Wednesday, April 22, 2026
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स्प्रिंटर दुती चंद चाहती हैं बायोपिक में कंगना निभाएं उनका किरदार

मुम्बई : देश की पहली एलजीबीटी एथलीट दुतीचंद ने कहा है कि कंगना रनोत उनकी बायोपिक के लिए सही चयन होंगी। वे चाहती हैं कि उनकी बायोपिक में उनका रोल निभाने वाला भी उनकी तरह साहसी ही हो।
बॉम्बे टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में दुतीचंद ने कहा कि उनके पास कई फिल्मकार आ रहे हैं जो उनकी बायोपिक के अधिकार लेना चाहते हैं। इनमें अनिल कपूर और राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि बायोपिक में किसे अपना रोल करते देखना चाहती हैं तो उन्होंने कहा – मुझे लगता है मेरी कहानी पर्दे पर कंगना रनोत ही सबसे बेहतर ढंग से निभा सकती हैं। जब कंगना से दुतीचंद की बायोपिक के बारे में सवाल किया गया तो उनका कहना था कि ये दुतीचंद का बड़प्पन है। मैं यह जानकर बेहद खुश हूं कि उन्हें लगता है मैं उनका रोल निभाने के काबिल हूं। वे साहसी हैं और उन्होंने अपनी निजी और पेशेवर जिन्दगी में भी कई तरह के मानदंड स्थापित किए हैं।
अप्रैल 2019 में दुतीचंद ने सार्वजनिक रूप से अपने समलैंगिक होने की बात स्वीकार की थी। दुती ने बताया था कि वे अपने गृहनगर चाका गोपालपुर (ओडिशा) में एक लड़की के साथ रिश्ते में हैं। दुती ने एशियन गेम्स 2018 में दो सिल्वर मेडल जीते थे। वे 100 मीटर और 200 मीटर के फाइनल में दूसरे स्थान पर रही थीं। दुती पर 2014 ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जेंडर विवाद के कारण एक साल का प्रतिबंध लगा था। वे टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी थीं। दुती का टेस्टोस्टोरेन (हार्मोन) बढ़ जाता था, इससे उन पर पुरुष होने के आरोप लगे थे। उनकी अपील पर लुसाने (स्विट्जरलैंड) स्थित खेल मध्यस्थता अदालत ने इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन (आईएएएफ) के फैसले को पलट दिया था। इसके बाद दुती 2016 रियो ओलिंपिक में हिस्सा ले सकी थीं।

