कोलकाता : नीलांबर संस्था द्वारा लिटरेरिया के तीसरे संस्करण का आयोजन 13 दिसंबर से 15 दिसंबर 2019 के बीच होने जा रहा है । नीलांबर का यह वार्षिकोत्सव है जिसका प्रमुख लक्ष्य देश भर के कवियों, आलोचकों, नाटककारों एवं कलाकारों को एक मंच पर लाकर साहित्यिक माहौल बनाना है । पहले दिन का आरम्भ बिदिशा बनर्जी सान्याल द्वारा सितारवादन से होगा। इस दिन ‘मिथ, फैंटेसी और यथार्थ’ विषय को केंद्र में रख कर आयोजित सेमिनार में वक्ता के रूप में सुधीर चंद्र, डॉ शम्भुनाथ, विजय कुमार, प्रियंकर पालीवाल, प्रकाश उदय, आशीष त्रिपाठी, अशोक कुमार पांडेय, डॉ विनय कुमार, अच्युतानंद मिश्र और श्रुति कुमुद अपनी बात रखेंगी I इसके बाद लोगों के मनोवैज्ञानिक पृष्टभूमि को लेकर अपनी बातें रखेंगे डॉ.स्कन्द शुक्ल और डॉ. विनय कुमार। दिन के अंत में विमलचंद्र पाण्डेय और संदीप मिश्र द्वारा निर्देशित फिल्म ‘होली फिश’ दिखाई जाएगी। दूसरे दिन की शुरूआत नंदन में अनिर्बान बसु के बांसुरी वादन से होगी । तदुपरांत ‘कला: सत्य, यथार्थ और संसार’ विषय पर आयोजित संवाद सत्र में हिस्सा लेंगे मृत्युंजय कुमार सिंह, भरत प्रसाद, चन्दन पांडेय और गीता दूबे I इस दिन का मुख्य आकर्षण देश भर से आये हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के कवियों का कविता पाठ होगा जिसमें ज्ञानेंद्रपति, जय गोस्वामी, विजय कुमार, केशव तिवारी, अनिता भारती, डॉ. विनय कुमार,अशोक कुमार पांडेय, यशोधरा राय चौधुरी, अनिल अनलहातु, अरुण देव, अमिताभ बच्चन, प्रकाश उदय, आशीष त्रिपाठी, भरत प्रसाद, दासू बैद्य, विनोद विट्ठल, शैलजा पाठक, विश्वासी एक्का, अविनाश दास, अच्युतानंद मिश्र, श्रुति कुशवाहा, श्वेता राय, संजय राय, सुघोष मिश्र, अमिताभ रंजन कानू अपनी कविताओं का पाठ करेंगे I कविता पाठ के बाद ‘मिथक की स्त्री और स्त्री का मिथक’ विषय पर संवाद सत्र होगा जिसमें राजश्री शुक्ला, गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ और अनिता भारती हिस्सा लेंगी । अंत में नीलांबर द्वारा निर्मित, एवं ऋतेश पांडेय द्वारा निर्देशित लघु फिल्म ‘गोष्ठी’ और ‘ज़मीन अपनी तो थी’ दिखाई जाएगी तथा फिल्म को लेकर अविनाश दास, चन्दन पांडेय एवं कैलाश मिश्रा अपनी बात रखेंगे I
तीसरे दिन का आरंभ ‘कविता के उपादान : फैंटेसी और यथार्थ’ विषय पर संवाद के साथ होगा जिसमें ज्ञानेन्द्रपति, प्रियंकर पालीवाल, नील कमल और अरुण देव हिस्सा लेंगे I इसके बाद गाँधी : मिथ, यूटोपिया और यथार्थ विषय पर आयोजित संवाद सत्र में प्रेमपाल शर्मा, पराग मांदले, अल्पना नायक और रश्मि भारद्वाज हिस्सा लेंगी I समापन सत्र विद्या मंदिर में आयोजित होगा जिसमें गीत-संगीत, नृत्य एवं कविता कोलाज की प्रस्तुति की जाएगी। इस अवसर पर निनाद सम्मान’ स्कंद शुक्ल को एवं ‘रवि दवे सम्मान’ उषा गांगुली को दिया जाएगा। अंत में असीमा भट्ट द्वारा निर्देशित एवं अभिनीत नाटक ‘द्रौपदी’ का मंचन होगा। यह जानकारी आज प्रेस क्लब में नीलाम्बर संस्था द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से दी गयी जहाँ संस्था के अध्यक्ष यतीश कुमार, सचिव ऋतेश पांडेय एवं उपसचिव द्वय आनंद गुप्ता और स्मिता गोयल मौजूद थीं।
साहित्य, शिक्षा और साधना के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान और उपलब्धियों के लिए डॉ. किरण सिपानी एजीसी बोस कॉलेज की पूर्व विभागाध्यक्ष और जैन कॉलेज में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी, साहित्यिकी पत्रिका और जैन धर्म के मर्म का मनन करने वाली विदुषी को कोलकाता की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था “विचार मंच” द्वारा फूल कुँवर कांकरिया सम्मान से 8 दिसंबर 2019 को अलंकृत किया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय से 1971 में हिन्दी में स्वर्ण पदक से विभूषित अपने जीवन में पहले घर और परिवार को महत्व देने वाली डॉ. किरण सिपानी ने अपभ्रंश भाषा के जैन कवि स्वयंभू के महाकाव्य “पउम चरियु” रामायण पर शोध कार्य किया जो हिन्दी के सेतु के रूप में विशेष महत्व रखता है, सहसंपादन – स्मरण को पाथेय बनने दो (इलारानी सिंह पर संस्मरण), विचार सरणी (निबंध संग्रह), विविध लेखन कविता, लघुकथा, पुस्तक समीक्षा और साहित्यिकी संस्था कोलकाता की बीस वर्षों से सचिव और संचालन, कोलकाता के प्रमुख संस्थाओं जैसे हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थान, लोकसेवा आयोग पश्चिम बंगाल, कल्याणी विश्वविद्यालय, सेंटजेवियर्स विश्वविद्यालय, डे होम फॉर गर्ल्स स्टूडेंट्स, मारवाड़ी युवा मंच उत्तर कोलकाता, श्री श्वेतांबर स्थानक वासी जैन सभा, उदयरामसर प्रवासी संघ से सक्रिय एवं ताजा टीवी, दूरदर्शन और आकाशवाणी पर आपके विचारों से बराबर साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रसारण। शिक्षा, सेवा और साधना के क्षेत्र में डॉ. सिपानी की जीवन यात्रा घर से आरंभ होकर व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होती है। सरल और कठिन दोनों ही डगर को सहजता और सजगता से लेना आपको संपूर्ण स्त्री की पहचान देता है। अपनी नयी सोच और कर्म को नया आयाम देने वाली विदुषी डॉ किरण सिपानी से डॉ वसुंधरा मिश्र ने उनकी जीवन यात्रा के विविध पहलू जाने । शुभजिता में प्रस्तुत है यह साक्षात्कार –
आप पिछ्ले 40 वर्षों से अध्यापन और साहित्य कर्म से जुड़ी हुई हैं। एक शिक्षक के रूप में आपकी यह यात्रा कैसी रही?
