मुम्बई : भारत के सबसे अमीर उद्यमी और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक मुकेश अम्बानी का वार्षिक वेतन पैकेज लगातार 11वें साल 15 करोड़ रुपये के स्तर पर बना रहा । कंपनी से मिलने वाली अम्बानी की वार्षिक परिलब्धियां वर्ष 2008-09 से स्थिर हैं। कम्पनी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार ‘‘चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक मुकेश अम्बानी की कुल परिलब्धियां वार्षिक 15 करोड़ रुपये के स्तर पर बरकरार रखी गयी हैं। यह कम्पनी में प्रबंधकीय स्तर की परिलब्धियों को संतुलित रखने के विषय में स्वयं एक उदाहरण प्रस्तुत करते रहने की उनकी इच्छा को दर्शाता है।’’ इसी दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज में अम्बानी के सभी पूर्णकालिक निदेशकों के मानदेय में अच्छी वृद्धि दर्ज की गयी है जिनमें उनके निकट संबंधी निखिल और हीतल मेसानी भी हैं। मुकेश अम्बानी के वित्त वर्ष 2018-19 की परिलब्धियों में 4.45 करोड़ रुपये वेतन एवं भत्ते के रूप में दिए गए। उनका वेतन एवं भत्ता 2017-18 में 4.49 करोड़ रुपये रहा था। अम्बानी ने स्वेच्छा से अपनी परिलब्धियां स्थिर रखने की अक्टूबर 2009 में घोषणा की थी। निखिल और हीतल दोनों को 2018-19 में 20.57-20.57 करोड़ रुपये का पैकेज दिया गया। एक साल पहले इन दोनों में से प्रत्येक को 19.99 करोड़ रुपये मिले थे। इसी दौरान कंपनी के कार्यकारी निदेशक पी.एम.एस. प्रसाद का मानदेय 8.99 करोड़ रुपये से बढ़कर 10.01 करोड़ रुपये किया गया । इसी तरह कंपनी के तेल परिशोधन कारोबार के प्रमुख पवन कुमार कपिल का मानदेय भी 3.47 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.17 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। कंपनी के पूर्णकालिक निदेशकों में अंबानी के अलावा निखिल, हीतल, प्रसाद और कपिल शामिल हैं।
आरटीआई से खुलासा : नयी दिल्ली में भुनाये गये 80.6 प्रतिशत चुनावी बॉन्ड
इन्दौर : सूचना के अधिकार (आरटीआई) से खुलासा हुआ है कि सियासी दलों को चंदा देने के लिये मार्च 2018 से मई 2019 के बीच कुल 5,851.41 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गये। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से 80.6 प्रतिशत बॉन्ड सिर्फ नयी दिल्ली में भुनाये गये जहां प्रमुख सियासी दलों के राष्ट्रीय मुख्यालय स्थित हैं। मध्यप्रदेश के नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने दो अलग-अलग अर्जियों पर सूचना के अधिकार के तहत भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से मिले आंकड़े “पीटीआई-भाषा” के साथ रविवार को साझा किये। यह जानकारी चुनावी बॉन्डों की बिक्री और इन्हें भुनाये जाने के शुरूआती 10 चरणों पर आधारित है। उन्होंने बताया कि आलोच्य अवधि में नयी दिल्ली में कुल 874.50 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिके, जबकि राष्ट्रीय राजधानी में इस रकम के मुकाबले पांच गुना से भी ज्यादा 4,715.58 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये।