लड़कियों का फुटबॉल खेलना बैन था, तो लड़का बनकर खेलती थीं सिसी

ब्राजीलिया :  अगर आप दुनिया जीतना चाहते हैं तो आपको विद्रोही बनना पड़ेगा। यह बात ब्राजील की सिसलीडे डो अमोर लीमा (सिसी- 52 साल) पर पूरी तरह से लागू होती है। ब्राजील में लड़कियों के फुटबॉल खेलने पर बैन था। इसके बावजूद लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं। इसके लिए उन्हें अपनी लड़की होने की पहचान छिपानी भी पड़ती थीं। फुटबॉल खेलने के लिए सिसी ने कई बार माँ से मार खाई लेकिन फुटबॉल खेलना नहीं छोड़ा। 1979 में ब्राजील ने लड़कियों के फुटबॉल खेलने पर से प्रतिबंध हटा दिया। इसके बाद सिसी राष्ट्रीय टीम में चुनी गईं और 10 नम्बर जर्सी पहनने वाली पहली महिला बनीं।
‘मैं सबको गलत साबित करना चाहती थी’
सिसी जब लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं तो उनकी माँ कान पकड़कर मारते हुए उन्हें घर ले जाती थीं। माँ को लगता था कि ब्राजील में लड़कियों के फुटबॉल खेलने का कोई भविष्य नहीं है। सिसी के मुताबिक- मुझे तभी लगता था कि दुनिया को गलत साबित करना है। ब्राजील में 1941 में महिला फुटबॉल मशहूर होने लगी थी। लेकिन तभी सरकार ने पुरुषों के खेल समझे जाने वाले रग्बी, वॉटर पोलो और फुटबॉल के लड़कियों के खेलने पर पाबंदी लगा दी। सिसी के मुताबिक- लड़कों ने मुझे अपने साथ फुटबॉल खिलाना शुरू कर दिया था। हालांकि कई बार मुझे लड़कों की तरह दिखना पड़ता था, क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानती थी कि देश में लड़कियों के फुटबॉल खेलने की मनाही है। मेरे पिता भाई को प्रोफेशनल फुटबॉलर बनाना चाहते थे और मैं उन्हें अपना खेल दिखाना चाहती थी।
1979 में महिलावादी आन्दोलनों के चलते लड़कियों के फुटबॉल खेलने से प्रतिबंध हटा दिया गया। लेकिन कुछ नियम बनाए रखे मसलन उनके मैच का समय कम होगा और महिलाओं को खेल के दौरान पूरा शरीर ढंकना होगा। मैच के बाद वे पुरुषों की तरह आपस में जर्सियां नहीं बदल सकेंगी। तब तक सिसी के पिता को भी उसके फुटबॉल टैलेंट का पता लग चुका था। मां के डर के बावजूद उन्होंने 14 साल की सिसी को फीरा द संताना की टीम में खेलने जाने की अनुमति दे दी। सिसी के मुताबिक- पापा ने कहा कि जब इस लड़की को भगवान ने ही फुटबॉल का तोहफा दिया है तो हम उसे कैसे रोक सकते हैं।
3 साल बाद सिसी को एक नामी क्लब सल्वाडोर और इसके बाद ब्राजील की नई नेशनल टीम में खेलने का मौका मिल गया। सिसी की उम्र उस वक्त 17 साल थी, लिहाजा उन्हें खेलने के लिए माता-पिता के दस्तखत कराकर लाने को कहा गया। सिसी बताती हैं- उस वक्त पिता किसी काम से शहर से बाहर गए थे। मैंने मां से पिता के नकली साइन बनाने को कहा क्योंकि मैं वापस नहीं लौटना चाहती थी। 1988 में फीफा ने चीन में महिलाओं के लिए पहला इन्विटेशनल टूर्नामेंट कराया। यहां सिसी क्वीन ऑफ ब्राजीलियन फुटबॉल के नाम से मशहूर हो गईं। डेब्यू मैच से पहले उन्हें 10 नंबर की जर्सी दी गई। 10 नंबर की जर्सी की शुरुआत पेले से हुई थी। यह जर्सी पहनने वाली सिसी पहली महिला बनीं। सिसी के मुताबिक- जब मैंने जर्सी पहनी तो बच्चों की तरह रोई।
सिसी ने अपना पहला गोल चीन में यूरोप चैम्पियन नॉर्वे के खिलाफ दागा। 1999 के महिला वर्ल्ड कप में वे सबसे ज्यादा गोल करने वाली खिलाड़ी बनीं। यहीं पर उन्होंने महिला वर्ल्ड कप के इतिहास का सबसे बेहतरीन गोल (35 मीटर की दूरी से फ्री किक) भी दागा। हालांकि टूर्नामेंट में ब्राजील तीसरे नंबर पर रहा। पिछले 20 से सिसी कैलिफोर्निया में रह रही हैं। वे यहां 2 हजार लड़कियों को फुटबॉल सिखा रही हैं। सिसी मजाकिया अंदाज में कहती हैं- मुझे फुटबॉल की लत है। मुझे फुटबॉल से प्यार है। मैंने एक खिलाड़ी के रूप में देश, फुटबॉल को काफी कुछ दिया। अब कोच बनकर लड़कियों को सिखा रही हूं। पिछले साल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की बेटी चेल्सी की किताब- 13 महिलाएं जिन्होंने दुनिया बदली- में सिसी भी शामिल हैं।

