Monday, July 13, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 767

पापी पेट का सवाल

0

अपराजिता की ओर से

अपने आस – पास हम ऐसे बहुत से बच्चों को देखते हैं जो अपना बचपन दाँव पर लगाकर अपने परिवार का पेट भरते हैं। कई बार इसमें उनकी जान भी दाँव पर लगी होती है मगर पेट भरने के लिए उनके माता – पिता ही कई बार उनको ऐसी जगहों पर भेजते हैं और यह उनकी मजबूरी है। हम 21वीं सदी के भारत का सपना देख रहे हैं जहाँ बच्चों को बच्चा भी नहीं रहने दिया जाता। बाल श्रमिक इस देश की भयावह समस्या हैं मगर खेल दिखाने वाले बच्चों को क्या अन्य बच्चों की तरह जीने का अधिकार नहीं है। कुछ ख्याल बरबस आ जाते हैं और कुछ ऐसी घटनाएँ जब झकझोर दें तो बस कलम चल पड़ती है। मौमिता भटट्टाचार्य युवा पत्रकार हैं और ऐसी ही घटना को देखकर उन्होंने  अपनी कलम चलायी है, आप भी पढ़िए और कुछ ऐसा देखकर लिखने की छटपटाहट हो तो हमसे साझा करें –

मौमिता भट्टाचार्य

” राधा रानी खेल दिखायेगी….दिखायेगी!!! राधा रानी रस्सी पर चलेगी…चलेगी!!! बाबू पापी पेट का सवाल है। कुछ मदद कर दो। हमारा भी त्योहार मन जायेगा।” यह किसी नुक्कड़ नाटक के संवाद नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता है।

त्योहार किसे पसंद नहीं होता है। बच्चों के लिये तो त्योहारों का महत्व कुछ ज्यादा होता है पर कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके जीवन की यह सच्चाई है।

एक ओर जहाँ न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि पूरी दुनिया दशहरा और विजया दशमी मनाने में मगन है। वही दूसरी तरफ है गोपी और राधा कुमारी की टोली, जिसमें हैं 5-6 साल की बच्ची राधा, 13-14 साल का गोपी, 3-4 साल का एक बच्चा और एक अधेर व्यक्ति शमिल है।

अपनी टोली के साथ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का रहनेवाला गोपी महानगर कोलकाता में तमाशा दिखाने आता है। षष्टी के दिन वह दमदम इलाके में तमाशा दिखाता है, तो नवमी को वह बागबाजार पूजा पण्डाल के बाहर तमाशा दिखाता है। बाग बाजार में राधा लगातार लगभग ढाई तीन घंटे रस्सी पर चलती है। आने जाने वाले दर्शनार्थियों में से कोई कुछ रुपये दे देता तो कोई अचरज से बस देखता रह जाता। वहाँ मौजूद हर किसी ने इसे मोबाइल में कैद किया।

गोपी कहता है कि हर रोज लगभग 500-600 रुपया कमा लेता है। गोपी के लिये काला अक्षर भैंस बराबर है। वह कभी स्कूल गया ही नहीं। गोपी और राधा इस पेशे को ही अपना बना चुके है।

गोपी को किसी और काम को पेशागत तरीके से करने की कोई इच्छा भी नहीं है। आज एक ओर तो बाल अधिकार और बाल सुरक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं और दूसरी तरफ गोपी और राधा जैसे बच्चे हैं जिन्होंने आज तक स्कूल का चेहरा तक नहीं देखा है।

इन सबके बीच एकमात्र अच्छी बात यह है कि कम से कम गोपी और राधा के बहाने रस्सी पर चलने जैसे खेलों ने अपना अस्तित्व बचा कर रखा है पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि 13-14 साल के इन बच्चों को सड़कों पर तमाशा दिखाकर अपना पेट पालने को मजबूर होना पड़े।

(तस्वीर – लेखिका  के सौजन्य से)

दुर्गापूजा और यायावरी के वो चार दिन

0

सुषमा त्रिपाठी

आज विजया दशमी है। देखते – देखते नवरात्रि कैसे गुजर गयी, पता ही नहीं चला। नवरात्रि की धूम तो सारे देश में रहती है मगर दुर्गापूजा के ये 4 दिन बंगाल का ऑक्सीजन है।

