Thursday, October 1, 2026
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विराट का वर्चस्व, मिताली ने भी खुद को स्थापित किया

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नयी दिल्ली  : प्रतिद्वंद्वी टीमों को लगातार रौंदने से विराट कोहली की महानता में इस वर्ष तेजी से बढ़ोतरी हुई जबकि भारतीय महिला टीम को भी अपने शानदार विश्व कप अभियान की बदौलत अंतत: ‘क्रिकेट को लेकर जुनूनी’ देश से प्यार और सम्मान मिला।

‘किंग कोहली’ लगातार नौ सीरीज जीतने के बाद अब अगले 18 महीनों में मिलने वाली चुनौती के लिये तैयार हैं जबकि पिछले छह महीनों में मिताली राज महिला क्रिकेट टीम की कप्तान से अब एक ब्रांड बन गयी हैं।

भारतीय महिला टीम भले ही मेजबान इंग्लैंड से विश्व कप के रोमांचक फाइनल में हार गयी हों, लेकिन इस प्रदर्शन की बदौलत उन्हें देश में लोगों का प्यार और वित्तीय प्रोत्साहन मिला जिससे महिला टीम देश में सुर्खिंयों में रहीं। यह पहली बार है जब देश में महिला क्रिकेट को इतनी गम्भीरता से लिया गया और आज महिला खिलाड़ियों को हर जगह देखा जाने लगा है जिसका श्रेय मिताली की लाजवाब कप्तानी को जाता है।

वहीं प्रतिद्वंद्वी टीमों के लिये भारतीय पुरूष टीम के बेहतरीन सफर को रोकना नामुमकिन रहा।

हालांकि भारतीय टीम ने अपने ज्यादातर मैच घरेलू मैदान पर ही खेले लेकिन लगातार नौंवी टेस्ट सीरीज जीतना और लगातार आठ वनडे सीरीज अपने नाम करना कोई उपलब्धि से कम नहीं।

कोहली और उनकी टीम को हालांकि कुछ मौकों पर परीक्षा से भी गुजरना पड़ा जैसे आस्ट्रेलिया के खिलाफ पुणे टेस्ट में मिली हार या ईडन गार्डंस में श्रीलंका के खिलाफ तेज गेंदबाजों के मुफीद पिच पर पहली पारी में सिमटना मुश्किल मौके रहे। लेकिन ऐसा एकाध बार ही हुआ।

इस इतने शानदार वर्ष में सबसे निराशाजनक प्रदर्शन चैम्पियंस ट्राफी का फाइनल रहा जिसमें उसे पाकिस्तान से हार का मुंह देखना पड़ा जबकि भारतीय टीम इसमें गत चैम्पियन के तौर पर खेल रही थी।

लेकिन इस हार के बाद जो विवाद भारतीय टीम से जुड़ा, वह भारतीय क्रिकेट इतिहास के भुलाने वाले अध्याय में शामिल हो गया। कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच बढ़ता विवाद खुले में आ गया जिसके बाद कुंबले को एक साल के सफल कार्यकाल के बाद इस्तीफा देने के लिये बाध्य होना पड़ा।

इस पूरे प्रकरण से हालांकि इस बार की फिर से पुष्टि हो गयी कि भारतीय टीम में केवल एक ही ‘बॉस’ है और वो कप्तान है।

हालांकि कोहली-कुंबले ब्रेक-अप से टीम के मैदानी प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ा और थोड़े ही समय में यह सामान्य हो गया तथा ड्रेसिंग रूम में पसंदीदा रवि शास्त्री ने इस महान स्पिनर की जगह वापसी की।

मैदान के बाहर उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति ने चार लोगों के साथ बीसीसीआई का काम शुरू किया लेकिन बाद में लोगों की संख्या घटकर दो हो गयी। रामचंद्र गुहा ने सीओए के काम करने के तरीके पर कड़वाहट भरा पत्र लिखकर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए इस पद से इस्तीफा दे दिया।

