Wednesday, April 22, 2026
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बंद नहीं होंगे बीएसएनएल, एमटीएनएल, उबारने की तैयारी

नयी दिल्ली : सरकार ने स्पष्ट किया कि बीएसएनएल और एमटीएनएल को बंद करने की योजना नहीं है बल्कि उन्हें उबारने की तैयारी की जा रही है। दूरसंचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने लोकसभा में यह जानकारी दी।
बीएसएनएल, एमटीएनएल ने सरकार से मदद मांगी थी। प्रसाद ने कहा कि बीएसएनएल और एमटीएनएल के रिवाइवल प्लान के लिए आईआईएम अहमदाबाद और डेलॉइट की मदद भी ली गई थी। उनकी सिफारिशों के आधार पर विस्तृत योजना बनाई जा रही है। घाटे से जूझ रही दोनों टेलीकॉम कंपनियों ने दूरसंचार विभाग से मदद मांगी थी। प्रसाद ने बताया कि बीएसएनएल की कुल आय का 75.06% और एमटीएनएल की आय का 87.15% कर्मचारियों पर खर्च हो जाता है। जबकि, निजी कंपनियों में यह 2.9% से 5% तक है। प्रसाद ने कहा कि पिछले 5-6 महीने में एमटीएनएल के कर्मचारियों के वेतन में कुछ दिन की देरी हुई थी। लेकिन, फिलहाल किसी का वेतन बकाया नहीं है। बीएसएनएल के कर्मचारियों को लगातार वेतन मिल रहा है। फरवरी की सैलरी में थोड़ी देरी हुई थी। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस साल 31 मार्च तक बीएसएनएल में कुल 1 लाख 63 हजार 902 कर्मचारी थे। इस दौरान एमटीएनएल के कर्मचारियों की संख्या 21,679 थी।

शार्क अटैक से 5 गुना ज्यादा जानें सेल्फी की वजह से गईं, भारत में 159 लोगों की मौत

लगभग हर स्मार्टफोन यूजर सेल्फी का दिवाना है। सबसे अलग सेल्फी लेने की सनक में लोग खतरनाक जगाहों पर फोटोग्राफी करने से भी पीछे नहीं हटते, जिस कारण कई लोग जान गवां देते हैं। इंडिया जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011 से 2017 तक 259 लोगों सेल्फी लेने के कारण अपनी जान गवां बैठे।
भारत में हुई सबसे ज्यादा मौतें…
मौतों का यह आँकड़ा साल दर साल बढ़ाता गया वो भी तब जब फोन से परफेक्ट शॉट लेने थोड़ा मुश्किल था, ऐसे में सेल्फी स्टिक के आने से हर कोई परफेक्ट फोटो लेने के लिए जोखिम उठाने लगा। अक्टूबर 2011 से नवम्बर 2017 के बीच दुनियाभर में लगभग 259 लोगों की मौत सेल्फी लेने के दौरान हुई। जबकि इसी समय के बीच शार्क के हमले से मरने वालों की संख्या केवल 50 थीं।
रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी लेने में महिलाएं सबसे आगे है जबकि युवा पुरुष जोखिम लेने में नहीं हिचकिचाते। यह सभी मिलकर सेल्फी से होने वाली मौतों को तीन हिस्सों में बांटते हैं जिसमें डूबने, दुर्घटनाग्रस्त होने और सेल्फी के दौरान गिरना शामिल है।130 करोड़ जानसंख्या वाले भारत में लगभग 80 करोड़ लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में खूद की फोटो लेते समय मरने वालों की संख्या में 159 लोगों के साथ भारत सबसे आगे हैं। यह आँकड़ा पूरी दुनिया में मरने वालों में आधे से ज्यादा है।
इसी समस्या के निपटने के लिए भारत के कई खतरनाक हिस्सों को नो-सेल्फी जोन में तब्दील कर दिया गया है। इसमें मुंबई के 16 स्पॉट शामिल है। सेल्फी के दौरान होने वाले हदसों में भारत के बाद रशिया का नाम आता है जहां 2011 से 2017 के बीच 16 लोगों की जान गई जबकि यूएस और पाकिस्तान में 14 लोगों की जान गयी। रशिया में सेल्फी लेते समय ज्यादातर लोगों की जान ब्रिज या ऊंची बिल्डिंग से गिरने से गई या तो खूद को गोली मरने और लैंड माइन को उठाते हुए सेल्फी लेते समय गयी।

