Wednesday, April 22, 2026
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अपर्णा ने फतह की सबसे ऊँची चोटी, सात शिखरों पर तिरंगा फहराने वाली पहली आईपीएस बनीं

लखनऊ : भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) देहरादून में तैनात यूपी कॉडर की आईपीएस अपर्णा कुमार ने दुनिया की सातवीं सबसे ऊंची चोटी भी फतह कर ली है। शनिवार को अपर्णा ने 20310 फुट ऊंचे दुनिया के सातवें सबसे ऊंचे शिखर अलास्का के माउंट डेनाली पर तिरंगा और यूपी पुलिस का झंडा फहराया। दुनिया की सात चोटियों पर पहुंचने वाली अपर्णा कुमार देश की पहली अधिकारी हैं। सिविल सर्वेंट के किसी सदस्य ने अब तक यह कारनामा नहीं किया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के अलास्का स्थित माउंट डेनाली की चोटी पर अपर्णा ने शनिवार को सुबह आठ बज कर दस मिनट पर कदम रखा। माउंट डेनाली अमेरिका का सबसे ऊंचा पर्वत है। इस चोटी को वह तीसरे प्रयास में फतह कर सकीं। माइनस 40 डिग्री तापमान में 250 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली हवा को चीरते हुए वह अनुमानित समय से लगभग 10 दिन पहले ही पहुँच गयीं। इससे पहले 2017 और 2018 में मौसम खराब होने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा था। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस उपलब्धि के लिए अपर्णा कुमार को बधाई दी है। अपर्णा का अगला लक्ष्य उत्तरी ध्रुव पर तिरंगा फहराने का है। इसके लिए वह अप्रैल 2020 में सफर शुरू करेंगी। मूल रूप से कर्नाटक के शिमांगो की रहने वाली अपर्णा कुमार यूपी कॉडर में 2002 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं। अपर्णा इससे पहले दुनिया की शीर्ष छह चोटियों को भी फतह कर चुकी हैं। इसमें एशिया का माउंट एवरेस्ट, अफ्रीका के तनजानिया का माउंट किलिमंजारो, यूरोप की एलब्रस, इंडोनेशिया की कांर्सटेंज पिरामिड, अंटार्किटा की विनसन मैसिफ और दक्षिण अमेरिका की माउंट एंकोकागुआ को फतह कर चुकी हैं।

चेन्नई: पानी के हाहाकार के बीच ‘इंद्र’ की मिसाल

चेन्नई :  पानी के संकट से जूझ रहे चेन्नई में हर कोई प्यास बुझाने के लिए पैसा और समय दोनों खर्च कर रहा है। शहर के दक्षिणी हिस्से का हाल और बुरा है लेकिन शहर में एक व्यक्ति ऐसा है जो चेन्नई में पानी के नल का कनेक्शन लेने से लगातार इनकार करता रहा है। 69 साल के एस इंद्र कुमार बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्हें जल बोर्ड की ओर से कनेक्शन लेने की कई बार अपील की गयी। उत्तरपूर्वी मानसून में देरी के कारण शहर के दक्षिणी हिस्से के सभी जलाशय सूख चुके हैं। इस समय लोग चेन्नई मेट्रोवॉटर बोर्ड के पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं, जिनकी बुकिंग या वेटिंग तीन तीन सप्ताह तक जा रही है। इसका फायदा उठाते हुए 40 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच निजी टैंकर खूब पैसा बना रहे हैं लेकिन इंद्र कुमार के पास पानी का भण्डार है। सात महीने बाद हुई बारिश में इंद्र कुमार ने इतना पानी इकट्ठा कर लिया है कि लोगों को हैरत हो सकती है।

