हमारे बुजुर्ग हमेशा हरी सब्जियां खाने की सलाह देते हैं। हरी सब्जियों का सेवन हर उम्र के लिए लाभकारी है, क्योंकि उनके सेवन से पाचन में सुधार, मजबूत प्रतिरक्षा, और हृदय स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है, हालांकि इनके सेवन का तरीका बहुत कम लोगों को पता होता है। आज के समय में सैंडविच से नूडल तक में कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल किया जाता है जो पाचन को प्रभावित करती हैं। आयुर्वेद के अनुसार हरी सब्जी खाने का भी एक सही तरीका होता है, तभी शरीर को पूरा फायदा मिलता है। हरी पत्तेदार सब्जियां पोषण से भरपूर होती हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इन्हें कम मात्रा में और सही तरीके से पकाकर खाना चाहिए, क्योंकि कई हरी सब्जियां वात दोष बढ़ा सकती हैं और पचने में भारी होती हैं। इसके लिए आयुर्वेद में कुछ बेहतर तरीके बताए गए हैं, जिससे हरी सब्जियों की पौष्टिकता बनाए रखते हुए पाचन प्रक्रिया में सरलता लाई जा सकती है।
हरी सब्जियों को कच्चा खाने से बचें, खासकर पालक, शिमला मिर्च और गोभी (पत्तागोभी)। इन सब्जियों में परजीवी टेपवर्म पाया जाता है, जो पेट से लेकर मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके साथ ही कच्ची हरी सब्जियों में वात की अधिकता होती है। पकने के बाद सब्जियों में वात की अधिकता कम हो जाती है। इसलिए हरी सब्जियों को उबालें, फिर उनका अतिरिक्त पानी निचोड़ें और अंत में घी या तेल में हल्का भूनकर पकाएं।
ध्यान रखने वाली यह भी बात है कि बुजुर्गों और बच्चों को हरी सब्जियों का सेवन कम करने दें। ऐसा इसलिए क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ शरीर में वात की अधिकता बढ़ती है और पाचन मंद पड़ जाता है। बच्चों का पाचन भी बड़ों की तुलना में कमजोर होता है। ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों दोनों को सही मात्रा और सही तरीके से सब्जियों का सेवन करने दें।
हरी सब्जियों की तुलना में बुजुर्गों और बच्चों को तोरई, टिंडा, लौकी, परवल और कुंदरू अधिक मात्रा में दें। यह हरी सब्जियों जितनी ही पौष्टिक होती है। अगर बच्चे इन सब्जियों को कम पसंद करते हैं तो उन्हें आटे में मिलाकर पराठा या मीठे के रूप में भी दिया जा सकता है।
जानिए हरी सब्जियों को सही तरीके से खाने का तरीका
इन सुपरफूड्स से करें मधुमेह को कंट्रोल
30 की उम्र के बाद खाने से लेकर सोने के समय में अगर परिवर्तन कर लिया जाए तो शरीर के आधे से ज्यादा रोग खुद-ब-खुद कम हो जाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कहा जाता है कि 30 के बाद आहार में मीठा और नमक दोनों की मात्रा आधी कर देनी चाहिए, लेकिन सभी के लिए ये करना बहुत मुश्किल है। बात चाहे सामान्य लोगों की हो या फिर मधुमेह से पीड़ित लोगों की, आज हम ऐसे सुपरफूड्स की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में आहार को भी औषधि माना है। अगर आहार संतुलित है तो जीवन भी संतुलित है। भविष्य में होने वाली मधुमेह की परेशानी से बचने के लिए या मधुमेह को नियंत्रित करने के सारे गुण आहार में मौजूद हैं। सबसे पहले आता है मैथी दाना और ओट्स। मैथी दाना और ओट्स दोनों ही मधुमेह को नियंत्रित करने और इंसुलिन रेजिस्टेंस को संतुलित करने में मदद करते हैं। दोनों में ग्लूकोमैनन और बीटा-ग्लूकान होता है जो घुलनशील फाइबर होते हैं और रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ने नहीं देते।
दूसरा है दालचीनी और करेला। दालचीनी और करेला दोनों ही भारतीय रसोई का हिस्सा हैं। मधुमेह से बचाव के लिए हफ्ते में तीन बार करेले का सेवन करना चाहिए और दालचीनी का इस्तेमाल खाने में और सुबह खाली पेट पानी पीने में कर सकते हैं। करेला और दालचीनी सेल्स को एक्टिव करते हैं, जिससे सेल्स ग्लूकोज का अच्छे से इस्तेमाल कर पाते हैं।