अफसर सारा ने महिलाओं के लिए बनायी गाना और सुरक्षा टीम

भुवनेश्वर : ‘झिअ-बोहु तुम अउ भय न करा, फोन अच्छी तुम डायल करा, झिआंकु कमेंट मरीबा चालिबा नहीं, रोड रोमोनकु करा थरहरा’ ओडिशा के गजपति जिले में यह गाना चर्चा में है। इसका अर्थ है- बेटियों अब डरो नहीं, तुम्हारे पास फोन नंबर है उसे डायल करो, महिलाओं पर फब्तियां कसना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, रोमियो को अब तुम्हारा डर होना चाहिए।’ यह गाना ओडिशा की महिला आईपीएस अधिकारी सारा शर्मा ने बनाया है। गाने का उद्देश्य है महिलाओं को छेड़छाड़ के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत मिले। उनमें इस तरह के अपराध के खिलाफ जागरुकता फैलाई जा सके। सारा ने छेड़छाड़ की घटनाएं रोकने के लिए स्पेशल पुलिस टीम का गठन किया। सारा के मुताबिक यह गाना पुलिस की टीम को अपराध के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करता है। सारा फरवरी में गजपति में एसपी बनी थीं। वे शास्त्रीय गायन से भी जुड़ी हैं।

बेहतर काम करती हैं बोर्ड में अधिक महिलाओं वाली कम्पनियां

जकार्ता : इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्प (आईएफसी) के एक अध्ययन के मुताबिक दक्षिण पूर्व एशिया और चीन की ऐसी कम्पनियाँ, जिनके बोर्ड में महिलाओं का प्रतिनिधत्व पुरुषों के मुकाबले अधिक रहा, उन्होंने वित्तीय मामलों में बेहतर परिणाम दिए।
30% से ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली कम्पनियों में इक्विटी पर रिटर्न 6.2% रहा
आईएफसी के मुताबिक जिन कंपनियों के बोर्ड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 30 फीसदी से ऊपर रहा, उनमें एसेट पर रिटर्न 3.8 फीसदी रहा। वहीं जिन कंपनियों में महिलाओं का प्रतिनिधितव नहीं था उनका रिटर्न 2.4 फीसदी रहा। आईएफसी ने यह अध्ययन वीमेंस एमपावरमेंट वर्किंग ग्रुप और इंडोनेशिया स्टॉक एक्सचेंज के साथ मिलकर किया था।
आईएफसी के रीजनल डायरेक्टर विवेक पाठक ने बताया कि जिन कंपनियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 30 फीसदी से अधिक था, इक्विटी पर उनका रिटर्न 6.2 फीसदी रहा जबकि पुरुष प्रतिनिधित्व वाले बोर्ड का रिटर्न 4.2 फीसदी रहा। इस अध्ध्यन में चीन, इंडोनेशिया फिलीपीन्स, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम की 1,000 कंपनियों को शामिल किया गया था। सर्वे में शामिल कंपनियों में थाइलैंड की कंपिनयों में सबसे ज्यादा जेंडर डाइवर्सिटी थी। यहां लिस्टेड कंपिनयों में बोर्ड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 फीसदी रहा। उसके बाद 15 फीसदी के साथ इंडोनेशिया और वियतनाम का नंबर रहा। सर्वे में शामिल करीब 40 फीसदी कंपनियों के बोर्ड में कोई भी महिला नहीं थी। करीब 16 फीसदी कंपनियों में 30 फीसदी से अधिक महिलाओं का प्रतिनिधित्व रहा।