इंद्र कुमार कहते हैं, “पिछले दो दिनों में तीन सेंटीमीटर तक बारिश हुई है। मैंने 18,000 लीटर पानी इकट्ठा करने में सफलता पाई। चेन्नई पानी संकट का सामना कर रहा है, मैं नहीं। “उनके अनुसार, “बारिश का पूरा पानी बेकार चला जाता है लेकिन मेरे घर में ऐसा नहीं होता। यहाँ हम बारिश की हर बूंद इकट्ठा करते हैं।” क्रोमपेट में स्थित बाहर से पुराने फ़ैशन के बने अपने दोमंज़िले मकान को वो पर्यावरण सुलभ घर बताते हैं। वॉटर हार्वेस्टिंग के उनके अनूठे प्रयास के लिए उनकी ख्याति ‘इको वॉरियर’ के रूप में है। साल 1986 में उन्होंने अपना घर बनवाया था, उसके 12 साल बाद उन्हें पहली बार चुनौती का सामना करना पड़ा था। कुएं का जो पानी मीठा था उसका स्वाद बदल गया। वो कहते हैं, “मैंने तुरन्त रेन वॉटर हार्वेस्टिंग शुरू कर दी और छह महीने में ही पानी की गुणवत्ता में सुधार दिखाई देने लगा। “उन्होंने अपने बच्चों से कहा कि वो अपने स्कूल प्रिंसिपल को सूचना दें कि सुबह की प्रार्थना सभा के समय वो अपने अनुभव साझा करना चाहते हैं। उस दिन वो स्कूल गए और अपना अनुभव साझा कर सीधे अपने काम पर चले गए। इंद्र कुमार बताते हैं, “जब मैं शाम को घर पहुंचा तो मैंने दो अध्यापकों को अपने घर पर इन्तज़ार करते हुए पाया। वो चाहते थे कि मैं उनके घर जाऊँ और उनके कुएं के बारे में अपनी राय बताऊँ। जब पहुँचा तो मैंने वहाँ सतह पर सफ़ेद पदार्थ को तैरते हुए देखा। उन्होंने बताया कि यही पदार्थ छत की टंकी में भी है। “वो कहते हैं, “असल में पुमाल, पल्लवरम, क्रोमपीट इलाक़े में टेरनरी बहुत हैं और ये पदार्थ उनका ही प्रदूषण था। उस दिन मैंने इसे अपना पेशा बनाने का फैसला कर लिया। मैंने तय किया कि मैं हर दिन इसका प्रचार करूँगा और दो लोगों को इसके लिए मनाने की कोशिश करूँगा। साल 1998 से 2000 के बीच 1,000 से अधिक घर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग से लैस हो गए। उनके रेन वॉटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट में घर के पास की ढलान का भी कुछ योगदान है जो उनके घर से 50 मीटर की दूरी से ही शुरू होती है। उनके घर के सामने पानी बहकर एक नाली में जाता है। वो बताते हैं, “नाली से होते हुए बारिश का पानी समन्दर में चला जाता है। इस पानी को रोकने के लिए मैंने घर के ठीक सामने एक गढ्ढा बनाया। “इंद्र कुमार कहते हैं, “हमने इस जगह को खोदा और इसमें रेत डाल दी। इसने ज़मीन के अंदर पानी के स्तर को बढ़ने में मदद की। ” इसके अलावा उन्होंने अपने घर की छत पर एक छोटा सा वॉटर टैंक बनवाया है जो बारिश के समय भर जाता है। इकट्टा हुआ पानी भी रेत से छनने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। इसमें एक देसी पौधा सारसापरिल्ला या ननारी तैरता है। वो कहते हैं, “ननारी पानी को शुद्ध करता है।”ये पानी कुएं में गिरने से पहले बिल्कुल ऊपर एक दूसरे फ़िल्टर से होकर गुजरता है। इंद्र कुमार कहते हैं, “मैं इस कुएं का पानी पीता हूँ। इसमें सभी मिनरल्स होते हैं और इसी पानी को मैं पीने के लिए इस्तेमाल करता हूँ। “लेकिन ‘इको वॉरियर’ के इस घर में पर्यावरण के अनुकूल अन्य चीजें भी मौजूद हैं। छत बिल्कुल खाली नहीं, बल्कि हरी भरी है। यहाँ दवाई के गुण वाले पौधे जैसे लेमन ग्रास, तुलसी आदि लगाए गए हैं। वो कहते हैं, “अगर आप इनका सेवन करें तो आपको डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ेगा। इन पौधों से ऑक्सीजन भी मिलती है जिससे सेहत अच्छी बनी रहती है।”

इंद्र कुमार उन लोगों से सहमत नहीं है जो मानते हैं कि बेकार जाने वाला पानी, पानी का स्रोत नहीं हो सकता है।
“अगर आप पूछें कि पानी के स्रोत क्या हैं, तो वो कहेंगे बादल, बारिश, पिघलती बर्फ़ आदि। वो कभी नहीं कहेंगे बेकार पानी। मैं इस बेकार पानी को रिसाइकिल करता हूं और किचन के सारे पानी को पौधों में इस्तेमाल करता हूँ। “वो कहते हैं, “मैं टॉयलेट के लिए केमिकल नहीं इस्तेमाल करता। मैं बैक्टीरिया का भी इस्तेमाल करता हूँ। मेरा टॉयलेट उतना सुंदर नहीं है लेकिन साफ़ ज़रूर है। सिर्फ़ टॉयलेट फ्लश में ही लोग 50 लीटर पानी खर्च कर देते हैं, इतने पानी से नारियल का एक पेड़ बचाया जा सकता है। “इंद्र कुमार घर के पीछे बगीचे की सारी पत्तियों का इस्तेमाल खाद बनाने में करते हैं। इससे वो 200 किलोग्राम आर्गेनिक खाद बनाते हैं, जिसे वो बहुत सस्ती दरों पर बेचते हैं। जहाँ इंद्र कुमार एक घर में वॉटर हार्वेस्टिंग और वेस्ट मैनेजमेंट की मिसाल खड़ी की है, वहीं बहुमंजिला इमारत में रहने वाले एमबी निर्मल ने भी लोगों के सामने एक उदाहरण पेश किया है। निर्मल इमारत की 12वें मंजिल पर रहते हैं और उनकी दोनों बालकनी और बैठक में 17,00 पौधे लगे हुए हैं। निर्मल एक एनजीओ एक्नोरा इंटरनेशनल के प्रेसिडेंट हैं, वो कहते हैं, “कोयम्बेडू बस स्टैंड के पास चेन्नई का ये हिस्सा सबसे प्रदूषित है। पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड मेरे अपार्टमेंट में प्रदूषण का स्तर मापने आया था। उन्हें प्रदूषण बिल्कुल नहीं मिला, ये पौधों के कारण था.” लेकिन रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में कितना खर्च आता है? इंद्र कुमार कहते हैं, “ये खर्च की बात नहीं है। ये भविष्य का निवेश है। उसी तरह जैसे आप अपने पेंशन फ़ंड, जीवन बीमा आदि में निवेश करते हैं।
(साभार – बीबीसी हिन्दी)

