Thursday, July 2, 2026
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ब्रिटेन की भारतीय मूल की पहली गृह मंत्री बनीं प्रीति पटेल, जावेद को मिला वित्त मंत्रालय

लंदन : टेरेसा मे की ब्रेक्जिट नीति की मुखर आलोचक रहीं प्रीति पटेल ने ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की कैबिनेट में गृह मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। इसके साथ ही वह ब्रिटेन में भारतीय मूल की पहली गृह मंत्री बन गई हैं। प्रीति पाकिस्तानी मूल के साजिद जावेद की जगह लेंगी, जिन्हें वित्त मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है। जावेद नस्लीय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले ब्रिटेन के पहले वित्त मंत्री हैं।
प्रीति कंजरवेटिव पार्टी नेतृत्व के लिए ‘‘बैक बोरिस’’ अभियान की प्रमुख सदस्य थीं और पहले से संभावना थी कि उन्हें नयी कैबिनेट में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। प्रीति ने कहा कि गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपे जाना सम्मान की बात है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने देश एवं हमारे लोगों को सुरक्षित रखने और सड़कों पर बढ़ रहे अपराधों को रोकने के लिए हर संभव कोशिश करूंगी। मैं आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार हूं।’

टेरेसा मे की कैबिनेट से ब्रेक्जिट मंत्री के तौर पर इस्तीफा देने वाले डोमिनिक राब को विदेश मंत्री बनाया गया हैं। वह टोरी नेतृत्व के मुकाबले में जॉनसन के प्रतिद्वंद्वी रहे जेरेमी हंट की जगह लेंगे। लिज ट्रुस को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री और बेन वालेस को रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया है। एंड्रिया लीडसम को व्यापार मंत्री बनाया गया है।
कुछ पदों में बदलाव नहीं किया गया हैं जिनमें स्वास्थ्य मंत्री और ब्रेक्जिट मंत्री के पद शामिल हैं। मैट हैनकॉक स्वास्थ्य मंत्री और स्टीफन बारक्ले ब्रेक्जिट मंत्री बने रहेंगे। प्रीति ने अपनी नियुक्ति की घोषणा से कुछ घंटे पहले कहा था, ‘‘यह महत्वपूर्ण है कि कैबिनेट आधुनिक ब्रिटेन और आधुनिक कंजरवेटिव पार्टी को प्रदर्शित करे।’’ गुजराती मूल की नेता प्रीति ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों के सभी प्रमुख कार्यक्रमों में अतिथि होती हैं और उन्हें ब्रिटेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्साही प्रशंसक के रूप में देखा जाता है।

उच्चतम न्यायालय ने रद्द किया आम्रपाली का पंजीयन और संपत्तियों का पट्टा

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कर्ज में फंसी कंपनी आम्रपाली समूह का रीयल एस्टेट नियमन प्राधिकरण (रेरा) के तहत पंजीयन रद्द कर दिया। न्यायालय ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों से आम्रपाली की संपत्तियों के लिये मिले पट्टे भी रद्द कर दिये।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति उदय यू. ललित की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आम्रपाली समूह की सभी लंबित परियोजनाओं को पूरा करने के लिये एनबीसीसी को नियुक्त किया है। पीठ ने अधिवक्ता आर. वेंकटरमणी को कोर्ट रिसीवर नियुक्त किया। वेंकटरमणी को आम्रपाली की संपत्तियों के सारे अधिकार मिल जाएंगे।
न्यायालय ने कहा कि वेंकटरमणी के पास यह अधिकार रहेगा कि वह बकाया वसूली के लिये आम्रपाली की संपत्तियों की बिक्री के लिये तीसरे पक्ष से करार कर सकेंगे। पीठ ने कहा कि विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रावधानों का उल्लंघन कर घर खरीदारों के पैसे का हेर-फेर किया गया। न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय को आम्रपाली के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अनिल शर्मा तथा कंपनी के अन्य निदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किये गये कथित मनी लौंड्रिंग (धन शोधन) की जांच का भी निर्देश दिया है।
न्यायालय ने कहा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के प्राधिकरणों ने आम्रपाली के साथ सांठगांठ करके उसे मकान खरीदारों के पैसे की हेर-फेर करने में मदद की और कानून के हिसाब से काम नहीं किया। न्यायालय ने मकान खरीदारों को राहत देते हुए नोएडा और ग्रेटर नोएडा के प्राधिकरणों से कहा कि वे आम्रपाली समूह की विभिन्न परियोजनाओं में पहले से रह रहे मकान खरीदारों को आवास पूर्ण होने संबंधी प्रमाणपत्र सौंपे।

ये खुदकुशी सवाल खड़े करती है हमारी व्यवस्था और समाज पर

इस देश को कॉफी का चस्का लगाने वाले वी.जी. सिद्धार्थ ने जिन्दगी से हार मान ली। यह एक हृदय विदारक दिल तोड़ने वाली घटना है। कर्ज के बोझ और साझेदारों के दबाव ने एक होनहार उद्यमी इस देश से छीन लिया। उन्होंने जाते – जाते जो पत्र लिखा है, वह एक भयानक हकीकत से रूबरू करवाता है। आयकर विभाग के दबाव का भी जिक्र है। सिद्धार्थ की खुदकुशी ने एक साथ बहुत से सवाल खड़े कर दिये हैं…आर्थिक, सामाजिक और मानसिक हैं ये प्रश्न। ये घटना हमारी पूरी व्यवस्था और समाज पर प्रश्न चिह्न है। एक तरफ विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे कारोबारी हैं जो रातोंरात हजारों करोड़ रुपये की ठगी कर के देश से फरार होते हैं और दूसरी तरफ सिद्धार्थ जैसे लोग हैं जो एक – एक पैसा जोड़ते हैं, हजारों लोगों को रोजगार देते हैं, जीने की उमंग जगाते हैं और खुद व्यवस्था के आगे हार मान लेते हैं…यह दोष किसका है? क्या इस तरह हम आर्थिक प्रगति कर पाएँगे…अगर उद्यमी ही मजबूत न हुए तो इस देश की गाड़ी कैसे मजबूत होगी..यह सवाल तो खड़ा होता है। इस देश में श्रमिकों के प्रति सहानुभूति रहती है, होनी चाहिए मगर सवाल यह भी है कि अगर पूँजीपति ही नहीं होंगे तो आप काम कहाँ करेंगे? क्या इसके बाद आयकर के लिए बेवजह दबाव डालने वाले अधिकारियों पर नकेल कसी जायेगी? अगर यही स्थिति रही तो कोई भी युवा कैसे किसी व्यवसाय के लिए आगे बढ़ेगा? बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, बात उस मानसिक व सामाजिक दबाव की है जो पुरुषों को विरासत से मिलती आ रही है। खुद को मजबूत रखने का दबाव, हमेशा जिम्मेदारी लेने का दबाव और सारा बोझ अपने कन्धे पर रखने का दबाव उनको इस परम्परा से मिलता है। इस समाज ने रोने को कमजोरी की निशानी बताया है मगर हमें यह याद रखना होगा कि हम सब इन्सान हैं…हमारी क्षमताएँ हैं, सीमाएँ हैं, हम सफल हो सकते हैं और असफल भी हो सकते हैं। अपना गम, अपनी तकलीफें बाँटना सीखिए… जितनी काउंसिलिंग स्त्रियों की होती है, उतनी ही काउंसिलिंग की जरूरत पुरुषों को भी है..। हमें स्त्री विमर्श के साथ आज पुरुष विमर्श की भी जरूरत है। एक के बाद एक ऐसी परिस्थितियाँ बन रही हैं कि दूर तक सिर्फ संशय है। राजनीतिक दबाव एक बड़ा फैक्टर है। वी.जी. सिद्धार्थ कर्नाटक के पूर्व सीएम एमएस कृष्णा के दामाद थे…जाहिर है कि उन पर विरोधियों की नजर रही होगी और कृष्णा के दुश्मनों की भी…मगर राजनीतिक मुकाबलेबाजी का यह बेहद घिनौना रंग है। राजनीति का यह घिनौना रंग उन्नाव में भी दिख रहा है जहाँ लड़कियों की रक्षा का दम भरने वाली योगी सरकार फिलहाल अपने विधायक को बचाती नजर आ रही है…मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है..व्यवस्था की इस गड़बड़ी के बीच तीन तलाक बिल का पारित होना एक नयी उम्मीद लेकर आया है मगर सवाल तो अब भी वहीं है….ये कैसा देश बना रहे हैं हम…। आज मैथिलीशरण गुप्त याद आ रहे हैं..
इस देश को हे दीनबन्धो, आप फिर अपनाइए
भगवान भारतवर्ष को फिर, पुण्यभूमि बनाइए।।