नागार्जुन जयंती के अवसर पर कवि पर्व का आयोजन

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से नागार्जुन जयंती के अवसर पर भारतीय भाषा परिषद में कवि पर्व का आयोजन किया गया ।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवयित्री निर्मला तोदी ने कहा कि नागार्जुन हिंदी कविता के सबसे सहज और बोधगम्य कवि हैं ।इस अवसर पर आयोजित कवि पर्व के अंतर्गत राजेश मिश्र, मनोज झा,सुषमा त्रिपाठी, राहुल शर्मा, मधु सिंह, राहुल गौड़, रूपेश यादव, निर्मला तोदी ने काव्य पाठ किया। कवि नागार्जुन को याद करते हुए मृत्युंजय श्रीवास्तव, विनोद यादव, नारायण दास, विनोद यादव मास्टर जी, पार्वती शॉ, अनूप यादव, सूर्यदेव राय आदि ने श्रद्धा सुमन अर्पित किया ।कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए संजय जायसवाल ने कहा कि नागार्जुन बहुजन समाज के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते हुए नैतिक साहस का परिचय भी दिया ।उनके पूरे रचना संसार में मानव हित के बेचैनी और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर सुनाई पड़ते हैं ।धन्यवाद ज्ञापन डॉ अनीता राय ने दिया ।

सुप्रसिद्ध समाजसेवी और अर्थविद नंदलाल शाह का निधन

कोलकाता : सुप्रसिद्ध समाजसेवी, अर्थविद और लेखक नंदलाल का विगत सोमवार को निधन हो गया। वे पिछले एक महीने से मस्तिष्क आघात से पीड़ित थे और कोलकाता के एक नर्सिंग होम में भर्ती थे। उन्होंने सोमवार को रात 9 बजे अपनी अंतिम सांस ली। नंदलाल शाह भारतीय भाषा परिषद के मंत्री थे और इस संस्था को पिछले कई दशकों को अपनी महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान कर रहे थे। उनका संबंध परिषद के अलावा कोलकाता की कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से था।
नंदलाल शाह ने समय समय पर विश्‍व आर्थिक स्थितियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ लिखी थीं। वे जीवन भर सामाजिक रूप से सक्रिय थे। उनके निधन शोक व्यक्त करते हुए भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने कहा कि नंदलाल जी से उनका पारिवारिक संबंध था। वे बड़े सहृदय और चिंतनशील थे। उनके निधन से परिषद की ही नहीं कोलकाता के सांस्कृतिक जगत की एक अपूरणीय क्षति हुई है।
नंदलाल शाह की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा गत 27 जून को हुई। भारतीय भाषा परिषद, भारतीय संस्कृति संसद, राजस्थानी प्रचारिणी सभा, अभिनव भारती, बड़ाबजार कुमारसभा पुस्तकालय, पश्‍चिम बंगाल प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन, संस्कृति सौरभ, मारवाड़ी युवा मंच, झुंझुनू प्रगति संघ, बंगीय हिंदी परिषद, जन संसार, डायलॉग सोसायटी, सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन, अपनी भाषा, लिटिल थेस्पियन,राजस्थान परिषद, साहित्यिकी, नीलांबर, नवज्योति हावड़ा, सदीनामा तथा अन्य कई संस्थाओं ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये।