तीसरा है दालें, अलसी, सत्तू, और इसबगोल। यह सारी चीजें आसानी से किचन में मिल जाती हैं, बस उन्हें अपने आहार का हिस्सा बनाना जरूरी है। इन सभी में मैग्नीशियम, ओमेगा-3, और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं, और ये इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाते हैं। चौथा है फलों का सेवन। आहार तभी पूर्ण होता है जब दिन में एक फल का सेवन जरूर किया जाए। मधुमेह से पीड़ित मरीजों को अमरूद, सेब और नाशपाती का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये फल लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल होते हैं जो शुगर तेजी से नहीं बढ़ने देते। इसके अलावा दिनचर्या में कई तरह के बदलाव करने की जरूरत होती है, जैसे रोजाना 30 मिनट पैदल चलना, हल्की एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय से दूरी और आखिर में पूरी नींद।
नियमित त्रिकोणासन से पाएं हेल्दी लाइफस्टाइल
आज के समय में सेहतमंद और अच्छे शरीर की चाह हर कोई रखता है, लेकिन व्यस्त दिनचर्या के चलते ऐसा होना कई बार लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। ‘त्रिकोणासन’ एक ऐसा योगासन है जिसे कम समय में किया जा सकता है और जिसको करने से कई सारे लाभ भी मिलते हैं। इस योगासन को नियमित करने से मांसपेशियां लचीली और रक्त संचार बेहतर होता है। रोजाना अभ्यास करने से शरीर को दाएं और बाएं तरफ स्ट्रेच करने की आवश्यकता होती है, जिससे पीठ, हाथों और पैरों की मांसपेशियों की सक्रियता बढ़ती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह एक ऐसा योगासन है जो शरीर को लचीला, संतुलित और शक्तिशाली बनाता है। साथ ही, यह पाचन को बेहतर बनाता है और कमर व जांघों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।
इसे करने के लिए योगा मैट पर दोनों पैरों को 3 से 4 फीट की दूरी पर फैलाएं। दाएं पैर को 90 डिग्री बाहर की ओर घुमाएं और बाएं पैर को थोड़ा अंदर की ओर मोड़ें। अब दोनों हाथों के कंधों को सीधे फैलाएं और अपनी हथेलियों को नीचे की ओर रखें। धीरे-धीरे दायीं ओर झुकें और दाहिने हाथ से दाएं पैर या टखने को छूने का प्रयास करें। बायां हाथ सीधा ऊपर की ओर रखें। इस स्थिति में 20 से 30 सेकंड तक रहें। सांस सामान्य रखें। फिर धीरे से ताड़ासन में वापस आएं। इसी प्रक्रिया को बाईं ओर दोहराएं।
इसे करते समय हाथ, पैर और रीढ़ एक त्रिकोण बनाते हैं और यह तनाव कम करने में भी मददगार है, लेकिन स्लिप डिस्क या साइटिका जैसी स्थितियों में सावधानी बरतनी चाहिए।
त्रिकोणासन एक ऐसी अभ्यास क्रिया है जिसके नियमित अभ्यास से वजन नियंत्रित होता है। साथ ही, तनाव और चिंता भी कम होती है। यह साथ ही संतुलन और एकाग्रता में भी वृद्धि करता है।
त्रिकोणासन के नियमित अभ्यास से शरीर की एनर्जी बढ़ती है, हालांकि इसके अभ्यास में कई सावधानी भी बरतने की सलाह दी जाती है
बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान, 4 मई को परिणाम
नयी दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में वोट डाले जाएंगे। 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होगा। वोटों की गिनती 4 मई को होगी। पोलिंग बूथों पर पर्याप्त इंतजाम रहेंगे। साथ ही सुरक्षा की सख्त व्यवस्था रहेगी। चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 6.44 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें पुरुष मतदाता 3.28 करोड़, महिला मतदाता 3.16 करोड़ और थर्ड जेंडर 1152 मतदाता हैं। अगर फर्स्ट टाइम वोटर (18-19 साल) की बात करें तो उनकी संख्या 5.23 लाख है। 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के वोटरों की संख्या 1.31 करोड़ है। 85 साल से अधिक उम्र वाले मतदाता 3.79 लाख हैं। दिव्यांग वोटरों की संख्या 4.16 लाख है। ईवीएम को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