मैदान में कप्तान के प्रदर्शन पर जरा भी असर नहीं पड़ा और उनका रनों का अंबार लगाना जारी रहा, जिसमें उन्होंने टेस्ट और वनडे में 11 शतक जुटाये जिसमें पांच दिवसीय प्रारूप में तीन दोहरे शतक शामिल थे।

रोहित शर्मा का भी चोट के बाद वर्ष शानदार रहा, उन्होंने सत्र में वनडे में तीसरा दोहरा शतक जड़ने के अलावा श्रीलंका के खिलाफ टी20 सीरीज के दौरान सबसे तेज शतक भी जड़ा।

 

पिकनिक का मजा बढ़ा देंगे ब्रेड स्नैक्स

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ब्रेड उत्तपम

 सामग्री – ब्रेड की चार स्लाइस, आधा कप सूजी, दो बड़े चम्मच मैदा, आधा कप दही, एक बारीक कटा टमाटर, एक बारीक कटी शिमला मिर्च, दो बारीक कटी, आधा कप बारीक कटा हरा धनिया, एक बड़ा चम्मच कसा अदरक, दो बारीक कटी हरी मिर्च, नमक स्वादानुसार, तेल आवश्यकतानुसार, पानी आवश्यकतानुसार

विधि  सबसे पहले ब्रेड के किनोरों को काटकर अलग निकाल लें। अब ब्रेड के सफेद हिस्से को सूजी, मैदा, पानी और दही के साथ मिक्स कर पीस लें और एक गाढ़ा पेस्ट तैयार कर लें। पेस्ट में टमाटर, शिमला मिर्च, प्याज, अदरक , हरी मिर्च और नमक मिलाएं।  मध्यम आंच में एक तवा पर थोड़ा सा तेल गरम करने के लिए रखें। तेल के गरम होते ही उत्तपम का तैयार पेस्ट डालें। एक साइड से सिक जाने के बाद इसे पलटकर दूसरे साइड से भी सुनहरा होने तक सेंक लें।  तैयार है ब्रेड उत्तपम। चटनी या टोमैटो सॉस के साथ सर्व करें।

नोट: 
आप चाहें तो थोड़ा सब्जियां बचाकर इसे ऊपर से भी डाल सकती हैं। उत्तपम को पलटते समय किनारों पर थोड़ा तेल लगा लें। पलटने में आसानी होगी।

 

ब्रेड पापड़ी चाट

सामग्री : आठ ब्रेड स्लाइस, एक छोटी कटोरी उबले हुए काबुली चने, एक छोटी कटोरी दही, दो छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर, दो छोटा चम्मच जीरा पाउडर, दो छोटी चम्मच मीठी चटनी, दो छोटी चम्मच तीखी चटनी, नमक स्वादानुसार, तेल तलने के लिए, एक छोटी कटोरी नमकीन सेव, एक छोटी कटोरी बूंदी

विधि : सबसे पहले सभी ब्रेड्स को बीच में से गोलाकार शेप में काट लें। इसके बाद तेज आंच में एक पैन में तेल गरम करने के लिए रखें। तेल के गरम होते ही ब्रेड के कटे हुए पीस डालकर सुनहरा तल लें और एक प्लेट में निकालकर रख लें। एक बॉउल में दही में नमक डालकर अच्छे से फेंट लें। अब ब्रेड पर उबले काबुली चने फैलाएं। फिर उसके बाद आलू के टुकड़े रखें, दही डालें।  दही के ऊपर मीठी और तीखी चटनी डालकर लाल मिर्च पाउडर और जीरा पाउडर छिड़कें।  तैयार है ब्रेड पापड़ी चाट। नमकीन सेव और बूंदी से गार्निश सर्व कर खाएं और सर्व करें।

नोट: 
ब्रेड तेज आंच पर ही तलें क्योंकि ब्रेड बहुत ज्यादा तेल सोख लेती है। आप चाहें तो नमकीन सेव और बूंदियों के साथ अनार के दानों से भी गार्निश कर सकते हैं।

 

