Saturday, April 25, 2026
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वैज्ञानिकों ने रेत और बुरादे पर उगाया टमाटर-खीरा

लहसुन, स्ट्रॉबेरी और फूल भी लगाए
इंदिरा गाँधी कृषि विश्विद्यालय में हवा में खेती का प्रयोग भी सफल रहा
धान के भूसे पर लगा टमाटर का पौधा 15 फीट तक ऊंचा हो गया और साल में 10 महीने तक फल दे रहा है
रायपुर : तेज शहरीकरण और बढ़ती आबादी की वजह से जमीन सिकुड़ रही है, इसलिए प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों ने अब जमीन यानी मिट्टी के विकल्प पर काम तेज कर दिया है। इस साल यहाँ के वैज्ञानिक रेत, लकड़ी के बुरादे और धान के भूसे की परत बिछाकर टमाटर और खीरे की बंपर फसल लेने में कामयाब हो गए हैं। यही नहीं, हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम से सलाद, पत्ती वाली लहसुन, स्ट्रॉबेरी और फूलों में पितूनिया और सेवंती भी उगा लिए हैं। हवा में खेती यानी एयरोपोनिक्स सिस्टम पर भी इस साल सफलता की उम्मीद है।
वैज्ञानिकों की मानें तो ऐसे तरीकों से खराब और बंजर पड़ी जमीन का भी उपयोग हो सकेगा। फूल-फल और सब्जियां आदि लगाने में जमीन की जरूरत अब बहुत कम पड़ेगी। इन्हें रेत, भूसे, बुरादे में उपजाया जा सकेगा। यहाँ तक कि इन्हें हवा में लटकाकर भी पैदावार किया जा सकेगा। प्रदेश में इंदिरा गांधी कृषि विवि में हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम से रेत और बुरादों पर उत्पाद लेने का सफल प्रयोग रहा है। यहां फूल, फूलगोभी, धनिया पालक पर इसका प्रयोग किया गया है। पहले इसके लिए लकड़ी के बुरादे का उपयोग किया गया। यह महंगा पड़ने लगा तो नारियल के बुरादे को लाया गया। फिर आसानी से उपलब्ध धान के भूसे को चुना गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस पर लगा टमाटर का पौधा 15 फीट तक ऊंचा हो गया है और साल में 10 महीने तक फल दे रहा है।
मिट्टी के विशेषज्ञ और कृषिविवि के कुलपति डॉ. एसके पाटिल ने कहा कि हाइड्रोपोनिक और एयरोपोनिक्स भविष्य के लिए फायदेमंद हैं। जमीन सिकुड़ रही है, इसलिए यह बेहतर विकल्प तो है ही, इससे फसलों की क्वालिटी भी सुधरेगी। इजराइल में यह प्रयोग सफल है, यहां के किसानों को दक्ष करने में समय लग सकता है। भूमि रहित खेती पर छत्तीसगढ़ ही नहीं, शिमला व दिल्ली में भी काम चल रहा है। एयरोपोनिक्स पर शिमला के सेंट्रल पटैटो इंस्टीट्यूट में आलू उगाए गए हैं। वहां आलू हवा में लटके हुए ही बड़ा हो रहा है। अभी इन्हें बीज के लिए उगाया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि घरों के लिए ये मॉडल लोकप्रिय हो सकते हैं। इसमें पानी की टंकी बनाकर जो भी उत्पाद लिया जाना है उससे संबंधित न्यूट्रीशियन (खाद-दवा आदि) पानी में घोल दिया जाता है। फिर इसे प्लास्टिक के पाइप के जरिए फसल पर स्प्रे (छिड़क) कर दिया जाता है।
आखिर मिट्टी है क्या?
चट्‌टानों के टूटने-फूटने तथा उनमें भौतिक और रासायनिक परिवर्तन के फलस्वरूप जो तत्व एक अलग रूप ले लेते हैं, उसे ही मिट्टी कहा जाता है। बताते हैं कि 1979 में डोक शैव ने मिट्टी का वर्गीकरण किया। उन्होंने मिट्टी को सामान्य व असामान्य में बांटा। देश की मिट्टी को पांच भागों में बांटा गया। 1. जलोढ़ मिट्टी 2. काली मिट्‌टी. 3. लाल मिट्‌टी, 4. लैटराइट 5. मरू मिट्‌टी। छत्तीसगढ़ की मिट्टियों में विविधता पाई गई है। इसमें लाल और पीली मिट्‌टी, लैटेराइट मिट्टी यानी भाठा, काली मिट्‌टी, लाल-बलुई मिट्टी व लाल दोमट मिट्टी शामिल हैं। देश में करीब 12 प्रकार की मिट्टी पाई जाती है।
सॉयल हेल्थ कार्ड
राज्य में 2015 से स्वायल हेल्थ कार्ड बांटे जा रहे हैं। 2015 से 17 तक पहले चरण में सात लाख 90 हजार मिट्टी के नमूनों की जांच करके 43 लाख 37 हजार 595 किसानों को स्वायल हेल्थ कार्ड बांटे गए। दूसरे चरण में 2017 से 19 तक 9 लाख 63 हजार 421 मिट्टी के नमूने जमा किए गए। इनमें से 9 लाख 57 हजार 60 नमूनों की जांच की गई। करीब 55 लाख 14 हजार 508 किसानों को कार्ड प्रदान किए गए। 2019 – 20 में 61 हजार 167 पायलट ग्रामों का चयन किया गया। यहां से 55 हजार 173 मिट्टी के नमूने जमा किए गए।
प्रदेश में पाँच प्रकार की मिट्टी
नाम हेक्टेयर प्रतिशत
कछार 1.38 लाख 2.7
भाटा 10.02 लाख 20
मटासी 13.54 लाख 26.9
डोरसा 13.82 लाख 27
कन्हार 11.43 लाख 22.8
इसलिए ज्यादा उत्पादन
वैज्ञानिकों का दावा है कि रेतीली जमीन या रेत पर में भरपूर न्यूट्रीशियन दिए जाएं तो हाई प्रोडक्शन लिया जा सकता है। इसकी वजह यह कि न्यूट्रीशियन जो खाद, दवा समेत करीब 18 प्रकार के होते हैं। रेत या बुरादे में चिपकते नहीं हैं। उन्हें पौधे सीधे आब्जर्व कर लेते हैं। इसके साथ ही पौधों की जड़ों को बढ़ने आसानी होती है, क्योंकि उन्हें बढ़ने या फैलने रास्ते आसानी से मिलते हैं। इसके लिए उन्हें एनर्जी भी खर्च नहीं करनी पड़ती। ये एनर्जी पौधे अपने फल को बढ़ाने लगाते हैं। इस वजह से उत्पादन भरपूर मिलता है।

