस अवॉर्ड को हासिल करने वाली पहली महिला पुलिसकर्मी हैं। हमें उम्मीद है कि कमलेश कुमारी सभी महिलाओं के लिए एक उदाहरण हैं।

कैंसर पर कॉमिक पुस्तक देगी प्रेरणा

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कैंसर से जूझ चुके लोगों की प्रेरणादायक कहानियों को साझा करने वाली एक कॉमिक पुस्तक जल्द बाजार में आने वाली है। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन और रतन टाटा ने लेखिका नीलम कुमार को इस अच्छी पहल के लिए धन देने का वायदा किया है। नीलम कैंसर से पीड़ित थीं। नीलम पुस्तक में कैंसर की लड़ाई जीत चुके लोगों की प्रेरणादायक कहानियों को साझा करेंगी। उन्होंने ‘सेल्फ वी’ में बताया, ‘‘ मैंने सात किताबें लिखीं हैं। प्रत्येक पुस्तक कैंसर से जूझ चुके लोगों और देखभाल करने वालों की मदद कर रही है। दरअसल, मेरी किताब की सफलता के बाद अमिताभ बच्चन और रतन टाटा ने कहा कि वे मेरी अगली दो पुस्तकों के लिए पैसा देंगे।’’ ‘सेल्फ वी’ एक अनूठा अभियान है जहां लोग कैंसर से जूझने की अपनी कामयाब कहानियां बताते हैं।

लेखिका के मुताबिक, यह कैंसर पर पहली कॉमिक होगी। ‘सेल्फ वी’ पिंक होप कैंसर पेशेंट सपोर्ट ग्रूप ने एचसीजी के साथ मिलकर आयोजित किया है। यह एक ऐसा मंच है जिसमें कैंसर से जूझ चुके देश भर के लोग हिस्सा लेते हैं और उम्मीद तथा प्ररेणादायक अपनी कहानियों को साझा करते हैं।

 

अब धरती के बाहर TRAPPIST-1 पर रहने की तैयारी

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अब बढ़ती जनसंख्या से घबराने की ज़रूरत नहीं है। धरती के अलावा यहां भी आप अपनी जरूरत अनुसार जी सकते हैं। दरअसल अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक ऐसा इतिहास रचा है जिसे हम सोच भी नहीं सकते। यूं तो आए दिन तरह तरह की नए खोज होती रहती हैं लेकिन इस बार जिस चीज की खोज हुई है उसके बारे में जान कर आप भी गर्व महसूस करेंगे।

इसके वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के आकार जैसे सात नए ग्रहों को खोजा है जिनमें से तीन पर तो धरती की तरह जीवन भी है। दरअसल खगोल विज्ञानी पहले भी सात ग्रहों की खोज कर चुके हैं, लेकिन यह पहली बार है जब धरती के आकार जैसे इतने सारे ग्रह मिले हैं। तो हुई न मजेदार बात!

शोधकर्ताओं को इन ग्रहों में से एक की दो बार झलक दिखी। इन सातों ग्रहों में से 3 ग्रह एक तारे के चारों ओर चक्कर काटते हुए दिखे। इस तारे का नाम TRAPPIST-1 है। फिलहाल तो ये खुशी की बात है कि नासा ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वाकई में इस धरती का बोझ थोड़ा बढ़ भी गया है तभी तो आए दिन भूकंप का सामना भी करना पड़ता है इन सब के इतर अगर सच में कहीं और भी जीवन की उम्मीद है तो इससे बड़ी खुशी कुछ हो ही नहीं सकती।

 

अमिताभ बच्चन वसीयत में रखेंगे समानता

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बी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर अपनी एक तस्वीर शेयर की जिसमें वो हाथ में एक स्लेट पकड़े नजर आ रहे हैं इस पर लिखा है, ‘ मेरे मरने के बाद मेरी सारी संपत्ति मेरे बेटे और बेटी के बीच समान रूप से बांट दी जाए। हम सब बराबर हैं और मैं बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं करता।’बिग बी का ये फैसला भारत जैसे देश में काफी मायने रखता है क्योंकि यहां जब भी संपत्ति या वंश को लेकर बात आती है तो बेटी को छोड़ बेटे को ज्यादा तरजीह दी जाती है।
बिग बी ने हमेशा की महिलाओं का सपोर्ट किया है, फिर चाहें वो उनकी पत्नी हो, बहू हो, बेटी श्वेता हो या फिर नाती-पोते हों। पिछले साल उन्होंने अपनी नातिन और पोती के नाम एक खुला खत भी लिखा था जिसमें उन्होंने ये सीख देने की कोशिश की कि उन्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है और आजादी से अपनी जिंदगी जीएं।