नए साल में सुखी और सफल रहे जीवन, लें कुछ ऐसे संकल्प

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नए साल 2018 में प्रवेश हम कर चुके हैं। हममें से अधिकतर लोग ऐसे भी होंगे जो कि  यह संकल्प लेंगे कि जो उन्होने बीते वर्ष में गलतियां की या कुछ भी गलत किया हो, वैसा इस आने वाले साल में न करें। माना जाता है नए साल का संकल्प हम सभी अपनी किसी खामी को दूर करने के लिए लेते हैं। कोई जिम में वर्कआउट करने का संकल्प लेता है तो कोई सिगरेट छोड़ने का। कोई अपनी पढ़ाई अच्छे से करने का संकल्प लेता है तो कोई अपने शौक पूरे करने का संकल्प लेता है।

ऐसे ही संकल्पों की लंबी फेहरिस्त है। आपको अपना कोई संकल्प चुनने में कोई परेशानी हो रही है तो आप इनमें से कोई चुन सकते हैं। तो चलिए देखते हैं 2018 में आप क्या संकल्प ले सकते हैं।

-विनम्र बनें और माफ करना सीखें
-विनम्र बनें और गलती होने पर माफी मांगना सीखें
-ज्यादा गुस्सा आता है तो उसे पीना सीखें
-ज्यादा भावुक होते हैं तो अपने इमोशन्स पर काबू पाना सीखें
-अपनी जिम्मेदारियां पहचानें और उन्हें निभाना सीखें
-पैसा बचाएं और कर्ज से छुटकारा पाने की कोशिश करें
-दुश्मनी भुला दें
-लड़ाई-झगड़ा न करें
-माफ करना सीखें
-कोई नई भाषा सीखें
-खाना पकाना सीखें
-नाकाम होने पर गम में न डूबे
-लक्ष्य
-हमेशा सक्रिय रहने की आदत डालें
-काम को टालने की आदत को छोड़ दें
-डायरी लिखने की आदत डालें
-सोशल मीडिया पर कम समय बिताएं और असली जिंदगी को ज्यादा वक्त दें
-अपने अंदर सकारात्मक सुविचार लाएं
-हर महीने कम से कम दो नए काम जरूर करें जो अच्छे हों
-झूठ बोलने की आदत छोड़ दें…

संकल्पों की ये लंबी लिस्ट कभी खत्म नहीं होगी। ऐसे में आपको खुद ही तय करना होगा कि आप अपनी कौन सी खामी को दूरकर एक बेहतर इंसान बनना चाहते हैं। इसलिए विचार करें और नए साल की शुरुआत नए प्रण से करें।

 

तीन बहनों ने खोला महानगर में निःशुल्क पुस्तकालय

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अक्सर हम सुनते हैं कि किताबों की दुनिया से बच्चे दूर भाग रहे हैं। सोशल मीडिया, टीवी और फिल्मों की मनमोहक दुनिया में कैद बच्चे को अक्षरों की दुनिया नहीं लुभाती, ये भी हम देख रहे हैं। ऐसे में दो बच्चियाँ पुस्तकालय खोलने के बारे में सोचें और खोलकर दिखा भी दें। यह हैरत में डालने वाली सुखद उम्मीद है। महानगर में सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली दो बहनों 12 साल की मनस्वी और 9 साल की सुहासिनी दूगड़ ने निःशुल्क पुस्तकालय खोला है और किताबों की शौकीन और अपनी बहनों में पढ़ने की आदत डालने वाली बड़ी बहन यशस्वी ने इस पुस्तकालय को संवारने और इंटीरियर और डिजिटल कार्यों का जिम्मा सम्भाला। तीनों बहनें ब्रिटिश काउंसिल में जाती रही हैं, वहाँ की लाइब्रेरी में पढ़ती भी रही हैं।