झारखंड में बनेगा देश का पहला 150 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट

3.30 रुपया होगी एक यूनिट बिजली की दर
राँची : देश का पहला 150 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट रांची के रूक्का डैम में लगाया जाएगा। झारखंड बिजली वितरण निगम एवं ज्रेडा के सहयोग से यह कार्य सोलर इनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सेकी) कर रहा है। अब तक केवल केरल में महज 2 मेगावाट और महाराष्ट्र में 500 किलोवाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट थे। उसमें भी केरल का प्लांट दो साल पहले बाढ़ में बह गया था। रूक्का डैम में प्लांट की बिजली की दर 3.30 रुपये तय की गयी है। इससे उत्पादित बिजली झारखंड बिजली वितरण निगम खरीदेगा। इसकी क्षमता 100 से 150 मेगावाट रखी गई है। अगर यह पॉयलेट प्रोजेक्ट सफल होता है तो आगे अन्य जलाशयों में इसे लगाने का काम शुरू होगा। इससे झारखंड में ग्रीन इनर्जी को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।
सेकी ने फिजिबिलिटी सर्वे का कार्य बेल्जियम की एक्सपर्ट टीम से कराई थी। इसमें इसे करीब-करीब हरी झंडी मिल चुकी है। अब इसकी टेक्निकल फिजिबिलिटी चेकिंग का काम होगा। इसके बाद सेकी ही इसका टेंडर जनवरी में करेगा। इसके बाद इस प्लांट के लगाए जाने का रास्ता साफ हो जाएगा।
फ्लोटिंग सोलर प्लांट से जल वाष्प रुकेगा
फलोटिंग सोलर प्लांट लगाने के पीछे मुख्य वजह जमीन है। इतना बड़ा प्रोजेक्ट लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन की जरूरत होगी। पानी में इसे लगाने से जलाशयों का पानी वाष्प बनकर नहीं उड़ेगा जो गर्मी के दिनों में अधिक होता है।