अध्यापन के चालीस वर्ष विभिन्न विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए बहुत ही शानदार ढंग से बीते। अध्यापन मेरे लिए जुनून रहा है । अपने स्कूल के सहपाठियों के साथ पढ़ कर भी मुझे आनंद मिलता था। अपने व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर मेरे घरेलू काम करने वाली को भी शिक्षित करती थी । तीन डिग्री कॉलेज में पढ़ाने के अतिरिक्त मैंने अपने मौहल्ले में के जी से लेकर बीए तक के बच्चों को सामाजिक सेवा के रूप में पढ़ाया। 28 वर्षों तक मैंने आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज पढ़ाया। इस कॉलेज में हिन्दी आनर्स देर से आरम्भ हुआ।मेरे अंदर आरंभ से ही उच्च विषयों को पढ़ाने की ललक रही। कलकत्ता विश्वविद्यालय में मुझे एमए के विद्यार्थियों को पढ़ाने का अवसर मिला। हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थान ने प्रत्येक रविवार को उच्च कक्षाओं के विषय पढ़ाने के लिए बुलाया जो सामाजिक सेवा के रूप में था। अपने पारिवारिक कार्यों में से समय निकाल कर प्रत्येक रविवार को हनुमान मंदिर में 12-5 बजे तक 22 वर्षों तक सेवाएं दीं। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की पिरीयडिकल टीचिंग सेंटर कलकत्ता में प्राइवेट एमए के विद्यार्थियों को वर्षों तक पढ़ाया। इसके लिए रात भर परिश्रम कर पाठ्यक्रमों को तैयार किया। वहां कुछ विद्यार्थी मेरे मेरे हम उम्र या मुझसे बड़े थे जिनसे अभी तक मेरा प्रत्यक्ष संपर्क है। उन्हें बनाने और गाइड करने का अवसर मिलता रहता है। उनकी आंखों की चमक से मेरी बैटरी भी ऊर्जा से भर जाती है। अध्यापन ने मेरी बाह्य दृष्टि को जहाँ विस्तार दिया वहीं धीरे-धीरे अधिक साहसी और मजबूत बनाया। मैं मेरे विद्यार्थियों के लिए ही काउंसिलर नहीं हूँ बल्कि मेरे पारिवारिक सदस्यों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हूँ। प्र. इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त हुई?
आरंभ से ही मैं अच्छी विद्यार्थी थी। मेरी माँ मेरे बड़े भाई ने मुझे स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए प्रेरित किया। मेरे सहृदय पिता ने विरोध किया। वे मुझे इसलिए उच्च शिक्षा नहीं दिलवाना चाहते थे क्योंकि हमारे समाज के लड़के अधिक शिक्षा नहीं प्राप्त करते थे। पिता जी नहीं चाहते थे कि मुझसे कम पढ़े लिखे लड़के से मेरा विवाह हो। मैंने उनको विश्वास दिलाया कि मैं यदि एमए करती हूँ तो भी मुझे ग्रैजुएट लड़के से विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं होगी।मेरे पिता ने उच्च शिक्षा के लिए स्वीकृति दे दी। मैंने भी विवाह के समय अपनी प्रतिज्ञा निभाई और स्नातक व्यवसायी लड़के से विवाह किया। दोनों ही परिवारों में मैं पहली स्नातकोत्तर बेटी और बहू हूँ। प्रोफेशन के विषय में तो सोचने की कोई बात ही नहीं थी। मेरे अंदर कुछ करने की आग बराबर जल रही थी कि मैं अपने बारे में कुछ फैसला करुं। इस साहस को मेरे शिक्षक स्वर्गीय डॉ. प्रबोधनारायण सिंह और मेरी माँ एवं सास ने बड़े प्रोफेशनल कार्य के लिए प्रेरित किया। प्र. आपके इस खजाने में निश्चित ही असंख्य अविस्मरणीय स्मृतियाँ हैं। कुछ स्मृतियों को हमसे साझा करें?
