Thursday, October 1, 2026
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कविता की जुगलबंदी से हिन्दी को समृद्ध करते तीन दोस्त

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हमारी शिकायत रहती है कि युवाओं में हिन्दी को लेकर उत्साह नहीं रहा या फिर अपनी भाषा के प्रति प्रेम नहीं है मगर एक बात तो तय है कि अँग्रेजी को लेकर हम चाहें कितनी भी बातें करें मगर इस देश के दिल में उतरना है तो आप हिन्दी से दूर नहीं रह सकते। आज सम्भवतः रोजगार के साथ यह एक बड़ा कारण है कि युवा वर्ग अपने तरीके से हिन्दी को अपना ही नहीं रहा है, रच रहा है और इस भाषा के माध्यम से न सिर्फ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा है बल्कि गम्भीर सामाजिक मसले भी उठा रहा है। मसले ऐसे जो एक की जिन्दगी से जुड़े होते हैं मगर इनसे समाज भी बनता है और देश भी। अब यही काम मुम्बई की मायानगरी में तीन दोस्त कर रहे हैं और इन तीनों की जुगलबंदी सोशल मीडिया पर धूम मचा रही है।

अगर आप सोशल मीडिया पर हैं तो आपके सामने बोल पोएट्री की क्या तुम समझती हो, वीडियो के रूप में आई जरूर होगी और अगर आप खुद ऐसी समस्या से परेशान हैं या यह आपके दिल से टकराती है तो यह इसी वीडियो की देन है।

” क्या तुम समझती हो” जी हाँ यही नाम है इनके विडीओ का, जो आपके किसी ना किसी फ़ेसबुकिया दोस्त की टाइमलाइन पर पर मिल जाएगा। पति-पत्नी और सास के रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट को दर्शाता यह वीडियो अपने रिलीज़ के पहले ही दिन एक मिलियन और दूसरे दिन भी इतनी ही तेज़ी से दो मिलियन से ज़्यादा बार देखा गया।

इस जुगलंदी में एक सुर बंगाल का भी है जो हावड़ा का ही है। मूल कविता के कवि धीरज पांडेय हावड़ा में ही रहते हैं और वह कभी पत्रकार हुआ करते थे। फिलहाल कविता से रिश्ता गहरा है और मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में हैं। धीरज ने  अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम ” बोल पोयट्री” और अपने दोनों दोस्तों विहान गोयल ( अभिनेता ) और विरेंद्र राय बोल्ड ( निर्देशक) को देते हुए बताया कि उन्होंने यह कविता पहले कई बड़े प्रडक्शन हाउसों और फ़ेस्बुक/यूटूब के बड़े चैनलों को सुनाई पर सबने यह कह कर खारिज कर दिया कि कविता में दम नहीं है। हर जगह खारिज होने के बावजूद भी तीनों निराश नहीं हुए और एक सीमित बजट में कुछ दोस्तों की मदद से वीडियो को शूट किया। धीरज ने अपनी लेखनी से ज़्यादा श्रेय विहान के अभिनय और वीरेन्द्र के निर्देशन को दिया। फिलहाल यह टीम एक नए विषय के साथ अपनी नयी पेशकश की तैयारी में व्यस्त है। बोल पोएट्री की जुगलबंदी को अपराजिता की ढेर सारी शुभकामनाएँ।  वीडियो आप भी देखिए और पूछिए क्या तुम समझती हो –

Kya Tum Samajhti ho.. Vihaan Goyal's rendition of what married life, love and relationship is all about!Hope you enjoy it. ❤Do like, comment and share! Tag your friends, couples, family and colleagues..who absolutely need to watch this!Like the page so you don't miss out on new videos and event updates!Insta – @niting0yalConcept and penned by – Dheeraj PandeyShot by – Virendra RaiEdited by – SajaleditingstudioCurated by – Team Bol poetrySpecial thanks to – Tushar Rawat and teamProduced by – A.D Production Also show your love to our YouTube channel as well – http://bit.do/BolPoetryWith love,Bol Poetry

Posted by Bol Poetry on Wednesday, September 6, 2017

भारतीय भाषाओं और अपनी बोलियों को सम्मान देकर ही देश की अपनी राष्ट्रभाषा बनेगी हिन्दी

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सुषमा त्रिपाठी

दक्षिण भारत….जिसकी संस्कृति उत्तर भारत से अलग है…जहाँ इस देश की राजभाषा को राजनीति ने अवांछनीय बना दिया है। दक्षिण भारत…जिसका उसी अवांछनीय हिन्दी से एक रिश्ता है…दिल का रिश्ता…साहित्य का रिश्ता…और वह रिश्ता अपनापन खोज रहा है। आजतक क्या हमने सुना है कि राजनीति ने कभी एक किया हो? उसने तो हमेशा बाँटा है….एक तो हमेशा संस्कृति ने किया है…भाषा कभी अलग नहीं करती…वह तो जोड़ती है। जरूरत बस हृदय से अपनाने की है। हम कहते हैं कि दक्षिण भारतीय भाषाएँ या यूँ कहें कि समस्त भारतीय भाषाएँ इस देश की भाषाएँ हैं…दक्षिण वाले हिन्दी को अपना नहीं समझते….जरा सोचिए तो क्या आपने कभी उनको अपनाया है या सीखने की कोशिश की है। अगर की भी है तो उसमें भी जरूरत है या फिर मजबूरी…यही समस्या दक्षिण भारत की भी है और इसी को लेकर राजनीति भी हो रही है।