बता दें कि साल 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 8 चरणों में हुआ था। यह चुनाव काफी लंबा चला था, क्योंकि राज्य में 294 सीटें हैं और सुरक्षा, लॉ एंड ऑर्डर, और बड़े मतदाता आधार को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने इसे 8 फेज में कराया था।
पिछले चुनाव में भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने शानदार जीत दर्ज की थी। बंगाल की कुल 294 सीटों में से 215 पर टीएमसी का कब्जा है। पार्टी को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले थे।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरी और उसे 77 सीटें मिली थीं। दशकों से बंगाल की राजनीति पर दबदबा बनाए रखने वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस को ऐतिहासिक झटका लगा और वे एक भी सीट जीतने में असफल रहे। गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रही भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (आईएसएफ) को एक सीट मिली।
पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है। राज्य विधानसभा में 294 सीटें हैं और लगभग 40 से 50 निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और बीरभूम जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है। इनमें से कई निर्वाचन क्षेत्रों में, मतदाताओं में से 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं, जिससे चुनावी परिणामों को निर्धारित करने में उनका वोट एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।
बंगाल समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा
-दो चरणों में होगा राज्य में मतदान -हेडिंग
– 23 और 29 अप्रैल को डाले जाएंगे वोट
नयी दिल्ली । चुनाव आयोग ने रविवार को असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अहम जानकारियां साझा की। असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 9 अप्रैल को चुनाव होंगे। वहीं, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। जबकि, तमिलनाडु में एक चरण में 23 अप्रैल को मतदान होगा। इन सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश के चुनावों के नतीजे 4 मई को जारी किए जाएंगे। पांचों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चुनाव की घोषणा होने के साथ ही तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि आयोग ने पिछले कुछ दिनों में सभी चुनावी राज्यों का दौरा कर तैयारियों की समीक्षा की है और राजनीतिक दलों, अधिकारियों तथा मतदाताओं से बातचीत की है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनाव आयोग की टीम ने इन राज्यों में जाकर विधानसभा चुनाव की तैयारियों का जायजा लिया। इस दौरान सभी राजनीतिक दलों से मुलाकात कर उनके सुझाव भी लिए गए। साथ ही प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों, जिला निर्वाचन अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, राज्य निर्वाचन अधिकारियों और पुलिस महानिदेशकों से भी विस्तृत चर्चा की गई।