टाला पार्क में आधुनिकता का भविष्य दिखा मगर क्या आज हमारी नियति नहीं है? दवाओं पर जिन्दा रहना

बंगाल की खूबसूरती देखनी हो तो पूजा के ये 4 दिन सबसे बेहतरीन है। वक्त बदला है तो शारदोत्सव के मायने बदले हैं, अब शहर होर्डिंग्स से पटा रहता है मगर ये भी संकेत बन जाते हैं कि शहर तैयार हो रहा है, ये पूरा बंगाल तैयार हो रहा है माँ की आराधना के लिए।

माँ दुर्गा को के पंख….गिरीबाबू लेन की प्रतिमा।

यह एक ऐसा मौसम है जब बसों की भीड़, लम्बी कतारों का असर लोगों पर नहीं पड़ता। इन चार दिनों में लोग नाराज नहीं होना चाहते, जल्दी होते भी नहीं, बस हर दिन नये – नये कपड़े, दोस्त, मस्ती और अड्डा…यही चलता है।

गाड़ियों का शोर,, ट्रैफिक….शिकायतें….उत्सव सब धो डालता है…अहिरीटोला का पंडाल

ये चार दिन बंगाल की संस्कृति और बंगाल कला के बेहतरीन नमूने लाते हैं। पंडालों में लगी भीड़ और एक प्रतियोगिता सी लगी रहती है। रिपोर्टर से लेकर एंकर तक, सब साड़ी और धोती – पंजाबी में सजे, पूजा की तस्वीरें लाते हैं।

हम लन्दन भले न जाएँ…लन्दन अपने शहर में उतार लाते हैं…भवानीपुर स्थित एक भव्य पंडाल

 

इन चार दिनों में सारे शिकवे, सारा गुस्सा, असंतोष सब पीछे छूट जाते हैं। बंगाल के ये चार दिन बंगालियों के चार दिन नहीं रहते, मजहब की दीवारें पीछे छूट जाती हैं। इस बार भी कहीं पंडालों में 22 किलो सोने की साड़ी माँ को पहनायी गयी तो कभी करोड़ों के बजट वाला पंडाल बना।

उत्सव मजहब और नफरत की हर सीमा से परे है। वह घृणा नहीं प्रेम जानता हैै। हिन्दूओं की ही नहीं दुर्गापूजा हम सबकी है।

 

कहीं महिष्मती तो कहीं लंदन उतरा। कहीं गौतम बुद्ध दिखे तो कहीं चन्द्रोदय मंदिर, हर पंडाल में एक सन्देश छुपा है। वह कहीं सड़क हादसों से बचने की सीख देता है तो कहीं मशीनी हो रही दुनिया को चेतावनी देता है और कहीं छोड़ जाता है शांति और साम्प्रदायिक सौहार्द का एक सबक।

कुम्हारटोली पार्क में दिखा प्रस्तावित चन्द्रोदय मंदिर

ये दिन आराधना के दिन हैं, ये दिन यायावरी के दिन थे….हम जब निकले तो आँखों को तड़क – भड़क की तलाश नहीं थी…करोड़ों के बजट वाले मंडप नहीं चाहिए थे….कुछ ऐसा चाहिए था जिसमें एक मकसद हो, परम्परा की छाप हो…कुछ ऐसे ही पंडाल हमें मिले भी जिसकी गूँज हमें अब तक सुनायी पड़ रही है।

मानव बंधन भी. भवानीपुर में एक मण्डप में यही थी इस पूजा की थीम

बाकी, माँ के आगमन की प्रतीक्षा में एक बार फिर डूब गया बंगाल एक और यायावरी के लिए….हमें भी इन्तजार है उन चार दिनों का क्योंकि ऑक्सीजन तो हम सबको चाहिए।

कुम्हारटोली तो अभी भी व्यस्त रहेगी…लक्खी पूजा आशछे तो…..खुमार बरकरार है…..यायावरी जारी है। ….ताले…आशछे बछर आबार होबे….शुभो विजया।

विजय दशमी

0

                                                -हरिवंशराय बच्चन

जो जय उठाते हाथ,
उनकी जाति है नत-शीश,
उनका देश है नत-माथ,
अचरज की नहीं क्या बात?
इष्ट जिनके देवता हैं राम
उनकी जाति आज अशक्त,
उनका देश आज गुलाम,
विधि की गति नहीं क्या वाम?

