Tuesday, September 8, 2026
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बंगाल के स्कूली विद्यार्थियों को मिलेगी डिजिटल पहचान

 

– अपार आईडी से जुड़ेगा पूरा शैक्षणिक रिकॉर्ड
कोलकाता, नि.सं.। पश्चिम बंगाल के स्कूली विद्यार्थियों के लिए शिक्षा व्यवस्था में डिजिटल बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की तैयारी की जा रही है। राज्य सरकार केंद्र सरकार के सहयोग से विद्यार्थियों की शैक्षणिक पहचान को डिजिटल स्वरूप देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों के लिए अपार आईडी (ऑटोमेटेड परमानेंट अकादमिक अकाउंट रजिस्ट्री) तैयार की जाएगी, जिसके माध्यम से उनके पूरे शैक्षणिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज और रिकॉर्ड एक ही डिजिटल पहचान से जोड़े जा सकेंगे। व्यवस्था लागू होने के बाद प्रत्येक विद्यार्थी को 12 अंकों वाली एक विशिष्ट पहचान संख्या मिलने की बात कही जा रही है। अपार को विद्यार्थियों की स्थायी डिजिटल शैक्षणिक पहचान के रूप में विकसित किया जा रहा है। अपार आईडी के माध्यम से विद्यार्थियों के अंकपत्र, प्रमाणपत्र, डिग्री, डिप्लोमा और अन्य शैक्षणिक उपलब्धियों से जुड़े दस्तावेज डिजिटल रूप से एक स्थान पर उपलब्ध कराए जा सकेंगे। इससे विद्यार्थियों को अपने शैक्षणिक दस्तावेजों को बार-बार भौतिक रूप में संभालने और विभिन्न संस्थानों में प्रस्तुत करने की आवश्यकता कम होने की उम्मीद है। इस डिजिटल व्यवस्था को डिजिलॉकर और अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स जैसी प्रणालियों से जोड़ने की योजना है। इससे भविष्य में उच्च शिक्षा में प्रवेश, एक संस्थान से दूसरे संस्थान में स्थानांतरण तथा शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया अधिक सुविधाजनक हो सकती है। अपार आईडी को केवल स्कूल स्तर तक सीमित नहीं रखा जाएगा। विद्यार्थियों के आगे की पढ़ाई से संबंधित रिकॉर्ड भी इस डिजिटल पहचान से जुड़े रह सकते हैं। उच्च शिक्षा में प्रवेश के दौरान दस्तावेजों के सत्यापन से लेकर भविष्य में रोजगार से जुड़ी आवश्यकताओं तक इसका उपयोग होने की संभावना है। डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने से विद्यार्थियों को प्रमाणपत्रों और अन्य दस्तावेजों की प्रतियां लेकर अलग-अलग संस्थानों के चक्कर लगाने की परेशानी कम हो सकती है। साथ ही शैक्षणिक रिकॉर्ड के व्यवस्थित डिजिटल संरक्षण से दस्तावेजों के रखरखाव और सत्यापन की प्रक्रिया भी आसान होने की उम्मीद है। नाबालिग विद्यार्थियों के लिए अपार आईडी तैयार करने से पहले अभिभावकों की सहमति आवश्यक होगी। यानी माता-पिता या अभिभावक की अनुमति के बिना नाबालिग विद्यार्थियों की डिजिटल शैक्षणिक पहचान तैयार नहीं की जाएगी। इस व्यवस्था में विद्यार्थियों के व्यक्तिगत और शैक्षणिक आंकड़ों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण माना गया है। पश्चिम बंगाल में डिजिटल शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के साथ अपार आईडी को विद्यार्थियों की शैक्षणिक यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल पहचान के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह विद्यार्थियों के शैक्षणिक दस्तावेजों के प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ने मनाया संस्कृत दिवस 