मुंबई में 1,782.36 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गये लेकिन वहां इनमें से केवल 7% यानी 121.13 करोड़ रुपये के बॉन्ड ही भुनाए गए। इसी तरह कोलकाता में करीब 1,389 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्डों की बिक्री हुई और वहां 167.50 करोड़ रुपये के बॉन्ड (12%) भुनाये। बेंगलुरू में करीब 195 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गये लेकिन उनमें से वहां इनमें से महज 1.5 करोड़ रुपये यानी एक प्रतिशत बॉन्ड ही भुनाये गये। हैदराबाद में 806.12 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिके और 512.30 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये। भुवनेश्वर में 315.76 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिके और 226.50 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये। चेन्नई में 184.20 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिके और 51.55 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये।
आलोच्य अवधि के दौरान देश भर में मार्च 2018 से मई 2019 के बीच 5,851.41 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गये। कुल 10 चरणों में बंटी इस अवधि के दौरान 5,831.16 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये। यानी 20.25 करोड़ रुपये के शेष बॉन्ड तय समय-सीमा में भुनाये नहीं जा सके और नियमानुसार इनकी वैधता समाप्त हो गयी। आलोच्य अवधि में गांधीनगर, गुवाहाटी, जयपुर, रायपुर, पणजी, तिरुअनंतपुरम और विशाखापत्तनम में कुल 279.70 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिके। लेकिन सातों शहरों में एक भी बॉन्ड नहीं भुनाया गया। शुरूआती 10 चरणों के दौरान 13 शहरों-अगरतला, आइजोल, बादामी बाग (श्रीनगर), भोपाल, देहरादून, गंगटोक, इम्फाल, ईटानगर, कोहिमा, पटना, रांची, शिलॉन्ग और शिमला में एक भी चुनावी बॉन्ड नहीं बिका। लेकिन बादामी बाग, पटना, रांची और गंगटोक में कुल 17.5 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाये गये। बहरहाल, आरटीआई के तहत इस बात का ब्योरा सामने नहीं आया है कि चुनावी बॉन्ड खरीदने वाले चंदादाता कौन थे और इन बंधपत्रों से किन-किन सियासी पार्टियों के खजाने में कितनी रकम जमा हुई। लेकिन नियमों के मुताबिक वे ही सियासी दल चुनावी बॉन्ड के जरिये चंदा लेने की पात्रता रखते हैं जो लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-ए के तहत पंजीबद्ध हैं और जिन्हें लोकसभा या विधानसभा के पिछले आम चुनाव में पड़े वोटों में से कम से कम एक प्रतिशत वोट मिले हों। गौरतलब है कि आलोच्य अवधि में देश भर में एसबीआई की विभिन्न अधिकृत शाखाओं के जरिये एक हजार रुपये, दस हजार रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य वर्गों वाले चुनावी बॉन्ड बिक्री के लिये जारी किये गये थे। ये बॉन्ड चंदा पाने वाले सियासी दलों द्वारा एसबीआई की अधिकृत शाखाओं में चालू खाते खोलकर भुनाये गये।
हिमा की 400 मीटर में वापसी, जुलाई में पांचवां स्वर्ण पदक जीता
नोवे मेस्तो (चेक गणराज्य) : भारत की स्टार धाविका हिमा दास ने शानदार प्रदर्शन जारी रखते हुए यहां अपनी पसंदीदा 400 मीटर दौड़ में 52 . 09 सेकेंड के सत्र के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ इस महीने का पांचवां स्वर्ण पदक जीता। गत शनिवार का हिमा का यह प्रदर्शन हालांकि 50 . 79 के उनके निजी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से धीमा है जो उन्होंने जकार्ता एशियाई खेलों के दौरान बनाया था। वह साथ ही 51 . 80 सेकेंड के विश्व चैंपियनशिप के क्वालीफाइंग स्तर से भी चूक गई। हिमा का यह प्रदर्शन हालांकि 52 . 88 सेकेंड के सत्र में उनके पिछले सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से बेहतर है। दो जुलाई को यूरोप में पहली प्रतिस्पर्धी दौड़ में हिस्सा लेने के बाद से हिमा का यह पांचवां स्वर्ण पदक है। हिमा ने साल की अपनी पहली 200 मीटर प्रतिस्पर्धी दौड़ में 23 . 65 सेकेंड के समय के साथ दो जुलाई को पोलैंड में पोजनान एथलेटिक्स ग्रां प्री में स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद उन्होंने सात जुलाई को पोलैंड में ही कुत्नो एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 23 .97 सेकेंड के साथ 200 मीटर में स्वर्ण पदक जीता।