मनस्वी बताती है कि वह जब भी लाइब्रेरी जाती, उसे महसूस होता कि बहुत से बच्चों को पढ़ने का मौका नहीं मिल पाता। वह कहती है कि पढ़ना एक अच्छी आदत है और सबको किताबें पढ़नी चाहिए। मनस्वी की माँ शीतल कहती हैं कि ये मनस्वी की इच्छा थी और इन बहनों के आग्रह को देखकर शीतल और उनके पति ने पुस्तकालय खोलने में मदद दी। तीनों बहनों के पापा के दफ्तर का एक अतिरिक्त कमरा पुस्तकालय में बदला गया। किताबें रखने के लिए आलमारी लायी गयी और साहित्यकारों की तस्वीरों से उसको सजाया गया। अब रीडर्स प्लानेट पुस्तकालय बनकर तैयार है और इसमें 15 साल तक संचित किया गया किताबों का खजाना शामिल है। पुस्तकालय में 1 हजार किताबें हैं। बालीगंज फांड़ी के डोवर रोड स्थित इस 300 वर्ग फीट जगह में स्थित इस रीडर्स प्लानेट में विज्ञान, इतिहास, भूगोल, सामान्य ज्ञान, नैतिक शिक्षा और अँग्रेजी की किताबें भी शामिल हैं। वैसे तो यह पुस्तकालय सभी के लिए है मगर जरूरतमंद बच्चों खासकर 5 से 5 साल की उम्र के बच्चों को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया है। पुस्तकालय में इन किताबों में पढ़ने के शौकीन मगर किताबों से वंचित हर बच्चे के लिए यह पुस्तकालय किसी वरदान से कम नहीं है। मनस्वी को इनसाइक्लोपीडिया पढ़ने में दिलचस्पी है जबकि खेलों की शौकीन सुहासिनी को फैंटेसी पढ़ना अच्छा लगता है। यशस्वी को हमेशा से पढ़ने का शौक रहा है और उसके निजी पुस्तकालय में 150 से ऊपर किताबें हैं। सिडनी में मार्केटिंग और फाइनेंस की पढ़ाई कर रही यशस्वी बताती है कि यहाँ पर बच्चों के लिए स्टोरी टेलिंग और लेखन पर कार्यशालाएँ भी आयोजित होंगी और वह खुद भी इस तरह की कार्यशालाएँ आयोजित करेगी। माँ शीतल दूगड़ को हिन्दी पसन्द है इसलिए हिन्दी किताबों का एक अलग सेक्शन है? रीडर्स प्लानेट सोमवार से शनिवार तक सुबह 11 से शाम 7 बजे तक खुला  रहेगा।

 

जब पड़ने लगे रिश्ते में दरार, तो ऐसे कराएं साथी को प्यार का अहसास

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जिस व्यक्ति से आप प्यार करते हैं उसके साथ अपनी जिन्दगी को साझा करने का एहसास ही बहुत खूबसूरत होता है. लेकिन गहरा प्यार और विश्वास होने के बाद भी कई बार आपके बीच किसी नी किसी बात पर अनबन होती रहती है जिससे धीरे-धीरे रिश्ते में दरार आने लगती है इसलिए रिश्ते में नयापन बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे प्रयास करते रहें जो आप दोनों को एक दूसरे के करीब लाए  –

आपका रिश्ता चाहे नया हो या पुराना अपने साथी को पर्सनल स्पेस जरूर दें। जिस रिश्ते में लोग अपने साथी पर ज्यादा प्रतिबंध लगाते हैं वो रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चलता। स्वस्थ रिश्ता के लिए जितना जरूरी अपने पार्टनर के साथ समय व्यतीत करना है उतना ही जरूरी खुद को समय देना और साथ ही अपने पार्टनर के पर्सनल स्पेस में दखल ना देना है।

साथी के साथ अपने दिनभर के अनुभव साझा करें। आपको उनकी कौन सी बात सबसे ज्यादा पसंद है उन्हें बताएं। अपने साथी की पसंद ना पसंद को जानने की कोशिश करें। इससे आप दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा और भावनात्मक तौर पर आप एक दूसरे के ज्यादा करीब आएंगे।

अपने पेशेवर जीवन की योजनाओं और लक्ष्य के बारे में अपने साथी को जरूर बताएं क्योंकि जीवन में हर व्यक्ति के अपने सपने होते हैं, लक्ष्य होता है। आपको नई जॉब के लिए शहर से बाहर भी जाना पड़ सकता है इसलिए पहले ही अपने प्लान के बारे में पार्टनर को साफ- साफ बता दें ताकि आगे जाकर आप दोनों के रिश्ते में कोई समस्या ना आए।

