Wednesday, July 15, 2026
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समाज और कानून के बीच अपना वजूद और न्याय तलाशते एसिड हमलों के शिकार

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  • सुषमा त्रिपाठी

तुम मेरे दिल पर लिखना चाहते थे अपना प्यार

इनकार किया तो चेहरे पर अपनी नफरत लिख दी

याद रखो, तुमने सिर्फ मेरा चेहरा जलाया है

 हौसले अब भी जिंदा हैं मेरे, छीन नहीं सकते तुम

सुना तुमने, जिंदा हूँ अपने जीने की जिद के साथ।।

नफरत और एसिड का गहरा रिश्ता है, खासकर स्त्रियों का मामला हो तो यह और गहराई से जुड़ जाता है। प्रेम निवेदन नहीं माना तो प्रतिशोध की आग को तरल कर चेहरे पर बहा देना आम बात है। स्त्री का इनकार उसकी हिमाकत है और 21वीं सदी की ओर बढ़ चले हिन्दुस्तान में नफरत और एसिड हमलों की तादाद भी बढ़ चली है मगर हमलों की शिकार महिलाओं के हौसलों को मारना इतना आसान नहीं है। अजीब बात यह है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पास भी 2013 तक एसिड हमलों का कोई आँकड़ा नहीं था मगर भला हो भारतीय दंड संहिता में हुए संशोधन का जिससे एसिड हमलॆ को अपराध की श्रेणी में रखा जाने लगा। जाहिर है कि आँकड़े 2014 से ही मिलते हैं और 2014 में ही एसिड हमलों के 225 मामले देखने को मिलते हैं और 2012 में 106 और 2013 के 116 मामलों से अधिक हैं। 2015 में एसिड हमलों के सबसे अधिक 249 मामले दर्ज किए गए।

कहने की जरूरत नहीं है कि एसिड हमले पितृसत्तात्मक सत्ता की नियंत्रण वाली मानसिकता का परिचायक है जहाँ नियंत्रण न कर पाने की स्थिति में बौखलाहट एसिड हमलों का रूप लेती है और यह सारी दुनिया में है। यह किसी जाति, धर्म, स्थान से रिश्ता नहीं रखता बल्कि दक्षिण एशिया, चीन, नाइजेरिया, केन्या, मैक्सिको, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में भी होता है। एसिड हमलों की 80 प्रतिशत शिकार महिलाएं ही होती हैं। कानून में संशोधन के बाद एसिड हमलों के मामले में 10 साल या फिर आजीवन सजा का प्रावधान है। ये भी कहा गया कि एसिड खरीदने वालों को अपना सचित्र प्रमाणपत्र दुकानदार को देना होगा और खरीददार का रिकॉर्ड दुकानदार के पास होना चाहिए मगर हम सब जानते हैं कि एसिड अब भी दुकानों में खुलेआम बिक रहा है। कानून है मगर वह लागू नहीं हो पाता। 2013 में कानून में संशोधन के बाद मुम्बई की स्पेशल कोर्ट ने दिल्ली के अंकुर नारायणलाल पंवार को प्रीति ए राठी पर एसिड डालने के अपराध में मौत की सजा सुनायी थी। यह एसिड हमलों के मामलों में सुनाई जाने वाली पहली मौत की सजा थी और एक ऐतिहासिक कदम भी। यह सजा स्पेशल विमेन्स कोर्ट  स्पेशल जज ए. एस. शिंदे ने सुनायी थी।

एसिड हमलों के मामले में सबसे खराब स्थिति उत्तर प्रदेश की है और बंगाल  उसके बाद आता है। एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन इंडिया (एएसएफआई) के आँकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2016 में एसिड हमलों के 29 मामले दर्ज हुए तो बँगाल में यह आँकड़ा 14 है, इसके बाद बिहार है जहाँ एसिड हमलों के 10 मामले हैं। पीड़ितों के मामले में बिहार आगे है जहाँ 23 एसिड पीड़ित हैं। हालाँकि यह भी ठीक है कि एसिड मामलों में कमी आयी है मगर बंगाल के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। हाल ही में मुर्शिदाबाद के मलिकपुर में ऐसी घटना हुई जहाँ पति ने पत्नी के मुँह में एसिड डाल दिया। अस्पताल ले जाने पर महिला ने दम तोड़ दिया।