पीरियड्स पर वरुण धवन ने की ऐसी बात आप भी करेंगे सलाम

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वरुण धवन इन दिनों अपनी फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ को लेकर चर्चा में छाए हुए हैं। हाल ही में वरुण ने लड़कियों को होने वाले पीरियड्स को लेकर एक ट्वीट किया है। अपने इस दमदार ट्वीट से वरुण ने लोगों की सोच को हिलाकर रख दिया है।

स्टूडेंट ऑफ द ईयर के इस हीरो ने एक फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘लड़कियों को फिर से स्कूल भेजने में उनकी मदद करें। मैंने अपना काम कर दिया है अब आपकी बारी है।’ वरुण ने जो तस्वीर शेयर की उस पर लिखा है, ‘भारत में पांच में से एक लड़की को पीरियड्स की वजह से स्कूल ना जाने पर मजबूर किया जाता है।’

वरुण का ये ट्वीट हर भारतीय की आंखें खोल देगा और लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करेंगे।

 

दंगे के शिकार बने मगर कायम है सौहार्द,  शेख मोहसिन बनाते हैं हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां

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मोहसिन शेख़ केवल 14 साल के थे जब गुजरात में दंगे भड़क गए। वो उस समय दसवीं में पढ़ते थे। ज़ाहिर है ये समय एक छात्र के लिए कितना महत्त्वपूर्ण होता है, ऐसे में अचानक ही दुनिया का इधर से उधर हो जाना उसके दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ जाता है। अहमदाबाद में रहने वाले मोहसिन के ने पिता ने अपना सब कुछ खो दिया।

इस दंगे में मोहसिन के पिता की दुकान को जला दिया गया। मोहसिन को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। घर की माली हालत इतनी बिगड़ गई कि ज़िंदगी का पहिया दूसरी दिशा में ही मुड़ गया और मोहसिन के इर्द-गिर्द सब कुछ बदल गया। लेकिन इन सब के बीच मोहसिन नहीं बदले।
मोहसिन शाह-ए-आलम नामक इलाके में रहते थे और दंगे के दौरान यहां लगातार एक महीने तक कर्फ्यू लगा रहा जिस वजह से वो घर से बाहर नहीं निकल पाए और इम्तेहान भी नहीं दे पाए। इसके बाद मोहसिन ने कई छोटे काम किए। वो अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ना चाहते थे लेकिन उनकी मजबूरी थी। 15 साल के मोहसिन ने एक कार बैट्री की दुकान में काम किया।

इतनी कम उम्र में ही मोहसिन ने धर्म के एक बेहद विक्राल रूप को देख लिया था। ऐसे में मोहसिन ने अपनी ख़ुशी चॉक और ग्रेफाइट में ही ढूंढ ली, और यही आगे जा कर उनकी ज़िंदगी बन गए। आज मोसिन 29 साल के हैं। उनके दिल में दंगों को लेकर दुःख तो है लेकिन इस दुःख ने उनको कट्टर नहीं बनने दिया।
उनके दिल में सभी धर्मों के प्रति बराबर इज्ज़त है। वो किसी धर्म विशेष से नफ़रत नहीं करते। भले ही मोहसिन अपनी पढ़ाई पूरी न कर सके हों लेकिन आज वो इस समाज के सामने एक उदाहरण पेश कर रहे हैं।
मोहसिन चॉक और ग्रेफाइट की मदद से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं। ऐसा करके वो समाज में धार्मिक सद्भाव का एक बहुत अच्छा सन्देश दे रहे हैं। हाल ही में मोहसिन ने महाशिवरात्रि के लिए भगवान शिव की मूर्ति तैयार की। ये वही चॉक और ग्रेफाइट हैं जिन्होंने बुरे समय में मोहसिन को दिल बहलाने का एक बहाना दिया था। ये ही नहीं मोहसिन नरेंद्र मोदी और अहमदाबाद में स्थित ‘तीन दरवाज़ा’ के मॉडल भी तैयार कर चुके हैं। आज ऐसा वक़्त है जब लोग दूसरे धर्मों के प्रति अपने दिल में बैर बनाकर बैठे हुए हैं। मौका मिलते ही सब एक दूसरे के ऊपर तीखे शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं। हमारी यही दिक्कत है कि हमने अलग-अलग धर्मों के प्रति अपने मन में एक छवि तैयार कर ली है और हम लोगों को उनके कर्म से नहीं धर्म से आंकते हैं। आज के माहौल में हमें मोहसिन से काफ़ी सीखने की ज़रूरत है। भारत को इस वक़्त ऐसे ही कई मोहसिन की ज़रूरत है।