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ने संस्कृत दिवस मनाया जिसमें संस्कृत के महत्वपूर्ण श्लोकोच्चारण, मंत्र और विष्णु ध्यान किए गए। यह कार्यक्रम संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और इसके ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए किया गया। यह प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षा बंधन) के दिन मनाया जाता हैऔर प्राचीन ज्ञान परंपरा के सम्मान में मनाया गया।संस्कृत को विश्व की सबसे पुरानी और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक माना जाता है। हमारे अधिकांश प्राचीन ग्रंथ, वेद, उपनिषद और दर्शन इसी भाषा में रचे गए हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ वसुंधरा मिश्र ने वंदे मातरम् के गायन से किया और श्लोकों को सुनाया जिसे विद्यार्थियों ने भी दोहराया। विद्यार्थियों ने गायत्री मंत्र और वेदों से श्लोक की आवृत्ति की। रेक्टर और डीन प्रोफेसर दिलीप शाह ने कहा कि कालेज के लिए यह ऐतिहासिक दिन है जहां पहली बार संस्कृत दिवस मनाया जा रहा है और महत्वपूर्ण श्लोक सुनाए।प्रातः कालीन कॉमर्स विभाग की वाइस प्रिंसिपल प्रोफेसर मीनाक्षी चतुर्वेदी ने संस्कृत भाषा में अपना परिचय देते हुए संस्कृत के वैज्ञानिक और वैश्विक पक्ष को रखा और श्लोक सुनाए।प्रो नितिन चतुर्वेदी ने कई श्लोक सुनाए जिसमें अपनी गलतियों के लिए ईश्वर से क्षमा प्रार्थना की जाती है। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए कहा कि कार्यक्रम का आयोजन और संयोजन प्रो गार्गी ने किया। इस अवसर पर पचास से अधिक छात्र छात्राओं और शिक्षक शिक्षिकाओं की उपस्थिति रही।

शिक्षक दिवस विशेष : यह है गुरू पूर्णिमा व शिक्षक दिवस में अन्तर

 हमारे जीवन में कोई न कोई ऐसा जरूर होता है, जो हमें सही ज्ञान और मार्ग दिखाता है। वे हमें अच्छे कार्य और सही फैसले लेने में मदद करते हैं। ये लोग हमारे जीवन में गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक भी हो सकते हैं। भारतीय संस्कृति में दो सबसे खास मौकों पर गुरु की अमूल्य भूमिका का जश्न मनाया जाता है। यह है गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस। यद्यपि दोनों ही मौकों पर शिक्षा की भावना का सम्मान किया जाता है। आइए इन दो सबसे जरूरी उत्सवों के बीच के अंतर को गहराई से समझते हैं।

गुरु पूर्णिमा क्या है?

गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में गुरु को समर्पित एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है जो एक शिक्षक या आध्यात्मिक मार्गदर्शक होते हैं। चंद्र पंचांग के मुताबिक गुरु पूर्णिमा आषाढ़ महीने (जुलाई-अगस्त) की पूर्णिमा के दिन पड़ती है। यह दिन ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाले गुरुओं और शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता करने के लिए समर्पित है।

रीति-रिवाज और परंपराएं  –इस दिन भक्त अक्सर अपने गुरुओं को श्रद्धा अर्पित करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। लोग सम्मान के रूप में फल, फूल और मिठाइयां चढ़ाते हैं। कई लोग ध्यान में बैठते हैं और आध्यात्मिक प्रवचनों में लीन होकर अपने अंतर्मन और अपने गुरुओं की शिक्षाओं से जुड़ते हैं।

शिक्षक दिवस क्या है? –भारत में शिक्षक दिवस हर साल 5 सितंबर को भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और एक सम्मानित शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है। जब वे राष्ट्रपति बने तो उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का अनुरोध किया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुझाव दिया कि उन्हें मनाने के बजाय हमें अपने शिक्षकों के महत्व को पहचानना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के बीच अंतर

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस दोनों ही ज्ञान प्रदान करने वालों का सम्मान करने का दिन है। फिर भी उनमें कुछ जरूरी अंतर है-

उत्पत्ति और प्रेरणाएं – गुरु पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक और दर्शन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, जो गुरु-शिष्य उत्सव का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर शिक्षक दिवस औपचारिक शिक्षकों और शैक्षणिक समाज में उनके योगदान को आधुनिक रूप से मान्यता प्रदान करने का तरीका है। गुरु पूर्णिमा अलग-अलग धर्मों और आध्यात्मिक शिक्षकों को सम्मानित करने का दिन है, जबकि शिक्षक दिवस मुख्य रूप से स्कूल और विश्वविद्यालय के शिक्षकों पर केंद्रित है।