पिछले कई दिनों से कर्नाटक में हिंदी-विरोधी आंदोलन चल रहा है। रेल्वे स्टेशनों पर लगे हिंदी नामपटों को पोता जा रहा है। कर्नाटक के लिए एक अलग झंडे की मांग की जा रही है। अभी अलग झंडे की मांग को तो दरी के नीचे सरका दिया गया है, क्योंकि कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार इसका खुला समर्थन नहीं कर सकती। यदि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया किसी क्षेत्रीय पार्टी में होते तो इस मांग को वे हाथोंहाथ उठा लेते लेकिन हिंदी-विरोध का कर्नाटक में कोई विरोध नहीं कर रहा है। न तो सत्तारुढ़ कांग्रेस, न सत्ताकांक्षी भाजपा और न ही पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का जनता दल !  कोई आश्चर्य नहीं कि यह हिंदी-विरोधी आंदोलन दक्षिण के अन्य राज्यों में भी जोर पकड़ ले। एक तरह से यह केंद्र के विरुद्ध दक्षिण के सभी विघ्नसंतोषी राज्यों को एक कर दे सकता है।

जरा सोचिए कि क्या वजह है कि जिस भाषा ने, जिस देश ने हमें 200 साल तक गुलाम बनाए रखा, वह भाषा आज भी राज कर रही है, वह इन राज्यों के लोगों के हृदय में विराजमान है…क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक दूसरे की भाषाओं को अपना ले। अँग्रेजी हो…जरूर हो…हमें सारी दुनिया से जुड़ना है मगर कोई पड़ोसी जिस तरह माँ और मौसी का विकल्प नहीं हो सकता, उसी तरह अँग्रेजी कभी भी हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विकल्प नहीं हो सकती। हम अँग्रेजी किसी भी अन्य विषय की तरह ही पढ़ेंगे….जरूर पढ़ेंगे….मगर प्राथमिकता अपनी भाषा ही होगी। अगर हम चाहते हैं कि लोग हिन्दी को अपनाएँ तो हमें स्थानीय भाषाओं को अपनाना चाहिए। इन भाषाओं का साहित्य हिन्दी में अधिक से अधिक उपलब्ध हो और हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास….अनुदित होकर तमिल या तेलगू में पहुँचें…..पाठ्यक्रम तक ले जाइए। हम रवीन्द्रनाथ को हिन्दी में पढ़ते हैं तो प्रेमचन्द, बिहार, आचार्य शुक्ल और अज्ञेय तमिल, तेलगू और कन्नड़ में पढ़ाएँ जाएँ। हम दोनों एक दूसरे के पूरक बने तो कोई अँग्रेजी हमें नहीं तोड़ सकती। अगर किसी राज्य में उसकी भाषा प्रथम स्थान पर है तो हिन्दी को दूसरी भाषा बनाइए मगर मामला अगर देश का हो तो हिन्दी को स्वीकार कीजिए….। आपसी समझ और समन्वय ही समस्या का समाधान है।

