Thursday, October 1, 2026
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बाल विवाह के मामलों में आयी कमी : सरकार

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नयी दिल्ली : सरकार ने कहा कि एक सर्वेक्षण के अनुसार 20-24 वर्ष के आयु वर्ग की ऐसी महिलाएं जिनका बाल विवाह हुआ था, उनका प्रतिशत 2014-15 में घटकर 26.8 फीसदी रह गया, जो 2005-06 में 47.4 प्रतिशत था।

महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री वीरेन्द्र कुमार ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार लड़के-लड़कियों में 0-9 वर्ष के आयुवर्ग में कोई विवाह नहीं हुए थे। उन्होंने कहा कि कम आयु में विवाह लड़के-लड़की दोनों के लिए हानिकारक है तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कदम उठा रहा है।

उन्होंने 2011 की जनगणना के आंकड़ों के हवाले से बताया कि बाल विवाह के मामले में राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल और झारखंड उच्च प्रतिशत के साथ शीर्ष पर हैं।

 

हिमाचल के नए सीएम ने करीब से देखी है गरीबी

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हिमाचल के मुख्यमंत्री बने जयराम ठाकुर ने बहुत करीब से गरीबी देखी है। वे प्रदेश के 13वें मुख्यमंत्री बनेंगे। जयराम ठाकुर का जन्म 6 जनवरी 1965 को मंडी जिले की थुनाग तहसील के तांदी गांव में राजपूत परिवार में हुआ है।

उनकी शिक्षा बगस्याड़ से हुई है। जेठूराम और ब्रिकमू देवी के घर में जन्मे जयराम ठाकुर का बचपन बेहद गरीबी में कटा है।

परिवार में तीन भाई और दो बहनें हैं। पिता खेतीबाड़ी और मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। जयराम तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं।

इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई में परिवार वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कुराणी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद बगस्याड़ से उच्च शिक्षा लेकर वे मंडी आ गए।

मंडी कॉलेज से बीए करने के साथ एबीवीपी और संघ से जुड़कर कार्य करते रहे। 1986 में एबीवीपी के जॉइंट सेक्रेटरी रहे। 1989-93 तक भाजयुमो के स्टेट सेक्रेटरी रहे।

जम्मू-कश्मीर जाकर एबीवीपी का प्रचार किया और 1992 में घर लौटे। वर्ष 1993 में जयराम को भाजपा ने सिराज विधानसभा क्षेत्र से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा।

जयराम यह चुनाव हार गए थे। घरवालों ने जयराम का राजनीति में जाने का विरोध किया था। जयराम ठाकुर के बड़े भाई बीरी सिंह बताते हैं कि परिवार के सदस्यों ने जयराम ठाकुर को राजनीति में न जाकर खेतीबाड़ी संभालने की सलाह दी थी।

इसकी वजह परिवार की आर्थिक तंगी थी। जयराम ठाकुर अपने दम पर राजनीति में डटे रहने का निर्णय लिया और विस चुनाव लड़ा।

उस वक्त वे महज 26 वर्ष के थे। यह चुनाव जयराम ठाकुर हार गए। 1998 में भाजपा ने फिर जयराम ठाकुर को चुनावी रण में उतारा। इस बार जयराम ने जीत हासिल की। इसके बाद कभी हार का मुंह नहीं देखा।

वर्ष 1995 में उन्होंने जयपुर की डॉ. साधना सिंह से शादी की। जयराम ठाकुर की दो बेटियां हैं।

वे एक बार सिराज मंडल भाजपा के अध्यक्ष, एक बार प्रदेशाध्यक्ष, राज्य खाद्य आपूर्ति बोर्ड के उपाध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 2006-09 तक जयराम के प्रदेशाध्यक्ष रहते भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।

जयराम ठाकुर की 79 वर्षीय मां बिक्रमू देवी बेटे की इस उपलब्धि पर फूली नहीं समा रही हैं। पूछने पर प्रसन्न आवाज में कहती हैं – मेरा बेटा सीएम बन गया। काश उसके पिता बेटे का इतना बड़ा राजनीतिक कद देखने के लिए जिंदा होते।