नुसरत जहाँ ने दिया फतवे का जवाब, शेयर की बिंदी और कलीरे वाली तस्वीरें

कोलकाता : तृणमूल सांसद नुसरत बीते दिनों शादी के बाद संसद में शपथ लेने पहुँची थी। इस दौरान वो भारतीय अवतार में दिखीं। सिंदूर, मेंहदी, मंगलसूत्र और हाथों में चूड़ा पहनकर जब खूबसूरत नुसरत संसद पहुँचीं तो लोग उन्हें बस देखते ही रह गए। उनकी तस्वीरें खूब वायरल हुई थीं। वहीं कुछ ही दिन बाद नुसरत जहां के पहनावे और ऐसे अवतार को लेकर उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया। नुसरत ने इस फतवे पर अपना बयान देते हुए कहा था कि मैं मुस्लिम ही रहूँगी और मुझे क्या पहनना है मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूँगी। विश्वास कपड़ों से कहीं बढ़कर है।
वहीं अब नुसरत ने कुछ अलग तरह से ही इस विवाद पर जवाब दिया है। उन्होंने इंस्टाग्राम एकाउंट पर अपनी शादी की कुछ बेहद खूबसूरत तस्वीरें शेयर की हैं। इन तस्वीरों में नुसरत न सिर्फ दुल्हन के जोड़े में सजी-धजी दिख रही हैं बल्कि वो कलीरा खनकाती हुई भी नजर आ रही हैं। उन्होंने इन तस्वीरों के कैप्शन में लिखा हर लड़की का सपना होता है कि वह अपने खास दिन पर लाल रंग की के परिधान पहने। मैं अपने परिवार और दोस्तों को शुक्रिया कहना चाहती हूँ जो मेरे साथ हर पल रहे।
नुसरत इन तस्वीरों में बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं। वहीं उनकी ये अनदेखी वेडिंग फोटोज सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी हो रही हैं। इन तस्वीरों पर कई लोग उन्हें सपोर्ट कर रहे हैं वहीं कुछ लोगों ने उनके खिलाफ निगेटिव कमेंट्स भी किए हैं।
इससे पहले नुसरत ने ट्वीट कर कहा था कि मैं सम्मिलित भारत का प्रतिनिधित्व करती हूँ जो कि जाति और धर्म के सारे बन्धनों से कहीं आगे है। जितना हो सकता है मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूँ। मैं मुस्लिम ही रहूँगी और मुझे क्या पहनना है मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूँगी। विश्वास कपड़ों से कहीं बढ़कर है। हर धर्म की अमूल्य शिक्षाओं को मानने में कोई हर्ज़ नहीं है। नुसरत
इस ट्वीट के साथ नुसरत ने लिखा- किसी भी धर्म के कट्टर लोगों द्वारा की गई टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देना केवल घृणा और हिंसा को जन्म देता है, और इतिहास इस बात की गवाही देता है। नुसरत के इस ट्वीट को सांसद और उनकी दोस्त मिमी चक्रवर्ती ने रीट्वीट करके लिखा है कि हम भारतीय हैं और सिर्फ यही हमारी पहचान है। भारतीय होने पर गर्व है और रहेगा।
बता दें, नुसरत ने निखिल के साथ 19 जून को शादी की थी। नुसरत और निखिल ने हिंदू रीति के साथ-साथ क्रिश्चियन वेडिंग भी की।

समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता नहीं है

कौशल दुग्गड़ पेशे से इंटीरियर डिजाइनर हैं जो कि हमेशा से उनका जुनून रहा। आरम्भ से ही घर सजाने और शानदार लुक देने में उनकी दिलचस्पी रही। द कन्क्रीट अफेयर्स के नाम से उनकी कम्पनी है और वे बीएनआई के सदस्य भी हैं।  इसके साथ ही इनको फोटोग्राफी भी अच्छी लगती है। इंटीरियर डिजाइनर कौशल दुग्गड़ से अपराजिता की बातचीत के प्रमुख अंश मुलाकात में
बचपन से ही इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहता था
बचपन से ही मैं इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहता था मगर यह मैं बहुत बाद में समझा जब मैं श्रमिकों और कॉन्टैक्टरों को सुबह से शाम तक काम करते देखा करता था। तब लगा कि मुझे यही क्षेत्र चुनना है।
परिवार का साथ मिला
मेरे परिवार का साथ मुझे मिला। शायद यही वजह है कि मैंने यह क्षेत्र चुना। मैं इस पृष्ठभूमि से नहीं था मगर उनको मेरे चयन और पेशे में पूरा विश्वास था।
जीवनशैली के अनुसार डिजाइन देता हूँ
इस शहर में कई इंटीरियर डिजाइनर हैं। परिवार और दोस्तों के बीच, मेरा सपना है कि ऐसी भव्य डिजाइन दूँ जो उनकी जीवनशैली से मेल खाए। ऐसी डिजाइन जो उनके जीवन स्तर को परिभाषित करे।
संवाद की कमी बड़ी समस्या है
क्लाइंट और डिजाइनरों के बीच कई बार पेशेवर अन्दाज की कमी होती है। ऐसी ही दिक्कत डिजाइनरों और वेंडर्स, श्रमिक के बीच भी आती है। क्लाइंट की अभिरुचि, पारदर्शिता का अभाव और कई बार डिजाइनरों का शोषण भी बड़ी समस्या है।
समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता नहीं है
मुझे लगता है कि समाज में इंटीरियर डिजाइनरों के प्रति जागरुकता का अभाव है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हर व्यक्ति के पास अपने सपनों का घर होना चाहिए जो इस तरीके से डिजाइन किया गया हो कि वह उनकी अभिरुचि को पूरा करे न कि डिजाइनरों और श्रमिकों की। ऐसे कई प्रोफेशनल हैं जो क्लाइंट से उनको मिली आजादी का दुरुपयोग करते हैं। उम्मीद है कि इस पेशे को भी वही सम्मान मिले जिसका वह अधिकारी है। किसी भी इंटीरियर डिजाइनिंग परियोजना के लिए पर्याप्त नियम होने चाहिए।

