Saturday, June 27, 2026
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अपराजिता से शुभजिता का सफर एक जिद है…

आज से दस साल पहले जब अपराजिता शुरू की थी तो लगा नहीं था कि यह कभी सम्भव हो सकेगा । बतौर पत्रकार काम करते हुए वेबसाइट चला लेना आसान तो बिल्कुल नहीं था क्योंकि खबर डालने का कोई नियमित समय न तब था और न आज है। व्यस्तता और जीवन के संघर्षों के बीच एक साथ कई मोर्चों पर लड़ते हुए ये दस साल बीते हैं । शुरुआत की तो पता था कि जिस क्षेत्र में कदम रखा है, वहां अपने कदम बहुत नन्हे हैं, नवजात । यह उम्मीद नहीं की थी कि कोई लेख भेजेगा या खबर भेजेगा मगर सबसे पहले रेखा श्रीवास्तव जी ने कविताएं भेजीं । 13 फरवरी 2016 को शुभजिता ने अपराजिता के नाम के साथ जन्म लिया । लोग कहते हैं कि हर बड़ी रचना का जन्म बड़े उद्देश्य के साथ होता है पर मैं कहती हूँ कि अपराजिता का जन्म तनाव से हुआ, टूटन से हुआ और उस खालीपन से हुआ जो मैं लगातार पत्रकारिता में काम करते हुए देख रही थी । हर जगह अपराध, राजनीति, षड्यंत्र, आरोप- प्रत्यारोप और दूर – दूर तक कुछ भी सकारात्मक नहीं दिख रहा था । लड़कियां फील्ड में और डेस्क पर कमतर मानी जा रही थीं । अखबारों से लेकर टीवी में शो पीस और पेज थ्री खबरें कवर करना उनका काम था, युवाओं की बात कोई सुन नहीं रहा था और उनके पास कहने को बहुत कुछ था । महिलाओं की दुनिया फैशन, रसोई और घरेलू नुस्खों तक सिमटती दिख रही थी और फील्ड पर काम करते हुए मैंने देखा था कि औरतें कितनी बदल रही हैं । दुनिया की दूसरी खबरों को जानना उनका हक है । पाठकों का अधिकार है कि वह अपने अतीत से जुड़े, इतिहास, संस्कृति व परम्परा को समझे । यह कहना कि शुभजिता में अपराध, राजनीतिक आरोप -प्रत्यारोप,धार्मिक प्रवचन के नाम पर अंधविश्वास नहीं चलेंगे, बहुतों को आश्चर्य में डालने वाला था । बहुत से वरिष्ठ लोगों को न कहना भी आसान नहीं था । बहुत लोग नाराज हुए, बहुतों ने साथ छोड़ा तो उससे ज्यादा लोग जुड़ते चले गए । अपराजिता से शुभजिता का सफर एक जिद है…अच्छा रचने की जिद । अच्छा देखने की जिद । भारत को समझने की जिद । अपनी जड़ों को समझने की जिद….आप सबने इस जिद को अपने हृदय में जगह दी…अशेष आभार…साथ बने रहिए…जहां तक हो सके, ईश्वर की इस धरती को हम सुन्दर बना सकें, यही प्रयास है ।