मजदूरों की तरह मेहनत कर मेरे पति ने इस परिवार को अपने कंधों पर खड़ा किया है। जयराम के पिता जेठूराम का देहांत 25 दिसंबर, 2016 को हुआ था। उनकी मां कहती हैं कि इस परिवार ने बड़ी गरीबी देखी है। छोटी भाभी कहती हैं कि उनके ससुर काष्ठकुणी शैली के कारीगर थे। उन्होंने बैहली (लकड़ी को छीलने वाला यंत्र) से परिवार का बोझ उठाया है। सिराज विस क्षेत्र के लोग सीएम की ताजपोशी की खबर सुनते ही चहक उठे हैं।

 

आईएएस अफसर ने महिला को मिलवाया 50 साल पहले बिछड़े परिवार से

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निजी स्वार्थों और ढीले रवैये से ब्यूरोक्रेसी लालफीताशाही बनती जा रही है। लेकिन ब्यूरोक्रेसी की गिरती साख के बीच ऐसी कुछ खबरें दिख जाती हैं जो नौकरशाहों की नीयत पर फिर से यकीन पुख्ता कर देती हैं। यह कहानी आईएएस अधिकारी डॉ प्रीति गोयल के प्रयासों के बारे में है, जो एक परिवार के लिए बन गईं रियल लाइफ बजरंगी भाईजान। प्रीति ने अनीता नाम की एक महिला को उसके परिवार से 50 सालों बाद मिलवा दिया। बेहतर भारत का निर्माण सकारात्मकता पर आधारित है। प्रीति गोयल पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में एसडीओ के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बचपन से अपने पड़ोस में रहने वाली अनीता के मुंह से सुना था कि 1967 में पहले वह नागालैंड से आर्मी के एक ऑफिसर से शादी कर पंजाब आ गई थी। उस समय उनकी उम्र करीब 14 साल की थी। अनीता नागालैंड में अंगामी जनजाति की थीं।

उन्होंने 1967 में सेना के सैनिक वकील चंद सिंह को शादी कर ली, जिन्हें नागालैंड में तैनात किया गया था। वर्ष 1971 में अनीता अपने पति के साथ पंजाब में चली गईं और कभी भी नागालैंड में कभी वापस नहीं गईं। चंदसिंह सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद एक छोटा सा वस्त्र व्यापार शुरू किया। बाद में उनका निधन हो गया। अनीता अब बिल्कुल अकेली हो गई थीं। उन्हें मां बाप की याद सताने लगी जिनको उन्होंने वर्षों पहले छोड़ दिया था। अफसोस की बात ये थी, वह अपने अतीत के बारे में कुछ याद नहीं कर पा रही थीं। उन्हें बस अपने पिता का नाम याद था और एक सिनेमा हॉल की अस्पष्ट स्मृति थी। उनके मुताबिक ये सिनेमाहॉल उनके घर के करीब ही था।

अनीता के दो बेटों ने भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, डीएनए की सूचना दी। प्रीति अनीता के पड़ोसी थीं और अनीता से उनकी कहानियों और उनके परिवार के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। वह अनीता की इच्छा को पूरा करने के लिए बाहर निकलीं और नागालैंड में अनीता और उनके परिवार को फिर से एकजुट करने की मुहिम पर लग गईं। 2014 में आईएएस अधिकारी प्रीति ने नागालैंड में अनीता के परिवार के सदस्यों की खोज शुरू की। दो साल बाद, असफल प्रयासों के बाद, आखिरकार प्रीति नागालैंड में अनीता के परिवार के साथ संपर्क स्थापित करने में कामयाब हो गईं। प्रीति ने अनीता के परिवार को खोजने के लिए अपने सभी संसाधनों और उसके पूरे नेटवर्क का इस्तेमाल किया।