 

 

पटना का अनोखा बैंड जहाँ ढोल नगाड़े बजाती हैं महिलाएं

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वो दिन गए जब महिलाएं घूंघट में रह कर घर का काम किया करती थीं और पुरुष बाहर जाकर पैसे कमाते थे बल्कि आज की महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं। हमारा समाज शुरू से ही पितृसत्तात्मक (पुरुषप्रधान) रहा है जिसमें महिलाओं को हमेशा से ही पुरुषों से कमतर आंका जाता है लेकिन इसी धारणा को गलत साबित कर दिखाया है पटना के एक कस्बे में रहने वाली कुछ महिलाओं ने।

दरअसल, पटना के दानापुर कस्बे के ढिबड़ा गांव की महिलाओं ने अपना एक बैंड बनाया है। इस बैंड का नाम ‘सरगम’ है और इस ग्रुप में 10 दलित महिलाएं शामिल हैं।

बैंड की मुखिया सविता देवी कहती हैं, ‘लोग हम पर हंसते थे कि हम पुरुषों का काम कर रहे हैं,  लेकिन हमारा कहना था कि आजकल महिलाएं हर काम कर रही हैं, ऑटो चलाने से ट्रेन चलाने तक तो फिर हम बैंड ड्रमर्स क्यों नहीं बन सकतीं.’

बैंड की मुखिया सविता देवी कहती हैं कि पटना की इन महिलाओं के लिए यह सब इतना आसान नहीं था. शुरुआत में लोग उन पर हंसा करते थे, मजाक बनाते थे. लेकिन उपहास और विरोध के बावजूद भी इन महिलाओं ने अपना जुनून नहीं छोड़ा। इन महिलाओं ने करीब 10 महीने तक अपने बैंड के लिए रोजाना 2 घंटे के लिए अभ्यास करना जारी रखा। इस बैंड ने ना केवल इन महिलाओं को एक नई पहचान दी है बल्कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है।

 

98 साल की उम्र में हासिल की एम.ए की डिग्री

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पटना :  नालंदा खुला विश्वविद्यालय (एनओयू) के 12वें दीक्षांत समारोह में 98 साल के वयोवृद्ध राज कुमार वैश्य को एम.ए की डिग्री से नवाजा गया। पटना में आयोजित एनओयू के दीक्षांत समारोह में मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद ने वैश्य को अर्थशास्त्र में एम.ए की डिग्री प्रदान की ।

वैश्य ने एम.ए (अर्थशास्त्र) में 2015 में दाखिला लिया था। अपनी डिग्री प्राप्त करने के बाद वैश्य ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं आज बहुत खुश हूं । मैंने कड़ी मेहनत की थी । लंबे समय से मैं मास्टर डिग्री पूरी करना चाह रहा था…..युवाओं को सिर्फ करियर नहीं बल्कि अपनी शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए ।’’ कुल 22,100 छात्रों को इस साल विभिन्न डिग्रियां प्रदान की गईं । वैश्य 29 स्वर्ण पदक विजेताओं सहित 2780 ऐसे छात्रों में से थे जिन्हें दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किया गया ।

 

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से सपने पूरे होंगे

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अपराजिता की ओर से

अपराजिता की कोशिश रही है कि नयी प्रतिभाओं को सामने लाया जाए और ऐसे लोगों की कहानी कही जाए जिन्होंने अपना एक मुकाम बनाया है और प्रेरक रहे हैं। आज के बदलते दौर में जहाँ सफलता की पूजा होती है, वहीं जरूरी है कि हम उन लोगों की भी बात करें जिन्होंने सफलता की इमारत की बुनियाद रखी। समय कुछ ऐसा है कि आज नींव की ईंट ही गुम हो जाती है। ऐसी स्थिति में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन लोगों को सामने लायें क्योंकि अगर नींव ही न हो तो महलों को ढहते देर नहीं लगेगी। इसी सोच के साथ नववर्ष पर अपराजिता एक नयी पहल करने जा रही है जिसका नाम नींव की ईंट है। हम मुलाकात के तहत जहाँ नयी और स्थापित प्रतिभाओं को हमेशा की तरह सामने लाएंगे, वहीं समय – समय पर नींव की ईंट स्तम्भ के तहत ऐसे लोगों से भी आपकी मुलाकात करवाएंँगे या उनकी कहानी बताएंगे जिन्होंने एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत की। आज नींव की ईंट के तहत हम आपकी मुलाकात राजन – साजन मिश्र के पं.  राजन मिश्र से करवाने जा रहे हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के माधुर्य को प्रसारित करने के लिए जाने जाते हैं –

