Tuesday, May 19, 2026
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बंगाल में मसला अब रोटी का है

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया
बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो चुका है । प्रचंड बहुमत के साथ प्रदेश में भाजपा ने सरकार बना ली है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ एक के बाद ऐतिहासिक फैसले लेते जा रहे हैं । बीएसएफ को जमीन देना और हॉकरों को सियालदह व हावड़ा से हटाना, सार्वजनिक गौ वध पर रोक समेत कई ऐसे फैसले सीएम शुभेंदु ने लिए हैं जिनको काफी सराहा जा रहा है । इन सभी के बीच असली चुनौती भाजपा सरकार के लिए रोटी की समस्या सुलझाने की है । बेरोजगारी और उद्योग लगाने की है क्योंकि ऐसा न किया गया तो यह बेरोजगारी अपराध के रास्ते खोल सकती है और तब स्थिति भयावह होगी । मतलब शुभेंदु सरकार को अब आर्थिक मोर्चे पर भी एक जंग लड़नी होगी। इसका कारण यह है कि कभी भारत की जीडीपी का सिरमौर होने वाला पश्चिम बंगाल आज कर्ज के दलदल में गले तक डूबा हुआ है। जब 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था, तब उन्होंने ‘परिबर्तन’ का नारा दिया था। उस वक्त राज्य पर करीब 2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। आज 15 साल बाद जब सत्ता भाजपा के पास आई है तो यह कर्ज का बोझ चार गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका है।
दरअसल, वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में विशेषकर अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए रेवड़ियां जिस तरह से बाँटी गयी हैं, उसने बंगाल के खजाने पर जबरदस्त बोझ बढ़ाया है। जो निवेश शिक्षा और स्वास्थ्य पर होना चाहिए था, वह पैसा पूजा क्लबों के खाते में गया । सोचने वाली बात यह है कि जिस परिवार में भत्ते ही भत्ते आ रहे हों और उसी से गुजारा चल जा रहा हो । मेहनत की जगह धमकाने, चमकाने और मारपीट से कमाई हो रही हो, वहाँ कार्य संस्कृति कैसे बनेगी ? कहीं न कहीं बंगाल की जनता को बेरोजगार बनाए रखना पुरानी सरकारों की साजिश रही है क्योंकि सक्षम युवा तो झंडा उठाने से रहे और यही कारण है कि यहां सुनियोजित तौर पर उद्योग पनपने ही नहीं दिए गए ।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में बंगाल का कुल कर्ज 7।62 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 2026-27 तक 8।15 लाख करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है। आज बंगाल देश के बड़े राज्‍यों में सबसे अधिक कर्जदार सूबों की सूची में पंजाब के बाद दूसरे पायदान पर है। राज्य का कर्ज-जीएसडीपी (डेब्ट -टू – जीएसडीपी) अनुपात लगभग 38 प्रतिशत है, जो किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। भाजपा के सामने सबसे पहली चुनौती इस वित्तीय गड्ढे को भरने की होगी।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के आंकड़े बंगाल के पतन की दुखद कहानी बयां करते हैं। 1960-61 में भारत की कुल जीडीपी में पश्चिम बंगाल का हिस्सा 10 यानी ।5 प्रतिशत था। आज यह गिरकर महज 5।6% रह गया है। यह गिरावट केवल वामपंथियों के समय नहीं, बल्कि टीएमसी के शासन में भी जारी रही। ईएसी -पीएम वर्किंग पेपर के अनुसार, प्रति व्यक्ति आय के मामले में जो बंगाल 1960 में राष्ट्रीय औसत से 127 यानी 15 प्रतिशत आगे था, वह आज गिरकर 83 यानी ।7 प्रतिशत पर आ गया है। आज स्थिति यह है कि राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्य, जिन्हें कभी पिछड़ा माना जाता था, वे भी प्रति व्यक्ति आय में बंगाल को पीछे छोड़ चुके हैं।
ब्याज चुकाने में जा रहा 20 प्रतिशत राजस्‍व