चेक गणराज्य में 13 जुलाई को क्लादनो एथलेटिक्स प्रतियोगिता में हिमा ने 23 . 43 सेकेंड से स्वर्ण पदक जीता जबकि बुधवार को इसी देश में उन्होंने ताबोर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में चौथा सोने का तमगा जीता। इस साल अप्रैल में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पीठ की तकलीफ के कारण परेशान रहने के बाद असम की 19 साल की हिमा ने पहली बार 400 मीटर में हिस्सा लिया था। इस बीच एमपी जबीर ने भी 400 मीटर बाधा दौड़ में 49 . 66 सेकेंड के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता लेकिन मोहम्मद अनस को 200 मीटर में 20 . 95 सेकेंड के समय से कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।
राजमार्ग परियोजनाओं के लिए 2024 तक 1.25 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा देगी एलआईसी : गडकरी
नयी दिल्ली : देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र की वित्तपोषण की जरूरतों को पूरा करने के नवोन्मेषी तरीकों के तहत बीमा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने 2024 तक राजमार्ग परियोजनाओं के लिए 1.25 लाख करोड़ रुपये की ऋण सुविधा देने का फैसला किया है। केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने यह जानकारी दी। मंत्रालय 8.41 लाख करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना का समय पर क्रियान्वयन करना चाहता है। इसके जरिये अखिल भारतीय स्तर पर राजमार्गों का ‘ग्रिड’ बिछाया जा सकेगा। मंत्रालय इस परियोजना के लिए पेंशन और बीमा कोषों सहित वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों तक पहुंचना चाहता है। गडकरी ने कहा, ‘‘एलआईसी ने हमें एक साल में 25,000 करोड़ रुपये और पाँच साल में 1.25 लाख करोड़ रुपये की ऋण सुविधा की पेशकश की है। इस पर वे सैद्धान्तिक रूप से सहमत हैं। हम राजमार्ग निर्माण में इस कोष का इस्तेमाल करेंगे।’’ एलआईसी के चेयरमैन आर कुमार ने पिछले सप्ताह गडकरी से मुलाकात की थी। मंत्री ने कहा कि इस ऋण सुविधा का इस्तेमाल भारतमाला परियोजना के लिए किया जाएगा जिसकी संशोधित लागत 8.41 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गयी है।
भारतमाला परियोजना की शुरुआती लागत 5.35 लाख करोड़ रुपये थी। बाद में भूमि अधिग्रहण की लागत की वजह से इसमें इजाफा हो गया। पहले चरण में 34,800 किलोमीटर का उन्नयन किया जाएगा। इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) का शेष 10,000 किलोमीटर भी शामिल है। गडकरी ने कहा कि भारतमाला परियोजना का वित्तपोषण उपकर, टोल राजस्व, बाजार से कर्ज, निजी क्षेत्र की भागीदारी, बीमा कोष, पेंशन कोष, मसाला बांड और अन्य पहल के जरिये किया जाएगा। एलआईसी से ऋण सुविधा ऐसी ही एक पहल है।
शुरुआती योजना के अनुसार इसके लिए कोष 30 साल की अवधि के लिए जुटाया जाएगा और प्रत्येक दस साल में ब्याज दरों में संशोधन होगा।