समाज को बाँटने वाली हर चाल का मुकाबला हम और आप ही करेंगे

अभिनेत्री जायरा वसीम ने फिल्म उद्योग को अलविदा कह दिया है। अभिनय छोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है मगर जो कारण उन्होंने बताए हैं, वे काफी परेशान करने वाले हैं। सीक्रेट सुपरस्टार जैसी फिल्म से अपना लोहा मनवाने वाली जायरा की उम्र अधिक नहीं है मगर उनमें सम्भावनाएँ बहुत हैं। एकमात्र धर्म क्या उस उर्जा का क्षरण कर सकता है? ऐसा माना जा रहा है कि उन पर कट्टरपंथियों का दबाव रहा और बहुत ज्यादा रहा। इस वजह से ही उन्होंने यह फैसला लिया। यह एक खतरनाक संकेत इसलिए है क्योंकि जायरा के इस फैसले को ढाल बनाकर अब दूसरी लड़कियों पर प्रहार किये जा सकते हैं।
दरअसल, धर्म और परिवार का काम है कि वह बच्चों को खड़ा करे। किसी भी व्यक्ति को मजबूती दे मगर कोई अपने जीवन को किस तरह से जीना चाहता है, वह आगे क्या करना चाहता है, इसका फैसला धर्म के नाम पर न तो हो सकता है और न होने देना चाहिए। ये बहुत हैरत की बात है कि जिन बन्धनों को बड़ी मुश्किल से तोड़ा गया था, उनको लड़कियाँ खुद पर लाद रही हैं। उड़ते खुले काले बाल बुरके या घूँघट के नीचे जा रहे हैं, उनकी आजाद सोच कैद हो रही है, यह परेशान करने वाला है। हम कह सकते हैं कि यह उनका निजी फैसला है मगर उनके फैसले के साथ खड़े होने वाले लोग रहें मगर लड़कियों के साथ अक्सर ऐसा नहीं हो पाता। उनके साथ कई बार वह ही नहीं खड़े होते जिन पर उनको सबसे ज्यादा भरोसा होता है। मुमकिन है कि ऐसा ही कुछ जायरा के साथ भी हुआ हो या फिर उन्होंने खुद को ही बाँधना शुरू कर दिया है।
जायरा ने अपनी पोस्ट में बताया कि 5 साल पहले उनके बॉलीवुड में कदम रखने के फैसले ने किस तरह उनकी जिन्दगी को बदल दिया लेकिन जायरा को लगता है कि अभिनेत्री बनने की वजह से वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं। जायरा के पोस्ट में उनका दर्द साफ झलक रहा है। उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए बताया कि पाँच सालों से वो किस तरह अपनी आत्मा से लड़ रही हैं। एक कामयाब पहचान मिलने के बाद वो खुश हैं. लेकिन ये वो पहचान नहीं है जो वो अपनी जिंदगी से चाहती हैं और इस बात का उन्हें एहसास हो गया है। जायरा ने अपनी पोस्ट में साफ-साफ शब्दों में बताया कि लम्बे वक्त से उन्हें ऐसा लग रहा है कि वो कुछ और ही बनने की जद्दोजहद कर रही हैं. लेकिन उन्हें एहसास हो गया है कि उनकी नयी जीवनशैली, प्रसिद्धि और संस्कृति में वो खुद को फिट तो कर सकती हैं, लेकिन वो इस प्लेटफॉर्म के लिए नहीं बनी हैं। जायरा को लगता है कि फिल्म इंड्स्ट्री से जुड़ने पर वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं लेकिन वो बीते कुछ समय से खुद को समझाने की कोशिश कर रही थीं कि वो जो कर रही हैं वो सब सही है. लेकिन उन्हें आखिरकार समझ आ गया है कि इस्लाम की बताई राह पर चलने में वो एक बार नहीं बल्कि 100 बार असफल रहीं हैं। जायरा ने यह भी बताया कि वो अपनी छोटी सी जिंदगी में इतनी लंबी लड़ाई नहीं लड़ पा रही हैं और वो बहुत सोच समझकर बॉलीवुड को अलविदा कहने का फैसला ले रही हैं. जायरा के इस फैसले से बॉलीवुड हस्तियों समेत उनके फैंन्स को बड़ा झटका लगा है। जाहिर है कि उनके इस फैसले से बॉलीवुड को गहरा झटका लगा है।
आज धर्म हर चीज को परिचालित कर रहा है। ऐसा नहीं होने देना चाहिए। धर्म के नाम पर हम किसी की जान लेने की इजाजत नहीं दे सकते और न ही उसे इजाजत दे सकते हैं कि उसके आधार पर हमारी जिन्दगी के फैसले हों। कहीं न कहीं आपको फैसला लेना पड़ता है। दूसरी तरफ इस सर्कींण मानसिकता के खिलाफ खड़ी नुसरत जहाँ हैं जो अपने खिलाफ जारी फतवों का न सिर्फ जवाब दे रही हैं बल्कि एक नयी मिसाल खड़ी कर रही हैं। नुसरत के खिलाफ भी फतवे जारी किये गये क्योंकि उन्होंने एक हिन्दू से विवाह किया और बाकायदा साड़ी, बिन्दी व सिन्दूर तक लगाया…मगर इसके खिलाफ नुसरत जिस तरह खड़ी हुईं और जिस तरह आलोचकों को जवाब दिया..भारतीयता को सामने रखा..उनकी यह स्वतन्त्र सोच एक उम्मीद तो जगाती है। अगर हम किसी नारेबाजी से खुद को उद्वेलित होने देते हैं या धर्म को खुद पर हावी होने देते हैं या किसी धर्म विशेष के चश्मे में खुद को बाँधना शुरू करते हैं तो दरअसल, वह हमारी हार ही होती है। जय श्री राम के नारे से किसी को उकसाना और यह सुनकर अपना आपा खो बैठना, दोनों ही आपके मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक हैं। तुष्टीकरण की नीति भी कुछ ऐसी ही समाज में दरार डालने वाली है मगर उनसे जनता के रूप में खुद को कैसे बचाना है, यह नेता नहीं देखेंगे बल्कि हमें ही देखना होगा। एक समाज की रक्षा का भार कोई सरकार या राजनीतिक पार्टी नहीं उठाने जा रही, इसके लिए आम जनता को ही खड़ा होना होगा। समाज को बाँटने वाली हर चाल का मुकाबला हम और आप ही करेंगे।

 

आपातकाल से जुड़ीं हैं ये 10 बड़ी बातें

आज से 44 साल पहले इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था। 25 जून, 1975 को लगा आपातकाल 21 महीनों तक यानी 21 मार्च, 1977 तक देश पर थोपा गया। 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर करने के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू हो गया था। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, ‘भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है।’ आइये आज आपातकाल से जुड़ी 10 बड़ी बातें जानते हैं… 

नेताओं की गिरफ्तरियां आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था। 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था। जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। जेलों में जगह नहीं बची थी। आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं। प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी। यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई।

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पृष्ठभूमि लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था। यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था। आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुतम से से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।

प्रमुख कारण 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबर्दस्त जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े मार्जिन से जीती थीं। खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है। मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया। इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगाने का फैसला लिया।

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आपातकाल की घोषणा इस फैसले से इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया।

इमर्जेंसी में हर कदम पर संजय के साथ थीं मेनका इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आर.के. धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में इमर्जेंसी को लेकर किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था। और तो और, मेनका गांधी को इमर्जेंसी से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं। वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं। दिवंगत आर.के.धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था।