अगर हिन्दी को देश के हर कोने में जाना है तो उसे साबित करना होगा कि वह जोड़ने की क्षमता रखती है। अगर कोई मराठी मराठी लहजे में हिन्दी बोलता है तो उसका स्वागत कीजिए, अगर कोई बांग्ला के लहजे में बोलता है तो उसका उत्साह बढ़ाइए…अगर कोई मणिपुरी तरीके से बोलता है तो उसका सम्मान कीजिए, अगर कोई हिन्दी में डोगरी मिलाता है तो मिलने दीजिए, अगर किसी की हिन्दी में तमिल, तेलगू या कन्नड़ है तो गले लगाइए। इसी प्रकार सभी भारतीय भाषाएँ भी हिन्दी को खुद में समाहित होने दें। अपनी सहोदर और सहचर भाषाओं के साथ मिलकर हिन्दी समृद्ध ही होगी….कम से ये बहनें हैं….पड़ोसी नहीं है। मुझे अँग्रेजी और हिन्दी के हिंग्लिश से ये बेहतर यह जुगलबन्दी लगती है जिसका सुर मेरे देश का सुर बनाता है। अगर अँग्रेजी से लोहा लेना है तो हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को एक साथ लाना होगा। आपको हिन्दी का प्रसार करना है तो बताइए कि स्थानीय भाषाएँ किसी एक राज्य में चल सकती हैं, कोई अँग्रेजी सीखे भी तो गाँवों तक नहीं पहुँच सकता मगर हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संसद से सड़क तक, होटलों से गाँव की चौपाल तक आपका साथ देगी…और अपनेपन से देगी। यह सही है कि आज हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है मगर हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है। नेताओं से मुद्दा छीनिए….वह भाषा के नाम पर आन्दोलन खड़ा करें, उसके पहले ही उनके हाथ से भाषा छीनिए। वैसे भी कोई भी भाषा राजनीति के भरोसे आगे कभी नहीं बढ़ती, उसे जनता आगे बढ़ाती है, सरकार तो बस संरक्षण दे सकती है….तो यह संरक्षण भी बराबरी का हो। हिन्दी के साथ 50 प्रतिशत राशि स्थानीय भाषाओं के विकास पर खर्च हो….उनके विस्तार और प्रसार को भी प्राथमिकता मिले। अगर आप हाथ बढ़ाएँगे तभी कोई आपका हाथ थाम सकता है। दक्षिण में हमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम का डटकर समर्थन करना चाहिए। वहां रहने वाले हिंदीभाषियों को भी ये भाषाएं सीखनी चाहिए। उत्तर भारत के नेता जब दक्षिण में जाएं तो उन्हें उन्हीं भाषाओं के अपने भाषण देवनागरी में लिखवाकर बोलना चाहिए। दक्षिण के नेता हिंदी सीखते हैं या नहीं ? देवेगौड़ाजी हिंदी में लिखे भाषणों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। दिल्ली में रहते हुए अब वे थोड़ी-बहुत हिंदी बोल लेते हैं। दक्षिण भारत में जाकर आप अँग्रेजी नहीं बल्कि तमिल, कन्नड़, तेलगू और मलयालम बोलिए..और उसके बीच में हिन्दी भी डालिए। .उसी तरह उत्तर भारत आने वाले हिन्दी के साथ पंजाबी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और भोजपुरी बोलें। ऐसा ही प्रयोग प्रशासनिक और विधानसभा या लोकसभा में हो।

राजनीतिक स्तर पर यदि कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्त्ता दक्षिण की भाषाओं का डटकर समर्थन करें और अंग्रेजी के नामपट पोतने लगें तो क्या होगा ? हिंदी को लाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। वह अपने आप आ जाएगी। त्रिभाषा-सूत्र तत्काल खत्म करें और प्रांतीय भाषाओं को प्रथम स्थान दें तो अखिल भारतीय संपर्क हिंदी के बिना कैसे संभव होगा ? यदि हम प्रांतीय भाषाओं को सिर पर बिठाएं तो वे हिंदी को गोद में जरुर बिठाएंगी।

सच तो यह है कि वर्तमान में जिस प्रकार दक्षिण में हिंदी को रोजगारमूलक भाषा मानकर इसके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। यदि उनकें राज्यों की जनता हिंदी सीख कर या मात्र बोलनें सुननें भर की क्षमता विकसित करके यदि अपनी व्यावसायिक निपुणता या पेशेवर दक्षता बढ़ा पाती है तो इसमें दोष क्या है? वोटों की खातिर क्षुद्र राजनीति करनें वाले इन हिंदी विरोधी नेताओं को समझना चाहिए कि दक्षिण भारत का शेष भारत की संस्कृति और भाषा के प्रति अपना आदरभाव का और विनम्र अनुगामी भाव  का अपना गरिमामय और आदरणीय इतिहास रहा है। उत्तर भारत के तीर्थों के प्रति अपनें पूज्य भाव के कारण यहाँ का सनातनी और हिन्दू समाज हिंदी भाषा सीखनें और माता पिता के गंगा स्नान करा लेनें को सदा उत्सुक रहा है!! हिंदी सीख लेनें की रूचि के आधार पर ही1918 में मद्रास में ‘हिंदी प्रचार आंदोलन’ को प्रारम्भ हुआ था और इसी वर्ष में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन मद्रास कार्यालय  आगे चलकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में स्थापित हुआ। बाद में तमिल और अन्य दक्षिणी राज्यों की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए ही इस संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया।