उन्होंने बताया कि आयोग ने युवाओं और पहली बार मतदान करने जा रहे मतदाताओं से भी संवाद किया। इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया को सुचारू बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) के काम की भी सराहना की गई। सीईसी ज्ञानेश कुमार ने कहा कि ये पांचों राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ऐसे में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया गया, ताकि कोई भी योग्य मतदाता वोट देने से वंचित न रह जाए और कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो सके। सीईसी ने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि वे अपने मताधिकार का गर्व और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा, “मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि अब आप एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने जा रहे हैं, मतदान का अधिकार। अपने वोट का इस्तेमाल गर्व और जिम्मेदारी के साथ करें। आपका वोट आपकी आवाज है। चुनाव का पर्व हम सबका गर्व है।” चुनाव आयोग के अनुसार इन पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में कुल 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह संख्या ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी और कनाडा जैसे कई देशों की कुल आबादी के बराबर है। सीईसी ने बताया कि इन चुनावों के लिए 824 विधानसभा सीटों पर मतदान कराया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए 2.19 लाख मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इसके अलावा पूरे चुनाव को निष्पक्ष और सुचारु तरीके से कराने के लिए करीब 25 लाख चुनाव अधिकारी और कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी आयोग ने व्यापक तैयारी की है। मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक चुनाव के दौरान करीब 8.50 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे, ताकि मतदान शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में हो सके। राज्यों के हिसाब से मतदाताओं की संख्या भी साझा की गई। आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल 6.44 करोड़ मतदाता हैं, जबकि असम में करीब 2.5 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। सीईसी ने बताया कि चुनाव के दौरान कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी की गई हैं। कई स्थानों पर पिंक बूथ बनाए जाएंगे, जहां पूरी व्यवस्था महिला कर्मियों द्वारा संभाली जाएगी। इसके अलावा, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान के बाद तुरंत मतदान प्रतिशत की जानकारी जारी की जाएगी। मतदान केंद्रों के अंदर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी, और मतदाताओं को उन्हें फोन बूथ के बाहर रखना होगा।
चैत्र नवरात्रि विशेष : झारखंड के इस मंदिर में विराजती हैं सोलह भुजाओं वाली माता
-पुजारी नहीं बल्कि आदिवासी को है पूजा का पहला अधिकार
हमारे पुराणों में 51 शक्तिपीठ मंदिरों का जिक्र किया गया है जबकि लाखों की संख्या में सिद्धपीठ मंदिर स्थापित हैं। एक ऐसा ही मंदिर झारखंड की धरती पर स्थापित है, जहां नवरात्रि के नौवें दिन बलि की विशेष प्रथा आज भी कायम है। हम बात कर रहे हैं देवरी मंदिर (देउड़ी मंदिर) की। झारखंड की राजधानी रांची से दक्षिण-पश्चिम दिशा में एनएच-33 पर 60 किलोमीटर दूर तामार में मां जगदम्बा का देवरी मंदिर मौजूद है। यहां विराजित मां की प्रतिमा बाकी सिद्धपीठ मंदिरों से काफी अलग है। देवरी मंदिर में मां की सोलहभुजी प्रतिमा स्थापित है। सामान्य मां दुर्गा के आठ हाथ होते हैं लेकिन यहां मां 16 भुजाओं में अस्त्र और शस्त्र के साथ भक्तों की मनोकामना की पूर्ति करती हैं। दिउड़ी माता के नाम से स्थानीय गांव को भी दिउड़ी के नाम से जाना जाता है। ‘दिउड़ी माता’ को तमाड़ राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। मंदिर और यहां स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा का इतिहास करीब 700 साल पुराना है। यह मंदिर बहुत पुराना है और अब इसका जीर्णोद्धार चल रहा है। माना जाता है कि दो एकड़ में फैला यह प्राचीन मंदिर भगवान शिव की प्रतिमा पर स्थापित है। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इस पर कोई एक राय नहीं है।