अच्छी बात यह है कि सरकार इस बारे में सोच रही है। गृह मंत्रालय ने पहले भी राज्यों को कहा है कि वे सेंट्रल विक्टिम कम्पन्सेशन फंड (सीवीसीएफ) के तहत एसिड हमलों के शिकार लोगों को कम से कम 3 लाख रुपए की राशि का चेक दें। पीड़ितों को तुरन्त लाभ पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नेशनल रिलिफ फंड से 1 लाख रुपए अतिरिक्त देने की बात कही है मगर सच तो यह है कि जरूरत एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाकर सक्षम बनाने की है। सर्जरी का खर्च इतना अधिक है कि यह राशि भी कम लगती है। एसिड हमला शारीरिक, सामाजिक और मानसिक रूप से तोड़ता है। इसे रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने अब भी बाकी हैं।

एसिड अटैक पीड़ितों के मुद्दे को कई मंचों पर उठाया गया है और जागरुकता लाने की कोशिश की जा रही है। युवाओं में इस मुद्दे को लेकर जागरुकता बढ़ाने की एक नई कोशिश है एक अनूठी कॉमिक किताब – प्रियाज़ मिरर। ये डाउनलोडेबल कॉमिक बुक ऐनिमेशन वीडियो के साथ असल ज़िंदगी की कहानियां साथ लाती है। अब उनको स्वीकृति मिल रही है। कुछ ऐसी ही साहस भरी गाथा देखिए –

हाल ही में सोनाली मुखर्जी, लक्ष्मी और रेशमा जैसी साहसी लड़कियाँ इसकी मिसाल बनी हैं मगर अब भी यह साहस बहुत कम लड़कियों में है कि वे आगे बढ़ सकें। स्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि कानून व्यवस्था मजबूत हो। न्याय और राहत शीघ्र मिले और उससे भी जरूरी है कि पुरुषों में स्त्री के इनकार को स्वीकार करने का साहस हो और ये तभी होगा जब स्त्री उनके लिए महज चेहरा नहीं बल्कि एक व्यक्तित्व होगी।

वीडियो – साभार – एबीपी न्यूज

 

 

 

 

महान नेता अपने साथ दूसरों के लिए भी काम करता है

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रक्षक फाउंडेशन की मैनेजिंग ट्रस्टी चैताली दास एक जानी – मानी सामाजिक कार्यकर्ता और उद्योगपति हैं। रक्षक फाउंडेशन के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने और शिक्षा के प्रसार के लिए लगातार काम कर रही हैं। स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उनको उड़ान इम्पावरिंग विमेन अवार्ड्स से सम्मानित भी किया गया है। अपराजिता में आपके लिए पेश हैं सामाजिक कार्यकर्ता व उद्योगपति चैताली दास से बातचीत के प्रमुख अंश –

हम समाज के हर वर्ग के लिए काम करते हैं

मेरी सास अपने समय से आगे थीं। उन्होंने मुझे कहा था कि उनके जाने पर किसी सामाजिक तामझाम की जगह भूखे लोगों को खिलाऊँ, वह उनकी आत्मा को शांति देगा। रक्षक फाउंडेशन इसी मानवता की रक्षा की बात करता है और मानवता के लिए काम कर रही अन्य संस्थाओं की सहायता की बात भी करता है। हम समाज के हर वर्ग के लिए काम करते हैं। पिछले 23 सालों से रक्षक फाउंडेशन ने बहुत से चेहरों पर मुस्कान लायी है। हम किसी एक मुद्दे को लेकर काम नहीं कर रहे और अब तो बुर्जुगों और बच्चों के लिए भी काम कर रहे हैं।