एक अधिकारी ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) तथा एलआईसी के अधिकारी मिलकर इसके तौर तरीके तय करेंगे। यह कर्ज एनएचएआई द्वारा जारी बांड के रूप में होगा। गडकरी ने कहा, ‘‘हमारे पास कोष की कमी नहीं है।‘‘ उन्होंने कहा कि जैसे ही परियोजनाएं पूरी होंगी उनका मौद्रिकरण किया जाएगा और उससे हासिल कोष को पुन: राजमार्ग निर्माण में लगाया जाएगा।
एनएचएआई परिचालन में आ चुके राजमार्ग खंडों की नीलामी के तीसरे चरण में निगाह टीओटी (टोल, परिचालन और स्थानांतरण) माडल पर चल रहे कुल 566 किलोमीटर के नौ मार्ग खंड नीलाम करना चाह रही है। इससे 4,995 करोड़ रुपये हासिल होने की उम्मीद है। ये खंड उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड और तमिलनाडु में पड़ते हैं।
एनआईए कानून बढ़ाएगा राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की ताकत
नयी दिल्ली : राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए ) संशोधन विधेयक 2019 पारित हो चुका है। अब दोनों सदनों पारित होने के बाद जांच एजेंसी पहले से और अधिक मजबूत हो जाएगी। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, एनआईए अधिनियम 2008 में तीन प्रमुख संशोधन किए गए हैं।
पहला बदलाव अपराधों का प्रकार है, जिसकी जाँच एनआईए कर सकती है और मुकदमा चला सकती है। मौजूदा अधिनियम के एनआईए परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, 1967 जैसे अधिनियमों के तहत अपराधों की जांच कर सकती है।
संशोधित विधेयक एनआईए को मानव तस्करी, जाली मुद्रा, प्रतिबंधित हथियारों के निर्माण या बिक्री, साइबर आतंकवाद, और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम 1908 जैसे अपराधों की जांच करने में सक्षम बनाएगा।
दूसरा बदलाव एनआईए के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है। मौजूदा अधिनियम के तहत, इसके दायरे में आने वाले अपराधों के लिए, एनआईए अधिकारियों के पास अन्य पुलिस अधिकारियों के समान शक्ति होती है। देश के किसी भी राज्य में जांच करने के लिए यह स्वतंत्र है। लेकिन संशोधित विधेयक एनआईए अधिकारियों को भारत के बाहर किए गए अपराधों की जांच करने की शक्ति प्रदान करता है। हालांकि एनआईए का क्षेत्राधिकार अंतरराष्ट्रीय संधियों और अन्य देशों के घरेलू कानूनों के अधीन होगा।
3. तीसरा बदलाव एनआईए के दायरे में आने वाले अपराधों या तथाकथित सूचीबद्ध अपराधों के लिए विशेष परीक्षण अदालतों से संबंधित है। मौजूदा अधिनियम केंद्र को एनआईए की जाँच के लिए विशेष अदालतों का गठन करने की अनुमति देता है। लेकिन संशोधित विधेयक केंद्र सरकार को इस तरह की जांच के लिए सत्र अदालतों को विशेष अदालत के रूप में गठित करने शक्ति प्रदान करता है।
पत्रकार व पर्यावरणविद् अभय मिश्रा की ‘माटी मानुष चून’ का लोकार्पण व परिचर्चा
नयी दिल्ली : दिल्ली के इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में गत 17 जुलाई 2019 को पत्रकार व पर्यावरणविद् अभय मिश्रा के वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पर्यावरण आधारित उपन्यास ‘माटी मानुस चून’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में श्री रामबहादुर राय, अध्यक्ष, आई.एन.जी.सी., डॉ. सच्चिदानंद जोशी, सदस्य सचिव व वरिष्ठ लेखक, प्रो. मौली कौशल, विभागाध्यक्ष, जनसंपदा विभाग, श्री सोपान जोशी, घुमक्कड़ी परम्परा के अग्रज, युवा अग्रदूत, लेखक व पत्रकार ने पुस्तक पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश चन्द्र गौड़, विभागाध्यक्ष कलानिधि, आई.