पहली सफलता तब हासिल हुई, जब नागालैंड में एक अंगाइ जनजाति के पुलिस निरीक्षक से प्रीति ने संपर्क किया। पुलिस निरीक्षक ने तुरंत लोगों को जुटाया और एक फोन कॉल करवाया, फिर एक वीडियो कॉल की व्यवस्था की। अनीता और उसके परिवार वालों ने जब 50 साल बाद फोन पर बात की तो वह 15 मिनट तक रोती रहीं क्योंकि 50 साल तक एक दूसरे को नहीं देखने के कारण शब्द भी शायद मूक हो गए थे। अनीता गोयल की पोती कामिनी सिंगला प्रीति गोयल को अपने जीवन की रियल बजरंगी भाईजान मानती है. जिन्होंने उसकी दादी को उनके 50 साल से बिछड़े परिवार से मिलाया। दोनों पक्ष के संतुष्ट हो जाने के बाद, अनिता पंजाब से नागालैंड आ गईं।

(साभार – योर स्टोरी)

 

पल्लवी फौजदार, जो बाइक राइडिंग में बना चुकी हैं कई विश्व रिकॉर्ड

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पल्लवी फौजदार का नाम लिम्का बुक आफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। दो बच्चों की मां पल्लवी की सबसे बड़ी ताकत उनका परिवार है। पति परीक्षित मिश्रा सेना में अधिकारी हैं। जबकि पल्लवी बाइकर के अलवा बेंगलुरू में बतौर फैशन डिजाइनर काम कर चुकी हैं। वे समाजसेवी और रेकी विशेषज्ञ भी हैं।

वे अपनी बाइक से विश्व की सबसे ऊंची झील में से एक देवताल (17950 फुट) तक भी पहुंच चुकी हैं। वे 6502 मीटर ऊंचे साताटोला दर्रे पर भी बाइक से जा चुकी हैं। इसके अलावा पल्लवी हिमालय के बर्फीले पहाड़ों की 5 हजार मीटर की ऊंचाई के 9 दर्रों और 19323 फीट ऊंचाई वाले उमलिंगला पर पहुंचने वाली पहली बाइकर हैं।
इससे पहले वे 18774 फीट की ऊंचाई वाले मानापास तक भी पहुंची हैं। इसी साल उन्हें भारत सरकार के नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।

 

भारतीय वैज्ञानिकों ने प्याज के छिलके से बनाई बिजली

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दुनिया के कई देश कृषि के कचरे से बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय इससे कहां पीछे रहने वाले। जी हां, आईआईटी खड़गपुर के विज्ञानियों ने प्याज के छिलके से बिजली बनाने वाली एक सस्ती डिवाइस का इजाद किया है। यह डिवाइस शरीर के मूवमेंट से ग्रीन बिजली उत्पन्न कर सकती है। इस बिजली का इस्तेमाल पेसमेकर, स्मार्ट गोलियां और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों में किया जा सकता है।पश्चिम बंगाल स्थित आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर भानू भूषण खातुआ ने कहा कि गैर-विषाक्त, बायोडिग्रेडेबल और बायोकॉम्पसिबेटेड डिवाइस प्याज के छिलकों से उपयुक्त पाइजेइलेक्ट्रिक गुणों का फायदा उठाते हैं।
पाइजेइलेक्ट्रिक सामग्री में रोजमर्रा के यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदलने की क्षमता होती है। विज्ञानियों ने अपने नए शोध में सस्ते दर पर बिजली उत्पादन करने में सफलता पाई है। एक आम व्यक्ति इस डिवाइस की मदद से प्याज के छिलकों से काफी किफायती बिजली का उत्पादन कर सकता है।

अंतरिक्ष में तैरने वाले पहले एस्ट्रोनॉट ब्रूस नहीं रहे 

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अंतरिक्ष में तैरने वाले पहले एस्ट्रोनॉट ब्रूस एमसीकैंडलेंस का कैलिफोर्निया में 80 साल की उम्र में निधन हो गया। उनकी मृत्यु के कारण का खुलासा नहीं किया गया है। ब्रूस फरवरी 1984 में पूरी दुनिया में चर्चा में आ गए थे, जब यान स्पेस शटल चैलेंजर से दूर होकर अंतरिक्ष में स्पेस वॉक करने की तस्वीरें सामने आई थीं। ब्रूस ने कुल 312 घंटे अंतरिक्ष में बिताए थे, जिनमें चार घंट वह सिर्फ अपने स्पेस सूट के सहारे अंतरिक्ष में रहे।