प्रोटीन की कमी से जूझ रहे हैं 73 प्रतिशत भारतीय मगर लेना जरूरी नहीं समझते

इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ने देश के 7 प्रमुख शहरों में किया सर्वे, रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोटीन क्षतिग्रस्त मांसपेशियों के लिए सबसे अहम तत्व
90% से ज्यादा भारतीयों का मानना है, प्रोटीन सिर्फ बॉडी बिल्डर और जिम जाने वालों के लिए जरूरी
नयी दिल्ली : आयरन और कैल्शियम की तरह भारतीयों में प्रोटीन की भी कमी है। 73% शहरी आबादी में प्रोटीन का स्तर मानक से काफी कम है। खानपान में इसे क्यों शामिल करना चाहिए, 93% लोगों को यह भी पता नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात है कि भारतीय प्रोटीन को महत्व ही नहीं देते। उनका मानना है कि यह सिर्फ जिम जाने वालों के लिए जरूरी है। इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 7 शहरों में हुए सर्वे में भारतीयों का मानना है कि डाइट में प्रोटीन का इस्तेमाल वजन घटाने के लिए किया जाता है। 2018 में इनबॉडी-आईपीएसओएस की रिसर्च के मुताबिक, 71% भारतीयों की मांसपेशियां कमजोर हैं। मानक के मुकाबले शरीर में 68% तक प्रोटीन की कमी है। नेशनल सैंपल सर्वे (2011-12) के मुताबिक, ग्रामीण इलाके में 56.5 ग्राम और शहरी इलाके के भारतीय 55.7 ग्राम प्रोटीन लेते हैं।
रोजाना कितना प्रोटीन जरूरी
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में काम कर रहे डॉ. नंदन जोशी कहते हैं- शारीरिक रूप से सक्रिय न रहना और मानक से कम प्रोटीन शरीर में पहुंचने से युवाओं की मांसपेशियों को कमजोर हो रही हैं। 30 साल की उम्र में मांसपेशियां क्षतिग्रस्त होना शुरू होती हैं। हर 10 साल में 3-5% तक मांसपेशियां डैमेज होती हैं। रोजाना एक्सरसाइज और प्रोटीन इसे रिपेयर करने का काम करते हैं और एक्टिव रखते हैं। किसी भी इंसान को अपने वजन के मुताबिक प्रोटीन लेना चाहिए। जैसे आपका वजन 60 किलो है तो रोजाना 60 ग्राम प्रोटीन डाइट में लेना चाहिए।
आहार विशेषज्ञ मानते हैं कि मांसाहारी हैं तो डाइट में मीट, चिकन, अंडे ले सकते हैं। शाकाहारियों के लिए दूध, फलियों की सब्जियां, मूंगफली, नट्स और दालें बेहतर विकल्प हैं। एक ही जगह पर दिनभर का ज्यादातर समय बिताना, शरीर सक्रिय न रखना और प्रोटीन का घटता स्तर मांसपेशियों को कमजोर कर रहा है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, प्रोटीन जीवन के हर पड़ाव के लिए जरूरी है।
सबसे ज्यादा प्रोटीन की कमी लखनऊ वालों में
इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के एक अन्य सर्वे में देश के प्रमुख शहरों में प्रोटीन का स्तर जांचा गया। सर्वे में पाया गया 90% लखनऊ के लोगों में प्रोटीन की कमी है। दूसरे पायदान पर दो शहर अहमदाबाद और चेन्नई हैं, यहां की 84% आबादी प्रोटीन की कमी से जूझ रही है। तीसरे स्थान पर विजयवाड़ा (72%) और चौथे पर मुंबई (70%) है। वहीं, दिल्ली में यह आँकड़ा 60 फीसदी है। इस सर्वे में 1800 लोग शामिल किए और उनके खानपान का विश्लेषण किया गया। इंडियन डाइटिक एसोसिएशन के मुताबिक, भारतीयों को खानपान से जरूरत का मात्र 50 फीसदी की प्रोटीन मिल पा रहा है। प्रोटीन बच्चों के विकास के अलावा उनके सोचने-समझने की क्षमता को बेहतर बनाता है। यह मांसपेशियों के लिए जितना जरूरी है, उतना ही शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए भी अहम है। इसके अलावा त्वचा और बालों को खूबसूरत और हेल्दी बनाने के लिए शरीर में पर्याप्त प्रोटीन का होना जरूरी है।