शिक्षक दिवस विशेष : बिहार के तीन नेता, जो पहले शिक्षक थे

पटना । बिहार की धरती ने देश को एक से बढ़कर एक हस्तियां दी हैं, जिन्होंने न केवल राजनीति के गलियारों में अपनी छाप छोड़ी, बल्कि शिक्षा के दम पर समाज को एक नई दिशा भी दी। शिक्षक दिवस पर हम आपको बिहार के तीन शिक्षकों के बारे में बताएंगे, जो राजनीति में आए तो उन्होंने इतिहास बना दिया। उनका नाम देश के नाम में दर्ज हो गया। ये तीन हस्तियां हैं- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह और डॉ. जगन्नाथ मिश्र। आइए जानते हैं इनके बारे में –
डॉ. राजेंद्र प्रसाद: ज्ञान और सादगी के प्रतीक

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि शिक्षा कैसे इंसान को महान बनाती है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में ही की थी। उन्होंने मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में कुछ समय के लिए अंग्रेजी के प्रोफेसर और प्रिंसिपल के रूप में सेवा दी। एलएलएम में गोल्ड मेडलिस्ट राजेंद्र प्रसाद को अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और बंगाली भाषा की भी जानकारी दी। आगे चलकर देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े और वकील की भूमिका निभाने लगे। इस दौरान जब महात्मा गांधी ने विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की तो राजेंद्र बाबू ने अपने बेटे मृत्युंजय प्रसाद को कोलकाता विश्वविद्यालय से निकालकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवा दिया था। महात्मा गांधी उनकी सादगी से काफी प्रभावित थे।
भारत के आजाद होने के बाद राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। बतौर राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में किसी को दखल देने का मौका नहीं दिया। उन्होंने राष्ट्रपति रहने के दौरान हिन्दू अधिनियम जैसे कई ऐतिहासिक फैसले हुए, जो इतिहास में दर्ज हो गए।

‘बिहार विभूति’ डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह

‘बिहार विभूति’ के नाम से जाने जाने वाले डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने डॉ राजेन्द्र प्रसाद के साथ चंपारण सत्याग्रह में भी भाग लिया था। राजनीति में आने से पहले अनुग्रह बाबू का जीवन भी शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा था। उन्होंने टीएनबी कॉलेज, भागलपुर में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में काम किया था। एक शिक्षक के रूप में अनुग्रह नारायण सिंह का मानना था कि बिना नैतिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता। जब उनकी सरकार बनी और वे बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री व वित्त मंत्री बने तो उन्होंने इसी फॉर्मूले पर सूबे में काम किया। उन्होंने राज्य के श्रम मंत्री रहते हुए पहली बार जापानी ढंग से धान उपजाने की पद्धति का प्रचार कराया। पूसा का कृषि अनुसंधान फार्म अनुग्रह नारायण सिंह की ही देन है।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र: प्रोफेसर से मुख्यमंत्री तक का सफर

डॉ. जगन्नाथ मिश्र का नाम बिहार की राजनीति में एक ऐसे राजनेता के रूप में जाना जाता है जो मूलतः एक अर्थशास्त्री और शिक्षक थे। राजनीति में सीएम जैसे पद पर पहुंचने के बावजूद उनकी पहचान एक विद्वान की रही। उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में सालों तक युवाओं को पढ़ाया और कई किताबें लिखीं। मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के लिए कई बड़े कदम उठाए। वर्ष 1980 में उनके कार्यकाल के दौरान ही उर्दू को बिहार की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया था। उनके कार्यकाल में ही बिहार में हजारों प्राथमिक शिक्षकों की बहाली हुई और बड़ी संख्या में गैर-सरकारी स्कूलों व कॉलेजों का अधिग्रहण कर शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिश की गई।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

कहां से आई कलाकंद मिठाई

कलाकंद एक स्वादिष्ट भारतीय मिठाई है जो दूध से बनती है और इसे हर उम्र के लोग पसंद करते हैं। इसे दिवाली, रक्षा बंधन, गणेश चतुर्थी जैसे कई त्योहारों पर खाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मिठाई कैसे अस्तित्व में आई? अधिक जानने के लिए पढ़ते रहिए। भारतीय व्यंजन अपने तीखे और चटपटे स्वादों के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें लज़ीज़ करी, रोटी और देश भर में मिलने वाली तरह-तरह की चाय शामिल हैं। लेकिन इतना ही नहीं, भारतीय व्यंजनों में अनगिनत प्रकार की मिठाइयाँ भी हैं , जिनमें से हर एक अपने आप में एक आनंददायक अनुभव प्रदान करती है। इनमें से एक है मलाईदार, मुलायम और लोकप्रिय कलाकंद । भारतीय मिठाइयों का एक समृद्ध इतिहास है, जिनमें से कई मिठाइयाँ वर्षों पुरानी हैं और कुछ ऐसी मिठाइयाँ भी हैं जिनका आविष्कार भारत में पहली बार नहीं हुआ था, लेकिन अब वे आम खाद्य पदार्थों का हिस्सा हैं, जैसे कि गुलाब जामुन, जिसका आविष्कार फारस में हुआ था और फिर इसे मध्यकालीन भारत में लाया गया था।