हमें साहित्य को परर्फॉमिंग आट्रर्स से जोड़ना होगा

प्रो. शुभ्रा उपाध्याय बेहद मृदु स्वभाव की हैं। एक -एक बात को बड़े इत्मीनान से समझाना इनकी खासियत है…अपनी कहानियों में भी वे अपने चरित्र के मन का एक – एक रेशा जैसे खोलती हैं। चार किताबें लिख चुकी हैं और लगातार लिख रही हैं। शिक्षा और साहित्य के विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रो. शुभ्रा उपाध्याय से बात हुई, पेश हैं प्रमुख अंश –

प्र. कहानी लिखना कैसे शुरू किया? 

मेरा बचपन उत्तर प्रदेश के गाँव में बीता है। प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुई। वह गाँव जो, बिजली, पानी जैसी तमाम मौलिक सुविधाओं से वंचित रहा। सूर्य की रोशनी के बाद लालटेन, डिबरी का प्रकाश और कुआँ, गड़ही, नहर आदि ही सामान्य जन – जीवन के जल स्त्रोत के आधार थे। कृषि ही उनकी जीविका का प्रमुख साधन थी। गाँव के गिने -चुने परिवार ही थे जिनके पास पक्के मकान थे और घर में शहर जाकर कमाने जैसे व्यक्ति और कमाई भी। सौभाग्य से हमारा परिवार उन कुछ गिने -चुने परिवारों में से था जिन्हें शिक्षा की विरासत मिली थी और आर्थिक आधार भी मजबूत था। तब, जब गाँव में लड़कियाँ छोटे भाई -बहनों को खिलाने, खाना पकाने और सिलाई कढ़ाई सीखकर विवाह हेतु सुयोग्य तैयार की जाती थीं, हमें पढ़ने का मौका मिला। बचपन के दिनों में ही जीवन के जमीनी जद्दोजहद को बड़े निकट से देखा और महसूस किया था। उसके बाद जब कोलकाता आना हुआ और पढ़ने के लिए आर्य कन्या महाविद्यालय में दाखिला हुआ तब भी आस – पास की जिन्दगियाँ, विशेषकर स्त्री जीवन और उसके संघर्ष, जो गाँव से लेकर शहर तक किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे, ने मेरे मन को सबसे अधिक छुआ। इस तरह कहानी लिखने की शुरुआत हुई। विधिवत कहानी लिखना मैंने स्नातक की पढ़ाई के दौरान शुरू किया था। कभी – कभी कोई एक कहानी लिखने में पूरी रात बीत जाती थी। कहानी का प्रकाशन सर्वप्रथम एम.ए. के दौरान हुआ। ‘समकालीन संचेतना’ पत्रिका में कई कहानियाँ प्रकाशित हुईं। कई प्रतियोगिताओं में कहानियाँ पुरस्कृत हुईं। एम.ए. के उपरान्त जब मेरा विवाह हुआ तो पहली बार मेरे स्वर्गीय श्‍वसुर जी ने विवाह के अवसर पर ही मेरी कुछ कहानियों का सँग्रह प्रकाशित कर सभी मेहमानों को उपहार दिया था। ‘स्मृतियों के कुहासे में’ सँग्रह का शीर्षक था और उसममें लगभग 8-10 कहानियाँ थीं।

प्र. समकालीन साहित्य को लेकर आपके क्या विचार हैं? 

यह अत्यन्त गम्भीर प्रश्‍न है। साहित्य वस्तुतः समाज से विलग नहीं होता। समुद्र – बादल और वर्षा की तरह इनके अपने अनन्य रिश्ते होते हैं। एक का अस्तित्व, रूप-स्वरूप, दूसरे के अस्तित्व और रूप – स्वरूप की अनिवार्य शर्त बन जाता है। इसी के बीच ‘कुछ बेहतर’ की चाह सदैव परिवर्तन की दिशा निर्धारित करती रहती है। यह अकाट्य सत्य है कि ‘एक समय का’ ‘सबकुछ’ न ही सुन्दर होता है और न ही असुन्दर होता है। वैसे ही उसकी ‘शिवता’ के बारे में भी कहा जा सकता है लेकिन हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि सतत एक प्रचेष्टा हमेशा सत्य, शिव और सुन्दर की ओर प्रवाहमान होती है। मैंने कभी भी समय को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ नहीं समझा है। वैसे ही साहित्य को भी पूरा का पूरा अपनी जमात में ‘त्याज्य’ या ‘वरेण्य’ नहीं माना है। सबकी अपनी मौजदूगी की वजहें हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हमारा, आज का समकालीन साहित्य काफी बड़े पैमाने पर, बड़े फलक को आत्मसात किये हुए है।

प्र. क्या साहित्यिक कृतियों की सम्यक आलोचना नहीं हो पा रही है या नये लेखकों की उपेक्षा की जा रही है? 