सजायाफ्ता कैदी बना योग गुरु, दूसरों को सिखा रहा योग

लखनऊ :  हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पा चुके कैदी कृष्णानंद द्विवेदी ने अपना पश्चाताप नये तरीके से किया। वह अवसाद में रहे तो योग करना शुरू किया। फायदा पहुंचा तो अब दूसरे कैदियों को योग सिखाना शुरू कर दिया। दूसरे कैदियों ने भी योग सीख कर तनाव दूर करना शुरू कर दिया। अब जेल के अधिकतर कैदियों की दिनचर्या में योग शामिल है और कृष्णानंद अब योग गुरू के नाम से जेल में चर्चा का केन्द्र हैं। यही नहीं 21 जून को विश्व योग दिवस पर कृष्णानंद के नेतृत्व में जेल के अंदर 3000 बंदी योग कर रहे हैं। वर्ष 2014 से लखनऊ की जिला जेल में बंद उन्नाव के कृष्णानंद पर हत्या समेत आधा दर्जन मामले दर्ज हैं। कृष्णानंद को आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। वह 13 साल सात महीने की सजा काट चुके हैं। कृष्णानंद बताते हैं कि कारावास ने उनके जीवन में अंधेरा कर दिया था। कुछ दिन बीतने के बाद जेल के माहौल का कृष्णानंद की सेहत पर शारीरिक और मानसिक दोनों तौर पर असर हुआ। वह अवसाद में चले गए। कृष्णानंद ने इस दौरान नियमित बैरक में योग शुरू किया। कृष्णानंद का कहना है कि योग के जरिये उन्हें दूसरों की मदद करने और खुद को सुधारने का मौका मिला।
जिला जेल के वरिष्ठ अधीक्षक प्रेमनाथ पाण्डेय बताते हैं कि जेल में नियमित योग का मकसद कैदियों के तन मन को शांत रखना है। योग की वजह से जेल के बहुत से नशेड़ी प्रवृत्ति के कैदियों में सुधार हुआ है। गांजा, चरस, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट समेत दूसरे नशे के लती कैदियों को योग और काउंसलिंग की मदद से लत छुड़वाने का प्रयास किया जा रहा है।
(साभार -हिन्दुस्तान)