कलाकंद एक भारतीय मिठाई है जिसे दिवाली, गणेश चतुर्थी और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर खूब खाया जाता है। यह फुल फैट दूध, इलायची पाउडर और चीनी से बनाई जाती है। भारत में यह इतनी लोकप्रिय है कि आपको शायद ही कोई मिठाई की दुकान ऐसी मिलेगी जहाँ यह मिठाई न मिले। यह एक पारंपरिक मिठाई है जो दिवाली के उत्सवों में प्रमुख मिठाइयों में से एक है और इसका अपना एक समृद्ध इतिहास है।

कलाकंद का इतिहास – ऐसा माना जाता है कि कलाकंद का आविष्कार राजस्थान के अलवर शहर में हुआ था। बाबा ठाकुर दास ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने हमें प्रसिद्ध कलाकंद दिया। राजस्थान में कलाकंद को अलवर कलाकंद के नाम से भी जाना जाता है। राजस्थानी लोग अपने कलाकंद पर बहुत गर्व करते हैं।

परंपरागत रूप से, कलाकंद बनाना एक श्रमसाध्य प्रक्रिया है क्योंकि इसे सही तरीके से बनाने में कई घंटे लग सकते हैं। इसमें लगातार हिलाना भी पड़ता है, इसलिए अगर आप कलाकंद बनाने की योजना बना रहे हैं तो तैयार रहें। यही कारण है कि दूध को ठोस बनाने की इस कठिन प्रक्रिया के कारण कई लोग आमतौर पर घर पर कलाकंद बनाना पसंद नहीं करते हैं। लेकिन समय के साथ, कलाकंद बनाने में लगने वाले समय को कम करने के लिए पनीर का उपयोग करने जैसे कई तरीके या विकल्प सामने आए हैं। आइए जानते हैं कि आप इस मिठाई को घर पर कैसे बना सकते हैं।

कलाकंद रेसिपी

सामग्री : 2 कप कसा हुआ पनीर, 1 कप मीठा गाढ़ा दूध, 1/4 कप दूध, 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर, सजावट के लिए कटे हुए मेवे

विधि :  सबसे पहले एक ट्रे को मक्खन या घी से चिकना कर लें । एक नॉन स्टिक पैन को मध्यम आंच पर गर्म करें और उसमें कसा हुआ पनीर और दूध डालें । 5-6 मिनट तक या मिश्रण के गाढ़ा होने तक पकाएं । मिश्रण में गाढ़ा दूध मिलाएं और पूरी तरह से मिल जाने तक हिलाते रहें । मिश्रण को धीमी आंच पर पकने दें। गांठें पड़ने से रोकने के लिए इसे लगातार चलाते रहें। मिश्रण गाढ़ा होने तक ऐसा करते रहें। इस प्रक्रिया में 15-20 मिनट लग सकते हैं  । बाद में, इलायची का पाउडर डालें और इसे अच्छी तरह मिला लें । मिश्रण को चिकनाई लगे ट्रे या पैन पर समान रूप से फैला दें। चाहें तो ऊपर से कटे हुए मेवे भी डाल सकते हैं  । इसे जमने के लिए कुछ घंटों के लिए फ्रिज में रखने से पहले कमरे के तापमान पर ठंडा होने दें  । जब यह जम जाए, तो इसे मनचाहे आकार में काट लें और परोसें।

(साभार – स्लर्प डॉट  कॉम)