इस प्रश्‍न में दो प्रश्‍न हैं। जहाँ तक साहित्यिक कृतियों की सम्यक आलोचना का प्रश्‍न है तो मैं समझती हूँ कि पूरी तरह से इसका उत्तर हाँ या न में नहीं हो सकता है। ऐसा नहीं है कि आज साहित्यिक कृतियों की आलोचना नहीं हो रही है लेकिन यह भी ठीक है कि साहित्यिक कृतियाँ जिस गम्भीर और सम्यक आलोचना दृष्टि की अपेक्षा रखती हैं, कभी – कभी उससे वंचित रह जाती हैं। वैसे भी हमारे समाज में बीमार और डॉक्टर के अनुपात की तरह रचनाकार और आलोचक का अनुपात भी विचारणीय है। अब मैं आपके प्रश्‍न के दूसरे हिस्से पर आती हूँ। इसका उत्तर भी बहुत सीधे शब्दों में नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह प्रश्‍न सिर्फ आज का प्रश्‍न नहीं है। यह एक शाश्‍वत अथवा कहें कि हर समय का प्रश्‍न है। साहित्य जगत की अपनी खूबियाँ, खामियाँ और उनसे निर्मित परिपाटियाँ हैं। मेरा मानना है कि किसी सवाल का उत्पन्न होना ही अपने आप में उसके जवाब की हल्की प्रतिध्वनि हुआ करता है। बावजूद इसके मीडिया और जनसंचार के तमाम सुलभ माध्यमों ने हर व्यक्ति को यह मौका प्रदान किया है कि वह स्वयं को उद्घाटित कर सके। स्वीकार और अस्वीकार किए जाने की दंगल तो नये लेखकों के साथ जुड़ी ही रहती है, फिर भी आज का समय इस मामले में पहले से कहीं ज्यादा उदार दृष्टिगोचर होता है। यह एक शुभ लक्षण है।

प्र. आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं? 

‘स्मृतियों के कुहासे में’ (जो अप्राप्य है) को छोड़ दें तो मेरी अभी तक कुल चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो कहानी सँग्रह ‘अंतराल’ और ‘कतरा -कतरा जिन्दगी’ हैं। एक आलोचनात्मक पुस्तक ‘अज्ञेय की कहानियों का पुनर्पाठ’ और एक सम्पादित पुस्तक ‘अपने – अपने अज्ञेय’ हैं। मैंने रंजन बंद्योपाध्याय के दो बांग्ला उपन्यास ‘आमि रवि ठाकुरेर बोउ’ और ‘कादम्बरी देवीर सुसाइड नोट’ का हिन्दी में अनुवाद भी किया है जो राजकमल से प्रकाशनाधीन है। उम्मीद है कि इस वर्ष के अन्त तक यह पुस्तक भी पाठकों के हाथ में होंगी।

प्र. आज के महिला लेखन के बारे में क्या कहना चाहेंगी?  

आज का महिला लेखन अत्यन्त समृद्ध है। मुझे लगता है कि आज की महिलाओं ने स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए साहित्य की सभी विधाओं को चुना और माध्यम बनाया है। कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, रिपोर्ताज, डायरी, संस्मरण, यहाँ तक कि आलोचना के क्षेत्र में भी बड़ी समर्थता के साथ स्वयं को स्थापित किया है। समाज की तमाम बुलन्दियों की तरह साहित्यिक बुलन्दियों पर भी अपने परचम लहराये हैं। यह अत्यन्त सन्तोषजनक है कि आज की तारीख का कोई भी मुकम्मलसाहित्यिक अनुष्ठान बिना महिला की भागीदारी के पूरा नहीं होता। आप देखें कि आज की महिलाओं का लेखन आपको चमत्कृत करेगा। महिलाओं ने अपने लेखन को अद्भुत विस्तार दिया है। उनकी चेतना, संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति की दक्षता, सब कुछ उन्हें श्रेष्ठ रचनाकार के रूप मे प्रतिष्ठित कर रहा है। 150 -200 पृष्ठों के उपन्यास, 5 -6 पन्नों की कहानियाँ, डायरी के आधे-अधूरे पृष्ठ, चेतना, संवेदना और भावना की त्रिवेणी के बहुतेरे अनछुए आयाम खोल देते हैं।

प्र. आज का स्त्री विमर्श किस तरह का विमर्श है और घरेलू स्त्रियों से जुड़े प्रश्‍नों पर आज का साहित्य कहाँ तक बात कर पाया है? 
कई बार जैसे कोई आन्दोलन या मुहिम भटकाव का शिकार हो जाते हैं, वैसे ही विमर्श भी अपनी तमाम बेहद जरूर बातों के बाद भी हम भटक जाते हैं। चिन्तन के स्तर पर बहुत गम्भीर विमर्श कई बार उथली और सतही बातों में फंसकर अपनी रूपरेखा अथवा प्रारूप से भिन्न शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श भी इसका अपवाद नहीं है। स्त्रियों की पीड़ा, उनकी संवेदना, उनके संघर्ष, उनकी अस्मिता, उनकी चेतना, उनकी स्वतन्त्रता की भाव भूमि से जिस विमर्श को सम्पृक्त होना चाहिए, वही अक्सर उनके बाह्य रूपाकार की ज्यामिति सुलझाने में व्यस्त दिखता है। ‘स्त्री आत्मा’ की मुक्ति, ‘देह की मुक्ति’ का विमर्श बन जाती है। ‘स्त्री मन का सुख’ ‘स्त्री मन की स्वाधीनता’ ‘दैहिक सुख’ ‘दैहिक स्वाधीनता’ की राह पकड़ लेता है। रिश्तों के प्रति नकार, परिवार की उपेक्षा, सम्बन्धों में धैर्यहीनता, सब प्रकार से ‘स्व’ की सन्तुष्टि का उतावलापन न जाने इस विमर्श को किस राह पर ले जा रहा है। तसल्ली इस बात की है कि ऐसी परिस्थितियों में भी अभी भी कई स्त्री विमर्श पर काम करने वाली लेखिकाएँ स्त्री विमर्श को उसके सच्चे अर्थों में ही खंगाल रही हैं। ऐसे प्रयास निश्‍चय ही सतह की काई को काट सकने में समर्थ होंगे और स्त्री विमर्श भटकावों से होता हुआ ही सही, किन्तु गन्तव्य तक अवश्य पहुँचेगा।
जहाँ तक घरेलू स्त्रियों से जुड़े प्रश्‍नों पर साहित्य के बात करने का सवाल है तो एक बात पहले स्पष्ट करना चाहूँगी कि स्त्री मात्र के साथ घर एक अद्भुत ढंग से जुड़ा होता है। चाहे कामकाजी स्त्रियाँ हों अर्थात जो घर के बाहर दफ्तर, स्कूल, कॉलेज में कार्यरत हैं, हों अथवा घरेलू स्त्रियाँ, जिन्हें आज हम ‘होम मेकर’ कहते हैं, वे हों। ऐसे कई सन्दर्भ होते हैं जहाँ इनकी समस्यायें अथवा संघर्ष एक जैसे होते हैं जिसमें मुझे लगता है कि सबसे बड़ी बाात इनके सम्मान और स्वाभिमान की होती है। ऐसा नहीं है कि साहित्य इनसे सरोकार रखने वाले प्रश्‍नों पर बात नहीं करता लेकिन हाँ, यह अवश्य है कि ज्यादातर ये प्रश्‍न सहानुभूति, दया, अथवा देयता के आलोकपुंज में रखे जाते रहे हैं। वहाँ भी स्त्री किसी न किसी दाता के प्रति नतमस्तक ही रही है।
आज का समय इस दृष्टि से काफी बदल गया है। स्त्रियाँ अपने सन्दर्भों के साथ स्वयं उपस्थित हो रही हैं। अपने संघर्ष, अपनी समस्यायें, स्वयं उद्घाटित भी कर रही हैं और सुलझा भी रही हैं। स्त्रियाँ स्वयं साहित्य की बाँह धर अपने घर का कोना -कोना दिखाने को तत्पर हो रही हैं।