आज महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं

जब मैंने शुरुआत की थी तो लोग सामाजिक तौर पर जागरुक नहीं थे। महिलाएं समाज को लेकर बहुत ज्यादा सोचती थीं। शांति और सौहार्द स्थापित करने की जिम्मेदारी उनकी थी। बचपन से ही उनको धीरे बोलना और चलना सिखाया जाता था। अपने सामाजिक अधिकारों की जानकारी महिलाओं को तब नहीं थी, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन से वे अनजान थीं। एड्स, निरक्षरता, बाल श्रम, मानव तस्करी, वेश्यावृति की समस्या ज्यादा थी। गरीबी और बेरोजगारी एक समस्या थी। आज की महिलाएं अपने लिए आवाज उठाती हैं और आर्थिक विकास के साथ घर में अपने योगदान के बारे में सोचती हैं। अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर वे सजग हैं। आज की महिलाएं समाज में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती हैं।

लोगों से मिली दुआएं ही हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है

सामाजिक जागरुकता की कमी हमारे लिए भी एक चुनौती थी, काम करना कठिन था। महिलाएं तब भय में जीती थीं। घरेलू हिंसा सहती थीं और अपने कानूनी अधिकारों से अनजान थीं। कम उम्र में गर्भ धारण कर लेती थीं और कुपोषण की शिकार थीं। जिन लोगों के लिए काम किया, उनको लाभ हुआ और काम करते हुए लोगों की दुआएं मिली हैं, मेरे लिए यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं संशोधनागारों में कैद महिलाओं के लिए काम करना चाहती हूँ।

शिक्षा होगी तो स्त्री बच्चों के लिए सही निर्णय ले सकेगी

महिलाओं को सशक्त बनाने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। मैं डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की बात नहीं कर रही हूँ बल्कि सही दिशा में सशक्तीकरण की बात कर रही हूँ। महिलाओं को प्रोत्साहित करने की जरूरत है जिससे वे अपनी बात कह सकें। बच्चों की जिन्दगी माँ पर निर्भर करती है इसलिए अगर वह शिक्षित होगी तो अपने बच्चों के लिए वह सही निर्णय लेने में सक्षम हो सकेगी। महिलाओं को आत्मनिर्भर होने की जरूरत है। वह परिवार में भी अपना आर्थिक योगदान दे सकती है और शिक्षा उसका व्यक्तित्व भी बदल सकती है।

महान नेता अपने साथ दूसरों के लिए भी काम करता है

चीजों को अलग तरीके से देखने की क्षमता ही नेतृत्व कहलाती है। महान नेता वह नहीं है जो महान काम करे बल्कि वह है जो असहाय लोगों को आगे लाने के लिए काम करे और भटके हुए लोगों की सहायता करे। आप अपनी तमाम मुश्किलों के बीच आगे बढ़ते हैं और दूसरों के लिए काम करते हैं तो नेतृत्व यही है।

 

 

स्त्री को अपने साथ हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ना होगा

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बहुत बातें होती हैं स्त्री को मजबूत बनाने के लिए। आज तो पहले से भी ज्यादा, स्त्रियों वाला महीना आ गया है न। अचानक महसूस होने लगता है कि स्त्रियाँ न हो संसार में कुछ भी न बचे, बात तो सच भी है मगर क्या खुद स्त्री इस बात को जानती है कि वह कितनी महत्वपूर्ण है।

स्त्री अब भी एक कहानी है, बाजार का हिस्सा है, उसके बहाने न जाने कितनी चीजें खरीदी और बेची जा रही हैं मगर हर बातचीत का सिरा एक ही जगह पर अटक जाता है – उसका शरीर और उसकी खूबसूरती। शायद यह समाज ही चाहता है कि स्त्री भूल जाए कि वह एक दिमाग भी रखती है या फिर वह असुरक्षा की ऐसी जंजीर से बँध गयी है कि उसकी सोच का एक जरूरी हिस्सा खूबसूरत दिखने और लगने में खर्च हो जाता है और वह भी अपने लिए नहीं बल्कि एक पुरुष के लिए, जो उसे नियंत्रित करता है और अपने अहंकार को तृप्त करता है।