तमिलनाडु के कलईयुर गाँव में हर पुरुष है कुशल रसोईया, सितारे भी हैं मुरीद

मदुरै : मदुरै से 125 किमी दूर रामेश्वरम के रास्ते में गांव है- कलईयुर। तमिल में कलई के मायने हैं ‘कला’ और युर यानी ‘गाँव’। अपने नाम को सार्थक करता रामनाथपुरम् जिले का यह गांव पाँक कला के लिए दुनियाभर में मशहूर है। गाँव का हर पुरुष एक्सपर्ट कुक यानी कुशल रसोइया है। दो हजार की आबादी वाले गाँव के 300 से अधिक कुक देश ही नहीं दुनियाभर के बड़े होटलों और रेस्त्रां में काम कर रहे हैं। बाकी पुरुष शादियों-पार्टियों में लाेगों को अपने भोजन का मुरीद बना रहे हैं। इनकी आय 40 हजार से शुरू होकर लाखों रु. तक जाती है। गाँव के सबसे बुजुर्ग कुक 73 वर्षीय मुरुवेल बताते हैं कि इस काम को पहचान 500 साल पहले मिलना शुरू हुई थी। इस कला ने मछलियां पकड़ने वाले हमारे वानियार समाज को ऊंची जाति के लोगों की रसाेई में जगह दिलवाई है। सबसे पहले संपन्न वर्ग रेडियार ने हमें कुक रखना शुरू किया था। तब से पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाँव में हर बच्चा यह काम सीख रहा है। बुजुर्गों की देखरेख में 12 साल की उम्र में ट्रेनिंग शुरू हो जाती है, जो 10 साल तक चलती है। 24 घंटे में 617 डिश बनाकर गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज करा चुके सेलिब्रिटी शेफ डॉ. दामू बताते हैं कि कलईयुर के शेफ सी फूड और अपने सीक्रेट मसालों के लिए मशहूर हैं। इनके जैसा करुवर टुकु (सूखी मछली) और चनाकुन्नी (मछली-चावल), प्याज और हरी मिर्च की चटनी दुनिया में कोई नहीं बना सकता। खाना बनाने में ये किसी यंत्र का उपयोग नहीं करते। हर काम हाथ से। वीआईपी और फिल्म एक्टर, फिर भले वो रजनीकांत हो या कमल हसन, कलईयुर के शेफ के हाथों का बना खाना जरूर चखना चाहता है। यहाँ के शेफ ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर, लंदन, और दुबई तक के रेस्त्रां में नौकरियां कर रहे हैं। अगर आप कलईयुर के शेफ हैं तो अच्छे वेतन पर नौकरी मिलना तय है। हिस्ट्री चैनल भी गाँव के बारे में शो कर चुका है। खाने के शौकीन, ऑफबीट ट्रैवलर और रेसिपी पर शोध करने वालों का इस गाँव में आना-जाना लगा रहता है।
गाँव के हर युवा के पास रोजगार, साक्षरता में भी आगे
एआईएडीएमके नेता और पूर्व मंत्री अनवर राजा बताते हैं कि 55 देशों में 2.5 करोड़ तमिल रहते हैं और जहां तमिल हैं, वहां पर कलईयुर के शेफ भी हैं। इस हुनर के ही कारण कलईयुर गांव में हायर सेकंडरी तक स्कूल है। साक्षरता में गांव जिले में दूसरे नंबर पर है। गांव के हर युवा के पास रोजगार है।

रात पर क्यों हो सिर्फ पुरुषों का अधिकार?” पुणे की दीपा ने बनाया देश का पहला बाउंसर समूह