दो घटनाओं को आपसे बांटना चाहूंगी। कक्षा 9-10 के विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य पढ़ने की बहुत इच्छा हुई क्योंकि उन्हें क्विज प्रतियोगिता में भाग लेना था। उस समय मैं शिक्षायतन कॉलेज में थी। मैंने उन्हें तैयारी करवाई। मेरे विद्यार्थियों ने बीए अॉनर्स के विद्यार्थियों के साथ हुई इस प्रतियोगिता में ट्राफी जीता जो मेरे लिए गौरव की बात थी। दूसरी घटना मेरे प्रथम हिन्दी ऑनर्स बैच से संबंधित है। जैसा मैंने बताया कि एजीसी बोस कॉलेज में ऑनर्स कोर्स देर से शुरू हुआ संभवतः बीस वर्षों बाद, उस समय मेरे विभाग में हमलोग चार प्रोफेसर ही थे। प्रथम वर्ष के बाद विद्यार्थी कॉलेज के बाहर प्राइवेट ट्यूशन लेने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने उन्हें हतोत्साहित नहीं किया और आश्वासन दिया कि जो विषय उन्हें समझ में नहीं आ रहा है, मैं व्यक्तिगत रूप से उसे पढा़उंगी। सेलेक्शन टेस्ट के बाद उन्होंने मुझे विषय की लिस्ट दे दी। मैने दिन-रात कठिन परिश्रम करके सभी विषयों को तैयार किया। आप विश्वास नहीं करेंगी कि उनका यूनिवर्सिटी एक्जाम संभवतः 20 अप्रैल से शुरू हुआ था और मेरी विशेष कक्षाएं 20 अप्रैल तक ली।ये कक्षाएं मैने 12-5 बजे तक कुछ दिनों तक लगातार ली। जबकि अन्य विभाग के लोग विद्यार्थियों से परेशान हो रहे थे, यहां तक कि उन विभागों में नियमित कक्षाएं भी नहीं हो रही थीं। कॉलेज के इतिहास में सेलेक्शन टेस्ट के बाद सबसे पहले मॉक टेस्ट मैंने करवाया।मेरी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा जब रिजल्ट आया, हमारे विद्यार्थी यूनिवर्सिटी एक्जाम में तृतीय स्थान पर रहे। प्र. आपके कार्यक्षेत्र में आपकी महत्वपूर्ण उपलब्धि कौन-सी है?
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी संस्कारित माँ थीं जिन्हें जीवन में स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला। मुझे ऑलरांउडर प्राइज़ और विशेष अवार्ड “लीला मेमोरियल अवार्ड” 1965-66 में मिला। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने 1969-71 में हिन्दी में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर” स्वर्ण पदक” मिला।पीएच-डी डिग्री के अवार्ड के समय भी मैं बहुत रोमांचित थी। उस समय मेरे ऊपर संयुक्त परिवार के दायित्वों के कारण पीएच-डी जमा करने की दो बार तारीखें भी निकल गई थीं। मेरी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या बहुत अधिक नहीं है लेकिन भविष्य में आशा करती हूँ कि कुछ पुस्तकें प्रकाशित होगीं। साहित्यिकी संस्था की सचिव और अध्यक्ष रही जो महिलाओं की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था है।वर्षों तक असंख्य यादगार कार्य किए। जब मेरे स्कूल मारवाड़ी बालिका विद्यालय ने सौ वर्ष पूर्ण होने पर उत्सव के दौरान मुझे 3 सितम्बर 2019 को सम्मानित किया उस समय मैं खुशी से भर गई थी। विचार मंच की आभारी हूँ जो मुझे 8 दिसम्बर 2019 को “फूल कुमारी कांकरिया शिक्षा सेवा साधना सम्मान 2019” प्रदान कर रहा है। ये मेरे लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियां है। प्र. आपने अपने पूरे कॅरियर में हिन्दी भाषा को समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में आपका शोध कार्य कितना सहायक रहा, इस पर प्रकाश डालें।
मेरा शोध कार्य अपभ्रंश से संबंधित है। अपभ्रंश को आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी माना जाता है। साधारणतया लोग समझते हैं कि संस्कृत भाषा हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि की जननी है लेकिन यह सही नहीं है, संस्कृत तो बड़ी दादी है। मैंने अपभ्रंश राम महाकाव्य” पउमचरिउ” चुना जिसके रचयिता स्वयंभू हैं जो अपभ्रंश के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, शोध कार्य किया। महाकाव्य के गुणों को प्रकाश में लाते हुए उसकी काव्य परंपरा और भाषीय संवेदनाओं को प्रकाशित करते हुए माँ अपभ्रंश को किस प्रकार बेटी हिंदी ने ग्रहण किया, इसे व्यक्त किया। हाँ! शोध निदेशक के रूप में मेरा अनुभव नहीं रहा। मेरे समय कॉलेज के शिक्षकों को शोध निदेशक बनने की अनुमति नहीं थी जबकि आज है। प्र. वर्तमान समय में हिन्दी अध्यापन कार्य और उसे सीखना किस प्रकार प्रासंगिक है?
आज सीखने के बहुत से नए विषय और रास्ते खुल गए हैं। इसलिए अकादमिक क्षेत्रों में हिन्दी पढ़ने और सीखने की ललक के प्रति कमी आ गई है।जैसे कि पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के कारण उनका आकर्षण प्रोफेशनल विषयों को सीखने की ओर बढ़ रहा है। हिन्दी माध्यम के स्कूल अंग्रेजी माध्यम में बदलते जा रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों से आशा नहीं कर सकते कि वे हिन्दी को समझे और हिन्दी से प्रेम करें। उनके अभिभावक भी उन्हें प्रेरित नहीं करते। समाज में हिन्दी के प्रति प्रशंसा का अभाव है। हिन्दी भाषियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। प्रतिभावान हिन्दी के छात्र हाशिए से बाहर रखे जाते हैं।
दूसरी ओर आजादी के बाद 14 सितंबर 1949 को अनुच्छेद संख्या 343 ने हिन्दी की शक्ति को बढ़ाने का काम किया । सरकारी नौकरियों में बैंक, कानून, सोशल मीडिया, पत्रकारिता और अनुवाद में हिंदी की मांग है। विश्व में बोलने वाली भाषा के रूप में हिंदी द्वितीय स्थान पर संप्रेषित भाषा है। चीनी भाषा मैन्डरिन प्रथम बोलने वाली भाषा है। विश्व के 140 देशों में 500 संस्थाओं में हिन्दी पढ़ाई जाती है। अभी कुछ वर्षों पहले ही मॉरिशस में विश्व भाषा हिन्दी का सेंट्रल हिंदी सेक्रेट्रिएट खोला गया है। मैं हिंदी के प्रति आशान्वित हूँ, मैं उसे मरती हुई भाषा नहीं मानती। प्र. पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में कुछ परिवर्तन हुए हैं। आप किसे ठीक समझती हैं और उनमें से कुछ में सुधार करने के विषय में क्या सोचती हैं?