प्र.बाजारवाद को आप किस रूप में देखती हैं? 

मुझे लगता है कि आज हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ से बाजारवाद को नकारना अथवा उसकी उपेक्षा करना एकदम असम्भव है। यह उस दुधारी तलवार की तरह है जिसे बरतने का शऊर सीखना अत्यन्त आवश्यक है। बाजारवाद अब बाजार से उठकर हमारे साथ हमारे घरों में स्थायी रूप से बस रहा है। ऐसी स्थिति में हमें एकमात्र साहित्य ही इसके साथ इसके बीच सुरक्षित मनुष्य बने रहने में मदद कर सकता है।

प्र. युवा पीढ़ी में क्या साहित्य के प्रति उदासीनता है? अगर हाँ तो इसका जिम्मेदार कौन है और स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है? 

यह प्रश्‍न मुझे बिल्व पत्र की तरह दिख रहा है। तीन प्रश्‍न। युवा पीढ़ी साहित्य के प्रति एकदम उदासीन है, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ, थोड़ी लापरवाही युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति जरूर देखी जा सकती है लेकिन अभी भी आप देखिए तो साहित्य विपुल पैमाने पर रचा भी जा रहा है और पढ़ा भी जा रहा है। मुझे तो युवा पीढ़ी इस मामले में भी बड़ी सकारात्मक और रचनात्मक दिखती है। थोड़ी बात उसकी लापरवाही पर करें जिसे आप उदासीनता कह रही हैं, वस्तुतः आज की जीवनचर्या (लाइफस्टाइल) ही एकदम बदल गयी है। मीडिया और जन संचार ने जीवन में नयी क्रान्ति लाकर इसे आमूलचूल परिवर्तित कर दिया है। आज हर व्यक्ति में, मैं विशेषकर युवा बच्चों की बात कर रही हूँ, उसके पास स्मार्टफोन है जिसमें दुनिया भर की जानकारियाँ भरी हुई हैं। ई लाइब्रेरी सुलभ है। आज बच्चे पुस्तकें खरीदने और पढ़ने की अपेक्षा मोबाइल में ही पत्रिकाएँ व पुस्तकें डाउनलो़ड कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं। हाँ, यह सत्य है कि यदि हम साहित्य के पठन – पाठन को प्रकाशित पुस्तकों के फॉर्म में देखना चाहते हैं। युवा पीढ़ी को पुस्तकालयों के रीडिंग रूम में में घंटों बैठा हुआ देखना चाहते हैं तो यह अवश्य कम हुआ है लेकिन समाप्त एकदम नहीं। इसके पीछे भी हमारी आज की जीवनचर्या ही काम कर रही है। जीवन की गतिशीलता तीव्र हो गयी है। व्यस्तताएं बढ़ गयी हैं। इसमें संचार क्रान्ति ने सब कुछ इन्सटेंट मुहैया करवा रखा है और तो और घर -परिवार के बुजुर्ग अभिभावक भी पुस्तकों का साथ छोड़ स्मार्टफोन और लैपटॉप की गिरफ्त में आते जा रहे हैं।  पुस्तकों के साथ रहने, पुस्तकों को पढ़ने का ‘संस्कार’ भी विलीन होता जा रहा है जिसे हमें युवा पीढ़ी तक पहुँचाना था। अब मैं कह सकती हूँ कि युवा पीढ़ी में यदि कहीं थोड़ी -बहुत साहित्य के प्रति उदासीनता है भी तो वह हमारी परिस्थितियों के साथ -साथ हमारी भी देन है।
जहाँ तक निपटने का प्रश्‍न है तो सबसे पहले हमें यह समझना और समझाना होगा कि तमाम तकनीकी हमारे जीवन के साधन हैं, साध्य नहीं। ये हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए हैं, खोखला करने के लिए नहीं। माध्यम को माध्यम की तरह इस्तेमाल किया जाए, उसे उद्देश्य न बनने दिया जाए्। द्वितीयतः हम अभिभावक – शिक्षक जनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों को साहित्य से परिचित करवायें। उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर उपहारों के साथ पुस्तकों को भी उपहार में देने – लेने के प्रति उत्साहित करें, साहित्य चर्चा करें।

प्र.  साहित्य को आम जनता के बीच में कैसे स्थापित किया जाए? 

आम जनता के बीच पहुँचने वाले साहित्य की अप्रतिम मिसाल है रामचरित मानस, सूर और मीरा के पद, कबीर के दोहे, प्रेमचन्द की कहानियाँ। मुझे लगता है कि थोड़ी सी सतर्कता और जागरुकता आवश्यक है इसके लिए। आप यदि देखें तो ‘रामचरित मानस’ के जन – जन तक पहुँचने में रामलीलाओं का अद्भुत योगदान है। अखण्ड पाठ का आयोजन, गायन, गायन प्रतियोगितायें इत्यादि इसे आम जन के बीच स्थापित करती हैं और सब कुछ अत्यन्त सहज रूप में्। हमें साहित्य को परर्फॉमिंग आट्र्स से जोड़ना होगा, साहित्यिक कृतियों का मंचन, पाठ, गायन, जैसे आयोजन इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं्। आज के समय में फिल्म एक अत्यन्त सशक्त माध्यम है। साहित्यिक कृतियों पर फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आप महत्वपूर्ण पाश्‍चात्य फिल्मों पर गौर करें, प्रायः फिल्में ऐसी कृतियों पर आधारित होती है जो जनसामान्य के मनोरंजन के साथ उनके रुचि परिष्करण और संस्करण का भी काम करती हैं। सामाजिक, धार्मिक तथा अन्य उत्सवों एवं अनुष्ठानों में साहित्यिक कार्यक्रमों को शामिल किया जाये।

प्र. हमारे पाठकों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगी? 