पुणे : ‘रण-रागिनी’, रण की रागिनी, रण का राग गानेवाली, कितनी सुन्दर कल्पना होगी इस नाम के पीछे! लेकिन सच तो यह है कि यह नाम किसी कल्पना से नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के रण को रागिनी में परिवर्तित करते संघर्ष की देन है। ऐसा संघर्ष, जो समाज से है, जो पितृसत्तात्मक सोच से है, जो औरतों के कामों पर संदेह से है। यह कहानी है समाज के रण की रागिनी बन अपना अस्तित्व बनाती महिलाओं की, जो पुरुषों से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। पुणे की दीपा परब, जिन्होंने समाज के नियमों और सोच के अनुसार न चलकर अपने लिए एक अलग पहचान बनाई है। ‘रणरागिनी‘ दीपा द्वारा बनाया गया देश का पहला महिला बाउंसर ग्रुप है, जो लोगों की सुरक्षा का ज़िम्मा उठाए हुए है। आइये जानते हैं राणरागिनी दीपा परब की कहानी।
दीपा हमेशा से ही अपने लिए एक करियर का निर्माण करना चाहती थीं। लेकिन समाज और खुद के परिवार से उन्हें इसकी इजाज़त नहीं मिली। दीपा वो दिन नहीं भूलतीं, जब उनकी आँखों के सामने पुलिस में भर्ती का फार्म फाड़ दिया गया था। वे पुलिस कॉन्स्टेबल बनना चाहती थीं और किरण बेदी, इंदिरा गाँधी जैसी महान महिलाओं के नक़्शे कदम पर चल कर समाज में बदलाव लाना चाहती थीं। लेकिन उन्हें इसका मौका नहीं मिला। पर उन्होंने हार नहीं मानी और महिला बाउंसर ग्रुप की शुरुआत करने की ठानी। वह उन सभी महिलाओं तक पहुंची, जो पुलिस में भर्ती की परीक्षा को पार नहीं कर पाईं थीं। उन्होंने उन महिलाओं को एकत्र किया और उन्हें रणरागिनी बन कर लोगों की सुरक्षा का ज़िम्मा उठाने का साहस दिया। पहले 3 या 4 महिलाओं से शुरू हुआ यह ग्रुप, अब दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आपको जान कर हैरानी होगी कि अब इस ग्रुप में 60 से भी ज़्यादा सक्रीय रणरागिनियां हैं।
लोगों के तानों का किया सामना
दीपा परब हम में से ही एक महिला है, जो लीक से हटकर काम करना चाहती थीं, लेकिन इसके लिए उन्हें समाज से लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा। दीपा कहती हैं, ‘पहले-पहल जब हमने प्रोजेक्ट लेने शुरू किये, तो लोगों की आलोचना हर कदम पर रोड़ा बनी हुई थी। एक मंदिर में भोज के दौरान हमें बुलाया गया था। लेकिन लोगों की आँखों में हमारे लिए मखौल था। हमने कई लोगों को ये कहते सुना- क्या ये औरतें बाउंसर का काम कर भी पाएंगी? ये क्या भीड़ को रोकेंगी! ऐसे कई सवालों की बारिश हम पर हुई। पर हमने इससे हार नहीं मानी और खुद को साबित करके दिखाया।”
महिलाओं के घरवालों को मानना चुनौतीपूर्ण
रणरागिनी ग्रुप में महिलाओं का आगमन तो उनकी इच्छा से होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें घरवालों के विरोध को पार करना पड़ता है। दीपा कहती हैं, “रणरागिनी का हिस्सा बनने के लिए हमें महिला का बैकग्राउंड चेक करना पड़ता है। हम पुलिस वैरिफिकेशन के बाद ही उस महिला को हमारे साथ जोड़ते हैं। साथ ही उन्हें उनके वज़न और लम्बाई को लेकर भी कुछ परीक्षाएं पास करनी पड़ती है। ये सब तो व्यक्तिगत चुनौतियाँ हैं। जिसे महिलाऐं आसानी से पार कर लेती हैं। लेकिन इससे कई गुना बड़ी चुनौती होती है उनके परिवारवालों को समझाने की। मैं खुद जाकर उनके परिवार की काउंसलिंग करती हूँ। यदि मैं इसमें सफल हो जाती हूँ, तो महिला को रणरागिनी बनने का मौका मिल जाता है।”