इंटर डिसिप्लीन कॉरिकुलम के अंतर्गत नयी शिक्षा नीति ने वास्तव में शिक्षकों और विद्यार्थियों को अपने खोल से निकलने और नई सोच विस्तार करने का नया आयाम दिया है। नए सेमेस्टर सिस्टम ने विद्यार्थियों की परेशानियों को कम किया है। वस्तुतः ज्ञान के दायरे में विस्तार हुआ है लेकिन इससे गहन अध्ययन में कमी आई है। शिक्षकों के पास भी ठोस शिक्षा देने के समय बहुत कम है। प्रत्येक व्यवस्था के अच्छे और बुरे दोनों ही पक्ष होते हैं।
मुझे उस समय बहुत खराब लगता है जब विद्यार्थी और यहाँ तक कि शिक्षक भी गलत बोलते और लिखते हैं। मेरे विचार से प्राथमिक स्तर की शिक्षा अच्छी होनी चाहिए।यदि प्राथमिक स्तर मजबूत और अच्छा होगा तो उच्च स्तरीय शिक्षकों को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। फिनलैंड और दक्षिण कोरिया के प्राथमिक स्तर के शिक्षकों को अधिक तनख्वाह दी जाती है अपेक्षाकृत उच्च स्तरीय शिक्षकों के। इस तरह के सुझाव बहस के कई मार्ग खोलते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है हमलोगों को कक्षा दस में एक पृष्ठ का डिक्टेशन दिया जाता था जो मेरी शिक्षा की उपलब्धियों में है। प्र. महिलाओं को बहुत सी विभिन्नताओं और लिंग के आधार पर कार्यक्षेत्रों में असमानताएं झेलनी पड़ती हैं, इस विषय में आप क्या कहेंगी ?
पुरुष और कभी-कभी महिलाएं अपने प्रोफेशनल सेटअप में पुरुष को अधिक सम्मान देती हैं। महिलाएं अपने कार्य को बहुत अच्छी तरह से करती हैं जिसके कारण वे कार्यक्षेत्र में स्वयं को प्रमाणित करती हैं जिसे अक्सर लोग समझ नहीं पाते। उनकी इस अज्ञात शक्ति को पुरुष प्रधान समाज अपने पूर्वाग्रहों के कारण मानते चले आ रहे हैं, कुछ कल्पना में मान लेते हैं और कई लोग नहीं मान पाते, लेकिन इस बात को महिला नहीं जानती। जब कोई उच्च पदस्थ महिला होती है तो वह पुरुषों के झुंड में अकेली होती है। लेकिन जब कोई पुरुष ऊंचे पद पर कार्यरत होता है तो लोगों की धारणा होती है कि वह तो अच्छा है ही। महिला होती है तो उसकी पदोन्नति अवश्य ही विभिन्न कारणों से हुई है क्योंकि लोगों की यही धारणा बन चुकी है। प्र. अध्यापन के अतिरिक्त आपकी रुचियाँ क्या हैं? खाली समय को किस प्रकार बिताती हैं?
अध्यापन के अतिरिक्त खाली समय में मैं विभिन्न अनुभवों से जुड़ी हुई हूँ जिनमें साहित्य, अकादमिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक संगठन और संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़ना है। जिन्हें करके मुझे आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है। 32 वर्षों से साहित्यिक गतिशील रही। हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थान में निःशुल्क शिक्षा सेवाएं प्रदान की। मारवाड़ी युवा मंच, उत्तर कोलकाता की दो वर्षों तक उपाध्यक्ष पद पर सामाजिक सरोकार से जुड़ी रही। आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज के आर्ट्स सेक्शन की गवर्निंग बॉडी मेंबर कोऑर्डिनेटर चयनित थी, प्रायमरी यूनिट कॉन्वेंट और वर्षों तक विभागाध्यक्ष रही।
* सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी और कल्याणी विश्वविद्यालय की बोर्ड स्टडीज की सदस्य रही। 35-30 वर्षों से लोक सेवा आयोग, पश्चिम बंगाल से जुड़ी हूँ।
डे होम फॉर गर्ल्स की दो वर्षों तक गवर्निंग बॉडी मेंबर रही। इसके कारण मुझे लड़की शिशु के लिए अपने कुछ विचारों को लागू करने का अवसर मिला।
* मैं स्वयं को भाग्यशाली मानती हूँ कि श्वेतांबर स्थानक वासी जैन सभा के कार्यक्रमों में कई वर्षों तक सेवा करने का अवसर मिला।
* मेरा झुकाव और शौक शास्त्रीय कंठ संगीत यानी वोकल क्लासिकल गायन में रहा लेकिन कुछ दूसरी रूचियों के कारण मेरी ये इच्छा पूरी नहीं कर सकी। जबकि 1964 में मैनें पश्चिम बंगाल में गायन के प्रथम वर्ष में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।
* मुझे अच्छा खाना बनाना और खिलाना दोनों पसंद है। मेरा एक शौक बुनाई रहा है। कॉलेज की सीढ़ियों पर भी चढ़ना और उतरना मेरा शौक रहा है। मैं बुनाई वाली के रूप में प्रसिद्ध थी।
* मैं इनडोर गेम्स पसंद करती हूँ। फिल्म और नाटक में भी रूचि है। बच्चे कहानी सुनने के लिए मुझे हमेशा घेरे रहते हैं। मैंने बहुत से कार्यक्रम किए हैं। सेमिनार में पेपर पढे़ हैं, दसवें विश्व संस्कृत कॉन्फ्रेंस में पेपर पढा़।
* मैं छोटी कहानियां, लेख, संस्मरण और कविताएं लिखती हूँ। मेरी कविताएं, छोटी कहानियां सामाजिक और साहित्यिक चर्चाएं टीवी और आकाशवाणी से प्रसारित होती हैं।
* मैं लिखने और सिर्फ लिखने के लिए सौ वर्ष जीना चाहती हूँ। प्र. आप विद्यार्थियों को क्या संदेश देना चाहती हैं? अकादमिक और प्रोफेशनल्स को अपनी चुनौतियों का सामना किस प्रकार करना चाहिए?