वर्तमान में इस संस्थान के चारों दक्षिणी राज्यों में प्रतिष्ठित शोध संस्थान है, और बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय इस संस्थान से हिंदी में दक्षता प्राप्त कर हिंदी की प्राणपण से सेवा कर रहें हैं। इसी क्रम में केरल में 1934 में केरल हिंदी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की स्थापना हुई। इन संस्थानों में लाखों छात्र हिंदी की परीक्षाओं में सम्मिलित व् उत्तीर्ण होतें हैं. तमिलनाडु में तथाकथित और पूर्वाग्रही विरोध के कारण भले ही शासकीय शिक्षण संस्थानों में हिंदी की उपेक्षा हो रही हो, किन्तु कई निजी संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई जारी है, और इनकी परीक्षाओं में छात्रों की संख्या लाखों में रहती है। जनसामान्य में असंतोष है कि निजी विद्यालयों में पढ़नें वाले बच्चे तो हिंदी पढ़कर अपनी रोजगार की संभावनाएं प्रबल कर लेतें हैं किन्तु शासकीय विद्यालयों के विद्यार्थी हिंदी पीछे रह जातें हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी को आजीविका का साधन विकसित करनें का एक प्रबल माध्यम माननें का ही परिणाम है कि यहाँ कई सेवाभावी संस्थाएं निःशुल्क हिंदी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन निरंतर कराती रहतीं हैं। मुम्बईया हिंदी फिल्मों और हिंदी गीतों की लोकप्रियता के कारण भी हिंदी अब दक्षिणी राज्यों में एक सहज सामान्य रूप से बोली सुनी जानें लगी है। आज हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से दसियों बड़े और कई छोटे हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित हो रहें हैं। यहाँ यह कतई न समझा जाए कि दक्षिण भारत में हिंदी का चलन कुछ दशकों की देन है! दक्षिण के सभी राज्यों में हिंदी का अपना दीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है, दो सौ वर्ष पूर्व भी केरल में ‘स्वाति तिरुनाल’ के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) ने हिंदी की कालजयी कृतियाँ रचीं थी जो वहां के जनजीवन में अब भी परम्परागत रूप से आदर पूर्वक बोली सुनी जाती हैं. दशकों पूर्व से कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से ‘युग प्रभात’ नाम के अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी पत्र  और हिंदी विद्यापीठ (केरल) से ‘संग्रथन’ मासिक पत्रिका और कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से “हिंदी प्रचार वाणी” का प्रकाशन हो रहा है। हिंदी समर्थक पहल को वापिस लेनें के स्थान पर आज अधिक आवश्यक हो गया है कि दक्षिण के जनसामान्य की भावनाओं को न समझनें वालें और अनावश्यक हिंदी विरोध की राजनीति करनें वालों के प्रति कठोर रूख रखा जाए और ऐसे असंतोष उपजा रहे दक्षिणी नेताओं पर कठोरता से अंकुश भी लगाया जाए।

कहीं भी कोई क्षेत्र महानगर का स्वरूप ले पाता है, जब उनमें सह-अस्तित्व की भावना हो। बेंगलुरु ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया। आप याद कर सकते हैं,बरसों पहले शिवसेना ने किस तरह दक्षिण भारतीयों और हिंदी भाषियों को जलील करने की कोशिश की थी, पर वह सिरे से नाकाम रही। कोलकाता और चेन्नई में भी कभी हिंदी विरोध का दावानल फूटा करता था, पर अब वह अतीत का किस्सा है। राजनेता बंबई को मुंबई, बंगलोर को बेंगलुरु, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता या गुड़गांव को गुरुग्राम बना सकते हैं, मगर सिर्फ बोर्ड पर नया नाम पोत देने से शहरों की आत्मा नहीं बदला करती।

1991 के आर्थिक उदारीकरण की बड़ी देन है। इससे हिन्दुस्तान में कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा मिला और नई तकनीक के आगमन से बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम, नोएडा जैसे ‘हब’ विकसित हुए। इन उभरते महानगरों का विकास यह भी जताता है कि हमें अपने मानसिक अवरोधों से मुक्ति पाने की कितनी जरूरत है? हर नया आगंतुक अपने साथ अपनी संस्कृति के मूल तत्व लेकर आता है और जहां जा बसता है, वहां उसके पौधे रोपता चलता है।
आप गौर करें, तो पाएंगे कि इधर हिंदी ने अन्य भाषाओं के शब्द बड़ी तेजी से ग्रहण किए हैं। यही हाल अन्य भारतीय भाषाओं का है। जरूरत है, तो बस इसमें तेजी लाने की, क्योंकि भाषा अलगाव के अवरोधों को सबसे पहले खत्म करने की क्षमता रखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि अँग्रेजी अपने प्रसार का एक माध्यम भर होना चाहिए…मगर इसके साथ जरूरी है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ साथ आएँ, एक दूसरे के साथ चलें, एक दूसरे की शाब्दिक, साहित्यिक, सामाजिक विरासत को खुले दिल से अपनाएँ तो हिंग्लिश खुद ही खत्म हो जाएगी। हिन्दीवालों को समझना होगा कि हिन्दी सिर्फ हिन्दी प्रदेश की भाषा नहीं है और उसका अस्तित्व और विकास भी अन्य भारतीय भाषाओं और उसकी तमाम बोलियों के साथ जुड़ा है। जाहिर सी बात है कि अगर आप राष्ट्रभाषा बनने की बात करते हैं तो वह संकुचित हृदय, शुद्धिवादिता की जिद के साथ नहीं होगा। भारतीय भाषाओं और हिन्दी को एक दूसरे के साहित्य को अपने पाठ्यक्रमों में जगह देनी होगी। मुझे विश्वास है कि अपने भाषायी क्षेत्र में तमाम बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं को जगह देकर हिन्दी जन – जन की भाषा बन सकती है और वह बनेगी, जरूर बनेगी।

 

सागर परिक्रमा पर निकलीं नेवी की 6 महिलाएं

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भारतीय नौसेना की महिला टीम सोमवार को दुनिया की सागर परिक्रमा पर निकली। देश की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे देश के लिए ऐतिहासिक दिन करार दिया।