रात पर सिर्फ पुरुषों का अधिकार क्यों?
दीपा परब महिलाओं और पुरुषों के बीच होने वाले इस फर्क को मिटाना चाहती हैं। दीपा कहती हैं, “क्या रात पर पुरुषों का एकाधिकार है? क्यों महिलाऐं रात में बाहर नहीं जा सकतीं? और अगर वो ऐसा करती हैं, तो उसकी नैतिकता और चरित्र पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं? इन सवालों का जवाब मैं रणरागिनी बन कर देना चाहती हूँ। मैं लोगों के दिमाग से ये बात निकालना चाहती हूँ कि रात को घर से बाहर निकलकर काम करनेवाली औरतों का उनके चरित्र से कोई सम्बन्ध नहीं होता। लोगों को अपनी इस गिरी हुई मानसिकता को बदलना होगा और ये बदलाव सिर्फ महिलाएं ही ला सकती हैं।”
दीपा परब अपना घर चलाने के लिए अपने पति के व्यवसाय में हाथ बटातीं हैं। रणरागिनी के एक प्रोजेक्ट से वह सिर्फ 100 रुपये की फीस अपने लिए लेती हैं। और इन पैसों को भी वो सामाजिक कल्याण के कामों में लगा देती हैं। एक घटना का विवरण देते हुए दीपा कहती हैं, “एक दिन पुलिस स्टेशन में एक केस के दौरान मैंने देखा कि एक लड़की के घरवाले उसे घर से बाहर निकालने पर उतारू हो गए थे। लड़की की माँ उसे छोड़कर चली गई थी और उसके घरवाले चाहते थे कि वो भी घर छोड़ कर कहीं चली जाए। मैंने आगे बढ़ कर कहा कि यदि तुम्हे कोई नहीं अपनाएगा, तो आज से मुझे अपनी माँ मान लो। जिस पर पुलिस वालों ने मुझसे कहा कि इसकी पढ़ाई से लेकर शादी तक की ज़िम्मेदारी मुझे उठानी पड़ेगी। मैंने तुरंत हामी भर दी और उस लड़की को गोद ले लिया। आज उसके 2 बच्चे हैं और वो अपने पति के साथ अपने संसार में खुश है। उसने पढ़ाई की, शादी की और आज अपने परिवार को संभाल रही है। रणरागिनी से मिलनेवाले उन 100 रुपयों को जमा कर मैंने अब तक कई लड़कियों की शादी करवाई है।”
पति ने दिया पूरा साथ
“औरतें मर्दों से ज़्यादा बुद्धिमान होती हैं!” ये हम नहीं कह रहे, बल्कि ये शब्द हैं दीपा परब के पति दीपक परब के, जिनकी मदद के बिना रणरागिनी का अस्तित्व नहीं होता।
दीपक कहते हैं, “औरतों को हमेशा यह कह कर रोक दिया जाता है कि वे बाहर जाकर काम नहीं कर पाएंगी। लेकिन सच तो ये है कि औरतें मर्दों से कई ज़्यादा बुद्धिमान होती हैं। वे हर समस्या का समाधान मिनटों में निकाल लेती हैं, जिसे करने के लिए शायद किसी पुरुष को कई दिन लग जाएं। इतिहास में हुए अच्छे कामों और बदलाव के पीछे हमेशा आपको औरतें ही दिखाई देंगी। इसलिए उन्हें रोकने की बजाय हमें उनका साथ देना चाहिए। वो हर काम करने में सक्षम हैं और अपने साथ-साथ कई लोगों को आगे बढ़ा सकती हैं।”इन्ही खूबसूरत शब्दों से आप जान सकते हैं कि दीपा परब की रणरागिनी को आगे बढ़ाने में दीपक का कितना बड़ा हाथ है। दीपा परब अपने पति को अपना गुरु मानती हैं और रणरागिनी की नींव भी। दीपा परब की इस खूबसूरत, लेकिन चुनौतीपूर्ण कहानी को सुनकर हर व्यक्ति जोश से लबरेज़ हो सकता है।
(साभार – द बेटर इंडिया)