एन.जी.सी. द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं रचनाकार अनुपम मिश्र की पत्नी श्रीमती मंजू मिश्र भी उपस्थित थीं। ज्ञात हो कि यह उपन्यास अनुपम मिश्र की आत्मीय स्मृति को ही समर्पित है। इस मौके पर मौली कौशल ने पर्यावरण की दयनीय स्थिति पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि हालाँकि उपन्यास सन् 2095 में शुरू होता है, लेकिन पर्यावरण की दुर्दशा का चित्रण हमारे वर्तमान काल का है। गंगा सिर्फ़ नदी न रह कर हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी बन कर प्रत्यक्ष है। साक्षी, तपन और गीताश्री की कहानी हमें दॉस्तोवस्की के कथानक की याद दिलाती है। पुस्तक में गिरमिटिया देशों में जन्मी नयी पीढ़ी के दर्द का आख्यान भी है। सोपान जोशी ने भारतीय नदियों के प्रति राजनीतिक उदासीनता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास सामाजिक पत्रकार की क़लम से निकला है। यह भी जानना ज़रूरी है कि कथा सिर्फ़ यथार्थ से नहीं निभती, उसमें कल्पना का बड़ा योगदान है। समाज की ओर से सवाल यूँ उठते हैं कि पर्यावरण के प्रति कोई संवेदना ही न हो। यह संवेदना कल्पना क्षेत्र में ही मुमकिन है। यदि चौमासे की तेज़ बारिश हिमालय से नहीं टकराती, तो भूतल नहीं बन पाता। यह पर्यावरण का संतुलन है। इस संतुलन का बिगड़ना और राजनीतिक उदासीनता हमारे समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। इस उदासीनता को दर्शाना आसान नहीं, यह जोख़िम अभय ने उठाया है। सच्चिदानन्द जोशी ने ‘जल से जुड़े’ अभय मिश्रा की तुलना तपस्वी भागीरथ से की जिन्होंने विश्व में गंगा की पवित्रता के लिये तप किया। नदियाँ सिर्फ़ पानी देने वाली या जीवनदायिनी नहीं हैं, हमारे समाज की आत्मा है। हमारी शिक्षा प्रणाली ने नदियों को एक भूगोल खण्ड ही बनाया, उनसे आत्मीय संबंध नहीं बनने दिया। यह हमारी शिक्षा प्रणाली की हार है। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में ख़ास कार्यक्रम शुरू किये गये हैं जिनमें नदियों के प्रति सामाजिक समावेश किया गया है। वरिष्ठ पर्यावरणविद् अनुमप मिश्र को याद करते हुए सच्चिदानन्द जोशी ने अभय मिश्रा को उन्हीं की परम्परा का भविष्य माना। जोशी ने एलिवन टॉफ्श्लर (Alvin Tofler) की 1970 में छपी पुस्तक ‘फ्यूचर शॉक’ का संदर्भ देते हुए कहा कि ‘माटी मानुष चून’ इसी लेखनी की पद्धति में नया पड़ाव है।
राम बहादुर रॉय ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पुस्तक पढ़ते हुए इंटेलिजेन्स ऐजेन्सी के सबसे क़ाबिल अफ़सर मलय कृष्ण धर की याद आयी। ‘Gangland Democracy’ में धर ने ज़मीनी अपराधों का पर्दाफ़ाश किया है। ‘माटी मानुष चून’ भी इसी तरह गंगा नदी के प्रति हो रहे अन्याय को रेखांकित करती है। यह किताब गंगा नदी की ऐन्जियोग्राफ़ी है। कार्यक्रम में सभी सम्मानित एवं श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री अरुण माहेश्वरी ने कहा कि प्रसन्नता इस बात की है कि अब कार्यक्रम में पुस्तकों की चर्चा फ्लैप पढ़कर ही नहीं की जाती वरन् पुस्तक के पृष्ठ पर चर्चा की जाती है। ‘नदी के इर्द-गिर्द का समाज’ बुनकर एक नए तरह की उपन्यास की रचना की गई है। यह स्वागत योग्य कदम है कि आज की युवा प्रतिभाओं एवं वरिष्ठ लेखकों द्वारा न केवल जीवन की समस्याओं पर वरन् पर्यावरण, संस्कृति भाषा, शिक्षा आदि विषयों पर बेहतरीन पुस्तकें लिखीं जा रही हैं। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, खोजबीन का आनंद, कुली लाइन्स, माटी मानुष चून आदि पुस्तकें अमेजॉन बिक्री केन्द्रों पर सफ़ल मानी जा रही हैं। इसी क्रम में ज्ञान का ज्ञान, माता हिमालय पिता हिमालय आदि पुस्तकें भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली हैं।