हिन्दी विश्वविद्यालय कोलकाता केंद्र में प्रवेश परीक्षा 29-30 जून को

कोलकाता :  महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में नए सत्र के लिए विभिन्न विषयों में एम.फिल., पी-एच.डी. तथा बी-एड, एम.एड. में प्रवेश के लिए सॉल्ट लेक, सेक्टर- तीन स्थित केंद्र भवन ऐकतान परिसर में 29-30 जून को लिखित परीक्षा आयोजित की जा रही है। इसके अतिरिक्त वर्धा, इलाहाबाद एवं दिल्ली में भी इसके परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। कोलकाता केंद्र में हिंदी साहित्य, जनसंचार, मानवविज्ञान, शिक्षाशास्त्र, समाज कार्य, बौद्ध अध्ययन, दलित एवं जनजाति अध्ययन, गांधी एवं शांति अध्ययन, फिल्म एवं नाटक, अनुवाद प्रौद्योगिकी तथा बी.एड.-एम.एड. के लिए यह परीक्षा दोनों दिन दो-दो सत्रों में सम्पन्न होगी। कोलकाता केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि कुल मिलाकर एक सौ तेरह विद्यार्थी इस लिखित प्रवेश परीक्षा में भाग ले रहे हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल के निर्देशन-मार्गदर्शन में निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया अपनाई जा रही है। दोनों दिन पूरी परीक्षा की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाएगी। डॉ सुनील ने बताया कि कोलकाता केंद्र में चलने वाले पाठ्यक्रम एमए हिंदी साहित्य एवं अनुवाद में डिप्लोमा के लिए जुलाई प्रथम सप्ताह में प्रवेश की प्रक्रिया सम्पन्न की जाएगी।