अपनी इच्छा शक्ति, एकाग्रता, ईमानदारी , सकारात्मक दृष्टिकोण , द्वारा अपनी योग्यता को परखना चाहिए। निरंतर अपने चरित्र, असफलताओं और कार्य योजनाओं को खंगालते रहना चाहिए। जीवन के ये मूल मंत्र हैं। कुछ महत्वपूर्ण बिंदु जिनका अनुकरणीय है – दिल, दिमाग और हाथों से काम करते रहें। अपने से छोटों की सहायता करें जिससे वे विकसित और समृद्ध हो सकें। समाज को सदैव अपनी सेवाएं देना न भूलें । प्र. समाज, परिवार और देश विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में आप महिलाओं को क्या संदेश देंगी?
सुरक्षित जीवन जीने की चाह में खुद को खोकर महिलाएं व्यवस्था की अंग बनती जा रही हैं। उनका ध्यान बाहरी आडंबरों में उलझ कर रह जाता है। देश और दुनिया की घटनाओं के प्रति जागरूक नहीं है। अपनी प्रतिभानुसार अपने दायरे को बढ़ावा देना चाहिए। महिलाओं को देश और देश की मुख्य धारा के मुद्दों में भी सक्रिय भागीदारी से भी जुड़ने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने दायरे को बढ़ाना चाहिए तभी महिलाएं वर्तमान समय में परिस्थितियों से सामना करने में सक्षम हो सकेंगी। प्र. अंत में, आप एक वाक्य में विद्यार्थियों, शिक्षकों, महिलाओं और समाज को क्या कहना चाहेंगी?
दृढ़ संकल्प , चिंतन – मनन – अध्ययन करें और प्रतिभा को सही दिशा में लगायें।
इन दिनों देश में बहुत हलचल है, चिन्ता है, आक्रोश है। सोशल मीडिया से लेकर अखबार के पन्ने और टीवी का परदा इन दिनों गुस्से से भरा नजर आ रहा है। निर्भया के बाद अब हैदराबाद में पशु चिकित्सक के साथ हुई बर्बरता से पूरा देश गुस्से में है। सब दोषियों को सजा देने की माँग कर रहे हैं। निश्चित रूप से सजा तो मिलनी ही चाहिए मगर क्या यह मौका नहींं है कि हम अपने अन्दर भी झाँककर देखें कि हम कहाँ पर खड़े हैं? आखिर यह मानसिकता आती कहाँ से है..आखिर स्त्री को महज शिकार मान लेने की भावना पनपती कहाँ से है? जरा सोचिए और गौर से देखिए कि आखिर गलती कहाँ पर रह गयी…स्त्री जब परदे से बाहर निकल रही है और पुरुष वर्चस्व के सामने खड़ी हो रही है तो वह उसकी सत्ता को चुनौती भी दे रही है और यही तो गवारा नहीं है हमारे आदिम समाज को। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लड़कों को हिंसक बनाता कौन है…कौन उनसे उनकी मनुष्यता छीन रहा है…हमने जिम्मेदारियों के लिए लड़कियों को हमेशा से तैयार किया है। हर क्षण लड़कियों को याद दिलाते रहे हैं कि वह जिस घर में जन्मी है…वह उसका नहीं, उसके भाइयों का है और जिस घर में वह जाने वाली है…वह भी उसका नहीं होता…आप सहने और रहने की जो शिक्षा बेटियों को दी…वह बेटों को कभी दी ही नहीं…मेहमानों के आने पर नाश्ता बेटा भी ला सकता है. यह ख्याल आपके दिमाग में कभी आया ही नहीं। बेटियों को याद दिलाते रहे हैं कि उनको भाई का तो कभी पति का तो कभी बेटे का ख्याल रखना है मगर भाइयों को या पतियों को या बेटों को तो बताया ही नहीं कि इस घर पर उनकी बहनों, पत्नियों और बेटियों का अधिकार है…घर में वर्चस्व आपने हमेशा अपने बेटों का रखा और रहने दिया तो वे सन्तुलन और समानता कहाँ से सीखते? आपने हमेशा से जो सवाल बेटियों से किये, वह कभी बेटों से किये ही नहीं तो वे खुद को कहाँ से जवाबदेह बनाते? इस देश में बेेटों की माँ होना प्रिविलेज की तरह लिया जाता है और औरतें भी इसका लाभ उठाना चाहती हैं क्योंकि बेटों की माँ की तरह सम्मान पाना उनको अच्छा लगता है….आज जब पढ़ी – लिखी औरतें भी इस मानसिकता में जी रही हैं तो दोष किसको दिया जाए..? आपने पराधीनता स्वीकार की और अब पराधीन होना आपको अच्छा लगने लगा है..बहुओं को अब भी बेटों की जीवन संगिनी नहीं बल्कि केयर टेकर बनाकर ला रही हैं आप तो भला किसका हो रहा है…जब तक मानसिकता नहीं बदली जाती और बेटों की परवरिश को संवेदनशीलता से जोड़ा नहीं जाता…तब तक तो यह सिर्फ पत्ते उखाड़ने जैसा है…जड़ उखाड़नी है तो पहले अन्दर से अपनी जड़ता को खत्म कीजिए…पत्ते उखाड़ने से कुछ नहीं होगा।
मराठा योद्धा नेता तानाजी मालसुरे के जीवन पर आधारित है