रक्षामंत्री ने यहां बोट पूल के पास से आईएनएस मंडोवी से भारतीय नौसेना के इस तरह के पहले अभियान ‘नविका सागर परिक्रमा’ को हरी झंडी दिखाई। लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में छह महिला सदस्यों का दल स्वदेशी निर्मित बोट आईएनएस तारिणी में दुनिया की समुद्री परिक्रमा करेंगी।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सीतारमण ने कहा, ‘यह ऐसा मौका नहीं है जो पांच या दस साल में आता है। यह भारत के लिए और नौवहन के क्षेत्र में ऐतिहासिक दिन है। मैं समझती हूं कि हमारी महिला नौसैनिकों वह काम कर रही हैं जो अधिकतर नौसेना सोच भी नहीं सकती है।

इस अवसर पर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर और नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा भी मौजूद थे। सीतारमण ने पूर्व रक्षामंत्री मनोहर परिकर को ‘प्रेरणादायक राजनीतिक गुरु’ बताया।

165 दिन की होगी समुद्र परिक्रमा
नौसेना प्रमुख लांबा ने कहा कि यह पहली बार है कि भारतीय महिला चालक दल इस प्रकार के समुद्री परिक्रमा अभियान पर निकली हैं। लांबा ने कहा, ‘यह समुद्री परिक्रमा करीब 165 दिन की होगी। इस यात्रा में आईएनएस तारिणी ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फॉकलैंड और दक्षिण अफ्रीका भी के बंदरगाह से होकर गुजरेगी।’ इस दल में ले. कमांडर जोशी के अतिरिक्त ले. कमांडर प्रतिभा जामवाल, ले. पी. स्वाति, ले. विजया देवी, ले. पायल गुप्ता और ले. बी ऐश्वर्या शामिल हैं।

यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिला क्रू-मेंबर को बधाई देते हुए ट्वीट किया कि ‘आज बेहद खास दिन है। नेवी की 6 महिला क्रू-मेंबर आइएनएसवी के जरिए सागर परिक्रमा पर निकली हैं। पूरे देश को एक साथ मिलकर इस टीम का हौंसला बढ़ाना चाहिए।’

 

शहीद की पत्नी बोलीं- पति की शहादत पर मेरी आंखों से बहे थे फक्र के आंसू

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मेरे पति ने जिस दिन देश के लिए प्राणों की न्यौछावर किया था, उस दिन मेरी आंखों से आंसू जरूर बहे थे, लेकिन वह फक्र के आंसू थे। दु:ख के साथ ही मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरे पति की मौत पर पूरा देश फक्र महसूस कर रहा है। यह कहते हुए वयोवृद्ध रसूलन बीबी की लड़खड़ाती आवाज कुछ देर के लिए बंद हो गई और गला रूंध गया।

उन्होंने इशारों ही इशारों में बहुत कुछ कहा। हर साल दस सितंबर को वीर अब्दुल हमीद का शहादत दिवस धामूपुर स्थित शहीद पार्क में मनाया जाता है। अब्दुल हमीद के पौत्र जमील आलम ने बताया कि 26 जनवरी 1966 को जब राष्ट्रपति राधा कृष्णनन ने भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से जब मेरे बाबा अब्दुल हमीद को नवाजा तो गर्व से मेरे परिवार का सिर ऊंचा हो गया।

कहा कि मेरे पति वीर अब्दुल हमीद की शहादत दिवस तो हर वर्ष मनाई जाती है, लेकिन इस बार के कार्यक्रम में आने वाले मुख्य अतिथियों को दिल से आभार व्यक्त किया। अंतत: इशारों में खुशी बयां करते हुए रसूलन बीबी की आंखें सजल हो गई।

सेना में शामिल हुईं स्वाति महादिक तथा निधि दूबे

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साहस का अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हुए शहीद कर्नल संतोष महादिक की पत्नी आज 11 महीनों का कठिन प्रशिक्षण हासिल करने के बाद सेना में अधिकारी के तौर पर शामिल हो गयीं। उनके साथ एक अन्य महिला निधि दूबे भी सेना में शामिल हुईं। दो साल पहले जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए कर्नल महादिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

38 साल की स्वाति महादिक दो बच्चों की मां हैं और आर्मी ऑर्डनेंस कोर ने उन्हें सेना में अधिकारी के रूप में शामिल किया।
उनके पति कर्नल महादिक को वीरता के लिए सेना मेडल दिया गया था। उनकी नवंबर, 2015 को उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंक विरोधी अभियान में मौत हो गयी थी।
कर्नल महादिक सेना के 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज के अधिकारी थे और उनके सहकर्मियों के अनुसार वह हमेशा आगे बढ़कर नेतृत्व करने के लिए जाने जाते थे।
स्वाति अपने पति के पदचिह्नों का पालन करते हुए पिछले साल अक्तूबर में सेना के अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) का हिस्सा बनी थीं।
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम सार्वजनिक ना करने के अनुरोध के साथ कहा, ‘‘चेन्नई में ओटीए में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद स्वाति महादिक को आज अधिकारी के तौर पर सेना में शामिल कर लिया गया।’’ उन्होंने बताया कि स्वाति पुणे में आर्मी ऑर्डनेंस कोर का हिस्सा होंगी।
निधि दुबे नाम की एक और महिला आज अधिकारी के तौर पर सेना में शामिल हुईं। निधि ने अपने पति को खो दिया जो सेना में नायक थे।