न्याय मिले तो कैसे जब 38 लाख केस हाईकोर्ट में लंबित पड़े हैं

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न्याय के लिए लोग कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं ताकि उन्हें जल्दी से अपने विवाद का समाधान मिल जाए। लेकिन कई बार न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती है कि वादी के परिवार वालों को कई सालों के बाद न्याय मिल पाता है।

इस वक्त देश के हाईकोर्ट में 38 लाख 50 हजार मुकदमे चल रहे हैं, जिनका निपटारा नहीं हुआ है। जब देश की हाईकोर्ट का यह हाल है तो आप समझ सकते हैं कि जिला अदालतों में कितनी संख्या में मुकदमें लंबित होंगे।

हालांकि इसमें 2014 की तुलना में काफी कमी आई है। तब पूरे देश में 41 लाख से अधिक मुकदमें केवल हाईकोर्ट में लंबित थे। सरकार देश की हाईकोर्ट में मुकदमों की संख्या में कमी करने के लिए काफी काम कर रही है। इसके लिए प्रगति प्लेटफॉर्म और ग्राम न्यायलयों की स्थापना की जा रही है।

महिलाओं पर होते है हर साल 3 लाख से अधिक जुर्म – भारत में महिलाएं सबसे ज्यादा अत्याचार और जुर्म की शिकार होती हैं। यूएनडीपी के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 3 लाख से अधिक जुर्म केवल आधी आबादी पर होते हैं। 2014 में अकेले महिलाओं और बच्चियों को मानव तस्करी में धकेलने के 5466 मामलें सामने आए थे।
निर्भया कांड के बाद लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई सारे सख्त कदम सरकार ने उठाए थे, लेकिन इसके बावजूद भी आज भी महिलाएं के साथ रेप, तेजाब फेंकना, जला देना जैसी घटनाओं में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई है।
इन सब घटनाओं के बीच अभी तक 30734 लोगों को आर्म्स एक्ट के तहत कारवाई की गई है। आपसी लड़ाई में रोजाना पूरे विश्व में 1300 लोगों की मौत रोजाना होती है, जो कि किसी युद्ध में मारे जाने वालों की संख्या से 9 गुणा अधिक है। भारत में हर साल सरकार के संरक्षण में 2 लाख लोग शरणार्थी देश में आकर के बसते हैं।

 

इसरो में छा रही हैं ये 8 महिला वैज्ञानिक

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कहते हैं हर सफल आदमी के पीछे एक महिला का हाथ होता है। इसरो के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है। यहां हर स्पेस मिशन के पीछे इन 8 महिलाओं का हाथ है। आज हम आपको इसरो की उन 8 महिलाओं से रूबरू करवाने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से इसके हर मिशन को सफल बना दिया। मार्स मिशन में 20% महिला वैज्ञानिक काम कर रही हैं।

ऋतु करिधाल

ऋतु जब छोटी सी थीं तो सोचा करती थीं कि चांद कुछ-कुछ समय पर छोटा-बड़ा क्यों होता रहता है। वो ये भी सोचती थीं कि चांद के काले वाले हिस्से का रहस्य क्या है। आज सालों बाद वो मार्स ऑर्बिटर मिशन की डिप्टी ऑपरेशन्स डायरेक्टर हैं। बचपन में उन्होंने स्पेस साइंस के बारे में हर बात जाननी चाही और आज वो अपने सपने को पूरा कर रही हैं।