मुक्ति जिनके जन्म का आदर्श
बंधन में पड़े वे आज,
बंधन की तजे वे लाज
क्यों हैं? बोल, भारतवर्ष!

आत्मपरिचय और संयम रखना सिखाता है दशहरा का पर्व

0

नवरात्रि के नौ पावन दिनों के पश्चात् दशहरा दरअसल स्वयं के पुर्नपरिचय का महाकाल है, आंतरिक जागरण का कालखण्ड है। नवरात्रि का पर्व किसी पंडाल में स्थापित देवी की कृपा प्राप्त करने का नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के सप्तचक्रों पर विराजित अपनी ही नौ शक्तियों के बोध और अपनी बाह्य ऊर्जा से नौ गुनी शक्तिशाली आंतरिक ऊर्जा को सहजता और सरलतापूर्वक सक्रीय करने की पावन बेला है। अपने अंतर्मन से बाहर पंडाल में देवी की स्थापना तो बस स्वयं से जुड़ने की किसी वैज्ञानिक पद्धति का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसकी तकनीक कालांतर में विस्मृत होने से आज सिर्फ पारंपरिक मान्यताओं की खुराक बन कर रह गयी है।

दशहरा और दशरथ दोनों में दस है। दस से अभिप्राय है दस इन्द्रियां। पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां। इन्हीं इन्द्रियों को पराजित करने का अभिप्राय है यह पर्व। स्वयं पर विजय पाने वाला ही दशरथ कहलाता है। राम दशरथ की संतान हैं। राम कहीं बाहर से नहीं, इन्हीं दशरथ से अर्थात् हमारे भीतर से ही प्रस्फुटित होते हैं। दशरथ हमारी आपकी आंतरिक क्षमता का प्रतीक पुरुष है, महाचिन्ह है। विजयादशमी अपने ही भीतर के सप्त सुप्त चक्रों पर आसीन नौ ऊर्जाओं और अपनी बाह्य शक्ति से नौ गुनी अधिक आंतरिक क्षमता के बोध से सर्वत्र विजय की महाअवधारणा है। नवरात्रि के नौ दिनों की साधना के पश्चात् स्वयं पर काबू पाकर विजय की दशमी अर्थात् विजयादशमी का सूत्रपात संभव है। मूल भाव तो यही है कि स्वयं को जीते बिना जगत को या किसी को भी जीतोगे कैसे।

(साभार – जनसत्ता)

मैक्स ने पेश किया पूजा कलेक्शन

0

मैक्स फ़ैशन ने कोलकाता और सिलीगुड़ी में अपने फेस्टिव कलेक्शन कोलॉन्च करके दुर्गा पूजा के आगमन का जश्न मनाया।कोलकाता में फेस्टिवकलेक्शन को लॉन्च करने के लिए अभिनेत्री नुसरत जहान और अभिनेताअंकुश हाज़रा उपस्थित थे। मैक्स ने सिलीगुड़ी में भी फेस्टिव कलेक्शन कोलॉन्च किया है।

आज महिलाओं द्वारा हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन प्रशंसनीय

0

साहित्यिकी द्वारा आयोजित संगोष्ठी में संस्था द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पत्रिका के ताजा अंक “साझा करते हुए” पर चर्चा हुई। अतिथियों का स्वागत करते हुए गीता दूबे ने संस्था की  गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

प्रमुख वक्ता बाबूलाल शर्मा ने कहा कि आज का दौर हस्तलिखित पत्रिकाओं का नहीं है, इसके बावजूद संस्था का यह साहस और प्रयास प्रशंसनीय है। रचनाओं के मूल में एक आदर्शवादी दृष्टि काम कर रही है जो अंक को विशेष सांस्कृतिक पहचान देती है। स्त्री विमर्श का स्वर इन रचनाओं में मुखरित होता है और पत्रिका में तकरीबन सभी विधाओं का समावेश है। उन्होंने सुझाव दिया कि संस्था को  साहित्यिक कार्यशालाओं का आयोजन करना चाहिए ताकि रचनाओं में और परिपक्वता आए। अपने  संपादकीय वक्तव्य में सुषमा हंस ने अपने संपादकीय अनुभवों को साझा किया। अध्यक्षीय वक्तव्य में किरण सिपानी ने कहा कि साहित्यिकी संस्था अपनी सीमाओं में अपने दायित्वों का निर्वाह करने की कोशिश कर रही है ताकि  प्रतिरोध का स्वर मुखरित हो और समाज में बदलाव आ सके। स्त्रियों को जागरूक करना और उनकी रचनात्मकता को उभारना हमारा मुख्य उद्देश्य है। संगोष्ठी का संचालन गीता दूबे और धन्यवाद ज्ञापन आशा जायसवाल ने किया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी दिवस समारोह