लीक से हटकर बनायी गयी है ‘धुमकुड़िया’

धुमकुड़िया नागपुरिया भाषा में बनी फिल्म लीक से हट कर बनाई गयी है,जो निर्देशक के अपने अनुभवों से प्रेरित है।यह फिल्म स्थानीय स्तर पर अपने समाज की बात कहती है।लेकिन उसका प्रभाव पूरे विश्व के आदिवासियों के लिए समानांतर रूप से सामान्य हो जाता है।
‘धुमकुड़िया’ झारखंड के आदिवासियों लड़कियों की तस्करी एवं झारखंड राज्य की आदिवासियों के साथ छल की कहानी कहती है।सीधे -साधे ग्रामीण परिस्थितिवश अपनी बात कह नहीं सकते,और जो उनके अगुआ बने हुए है जो इन्हीं आदिवासियों के बीच पैदा हुए लोग है। वह भी स्वार्थ वश उनकी बातें अपने फायदे के लिए उनकी बातें भिन्न भिन्न तरीकों से उठा उसे समाप्त कर दीकुओं के दलाल बने हुए है ।
सच्ची घटनाओं पर आधारित इस फिल्म की नायिका रिशु हाॅकी खिलाड़ी बनने का सपना लिए गाँव छोड़ती है ,और बुधुआ नाम के मानव तस्कर के हाथों नायिका रिशु अपनी बहन के पास राँची आती है।अपनी जीजा की सहमति पाकर हाॅकी प्रशिक्षण पाने दिल्ली चली जाती है। वहीं से बुधुआ उसके जीजा और रिशु साथ -साथ वहां की जन जीवन की कथा अपने अपने तरीके से शुरू हो जाती है। फिल्म में दर्शकों के सामने भिन्न-भिन्न तरीके से चरित्रों के माध्यम से झारखंड की विवशता और मजबूरी की कहानी दिखाई देने लगती है।

नायिका रिशु अपने विरोध को स्वर नहीं दे पाती लेकिन उसकी खामोशी और प्रायः रोज यौन उत्पीड़न अपनी ही पथरायी आँखों से देखती रह जाती है।उधर दलाल बन चुका बुधुआ अपने लोगों की शोषण पर गुस्से में चीखता है ,लेकिन उसकी चीख अनेक सुविधाओं की प्राप्ति के कारण दबी सुनायी देती है। जीजा कुछ पाने की आकांक्षा न इधर न उधर वाली दुविधा की स्थिति में जीने लगता है।लेकिन फिल्म में दर्शकों को रिशु की पथरायी आँखें, उसके जीजा और माँ की छटपटाहट के साथ बुधुआ की दबी चीख-यत्रंणा जरूर सुनायी देने लगता और फिल्म में अपनी पूरी यत्रंणा कथा कह जाती है।
युवा निर्देशक नंदलाल नायक सहजता से पूरे झारखंड की औरतों की एवं समाज की तस्वीर कम संवाद और ज्यादा चित्रों में प्रवाह रूप से झारखंड की छवि आंकते है।इस फिल्म को देखकर आप महसूस करने नहीं बच सकते है।यह फिल्म नारीवादी न होकर आदिवासी औरतों की यथार्थ की फिल्म बनती है ।
जहाँ आजकल की ज्यादा फिल्मों से हमेशा केन्द्रीय कथावस्तु गायब रहती है। वहीं ‘धुमकुड़िया’ औरतों की तस्करी जैसी कथावस्तु को रखते हुए चलचित्र की भाषा ,चरित्रों की विदग्धता,स्थितियों, परिवेश की गहन परतों को भी सामने लाते हुए झारखंड की आंतरिक कथा कहते हुए जीवंत और ज्वलंत प्रश्नों को उठाती है । नागपुरिया भाषा में बनी यह फिल्म समानांतर फिल्मों कि श्रृखंला में खड़ी होकर बेबाकी से विचार करने पर मजबूर करती है।
इस फिल्म का छायांकन सत्यजीत राय फिल्म इंस्टीट्यूट के पास आउट रूपेश कुमार ने किया है और सम्पादन प्रकाश झा ने किया है। निर्देशक नंदलाल नायक ने संगीत तैयार किया है।इस फिल्म में रिकंल कच्छप, प्रद्युम्न नायक, गीता गुहा,सुब्रत दत्ता और राजेश जैश ने अभिनय किया है। इस फिल्म के निर्माता सुमित अग्रवाल और निर्देशक नंदलाल नायक के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपनी भाषा में रचनात्मक तटस्थता को संभव बनाती है।