कहते हैं कि साहित्य हमें जीने का सलीका सिखाता है। वस्तुतः वह हमारे मन को उदार बनाता है। हमारे मन के कलुष को धोकर उसे तमाम जानी – अनजानी ग्रन्थियों से मुक्त करता है। हमें एक दूसरे से जोड़ता है। एक दूसरे तक पहुँचने का रास्ता निर्मित करता है। एक दूसरे की व्यथा, पीड़ा, दुःख की आँच को महसूस करने का सामर्थ्य प्रदान करता है। इस प्रकार अन्ततः हमें एक बेहतर मनुष्य बनाता है। अनुरोध करना चाहूँगी कि कृपया साहित्य से स्वयं जुड़ें और दूसरों को भी जोड़ें।

मेरी पहली रचना 

मुंशी प्रेमचंद

उस वक्त मेरी उम्र कोई १३ साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शरर, पं० रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व० हजरत रियाज़ ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा’ के नाम से किया था। उस जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच’ के सम्पादक स्व० मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद ‘धोखा’ या ‘तिलस्मी फ़ानूस’ के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं और पं० रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था; मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दूकान से अँग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लडक़ों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलस्मी होशरुबा’ के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रन्थ के १७ भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररायल के आकार के दो-दो हज़ार पृष्ठों से कम न होगा। और इन १७ भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रन्थ की रचना की, उसकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने ६० वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।

उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी-कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गये थे; लेकिन अभी तक बिन-ब्याहे थे। पास में थोड़ी-सी जमीन थी, मकान था, लेकिन घरनी के बिना सब कुछ सूना था। इसलिए घर पर जी नहीं लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे, और सबसे यही आशा रखते थे, कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिए सौ-दो-सौ खर्च करने को भी तैयार थे। क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे-खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूँछें, औसत कद, साँवला रंग। गाँजा पीते थे, इससे आँखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे। और माँस मछली नहीं खाते थे।

आख़िर एक बार उन्होंने भी वही किया, जो बिन-ब्याहे लोग अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन-बाणों से घायल हो गये। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के दूसरे फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी, छबीली थी, और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भाँति प्रसन्न मुख और विनोदनी थी। ‘एक समय सखि सुअरि सुन्दरि’ वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गयी। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पडऩे लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आयी, और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आयी और झलक दिखाकर चली गयी, कभी साँझ को आयी और एक तीर चलाकर चली गयी। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्योंकर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो गया था। होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी; मगर अबकी गजी की साड़ी न थी, खूबसूरत-सी सवा दो रुपये की चुँदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूल से चौगुनी दी। और यह सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गयी।

एक दिन सन्ध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे! एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर न देखा, (हालाँकि यह सरासर ग़लत था) और एक यह हैं कि नीच जाति की बहू-बेटियों पर भी डोरे डालते हैं! समझाने-बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उलटे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है, लेकिन मरम्मत से भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है।

दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर में आयी तो उन्होंने अन्दर का द्वार बन्द कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल मरजाद रहे या जाय, बाप-दादा का नाम डूबे या उतराय!

उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बन्द हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई असामी मिलने आया होगा, किवाड़ बन्द पाकर लौट जाएगा; लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाये। जाकर किवाड़ों की दराज से झाँका। कोई बीस-पचीस चमार लाठियाँ लिए द्वार रोके खड़े किवाड़ों को तोडऩे की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गये कि शामत आ गयी। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा इन्हीं को कोस रही थी-तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गयी। घर वाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे, कहती थी, कभी किवाड़ बन्द न करो, हाथ-पाँव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुँह में कालिख कि नहीं?

मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आये थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता; लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गयी। बरौठ में थर-थर काँपते ‘हनुमान-चालीसा’ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।

और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिए आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवद्र्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द एक औरत के साथ घर में बन्द पाया जाए! फिर वह चाहे कितना ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गये और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आँगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते? वह जानते थे, उनके लिए भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पडऩे लगी और बेभाव की पडऩे लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा-जूता, छड़ी, छाता, लात, घँूसा अस्त्र चले। यहाँ तक मामू साहब बेहोश हो गये और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझकर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गये, तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टीदारों के हाथ आएगी।

इस दुर्घटना की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहाँ भी पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनन्द उठाया। पिटते समय उनकी रूप-रेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हँसी आयी।

एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्योंही चलने-फिरने लायक हुए, हमारे यहाँ आये। यहाँ अपने गाँव वालों पर डाके का इस्तग़ासा दायर करना चाहते थे।

अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखायी होती, तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती; लेकिन उनका वही दम-खम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगडऩा और रोब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था! अब तो मेरे पास उन्हें नीचा दिखाने के लिए काफी मसाला था!

आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनायी। सब-के-सब खूब हँसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिखकर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढक़र मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टँगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला गया। मगर द्वार के समीप आकर पाँव रुक गये। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें; लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लडक़ों में न था।

मगर यह मामला क्या है! मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गये? आकर कमरा देखा वहाँ भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अन्दर जाकर पूछा। मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गये। भोजन तक नहीं किया।

मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा मगर मेरा ड्रामा-मेरी वह पहली रचना-कहीं न मिली। मालूम नहीं, मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गये?

(साभार – हिन्दी समय)

मुंशी जी के जीवन से कुछ किस्से

हिंदी के उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के लमही गांव में हुआ था। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य के खजाने को लगभग एक दर्जन उपन्यास और करीब 250 लघु-कथाओं से भरा है। प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। आज मुंशी प्रेमचंद के बिना हिंदी की कल्पना भी करना मुश्किल है, लेकिन लेखन की शुरुआत प्रेमचंद ने उर्दू से की थी। उन्होंने पहला उपन्यास उर्दू में लिखा था। उन्होंने ‘सोज-ए-वतन’ नाम की कहानी संग्रह भी छापी थी जो काफी लोकप्रिय हुई।
मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के बारे में तो काफी पढ़ा और लिखा गया है। लेकिन उनके निजी जीवन के बारे में लोगों को बहुत कुछ मालूम नहीं है। उनके जीवन के अनछुए पहलू को उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद: घर में’ उजागर किया है। आइए आज उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को जानते हैं…

जब एक लड़के के कान काट दिए
एक बार बचपन में वह मोहल्ले के लड़कों के साथ नाई का खेल खेल रहे थे। मुंशी प्रेमचंद नाई बने हुए थे और एक लड़के का बाल बना रहे थे। हजामत बनाते हुए उन्होंने बांस की कमानी से गलती से लड़के का कान ही काट डाला।