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित राजन-साजन मिश्र का नाम बेहद आदर से लिया जाने वाला नाम है। बनारस घराने की गूँज को विश्‍व तक ले जाने में इन भाइयों का महत्वपूर्ण योगदान है। संगीत को विश्‍व शांति का माध्यम मानने वाले राजन – साजन मिश्र ने भैरव से भैरवी तक’ की यात्रा आरम्भ की है। इसकी शुरुआत कला की समृद्ध भूमि बनारस से 18 नवंबर 2017 से हुई है जो अहमदाबाद और कोलकाता से होते हुए ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोपीय देशों तक जारी रहेगी। 7 जनवरी को कोलकाता के जोड़ासांको में होने वाले इस कार्यक्रम के सिलसिले में पद्मभूषण पंडित राजन मिश्र महानगर आए जहाँ हमने उनसे संगीत की दुनिया को लेकर बात की, पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश –

संगीतमय बचपन बीता

हमारी तो आँखें ही संगीत के बीच खुली। हम बनारस के कबीर चौरा मोहल्ले में रहते हैं जहाँ कबीर का स्थान है। वहीं बड़े – बड़े कलाकार रहते हैं। जब आँख खुली तो हर जगह स्वर लहरियाँ गूँज रही थीं। कहीं तबले, तो कहीं नृत्य, कहीं सितार की आवाज, कहीं सारंगी की आवाज, संगीतमय बचपन जीता। 4 -5 साल की उम्र से गंडाबंधन पंडित बड़े रामदास जी से हो गया और तब से शिक्षा शुरू हो गयी और अब तक चल ही रही है।

बनारस से रिश्ता मजबूत है

समय के साथ तो बदलाव आता ही है। बहुत से लोग इधर – उधर चले गये। हम भी स्थायी तौर पर दिल्ली रहने लगे मगर बनारस से नाता टूटा नहीं है। हर एक -दो महीने पर बनारस जाते हैं, वहाँ हमारा अपना निवास स्थान है। गुरु लोगों का स्थान है, वहाँ जाकर माथा टेकते हैं।

बॉलीवुड गीत बाजार के दबाव में बनते हैं

80 और 90 के दशक तक जो फिल्मी गाने बने….उसे हम 50 बार भी सुनें तब भी अच्छे लगते हैं क्योंकि उस जमाने के संगीत निर्देशक पार्श्‍व गायक होते थे। वो सब शास्त्रीय संगीत सीखे हुए होते हैं। अब बैजू बावरा के गाने, झनक – झनक पायल बाजे के गाने और मुगले आजम के गाने सालों बाद आज भी कर्णप्रिय लगते हैं। बाजार का दबाव है कि लोगों को वैसे गीत बनाने पड़ते हैं। एक बार कविता कृष्णमूर्ति के साथ यात्रा कर रहे थे हम, तब उन्होंने ये बात बतायी कि संगीत निर्देशक अगर अच्छे और कर्णप्रिय गाने बनाना चाहते हैं मगर निर्माताओं का नजरिया कुछ अलग होता है और वे हर किसी की पसन्द को ध्यान में रखकर ऐसे गीत बनवाना चाहते हैं जिन पर लोग थिरक सकें।