अपने पहले स्पेस वॉक के दौरान ब्रूस अंतरिक्ष यान से करीब 300 फुट की दूरी तक गए थे। उन्होंने कहा था कि वह इस मिशन को लेकर डरे नहीं थे क्योंकि वह इसके लिए बेहद प्रशिक्षित किये जा चुके थे। 2006 में अपने एक इंटरव्यू में ब्रूस ने कहा था, मैं वहां जाने के लिए बेचैन था। मैं बेहद शांत महसूस कर रहा था। उन्होंने बताया था कि वह चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रांग जैसा कुछ करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पहली स्पेस वॉक की।

 

देश में 8 करोड़ लोगों ने की हवाई यात्रा

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नयी दिल्ली : सरकार ने बताया है कि देश में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और साल 2016-17 में कुल 15.8 करोड़ यात्रियों ने हवाई सफर किया। लोकसभा में एंटो एंटोनी के प्रश्न के लिखित उत्तर में नागर विमानन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने पिछले तीन वर्षों का आंकड़ा पेश किया और कहा कि देश में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल  2016-17 में 15.84 करोड़ लोगों ने हवाई यात्रा की। इसी तरह 2015-16 में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या 13.49 करोड़ रही।

मंत्री की ओर से पेश आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2014-15 में 11.58 करोड़ लोगों ने यात्रा की थी।

 

अटल बिहारी वाजपेयी की दो कविताएँ

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अटल बिहारी वाजपेयी

 

क़दम मिलाकर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

 

हरी हरी दूब पर

हरी हरी दूब पर

ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|

25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है क्रिसमस

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25 दिसंबर को हर साल क्रिसमस डे के रुप में मनाया जाता है। इस साल भी ढेर सारी खुशियों और सेलिब्रेशन को लेकर क्रिसमस का त्योहार आ गया है। ईसाई समुदाय की मान्यता के अनुसार क्रिसमस से रौशनी का आरंभ होता है। इस दिन को यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाया जाता है। इस उत्सव पर अपने प्रियजनों को गिफ्ट्स देना, चर्च में आयोजन और सजावट करना शामिल होता है। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर की शाम को ही इस पर्व का उल्लास अपने चरम पर पहुंच जाता है। इसी के साथ इस दिन पेड़ सजाने की परंपरा है और गिफ्ट्स, लाइट आदि से सजे हुए पेड़ को क्रिसमस ट्री के नाम से जाना जाता है।

25 दिसंबर को ईसाई समुदाय के लोग यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि इस दिन ईसा मसीह का का जन्म नहीं हुआ था। चौथी शताब्दी से पहले ईसाई समुदाय इस दिन को त्योहार के रुप में नहीं मनाते थे, लेकिन चौथी शताब्दी के बाद इस दिन ईसाईयों का प्रमुख त्योहार मनाया जाने लगा। माना जाता है कि यूरोप में गैर ईसाई समुदाय के लोग सूर्य के उत्तरायण के मौके पर त्योहार मनाते थे। इस दिन सूर्य के लंबी यात्रा से लौट कर आने की खुशी मनाई जाती है, इसी कारण से इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है। इस दिन की प्रमुखता देखते हुए ही ईसाई समुदाय ने इस दिन को ईशू के जन्मदिन के रुप में चुना। क्रिसमस से पहले ईस्टर का पर्व ईसाई समुदाय का प्रमुख त्योहार माना जाता था।