(समीक्षक वरिष्ठ नाट्यकर्मी हैं)
विराटता के प्रतीक थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर: डॉ. शंभुनाथ
मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी और बांग्ला विभाग के संयुक्त तत्वावधान में पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के जन्म द्विशतवार्षिकी के अवसर पर “जन्म द्विशतवार्षिकी स्मरण : समाज सुधारक, साहित्य स्रष्टा एवं नवजागरण के अग्रदूत विद्यासागर” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन की शुरुआत स्वागत गीत से हुई जिसे पंकज सिंह ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ शंभुनाथ ने कहा कि विद्यासागर का हृदय बहुत विराट था और विराट हृदय ज्ञान और संवेदना का सागर होता है। उन्होंने कहा कि विद्यासागर और भारतेंदु ने मिलकर हिंदी-बांग्ला के बीच संवाद की परंपरा शुरू की। राजशाही विश्वविद्यालय, बांग्लादेश के प्रो. महफूजूर रहमान ने कहा कि विद्यासागर का जीवन जितना भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रासांगिक है, उतना ही पूर्व बंगाल के लिए भी है। विद्यासागर विश्वविद्यालय के कला एवं वाणिज्य विभाग के डीन प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि विद्यासागर का जीवन इस अर्थ में अनुकरणीय है कि उन्होंने मानव जाति के हित के लिए अपना सर्वस्व जीवन लगा दिया। रेवेंशा विश्वविद्यालय की प्रो. अंजुमन आरा ने कहा कि विद्यासागर वास्तव में विद्या के सागर थे। खिदिरपुर कॉलेज की प्राध्यापिका डॉ इतु सिंह ने कहा कि विद्यासागर के योगदान को शिक्षा, समाज और धर्म के क्षेत्र में उनके योगदानों से परिचित करवाते हुए उनकी प्रासंगिकता पर अपनी बात रखी। डॉ प्रीति सिंघी (श्री शिक्षायतन कॉलेज) ने उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों पर प्रकाश डाला। डॉ मधुलता गुप्ता (सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज) ने विद्यासागर से जुड़े तथ्यों को सबके सामने रखते हुए कहा कि विद्यासागर ने सामाजिक कुरीतियों का जमकर विरोध किया। खड़गपुर कॉलेज के प्रो. पंकज साहा ने कहा कि विद्यासागर ज्ञान के साथ-साथ करुणा के भी सागर थे। डॉ. संजय पासवान ने कहा कि विद्यासागर का यह पर्व निश्चित तौर पर एक सामाजिक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। प्रो. रंजीत सिन्हा ने कहा कि विद्यासागर एक समाज सुधारक के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। इस अवसर पर लिली साह, इबरार खान, पंकज उपाध्याय, विक्रम मुखी, हरेंद्र पंडित, प्रियंका गुप्ता, श्रद्धा उपाध्याय आदि ने आलेख पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन मधु सिंह एवं राहुल गौड़ ने किया। धन्यवाद ज्ञापन देते हुए डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि विद्यासागर का जीवन और दर्शन आज के समय में ज्यादा प्रासांगिक है।
कवि के रूप में मुझे स्वीकृति कोलकाता में ही मिली : राज्यपाल
कोलकाता : ‘मैं खुद को कवि नहीं मानता लेकिन सच पूछा जाए तो कवि के रूप में मुझे स्वीकृति कोलकाता में ही मिली। साहित्य का लक्ष्य मानव कल्याण है। हम सभी को इसके लिए समर्पित होना है।’ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ.केशरीनाथ त्रिपाठी ने अपने अभिनंदन की कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उपर्युक्त बातें कहीं। उन्हें भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी द्वारा साहित्य सेवी सम्मान प्रदान किया गया। अभिनंदन पत्र का वाचन परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने किया। इस सम्मान से प्राप्त होने वाली राशि इलाहाबाद के एक शिक्षण संस्थान पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी विद्यापीठ को अर्पित कर दी।