कहा जाता है कि सिंहभूम के केरा के राजा अपने दुश्मनों से पराजित होकर दिउड़ी पहुंचे। वह अपने साथ देवी की प्रतिमा भी लेकर आए और उसे वेणु वन में जमीन के अंदर छिपा दिया था। कुछ दिनों बाद मंदिर का निर्माण कर प्रतिमा स्थापित की गई। एक दूसरी कथा ओडिशा से जुड़ी है। ओडिशा के चमरू पंडा साल में दो बार तमाड़ के राजा को तसर बेचने आते थे। इसी क्रम में राजा के यहां पूजा-पाठ करा दिया करते। राजा ने उनसे यहीं बसने का आग्रह किया और वे यहीं बस गए। वे जंगल में तपस्या भी करने लगे। एक दिन तपस्या करते समय लगा कि मां उनसे मिलना चाहती हैं। ये बातें राजा को बता दीं। राजा ने जंगल साफ करवाना शुरू किया। सफाई के दौरान काला रंग का पत्थर दिखा। शाम हो गया था। मजदूर थक गए थे। वे लौट आए। दूसरे दिन देखा कि वहां एक मंदिर खड़ा है। कुछ लोग मानते हैं कि कलिंग अभियान के दौरान महान सम्राट अशोक ने इसका निर्माण करवाया। कथाएं और भी हैं। एक कथा असुरों से जुड़ी है। असुर यहां की प्राचीन जाति है, जो तकनीकी दक्षता में आगे थी। लोहा गलाने की पद्धति इसके पास थी। राज्य में मुंडाओं के आगमन से बहुत पहले से असुर रह रहे थे। इनका संबंध द्रविड़ कुल से है। उन्होंने ही शायद मां के मंदिर का निर्माण किया हो। मंदिर का निर्माण बड़े-बड़े पत्थरों से किया गया है और खास बात यह है कि मंदिर के निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ है। मंदिर की भव्य वास्तुकला दर्शकों के लिए एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है क्योंकि इसकी बलुआ पत्थर की दीवारें विभिन्न देवी-देवताओं की जटिल नक्काशी से सुशोभित हैं। माना जाता है कि मंदिर 700 से भी अधिक साल पुराना है।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, जिसने भी मंदिर की संरचना में बदलाव करने की कोशिश की है, उसे देवताओं के प्रकोप का सामना करना पड़ा है और इसके परिणाम भुगतने पड़े हैं। यही कारण है कि मंदिर की संरचना झारखंड की समृद्ध विरासत को दिखाती है।
मंदिर की एक खास बात और है जो इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती है। शक्तिपीठ और सिद्धपीठ मंदिरों में मुख्यत: पुजारी को पूजा का अधिकार होता है लेकिन देवरी मंदिर ऐसा मंदिर है, जहां पुजारी को हफ्ते में एक दिन पूजा का अधिकार मिला है और बाकी के छह दिन आदिवासी समुदाय के लोग मंदिर में मां की विशेष आराधना करते हैं। मार्च का महीना मंदिर और भक्तों के लिए खास होता है क्योंकि होली और चैत्र नवरात्रि का पर्व मंदिर में धूमधाम से मनाया जाता है।
चैत्र नवरात्रि में लाखों की संख्या में भक्त मां के अलग-अलग रूपों के दर्शन के लिए आते हैं। खुद भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी मंदिर में कई बार दर्शन कर चुके हैं। उनके लगातार आगमन ने मंदिर की लोकप्रियता में बड़ा उछाल आया है।
(साभार – खास खबर)
चैत्र नवरात्र विशेष : यहां दिव्य शक्ति करती है मां शारदा का शृंगार
चैत्र माह की शुरुआत के साथ ही देवी मंदिरों में नवरात्र की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की धरती पर ऐसा शक्तिशाली मंदिर स्थापित है, जहां दर्शन मात्र से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। चैत्र माह में लाखों की संख्या में भक्त कठिन चढ़ाई चढ़कर मां के दर्शन के लिए मंदिर तक पहुंचते हैं। हम बात कर रहे हैं मैहर के मां शारदा के चमत्कारी मंदिर की। मध्य प्रदेश के सतना जिले में त्रिकूट पर्वत पर स्थित मैहर वाली मां शारदा 108 शक्तिपीठों में शामिल है, जहां चैत्र नवरात्रि पर भक्तों का सैलाब मां का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचता है। मां का मंदिर अपने