इसलिए 21 जून को मनाया जाता है योग दिवस

भारत समेत दुनिया के कई देशों में 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। पहली बार अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसम्बर 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सिफारिश पर 21 जून को योग दिवस के रूप में घोषित किया था। इस दौरान 193 देशों में से 175 देशों ने बिना किसी वोटिंग के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यूएन ने योग की महत्ता को स्वीकारते हुए माना कि ‘योग मानव स्वास्थ्य व कल्याण की दिशा में एक संपूर्ण नजरिया है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 सिंतबर 2014 को पहली बार पेश किया गया यह प्रस्ताव तीन महीने से भी कम समय में यूएन की महासभा में पास हो गया था। संयुक्त राष्ट्र की महासभा में किसी भी प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में मिला समर्थन अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। इससे पहले किसी भी प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर इतने देशों का समर्थन नहीं मिला था। कई आध्यात्मिक नेताओं ने भी पीएम मोदी की इस सिफारिश का समर्थन किया था।
इस मसौदे को सबसे पहले भारत के स्थायी प्रतिनिधि अशोक मुखर्जी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया और 177 देशों ने इस प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया। 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस बनाए जाने के पीछे वजह है कि इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। खास बात यह है कि आम दिनों के मुकाबले 21 जून को सूरज की किरणें ज्यादा देर तक धरती पर रहती है जिसके कारण दिन बड़ा होता है। योग में इस घटना को संक्रमण काल कहते हैं। संक्रमण काल में योग करने से शरीर को बहुत फायदा मिलता है। इसलिए अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है।
क्यों जरूरी है योग – योग एक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है जो व्यक्ति को शांति, आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है। योग के माध्यम से हम कई गतिविधियों को बेहतर तरीके से कर पाते हैं। ‘योग’ शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ है शामिल होना या एकजुट होना। योग के महत्व को समझते हुए आज पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रही है, पर क्या आप जानते हैं 21 जून को ही अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस क्यों मनाया जाता है। आइए जानते हैं ऐसे ही सवालों के जवाब और इस दिन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य जिनके बारे में अब तक शायद ही आपने कभी कुछ सुना हो।
योग शब्द का शाब्दिक अर्थ जुड़ना या मिलना होता है लेकिन यह बहुत विस्तृत विज्ञान है क्योंकि इसके सभी कर्म और क्रियाएं मनुष्य को शारीरिक और आत्मिक रूप से पूर्ण योगी बनाती है। वेदांत के अनुसार, “आत्मा का परमात्मा से पूर्ण रूप से मिलन होना ही योग कहलाता है।”
क्या है योग का इतिहास – योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके 7 शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन 7 ऋषियों को ग्रीष्म संक्रांति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस दौर को दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है। इस दौरान आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों को प्रकृति की तरफ से स्वत: सहयोग मिलता है।
21 जून को ही क्यों मनाया जाता है ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’
कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर 21 जून को ही योग दिवस के रूप में क्यों मनाया जाता है। इसके पीछे की वजह भी काफी खास है। इस दिन उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन है, जिसे कुछ लोग ग्रीष्म संक्रांति भी कहकर बुलाते हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है। कहा जाता है कि सूर्य के दक्षिणायन का समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में बहुत लाभकारी होता है इसी वजह से 21 जून को ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाते हैं।
भारत के नाम दर्ज हैं रिकॉर्ड – संयुक्त महासभा की मंजूरी के बाद 21 जून 2015 को पहला ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ मनाया गया। उस वक्त पीएम मोदी के नेतृत्व में करीब 35 हजार से अधिक लोगों और 84 देशों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली के राजपथ पर योग के 21 आसन किए थे। इस खास आयोजन ने दो गिनीज रिकॉर्ड बनाए थे। पहला रिकॉर्ड 35,985 लोगों के साथ योग करना और दूसरा रिकॉर्ड 84 देशों के लोगों द्वारा इस समारोह में हिस्सा लेना रहा।

आलोचक नामवर सिंह पर केंद्रित मुक्तांचल के नए अंक का लोकार्पण

हावड़ा : मुक्तांचल और हावड़ा की संस्था विद्यार्थी मंच के तत्वावधान में प्रसिद्ध आलोचक ‘नामवर सिंह’ को याद करते हुए हिंदी आलोचना पर चर्चा एवं काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इस मौके पर नामवर सिंह के रचना संसार पर केंद्रित मुक्तांचल के अंक का लोकार्पण भी किया गया। इस अवसर पर पत्रिका की संपादक डॉ. मीरा सिन्हा ने नामवर जी को श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुए कहा कि साहित्य में आलोचना का सही अर्थ निंदा करना नहीं बल्कि उन रेशों को ढूंढ निकालना हैं जिसमें रचनाकार के मूल्य बसे होते हैं। विमल वर्मा ने कहा कि नामवर जी के लेखन में देशकाल की तात्विकता का संक्रमण आलोकित होता है। कथाकार विमलेश्वर द्विवेदी ने कहा कि नामवर जी ने नए लेखकों की रचनाओं की आलोचना करते हुए उन्हें साहित्य जगत में प्रतिष्ठित किया है।  आलोचक परशुराम ने कहा कि नामवर जी ने रचना और आलोचना को संवाद का एक माध्यम बनाया है। प्रो. मधुलता गुप्ता ने कहा कि नामवर जी ने बेबाकी से किसी भी रचना की आलोचना की इसी वजह से आज उनकी प्रासंगिकता वैसे ही बनी हुई है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वभारती विश्वविद्यालय की प्रो. मंजूरानी सिंह ने कहा कि साहित्यकार के पास शब्द योजना नहीं शब्द चेतना होनी चाहिए क्योंकि युग से हटकर किसी भी रचना की आलोचना नहीं हो सकती है। इस अवसर पर प्रसिद्ध गायक अजय राय ने कविताओं पर संगीतबद्ध प्रस्तुति की। दूसरे सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन में वरिष्ठ कवि लखवीर सिंह निर्दोष, राज्यवर्द्धन समेत अन्य कवियों ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए प्रो. शुभ्रा उपाध्याय ने किया। इस मौके पर कई अन्य गण्यमान्य अतिथि उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन देते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रो. रामप्रवेश रजक ने कहा कि नामवर जी को याद करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना है।