भड़क गया इंस्पेक्टर
उन दिनों मुंशी प्रेमचंद शिक्षा विभाग के डेप्युटी इंस्पेक्टर थे। एक दिन इंस्पेक्टर स्कूल का निरीक्षण करने आया। उन्होंने इंस्पेक्टर को स्कूल दिखा दिया। दूसरे दिन वह स्कूल नहीं गए और अपने घर पर ही अखबार पढ़ रहे थे। जब वह कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे तो सामने से इंस्पेक्टर की गाड़ी निकली। इंस्पेक्टर को उम्मीद थी कि प्रेमचंद कुर्सी से उठकर उसको सलाम करेंगे। लेकिन प्रेमचंद कुर्सी से हिले तक नहीं। यह बात इंस्पेक्टर को नागवार गुजरी। उसने अपने अर्दली को मुंशी प्रेमचंद को बुलाने भेजा। जब मुंशी प्रेमचंद गए तो इंस्पेक्टर ने शिकायत की कि तुम्हारे दरवाजे से तुम्हारा अफसर निकल जाता है तो तुम सलाम तक नहीं करते हो। यह बात दिखाती है कि तुम बहुत घमंडी हो। इस पर मुंशी प्रेमचंद ने जवाब दिया, ‘जब मैं स्कूल में रहता हूं, तब तक ही नौकर रहता हूं। बाद में मैं अभी अपने घर का बादशाह बन जाता हूं।’

शराब और मुंशी प्रेमचंद 
सन् 1924 में ‘माधुरी’ ऑफिस की कुछ किताबें बोर्ड मंजूर कराने बेदार साहब के यहां प्रयाग गए थे। बेदार साहब खुद बड़े शराबी थे। उन्होंने खुद भी पिया और मुंशी प्रेमचंद को भी पिला दिया। वह लेट से घर आए तो दरवाजा बच्चों ने खेला। बच्चों ने मां को पहले बता दिया था कि पिता जी पीकर आए हैं। यह सुनते ही शिवरानी देवी जान-बूझकर सो गईं। सुबह उन्होंने पत्नी से शिकायत की तो पत्नी ने कहा कि आप शराब पीकर आए थे, इसी वजह से दरवाजा नहीं खोला। अगर दोबारा भी पीकर आएंगे तो मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी। उस पर उन्होंने आगे से नहीं पीने का वादा किया। लेकिन एक बार फिर पीकर आगए। पत्नी शिवरानी देवी ने फिर से दरवाजा नहीं खोला। दूसरी बार के बाद फिर उन्होंने कभी शराब नहीं पी।

जब हिंदू सभा वाले हो गए नाराज
उन्होंने एक लेख लिखा था जिस पर हिंदू सभा वाले नाराज हो गए थे। इस पर उनकी पत्नी ने उनसे पूछा कि आप ऐसा लिखते ही क्यों है कि लोग भड़क जाते हैं और आपके दुश्मन बन जाते हैं। इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘लेखक को पब्लिक और गर्वनमेंट अपना गुलाम समझती है। आखिर लेखक भी कोई चीज़ है। वह सभी की मर्जी के मुताबिक लिखे तो लेखक कैसा? लेखक का अस्तित्व है। गवर्नमेंट जेल में डालती है, पब्लिक मारने की धमकी देती है, इससे लेखक डर जाये और लिखना बन्द कर दे?’

अंधविश्वास के खिलाफ
एक बार किसी बात पर उनकी पत्नी ने जब भगवान का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि भगवान मन का भूत है, जो इंसान को कमजोर कर देता है। स्वावलंबी मनुष्य ही की दुनिया है। अंधविश्वास में पड़ने से तो रही-सही अक्ल भी चली जाती है।  इस पर उनकी पत्नी ने कहा, गांधीजी तो दिन-रात ‘ईश्वर-ईश्वर’ चिल्लाते रहते हैं। जवाब में प्रेमचंद बोले, वह एक प्रतीक भर है। वह देख रहे हैं कि जनता अभी बहुत सचेत नहीं है। और फिर तो जनता सदियों से भगवान पर विश्वास किए चली आ रही है। जनता एकाएक अपने विचार बदल नहीं सकती है। अगर एकाएक जनता को कोई भगवान से अलग करना चाहे तो यह संभव भी नहीं। इसी से वे भी शायद भगवान का ही सहारा लेकर चल रहे हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

कारगिल विजय दिवस के गौरवमय 20 साल

कारगिल भारतीय इतिहास में सेना की शौर्य गाथा है । 1999 में 26 जुलाई को भारत के वीर सपूतों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर तिरंगा फहराया था। इन 10 बातों से जानिए कारगिल युद्ध की वीरता भरी कहानी…
– भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था। 8 मई 1999 में ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी, जब पाकिस्तानी सैनिकों और कश्मीरी आतंकियों को कारगिल की चोटी पर देखा गया था।
– कारगिल में घुसपैठ की सबसे पहले जानकारी ताशी नामग्याल नामक एक स्थानीय चरवाहे ने दी थी, जो कि कारगिल के बाल्टिक सेक्टर में अपने नए याक की तलाश कर रहे थे। याक की खोज के दौरान उन्हें संदिग्ध पाक सैनिक नजर आए थे।
– 3 मई को पहली बार भारतीय सेना को गश्त के दौरान पता चला था कि कुछ लोग वहां पर हरकत कर रहे हैं। पहली बार द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया था।
– भारतीय सेना ने 9 जून को बाल्टिक क्षेत्र की 2 चौकियों पर कब्जा कर लिया। फिर 13 जून को द्रास सेक्टर में तोलोलिंग पर कब्जा ‍जमाया। हमारी सेना ने 29 जून को दो अन्य महत्वपूर्ण चौकियों 5060 और 5100 पर कब्जा कर अपना परचम फहरा दिया।
– 11 घंटे लड़ाई के बाद पुन: टाइगर हिल्स पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया, फिर बटालिक में स्थित जुबर हिल को भी कब्जाया गया।
– 1999 में हुए कारगिल युद्ध में आर्टिलरी तोप से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे। 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों से रोज करीब 5,000 बम फायर किए गए थे।
– 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था।
– कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16,000 से 18,000 फुट ऊपर है, ऐसे में उड़ान भरने के लिए विमानों को करीब 20,000 फुट की ऊंचाई पर उड़ना पड़ता है।
– कारगिल युद्ध में मिराज के लिए महज 12 दिन में लेजर गाइडेड बम प्रणाली तैयार की गई थी। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 विमानों का प्रयोग किया था।
– कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में लगभग 2 लाख भारतीय सैनिकों ने भाग लिया था। इसमें करीब 527 सैनिक शहीद हुए थे।

बाल गंगाधर तिलक व चन्द्रशेखर आजाद : एक ने दिया स्वराज्य का मंत्र तो दूजे ने सिखाया बलिदान