पूर्व राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को विचार मंच का विजय सिंह नाहर सम्मान

कोलकाता : पूर्व राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि आदर्शों की राजनीति खोती जा रही है उसके स्थान पर विकृति राजनीति सामने आ रही है। जहाँ जन सेवा का भाव नहीं है बल्कि कुर्सी दिखायी देती है। यह दुख का विषय है। वे विचारमंच द्वारा ज्ञानमंच में आयोजित सम्मान समारोह में विजय सिंह नाहर सम्मान ग्रहण करने के उपरान्त बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि आज राजनीतिक शुद्धिकरण की आवश्यकता है। सम्मान समारोह सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सम्मान उन सभी के लिए होता है जिनके समक्ष सम्मान दिया जाता है यह सम्मान उनके माता-पिता द्वारा दिए गये संस्कारों का है। ऐसे समारोह हमेशा ही प्रेरणादायक होते हैं।
समारोह के मुख्य अतिथि मेघालय के राज्यपाल तथागत राय ने भी इस अवसर पर विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजसेवी व उद्योगपति अजित चौरड़िया ने किया। मंच पर पन्नालाल कोचर भी उपस्थित थे।
समारोह में अहमदाबाद के डॉ. जीतेन्द्र बी. शाह को हेमचंद्राचार्य साहित्य सम्मान, चेन्नई के डॉ. दिलीप धींग को आचार्य नानेश सम्मान डॉ. ओम निश्चल को प्रो. कल्याणमल लोढ़ा, सारस्वत साधना सम्मान, डॉ. राजीव रावत आचार्य विष्णुकांत शास्त्री स्मृति प्रतिभा सम्मान को दिया गया। इसके साथ ही विद्यालय गौरव सम्मान सुशील राठी, स्विट्जरलैंड, गणेश ललवानी सम्मान डॉ. श्वेता जैन, जोधपुर तथा फुलकंवर कांकरिया सम्मान डॉ. किरण सिपानी, इंद्र दुगड़ सम्मान चित्रकार पार्थ चटर्जी, कोलकाता, श्रीजैन विद्यालय हावड़ा की छात्रा स्वाति चौधरी को अनुपमा सम्मान व अन्य छात्राओं को भी सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ जैन विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ। स्वागत भाषण एवं सम्मान के बारे में जानकारी दिया संस्था के मंत्री श्री सरदारमल कांकरिया ने तथा संचालन डॉ. तारा दुग्गड़ ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने किया।
कार्यक्रम में संस्था के संरक्षक रिखबचन्द्र जैन, पदमचन्द्र नाहटा, जितेन्द्र मेहता, राजेन्द्र भूतोड़िया, विनोद मिन्नी अशोक मिन्नी, ललित कांकरिया, विनोद कांकरिया, मनोज बोथरा, अरुण बक्षावत, रिधकरन बोथरा, दुर्गा व्यास, अनिल ओझा नीरद, डॉ. कमल कुमार, डॉ. बसुमति डागा, श्रीमोहन तिवारी, डॉ. गिरधर राय, सत्यप्रकाश दुबे, दिव्या प्रसाद उपस्थित थे।
कार्यक्रम को सफल बनाने में युधिष्ठिर महतो, हनुमान नाहटा तथा किशोर गेनरी के साथ ही विद्यालय के शिक्षकगण व कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 भवानीपुर कॉलेज में एन्गेज फ्रेशर पार्टी 2.0 

कोलकाता : भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज में एन्गेज के सौजन्य से फ्रैशर पार्टी का आयोजन किया गया। म्यूजिक चैनल वी एच 1के प्रसिद्ध और लोकप्रिय डीजे क्लिंज ने विद्यार्थियों के विशाल समूह को अपने प्रमुख लोकप्रिय गीतों के द्वारा बहुत ही रंगीन समा बांध दिया। भवानीपुर कॉलेज का टर्फ विद्यार्थियों से ठसाठस भरा हुआ था। सभी गीतों की धुन पर थिरक रहे थे। कुछ विशेष लड़के-लड़कियों के जोडों ने अपने नृत्य से एन्गेज डीयो भी जीते। लड़कों को लड़कियों के और लड़कों को लड़कियों के परफ्यूम दिए गए। इस अवसर पर कई तरह के खेलों का भी आयोजन हुआ जिसमें स्पिन द बोटल, पास द कार्ड आदि बहुत लोकप्रिय रहे। वीएच 1 के एंकर क्लिंज ने कार्यक्रम में अपने संचालन से विद्यार्थियों को उत्साहित और डांस के लिए प्रेरित किया। डांस फ्लोर पूरी तरह से छात्र छात्राओं से भरा हुआ था। भवानीपुर कॉलेज के मुख्य द्वार पर विभिन्न कोणों से विद्यार्थियों के लिए फोटोग्राफी का आयोजन किया गया। प्रो दिलीप शाह ने म्यूजिक चैनल वी एच 1के प्रसिद्ध और लोकप्रिय डीजे क्लिंज और मैइशा अय्यर को कॉलेज की ओर से स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। डॉ वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज कराई एवं सूचना प्रदान की।

जेजीयू ने 7 ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों से मिलाया हाथ