क्रिसमस का त्योहार पूरे विश्व में लोग धूमधाम से मनाते हैं। ईसाई समुदाय के साथ गैर ईसाई समुदाय के लोग भी इस दिन इकठ्ठे होते हैं और एक दूसरे को गिफ्ट्स देते हैं। भारत में पाइन के पेड़ों की जगह लोग आम और केले के पेड़ों को भी सजाया जाता है। बच्चे इस दिन गिफ्ट्स पाने के लिए बहुत ही उत्सुक रहते हैं। क्रिसमस के दिन बच्चों में सांता क्लॉज को लेकर उत्सुकता रहती है। सांता निकोलस को सांता क्लॉज के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म ईसा मसीह की मृत्यु के लगभग 280 साल बाद मायरा नामक जगह पर हुआ था। उन्हें लोगों की मदद करना और सेवा करना बेहद पसंद था, वो यीशू के कदमों पर चलते थे। इसी कारण वो यीशू के जन्मदिन पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे।

 

मजेदार केक के साथ कीजिए सांता का स्वागत

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बिस्कुट केक

सामग्री : 150 ग्राम पारले जी बिस्कुट, 5-6 हाइड एंड सीक बिस्कुट, डेढ़ चम्मच बेकिंग पाउडर, एक तिहाई कप चीनी, डेढ़ कप दूध, 2 बड़े चम्मच बारीक कटे बादाम, 1 बड़ा चम्मच तेल

विधि : एक गहरे माइक्रोवेव के बर्तन को तेल से चिकना कर लें। पारले जी बिस्कुट और हाइड एंड सीक बिस्कुट को छोटे टुकडो में तोड़ लें। इसमें चीनी मिलाकर मिक्सर में पीसकर बारीक पाउडर बना लें। एक बड़े बर्तन में दूध लें फिर बिस्कुट का पाउडर धीरे-धीरे करके मिलाते जाएं और गाढ़ा पेस्ट बना लें। मिश्रण न ज्यादा गाढ़ा हो और न ही बहुत पतला. अगर दूध कम लगे तो और मिला सकते हैं।  बिस्कुट के घोल में बेकिंग पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लें। कटे हुए आधे बादाम मिला के घोल को माइक्रोवेव के बर्तन में डाल दें।  माइक्रोवेव को हाई पावर मोड पर सेट करके केक का बर्तन रखकर 5 मिनट तक बेक कर कर लें। तय समय के बाद टूथपिक या कांटे वाला चम्मच डालकर चेक करें अगर टूथपिक साफ बाहर आ जाये तो केक अच्छी तरह बेक हो गया है. अगर नहीं बेक हुआ है इसे 1-2 और बेक करने के लिए रखें। केक को बाहर निकालकर 5-6 मिनट तक ठंडा होने दें. फिर चाकू से केक को छोटे टुकड़ों में काट लें।  बचे हुए कटे बादाम से सजाकर परोसें।

 

एगलेस मग केक

सामग्री : 3 चम्‍मच मैदा, डेढ़ चम्‍मच बगैर चीना का कोको पाउडर, 3 चम्‍मच पिसी चीनी, 1/8 चम्‍मच बेकिंग सोडा, 1/8 चम्‍मच नमक, 3 चम्‍मच पकाने का तेल, 3 चम्‍मच दूध, 1/4 चम्‍मच वनीला एसेंस, 1 चम्‍मच चोको चिप्‍स

विधि : एक कॉफी मग में मैदा, चोको पाउडर, नमक और बेकिंग सोडा डालकर अच्‍छी तरह मिक्‍स करें। अब इसमें ऑयल, दूध और वनीला एसेंस डालकर अच्‍छी तरह फेंट लें। पेस्‍ट क्रीमी रहना चाहिए। इसके ऊपर चोको चिप्‍स डाल दें और माइक्रोवेव में इसे 600 वॉट्स पर 1 मिनट के लिए बेक करें और फिर इसे चेक करें और जरूरत पड़ने पर 1 मिनट के लिए और बेक करें। अगर आप ओवन इस्‍तेमाल कर रहे हैं तो इसे 185 डिग्री सेंटीग्रेट पर प्रीहीट करें और केक को उसमें 10-15 मिनट तक बेक कर लें। माइक्रोवेव एगलेस मग केक तैयार है. अब जब मन करे इसे आसानी से बनाएं।

नोट : ओवन प्रूफ मग इस्‍तेमाल करें। चोको चिप्‍स आप अपनी मर्जी के अनुसार डाल सकते हैं.