डॉ.केसरीनाथ त्रिपाठी ने कथाकार कुसुम खेमानी के नए उपन्यास ‘लालाबत्ती की अमृतकन्याएँ’ का लोकार्पण करते हुए अपने भाषण में कहा कि लालबत्ती एक चौंकाने वाला शब्द है लेकिन यह हमारे समाज के एक यथार्थ को उभारता है। हम सिर्फ आदर्शों की दुनिया में नहीं रह सकते हमें यथार्थ का भी सामना करना होगा। राज्यपाल डॉ. केसरीनाथ त्रिपाठी के अभिनंदन के पश्चात लिटिल थेस्पियन द्वारा राज्यपाल की कविता ‘विहान’ की नाट्य प्रस्तुति की गई। इसका निर्देशन उमा झुनझुनवाला ने किया था। सांस्कृतिक संस्था नीलांबर द्वारा उनकी कुछ कविताओं का मोंताज भी प्रस्तुत हुआ। इसका निर्देशन विशाल पांडेय ने किया था। समारोह में स्वागत भाषण परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने दिया। संचालन करते हुए प्रो.राजश्री शुक्ला ने कहा कि महामहिम डॉ.केसरीनाथ त्रिपाठी का अभिनंदन वस्तुतः हमारा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है। यह अभिनंदन साहित्य प्रेम का अभिनंदन है। परिषद की मंत्री डॉ.बिमला पोद्दार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
प्रेषक : सुशील कान्ति
दुबई में भोजपुरी के वैश्विक सम्मेलन में सम्मानित होंगी प्रतिभा सिंह
कोलकाता : वर्ल्ड बिहारी कनेक्ट लंदन के बैनर तले 22 से 24 अगस्त 2019 तक दुबई में ग्लोबल समिट 2019 का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में भारत समेत कई देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। प्रख्यात गायिका और विश्व भोजपुरी उत्थान कल्याण समाज की उपाध्यक्ष प्रतिभा सिंह पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व करेंगी तथा उन्हें सम्मानित किया जायेगा। यह जानकारी लंदन से बिहारी कनेक्ट के अध्यक्ष उधेश्वर सिंह ने बताया कि भोजपुरी साहित्य एवं संस्कृति के वैश्विक स्वरूप पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार व सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया गया है, जिसमें दुनिया भर के विद्वान एवं संगठनकर्ता भोजपुरी के योगदान, उसकी स्थिति और भविष्य पर अपने विचार रखेंगे। सेमिनार को जमशेदपुर झारखंड के सम्पूर्ण भोजपुरी विकास मंच के महामंत्री प्रदीप कुमार सिंह, सासाराम से अखिल भारतयी भोजपुरी साहित्य परिषद के महामंत्री डॉ.गुरशरण सिंह, दिल्ली से पूर्वांचल एकता मंच के महामंत्री शिवाजी सिंह, सबरंग फिल्म अवार्ड समराोह के निदेशक कुलदीप श्रीवास्तव, भोजपुरी अकादमी बिहार के पूर्व अध्यक्ष सीबी राय, विश्व भोजपुरी सम्मेलन के दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे, जीवनदीप संस्था बनारस के चेयरमैन डॉ.अशोक सिंह, उत्तर प्रदेश अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष डॉ.अशोक चौबे आदि सम्बोधित करेंगे। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार के लिए विशेष योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित भी किया जायेगा। भोजपुरी के रंगारंग सास्कृतिक कार्यक्रम में प्रख्यात मशहूर गायिका देवी, प्रतिभा सिंह, सुरसंग्राम विजेता मोहन राठौड़, दीपक त्रिपाठी,राधा श्रीवास्तव अपनी आवाज का जादू बिखेरेंगे।