मौमिता दत्ता

ये मार्स मिशन की प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एप्लाइड फिजिक्स में एम. टेक किया है। आज वो ‘मेक इंडिया इनिशिएटिव’ की टीम की हेड हैं जो कि ऑप्टिकल साइंस में भारत के विकास के लिए अग्रसर है।

 नंदिनी हरिनाथ

नंदिनी ने बचपन में स्टार्क ट्रेक सीरीज़ देखी, इसके बाद से ही इनकी साइंस में रुचि बढ़ गई। इनके परिवार में इंजीनियर, टीचर आदि भरे पड़े हैं जिस वजह से बचपन से ही ये विज्ञान की तरफ़ आकर्षित होती थीं। आज इन्हें 2000 रुपए के नोट पर मार्स ऑर्बिटर मिशन की तस्वीर देखकर बहुत गर्व होता है। ये इस मिशन की डिप्टी डायरेक्टर हैं। ये बेहद मेहनती महिला हैं। इस मिशन के पूरा होने के कई दिन पहले तक ये अपने घर नहीं जाती थीं बल्कि लगातार काम कर रही थीं।

अनुराधा टी.के.

ये इसरो की वरिष्ठ महिला अधिकारी हैं। जब अनुराधा केवल 9 वर्ष की थीं, तभी उन्होंने ये तय कर लिया था कि वो बड़ी होकर स्पेस साइंटिस्ट बनेंगी। वहां नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखा था और यहां अनुराधा के दिल में अंतरिक्ष को जानने की लालसा और बढ़ गई थी। ये इसरो की सभी महिला कर्मचारियों के लिए एक उदाहरण हैं। अनुराधा कहती हैं कि कभी-कभी काम करते वक़्त वो ये भूल जाती हैं कि वो एक महिला हैं क्योंकि इसरो में सभी को एक तरह से देखा जाता है।

 

एन. वलरमाथी

इन्होंने भारत में बने पहले रडार RISAT-1 के लॉन्च में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसरो में किसी सैटेलाइट मिशन का नेतृत्व करने वाली ये दूसरी महिला हैं। ये 52 साल की हैं और इन्होंने पूरे तमिलनाडु का नाम रौशन किया है।

मीनल संपथ

इन्होंने इसरो में 500 वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व किया। लगातार 2 सालों तक उन्होंने कोई छुट्टी नहीं ली। मीनल इसरो की पहली महिला डायरेक्टर का पद संभालना चाहती हैं। हम आशा करते हैं कि इनका ये सपना ज़रूर पूरा होगा।

कृति फौजदार

कृति इसरो की उस टीम का हिस्सा हैं जो सारे मिशन को सफल बनाने की हर संभव कोशिश करता है। कृति की टीम मिशन के समय आने वाली हर दिक्कत पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखती है। इनको कभी-कभी लगातार काम करना पड़ता है लेकिन इससे इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि इन्हें अपने काम से प्यार है।

टेसी थॉमस

वैसे तो टेसी डी आर डी ओ के लिए काम करती हैं लेकिन उनका इस लिस्ट में होना बहुत ज़रूरी है। इनकी मेहनत की वजह से ही भारत को ICBMs (इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल्स) क्लब में हिस्सा बनने का मौका मिला है। यही कारण है कि इन्हें अग्नि पुत्री भी कहा जाता है।

आज इसरो में 16000 से भी अधिक महिलाएं कम कर रही हैं। और यहां महिलाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। ये महिलाएं पूरे भारत के लिए गर्व करने का एक कारण हैं।  हर लड़की और महिला को इनके बारे में पढ़ना चाहिए जिससे उनमें हर समय कुछ नया करने की इच्छा बनी रहे और वो खुद को पुरुषों से कम न समझें।

(साभार – अमर उजाला)