रहस्यमयी शृंगार के लिए प्रसिद्ध है; माना जाता है कि रात के वक्त मां का शृंगार दिव्य शक्तियों के जरिए किया जाता है। रहस्यमयी शृंगार को उनके परम भक्त वीर आल्हा से जोड़कर देखा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार मां के परम भक्त वीर आल्हा ने त्रिकूट पर्वत पर बैठकर 12 साल तक लगातार तपस्या की थी, और मां ने उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए थे। मां ने वीर आल्हा को वरदान दिया था कि सबसे पहले पूजा और शृंगार का अधिकार उनका होगा। इसी कारण है कि सुबह मंदिर के कपाट खोलने पर मंदिर के पुजारियों को मां के गर्भगृह में ताजे फूल मिलते हैं। माना जाता है कि परम भक्त वीर आल्हा मां की पहली पूजा करते हैं।
मंदिर की एक और खास बात है जिससे भक्तों का माई शारदा पर और मंदिर दोनों पर अटूट विश्वास है। मंदिर में एक चमत्कारी दीपक मौजूद है, जो सदियों से लगातार जल रहा है। मान्यता है कि खुद आल्हा मां की आराधना के लिए मंदिर में दीप जलाकर जाते हैं। इन्हीं सब कारणों से भक्तों की आस्था अटूट है।
भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए 1 हजार से अधिक सीढ़ियां चढ़कर मंदिर तक पहुंचते हैं। कहते हैं कि जो भी 1 हजार सीढ़ियों को पार कर मां शारदा का पूरे मन से ध्यान करता है, मैहर वाली माई उनकी सारी मनोकामना को पूरा करती है। चैत्र नवरात्र में मैहर में भव्य मेले का आयोजन होता है। इस बार मेला का आयोजन 19 मार्च से शुरू होगा और 27 मार्च तक चलेगा। इस मौके पर मंदिर में भारी मात्रा में पुलिस बन की तैनाती की जाती है और भक्तों के लिए विशेष इंतजाम भी किए जाते हैं।
(साभार – खास खबर)
डॉ. पूर्णिमा सिन्हा : भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि धारक पहली बंगाली महिला
विज्ञान और महिलाओं का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है, इतना कि भारतीय महिला वैज्ञानिकों के नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। भारतीय विज्ञान अकादमी द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आम तौर पर भारतीय वैज्ञानिक को पुरुष ही माना जाता है, जबकि भारतीय महिलाओं ने एक सदी पहले ही इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली थी। पहली भारतीय महिला ने 1885 में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की थी।
अज्ञानता की कमी का कारण यह पुरानी लैंगिक धारणा है कि महिलाएं और विज्ञान एक असंगत संयोजन हैं, और चूंकि वे एक असंगत संयोजन हैं, इसलिए उन महिलाओं के बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिन्होंने वास्तव में कठोर धारणाओं को तोड़कर अपना रास्ता बनाया है।
ऐसी ही एक महिला जो इस गुमनामी में डूबी हुई है, वह हैं डॉ. पूर्णिमा सिन्हा, जो एक भौतिक विज्ञानी और भौतिकी में डॉक्टरेट प्राप्त करने वाली पहली बंगाली महिला हैं। डॉ. पूर्णिमा सिन्हा (जन्म नाम सेनगुप्ता) का जन्म 12 अक्टूबर, 1927 को हुआ था। उनके पिता डॉ. नरेश चंद्र सेनगुप्ता एक संवैधानिक वकील और प्रगतिशील लेखक थे, जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा की वकालत भी की। पूर्णिमा सिन्हा और उनकी तीन बड़ी बहनें भौतिकी, रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र और गणित जैसे विषयों में गहरी रुचि रखती थीं। घर के उदार वातावरण ने उन्हें अपनी पसंद के विषयों का अध्ययन करने की स्वतंत्रता दी।
डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने 1957 में डॉ. सत्येंद्र नाथ बोस के मार्गदर्शन में कलकत्ता विश्वविद्यालय से ‘भारतीय मिट्टी और खनिजों के एक्स-रे और विभेदक तापीय विश्लेषण‘ विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । यह उल्लेखनीय है कि भारत में विज्ञान का अध्ययन अभी प्रारंभिक अवस्था में था और वास्तव में, कलकत्ता विश्वविद्यालय विज्ञान महाविद्यालय का भौतिकी विभाग 1916 में ही कार्य करने लगा था। उस समय के कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी जानते थे कि ब्रिटिश सरकार विज्ञान विभाग को आर्थिक सहायता नहीं देगी। इसलिए, उन्होंने धनी भारतीय दानदाताओं से धन जुटाया और सी.वी. रमन, सत्येंद्र नाथ बोस और मेघनाद साहा के मार्गदर्शन में विज्ञान विभाग अस्तित्व में आया।
आजीविका –डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद, डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में बायोफिजिक्स में हाथ आजमाया , और 1963-64 में सैद्धांतिक जीवविज्ञानी हॉवर्ड पैटी के लिए काम करते हुए, डीएनए डबल हेलिक्स में दिखाई देने वाले बेस और क्ले की संरचनाओं का अध्ययन किया।
भारत लौटने पर, डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने केंद्रीय काँच और सिरेमिक अनुसंधान संस्थान में शामिल होने से पहले दो दशकों तक भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और जेसी बोस संस्थान में काम किया। केंद्रीय काँच और सिरेमिक अनुसंधान संस्थान में , उन्होंने सिरेमिक रंग के भौतिकी पर काम किया।
अपने एक लेख में, डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने बताया कि शोध के दौरान, प्रोफेसर एस.एन. बोस ने उन्हें और अन्य शोधकर्ताओं को अपनी-अपनी आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं एक्स-रे उपकरण बनाने के लिए कहा था (कभी-कभी द्वितीय विश्व युद्ध के बचे हुए सामान का उपयोग करके)। इस प्रकार, डॉ. पूर्णिमा और उनकी टीम ने पचास से अधिक मिट्टी के नमूनों का वर्गीकरण किया था।
वह नियमित रूप से ज्ञान और विज्ञान (ज्ञान और विज्ञान) जैसी विज्ञान पत्रिकाओं में योगदान देती थीं, जिसे उनके गुरु डॉ. एस.एन. बोस द्वारा स्थापित बंगीय विज्ञान परिषद (बंगाल विज्ञान संघ) द्वारा प्रकाशित किया जाता था। उन्हें वैज्ञानिक जिज्ञासा की भावना को बढ़ावा देने और प्रोत्साहित करने के लिए संघ द्वारा सम्मानित भी किया गया था।
भौतिकी में रुचि के अलावा, डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने ललित कलाओं में भी गहरी रुचि ली और यहां तक कि ‘ भारतीय संगीत के अध्ययन के लिए एक दृष्टिकोण‘ नामक एक पुस्तक और संगीतकारों गोपाल घोष और ज्ञान प्रकाश घोष पर रचनाएँ प्रकाशित कीं।
उन्होंने श्रोडिंगर की ‘ माइंड एंड मैटर‘ और कामेनेत्स्की की ‘ अनरेवलिंग डीएनए: द मोस्ट इंपोर्टेंट मॉलिक्यूल ऑफ लाइफ‘ का बंगाली में अनुवाद भी किया।
उन्होंने अपने गुरु डॉ. एस.एन. बोस (जो बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट के सिद्धांत के लिए जाने जाते हैं) के जीवन के पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उनके बारे में और उन पर व्यापक रूप से लिखकर।
इसलिए, उनके जैसी महिलाओं को महत्व देना और उन्हें मुख्यधारा के विमर्श में शामिल करना तथा भारत में विज्ञान के इतिहास का पुनर्निर्माण करना आवश्यक हो जाता है, जो कि अत्यधिक लैंगिक और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला बना हुआ है।
डॉ. पूर्णिमा सिन्हा ने प्रख्यात मानवविज्ञानी सुरजीत चंद्र सिन्हा से विवाह किया और उनकी दो बेटियाँ, सुपूर्णा और सुकन्या हुईं। दोनों ही भौतिक विज्ञानी हैं।
डॉ. पूर्णिमा सिन्हा की रुचियां भौतिकी से परे भी थीं। उनसे कई प्रख्यात रंगमंच कलाकार, संगीतकार और अन्य कलाकार मिलने आते थे, जिनमें सत्यजीत रे भी शामिल थे। प्रख्यात फिल्म निर्देशक सत्येन बोस भी उनके गुरु थे। उनका निधन 11 जुलाई, 2015 को हुआ ।