क्या यही असुरक्षा नहीं है कि वह दूसरी स्त्री की शत्रु बन जाती है या सुन्दरता उसकी वह कमजोर नस बना दी गयी है जिसे दबाकर अक्सर पुरुष अपने पौरुष को सहलाता है? प्रेम अगर स्त्री से हो तो वह भी उसके सौंदर्य और उसकी कामुकता पर अटक जाता है और साहित्य से लेकर गीतों तक में शायद यही कारण है कि दिमाग और सोच रखने वाली स्त्री नजर नहीं आती।

अगर हिंसा होती है तो पहला वार उसके चेहरे पर होता है और इसका अंत उपभोग की वस्तु बनाने पर होता है। द्रोपदी और सीता के बाल ही पहले खींचे गए थे, तमिलनाडु में जयललितता और बंगाल में ममता बनर्जी के बाल ही खींचे गए मगर इन सभी घटनाओं ने इतिहास को पलटकर रख दिया। स्त्री विरोध करे तो उसके साथ यौन हिंसा की धमकी दी जाती है।

 

अब गुरमेहर का मामला लीजिए, मैं उसके कथन से सहमत नहीं हूँ मगर क्या हमारा स्तर इतना गिर गया है कि असहमति का उत्तर यौन हिंसा और बलात्कार और सम्भोग की धमकियों से दिया जाए?  निश्चित रूप से देशभक्ति का स्तर इतना नीचे तो नहीं गिरना चाहिए कि भारत माँ की बेटी को आप ऐसी घटिया धमकियाँ दें।

मत भूलिए, आप भारत को भी माता ही कहते हैं और कोई माँ यह बर्दाश्त नहीं करेगी कि उसकी बेटी को उसके नाम पर बलात्कार की धमकी मिले। गुरमेहर महज 20 साल की बच्ची है, उसका तर्क गलत है मगर वह कहाँ गलत है, यह समझाने की जरूरत है।

अगर आप उसे समझाने में सक्षम होते तो इन धमकियों की जरूरत नहीं पड़ती। मैं गुरमेहर से असहमत हूँ मगर एक स्त्री और एक भारतीय होने के नाते आपकी धमकियों का समर्थन मैं नहीं कर सकती। शर्म कीजिए जो आप एक 20 साल की बच्ची पर अपनी मर्दानगी दिखाने चले हैं।

जो पुरुष यौन हिंसा को अपनी मर्दानगी का नाम देते हैं, दरअसल, वे हारे हुए होते हैं और उनका पौरुष हमेशा स्त्री की देह के सामने हार मान जाता है और वहीं दम तोड़ देता है मगर माफ कीजिएगा, यह पुरुष होने का नहीं, आपकी कमजोरी का प्रतीक है क्योंकि वास्तविक अर्थों में पुरुष भी स्त्री की तरह ही संवेदनशील है और वह हिंसा नहीं करता बल्कि स्त्री का सम्मान करता है।

स्त्री अगर प्रेम को स्वीकार न करे तो भी वह उसकी इच्छा का सम्मान करता है, उसके चेहरे पर एसिड नहीं फेंकता और न ही उसे बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाता है। दरअसल, दम्भ से भरा पौरुष वह मानसिकता है जो स्त्री को सम्पत्ति और भोग्या समझती आ रही हैं और इन मानसिकता की परवरिश हमारे साहित्यकारों और फिल्मकारों ने की है। निश्चित रूप से इनमें से अधिकतर पुरुष ही हैं मगर जब स्त्री खुद को आलू, झंडू बाम और तंदूरी मुर्गी समझकर उस पर थिरकने लगे तो आप दोषी किसे मानेंगे? धारावाहिकों में स्त्री पुरुष का मोहरा मात्र बनती है। तर्क का जवाब तर्क हो सकता है, बलात्कार की धमकी नहीं। निश्चित रूप से ऐसा लिखने की घटिया हरकत जिसने की है, स्त्री उसके परिवार में भी होगी किसी न किसी रूप में।