5 करोड़ भारतीय हैं अवसाद से पीड़ित मगर योग बना मददगार

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अध्ययन में कहा गया है कि पांच करोड़ भारतीय अवसाद से पीड़ित हैं। यह अध्ययन मुख्यत: 2015 में भारत जैसे कम या मध्यम आय वाले देशों में मुख्य रूप से किया गया है। 2015 के लिए अवसाद पर अपने नए वैश्विक स्वास्थ्य आंकलन में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि इसके अलावा तीन करोड़ से ज्यादा लोग चिंता के विकारों से पीड़ित हैं। अच्छी बात यह है कि योग भारत की ऐसी देन है जो समस्या का समाधान बनकर सामने आया है।

दुनिया भर में 322 मिलियन लोग अवसाद से पीड़ित हैं

‘अवसाद और अन्य आम मानसिक विकारों-विश्व स्वास्थ्य आंकलन’ से संबंधित रिपोर्टों में कहा गया कि वैश्विक आत्महत्याओं में दो-तिहाई से ज्यादा भारत जैसे कम और मध्यम आय वाले देशों में हैं। डब्ल्यूएचओ दस्तावेज में कहा गया कि दुनिया भर में 322 मिलियन लोग अवसाद से पीड़ित हैं और इनमें से आधे दक्षिण पूर्वी एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों में रहते हैं और यह भारत और चीन के अपेक्षाकृत बड़ी आबादी को दर्शाती है।

‘भारत में 2015 में अवसाद विकारों के कुल मामले 56675969 थे’।अध्ययन में दस्तावेजों में कहा गया कि दुनिया में अवसाद में जीवन यापन कर रहे लोगों की कुल आबादी में 2005 और 2015 के बीच 18.4 फीसदी का इजाफा हुआ है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2015 में अवसाद विकारों के कुल मामले 56675969 थे, जो 2015 में आबादी का 4.5 फीसदी था। जबकि चिंता के विकारों के कुल मामले 38425093 थे, जो इसी साल की अवधि में आबादी का 3 फीसदी था।

साथ ही इन आंकड़ों में यह भी कहा गया कि 2015 में 788000 लोगों ने आत्महत्याएं की जबकि इतनी ही संख्या से ज्यादा लोगों ने हत्या के प्रयास किए लेकिन वे मरे नहीं। दुनिया भर में सभी प्रकार की मौतों का 1.5 फीसदी आत्महत्या से है ओर यह 2015 में मौतों के शीर्ष 20 कारणों में एक है।

 योग से मिलेगी मदद 

एक सप्ताह में दो बार योग एवं गहरी सांस लेने की कक्षाओं में शामिल होने और घर पर इसका अभ्यास करने से अवसाद के लक्षणों में कमी आ सकती है। एक नए अध्ययन में यह बात कही गई है।

यह अध्ययन, अवसाद के औषधीय उपचार के विकल्प के तौर पर योग आधारित कार्यक्रमों के इस्तेमाल का समर्थन करता है। अध्ययन के अनुसार अवसाद से निपटने के लिए योग औषधीय उपचार के विकल्प के तौर पर कारगर है।

अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर, क्रिस स्ट्रीटर के मुताबिक, ‘‘यह अध्ययन योग के प्रयोग का समर्थन करता है और ऐसे अवसादग्रस्त लोगों की श्वसन क्रिया में सहायक होता है, जो अवसाद रोधी दवाओं का प्रयोग नहीं करते है। इसके अलावा योग ऐसे व्यक्तियों के लिए भी कारगर है, जो एक निश्चित मात्रा में अवसाद रोधी दवाओं का सेवन करते हैं, अथवा दवाओं के बाद भी जिनके अवसाद के लक्षणों में सुधार नहीं हो सका है।’’

शोधार्थियों का कहना है कि प्रमुख अवसादग्रस्त विकार (एमडीडी) सामान्य है और बार बार होने वाला पुराना और अशक्त बनाने वाला विकार है। अवसाद वैश्विक स्तर पर अन्य बीमारियों की तुलना में कई सालों से विकलांगता के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि करीब 40 प्रतिशत लोग लंबे समय तक अवसाद रोधी दवाओं का सेवन करने के बावजूद भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो सके हैं। यह शोध वैकल्पिक एवं पूरक चिकित्सा संबंधी एक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें आसन एवं श्वसन नियंत्रण की सटीक विधियों के लिए आयंगर योग के विस्तार पर जोर दिया गया है।