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

सम्पादक 

शुभजिता 

बंगाल में मसला अब रोटी का है

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया
बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो चुका है । प्रचंड बहुमत के साथ प्रदेश में भाजपा ने सरकार बना ली है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ एक के बाद ऐतिहासिक फैसले लेते जा रहे हैं । बीएसएफ को जमीन देना और हॉकरों को सियालदह व हावड़ा से हटाना, सार्वजनिक गौ वध पर रोक समेत कई ऐसे फैसले सीएम शुभेंदु ने लिए हैं जिनको काफी सराहा जा रहा है । इन सभी के बीच असली चुनौती भाजपा सरकार के लिए रोटी की समस्या सुलझाने की है । बेरोजगारी और उद्योग लगाने की है क्योंकि ऐसा न किया गया तो यह बेरोजगारी अपराध के रास्ते खोल सकती है और तब स्थिति भयावह होगी । मतलब शुभेंदु सरकार को अब आर्थिक मोर्चे पर भी एक जंग लड़नी होगी। इसका कारण यह है कि कभी भारत की जीडीपी का सिरमौर होने वाला पश्चिम बंगाल आज कर्ज के दलदल में गले तक डूबा हुआ है। जब 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था, तब उन्होंने ‘परिबर्तन’ का नारा दिया था। उस वक्त राज्य पर करीब 2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। आज 15 साल बाद जब सत्ता भाजपा के पास आई है तो यह कर्ज का बोझ चार गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका है।
दरअसल, वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में विशेषकर अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए रेवड़ियां जिस तरह से बाँटी गयी हैं, उसने बंगाल के खजाने पर जबरदस्त बोझ बढ़ाया है। जो निवेश शिक्षा और स्वास्थ्य पर होना चाहिए था, वह पैसा पूजा क्लबों के खाते में गया । सोचने वाली बात यह है कि जिस परिवार में भत्ते ही भत्ते आ रहे हों और उसी से गुजारा चल जा रहा हो । मेहनत की जगह धमकाने, चमकाने और मारपीट से कमाई हो रही हो, वहाँ कार्य संस्कृति कैसे बनेगी ? कहीं न कहीं बंगाल की जनता को बेरोजगार बनाए रखना पुरानी सरकारों की साजिश रही है क्योंकि सक्षम युवा तो झंडा उठाने से रहे और यही कारण है कि यहां सुनियोजित तौर पर उद्योग पनपने ही नहीं दिए गए ।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में बंगाल का कुल कर्ज 7।62 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 2026-27 तक 8।15 लाख करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है। आज बंगाल देश के बड़े राज्‍यों में सबसे अधिक कर्जदार सूबों की सूची में पंजाब के बाद दूसरे पायदान पर है। राज्य का कर्ज-जीएसडीपी (डेब्ट -टू – जीएसडीपी) अनुपात लगभग 38 प्रतिशत है, जो किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। भाजपा के सामने सबसे पहली चुनौती इस वित्तीय गड्ढे को भरने की होगी।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के आंकड़े बंगाल के पतन की दुखद कहानी बयां करते हैं। 1960-61 में भारत की कुल जीडीपी में पश्चिम बंगाल का हिस्सा 10 यानी ।5 प्रतिशत था। आज यह गिरकर महज 5।6% रह गया है। यह गिरावट केवल वामपंथियों के समय नहीं, बल्कि टीएमसी के शासन में भी जारी रही। ईएसी -पीएम वर्किंग पेपर के अनुसार, प्रति व्यक्ति आय के मामले में जो बंगाल 1960 में राष्ट्रीय औसत से 127 यानी 15 प्रतिशत आगे था, वह आज गिरकर 83 यानी ।7 प्रतिशत पर आ गया है। आज स्थिति यह है कि राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्य, जिन्हें कभी पिछड़ा माना जाता था, वे भी प्रति व्यक्ति आय में बंगाल को पीछे छोड़ चुके हैं।
ब्याज चुकाने में जा रहा 20 प्रतिशत राजस्‍व
बंगाल की वित्तीय सेहत इतनी खराब हो चुकी है कि राज्य अपनी कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रहा है। सालाना लगभग 35,000 से 40,000 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज और मूलधन के भुगतान में चले जाते हैं। यह राज्य के कुल राजस्व का 20 प्रतिशत से अधिक है। जब आपकी कमाई का हर पांचवां रुपया पुराने कर्ज की किश्त भरने में जा रहा हो, तो नए अस्पताल, सड़कें और स्कूल बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में पूंजीगत व्यय में लगातार कटौती की गई है।
लोक-लुभावन योजनाओं का प्रभाव
तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सफलता का सबसे बड़ा आधार उनकी ‘कल्याणकारी योजनाएं’ रही हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इन योजनाओं को बंद नहीं कर सकती, क्योंकि ये सीधे आम लोगों से जुड़ी हैं। लेकिन, ये योजनाएं खजाने पर भारी बोझ भी डाल रही हैं। राज्य के कुल बजट का 1।5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हिस्सा केवल प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) आधारित योजनाओं पर खर्च हो रहा है।
लक्ष्मी भंडार : इस योजना के तहत 2।20 करोड़ महिलाओं को मासिक सहायता दी जा रही है, जिस पर सालाना 40,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है।
अन्य योजनाएं : कन्याश्री, रूपश्री, युवाश्री और किसान सहायता जैसी दर्जनों योजनाओं पर भी करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
भाजपा ने ‘सोनार बांग्ला’ का वादा किया है, लेकिन इन भारी-भरकम योजनाओं के बीच विकास कार्यों यानी पूंजी व्यय के लिए पैसा कहां से आएगा, यह एक बड़ा सवाल है। नयी सरकार के लिए इन योजनाओं को जारी रखना और विकास के लिए पैसा जुटाना ‘आग पर चलने’ जैसा होगा।
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बात समाधान की
अब बात करते हैं समाधान की तो हमने बात की वरिष्ठ पत्रकार अशोक पांडेय से। उन्होंने शुभेंदु सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं। आइए इन पर सिलसिलेवार तरीके से बात की जाए –
1. सबसे पहले राज्य को कॉरपोरेट विंग बनानी चाहिए। नए निवेश के पहले राज्य में जो बंद मिलें और कारखाने हैं, उनको खोलने पर जोर देना चाहिए ।
2. राज्य सरकार को लैंड बैंक बनाना होगा । इसमें खाली जमीनों के अतिरिक्त बंद हो चुके परित्यक्त कारखानों की जमीनें और अवैध बस्तियां भी शामिल हैं । राज्य में फाउंड्रीज हैं, कास्ट आयरन के कारखाने हैं, जूट मिलें हैं, टेक्सटाइल मिलें जो बंद पड़ी हैं, उन जमीनों को समझने की जरूरत है। जमीन की प्रकृति के अनुरूप ही वहाँ उद्योग लगाए जाएं।
3. सिंगल विंडो सिस्टम बने। लाइसेंस प्रणाली में सुधार हो । निगरानी तंत्र को बहुत मजबूत बनाने की जरूरत है ।
4. निवेशकों को अधिक छूट मिले । एमएसएमई पर जोर दिया जाए ।
5. पीएम कौशल विकास योजना को बंगाल में स्कूली स्तर से ही लागू किया जाए । आईटीआई बढ़ाए जाएं और कौशल विकास प्रशिक्षण पर अधिक जोर दिया जाए जिससे जब उद्योग लगाए जाएं तो तकनीकी रूप से दक्ष श्रम की सुविधा मिले ।
6. सही है सार्वजनिक तौर पर गौ वध पर रोक लगा दी गयी है और हावड़ा व सियालदह स्टेशन से अवैध अतिक्रमण हटाया जा रहा है पर जरूरी है कि इन हॉकरों के पुनर्वास की योजना बनायी जाए ।
7. गौ पालकों के बारे में भी पुनर्वास की योजना बनायी जाए । गौ शालाओं में कमजोर गायों को खरीदा जाए और मर जाने पर उनको बंजर जमीन में ही दफनाया जाए ।
बंगाल की प्रतिभाओं को वापस बंगाल में लाने के लिए विश्वास का माहौल बनाना बहुत जरूरी है और निश्चित रूप से वर्तमान सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है ।