 

लेखक बने नवाजुद्दीन सिद्दीकी

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नयी दिल्ली :बड़े पर्दे पर अपने अभिनय का जौहर दिखाने के बाद अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अब हाथों में कलम थाम ली है।

‘‘एन आर्डिनरी लाइफ : ए मेमॉयर’’ पुस्तक को अभिनेता ने पत्रकार एवं लेखिका रितुपर्णा चटर्जी के साथ मिलकर लिखा है।
अभिनेता ने इस किताब में अपने जीवन के अन्छुए पहलुओं और शोहरत की गलियों तक पहुंचने के अपने सफर को बयां किया है।
नवाजुद्दीन ने आज सोशल मीडिया पर पुस्तक की एक तस्वीर साझा करते हुए अपने प्रशंसकों से पहले से ही पुस्तक का आर्डर करने की अपील की।
उन्होंने लिखा, ‘‘और अब समय है एक नयी भूमिका निभाने का। ‘‘एन आर्डिनरी लाइफ : ए मेमॉयर’’ के लेखक के रूप में, रितुपर्णा चटर्जी के साथ।’’ पुस्तक के कवर पर नवाजुद्दीन नजर आ रहे हैं और लिखा है ‘‘कोई नहीं जानता कि एक किसान की संतान को इंडस्ट्री (फिल्म) में आने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। जिंदगी में यह हासिल करना, केवल एक दूरस्थ सपना ही हो सकता है।’’ किताब के अक्तूबर में बाजार में आने की संभावना है।

 

रेलमंत्री पीयूष गोयल का दावा, एक साल में सभी मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग होंगी खत्म

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कोलकाता : नवनियुक्त रेलमंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि देश में सभी मानवरहित रेलवे क्रॉसिंगको खत्म करने के लक्ष्य को एक साल के भीतर हासिल कर लिया जाएगा।

शुरुआत में इसे तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। आईआईएम-कलकत्ता के एक कार्यक्रम में रेलमंत्री ने कहा कि, रेलवे में सभी मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग को तीन साल में खत्म करने का लक्ष्य रखा था लेकिन मैंने उन्हें कहा है कि हम इसे एक साल में क्यों नहीं कर सकते हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश में करीब पांच हजार मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग हैं। इनसे कुल 30 से 35 फीसदी रेल दुघर्टनाएं होती हैं। इन्हें अगले एक साल में खत्म करने की जरूरत है। उन्होंने रेल की पटरियों को मैनुअल रख-रखाव कम करने के लिए तकनीक के प्रयोग की वकालत की। रेल पटरियों के मैनुअल रख-रखाव में अधिक मैनपावर की जरूरत होती है।

 

‘महिला को छम्मकछल्लो कहना उसका अपमान’

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ठाणे, : हिंदी भाषा के शब्द ‘छम्मकछल्लो’ का इस्तेमाल बॉलीवुड के गाने में तो आपको लुभावना लग सकता है लेकिन असली जिंदगी में इस शब्द का इस्तेमाल करने पर आप कानूनी परेशानी में फंस सकते हैं। ठाणे की एक अदालत ने कहा है कि इस शब्द का इस्तेमाल करना ‘‘एक महिला का अपमान करने’’ के बराबर है।

शाहरूख खान अभिनीत फिल्म ‘रॉ वन’ के एक हिट गाने में इस शब्द का इस्तेमाल हो चुका है।एक मजिस्ट्रेट ने पिछले सप्ताह शहर के एक निवासी को ‘‘अदालत के उठने तक’’ साधारण कैद की सजा सुनाई थी और उसपर एक रूपए का जुर्माना लगाया था।

आरोपी के एक पड़ोसी ने उसे अदालत में घसीटा था। पड़ोसी महिला की शिकायत के अनुसार, नौ जनवरी 2009 को जब वह अपने पति के साथ सैर से लौट रही थी, तब उसे एक कूड़ेदान से ठोकर लग गई। महिला ने कहा कि यह कूड़ेदान उक्त आरोपी ने सीढ़ियों पर रखा था।

आरोपी इस दंपति पर चिल्लाने लगा और उन्हें कई चीजें कहने के बीच उसने महिला को ‘‘छम्मकछल्लो’’ कहकर पुकारा। इस शब्द से गुस्साकर महिला ने पुलिस से संपर्क किया लेकिन पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया। तब महिला ने अदालत का रूख किया।