मधु सिंह की पाँच कविताएँ

मधु सिंह

तुम ले चलो मुझे

तुम ले चलोगे न मुझे
दुनिया की भीड़ से छिपाकर
वहां,
जहां पत्तियों के बीच से
सूरज की किरणें झांकती हो
दुनिया को छूकर महसूस करने के लिए

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां बारिश की बूंद पड़ते ही
मिट्टी की सौंधी खुशबू से
खिल जाता हो
किसानों का रोम- रोम

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां सांझ के ढलते ही
सब लौटते हैं
जिंदगी की दौड़ से थककर
चांद को तकिया बना
एक शिशु सी मुस्कान लिए
सपनों से लिपटने

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां नक्षत्रों और सौर मंडल से
दिखती है एक तैरती पृथ्वी
जहां बसता है
लोगों के बीच
प्रेम का गुरुत्वाकर्षण

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां हवा की सरसराहट
कानों को छू
कह जाती हो एक प्रेम कथा

तुम ले चलो न मुझे
भौरों की दुनिया में
जहां तितलियों के स्पर्श से
खिल जाती हो
कलियां

मुझे ऐसी लोककथाओं की
यात्रा पर ले चलो
जहां संवाद के बाद
एक गहरी चुप्पी हो
और सिर्फ तुम रहो
और मैं रहूं….

 

स्त्री का आदिम इतिहास

इन दिनों
कुछ अजीब स्थिति है मेरी
जीवन की कड़ी परीक्षा की तैयारी
मैं करती हूं स्टडी रूम में नहीं

बल्कि रसोईघर में

हिंदी साहित्य का इतिहास लेकर
घुसती हूं मैं रसोईघर में
सबसे पहले गैस जला
चढ़ाती हूं कढ़ाई में आदिकाल को

फिर भक्तिकाल को
धीरे-धीरे पकाते हुए

मैं पहुंच जाती हूं
सुंगधित रीतिकाल में
और
मसालों को भांजते भांजते
तैयार हो जाता है
पूरा आधुनिक काल

और फिर चारों को
डाइनिंग टेबल पर सजाकर
परोसती हूं सबके सामने
साहित्य का पाकशास्त्र

जिसे चखकर सब करते हैं बहस
मसलन आलोचना की चीरफाड़
और
मैं घिर जाती हूं
कहानी, कविता,उपन्यास
निबंध,
संस्मरणों और आत्मकथाओं के जाल में

और
इस तरह मेरे जीवन की इतिहास गाथा में
रोज जुड़ने लगते हैं ऐसे नये अनुभव
और तैयार हो जाता है

मेरे जीवन के साहित्य का सबसे आदिम इतिहास

3.

 

 

चुप्पी

वो चुप थी
खुद के विरुद्ध
होने वाली साजिशों के खिलाफ

वह सह रही थी सब
चुपचाप
ताकि बचा सके
अपने सुनहरे सपनों को
जिसे वह हर पल जीती थी

उसे नहीं पता था
यह सपना सिर्फ उसका था
साथ रह रहे पुरुष का नहीं
पति वो जरूर है
पर सिर्फ नाम का

वह पुरुष
बार-बार उसकी चमड़ी से
उधेड़ लेना चाहता है
उसके पंख को
ताकि वो उड़ न सके
सपनों की ऊंची उड़ान