नयी दिल्ली : ओ.पी. जिन्दल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (जेजीयू) ने शिक्षा के क्षेत्र में एक कदम आगे बढ़ाते हुए ऑस्ट्रेलिया के 7 शीर्ष विश्वविद्यालयों से हाथ मिलाया है। न्यू साउथ वेल्स की गवर्नर मार्गरेट बेजली द्वारा जेजीयू के प्रतिनिधिमण्डल का स्वागत किया गया और वे ऑस्ट्रेलियन विश्वविद्यालयों के साथ हुए समझौते के दौरान उपस्थित रहीं। इस प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व प्रो. डॉ. सी. राजकुमार ने किया। यह समझौता मैक्यूरी यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू इंग्लैंड, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू कैसल, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी, वेस्टर्न सि़डनी यूनिवर्सिटी के साथ हुआ। इस मौके पर मार्गरेट बिजली ने प्रसन्नता जाहिर की और कहा कि इससे भारत और ऑस्ट्रेलिया के सम्बन्ध मजबूत होंगे। इस समझौते के तहत जेजीयू में 100 से अधिक ऑस्ट्रेलियाई विद्यार्थी इंडिया इम्मरशन प्रोग्राम के लिए आएंगे। जेजीयू के संस्थापक वाइस चांसलर प्रो. सी. राजकुमार ने इसे ऐतिहासिक समझौता करार दिया और कहा कि इस समझौते के बाद संस्थान के विद्यार्थियों तथा शिक्षकों को इन सम्बन्धित संस्थानों में अधिक अवसर मिलेंगे और दोनों के देशों के बीच शोध और उच्च शिक्षा को लेकर सम्पर्क मजबूत होंगे। उन्होंने भारत में कानून तथा लोकतंत्र विषय पर व्याख्यान भी दिया। गौरतलब है कि जेजीयू में अब तक व्याख्यान, सम्मेलनों और कार्यशालाओं के सिलसिले में 300 से अधिक ऑस्ट्रेलियाई अतिथि आ चुके हैं। द सेंटर फॉर इंडिया – ऑस्ट्रेलिया स्टडीज (सीआईएएस) के निदेशक प्रो. शॉन स्टार्स ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय वैश्विक मान्यता प्राप्त भारतीय विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी कर सकते हैं।

नवनीता देव सेन की स्मृति में साहित्य अकादमी का लिटरेरी फोरम

कोलकाता : साहित्य अकादमी ने दिवंगत बांग्ला लेखिका नवनीता देव सेन की स्मृति में लिटरेरी फोरम आयोजित किया। परिचयात्मक सत्र में साहित्य अकादमी की बांग्ला सलाहकार पर्षद के संयोजक सुबोध सरकार ने विचार रखे। लिटरेरी फोरम के चेयरपर्सन होने के नाते उन्होंने साहित्य अकादमी और नवनीता देव सेन के सम्बन्धों पर प्रकाश डाला। इस मौके पर साहित्य अकादमी के पूर्वी क्षेत्र प्रभारी डॉ. मिहिर कुमार साहू ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने नवनीता देव सेन से जुड़ी स्मृतियाँ साझा कीं। इस अवसर पर चित्रा लाहिड़ी, प्रो. पवित्र सरकार जैसे साहित्यकारों ने भी विचार रखे।

हावड़ा में महफ़िल-ए-ख़ुश रंग की 7वी. वार्षिक पुरस्कार व जयन्ती

हावड़ा : हावड़ा के कल्पना चावला ऑडिटोरियम के तत्वाधान में रविवार को इदारा महफ़िल-ए-खुश रंग की 7वी. वार्षिक पुरस्कार एवं जयन्ती आयोजित की गई। हर वर्ष विभिन्न श्रेणियों में यह पुरस्कार साहित्य एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उम्दा कार्य करने वाले लोगों को प्रदान किया जाता है। इस वर्ष इस समारोह में कुल दस लोगों को पुरस्कार प्रदान किया गया। इस वर्ष का युवा साहित्यकार सम्मान ‘राइजिंग स्टार’ की श्रेणी में युवा कवि ‘नीरज सिंह’ को प्रदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर उर्दू शायर एवं विद्वान क़ैसर शमीम जी ने की। सभागार में प्रमुख अतिथि के तौर पर आरती सिंह,इस्माइल परवाज़, कपिल आर्य, इम्तिआज़ अहमद, उस्मान जावेद, जमाल अहमद जमाल, डॉ. मुश्ताक अंजुम तथा अन्य लोग मैजूद थे। इस वर्ष का मौलाना अबुल कलाम अज़ाद पुरस्कार, सोहेब रज़ा फ़ातमी को, कबीर दास पुरुस्कार, कपिल आर्य को, मदर टेरेसा पुरस्कार,ज़नाब हातिम ताई तथा युवा साहित्यकार सम्मान ‘नीरज सिंह’ को दिया गया। नीरज सिंह ने देश के विकास के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता को अति आवश्यक बताया, उनके अनुसार इसके बिना अखंड हिंदुस्तान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हिन्दी तथा उर्दू के सामाजिक सौहार्द से बनी यह संस्था हिन्दी तथा उर्दू साहित्य को बढ़ावा देने के साथ-साथ सामाजिक तौर पर भी शानदार कार्य कर रही है। संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन ज़नाब ताहीर बंग दहलवी ने किया। इदारा महफिल-ए-ख़ुश रंग के संयोजक अफ़ज़ल खान ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए धन्यवाद ज्ञापन दिया।