क्यों नहीं एक स्त्री सबसे पहले अपने बच्चों को यह सिखाती कि वह दूसरी स्त्रियों का भी सम्मान करे। हमारी शिक्षित और ग्लैमरस नायिकाएं क्यों नहीं आइटम गीतों को न करना सीख रही हैं जबकि उनको भी पता है कि ऐसे गीतों से आम लड़की का जीवन दूभर हो सकता है। सम्मान माँगने से नहीं मिलता, उसे प्राप्त करना पड़ता है और उसे प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि आप अपनी ही नहीं, दूसरी स्त्री के सम्मान की लड़ाई लड़ें, शायद तब हमारी लड़ाई आसान हो जाए। बहरहाल स्त्री वाले एक महीने में महिला दिवस की शुभकामनाएं मगर अभी लम्बी राह  चलनी है, याद रहे।

बिहार की नेहा बनीं मिसेज इंडिया इंटरनेशनल

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 ये बात सच है कि शादी के बाद करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठाना जरा मुश्किल होता है। खासतौर से अगर आप कॅरियर मॉडलिंग और फैशन की दुनिया में बनाना चाहती हैं तो चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं पर जज्बा और आत्मविश्वास हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। बिहार की रहने वाली नेहा गुप्ता की कहानी भी आत्मविश्वास और जज़्बे की एक ऐसी ही कहानी है। नेहा गुप्ता दरअसल, बिहार के एक छोटे से शहर जमालपुर से ताल्लुक रखती हैं। नेहा पेशे से एक डेंटल सर्जन हैं और फिलहाल वो पब्लिक हेल्थ डेंटिस्ट्री में मास्टर्स कर रही हैं। उनकी शादी एक आर्मी डॉक्टर से हुई, जो बाल चिकित्सक भी हैं. शादी के बाद नेहा और उनके पति लखनऊ में रहते हैं।शादी के बाद ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने के लिए नेहा ने कड़ी मेहनत तो की, पर नेहा को उनके पति और परिवार का भी पूरा साथ मिला और इसी का नतीजा है कि नेहा ने मिसेज इंडिया इंटरनेशनल का खिताब जीत लिया।

हिजाब पहन सुपरबाइक चलाती है रोशनी

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आमतौर पर आपने लड़ियों को स्कूटी या गाड़ी चलाते हुए देखा होगा, लेकिन आज हम आपको उस लड़की से मिलवाने जा रहे हैं जो कि हिजाब पहने सड़कों पर स्पोर्ट्स बाइक दौड़ाती है। यह लड़की है जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ने वाली रोशनी मिसबाह।

वैसे तो आजकल कई लड़कियां ऐसी हैं जो स्कूटी को छोड़कर बाईक चलाना काफी पसंद करती हैं और चलाती भी हैं लेकिन क लेदर जैकेट, जीन्स, हाई हील बूट के साथ सिर पर हिजाब पहने रोशनी जब अपनी बाईक पर निकलती है तो सबकी निगाह उसी पर होती हैं।

रोशनी इनदिनों काफी चर्चा में है। खास बात यह है कि रोशनी बाइक चलाने के साथ-साथ पढ़ाई में नंबर वन भी हैं। रोशनी का कहना है कि जब वो नौवीं क्लास में बाइक थामी थीं तब उन्होंने पहली बार बाइक थामी थी। इसके लिए रोशनी के पापा ने रोशनी का पूरा सपोर्ट किया है। इसके अलावा रोशनी का यह भी कहना है कि उन्हें समाज, दोस्तों और परिवार से खूब सपोर्ट मिल रहा है।