बहुत लम्बी है भोजशाला संघर्ष की ये हिन्दू व्यथा कथा…

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। मध्य प्रदेश में मालवा की धरती पर खड़ी भोजशाला सिर्फ पत्थरों, स्तंभों और खंडहरों का समूह नहीं है, यह एक ऐसा प्रतीक बन चुकी है, जहां इतिहास की परतों में दबी आस्था, राजनीति की तपिश, पुरातत्व की भाषा और अदालत की बहसें एक साथ दिखाई देती हैं। धार की यह प्राचीन धरोहर वर्षों तक एक धार्मिक स्थल का विवाद बन कर रही है, किंतु हिन्दू आस्था और उससे उमड़ी जन भावनाओं ने इसे केंद्र में बनाए रखा। हजारों लोग सड़कों पर उतरे, गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां खड़ी हुईं और पूरे मालवा में अपने आराध्य के स्थल को पुन: प्राप्त करने के लिए समय-समय पर जनजागरण एवं आंदोलन होते रहे।

भोजशाला संघर्ष की यह कथा वास्तव में उन लोगों की भी व्यथा है, जिन्होंने इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ कर देखा, लेकिन इस विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस संघर्ष की हुई, जिसने धार को कई बार तनाव, कर्फ्यू, लाठीचार्ज और अदालतों की चौखट तक पहुंचाया।

भोजशाला विवाद की जड़ें करीब एक हजार वर्ष पुराने इतिहास में जाती हैं, जब परमार वंश के महान शासक राजा भोज के शासनकाल में यहां सरस्वती सदन और संस्कृत अध्ययन केंद्र का निर्माण हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार यह विद्या, दर्शन और संस्कृति का केंद्र था। मालवा की सांस्कृतिक चेतना में राजा भोज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। इसी कारण भोजशाला को लेकर भावनात्मक जुड़ाव और गहरा होता गया। हिंदू पक्ष शुरू से ही यह दावा प्रस्तुत करता रहा है कि यहां मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी और यह स्थान विद्या की आराधना का प्रमुख केंद्र था।

समय के साथ आक्रमण हुए, सत्ता बदली और संरचनाओं का स्वरूप भी बदलता गया। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह परिसर कमाल मौला मस्जिद के रूप में स्थापित हुआ और लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है। यहीं से दो दावों के बीच संघर्ष की जमीन तैयार हुई।

भोजशाला विवाद लंबे समय तक सीमित बहसों में रहा, किंतु 1990 के दशक में यह एक व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। वर्ष 1994 में धार में सरस्वती वंदना और हनुमान चालीसा के सार्वजनिक पाठ ने आंदोलन को नई दिशा दी। धीरे-धीरे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों ने इसे “भोजशाला मुक्ति आंदोलन” का स्वरूप देना शुरू किया। उस दौर में मालवा के गांवों में सभाएं होने लगीं। धार्मिक यात्राएं निकाली गईं। युवाओं को जोड़ा गया। इस तरह भोजशाला मुक्ति आंदोलन धार के आसपास के जिलों तक फैल गया।

टकराव की पहली बड़ी आहट-

छह दिसंबर 1996 को विश्वहिन्दू परिषद के आह्वान पर शौर्य दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। पुलिस बल बढ़ाया गया। आंदोलनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं थे और प्रशासन कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जता रहा था। यहीं से आंदोलन और शासन के बीच सीधा टकराव शुरू हुआ। भोजशाला का विवाद पहली बार प्रदेश स्तर से होता हुआ राष्ट्रीय स्तर पर बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बन गया।