आठ साल बाद, न्यायिक मजिस्ट्रेट आर टी लंगाले ने उनके मामले को उचित ठहराते हुए कि आरोपी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 509 :शब्द, इशारे या किसी गतिविधि से महिला का अपमान: के तहत अपराध किया है।

मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह एक हिंदी शब्द है। अंग्रेजी में इसके लिए कोई शब्द नहीं है। भारतीय समाज में इस शब्द का अर्थ इसके इस्तेमाल से समझा जाता है। आम तौर पर इसका इस्तेमाल किसी महिला का अपमान करने के लिए किया जाता है। यह किसी की तारीफ करने का शब्द नहीं है, इससे महिला को चिढ़ होती है और उसे गुस्सा आता है।’’

 

तलाक के खौफ से आजाद शाजदा ने शौहर को भेजा ‘खुला’

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अब मुस्लिम महिलाएं तलाक  के खौफ से बाहर निकलकर खुला (जब बीवी शौहर को तलाक दे) का इस्तेमाल करने से भी नहीं डर रहीं। ताजा मामला राजधानी का है। यहां की शाजदा खातून ने अपने शौहर को खुलानामा भेजा है।

बाकायदा मीडिया के सामने शाजदा ने 12 साल के निकाह को तोड़ने का एलान किया। शाजदा ने कहा-जिंदगी दुश्वार हो गई थी। अब मैं आजाद हूं। अगर इसके कोई आड़े आता तो मैं और बड़ा फैसला ले सकती थी।

शाजदा का मायका कानपुर के फूलबाग में है। शाजदा ने कहा, 12 साल पहले यानी 2005 में हाता मुस्तफाबाग लालबाग के जुबेर से निकाह हुआ। मैं मध्यमवर्गीय परिवार से थी। शौहर जुबेर अली भी मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। शाजदा का आरोप है कि ससुरालवालों ने निकाह के बाद से ही परेशान करना शुरू कर दिया।

सब सहती रही। सोचा परिवार में सुधार होगा। पर, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कई बार लड़ाई-झगड़ा होने के बाद मायके गई। मायके की माली हालात ऐसी नहीं कि वहां ताउम्र रह सकूं। पर, कितना सहती…।

शाजदा का आरोप है कि जुल्म ज्यादतियों के बीच पति से छुटकारा पाने के लिए नदवा की शरई अदालत में आवेदन किया। पर वहां से खुला की इजाजत नहीं दी गई। इंसाफ के लिए फिरंगी महल की दारुलकजा अदालत में पेश हुई। वहां से भी नाउम्मीदी मिली। लिहाजा मुस्लिम वीमेंस लीग की महासचिव नाइश हसन की मदद ली और शौहर को 6 अगस्त को खुलानामा (तलाकनामा) भेज दिया।

मैं अपना सहारा खुद बनूंगी
जिंदगी कैसे चलेगी इस सवाल पर शाजदा कहती हैं, मैं बीएड हूं। यहां एक निजी स्कूल में पढ़ाती हूं। मैं किसी के भरोसे नहीं रहना चाहती। अपना सहारा खुद बनूंगी। मुझे अपने परिवार (मायके) वालों की मदद करना है। क्योंकि उन्होंने मेरा हर मौके पर साथ दिया।

…तो लेती बड़ा फैसला
शाजदा कहती हैं, अगर खुला के तहत शौहर से छुटकारा न मिलता तो बड़ा फैसला लेती। ये बड़ा फैसला क्या होता, इस सवाल पर वह कहती हैं-मैं इस मसले पर कोई समझौता नहीं करती। सारे रास्ते बंद ही हो जाते तो मजहब ही बदल लेती।

 

गंदगी और  सफाईकर्मियों पर वृत्तचित्र बनाने वाली भारती को धमकियां, 12 केस दर्ज

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चेन्नई. तमिलनाडु की दिव्या भारती को रोज धमकी भरे फोन आ रहे हैं। रेप, एसिड अटैक और हत्या तक की धमकियां दी जा रही हैं। उनके खिलाफ 12 केस दर्ज किए गए हैं। उन्हें राज्य छोड़ने तक पर मजबूर किया गया। आरोप ये है कि उन्होंने जातीय और सामुदायिक नफरत भड़ाकाने की कोशिश की। इन आरोपों के पीछे है, उनकी बनाई एक डॉक्युमेंट्री फिल्म और एक यूट्यूब वीडियो। दरअसल भारती ने तमिल भाषा में एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई है, काक्कूस। इसका मतलब है, टॉयलेट।

भारती के मुताबिक, जिस गंदगी को हम देखना तक नहीं चाहते देश के करीब 8 लाख लोग रोज उसे हमारे लिए अपने हाथों से साफ कर रहे हैं, मेनहोल में उतर रहे हैं। इस गंदगी के बीच ही उनका पूरा जीवन निकल जाता है और इसी में उनकी मौत हो जाती है। यही फिल्म का विषय है।

2013 में सुप्रीम के कोर्ट के आदेश के बाद देश में हाथ से मैला सफाई पर प्रतिबंध है। अगर कोई ऐसा करवाता है तो 5 साल की जेल का प्रावधान है। इसके बावजूद हाथ से मैला साफ करना जारी है।