युद्ध के खिलाफ खड़ा वाइल्ड एक्सपेरिमेंट नाटक

समीक्षक जीतेन्द्र सिंह

पिछले दिनों प्रोसेनियम आर्ट सेंटर की नयी नाट्य प्रस्तुति (WILD EXPERIMENT )’वाइल्ड एक्सपेरिमेंट ‘ नाटक का लगातार तीन दिनों तक (7’8’ और 9 जून को ) प्रोसेनियम आर्ट सेंटर में नाम प्रस्तुत किया गया।जिस कहानी का मंचन हुआ उस कहानी को लोग एक झूठी कहानी मानते है । दरअसल “द रशियन स्लीप एक्सपेरिमेंट ” इंटरनेट पर वायरल हुई कहानी थी जिसे ‘आँरेज सोड़ा’नाम के एक युजर ने Creepyasta.wikia.com पर पोस्ट किया था। हालाँकि यह ऑरेंज सोडा कौन है?इस बारे में आजतक पता नहीं चल सका।गुमनाम रूप से लिखी गयी इस छोटी सी कहानी ने फिल्म मीडिया के कलाकारों को प्रेरित किया और उसके परिणाम स्वरूप कई लघु फिल्में और एक उपन्यास का प्रकाशन हुआ जो काफी चर्चित रहा।यह नाटक ताकि वायरल कहानी प्रेरित होकर टी.जे.स्मीथ ने लिखी और फिल्म निर्देशित किया उसी पर फिल्म पर आधारित नाटक है।
सामाजिक, राजनैतिक सुझ बूझ वाले कलात्मक विषयों वाले नाटकों की तलाश सिर्फ हिंदी में ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय रंगमंच को जरूरत है ।ऐसा सकंट महसूस किया जाता रहा है।अगर हिन्दी में नाटक है भी तो उन नाट्य संस्थाओं तक नहीं पहुँच रहे हैं और पहुँच भी रहे हैं तो उस नाटककार और निर्देशकों के बीच कोई संवाद नही बन पाता जो जरूरी है । अज़ुम रिज़वी द्वारा इस तरह की कहानी खोज निकालना और उसे अनुदित कर मंचस्थ करना एक प्रसंशनीय काम है, यह नाटक उसी कमी को जरूर पूरा करता है।
“राक्षस वास्तव में एक बहुत ही वास्तविक ,मानवीय स्थान से आते है,
जो मानव पर जहरीले प्रयोग कर ताकतवर और प्रशंसनीय बन जाते हैं।”
कहानी 1940 दशक के अंत में सोवियत संघ में एक सैन्य मंजूरी के बाद एक प्रकार की रासायनिक गैस को लेकर मानव पर वैज्ञानिक प्रयोग किया गया था। उसी वैज्ञानिक प्रयोगात्मक विषय से अवगत कराते हुए यह नाटक उत्तेजित करता है ।
नाटक की कहानी कुछ यूं है कि एक वैज्ञानिक शोधकर्ता द्वारा तीन राजनैतिक कैदियों को एक सील बंद गैस चेम्बर में एक सैन्य अस्त्र के परीक्षण लिए रखा गया । शर्तानुसार अनुसार उन्हें एक प्रकार की गैस में छोड़ा जायेगा जो उन्हें सोने नहीं देगा और उन्हें तीस दिनों तक जाग कर रहना होगा। उसी शर्तानुसार अनुसार प्रयोग के बाद उन्हें हमेशा के लिए स्वतंत्र कर दिया जायेगा यदि वे इस प्रयोग को पूरा करते हैं।गैस चेम्बर में उन कैदियों की बातचीत को इलेक्ट्रानिक रुप से माँनिटर किया गया क्योंकि उस समय सर्किट कैमरा नहीं हुआ करता था।उनके व्यवहार को गुप्त रूप से पाँच इंच मोटी ग्लास जो पोरथोल आकार की खिड़की है उसी के माध्यम देखा जा रहा ।
प्रारम्भिक दिनों के दौरान देखा जा रहा कि कैदी सामान्य रूप से व्यवहार करते है,एक दूसरे से बातचीत करते हैं और फुसफुसा रहे हैं।कुछ दिनों बाद सभी ने असमान्य व्यवहार करना शुरू कर दिया। उनकी बातचीत अपना एक गहरा पक्ष लेती है। कुछ दिन बाद वे परिस्थितियों के बारे शिकायत करना शुरू करते हैं और गम्भीर व्यामोह (आसक्ति )प्रदर्शित करना शुरू कर देते हैं। उसके बाद अनियंत्रित रुप से चीखना शुरु कर देते है। एक दूसरे पर हमला करते,कुछ दिनों बाद अपना ही मांस खाना शुरू कर देते है। बारह दिनों के बाद जब,शोधकर्ता कैदियों को निर्देश देता है कि अब उन्हें मुक्त कर दिया जा रहा है लेकिन शोधकर्ता को आश्चर्य तब होता है कि एक कैदी कहता है ,हम अब मुक्त नहीं होना चाहतें ।लेकिन गैस प्रयोग चलता रहता है उसी दौरान ही वे मर जाते और मारे जाते हैं।
नाटक में कहानी यही है।लेकिन ऐसा भी माना जाता है कि इस कहानी की घटना और पात्र काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक थे।
यह कहानी1940-45 द्वितीय महा विश्व युद्ध के समय की है।
जोसेफ स्टालिन से हिटलर हार चुके थे ,स्टालिन सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व करते हुए और शक्तिशाली बने थे। उस काल में रूस दिनरात प्रगति कर रहा था और शस्त्र बनाने के होड़ में लगा था ।रूस किसी भी आने वाले युध्द के लिए हर हाल में लड़ने के लिए तैयार रहना चाहता था शायद इसलिए गैस 76आईए का परीक्षण करना चाह रहा था ।
हिटलर के कुछ नाजियों को गिरफ्तार कर लिया गया था।जिन्हें दस साल की कठोर श्रम सजा सुनाई गयी थी। संघ द्वारा इन राजनैतिक कैदियों को जिन्हें राज्य का दुश्मन समझा गया था ।उन्हीं में से पांच कैदियों को चुन जाता है (ताकि नाटक में तीन पात्र दिखाये गये है।),उन्ही पाँच सिपाहियों के साथ साइबेरिया की जगंलों में संघ के द्वारा अनुमोदित एक वैज्ञानिकों के दल ने उन कैदियों को एक प्रकार की रासायनिक गैस के बीच रख गुप्त और अनैतिक रूप से मानव वैज्ञानिक एक्सपेरिमेंटल किया था लेकिन इस जधन्य वैज्ञानिक प्रयोग की जिम्मेदारी रशियन सरकार ने आजतक नहीं स्वीकार किया इसलिए आज भी इस कहानी का सच रहस्य बना हुआ है।
लेकिन इस सत्य घटना को पुरी दुनिया में “रशियन स्लीप एक्सपेरिमेंट”के नाम से जानती है। यह भयानक क्रूर अमानवीय प्रयोगों में से एक था। यह पूरी दुनिया में अपनी भयावहता के लिए जितना प्रसिद्ध है उतना ही मानव समाज के लिए कलंकित है ।
कहानी के भीतर छिपे आतंक के हर पल भयावह है ,क्योंकि इस नाटक की यात्रा काफी गहन है साथ ही गहराई से वास्तविक विचार प्रकट होने देता है। दुनिया में होने वाले राजनैतिक अत्याचार, हत्या ,रक्तपात, युध्द के लिए मानव हथियारों इस्तेमाल, इन सबके लिए दुनिया के तमाम राज्य और राष्ट्र ही जिम्मेदार है । यह बात इस कहानी में बड़ी तीव्रता से यह व्यंजित होता है। साथ ही यह नाटक परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों का इस्तेमाल न हो इसकी पैरवी करता है।
अज़ूम रिज़वी के निर्देशन में खेले गये इस नाटक का चुनाव और अनुवाद ही उन्हें मजबूत बना देता है। हालांकि अनुवाद कुछ शाब्दिक जरूर हो गये हैं। इस नाटक की कथा वस्तु के अनुसार हर पात्र मानसिक और दैहिक रूप से कष्ट भोग रहा है इसलिए आंतरिक और दैहिक यत्रंणा की अभिनय शैली को माध्यम द्वारा उजागर करने की जरूरत है। हालांकि नाटक की कथा वस्तु में इतनी मजबूत है कि नाटक उतना प्रभावित नहीं होता है।अभिनेताओं में अरविंद प्रेमचंद ,आनंद चतुर्वेदी, बलराम कुडंलिया और शरभ चटर्जी ने जरूर कोशिश किया है। प्रकाश योजना पर ध्यान देने की जरूरत है। सेट और पार्श्व संगीत प्रोसेनियम जैसे अतंरंग मंच के लिए बिल्कुल ठीक है । पूरी टीम इसके लिए बधाई की पात्र है।