 

इस लोक सभा सदस्य ने इस गांव को गोद लेकर इसकी सूरत बदल दी

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 गुजरात का चीखली गांव एक साल पहले तक पानी और जरूरी सुविधाओं के लिए तरसता था, लेकिन अब वह आदर्श गांव बनने की राह पर बढ़ चला है। महज एक साल के भीतर यहां सभी 450 घरों में पानी के नल के कनेक्शन लग गए हैं। हर घर में शौचालय भी है। सड़कों पर सीसीटीवी कैमरे लग चुके हैं। जिले का पहला रिवरफ्रंट भी तैयार हो चुका है।

 नवसारी जिले के इस गांव के कायापलट के पीछे यहां के भाजपा सांसद सीआर पाटिल की बड़ी भूमिका है। पाटिल ने एक साल पहले चीखली गांव को गोद लिया था। इसके बाद यह गांव विकास की राह पर सरपट दौड़ पड़ा। पाटिल के प्रयासों से महज एक साल में इस गांव पर तीन करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इसके अलावा करीब ढाई करोड़ रुपए ग्राम पंचायत ने खर्च किए। नतीजा यह रहा कि जो गांव पहले खराब सड़क की वजह से आसपास से कटा रहता था। अब वह नजदीकी गांवों के साथ-साथ जिला मुख्यालय से पक्की सड़क से जोड़ा जा चुका है। सड़क के किनारों पर ब्लॉकिंग की गई है ताकि कीचड़ न हो।
गांव की सरपंच ज्योति बेन ने बताया कि गांव के विकास में पर्यावरण का खास ध्यान रखा गया है। सीवेज का गंदा पानी नदी में न जाए, इसके लिए फिल्टर प्लांट लगाया गया है। गांव और सड़क के किनारे पौधारोपण किए गए हैं। शवों को जलाने के लिए इलेक्ट्रिक मशीन लगाई गई है। आंगनवाड़ी में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
ऐसे मिला गांव को नया रूप:
– 20 लाख खर्च से 450 घरों में लगाए गए नल के कनेक्शन।
– 172 शौचालय बनवाए गए 2 लाख रुपए खर्च कर।
– 10 लाख खर्च कर लगवाए गए दर्जनों सीसीटीवी कैमरे।
– 06 लाख खर्च कर किया गया पौधारोपण।
– 20 लाख खर्च किए गए स्वच्छता के लिए।
– 20 लाख खर्च कर बनाया रिवरफ्रंट।

कम्प्यूटर पर लगातार काम करना है, तो रहे ध्यान

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लगातार कंप्यूटर पर काम करने से अंगुलियों में दर्द होने लगता है। माउस को स्क्रॉल करने से सबसे ज्यादा असर अंगुलियों पर पड़ता है। ऐसे में लोगों को समझ नहीं आता कि क्या किया जाए। अगर आपके साथ भी यह समस्या रहती है तो हाथों और अंगुलियों की ये कसरत आपको आराम दिला सकती हैं।

हाथों में दर्द होने पर आप कसकर मुट्ठी बांधें जिससे हथेली और अंगुलियों की जकड़न खुल जाए। इसके लिए अंगूठे को अंदर करके मुट्ठी बनाएं और 30 से 60 सेकेंड के लिए उसे कसें। अब हाथ को ढीला छोड़ दें। लगातार चार बार इसे दोहराएं।

लिखते-लिखते भी अंगुलियों में दर्द होने लगता है। इसके लिए हाथ को सीधा रखें और अंगूठे से हर अंगूली को ऐसे मिलाएं की ‘O’ बन जाए। इसे 30 से 60 सेकेंड तक करें। कम से कम चार बार इस प्रक्रिया को दोहराएं।

टाइपिंग करते-करते अगर अंगुलियों में दर्द होने लगे तो मेज पर अपना हाथ रखें और एक-एक करके अपनी अंगुलियों को उठाएं और नीचे कर दें। आप चाहें तो इन्हें एक साथ भी उठा सकते हैं। इसे 8 से 12 बार कर सकते हैं।