1997 का फैसला और उफान पर पहुंचा आंदोलन

वर्ष 1997 भोजशाला विवाद का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। तत्कालीन सरकार ने मुस्लिम पक्ष को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति दे दी, जबकि हिंदू पक्ष के प्रवेश और पूजा-अर्चना पर प्रतिबंध लगाए गए। इस निर्णय ने आंदोलन को और तीखा बना दिया। हिंदू संगठनों ने इसे धार्मिक अधिकारों का हनन बताया। गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां सक्रिय हो उठीं। धार आंदोलन का केंद्र बन गया। हिन्दू जन में यह भावना गहराने लगी कि उनके सांस्कृतिक प्रतीकों को सीमित किया जा रहा है। इसी दौर में महिलाओं की बड़ी भागीदारी सामने आई। मातृशक्ति संगम में हजारों महिलाएं शामिल हुईं। आंदोलन परिवारों और सामाजिक समूहों तक फैल गया। यही कारण था कि भोजशाला आंदोलन मालवा के सबसे बड़े जनआंदोलनों में गिना जाने लगा।

सवा लाख लोगों का जमावड़ा और उग्र होती सड़कें

आंदोलन के सबसे तीखे चरण में धार की सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ी। आंदोलनकारियों के अनुसार एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया। हर ओर भगवा झंडे, धार्मिक नारे और भोजशाला को मुक्त कराने की मांग गूंज रही थी। प्रशासन ने हालात को नियंत्रित करने के लिए धारा 144 लागू कर दी। कई इलाकों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़पें हुईं। लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों की घटनाएं सामने आईं।

संघर्ष इतना तीखा हो गया कि 39 आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए और दो लोगों की मौत ने पूरे क्षेत्र का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना दिया। जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे। इन घटनाओं ने आंदोलन को और भावनात्मक बना दिया।

व्यवस्था और अस्थायी संतुलन-

लगातार बढ़ते जनदबाव और आंदोलन के बाद 8 अप्रैल 2003 को सरकार ने नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत हिंदू पक्ष को प्रतिदिन दर्शन और प्रत्येक मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की व्यवस्था दी गई। इस निर्णय के बाद धार में विजय उत्सव मनाया गया। मंदिरों में महाआरती हुई। आंदोलनकारियों ने इसे आंशिक जीत माना, किंतु यह समाधान स्थायी नहीं बन सका।

हर बार जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते, तनाव फिर बढ़ जाता। प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ती। भोजशाला विवाद बार-बार यह संकेत देता रहा कि यह धार्मिकता से अधिक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बन चुका है।

एएसआई सर्वे ने फिर बढ़ाई बहस

हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया। ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार, खुदाई और तकनीकी विश्लेषण के जरिए परिसर की जांच की गई। 2000 से अधिक पेज की रिपोर्ट में कई ऐसे दावे सामने आए, जिन्होंने बहस को फिर तेज कर दिया। रिपोर्ट में मंदिर शैली के अवशेष, मूर्तियां, स्तंभ, शिलालेख और स्थापत्य सामग्री मिलने का उल्लेख किया गया। एएसआई ने दावा किया कि वर्तमान ढांचे में पूर्ववर्ती संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग हुआ है।

106 स्तंभ और 82 पिलास्टर मंदिर स्थापत्य से जुड़े बताए गए। संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों को अरबी-फारसी लेखों से पुराना बताया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद की संरचना जल्दबाजी में निर्मित प्रतीत होती है। इन निष्कर्षों ने हिंदू पक्ष के दावों को नई ताकत दी, जबकि मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट की व्याख्या पर सवाल उठाए। पर अब सच सभी के सामने आ चुका था, न्यायालय में अब इतिहास और पुरातत्व की भाषा सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुकी है।

वाग्देवी प्रतिमा और सांस्कृतिक स्मृति का प्रश्न

भोजशाला विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा भी बड़ा मुद्दा रही है। दावा किया जाता है कि 1875 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी, जिसे बाद में ब्रिटिश अधिकारी इंग्लैंड ले गए। हिंदू संगठनों ने कई बार प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग उठाई। आंदोलनकारी इसे भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ते रहे हैं।

न्यायालय के दरवाजे पर खड़ा इतिहास

वर्ष 2022 में हिंदू फ्रंट फार जस्टिस और भोज उत्सव समिति से जुड़े पक्षकारों ने हाई कोर्ट में नई याचिका दायर की। इसमें परिसर के मूल स्वरूप की वैज्ञानिक जांच और धार्मिक अधिकार तय करने की मांग की गई। अब पूरा मामला अदालत में इतिहास, आस्था, पुरातत्व और संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर खड़ा है। एक ओर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और एएसआई रिपोर्ट हैं, दूसरी ओर धार्मिक परंपरा और नमाज का दावा।

उल्लेखनीय है कि इंदौर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई को एक कानूनी विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस निर्णय के रूप में देखा जा रहा है जो मालवा की सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। भोजशाला की यह कथा उन पीढ़ियों की कहानी भी है, जिन्होंने इसे अपने विश्वास से जोड़ा, सड़कों पर संघर्ष किया, कर्फ्यू झेला, लाठियां खाईं और वर्षों तक फैसले की प्रतीक्षा की। तब कहीं जाकर आज की पीढि़यों के सामने यह शुभ दिन आया है।

“हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस” के प्रदेश संयोजक आशीष जैन इस अवसर पर कहते हैं कि इस दिन का वर्षों से इंतजार था, सत्य परेशान हो सकता है, किंतु आखिर में जीत उसी की होती है, भोजशाला मां वाग्देवी का मंदिर है, यह ज्ञान का क्षेत्र है, यहां ज्ञान का ही कार्य होना चाहिए। वास्तव में यह सफलता किसी एक वर्ग या समुदाय की नहीं, संपूर्ण हिन्दू समाज की जीत है।

(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)

आऱजी कर कांड में तीन आईपीएस अधिकारी निलंबित 

ममता बनर्जी की भूमिका की भी होगी जांच : सीएम शुभेंदु 
कोलकाता, नि.स. । पश्चिम बंगाल में आरजी कर मेडिकल कॉलेज की महिला चिकित्सक से दुष्कर्म और हत्या मामले में अब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका की भी जांच होगी। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को नवान्न में इसकी घोषणा करते हुए इस मामले में तीन आईपीएस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। वहीं, पीड़िता की मां व पानीहाटी से भाजपा विधायक ने मुख्यमंत्री के इस फैसले का स्वागत किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि आरजी कर कांड की फाइल दोबारा खोली जा रही है और उस समय जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारियों की भूमिका की विभागीय जांच होगी। जिन अधिकारियों को सस्पेंड किया गया है उनमें तत्कालीन कोलकाता पुलिस आयुक्त विनीत गोयल, तत्कालीन डीसी नॉर्थ अभिषेक गुप्ता और तत्कालीन डीसी सेंट्रल इंदिरा मुखोपाध्याय शामिल हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गृह मंत्री का पद संभालने के बाद उन्होंने मुख्य सचिव और गृह सचिव से आरजी कर मामले तथा उसके बाद की परिस्थितियों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट के आधार पर प्रारंभिक प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मामले को सही तरीके से हैंडल नहीं किया गया और प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर शुरुआती जांच तक कई स्तर पर गंभीर चूक हुई। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि विभिन्न समाचार माध्यमों से यह जानकारी सामने आई थी कि पीड़िता की मां को राज्य सरकार की ओर से पैसे देने की कोशिश की गई थी। यह “एक प्रकार की घूस देने की कोशिश” थी और इसकी भी जांच की जाएगी। उस समय संबंधित अधिकारियों ने किन लोगों से बातचीत की, उनके कॉल रिकॉर्ड और व्हाट्सएप चैट की भी जांच होगी। यह भी देखा जाएगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री या किसी मंत्री की ओर से कोई निर्देश दिया गया था या नहीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ आरोप हैं, उन्हें जांच प्रक्रिया से अलग रखकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से चल रही जांच में राज्य सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी, लेकिन राज्य पुलिस की भूमिका की अलग से समीक्षा की जाएगी। शुभेंदु अधिकारी ने तत्कालीन डीसी स्तर की एक महिला अधिकारी (इंदिरा मुखर्जी) की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उस समय उनकी शारीरिक भाषा और बयान राज्य के लिए सुखद नहीं थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह आधिकारिक रूप से कोलकाता पुलिस या गृह विभाग की प्रवक्ता नहीं थीं, फिर भी सार्वजनिक रूप से लगातार बयान दे रही थीं। यह भी जांच का विषय होगा कि उन्हें किसके निर्देश पर मीडिया के सामने भेजा गया था। गौरतलब है कि, अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला चिकित्सक से दुष्कर्म और हत्या की घटना के बाद पूरे राज्य में भारी आक्रोश फैल गया था। जूनियर डॉक्टरों के लगातार आंदोलन और दबाव के बीच तत्कालीन पुलिस आयुक्त विनीत गोयल को सितंबर, 2024 में कोलकाता पुलिस आयुक्त पद से हटाकर एसटीएफ में एडीजी बनाया गया था। अभिषेक गुप्ता को भी जांच में कथित लापरवाही के आरोप में डीसी नॉर्थ पद से हटाया गया था। इंदिरा मुखोपाध्याय उस समय डीसी सेंट्रल थीं और आरजी कर कांड के बाद कई बार पुलिस की ओर से मीडिया के सामने दिखाई दी थीं। वर्तमान में विनीत गोयल राज्य खुफिया विभाग में डीजी पद पर कार्यरत हैं। अभिषेक गुप्ता ईएफआर में कमांडेंट हैं, जबकि इंदिरा मुखोपाध्याय सीआईडी में स्पेशल सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात हैं।
इस बीच आरजी कर कांड की पीड़िता की मां, जो भाजपा के टिकट पर जीतकर पानीहाटी से विधायक बनी हैं, ने मुख्यमंत्री के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की थी और उनकी बेटी के मामले में गलत जानकारी दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के शव का दूसरी बार पोस्टमार्टम कराने में बाधा डाली गई और जल्दबाजी में अंतिम संस्कार कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि, पीड़िता की मां ने बुधवार को अदालत जाकर तीन लोगों की गिरफ्तारी की मांग की थी। इनमें पानीहाटी के तत्कालीन विधायक निर्मल घोष, सोमनाथ दास और संजीव मुखोपाध्याय के नाम शामिल हैं।