नाना पाटेकर निभा सकते हैं हमारा किरदार

हमने एक फिल्म की थी सुर संगम, जो तमिल फिल्म की रीमेक थी। इस फिल्म में 11 गाने हमने गाए। उसमें हमारा लता जी, अनुराधा पौंडवाल जी और कविता जी के साथ गाना है। बहुत अच्छी फिल्म बनी थी। वह फिल्म गुरु शिष्य परम्परा पर बनी थी और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के व्यक्तित्व पर फिल्म बनी है। तब बॉलीवुड का अनुभव लेने का मौका मिला। बीच में माटी नाम की फिल्म में संगीत दिया था। एक फिल्म निर्माता -निर्देशक के मतभेद में बंद पड़ी है, उसमें सोनू निगम, श्रेया घोषाल और आकृति कक्कड़ के साथ गाने हैं और वे रिकॉर्ड हो चुके हैं। नाना पाटेकर हमारा किरदार निभा सकते हैं।

युवाओं को संदेश

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से युवा अपने सपने पूरे कर सकते हैं।

 

हिंदी पुस्तकों में प्राण बसते थे श्रीराम तिवारी के

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कोलकाता : सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के पूर्व पुस्तकालयाध्यक्ष श्रीराम तिवारी के निधन पर भारतीय भाषा परिषद के भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय में आज एक शोक सभा की अध्यक्षता करते हुए विश्‍वभारती, शांतिनिकेतन की प्रोफेसर डॉ. मंजुरानी सिंह ने कहा कि श्रीराम तिवारी विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए ज्ञान का ठिकाना थे। वे बहुत सहृदय और सरल इन्सान थे। उनके निधन से हिंदी पुस्तकालय संसार की एक अपूरणीय क्षति हुई है। भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि श्रीराम तिवारी कॉलेज एवं विश्‍वविद्यालयों के विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन में बहुत बड़े सहयोगी थे। हिंदी पुस्तकों में उनके प्राण बसते थे।  उनकी जैसी सरलता और कर्मठता से ही हिंदी पुस्तकालयों में गतिशीलता आ सकती है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने अपने शोक-संदेश में कहा कि श्रीराम तिवारी एक सच्चे हिंदी सेवी थे। ग्रंथालय के पाठकों ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। लम्बे समय तक सावित्री गर्ल्स कॉलेज में पुस्तकालयध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले श्रीराम तिवारी का निधन मष्तिष्क ज्वर से 71 वर्ष की आयु में गत 27 दिसम्बर को हो गया था।

अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है

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नया साल, नयी उम्मीदों का साल। पुरानी स्मृतियों से सीखने की सीख देता नया साल। हिंसा, कड़वाहटों और निराशा के बीच नये साल का आगमन उम्मीदें भरता है और इनको पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। गुजरा साल हिंसा, कड़वाहटों, शिकायतों और रक्त से भरा रहा…..इस साल ऐसा बिलकुल न हो…इसकी तो कल्पना हम नहीं कर सकते मगर थोड़ा प्रेम, संवेदना, सहानुभूति की कोंपल तो हम अपने हृदय में रख ही सकते हैं..इनको पुष्पित पल्लवित होने दें…तो क्या एक सुन्दर दुनिया बनाना इतना कठिन कार्य होगा?

इस समय तो न जाने कितनी नाराजगी भरी है…थोड़ी हमारे अन्दर और थोड़ी आपके भीतर…इन शिकायतों और नाराजगी को हम सृजनात्मक रूप भी तो दे सकते हैं।

 

पता है कि अभी यह यूटोपिया ही है मगर यूटोपिया भी सच में बदल सकती है…जरूरत शुरुआत करने की है….अगर टूटी सड़कों से शिकायत है तो सरकार का इन्तजार करने की जगह हम और आप मिलकर बना दें…क्योंकि टूटी सड़कों से हमको और आपको गुजरना है। बच्चों को सरकार सीट नहीं देती तो हम और आप उनको बसों में बैठा सकते हैं। कहने को छोटी –छोटी बातें हैं मगर बड़े बदलावों की आधारशिला ऐसी ही छोटी बातों से होती है। नाराजगी है तो पास बैठाकर एक – दूसरे की बात सुनिए और सुनाइए…यह जरूरी है क्योंकि अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है..तमाम शिकायतों और नाराजगी के बीच। अपराजिता की ओर से

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं….नव वर्ष ही नहीं पूरा साल मंगलमय हो…..सुस्वागतम 2018