बंगाल की वित्तीय सेहत इतनी खराब हो चुकी है कि राज्य अपनी कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रहा है। सालाना लगभग 35,000 से 40,000 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज और मूलधन के भुगतान में चले जाते हैं। यह राज्य के कुल राजस्व का 20 प्रतिशत से अधिक है। जब आपकी कमाई का हर पांचवां रुपया पुराने कर्ज की किश्त भरने में जा रहा हो, तो नए अस्पताल, सड़कें और स्कूल बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में पूंजीगत व्यय में लगातार कटौती की गई है।
लोक-लुभावन योजनाओं का प्रभाव
तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सफलता का सबसे बड़ा आधार उनकी ‘कल्याणकारी योजनाएं’ रही हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इन योजनाओं को बंद नहीं कर सकती, क्योंकि ये सीधे आम लोगों से जुड़ी हैं। लेकिन, ये योजनाएं खजाने पर भारी बोझ भी डाल रही हैं। राज्य के कुल बजट का 1।5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हिस्सा केवल प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) आधारित योजनाओं पर खर्च हो रहा है।
लक्ष्मी भंडार : इस योजना के तहत 2।20 करोड़ महिलाओं को मासिक सहायता दी जा रही है, जिस पर सालाना 40,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है।
अन्य योजनाएं : कन्याश्री, रूपश्री, युवाश्री और किसान सहायता जैसी दर्जनों योजनाओं पर भी करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
भाजपा ने ‘सोनार बांग्ला’ का वादा किया है, लेकिन इन भारी-भरकम योजनाओं के बीच विकास कार्यों यानी पूंजी व्यय के लिए पैसा कहां से आएगा, यह एक बड़ा सवाल है। नयी सरकार के लिए इन योजनाओं को जारी रखना और विकास के लिए पैसा जुटाना ‘आग पर चलने’ जैसा होगा।
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बात समाधान की
अब बात करते हैं समाधान की तो हमने बात की वरिष्ठ पत्रकार अशोक पांडेय से। उन्होंने शुभेंदु सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं। आइए इन पर सिलसिलेवार तरीके से बात की जाए –
1. सबसे पहले राज्य को कॉरपोरेट विंग बनानी चाहिए। नए निवेश के पहले राज्य में जो बंद मिलें और कारखाने हैं, उनको खोलने पर जोर देना चाहिए ।
2. राज्य सरकार को लैंड बैंक बनाना होगा । इसमें खाली जमीनों के अतिरिक्त बंद हो चुके परित्यक्त कारखानों की जमीनें और अवैध बस्तियां भी शामिल हैं । राज्य में फाउंड्रीज हैं, कास्ट आयरन के कारखाने हैं, जूट मिलें हैं, टेक्सटाइल मिलें जो बंद पड़ी हैं, उन जमीनों को समझने की जरूरत है। जमीन की प्रकृति के अनुरूप ही वहाँ उद्योग लगाए जाएं।
3. सिंगल विंडो सिस्टम बने। लाइसेंस प्रणाली में सुधार हो । निगरानी तंत्र को बहुत मजबूत बनाने की जरूरत है ।
4. निवेशकों को अधिक छूट मिले । एमएसएमई पर जोर दिया जाए ।
5. पीएम कौशल विकास योजना को बंगाल में स्कूली स्तर से ही लागू किया जाए । आईटीआई बढ़ाए जाएं और कौशल विकास प्रशिक्षण पर अधिक जोर दिया जाए जिससे जब उद्योग लगाए जाएं तो तकनीकी रूप से दक्ष श्रम की सुविधा मिले ।
6. सही है सार्वजनिक तौर पर गौ वध पर रोक लगा दी गयी है और हावड़ा व सियालदह स्टेशन से अवैध अतिक्रमण हटाया जा रहा है पर जरूरी है कि इन हॉकरों के पुनर्वास की योजना बनायी जाए ।
7. गौ पालकों के बारे में भी पुनर्वास की योजना बनायी जाए । गौ शालाओं में कमजोर गायों को खरीदा जाए और मर जाने पर उनको बंजर जमीन में ही दफनाया जाए ।
बंगाल की प्रतिभाओं को वापस बंगाल में लाने के लिए विश्वास का माहौल बनाना बहुत जरूरी है और निश्चित रूप से वर्तमान सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है ।

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