पारंपरिक दूध के पोषक गुणों से भरपूर  लैक्टोज फ्री मिल्क

बचपन से हम दूध, दही और पनीर के फायदों के बारे में सुनते आए हैं। इनमें मौजूद कैल्शियम, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व शरीर के लिए जरूरी माने जाते हैं। लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे कि एक ऐसी फैक्ट्री है जहां बिना किसी गाय से एक बूंद दूध निकाले ही असली दूध, दही और पनीर बनाया जा रहा है? जी हां, ये लैक्टोज फ्री मिल्क है जो पारंपरिक दूध के पोषक गुणों से भरपूर है। यह क्रांति इजरायली कंपनी रेमिल्क (Remilk) की बदौलत संभव हुई है। कंपनी का दावा है कि उसने दुनिया की पहली ऐसी डेयरी फैक्ट्री विकसित की है जहां गायों की कोई जरूरत नहीं पड़ती। रीमिल्क प्रेसिजन फर्मेंटेशन तकनीक का इस्तेमाल करती है। इसमें खमीर (यीस्ट) जैसे सूक्ष्मजीवों को इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि वे गाय के दूध वाले प्रोटीन (जैसे व्हे और केसीन) पैदा करें। ये प्रोटीन रासायनिक रूप से बिल्कुल वही होते हैं जो गाय के दूध में पाए जाते हैं। परिणामस्वरूप बना दूध स्वाद, बनावट और पोषण में पारंपरिक दूध जैसा ही होता है। लेकिन इसमें लैक्टोज, कोलेस्ट्रॉल, हार्मोन और एंटीबायोटिक्स नहीं होते।

असली दूध से ज्यादा गुणकारी

कंपनी इसे “रियल डेयरी, नो काउज” कहती है। इस दूध से दही, पनीर, आइसक्रीम और अन्य डेयरी उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं। रीमिल्क की स्थापना 2019 में अवीव वोल्फ और ओरी कोहावी ने की थी। कंपनी ने अमेरिका के एफडीए, सिंगापुर और इजरायल के स्वास्थ्य मंत्रालय से मंजूरी हासिल की है। हाल ही में इजरायल में गैड डेयरिज के साथ साझेदारी में “द न्यू मिल्क” लॉन्च किया गया। कैफे, रेस्तरां और जल्द सुपरमार्केट में यह उपलब्ध हो रहा है। बारिस्टा स्टाइल मिल्क भी बाजार में आ चुका है जो कॉफी में बढ़िया फोम बनाता है। पर्यावरण के लिहाज से यह तकनीक बहुत फायदेमंद बताई जाती है। रीमिल्क का दावा है कि उनकी प्रक्रिया में पारंपरिक डेयरी की तुलना में सिर्फ 1 प्रतिशत जमीन, 4 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और 5 प्रतिशत पानी लगता है। पशुओं पर निर्भरता खत्म होने से पशु कल्याण भी बेहतर होता है।

जन्माष्टमी विशेष : ये हैं देश के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और इस बार यह शुभ तिथि 4 सितंबर दिन शुक्रवार को है।  भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण का विशेष स्थान है।  उनके जीवन, लीलाओं और शिक्षाओं से जुड़े अनेक मंदिर देश के अलग-अलग राज्यों में आस्था का विशेष महत्व रखते हैं।  इन मंदिरों की विशेषता केवल उनकी भव्यता या धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, इनके पीछे पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं।  आइए जन्माष्टमी के मौके पर कृष्णजी के इन मंदिरों के बारे में…

अनंत वासुदेव मंदिर : भुवनेश्वर में स्थित यह मंदिर बिंदु सरोवर और लिंगराज मंदिर के निकट है, जिसमें भगवान (कृष्ण), भगवान अनंत (बलराम) और देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है।  मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का महाप्रसाद है।  इसे मिट्टी के बर्तन में चूल्हे पर पकाया जाता है।  पूर्वी गंगा वंश की रानी चंद्रिका देवी ने 13वीं शताब्दी में अनंत वासुदेव मंदिर का निर्माण करवाया था।  हालांकि, मंदिर को लेकर मान्यता है कि पहले भी इसी स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा की जाती थी।  17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मराठों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, जिन्होंने तब तक ओडिशा (पूर्ववर्ती कलिंग) तक अपना शासन फैला लिया था।  यहां जन्माष्टमी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।  इस दिन मंदिर को फूलों और दीपों से खूबसूरती से सजाया जाता है।

इस्कॉन मायापुर, पश्चिम बंगाल : यह मंदिर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का पवित्र केंद्र माना जाता है।  15वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने यहीं से ‘संकीर्तन आंदोलन’ (हरे कृष्ण महामंत्र का प्रचार) की शुरुआत की थी।  बताया जाता है कि वर्तमान में मायापुर में दुनिया का सबसे बड़ा वैदिक मंदिर बनकर तैयार हो रहा है।  इस विशाल मंदिर के निर्माण का सपना श्रील प्रभुपाद का था।