कोलकाता : अजय देवगन ने अपनी 100वीं फिल्म तानाजी: द अनसंग वॉरियर को लेकर काफी उत्साहित हैं और फिल्म के प्रचार में कोई कोताही नहीं बरत रहे। अजय के मुताबिक 100वीं फिल्म होने के कारण भी यह फिल्म उनके दिल के बेहद करीब है। इस फिल्म के प्रचार को लेकर कोलकाता पहुँचे जहाँ स्क्रीन एक्स थियेटर में फिल्म का थ्री डी ट्रेलर दिखाया गया। तानाजी: द अनसंग वॉरियर एक पीरियड फिल्म है और 17वीं शताब्दी के मराठा योद्धा नेता तानाजी मालसुरे के जीवन पर आधारित है।
अजय देवगन के लिए यह फिल्म इसलिए भी खास है क्योंकि यह उनकी 100वीं फिल्म है। फिल्म अगले साल 10 जनवरी को प्रदर्शित होने जा रही है। इस खास मौके पर शानदार बनाते हुए आईनॉक्स ने क्वेस्ट मॉल के बंगाल स्क्रीन एक्स थियेटर में अजय देवगन के लिए कार्यक्रम आयोजित किया जहाँ 3 डी ट्रेलर प्रदर्शित किया गया।इस मौके पर लवलॉक बस्ती स्कूल के बच्चों को भी आमंत्रित किया गया था। इस मौके पर टॉलीवुड अभिनेता प्रसेनजीत चटर्जी तथा निर्देशक शिवप्रसाद मुखर्जी भी मौजूद थे।
कोलकाता : कन्याकुमारी के विवेकानंद शिला स्मारक के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 101 दिनों की भारत परिक्रमा (11सितंबर से 20 दिसम्बर तक) को संपूर्ण करने के लिए निकले दिव्यांग व कर्मठ कार्यकर्ता आर.थंगराजा। ‘एक भारत-विजयी भारत’ अभियान के तहत स्कूटी से कन्याकुमारी से भारत के प्रत्येक राज्य की राजधानी से होते हुए कुल 18 हजार किलोमीटर की भारत परिक्रमा आरम्भ की है। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख-लेह, असम, अरूणाचल, झारखंड होते हुए कोलकाता से ओडिशा की ओर प्रस्थान किया है। अभी तक वे 15,120 km तक की यात्रा तय कर चुके हैं। सेंट्रल पार्क में कार्यकर्ताओं ने एक छोटे कार्यक्रम का आयोजन कर उन्हें विदाई दी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों को सन्देश दिया कि स्वामी विवेकानंद के विचार घर-घर पहुँचे, कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला स्मारक की प्रेरणास्पद कथा जन-जन तक पहुंचे, दिव्यांग भी यदि दृढ़ निश्चय कर लें तो वे भी हर कार्य को करने में समर्थ हो सकते हैं। यह यात्रा कन्याकुमारी में स्थित विवेकानंद शिला स्मारक के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में गत 11 सितम्बर को शुरू की गयी थी जो 20 दिसम्बर को कन्याकुमारी में ही समाप्त होगी। इस दौरान उनके द्वारा विद्यालयों और महाविद्यालयों में स्वामी विवेकानंद व विवेकानंद शिला स्मारक के बारे में लोगों को बताया जाएगा। थंगराजा इससे पहले भी चार यात्राएं कर चुके हैं, जिनमें उन्होंने ट्रायसाइकिल से कन्याकमारी से चेन्नई , कन्याकुमारी से कोलकाता की यात्रा की है. जबकि मोटर साइकिल से उन्होंने कन्याकुमारी से दार्जिलिंग, व कन्याकुमारी से अमरावती की यात्रा की है। थंगराजा ने इलेक्ट्रनिक व कम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है और विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी में रेलवे सूचना केन्द्र में कार्यरत हैं। स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयन्ती पर उन्होंने 2013 में कन्याकुमारी से चेन्नई की 1100 किमी और कन्याकुमारी से कोलकाता तक ट्राइसाइकिल से 2850 किमी से पूरी की।
सर्दियों में स्टाइलिश दिखने की जद्दोजहद में सदाबहार शॉल मदद कर सकती है। इसे पारम्परिक ढंग से ओढ़ने की बजाए, आप प्रयोग कर सकती हैं। इस बार शॉल को अलग अंदाज में ओढ़कर देखें।जानिए किस तरह आप न शॉल्स को स्टाइलिश तरीके से ले सकती हैं… हेरिटेज लुक
ये स्टाइल साड़ी, सूट पर खूब जंचता है। ख़ासतौर पर पश्मीना शॉल के साथ ये बेहद खूबसूरत लगता है। साड़ी पर शॉल डालना चाहती हैं तो कंधे से कोहनी तक ओढ़ें। यदि पूरे कंधे पर नहीं ओढ़ना चाहती हैं तो आधे कंधे तक ही काफी होगा। शॉल के दोनों छोर आगे की ओर लटकने दें। सूट पर दुपट्टे की जगह शॉल को इस्तेमाल कर सकती हैं।
बोहो लुक
इस लुक के लिए शॉल की जगह पश्मीना स्टोल डालें। आजकल ये काफ़ी चलन में हैं। ये हल्के होने के साथ ही काफ़ी गर्म भी होते हैं। साड़ी के साथ स्टोल को स्कार्फ की तरह गले में लपेटकर दोनों सिरे आगे की तरफ़ करके डाल सकती हैं। नौकरी पेशा महिलाएं शिफॉन जैसे हल्के वज़न वाली साड़ी पर डालकर नया स्टाइल पा सकती हैं। नए प्रयोग के लिए जींस के साथ भी टीमअप कर सकती हैं।
केप स्टाइल