बदरीनाथ-केदारनाथ धाम पर वृद्ध व दिव्यांगों को प्राथमिकता

देहरादून, एजेंसी। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने बदरीनाथ धाम और केदारनाथ धाम में वृद्ध एवं दिव्यांग श्रद्धालुओं काे सुगम दर्शन कराने के लिए प्राथमिक दर्शन सुविधा लागू करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में मंदिर समिति ने मानक प्रचालन विधि (एसओपी) जारी कर दी है।
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के निर्देश पर मुख्य कार्याधिकारी सोहन सिंह रांगड़ ने इसके आदेश जारी किए। बीकेटीसी हेमंत द्विवेदी ने कहा कि दोनों धामों में बुजुर्ग और दिव्यांग श्रद्धालुओं को सम्मानजनक, सुरक्षित और सुगम दर्शन उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। एसओपी के तहत 50-50 श्रद्धालुओं के 15 मिनट के चार स्लॉट निर्धारित किए गए हैं, जिनमें केवल वृद्ध और दिव्यांग श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाएंगे। दर्शन का समय सुबह 8 बजे से 8:15 बजे, 10 बजे से 10:15 बजे और शाम 3 बजे से 3:15 बजे और 4:45 बजे से 5 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस व्यवस्था के तहत 70 वर्ष से अधिक आयु के श्रद्धालुओं को आधार कार्ड और पंजीकरण के आधार पर यह सुविधा दी जाएगी। दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए वास्तविक स्थिति का आकलन करने के बाद प्राथमिक दर्शन की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने बताया कि बीकेटीसी ने बदरीनाथ एवं केदारनाथ धाम में निर्धारित मानक प्रचालन विधि (एसओपी) अनुसार पात्र वृद्ध एवं दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए प्राथमिक दर्शन सुविधा व्यवस्था प्रारम्भ कर दी है। मंदिर समिति कार्मिक दर्शन में श्रद्धालुओं की सहायता करेंगे।

मप्र हाईकोर्ट ने धार की ऐतिहासक भोजशाला को माना वाग्देवी मंदिर

-उच्चतम न्यायालय जाएगा मुस्लिम पक्ष
– मुस्लिमों को एएसआई के नमाज के अधिकार के आदेश को किया खारिज

इंदौर, एजेंसी। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को अपना फैसला सुना दिया। उच्च न्यायालय ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि भोजशाला परिसर मंदिर ही है। मस्जिद पक्ष यदि सरकार को आवेदन देता है तो उसे अलग जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। एएसआई एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार और एएसआई यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा। 1958 एक्ट के तहत इस प्रॉपर्टी का पूरा मैनेजमेंट एएसआई के हाथ में ही रहेगा। पीठ ने कहा कि ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। भोजशाला मामले में हिंदू पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 7 अप्रैल, 2003 के एएसआई के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है। इसके अलावा, न्यायालय ने हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार प्रदान किया है और भोजशाला परिसर को राजा भोज की संपत्ति के रूप में मान्यता दी है। लंदन के एक संग्रहालय में रखी हमारी मूर्ति को वापस लाने की मांग के संबंध में न्यायालय ने सरकार को विचार करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि मुस्लिम पक्ष भी सरकार के समक्ष अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने सरकार से मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक भूमि आवंटित करने पर विचार करने को कहा है। न्यायालय ने हमें पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्रदान किया है और सरकार को स्थल के प्रबंधन की निगरानी करने का निर्देश दिया है। एएसआई का पिछला आदेश, जिसमें नमाज अदा करने का अधिकार दिया गया था, पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है, अब से वहां केवल हिंदू पूजा-अर्चना ही होगी। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ में छह अप्रैल से 12 मई 2026 तक नियमित सुनवाई हुई। इन 24 दिनों में कुल 43 घंटे चली सुनवाई के दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने अपने-अपने तर्क न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। इसके बाद 12 मई को न्यायालय ने सभी याचिकाओं में निर्णय सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। इस दौरान अंतरसिंह की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि दोनों पक्षों में सौहार्द बना रहे, इस तरह की व्यवस्था का आदेश दिया जाए। भोजशाला के फैसले पर धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा है कि उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान है। उनकी ओर से सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने तथ्य रखे थे। हम फैसले की समीक्षा करेंगे। इसके बाद हम उच्चतम न्यायालय जाएंगे।