नवद्वीप धाम : सन 1486 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन नदिया (पश्चिम बंगाल) के नवद्वीप धाम में चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था।  गौड़ीय संप्रदाय के शास्त्रों के अनुसार, नवद्वीप को ‘गुप्त वृंदावन’ कहा जाता है।  माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी के भावों को समझने और स्वयं एक भक्त का आनंद लेने के लिए चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लिया था।  महाप्रभु ने नवद्वीप की गलियों से ही मृदंग और करताल के साथ ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का सामूहिक कीर्तन शुरू किया था।  मात्र 24 वर्ष की आयु में, चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप के कटवा नामक स्थान पर केशव भारती से संन्यास की दीक्षा ली और उनका नाम ‘कृष्ण चैतन्य’ पड़ा।  जब वे नवद्वीप छोड़कर जा रहे थे, तो पूरे नदिया क्षेत्र में शोक छा गया था।  उनकी पत्नी विष्णुप्रिया और माता शची देवी के विरह की कहानियां आज भी इस क्षेत्र के लोकगीतों और इतिहास में अमर हैं।

द्वारकाधीश गोपाल मंदिर (उज्जैन) : यह मंदिर अपने ऐतिहासिक और चमत्कारी चांदी के दरवाजों के लिए प्रचलित है।  मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में मराठा शासक दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई शिंदे ने करवाया था।  यह संरचना पहले सिंधिया राजघराने की संपत्ति थी, जिसे बाद में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर के रूप में स्थापित किया गया।  आज यह मंदिर भक्ति, इतिहास और मराठा वास्तुकला का अद्भुत प्रतीक है।

इस मंदिर के पीछे एक और विशेष परंपरा जुड़ी है, जिसे ‘हरिहर पर्व’ कहा जाता है।  मान्यता है कि साल में एक बार जन्माष्टमी या उसके आस-पास के विशेष अवसरों पर राजा महाकाल (शिव) की सवारी रात के समय इस गोपाल मंदिर में आती है।  स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पर्व पर हरि (भगवान कृष्ण) और हर (भगवान शिव) का मिलन होता है और कई घंटों तक विशेष पूजा-अर्चना चलती है।  मंदिर का मुख्य आकर्षण चांदी का दरवाजा है।

(साभार – न्यूज 18)

 

जन्माष्टमी पर कान्हा को लगाइए इन व्यंंजनों का भोग

धनिया पंजीरी

 सामग्री : 2 कप धनिया पाउडर, ¼ कप घी,10-12 कटे हुए काजू,10-12 कटे हुए बादाम,1 कप मखाना, ½ कप पीसी शक्कर,1/2 टीस्पून इलायची पाउडर

विधि : धनिया पंजीरी बनाने के लिए सबसे पहले साबूत धनिया लेकर इसे मीडियम आंच पर सूखा ही भून लें। पंजीरी में डालने के लिए काजू, बादाम और मखाने को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। एक पैन में 1 चम्मच देसी घी डालकर काजू-बादाम और मखाने को भून लें। भुने हुए धनिया को हल्का ठंडा होने पर मिक्सी में दरादरा पीस लें। अब बाउल में पिसा हुआ धनिया, मेवा और पीसी शक्कर मिलाएं। आप इसमें इलायची पाउडर और बाकी का सारा घी डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें। टेस्टी और आसान धनिया पंजीरी बनकर तैयार है। इसके लिए आपको आटा भूनने की भी जरूरत नहीं होगी। इस पंजीरी को भगवान कृष्ण के भोग में चढ़ाएं और बाद में प्रसाद के रूप में खुद भी खाएं।

मखाना पाग

सामग्री : 3 कप (लगभग 100 ग्राम) फूल मखाना,1.5 कप चीनी, 3/4 कप पानी,1/2 कप कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल, 1/4 कप (बारीक कटे हुए) काजू और बादाम,2 बड़े चम्मच खरबूजे के बीज (मगज), 1/2 छोटी चम्मच हरी इलायची पाउडर, 3 से 4 बड़े चम्मच देसी घी ।