0

हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में कलकत्ता विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग द्वारा हाल ही में विभिन्न साहित्यिक व् सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया | मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी ने समारोह का उद्घाटन कर विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाया|

अपने सारगर्भित भाषण से विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने कहा कि “हिन्दी से प्रेम करना हिन्दी में बड़ी डिग्रीयाँ हासिल करना नहीं, बल्कि हिन्दी शब्दों का अधिक प्रयोग करना है।” विशिष्ठ अतिथि के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. स्वागत सेन ने हिन्दी के संवैधानिक महत्व को उजागर किया | विश्वविद्यालय के कुल सचिव प्रो. राजगोपाल धर चक्रवर्ती ने वर्तमान परिपेक्ष्य में हिन्दी के महत्व को रेखांकित किया | प्रो. राम अह्लाद चौधरी ने हिन्दी भाषा के ऐतिहासिक महत्व को बताते हुए गांधी जी के योगदान तथा हिन्दी के विकास के लिए देशी, प्रादेशिक एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के योगदान की बात कही | कार्यक्रम में काव्य आवृति, वाद विवाद, लोक गीत, आशु अभिनय, रचनात्मक लेखन तथा कविता पोस्टर प्रतियोगिताएं हुईं जिनमे बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया | विविध प्रतियोगिताओं के निर्णायकों के रूप में डॉ विवेक सिंह , डॉ आशुतोष कुमार, डॉ मनीषा त्रिपाठी , डॉ रेशमी पंडा मुख़र्जी, डॉ ममता त्रिवेदी, डॉ वीरेंद्र सिंह, डॉ सुनीता साव, डॉ अभिजीत सिंह, वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश मिश्र , काजू कुमारी साव, रणजीत सिंह, प्रतीक सिंह, इबरार खान इत्यादि उपस्थित रहे |

विभाग के शोधार्थी विकास साव की पुस्तक “आधुनिक हिन्दी साहित्य के विविध स्तम्भ” का लोकार्पण भी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी एवं विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ल के द्वारा किया गया| कार्यक्रम का सफल संचालन विभाग के विद्यार्थी राहुल गौड और सुजाता शर्मा ने किया | कार्यक्रम को सफल बनाने में कलकत्ता विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के समस्त शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा |

बीसीसीआई ने पद्म भूषण के लिये धोनी का नाम भेजा

0

नयी दिल्ली : भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) ने पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का नाम देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण पुरस्कार के लिये भेजा है।

बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुये कहा कि बीसीसीआई ने पद्म सम्मान के लिये सर्वसम्मति से एक नाम भेजा है जोकि भारत के सबसे सफल कप्तान का नाम है ।

बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना ने पीटीआई से कहा, ‘‘ बोर्ड ने महेन्द्र सिंह धोनी का नाम पद्म भूषण सम्मान के लिये भेजा है। यह फैसला सदस्यों की सर्वसम्मति से हुआ। वह मौजूदा क्रिकेट के महानतम नामों में से एक है और बोर्ड के लिये सबसे उपयुक्त विकल्प।’’ धोनी भारत के इकलौते खिलाड़ी है जिनकी कप्तानी में टीम ने दो विश्व कप जीते हैं जिसमें 2007 में टी-20 विश्व कप और 2011 का एकदिवसीय विश्व कप शामिल है।

खन्ना ने कहा, ‘‘ वह एकदिवसीय में 10,000 रन के करीब है और हमारे सबसे महानतम एक दिवसीय खिलाड़ियों में से एक हैं। इस पुरस्कार के लिये उनसे अच्छा कोई नाम नहीं हो सकता था।’’ अगर धोनी को यह खिताब मिलता है तो यह सम्मान पाने वाले वह देश के 11वें क्रिकेटर होंगे। इससे पहले सचिन तेंदुलकर, कपिल देव, सुनील गवास्कर, राहुल द्रविड़, चंदू बोर्डें, प्रो. डी.बी. देवधर, कर्नल सी.के. नायडू और लाला अमरनाथ के साथ साथ पटियाला के राजा भलिंद्रा सिंह और विजयनगर के महाराज विजय आनंद को यह सम्मान मिला है।