स्वराज्य का मंत्र दे गये बाल गंगाधर तिलक

पत्रकारिता में इन्होंने राष्ट्रप्रेम का स्वर भरा

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में बाल गंगाधर तिलक का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। वे हिन्दुस्तान के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त करवाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि के चिक्कन गांव में जन्‍म हुआ था। पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। अपने परिश्रम के बल पर शाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था।
सन्‌ 1879 में उन्होंने बीए तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घर वाले और उनके मित्र-संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएंगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत धारण कर लिया था। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वे पहले लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंग्रेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंग्रेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर 6 साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और ‘गीता रहस्य’ नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका ‘गीता रहस्य’ प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ।
तिलक ने मराठी में ‘मराठा दर्पण’ व ‘केसरी’ नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए, जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की। सच्चे जननायक तिलक को लोगों ने आदर से ‘लोकमान्य’ की पदवी दी थी। ऐसे वीर लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक का निधन मुंबई में 1 अगस्त 1920 को हुआ।
आज भी सारे देश में तिलक का वह कथन ख्यात है।
-‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।’

 

                                                                                                                                साहसी क्रांतिकारी थे चंद्रशेखर आजाद

महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आजाद’ का जन्म 23 जुलाई 1906 को श्रीमती जगरानी देवी व पंडित सीताराम तिवारी के यहां भाबरा (झाबुआ, मध्यप्रदेश) में हुआ था। वे पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में थे और उनकी मृत्यु के बाद नवनिर्मित हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी/ एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख चुने गए थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी जीविका के लिए नौकरी आरंभ करने वाले आजाद ने 15 वर्ष की आयु में काशी जाकर शिक्षा फिर आरंभ की और लगभग तभी सब कुछ त्यागकर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। 1921 में मात्र 13 साल की उम्र में उन्हें संस्कृत कॉलेज के बाहर धरना देते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने उन्हें ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- ‘आजाद’। मजिस्ट्रेट ने पिता का नाम पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- स्वाधीनता। मजिस्ट्रेट ने तीसरी बार घर का पता पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया- जेल। उनके जवाब सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 कोड़े लगाने की सजा दी। हर बार जब उनकी पीठ पर कोड़ा लगाया जाता, तो वे ‘महात्मा गांधी की जय’ बोलते। थोड़ी ही देर में उनकी पूरी पीठ लहूलुहान हो गई। उस दिन से उनके नाम के साथ ‘आजाद’ जुड़ गया।
आजाद को मूलत: एक आर्य समाजी साहसी क्रांतिकारी के रूप में ही ज्यादा जाना जाता है। यह बात भुला दी जाती है कि रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान के बाद की क्रांतिकारी पीढ़ी के सबसे बड़े संगठनकर्ता आजाद ही थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सहित सभी क्रांतिकारी उम्र में कोई ज्यादा फर्क न होने के बावजूद आजाद की बहुत इज्जत करते थे। उन दिनों भारतवर्ष को कुछ राजनीतिक अधिकार देने की पुष्टि से अंग्रेजी हुकूमत ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग की नियुक्ति की, जो ‘साइमन कमीशन’ कहलाया। समस्त भारत में साइमन कमीशन का जोरदार विरोध हुआ और स्थान-स्थान पर उसे काले झंडे दिखाए गए। जब लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध किया गया तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपतराय को इतनी लाठियां लगीं कि कुछ दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और पार्टी के अन्य सदस्यों ने लालाजी पर लाठियां चलाने वाले पुलिस अधीक्षक सांडर्स को मृत्युदंड देने का निश्चय कर लिया।
चंद्रशेखर ‘आजाद’ ने देशभर में अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया और अनेक अभियानों का प्लान, निर्देशन और संचालन किया। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के काकोरी कांड से लेकर शहीद भगत सिंह के सांडर्स व संसद अभियान तक में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। काकोरी कांड, सांडर्स हत्याकांड व बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह का असेंबली बमकांड उनके कुछ प्रमुख अभियान रहे हैं।
देशप्रेम, वीरता और साहस की एक ऐसी ही मिसाल थे शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद। 25 साल की उम्र में भारतमाता के लिए शहीद होने वाले इस महापुरुष के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है। अपने पराक्रम से उन्होंने अंग्रेजों के अंदर इतना खौफ पैदा कर दिया था कि उनकी मौत के बाद भी अंग्रेज उनके मृत शरीर को आधे घंटे तक सिर्फ देखते रहे थे। उन्हें डर था कि अगर वे पास गए तो कहीं चंद्रशेखर आजाद उन्हें मार ना डालें। एक बार भगतसिंह ने बातचीत करते हुए चंद्रशेखर आजाद से कहा, ‘पंडितजी, हम क्रांतिकारियों के जीवन-मरण का कोई ठिकाना नहीं, अत: आप अपने घर का पता दे दें ताकि यदि आपको कुछ हो जाए तो आपके परिवार की कुछ सहायता की जा सके।’ चंद्रशेखर सकते में आ गए और कहने लगे, ‘पार्टी का कार्यकर्ता मैं हूं, मेरा परिवार नहीं। उनसे तुम्हें क्या मतलब? दूसरी बात, उन्हें तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है और न ही मुझे जीवनी लिखवानी है। हम लोग नि:स्वार्थ भाव से देश की सेवा में जुटे हैं, इसके एवज में न धन चाहिए और न ही ख्याति।’
27 फरवरी 1931 को जब वे अपने साथी सरदार भगतसिंह की जान बचाने के लिए आनंद भवन में नेहरूजी से मुलाकात करके निकले, तब पुलिस ने उन्हें चंद्रशेखर आजाद पार्क (तब एल्फ्रैड पार्क) में घेर लिया। बहुत देर तक आजाद ने जमकर अकेले ही मुकाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आखिर पुलिस की कई गोलियां आजाद के शरीर में समा गईं। उनके माउजर में केवल एक आखिरी गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं यह गोली भी चला दूंगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कनपटी से माउजर की नली लगाकर उन्होंने आखिरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली घातक सिद्ध हुई और उनका प्राणांत हो गया पुलिस पर अपनी पिस्तौल से गोलियां चलाकर ‘आजाद’ ने पहले अपने साथी सुखदेव राज को वहां से सुरक्षित हटाया और अंत में एक गोली बचने पर अपनी कनपटी पर दाग ली और ‘आजाद’ नाम सार्थक किया। 27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद के रूप में देश का एक महान क्रांतिकारी योद्धा देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दे गया, शहीद हो गया। उनको श्रद्धांजलि देते हुए कुछ महान व्यक्तित्व के कथन निम्न हैं-
* चंद्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूं। ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं। फिर भी हमें अहिंसक रूप से ही विरोध करना चाहिए। -महात्मा गांधी
* चंद्रशेखर आजाद की शहादत से पूरे देश में आजादी के आंदोलन का नए रूप में शंखनाद होगा। आजाद की शहादत को हिन्दोस्तान हमेशा याद रखेगा। -पंडित जवाहरलाल नेहरू
* देश ने एक सच्चा सिपाही खोया। -मुहम्मद अली जिन्ना
* पंडितजी की मृत्यु मेरी निजी क्षति है। मैं इससे कभी उबर नहीं सकता। -महामना मदन मोहन मालवीय