धवन ने यह भी कहा था कि इंदिरा गांधी जबरन नसबंदी और तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चलवाने जैसी इमर्जेंसी की ज्यादतियों से अनजान थीं। इन सबके लिए केवल संजय ही जिम्मेदार थे। इंदिरा को तो यह भी नहीं पता था कि संजय अपने मारुति प्रॉजेक्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण कर रहे थे। धवन के मुताबिक इस प्रॉजेक्ट में उन्होंने ही संजय की मदद की थी, और इसमें कुछ भी गलत नहीं था।

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बंगाल के सीएम एस.एस.राय ने दी थी आपातकाल लगाने की सलाह धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। इमर्जेंसी की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी। धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी। वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे। धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें अरेस्ट किया जाना है। इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं।

इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा 
धवन ने कहा था कि आपातकाल इंदिरा के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए नहीं लागू किया गया था, बल्कि वह तो खुद ही इस्तीफा देने को तैयार थीं। जब इंदिरा ने जून 1975 में अपना चुनाव रद्द किए जाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश सुना था तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इस्तीफे की थी और उन्होंने अपना त्यागपत्र लिखवाया था। उन्होंने कहा था कि वह त्यागपत्र टाइप किया गया लेकिन उस पर हस्ताक्षर कभी नहीं किए गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी उनसे मिलने आए और सबने जोर दिया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए।

आईबी की रिपोर्ट और 1977 का चुनाव धवन ने कहा था कि इंदिरा ने 1977 के चुनाव इसलिए करवाए थे, क्योंकि आईबी ने उनको बताया था कि वह 340 सीटें जीतेंगी। उनके प्रधान सचिव पीएन धर ने उन्हें यह रिपोर्ट दी थी, जिस पर उन्होंने भरोसा कर लिया था। लेकिन, उन चुनावों में मिली करारी हार के बावजूद भी वह दुखी नहीं थीं। धवन ने कहा था, ‘इंदिरा रात का भोजन कर रही थीं तभी मैंने उन्हें बताया कि वह हार गई हैं। उनके चेहरे पर राहत का भाव था। उनके चेहरे पर कोई दुख या शिकन नहीं थी। उन्होंने कहा था भगवान का शुक्र है, मेरे पास अपने लिए समय होगा।’ धवन ने दावा किया था कि इतिहास इंदिरा के साथ न्याय नहीं कर रहा है और नेता अपने स्वार्थ के चलते उन्हें बदनाम करते हैं। वह राष्ट्रवादी थीं और अपने देश के लोगों से उन्हें बहुत प्यार था।

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इमर्जेंसी के दौरान इंदिरा के घर में था अमेरिकी जासूस
विकिलीक्स पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर में 1975 से 1977 के दौरान एक अमेरिकी भेदिया था, जो उनके हर पॉलिटिकल मूव की खबर अमेरिका को दे रहा था। यह खुलासा विकिलीक्स ने कुछ साल पहले अमेरिकी केबल्स के हवाले से किया था। विकिलीक्स के मुताबिक, इमर्जेंसी के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर में मौजूद इस भेदिए की उनके हर राजनीतिक कदम पर नजर थी। वह सारी जानकारी अमेरिकी दूतावास को मुहैया करा रहा था। केबल्स में इस भेदिए के नाम का खुलासा नहीं किया गया है।  26 जून 1975 को इंदिरा गांधी के देश में इमर्जेंसी घोषित करने के एक दिन बाद अमेरिकी दूतावास के केबल में कहा गया था कि इस फैसले पर वह अपने बेटे संजय गांधी और सेक्रेटरी आरके धवन के प्रभाव में थीं। केबल में लिखा था, ‘पीएम के घर में मौजूद ‘करीबी’ ने यह कन्फर्म किया है कि दोनों किसी भी तरह इंदिरा गांधी को सत्ता में बनाए रखना चाहते थे।’ यहां दोनों का मतलब संजय गांधी और धवन से है।
आपातकाल और पीएम मोदी 
आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहम भूमिका निभाई थी। आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता छीनी जा चुकी थी। कई पत्रकारों को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकार की कोशिश थी कि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंचे। उस कठिन समय में नरेंद्र मोदी और आरएसएस के कुछ प्रचारकों ने सूचना के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी उठा ली। इसके लिए उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया। संविधान, कानून, कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के बारे में जानकारी देने वाले साहित्य गुजरात से दूसरे राज्यों के लिए जाने वाली ट्रेनों में रखे गए। यह एक जोखिम भरा काम था क्योंकि रेलवे पुलिस बल को संदिग्ध लोगों को गोली मारने का निर्देश दिया गया था। लेकिन नरेंद्र मोदी और अन्य प्रचारकों द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीक कारगर रही।