(लेखक वरिष्ठ रंगकर्मी हैं)

बजाज डॉमिनार : आर्कटिक से अंटार्कटिक तक की पहले पोलर ओडिसी की पहली सफल भारतीय बाइक

 खास बातें –  किसी भी भारतीय मोटरसाइकिल द्वारा दुनिया की पहली पोलर ओडिसी: आर्कटिक क्षेत्र में टुकटॉयक्टुक से अंटार्कटिक तक की यात्रा को किसी ब्रेकडाउन के बिना सफलतापूर्वक पूरा किया बजाज डॉमिनार पर तीन भारतीय राइडरों ने 99 दिनों की इस यात्रा में 3 महाद्वीपों के 15 देशों से गुजरते हुए 51,000 किमी (औसतन 515 किमी प्रतिदिन) का सफ़र तय किया। इस ओडिसी के दौरान 4 सबसे दुर्गम सड़कों और 3 प्रमुख अक्षांशों को पार किया गया

 

पोलर ओडिसी — अर्थात आर्कटिक से अंटार्कटिक तक की यात्रा में जीत हासिल करने वाली पहली भारतीय मोटरसाइकिल बनकर बजाज डॉमिनार ने एक बार फिर से इतिहास रचा है। 99 दिवसीय इस यात्रा के दौरान डॉमिनार पोलर ओडिसी ने पूरे उत्तर और दक्षिण अमेरिका को कवर किया, जिसकी शुरुआत आर्कटिक क्षेत्र में टुकटॉयक्टुक के ऐंगकरेज से हुई और फिर नीचे की ओर आगे बढ़ते हुए दुनिया के अंतिम छोर के तौर पर अर्जेंटीना के उशुआइया तक के सभी रास्तों को कवर किया तथा अंटार्कटिक तक पहुंचे! डॉमिनार पोलर ओडिसी किसी ब्रेकडाउन के बिना पूर्ण हुई, साथ ही इस यात्रा को विभिन्न प्रकार के इलाकों, जलवायु एवं परिस्थितियों का सामना करते हुए किसी प्रकार के समर्पित सर्विस सपोर्ट अथवा बैक-अप टीम के बगैर ही पूरा किया गया। बेहद थका देने वाली इस दुष्कर यात्रा में 3 महाद्वीपों– अर्थात उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका एवं अंटार्कटिक तथा 15 देशों को कवर किया गया:

कनाडा, अमेरिका, मैक्सिको, ग्वाटेमाला, होंडुरास, अल सल्वाडोर, निकारागुआ, कोस्टा रिका, पनामा, कोलंबिया, इक्वेडोर, पेरू, बोलीविया, चिली और अर्जेंटीना। राइडरों और मशीनों ने परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए बेहद ख़राब मौसम का सामना किया, जिसमें शामिल हैं – पूरे अलास्का में भारी बर्फबारी, बारिश तथा कीचड़ और ढीली बजरी, पाइक्स पीक, कोलोराडो की चोटियों पर बर्फ़ीला तूफ़ान, बाजा कैलिफोर्निया, मेक्सिको की पगडंडियां एवं कच्ची सड़क, अंटार्कटिक में – 22 °C से लेकर धरती के सबसे गर्म स्थान डेथ वैली, अमेरिका में +54 °C  तक के तापमान का सामना

दुनिया की कुछ बेहद ख़तरनाक सड़कों में शामिल कुछ रास्तों पर डॉमिनार राइडरों ने विजय हासिल की:

  • जेम्स डाल्टन हाईवे – आर्कटिक क्षेत्र, अमेरिका
  • द डेम्पस्टर हाईवे – आर्कटिक क्षेत्र, कनाडा
  • अटाकामा रेगिस्तान का पैन-अमेरिकी हिस्सा, चिली
  • बोलीविया का द डेथ रोड

पोलर ओडिसी की चुनौती को 3 बेहद उत्साही राइडरों, अर्थात दीपक कामथ, अविनाश पी. एस., और दीपक गुप्ता ने पूरा किया। दीपक कामथ पिछले 30 वर्षों से राइडिंग कर रहे हैं और वह डॉमिनार पोलर ओडिसी के टीम लीडर थे। अविनाश पी. एस. पेशे से एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, साथ ही वह बेहद उत्साही मोटरसाइकिल राइडर एवं फोटोग्राफर हैं। दीपक गुप्ता, ग्रुप ऑफ दिल्ली सुपर बाइकर्स (GODS) के सक्रिय सदस्य हैं।
डॉमिनार पोलर ओडिसी के सफलतापूर्वक समापन के अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बजाज ऑटो लिमिटेड के उपाध्यक्ष (मार्केटिंग – एमसी),  नारायण सुन्दररमन ने कहा, “डॉमिनार पोलर ओडिसी दरअसल व्यक्ति एवं मशीन की प्रभावशाली साझेदारी का प्रतीक है। इस सफलता के लिए दीपक कामथ, अविनाश पीएस और दीपक गुप्ता बधाई के पात्र हैं। डॉमिनार का बिना किसी ख़राबी के 99 दिनों से अधिक समय तक लाजवाब प्रदर्शन, इसकी उच्चस्तरीय निर्माण गुणवत्ता एवं लंबी यात्राओं की असाधारण क्षमता की पुष्टि करता है। किसी भी बड़े पुर्जे में बदलाव या सहायता दल की मौजूदगी के बिना, सामानों के साथ डॉमिनार पर कुछ बेहद दुर्गम इलाकों तथा परिस्थितियों का सामना करते हुए 51,000 किमी की यात्रा तय करना वास्तव में अत्यंत उत्कृष्ट उपलब्धि है।”

सोशल मीडिया पर दी जाने वाली धौंस के खिलाफ अनन्या पांडे की मुहिम

मुम्बई : अदाकारा अनन्या पांडे ने सोशल मीडिया पर दिये जाने वाले धौंस के खिलाफ ‘सो पॉजिटिव’ नाम के एक खास अभियान की ‘वर्ल्ड सोशल मीडिया डे’ पर शुरुआत की है। उनकी इस पहल का उद्देश्य सोशल मीडिया पर दी जाने वाली धौंस के खिलाफ जागरूकता फैलाना और इसके पीड़ितों को इससे निपटने के उपायों की जानकारी देना है। उन्होंने इसकी घोषणा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर की है। अनन्या (20) ने बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ से की है।