(साभार – वेबदुनिया)

चन्द्रयान की बुनियाद और भावी भारत का स्वप्न देखने वाले एपीजे अब्दुल कलाम

‘भारत रत्न’ से नवाजे गए पूर्व राष्ट्रपति, स्वर्गीय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का आज ही के दिन ’27 जुलाई 2015′ को आईआईटी गुवाहाटी में संबोधन के दौरान देहांत हो गया था। दुनिया से चले जाने के बाद भी उनके किए गए काम, उनकी सोच और उनका सम्पूर्ण जीवन देश के लिए प्रेरणास्रोत है। आइए, देश के महान राष्ट्र निर्माता के बारे में जानें कुछ बेहद रोचक बातें :
डॉक्टर अब्दुल कलाम वह व्यक्ति थे जो बनना तो पायलट चाहते थे लेकिन किन्हीं कारणों से पायलट नहीं बन पाए। फिर हार नहीं मानते हुए जीवन ने उनके सामने जो रखा उन्होंने उसे ही स्वीकार कर साकार कर दिखाया। उनका मानना था कि जीवन में कुछ भी यदि आप पाना चाहते हैं तो आपका बुलंद हौसला ही आपके काम आएगा।
अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् के एक गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम ‘अबुल पक्कीर जैनुलआबेदीन अब्दुल कलाम’ था।
उनके परिवार में पांच भाई और पांच बहनें थी और उनके पिता मछुआरों को बोट किराए पर देकर घर चलाते थे। उनके पिता ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं थे लेकिन ऊंची सोच वाले व्यक्ति थे। कलाम का बचपन आर्थिक तंगी में बीता।
वे पढ़ने के बाद सुबह रामेश्वरम के रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर जाकर समाचार पत्र एकत्र करते थे। अब्दुल कलाम अखबार लेने के बाद रामेश्वरम शहर की सड़कों पर दौड़-दौड़कर सबसे पहले उसका वितरण करते थे। बचपन में ही आत्मनिर्भर बनने की तरफ उनका यह पहला कदम था।
कलाम ने अपनी आरंभिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके दरवाजे सदा आमजन के लिए खुले रहते थे। कई पत्रों का जबाव तो स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
देश के सर्वोच्च पद यानी 11वें राष्ट्रपति की शपथ लेने के बाद उन्होंने देश के हर वैज्ञानिक का सर फक्र से ऊंचा कर दिया।
कलाम को विद्यार्थियों के प्रति विशेष प्रेम था। जिसे देखकर संयुक्त राष्ट्र ने उनके जन्मदिन को ‘विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
मिसाइल मैन के नाम से जाने जाने वाले ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारतीय मिसाइल प्रोग्राम के जनक कहे जाते हैं।
अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्र निर्माताओं में से एक है, उन्हें ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ भी कहा जाता है।
उनकी लिखी हुई पुस्तकें विंग्स ऑफ फायर, इंडिया 2020, इग्नाइटेड माइंड, माय जर्नी आदि है। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन से डाक्टरेट की उपाधि मिली है।
भारत में अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से सम्मानित हुए।
27 जुलाई 2015 को आईआईटी गुवाहटी में संबोधित करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और हमने देश के महान राष्ट्र निर्माता खो दिया।

भारतीय राजनीति के चार दिग्गज एक साथ दुनिया से हुए विदा

नयी दिल्ली : भारतीय राजनीति में शनिवार और रविवार सियासी मातम के दिन रहे। पिछले दो दिनों में हिंदुस्तान की सियासत में रसूख रखने वाले, अवाम की आवाज बनने वाले, जनता के बीच के नेता और जमीन से उठकर भारतीय राजनीति के सियासी फलक पर छा जाने वाले दिग्गज नेता दुनिया को अलविदा कहकर आसमान की अनन्त गहराइयों में विलीन हो गए। ये सभी अपनी पार्टी में भी खासा दमखम रखते थे और अपने क्षेत्रों में भी इनकी बेहतर पकड़ थी।

शीला दीक्षित
शीला दीक्षित का गत शनिवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्होंने 81 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। निधन के वक्त वह दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष थी और पूरे दमखम के साथ विपक्षियों को चुनौती देने में जुटी हुई थी। शीला दीक्षित ने साल 1998 से 2013 तक के अपने 15 साल के शासन के दौरान दिल्ली का चेहरा पूरी तरह से बदलकर रख दिया। अपने विनम्र स्वभाव से उन्होंने न सिर्फ आम लोगों का दिल जीता, बल्कि विरोधी भी उनके काम और लगन के कायल हैं। दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी स्तर पर काम कराए और सड़कों व फ्लाईओवरों के निर्माण से उन्होंने शहर के बुनियादी ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव किए। उन्होंने बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम, दिल्ली मेट्रो के साथ ही स्वास्थ्य और शैक्षणिक क्षेत्र के विकास में भी काफी काम किया।

मांगे राम गर्ग
दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मांगे राम गर्ग का गत रविवार को निधन हो गया।दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मांगे राम गर्ग के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक जताया है। उन्होंने ट्विट कर कहा कि मांगे राम के निधन से पार्टी को बहुत बड़ी क्षति हुई है। वे निस्वार्थ भाव से काम करते थे। वे जमीनी स्तर से जुड़े नेता थे। मांगे राम समाज सेवा के लिए हमेश तत्पर रहते थे।गर्ग ने दिल्ली की जनता और पार्टी के लिए जो काम किया है वह वर्षों तक याद किया जाता रहेगा। पीएम मोदी ने एक अन्य ट्वीट में कहा कि मांगे राम गर्ग का दिल्ली से गहरा नाता था और उन्हें शहर के लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते थे। उन्होंने दिल्ली में भाजपा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रामचन्द्र पासवान

बिहार के समस्तीपुर से सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी के वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पासवान का रविवार दोपहर निधन हो गया। उनको 12 जुलाई की रात दिल का दौरा पड़ने के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में भर्ती कराया गया था। रामचंद्र पासवान लोजपा प्रमुख और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के भाई थे।

एके राय

कोयला नगरी धनबाद के पूर्व सांसद और जाने-माने कम्युनिस्ट चिंतक कॉमरेड एके राय का रविवार को निधन हो गया। रविवार सुबह 11:15 बजे वह धनबाद में बीसीसीएल के सेंट्रल हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे कोयलांचल में शोक की लहर दौड़ गयी। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पूर्व सांसद एके राय के निधन पर शोक जताया।