 (तस्वीरें व आलेख – साभार नवभारत टाइम्स)

14 साल के छात्र ने खेत में दौड़ाया सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन का मॉडल

नागौर (राजस्थान) :  राजस्थान के नागौर के प्यावां गांव में रहने वाले 14 साल के सुनील ने अपने खेत में सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन का मॉडल बनाया है। सौर ऊर्जा से संचालित इस ट्रैक पर रेलवे फाटक, शंटिंग और सिग्नल के साथ प्लेटफार्म भी बना है। सुनील के इस मॉडल को देखकर रेलवे के अधिकारी भी हैरान हैं। सुनील को रेलवे के अधिकारियों ने खास अनुमति के साथ जोधपुर-दिल्ली सराय रोहिला के इंजन में लोको पायलट के साथ सफर भी कराया है। 8वीं में पढ़ने वाले सुनील ने बताया कि यह ट्रैक 60 फीट लंबा है। इसे बेकार सामान से चार माह में तैयार किया है।

भारतीय और क्षेत्रीय परिधानों में ही मिलेगी डिग्री, यूजीसी ने 750 विश्वविद्यालयों को दिया निर्देश

नयी दिल्ली : दीक्षांत समारोह में अब खादी से तैयार भारतीय और क्षेत्रीय पहचान को दर्शाते परिधान ड्रेस कोड के रूप में नजर आएंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश के सभी 750 विश्वविद्यालयों को इस बाबत पत्र लिखा है। निर्देश दिए कि दीक्षांत समारोह में हैंडलूम फैब्रिक से तैयार भारतीय और क्षेत्रीय परिधानों में छात्रों को डिग्री दी जाए। इस संबंध में विवि से रिपोर्ट भी मांगी गई है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. रजनीश जैन की ओर से केन्द्रीय, राज्य, निजी विश्वविद्यालयों समेत डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी के कुलपतियों को पत्र लिखा गया है, जिसमें कुलपतियों से दीक्षांत समारोह में नए नियमों के तहत नए डिजाइन व फैब्रिक के परिधान पहनकर डिग्री देने का निर्देश दिया है।
प्रो. जैन के मुताबिक, दीक्षांत समारोह में वर्षों से गाउन और टोपी पहनकर डिग्री दी जाती रही है, लेकिन अब समय बदल चुका है इसलिए कुलपतियों को भारतीय व क्षेत्रीय संस्कृति के तहत परिधान चुनने को कहा गया है। यह परिधान खादी या हैंडलूम फैब्रिक से तैयार होने चाहिए। यह वस्त्र हर मौसम के लिए उपयुक्त रहते हैं।
देश के सभी 750 विश्वविद्यालयों में यदि हैंडलूम निर्मित भारतीय व क्षेत्रीय संस्कृति को दर्शाते परिधान पहने जाते हैं तो दुनिया में भारतीय संस्कृति खुद-ब-खुद प्रसारित होगी। साथ ही, हैंडलूम फैब्रिक की भी बाजार में माँग बढ़ेगी तो छोटे कारीगरों को रोजगार मिलेगा।
केन्द्रीय मंत्री की मंजूरी के बाद माँगे थे सुझाव
गौरतलब है कि 15 सितम्बर 2017 को पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर की अध्यक्षता में दीक्षांत समारोह में भारतीय परिधान में आयोजित करने पर बैठक हुई थी। केन्द्रीय मंत्री की मंजूरी के बाद मंत्रालय ने आम लोगों, छात्रों, शिक्षाविदें व राज्यों से सुझाव मांगे थे। इसी के आधार पर एक परिधान के बजाय सभी राज्यों की संस्कृति पर आधारित परिधानों को प्रमोट करने का फैसला लिया गया था।
पंजाब में सूट-सलवार, पहाड़ों में पारम्परिक पोशाक
सभी राज्यों के उच्च शिक्षण संस्थान अपने राज्य की वेशभूषा को दर्शाते हैंडलूम फैब्रिक से निर्मित परिधान दीक्षांत समारोह में ड्रेस कोड बना सकेंगे। कश्मीर में कश्मीरी ड्रेस, पंजाब में सलवार-सूट, हरियाणा में हरियाणवी ड्रेस, उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों में पहने जाने वाली पारंपरिक ड्रेस, नार्थ-ईस्ट व पश्चिम, दक्षिण समेत अन्य राज्य अपनी संस्कृति को दर्शाती पोशाक पहनेंगे।