विधि  : एक भारी तले की कढ़ाई में 2 चम्मच देसी घी गरम करें। सबसे पहले इसमें कटे हुए काजू, बादाम और खरबूजे के बीज डालकर हल्का सुनहरा होने तक भून लें और एक प्लेट में निकालें। अब उसी कढ़ाई में बचा हुआ घी डालें और धीमी आंच पर मखानों को लगातार चलाते हुए 5-6 मिनट तक भूनें। जब मखाने उंगली से दबाने पर आसानी से टूटने लगें, तो गैस बंद कर दें। मखानों के ठंडा होने पर उन्हें मिक्सी में डालकर दरदरा पीस लें। इसी के साथ कद्दूकस नारियल को भी हल्का सा सूखा भून लें। कढ़ाई में चीनी और पानी डालकर मध्यम आंच पर चढ़ाएं। चीनी के पूरी तरह से पिघलने के बाद इसे 4-5 मिनट तक उबलने दें। हमें एक तार की चाशनी बनानी है। चाशनी को जांचने के लिए एक बूंद उंगली और अंगूठे के बीच चिपकाकर देखें, अगर एक तार बनता दिखे तो चाशनी तैयार है। अब इसमें इलायची पाउडर मिला दें। आंच को एकदम धीमा करें। चाशनी में दरदरा पिसा मखाना, भुना नारियल और तले हुए ड्राई फ्रूट्स डालें। सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाएं और तब तक लगातार चलाते रहें जब तक कि मिश्रण कढ़ाई का तला न छोड़ने लगे और गाढ़ा न हो जाए। अब एक थाली या ट्रे में थोड़ा सा घी लगाकर उसे चिकना कर लें। तैयार मिश्रण को थाली में पलटें और चम्मच की मदद से फैलाएं। जब पाग थोड़ा गुनगुना रहे, तभी चाकू की मदद से अपनी पसंद के चौकोर या बर्फी के आकार में काट लें। पूरी तरह ठंडा होने के बाद पाग की टुकड़ियों को अलग कर लें। आपका कृष्ण प्रिय मखाना पाग तैयार है। भगवान श्री कृष्ण को तुलसी दल रखकर यह पाग अर्पित करें।

भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज को एकेडमी लीडर आफ दी ईयर अवार्ड

कोलकाता । दी भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ने सर्वश्रेष्ठ एसोचैम एडु मीट 2026का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त किया है।इस सम्मान का विषय “शिक्षा का भविष्य और कौशल –विजन 2030″रहा। भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज को यह पुरस्कार उसके उन्नत प्रगतिशील एकेडमिक शिक्षा , और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम विश्वविद्यालय की स्थापना आदि में अपना योगदान देने की पहचान बनाने के कारण  है। 21अगस्त 2026को यह ताज कुटीर कोलकाता में ऑस्ट्रेलिया के काउंसलेट जनरल काउंसिल जनरल एच. ई.बर्नार्ड लिंच द्वारा प्रो दिलीप शाह और प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी को सौंपा गया।इस अवसर पर प्रो दिलीप शाह ने अपने वक्तव्य में शिक्षा के भविष्य पर अपने विचार व्यक्त किए। कॉलेज ने उनके सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी के वार्षिक पुरस्कार के लिए नामांकन किया ।यह भवानीपुर परिवार के लिए गौरव की बात है। जानकारी दी डाक्टर वसुंधरा मिश्र ने।

एनसीसी कैडेटों और सशस्त्र बलों के बीच रक्षा सूत्र बांधे

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज के त्रि-सेवा एनसीसी विंग ने, 31 बंगाल बीएन एनसीसी, 2 बंगाल नेवल यूनिट एनसीसी और 1 बंगाल एयर स्क्वाड्रन एनसीसी*, पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय के तत्वावधान में, रक्षा बंधन 2026 को “मेन इन यूनिफॉर्म” के साथ मनाया, जिसकी शुरुआत बहादुर कर्मियों के साथ हुई*बिहार रेजिमेंट की 14वीं बटालियन* अल्बर्ट एक्का ऑडिटोरियम, विजय दुर्ग में।उनके साहस, समर्पण और सेवा के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि के रूप में, एसडब्ल्यू कैडेटों ने राष्ट्र की सेवा के लिए खुद को समर्पित करने वालों के प्रति अपना आभार और स्नेह व्यक्त करते हुए, उपस्थित सभी रैंकों के बीच राखी बांधी और मिठाइयां बांटीं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि इस उत्सव ने एनसीसी कैडेटों और सशस्त्र बलों के बीच बंधन को मजबूत करते हुए सम्मान, सौहार्द और कृतज्ञता की भावना को खूबसूरती से प्रतिबिंबित किया।