वह पुरुष चाहता है
सदा बनी रहे वह दासी
और वह उस पर करे वार
पल-प्रतिपल

वह पुरुष
एक स्त्री के दर्द को भी
कहता है बहाना
और खुद के
दर्द का
पीटता है ढोल

ऐसे ही होते हैं कुछ मर्द
जो अक्सर भरी सभाओं में
उठाते हैं आवाज
महिला सशक्तिकरण का
और फिर
शाम ढलते
करते हैं महिला पर
अपनी शक्ति का प्रयोग

जब कुछ स्त्रियां
उठाना चाहती हैं आवाज
अन्याय के खिलाफ
और उन अपनों के खिलाफ
जिन्होंने बिछा रखा है जाल
लेकिन अक्सर ये स्त्रियां
झूठे आश्वासनों में
उलझ
भूल जाती हैं
परिवार के अपमान के डर से उठाना आवाज

और वे फिर सहने लगती हैं
रोज नया ताना
स्री होने का ताना ….

4.

 

एनीमिया

बूंद बूंद
कतरा कतरा
कुछ रक्त जैसा
बहता हुआ
वह द्रव पदार्थ
पाइप के जरिए
जा रहा था
मांस हाड़ की बनी
उस देह में
जिसमें बसती है
एक बेटी
एक बहन
एक पत्नी
एक मां
और एक औरत
उस देह में
बसता है दर्द भी
जिसे वह सबसे छुपाए
करती है दिनभर का काम

उस औरत के दर्द में छिपा है
एनीमिया
थाइराइड
कैल्शियम की कमी
और न जाने क्या क्या

खामोशी से वह सहती है सब
इसलिए
दुनिया कहती है
ये तो आम बात है
औरतों में
दर्द और शर्म तो
औरत का गहना होता है
जिसे जिदंगी भर
ऐसे ही
पहने रखना है

खोखले रिश्तों को
दिल से निभा रही है वह
सब के होते हुए भी
वह नहीं है
किसी की
वह बस है
उस दर्द की
और दर्द उसका
जो रहते है साथ-साथ
वैसे ही जैसे स्लाइन की चढ़ती
आखिरी बोतल
और अस्पताल में लेटी हर एक औरत
जो ग्रस्त है
एनीमिया से और
अपनों से
जो उनकी नहीं
उनके काम का डंका बजाते हैं..

 

5.
नाखून
उस शख्स के पास बैठते ही
खुद को समेट लिया
 उसने अपनी सीमाओं में
लगातार टकटकी लगाए वह देख रही थी
उसकी ओर बढ़ते पैने नाखूनों को
और हाथों को
जो बार-बार उसके शरीर को छू लेने की कोशिश में
बढाए जा रहे थे
खुद को वो और कितना सिमटती खुद में ही
अंदर से आ रही आवाजों को
वो कर देना चाहती थी शब्दों में बयां
लेकिन ये शब्द औरों के लिए
बस रोजाना उनके साथ
गुजरने वाले शब्द ही तो थे
 काश वो उस आवाज को
बना लेती हथियार
अपने संकोच के खोल से निकल
काट देती
उसकी ओर बढ़ने वाले नाखूनों को
ताकि खुद को दे सके निर्भय विस्तार…

जल्द नए स्वरूप में दिखेगा जलियांवाला बाग का शहीदी कुआं

अमृतसर : जलियांवाला बाग को सैलानियों के लिए आकर्षक बनाने का काम जोरों पर है। अतीत से जुड़ी विरासत को भविष्य के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी गुजरात की कंपनी को सौंपी गई है। जल्द बाग को जनता के लिए खोल दिया जाएगा। हीदी कुआं को नया रूप दिया जा रहा है।
यह बदलाव होगा
शहीदी कुएं में नीचे तक देखने के लिए लाइटिंग और लैंड स्कैपिंग होगी।
नई शहीदी गैलरी, म्यूजिकल फाउंटेन बनाया जाएगा।
13 अप्रैल 1919 का नरसंहार दिखाया जाएगा।
7-डी थिएटर,पर्यटकों के लिए एसी गैलरी
एलईडी स्क्रीन से इतिहास दिखाया जाएगा
बाग रात 9 बजे तक खुला रहेगा