21 जून को दोबारा होगी नीट की परीक्षा 

-शिक्षा मंत्री ने नीट परीक्षा पेपर लीक की बात मानी

-अगले साल से ऑनलाइन होगी नीट परीक्षा

नयी दिल्ली, एजेंसी । देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा ‘नीट-यूजी’ को लेकर पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों के बाद शिक्षा मंत्री ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने भी इस बात को स्वीकार किया कि नीट का पेपर लीक हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद नीट परीक्षा के कई महत्वपूर्ण नियमों और व्यवस्थाओं में बड़े बदलाव किए गए हैं। नीट-यूजी की परीक्षा पहले 3 मई को आयोजित की गई थी, लेकिन 7 मई को यह बात सामने आई कि गेस पेपर वाले सवाल ही मुख्य परीक्षा में पूछे गए हैं। प्रारंभिक जांच के बाद मामले को तुरंत जांच एजेंसियों को सौंप दिया गया। 8 मई से जांच प्रक्रिया शुरू हुई और 12 मई को छात्रों के हित में इस परीक्षा को पूरी तरह से रद्द कर दिया गया। अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने इस री-एग्जाम की नई तारीख 21 जून तय की है।आमतौर पर छात्रों को ओएमआर शीट पर हस्ताक्षर करने और अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने में काफी समय लग जाता था, जिससे उनका मुख्य परीक्षा का समय प्रभावित होता था। अब नए नियमों के तहत छात्रों को बड़ी राहत देते हुए परीक्षा के समय में 15 मिनट की अतिरिक्त बढ़ोतरी की गई है। अब उम्मीदवारों को परीक्षा के लिए कुल 3 घंटे 15 मिनट का समय मिलेगा। 21 जून को नीट यूजी परीक्षा दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:15 बजे तक आयोजित की जाएगी। छात्र अब अपनी पसंद का परीक्षा केंद्र या शहर चुन सकेंगे। इसके लिए एनटीए की ओर से एक हफ्ते के लिए विशेष विंडो खोली जाएगी। सरकार का उद्देश्य है कि मौसम की स्थिति और विद्यार्थियों के आवागमन को देखते हुए उन्हें कम से कम यात्रा करनी पड़े।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि पुनर्परीक्षा के प्रवेश पत्र 14 तक उपलब्ध करा दिए जाएंगे। 21 जून को होने वाले री-एग्जाम के लिए छात्रों से कोई भी अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। शिक्षा मंत्री ने कहा कि 21 जून को होने वाली पुनर्परीक्षा के आसपास बरसात को मौसम रहेगा। मौसम की स्थिति का भी ध्यान रखा जा रहा है। अगर मौसम अनुकूल नहीं हुआ तो हम उसी के अनुसार निर्णय लेंगे । नीट परीक्षा के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव होने जा रहा है। सरकार का मानना है कि पेपर-पेन मोड और ओएमआर शीट आधारित व्यवस्था ही पेपर लीक और धांधलियों की मुख्य जड़ रही है। इसलिए शिक्षा मंत्री ने घोषणा की है कि अगले साल से नीट-यूजी की परीक्षा पूरी तरह से ऑनलाइन यानी कंप्यूटर आधारित टेस्ट मोड में ली जाएगी। इस डिजिटल शिफ्ट से परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। वर्तमान में एनटीए लगभग 1 करोड़ बच्चों की परीक्षाएं आयोजित कराता है। शिक्षा मंत्री ने स्वीकार किया है कि वर्तमान एनटीए मैकेनिज्म में सुधार की सख्त जरूरत है। टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आधुनिक साइबर खतरों के माध्यम से होने वाली गड़बड़ियों से निपटने के लिए एनटीए के तकनीकी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है ताकि भविष्य में इस तरह की सेंधमारी को पूरी तरह रोका जा सके। इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने और कमियों का पता लगाने की जिम्मेदारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई है। शिक्षा मंत्री ने कहा है कि इससे पहले राधाकृष्णन कमेटी की सिफारिशों को शब्दशः लागू किए जाने के बावजूद यह घटना हुई, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने 21 जून की परीक्षा के मद्देनजर शिक्षा माफियाओं को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वे इस परीक्षा से दूर रहें, अन्यथा उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।

 

बंगाल : स्कूलों की प्रार्थना सभा में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य

-शिक्षा विभाग का आदेश जारी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में स्कूलों की प्रार्थना सभा को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक फैसला सामने आया है। राज्य सरकार ने सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में सुबह की असेंबली के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य कर दिया है। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी आधिकारिक निर्देश में इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने को कहा गया है। निर्देश के अनुसार, कक्षाएं शुरू होने से पहले होने वाली प्रार्थना सभा के प्रारंभ में सभी छात्रों के लिए ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गायन अनिवार्य होगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि विद्यालय प्रमुख इस व्यवस्था का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।
स्कूल शिक्षा निदेशक की ओर से 13 मई को जारी पत्र में कहा गया है कि प्रार्थना सभा की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ के गायन से की जाए, ताकि राज्य के सभी स्कूलों में यह एक समान रूप से लागू हो सके। सूत्रों के अनुसार, यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े प्रावधानों को और मजबूत करने की दिशा में पहल कर रही है।
बताया जा रहा है कि ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971’ में संशोधन पर भी विचार किया जा रहा है, जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ के गायन में बाधा डालने को दंडनीय बनाने का प्रस्ताव शामिल है। विभागीय अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि स्कूलों को इस पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखने को कहा गया है और आवश्यकता पड़ने पर वीडियो दस्तावेजीकरण भी अनिवार्य किया जा सकता है।
गौरतलब है कि अब तक राज्य के स्कूलों में मुख्य रूप से रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन’ का गायन होता रहा है। वहीं पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में 1905 के बंग-भंग आंदोलन से जुड़े टैगोर रचित राज्य गीत ‘बांग्लार माटी , बांग्लार जल ’ को भी प्रार्थना सभा में शामिल किया गया था। अब ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किए जाने के बाद राज्य के स्कूलों की प्रार्थना सभा में राष्ट्रीय गीत और राज्य गीत के साथ एक और राष्ट्रीय प्रतीक जुड़ गया है।