फिल्म इस साल 26 फरवरी को पहली बार चेन्नई में रिलीज हुई। एक कल्चरल ग्रुप ने इसकी अगली स्क्रीनिंग चार मार्च को नागरकोइल में रखी। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, क्योंकि विरोध के कारण तिरुनेलवल्ली में पुलिस को लगा कि इससे कानून व्यवस्था का संकट पैदा हो सकता है।

इसके बाद कोयम्बटूर में फिल्म का प्रदर्शन होना था, लेकिन इस पर भी रोक लग गई। कई तरह की आपत्तियां इस पर लगाई जाती रहीं। कभी कहा गया कि फिल्म का प्रमाणपत्र  नहीं लिया गया है तो कभी कहा गया कि भारती नक्सली बैकग्राउंड से हैं। लेकिन 13 जुलाई के बाद बड़ा बदलाव आया।

अन्ना यूनिवर्सिटी के 15 सेनेटरी कर्मचारियों ने डीन के खिलाफ पुलिस में अमानवीय व्यवहार की शिकायत की। अगले दिन इन सभी को नौकरी से हटा दिया गया। इन लोगों ने यूनिवर्सिटी के गेट पर प्रदर्शन शुरू किया तो पुलिस ने इन्हें खदेड़ दिया।

#वीडियो यूट्यूब पर अपलोड

– भारती बताती हैं, जब उन्हें यह पता चला तो उन्होंने इन कर्मचारियों से बात की और उसका वीडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया। कुछ ही दिनों में इसे 8 हजार व्यू मिले। इसके बाद उन्हें लोगों के धमकी भरे फोन आने लगे और वीडियो हटाने की चेतावनियां दी जाने लगीं।

26 जुलाई को भारती को मदुरै के पुलिस कमिश्नर के आफिस से फोन आया और उन्हें ऑफिस आने के लिए कहा गया। वे इसके लिए राजी भी हो गईं, लेकिन इसके पहले कि वे पहुंचती पुलिस उनके घर पहुंची और गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी 2009 के एक केस में बताई गई। तब भारती मदुरै के लॉ कॉलेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट थीं। हॉस्टल के एक स्टूडेंट की सांप के काटने से मौत हो गई थी और स्टूडेंट्स ने उसके परिवार को मुआवजा देने के लिए आंदोलन किया था।

आठ साल बाद इस केस को रहस्यमयी तरीके से भारती के लिए निकाल लिया गया। हालांकि उसी दिन उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। अगले दिन दलित पल्लर कम्युनिटी की रिप्रेजेंटेटिव पुथिया तमिलागम राजनीतिक पार्टी के नेता के कृष्णास्वामी ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी किया और कहा कि काक्कूस से उनके समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं। भारती ने 29 जुलाई को पुलिस में शिकायत की। भारती बताती हैं कि इसके बाद से लगातार धमकी भरे फोन आ रहे हैं।

#काक्कूस नाम रखने के पीछे की घटना

भारती कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी हैं और एक बार 2015 में वे एक विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं थी। सीवर की सफाई के दौरान दो सफाई कर्मियों की मौत हो गई थी। इसी दौरान उन्हें एक समस्या पर फिल्म बनाने का विचार आया था।

फिल्म का नाम काक्कूस रखने के पीछे वे घटना बताती हैं। बात 2016 की है। उन्होंने फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी थी। बालमुरुगन नाम के एक सफाईकर्मी की सेप्टिक टेंक में सफाई के दौरान जहरीली गैसे से मौत हो गई थी। उसकी दो बेटियां थी। जब भारती उसके परिवार से मिलने पहुंची तो पता चला कि लोग इन सफाईकर्मियों के बच्चों को काक्कूस कहकर बुलाते हैं। इसके बाद उन्होंने फिल्म का नाम काक्कूस कर दिया।

#दो चेन गिरवी रखीं

भारती के पति काला गोपाल ने फिल्म बनाने में उनकी मदद की। संसाधन के नाम पर उनके पास 9 हजार रुपए का कैमरा था। 30 हजार रुपए का लोन लेने के लिए उन्होंने अपनी दो चेन गिरवी रखीं। इसके अलावा 30 हजार रुपए क्राउड फंडिंग से जुटाए। दो वर्षों तक तमिलनाडु भर में घूमे और सफाई कर्मचारियों से बात की। इस दौरान 25 शहरों और कस्बों में वे गए।

भारती बताती हैं कि फिल्म की शूटिंग के दौरान कई बार गंदगी देखकर उन्हें उल्टी तक हो जाती थी। 14 जून को यू्ट्यूब पर जारी होने के बाद से अब तक इस फिल्म को करीब चार लाख बार देखा जा चुका है। अंग्रेजी सबटाइटल के साथ जारी फिल्म का सब्जेक्ट है- सीवरेज, मेनहोल और टॉयलेट की सफाई करने वाले लोगों का जीवन।