सर्वाधिक कमाई करने वाली खिलाड़ियों की फोर्ब्स सूची में कोहली एकमात्र भारतीय

नयी दिल्ली : स्टार क्रिकेटर विराट कोहली विश्व में सर्वाधिक कमाई करने वाले खिलाड़ियों की फोर्ब्स की सूची में शामिल एकमात्र भारतीय है और उनकी कुल वार्षिक कमाई दो करोड़ 50 लाख डॉलर है। भारतीय कप्तान हालांकि इस सूची में 17 पायदान नीचे 100वें स्थान पर खिसक गये हैं। इस सूची में बार्सिलोना और अर्जेंटीना के फुटबाल स्टार लियोनेल मेस्सी शीर्ष पर हैं। फोर्ब्स की मंगलवार को जारी सूची के अनुसार कोहली को विज्ञापनों से 2.1 करोड़ डॉलर जबकि वेतन और जीत से मिलने वाली राशि से 40 लाख डॉलर की कमाई होती है। पिछले 12 महीने में उनकी कुल कमाई 2.5 करोड़ डॉलर की रही है। पिछले साल कोहली इस सूची में 83वें स्थान पर थे, लेकिन इस साल वह फिसल कर 100वें स्थान पर आ गए हैं। हालांकि विज्ञापन से उनकी कमाई में 10 लाख डॉलर का इजाफा हुआ है। मेस्सी ने खेलों की दुनिया में सर्वाधिक कमाई करने वाले खिलाड़ियों की सूची में संन्यास ले चुके मुक्केबाज फ्लायड मेवेदर को शीर्ष से हटाया। अर्जेंटीनी स्टार की वेतन और विज्ञापन से कुल कमाई 12.7 करोड़ डॉलर है। मेस्सी के बाद पुर्तगाल के फुटबालर क्रिस्टियानो रोनाल्डो का नंबर आता है जिनकी कुल कमाई 10.9 करोड़ डॉलर है।

सीतारमण और जयशंकर को सम्मानित करेगा जेएनयू

नयी दिल्ली  :  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और सुब्रहमण्यम जयशंकर को अपने प्रतिष्ठित पूर्व छात्र (डिस्टिंग्विश्ड अलम्नाई) पुरस्कार से सम्मानित करेगा। जेएनयू की कार्यकारी परिषद ने वित्त मंत्री सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर को सम्मानित करने के प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया है। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने बताया कि इस साल अगस्त में होने वाले दीक्षांत समारोह में उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सीतारमण ने जेएनयू से एमए और एमफिल की डिग्री हासिल की है, वहीं जयशंकर ने यहां से एम फिल और पीएचडी की पढ़ाई की है।

भारतीय लेखिका को इटली ने दिया नाइटहुड सम्मान

नयी दिल्ली : इतालवी भाषा विशेषज्ञ प्रतिष्ठा सिंह को इटली ने नाइटहुड सम्मान प्रदान किया है। यह सम्मान भारत-इतालवी संबंधों को बढ़ावा देने के लिए सांस्कृतिक और राजनीतिक अध्ययन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया है। यहां इटली के भारत में राजदूत लोरेंजो एंगेलोनी द्वारा ‘नाइट ऑफ आर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इटली’ के सम्मान से सिंह को नवाजा गया। सिंह एक लेखिका हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतालवी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास पढ़ाती हैं। सिंह ने सांस्कृतिक और राजनीतिक अध्ययन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर योगदान दिया है और वह इस सम्मान को हासिल करने वाले सबसे कम उम्र के लोगों में से एक हैं। सिंह ने बताया कि कैसे इतालवी सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास के अध्ययन ने उन्हें अधिक संवेदनशील बनाया और अपने ही देश के बारे में जागरूक किया ।