बंगाल में सार्वजनिक स्थानों पर गौ वध पर राज्य सरकार ने लगाई रोक

कोलकाता । पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने राज्य में गौ हत्या और सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश सरकार ने पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950 को सख्ती से लागू करने का निर्देश देते हुए सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पर रोक लगा दी है। राज्य में नई सरकार बनने के बाद अल्पसंख्यकों के त्यौहार कुर्बानी से पहले ये फैसला सुर्खियों में है।

राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि गाय, बैल, सांड, बछड़ा, भैंस और अन्य मवेशियों का वध बिना वैध प्रमाणपत्र के नहीं किया जा सकेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पशु के वध से पहले यह प्रमाणित करना अनिवार्य होगा कि वह 14 वर्ष से अधिक आयु का है और प्रजनन या कार्य के लिए अनुपयुक्त हो चुका है अथवा बीमारी, चोट या विकृति के कारण स्थायी रूप से अक्षम है।

यह प्रमाणपत्र नगरपालिका अध्यक्ष या पंचायत समिति के सभापति तथा सरकारी पशु चिकित्साधिकारी संयुक्त रूप से जारी करेंगे। बिना अनुमति के पशु वध करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने यह भी साफ किया है कि जिन पशुओं के वध की अनुमति दी जाएगी, उनका वध केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही किया जा सकेगा। खुले स्थानों, सड़कों या सार्वजनिक इलाकों में पशु वध पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।

अधिसूचना में कहा गया है कि कानून का उल्लंघन करने वालों को छह महीने तक की जेल, एक हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते हैं। राज्य सरकार ने सभी जिला प्रशासन, नगरपालिका और पंचायत अधिकारियों को इस कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। सरकार ने यह कदम कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2018 के आदेश और 2022 में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर उठाया है।

उच्च माध्यमिक में 91.23 प्रतिशत विद्यार्थी सफल

कोलकाता । पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद ने गुरुवार को वर्ष 2026 की उच्च माध्यमिक परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया। परिषद कार्यालय, विधाननगर में आयोजित पत्रकार वार्ता में परिणामों की औपचारिक घोषणा की गई। सुबह 11 बजे के बाद से परीक्षार्थियों के लिए परिणाम परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिए गए।
इस वर्ष उच्च माध्यमिक परीक्षा के लिए कुल 6 लाख 35 हजार 931 विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया था, जिनमें से 6 लाख 26 हजार 258 परीक्षार्थी परीक्षा में शामिल हुए। कुल 5 लाख 71 हजार 355 विद्यार्थी सफल घोषित किए गए। परीक्षा का कुल उत्तीर्ण प्रतिशत 91.23 रहा।
जिलावार प्रदर्शन में पूर्व मेदिनीपुर ने सबसे बेहतर परिणाम दर्ज किया। जिले का उत्तीर्ण प्रतिशत 94.19 रहा, जो राज्य में सर्वाधिक है। इस वर्ष की मेधा सूची में शीर्ष 10 स्थानों पर कुल 64 विद्यार्थियों ने जगह बनाई है, जिनमें 56 छात्र और आठ छात्राएं शामिल हैं। आदृत पाल ने 496 अंक प्राप्त कर राज्य में प्रथम स्थान हासिल किया। इस वर्ष पहली बार सेमेस्टर प्रणाली के तहत उच्च माध्यमिक परीक्षा आयोजित की गई। परीक्षा में 15 भाषाओं और 16 व्यावसायिक विषयों को शामिल किया गया था। राज्यभर के 6837 विद्यालयों के विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। छात्राओं की संख्या छात्रों की तुलना में 66,486 अधिक रही। परिषद ने बताया कि विद्यार्थी आधिकारिक वेबसाइट पर रोल नंबर और पंजीकरण संख्या दर्ज कर अपना परिणाम देख सकते हैं। स्कूलों से अंकपत्र और प्रमाणपत्र वितरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। साथ ही पोस्ट पब्लिकेशन स्क्रूटिनी और पोस्ट पब्लिकेशन रिव्यू के लिए आवेदन प्रक्रिया 14 मई की रात 12 बजे के बाद शुरू होगी।