 

पत्रकारिता की हकीकत फिल्म में दिखाएँगे फोटो पत्रकार से फिल्मकार बने शैलेंद्र

0

दुनिया को सच दिखाने वाले मीडियावालों की निजी जिन्दगी और राजनीतिक दबाव में प्रेस की हालत कैसी होती जा रही है इसी विषय पर ‘जर्नलिज्म डिफाइन (जेडी)’ फिल्म बनाकर फोटो जर्नलिस्ट शैलेंद्र पांडेय बॉलीवुड में डेब्यू कर रहे हैं। अपनी फिल्म से ‘वर्तमान पत्रकारिता का सच’ उजागर करने की बात करते हुए शैलेंद्र ने सेंसर बोर्ड पर उंगली उठाई है।

शैलेंद्र इन दिनों दिल्ली में एक शीर्ष मीडिया हाउस में बतौर नेशनल फोटो एडिटर काम कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके शैलेंद्र ने दो साल पहले जेडी फिल्म की कहानी लिखी थी। इस फिल्म को पहले वह कम बजट में ही बनाना चाहते थे लेकिन फिर कुछ ऐसे मददगार मिल गए जिन्होंने फिल्म को मल्टीप्लेक्स तक पहुंचा दिया। जेडी फिल्म रिलीज हो चुकी है। कानपुर और आसपास जिलों के सिनेमाघरों में ये फिल्म जल्द ही लग जाएगी। शैलेंद्र ने बताया कि फिल्म में दिखाया गया है कि जो पत्रकार शोषण, अत्याचार और घोटालों की खबरें छापकर जनता के सामने सच उजागर करते हैं दरअसल उनका क्या हाल है, वे किन परेशानियों से गुजरते हैं, उन पर कैसे-कैसे राजनीतिक दबाव होते हैं यही सच्चाई जेडी फिल्म में देखने को मिलेगी।

डायरेक्टर-प्रोड्यूसर शैलेंद्र पांडेय ने बताया कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म ‘जर्नलिज्म डिफाइन (जेडी)’ को ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया है। जबकि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो परिवार के साथ देखने लायक न हो। फिल्म को सर्टिफिकेट तो पहलाज निहलानी के कार्यकाल में ही मिल गया था लेकिन प्रोमो का सेंसर रिलीज के दिन मिला। प्रोमो  का सेंसर रिलीज देर से करने के पीछे सेंसर बोर्ड की क्या मंशा रही इस पर शैलेंद ने सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के अध्यक्ष प्रसून जोशी को ओपन लेटर लिखा है। प्रोमो का सेंसर सर्टिफिकेट देरी से मिलने के कारण फिल्म का प्रोमा और ट्रेलर टीवी या सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं किया जा सका

जेडी फिल्म लखनऊ  के एक ईमानदार पत्रकार जय द्विवेदी की कहानी है जो एक विवाद में फंस जाता है। जय के पिता लखनऊ के जाने-माने डेंटिस्ट होते हैं। जय ने पत्रकारिता की पढ़ाई अमेरिका से की है। डॉक्टर पिता को पसंद नहीं होता कि उसका बेटा पत्रकारिता अपनाये। फिल्म की कहानी कहीं न कहीं तहलका पत्रिका के संपादक तरुण तेजपाल के जीवन से प्रेरित होती नजर आती है। फिल्म के निर्माता और निर्देशक शैलेंद्र पांडेय तहलका पत्रिका में फोटो एडिटर के तौर पर काम कर चुके हैं। हालांकि अमर उजाला को दिए इंटरव्यू में शैलेंद्र पाण्डेय ने फिल्म के तरुण तेजपाल के जीवन से प्रेरित होने से इनकार किया है। फिल्म में वास्तविक जीवन के कई चर्चित नाम भी नजर आएंगे। गोविंद नामदेव, अमन वर्मा, वेदिता प्रताप सिंह, अरविंद गौड़ मुख्य भूमिका में हैं। अमिताभ बच्चन और मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाने वाले राजनेता अमर सिंह फिल्म में ईमानदार नेता की भूमिका में दिखेंगे। फिल्म में न्यूज चैनल की पूर्व एंकर तनु शर्मा भी अहम भूमिका में होंगी। फिल्म की पटकथा कुमार विजय और शैलेंद्र पाण्डेय ने लिखी है। लोकप्रिय टीवी सीरियल हिटलर दीदी से चर्चा में आई जसवीर कौर ने फिल्म में आइटम डॉन्स किया जो कनपुरिया नौटंकी पर आधारित है। फिल्म में छह गाने हैं। गीत कुमार विजय और साहिल फतेहपुरी ने लिखे हैं। फिल्म के दो गानों की कोरियोग्राफी संदीप सोपारकर ने की है। फिल्म में एक नौटंकी गीत है जो मूल कनपुरिया नौटंकी से ही लिया गया है।