केरल में बन रहा है देश का पहला डिजिटल गार्डन, पेड़ों पर हैं क्यूआर कोड

तिरुअनंतपुरम : देश का पहला डिजिटल गार्डन केरल में बन रहा है। राजभवन स्थित 21 एकड़ के क्षेत्र में फैले कनककुन्नु गार्डन में जितने भी पेड़ हैं, सभी को क्यूआर कोड दिया जा रहा है। स्मार्टफोन के जरिए पेड़ों पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन कर उसकी पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। जैसे पेड़ों की प्रजाति, उम्र, बॉटेनिकल नाम, प्रचलित नाम, पेड़ों पर फूल खिलने का मौसम, फल आने का मौसम, चिकित्सा और अन्य इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी पलभर में हासिल हो जाएगी। गार्डन में पेड़ों की 126 प्रजातियां हैं, जिन्हें डिजिटल फार्मेट में किया गया है। इस गार्डन को विकसित करने में केरल विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. ए. गंगाप्रसाद और अखिलेश नायर ने मुख्य रूप से योगदान दिया है। कनककुन्नु गार्डन में हजारों पेड़ हैं, लेकिन फिलहाल 600 पेड़ों पर ही क्विक रिस्पांस यानी क्यूआर कोड लगाए हैं। शेष पर कोडिंग का काम जारी है।
गार्डन में आए पोस्ट ग्रेजुएट बॉटनी के छात्र अखिलेश एसवी नायर का कहना है, “मैंने अब तक 50 से ज्यादा पेड़ों की जानकारी मोबाइल के जरिए इकट्ठा कर ली है। क्लासरूम या प्रयोगशाला से बेहतर है कि हम प्रकृति के बीच आएं और सालों पुराने पेड़ों के बारे में जानें। आमतौर पर पेड़ को देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि उसकी उम्र कितनी है या फिर उस पर किस मौसम में फल या फूल आते हैं लेकिन इस क्यूआर कोड से हमें मिनटों में ही सारी जानकारी मिल जाती है।”
अमेरिका और जापान जैसे देशों में पेड़ों पर क्यूआर कोड या माइक्रो चिप अनिवार्य रूप से लगाई जाती है। एक अन्य छात्र सजी वर्गीस का कहना है, “क्यूआर कोड की वजह से रोजाना सैर करने वालों के साथ-साथ पर्यटकों में भी पेड़ों के प्रति जागरुकता बढ़ी है।”
दिल्ली के लुटियंस जोन स्थित लोधी गार्डन के पेड़ों पर क्यूआर कोड सबसे पहले लगाए गए थे। मकसद था लोगों को सालों पुराने पेड़ों के बारे में जानकारी मिले। यहां करीब 100 से ज्यादा पेड़ों पर कोडिंग की गई है,जिन पेड़ों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं, उनमें से कई पेड़ों की उम्र सौ साल से अधिक है। गार्डन में कई औषधीय गुणों वाले पौधे भी हैं।

तालिबानी डर को ताक पर रखा, अफगानिस्तान में सुर साध रही लड़कियाँ

काबुल : अफगानिस्तान में तालिबानी डर को ताक पर रखकर लड़कियाँ संगीत के सुर साध रही हैं।  यहाँ महिलाओं ने पहला ऑर्केस्ट्रा ‘जोहरा’ बनाया है। इसे दुनियाभर में शोहरत मिल रही है। हाल ही में ग्रुप की 30 लड़कियों ने लंदन जाकर प्रस्तुति दी। जरीफा अबीदा इस ऑर्केस्ट्रा ग्रुप की संयोजक हैं।। जरीफा बताती हैं, संगीत को समाज पाप मानता है, दुनिया घूमने पर मायने पता चले। हमारे समाज की लड़कियों के लिए संगीत पाप से कम नहीं समझा जाता है। कश्मीर की महिला बैंड के सदस्यों को भी मैं यही कहना चाहती हूं कि लोगों की बातों पर ध्यान मत दीजिए। अपने सपनों को सच में तब्दील करने के लिए मेहनत करें।
तालिबानी जिंदा जला देंते हैं
अफगानिस्तान एक ऐसा देश जहां औरतें जो संगीतकार, कलाकार या कंडक्टर हैं, उन्हें तालिबानी सड़कों पर जिंदा जला देते हैं या फिर पत्थरों से मार-मार कर हत्या कर देते हैं। मुझे हर रोज यह डर सताता था कि घर वाले मेरा स्कूल जाना बंद करवाकर मेरी शादी न करवा दें। 2014 में मैंने संगीत स्कूल एएनआईएम में दाखिला लिया। इस बारे में परिवार को भी नहीं बताया। हमारे यहां संगीत सीखने वाली लड़कियों से लोग बेहतर सुलूक नहीं करते हैं।
2015 में जोहरा ऑर्केस्ट्रा बनाया
एक बार समर प्रोग्राम के लिए अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी गई, तब लगा कि देश के बाहर संगीतकारों के प्रति लोगों की सोच और रवैया बेहद अलग है। भले ही वह महिला क्यों न हों। तब अहसास हुआ कि अफगानिस्तान में एक लड़की के संगीत सीखने के बाहरी दुनिया में क्या मायने हैं। 2015 में मैंने जोहरा ऑर्केस्ट्रा बनाया। एक साल बाद साथी नेगिन खापोल्वॉक के साथ इसके संचालन का मौका मिला।