अगर माउस चलाते-चलाते अंगुलियां दर्द करने लगी हैं तो हाथ को मेज पर रखकर अंगुलियों को स्ट्रेच करने से आराम मिलेगा। इसके लिए हाथ को मेज पर सीधा रखें और अंगुलियों पर बल देते हुए स्ट्रेच करें। 30 से 60 सेकेंड तक इसी अवस्था में रहें। अब हाथ को ढीला छोड़ दों और लगातार चार बार इसे दोहराएं।

हथेली में दर्द होने पर उसे स्ट्रेच करने से फायदा होगा। हथेली को स्ट्रेच करने के लिए सबसे पहले हथेली को मुंह के सामने सीधा रखें और अंगुलियों के ज्वाइंट से हथेली की ओर मोड़ें। ऐसे हथेली आधी खुली मुट्ठी की तरह हो जाएगी। 30 सा 60 सेकेंड तक इसी तरह रहें। इसे भी लगातार चार बार करें।

अंगूठे की मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए हाथ को मेज पर सीधा रखें। अंगुलियों को हल्के रबर बैंड से बांध लें यानी जितना हो सके अंगूठे को अंगुलियों से दूर रखें। 30-60 सेकेंड तक अंगूठे को अंगुलियों से दूर खीचें। इसे आप एक बार में 10 से 15 बार कर सकते हैं।

 

मेरी बच्ची अब मेरी प्राथमिकता है: रणविजय

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लोकप्रिय टीवी प्रस्तोता एवं अभिनेता रणविजय सिंह ने कहा है कि एक पिता के तौर पर वह अपनी पूरी उर्जा और ध्यान अपनी नवजात बच्ची पर लगा रहे हैं और वही उनके जीवन की प्राथमिकता बन गई है। अभिनेता इस साल की शुरआत में पिता बने जब उनकी पत्नी प्रियंका वोहरा ने एक बच्ची को जन्म दिया। जब उनसे पूछा गया कि पिता बनने के बाद क्या बदला है तो उन्होंने बताया कि ‘‘मैं अब ज्यादा काम नहीं लेना चाहता हूं, जो कि एक अजीब बात है। मैं जैसे ही काम से छूटता हूं, चाहता हूं कि जल्द से जल्द अपने बच्चे से मिलने लंदन चला जाउं। मैं वहां समय बिताना चाहता हूं। मेरी जिंदगी में इससे बड़ी खुशी कुछ भी नहीं है और बच्ची से ज्यादा कोई मायने नहीं रखता।’’ 33 साल के अभिनेता ने कहा कि वह हमेशा से अधिक काम करने वाले रहे हैं लेकिन ‘‘अब मेरी सारी उर्जा और ध्यान इस बात पर रहता है कि वह अच्छे से सोई है या नहीं। वह दूध पी रही है या नहीं। तकनीक की वजह से मैं फेसटाइम और अन्य तरह की चीजें करता हूं और संपर्क में रहता हूं।’’ रणविजय अब एमटीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘रोडीज’ के 14वें सीजन की तैयारी कर रहे हैं जिसके वह प्रस्तोता एवं जज हैं।

 