ये स्टाइल साड़ी, सूट, जींस के अलावा अन्य ड्रेस पर भी आज़मा सकती हैं। इसके लिए शॉल को कंधों से ओढ़कर आगे की ओर लटकाएं और कमर पर बेल्ट लगा लें। ब्लैक और वाइट वैलवेट शॉल के साथ गोल्डन बेल्ट ख़ूब जंचेगी। ये स्टाइल पश्मीना और कश्मीरी शॉल पर भी फ़बता है।
पोन्चू स्टाइल
ये स्टाइल क्रोशिया शॉल के साथ ज़्यादा अच्छा लगता है। क्रोशिया शॉल को सामान्य शॉल की तरह गोलाई में पूरा लपेट लें। उसके बाद बाहरी छोर को पिनअप कर लें, ताकि वो गिरे नहीं। पोन्चू को सूट, साड़ी, जींस पर भी पहन सकती हैं।
कोट स्टाइल
इसमें भी शॉल को पोन्चू की तरह पहनना है। बस फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसमें कंधे से हाथों तक नीचे की ओर पिनअप करना है, ताकि शॉल का हाथ वाला हिस्सा अलग हो सके। ये स्टाइल किसी भी शॉल के साथ अच्छा लगता है।
कैसा हो रंगों का तालमेल
शादी, पार्टी में यदि हल्के रंग की साड़ी पहन रही हैं तो उस पर खिलते हुए रंग का शॉल डालें।
यदि पीच कलर की साड़ी है तो उस पर गहरे गुलाबी रंग की शॉल डालें।
पेस्टल ब्लू कलर की साड़ी पहन रही हैं तो उसके साथ रॉयल ब्लू शॉल ओढ़ें।
यदि गहरे रंग की साड़ी है तो हल्के पेस्टल कलर का शॉल डालें।
इस पर खाना भी पकेगा और मोबाइल भी चार्ज होगा लखनऊ : लखनऊ के प्रांजल श्रीवास्तव ने ऐसी डिवाइस बनाई है जिसकी मदद से खाना पकाने समय मोबाइल भी चार्ज किया जा सकता है। छात्र प्रांजल श्रीवास्तव ने इसका नाम थर्मोइलेक्ट्रिक स्टोव जनरेटर दिया है। डिवाइस के लिए प्रांजल को नेशनल इंस्पायर अवॉर्ड में पहला स्थान मिला है। इसके अलावा फिलीपिंस में आयोजित स्टूडेंट इनोवेशन कॉम्पिटीशन भी जीता है। जीडी गोयनका स्कूल, लखनऊ के छात्र प्रांजल के मुताबिक, थर्मोइलेक्ट्रिक स्टोव जनरेटर वेस्ट हीट को इलेक्ट्रिकल एनर्जी में बदलता है। ऊर्जा स्टोव के सुपरकेपेसिटर में एकत्र होती है। डिवाइस में यूएसबी पोर्ट दिया गया है जहां से मोबाइल भी चार्ज किया जा सकता है।
स्टोव की लागत 400 रुपये
प्रांजल के अनुसार, स्टोव की लागत 400 रुपये है और मुझे इसे तैयार करने में करीब 6 माह का वक्त लगा है। करीब दो साल से टेस्टिंग कर रहा हूं ताकि यह डिवाइस सुरक्षा मानकों पर खरा उतर सके। लगातार एक साथ खाना बनाने के साथ मोबाइल भी चार्ज किया जा सकता है।
केरोसिन लालटेन को देखकर आया आइडिया
प्रांजल कहते हैं, मैं ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ा हुआ हूं। गांव में मैंने देखा कि बिजली न होने पर लोग केरोसिन लालटेन का इस्तेमाल करते हैं। इस दौरान खाना बनाते समय अधिक ऊष्मा यानी हीट व्यर्थ हो जाती है जिसे स्टोर नहीं किया जाता। डिवाइस ऊष्मा को इकट्ठा करके और ऊर्जा यानी बिजली में बदलती है।
माँ नीमा का कहना है कि प्रांजल पढ़ाई में काफी अच्छा है और उसकी उपलब्धि पर हमें गर्व है। स्कूल के चेयरमैन सर्वेश गोयल का कहना है कि स्कूल के दूसरे स्टूडेंट्स को प्रांजल का मॉडल प्रेरित करेगा।
इजरायली शोधकर्ताओं ने एक ऐसा बैक्टीरिया ‘ई-कोली’ विकसित किया है जो पूरी तरह से कार्बन डायऑक्साइड को खा कर जीवित रहता है। बुधवार को सेंट्रल इजरायल स्थित वेइजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि यह बैक्टीरिया वायुमंडल में मौजूद कार्बन से अपनी बॉडी का बायोमास तैयार करता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक से न सिर्फ वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते दुष्प्रभावों को कम किया जा सकेगा बल्कि ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर समस्याओं से लड़ने में भी मदद मिलेगी। बैक्टीरिया का आहार बदलने में लगे दस साल
जर्नल सेल में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने करीब एक दशक के लंबी प्रोसेस के बाद इन बैक्टीरिया की शुगर पर निर्भरता खत्म की। इसके बाद शोधकर्ता इनकी डाइट री-प्रोग्राम करने में सफल हुए। पहले जहां ये बैक्टीरिया शुगर कंज्यूम कर कार्बन डायऑक्साइज प्रोड्यूस करते थे, वहीं री-प्रोग्रामिंग के बाद यह कार्बन डायऑक्साइड कंज्यूम कर शुगर प्रोड्यूस करने लगे। यानी इन्होने जीवित रहने के लिए वायुमंडल में मौजूद कार्बन का उपयोग किया।
इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास तरह का जीन तैयार किया, जिसे लैब में बैक्टीरिया के जीनोम में डाला गया। उन्होंने बताया कि बैक्टीरिया में ऐसा जीन शामिल किया गया, जिसकी मदद से वह फॉर्मेट नाम के तत्व से एनर्जी ले सके। हालांकि बैक्टीरिया के डाइट बदलने के लिए बस यही काफी नहीं था। बैक्टीरिया में दोबारा प्रोग्रामिंग करने के लिए उन्हें धीरे-धीरे इन्हें शुगर से अगल किया गया। बैक्टीरिया को हर प्रोसेस में कम से कम मात्रा में शुगर दी जाने लगी। इस प्रक्रिया के जरिए बैक्टीरिया की शुगर पर निर्भरता लगभग खत्म होने लगी और धीरे-धीर वह नई डाइट यानी शुगर के बजाए कार्बन डायऑक्साइड पर निर्भर हो गए। शोधकर्ताओं का मानना है कि, बैक्टीरिया के यह हेल्दी हैबिट, धरती की सुरक्षा के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है, जो फिलहाल ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है।
मुम्बई : माराकेच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ने प्रियंका चोपड़ा की उपलब्धियों को सेलिब्रेट करते हुए उनको सम्मानित करने की घोषणा की है। उनको यह ट्रिब्यूट ऐतिहासिक स्थल जेमा एल फना स्क्वायर में दिया जाएगा। यह पहला मौका है जब किसी इंडियन सेलिब्रिटी को इस फेस्टिवल में व्यक्तिगत रूप से सम्मानित किया जा रहा है। प्रियंका के अलावा तीन और लोगों को सिनेमा में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाएगा, इनमें अमेरिकन निर्देशक रॉबर्ट रेडफोर्ड, वेटरन फ्रेंच फिल्ममेकर बरट्रैंड तावेर्निएर और तीन दशक से मोरक्कन सिनेमा की स्टार रहीं मूना फत्तेउ भी शामिल हैं।
नयी दिल्ली : अब आप स्वदेशी कृत्रिम दांत (डेंटल इम्प्लांट) भी लगवा सकेंगे। आईआईटी दिल्ली और मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के वैज्ञानिकों ने एक दशक की मेहनत से भारतीय डेंटल इम्प्लांट तैयार किया है। अभी तक भारत में चीन, अमेरिका, यूरोप, इजराइल, कोरिया से ये इम्प्लांट मंगाए जाते हैं। भारतीय डेंटल इम्प्लांट तीन गुना ज्यादा सस्ते पड़ेंगे। भारतीय डेंटल इम्प्लांट की कीमत 7.5 हजार रुपए हाे सकती है, जबकि इसी गुणवत्ता के स्वीडन के इम्प्लांट की कीमत 20 हजार रुपए हाेती है। देश में हर साल 5-6 लाख मरीज डेंटल इम्प्लांट करवाते हैं।
इस प्रोजेक्ट पर मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के पूर्व डायरेक्टर महेश वर्मा और आईआईटी दिल्ली के प्रो. नरेश भटनागर ने काम किया है। प्रो. भटनागर ने बताया कि यह प्रोजेक्ट सीएसआईआर की मदद से शुरू किया गया था।
टीम ने पांच हजार से ज्यादा पेटेंट पर शोध किए
टीम ने दुनियाभर के पांच हजार से ज्यादा पेटेंट पर शोध किए। उसके बाद 250 डिजाइन टेस्ट किए। 249 फेल हुए। 250वें टेस्ट में बेहतर मॉडल मिल पाया। यह काम 2011 तक पूरा हो चुका था। इसके बाद 30 खरगोशों पर क्लीनिकल ट्रायल किया गया। इसके बाद 150 मरीजों पर परीक्षण किया गया। दोनों सफल रहे। उसके बाद कंपनियों से बिड मंगाई गई। देश की एक कंपनी ने 2017 में तकनीक खरीद कर फरीदाबाद में प्लांट लगाया। पिछले महीने ही इसका पेटेंट मिला है। दो हफ्ते पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने वैज्ञानिकों को बधाई दी थी।
एक सिटिंग में डेंटल इम्प्लांट होगा
प्रो. भटनागर ने बताया कि अभी इम्प्लांट के लिए दांतों में ड्रिल करनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में दांतों की हड्डी की चीरफाड़ हो जाती है और डॉक्टर के साथ 4-5 सिटिंग करनी पड़ती है। आईआईटी द्वारा विकसित बोन थ्रेड फॉर्मिंग डिजाइन में चीरफाड़ नहीं होगी। यह हडि्डयां इम्प्लांट को जकड़ लेंगी। इससे रिकवरी जल्दी होगी। नैनो टेक्नाेलॉजी के आधार पर ड्रग इल्यूटिंग डेंटल इम्प्लांट भी बनाया जा रहा है, जो घाव तेजी से रिकवर करेगा। डॉक्टर के साथ एक सिटिंग में डेंटल इम्प्लांट हो जाएगा।
भारत में मेडिकल डिवाइस की टेस्टिंग के नियम सख्त नहीं
प्रो. भटनागर ने बताया कि भारत में विदेशों से आने वाले मेडिकल डिवाइस की टेस्टिंग के नियम सख्त नहीं हैं। भारत में सिर्फ यहीं बनने वाले डिवाइस की जांच होती है। विदेशी कंपनियां अपने देश के टेस्ट सर्टिफिकेट दिखाकर यहां डेंटल इम्प्लांट बेचती हैं। ये काफी महंगे हाेते हैं। अभी सबसे ज्यादा इजराइल का डेंटल इंप्लांट प्रयोग किया जाता है। सस्ता विकल्प उपलब्ध होने से विदेशी इम्प्लांट पर निर्भरता कम होगी।