शैलेंद्र इन दिनों नोएडा मे अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। उन्होंने अपनी पहले बॉलीवुड फिल्म जेडी की शूटिंग नोएडा-मुंबई के अलावा गोआ, कानपुर, लखनऊ और उन्नाव में भी की है। ‘जेडी’ में उन्होंने अपने पैतृक गांव बीघापुर का मशहूर संदोही माता का मंदिर भी दिखाया है। पत्रकारिता में करियर शुरू करने से पहले उन्हें रक्षा क्षेत्र में जाने की बहुत तमन्ना थी इसी की तैयारी करने वह दिल्ली गए थे। लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था। साल 2004 दिसंबर में नीदरलैंड में हुए आरएनजी प्रेस फोटो एग्जिबिशन में शैलेंद्र की तस्वीरें खूब सराही गईं जिसके लिए उन्हें रामनाथ गोयनका अवॉर्ड दिया गया। इस आरएनजी अवॉर्ड में वर्ल्ड प्रेस की विजिट शामिल थी। भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए शैलेंद्र लेमोन्ड इंटरनेशनल फ्रेन्च मैगजीन में टॉप-12 वर्ल्ड फोटोग्राफर्स में चुने गये थे।

ये हैं यू एन में पाक को ‘टेररिस्तान’ कहने वाली एनम गम्भीर

0

भारत ने संयुक्त राष्ट्र परिषद में  पाकिस्तान को नया नाम दिया है “टेररिस्तान”, जो आतंकियों को जन्म देता है और दुनिया में एक्सपोर्ट करता है। पाकिस्तान को टेररिस्तान कहने वाली भारत की यूएन में विशेषदूत का नाम एनम गंभीर है। गंभीर ने जब-जब पाकिस्तान के खिलाफ भारत की बात रखी है तालियां बटोरी हैं।

एनम ने संयुक्त राष्ट्र में दूसरी बार पाकिस्तान को घेरा है। राइट टू रिप्लाई का उपयोग करते हुए शुक्रवार को युवा भारतीय डिप्लोमैट एनम ने पाकिस्तान प्रधानमंत्री के जम्मू और कश्मीर मामले के लिए विशेष दूत नियुक्त करने की मांग पर टेररिस्तान कह कर करारा जवाब दिया।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब एनम ने अपनी छोटी सी बात कह कर सबकी बोलती बंद कर दी हो, एनम अपनी बातों और करारे जवाब का जादू यूएन में इससे पहले भी चला चुकी हैं।
ठीक एक साल पहले गंभीर ने पाकिस्तान की बोलती तब बंद कर दी थी जब पाकिस्तान ने यूएन में कश्मीर का मुद्दा उठाया था और कहा था कि पाकिस्तान के लिए कश्मीर अब “मिशन कश्मीर” बन गया है।  तब एनम ने  पाकिस्तान को “टेररिस्ट स्टेट” कहा था।
एनम गंभीर 2005 बैच की आईएफएस हैं। गंभीर ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से गणित में ग्रेजुएशन किया है। साथ ही एनम ने यूनिवर्सिटी ऑफ जेनेवा से भी पढ़ाई की है। पाकिस्तान मुद्दों पर जबरदस्त समझ रखने वाली गंभीर विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान डेस्क पर भी काम कर चुकी हैं। एनम को अफगानिस्तान और इरान मामलों की भी अच्छी समझ है।