भारत के लिए दाखिला कार्यक्रम आरंभ करेगा कैंब्रिज

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ब्रिटेन का प्रतिष्ठित कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने इस साल ब्रिटेन-भारत संस्कृति वर्ष उत्सव के तहत भारत के लिए नया दाखिला कार्यक्रम शुरू करने की योजना पेश की है। भारत के तीन पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह ने कैंब्रिज से पढ़ाई की है। कैंब्रिज ने इस सप्ताह एलान किया गया कि संस्थान के दाखिले से संबंधित कर्मचारी भारत का दौरा करेंगे और मुंबई, बेंगलुरू एवं दिल्ली में छात्रों से मुलाकात करेंगे।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘‘शिक्षाविदों की एक टीम दाखिले के मकसद से साक्षात्कार करने के लिए भारत का दौरा करेगी ताकि आवेदनकताओं को हमारी आवेदन प्रक्रिया के लिए ब्रिटेन का दौरा करने की जरूरत नहीं होगी।’’ यह एलान उस वक्त किया गया जब कैंब्रिज विश्वविद्यालय के कुलपति लेसजेक बोरीसेविक्ज ने अपनी भारत यात्रा के दौरान इस बात पर जोर दिया कि यह विश्वविद्यालय ‘भारत से बेहतरीन और होनहार छात्रों’ को आकषिर्त करने को लेकर प्रतिबद्ध है।

 

नौंवी के छात्र ने गांव में खोली लाइब्रेरी

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जब बच्चे किताबों और खेल के मैदानों से दूर होते जा रहे हैं तब एक ग्रामीण छात्र ने गांव में पुस्तकालय खोल कर एक नई पहल की है। यह पहल पिथौरागढ़ जिले के देवलथल क्षेत्र से लगभग तीन किमी दूर पथरौली गांव में हुई है। इसमें छात्र का जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों ने भी सहयोग किया है। पथरौली गांव निवासी और राजकीय इंटर कॉलेज देवलथल के कक्षा नौवीं के छात्र राहुल चंद्र बड़ की पहल पर गांव में पुस्तकालय की स्थापना की गई है। पुस्तकालय में साहित्यिक पुस्तकों के अलावा बाल साहित्य, प्रतियोगी साहित्य, बाल साहित्य के अलावा कई पत्रिकाएं भी पुस्तकालय में रखी गई हैं। जीआईसी देवलथल में सामाजिक विज्ञान के अध्यापक महेश पुनेठा ने बताया कि बुधवार 15 फरवरी को पथरौली के ग्राम प्रधान हरीश चंद्र बड़ से पुस्तकालय का उद्घाटन करवाया गया। पुस्तकालय के लिए ग्राम प्रधान के भाई जगदीश चंद्र बड़ ने कमरा और फर्नीचर उपलब्ध करवाया है। पुनेठा के मुताबिक शुरुआत में जन सहयोग और उनके पुस्तकालय से 50 किताबें और कुछ पत्रिकाएं रखी गई हैं। कहा कि अभी पुस्तकालय के लिए किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा है। बताया कि पुस्तकालय के सफल संचालन के लिए छात्रों की एक संचालन समिति का भी गठन किया गया है। इसका अध्यक्ष राहुल को ही बनाया गया है। महेश पुनेठा ने बताया कि राहुल सें प्रेरित होकर उसैल गांव में नौंवी के ही श्वेता पांडे और विजय पांडे ने एक और पुस्तकालय की शुरुआत कर दी है। इसमें उन्हें गांव के बुजुर्गों ने सहयोग किया है। उन्होंने बताया कि छात्र राहुल विद्यालय में होने वाली कई रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ा है। पढ़ाई में अव्वल होने के साथ ही राहुल अच्छा वक्ता भी है। उसने  बताया कि वह विज्ञान में रुचि रखने के साथ ही विद्यालय की मासिक दीवार पत्रिका ‘कल्पना’ का भी संपादन करता है। आजकल गांव के पढ़ने का माहौल कम होता जा रहा है। इसी कारण मेरे मन में गांव में पुस्तकालय खोलने का विचार आया। जब गांव में प्रधान और अन्य लोगों से बातचीत की तो उन्होंने सहयोग किया। गांव में पुस्तकालय खुलने से ग्रामीणों और विद्यार्थियों में साहित्य के प्रति रुचि पैदा होने के साथ ही गांव में रचनात्मक गतिविधियां बढ़ने की भी उम्मीद है। इसके अलावा पुस्तकालय में रखा गया साहित्य पढ़ने से गांव में फैलने वाली कुरीतियों को रोकने में भी मदद मिलेगी।