वह बहुमुखी प्रतिभा की धनी महिला थीं और केंद्रीय काँच एवं सिरेमिक अनुसंधान संस्थान से सेवानिवृत्त होने के बाद , ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने उस समय सफलता की एक सीमा को पार कर लिया जब बालिका शिक्षा एक बेहद जटिल मुद्दा था। भारतीय विज्ञान अकादमी के एक प्रयास, ‘लीलावती की बेटियाँ: भारत की महिला वैज्ञानिक‘ में उन्हें प्रमुखता से दर्शाया गया था।
इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि उनके जैसी महिलाओं को महत्व दिया जाए और उन्हें मुख्यधारा के विमर्श में शामिल किया जाए, तथा भारत में विज्ञान के इतिहास का पुनर्निर्माण किया जाए जो अत्यधिक लैंगिक भेदभाव और संकीर्ण सोच पर आधारित है। क्योंकि यदि डॉ. पूर्णिमा सिन्हा जैसी प्रख्यात महिलाएं अपने गुरुओं (आमतौर पर पुरुष) के बारे में लिख रही हैं, तो किसी को उनके जैसी महिलाओं के बारे में भी लिखने की पहल करनी चाहिए।
संदर्भ
- सुपर्णा सिन्हा: ‘ जैसी मां, वैसी बेटी‘
- अर्नब राय चौधरी:कलकत्ता भौतिकी का स्वर्ण युग
(साभार – फेमिनिज्म इन इंडिया)
बनाइए मिट्टी का चूल्हा
मिट्टी के चूल्हे पर पका खाना सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। इस भोजन का एक अलग ही स्वाद होता है, जो अन्य तरीकों से पकाए खाने में नहीं मिलता है। इसमें आयरन, कैल्शियम, सल्फर, फॉस्फ़ोरस, पोटैशियम, ज़िंक, और मैग्नीशियम जैसे तत्व शामिल होते हैं। जिसकी वजह से शरीर में कब्ज, गैस, और अपच जैसी समस्याएं नहीं होतीं है। तभी गांव में रहने वाले लोग ज्यादा ताकतवर और स्वस्थ होते हैं। इसलिए शहरों में रहने वाले लोगों की भी चाहत होती है कि मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाए। लेकिन इस चूल्हे से निकलने वाला धुआं पूरे घर को काला कर देता है। मगर, अब आपको इसकी टेंशन लेने की जरूरत नहीं है आपको ऐसा चूल्हा बनाना बता रहे हैं जिसमें धुएं का सही इंतेजाम है।
चूल्हा बनाने के लिए जरूरी सामान – मिट्टी और भूंसा, 27 ईंट, लोहे की रॉड, एक पीवीसी पाइप
ऐसे बनाना है चूल्हा –सबसे पहले आप मिट्टी और भूंसे में पानी मिलाकर एक मिश्रण तैयार लें। अब 4-4 ईंट को दोनों साइड रख लीजिए, इनका शेप आगे से पतला और पीछे से चोड़ा होकर राउंड होना चाहिए। अब दोनों साइड मिट्टी के मिश्रण की एक लेयर बनाने के बाद 4-4 ईंट और रखें। एक बार फिर मिट्टी की लेयर और उसके ऊपर ईंट रखना है। अब दोनों ही पार्ट के पिछले खाली हिस्से में भी 3 आधी ईंट लगाकर कवर कर दीजिए, यहां पाइप लगाने के लिए थोड़ी सी जगह छोड़ दें। अब आपको सभी ईंटों को मिट्टी के मिश्रण से पूरी तरह कवर करना है।
लोहे की रॉड और पाइप – एक बेस तैयार होने के बाद आपको आगे से राउंड और एक लंबा पीवीसी पाइप लगाना है, जिसका मुंह चूल्हे के अंदर होना चाहिए। इस तहर पाइप के ऊपरी हिस्से से धुएं निकलने का इंतेजाम हो जाएगा, आप अपनी सहूलियत के हिसाब से पाइप की लंबाई रख सकते हैं। अब खाना बनाने के लिए एक चूल्हे के अंदर 3 पार्ट बनाना है तो लोहे की रॉड को ऐसे ही रखना होगी। जब इन रॉड को कवर करेंगे तो आपके 3 चूल्हे बन जाएंगे और सामने की ओर का खाली हिस्सा लकड़ी या उबले लगाने के लिए खाली रहेगा। अब बर्तन रखने के लिए बेस बनाने के बाद आपका चूल्हा तैयार हो जाएगा। इसमें एक साथ आप 3 काम कर सकते हैं, जिससे हेल्दी खाना भी पकेगा।
भीम चूल्हा…जिस पर अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने बनाया भोजन
झारखंड का जंगलों-पहाड़ों से घिरा पलामू क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक-पौराणिक स्थलों से परिपूर्ण है। इसी क्षेत्र में हुसैनाबाद अनुमंडल का मोहम्मदगंज भी शामिल है। यहीं पर है पौराणिक भीम चूल्हा स्थित है । किवदंतियों के अनुसार यह वही 5 हजार साल पुराना चूल्हा है, जिस पर पांडवों के अज्ञातवास के दौरान भीम भोजन बनाया करते थे। कोयल नदी के तट पर शिलाखंडों से बना यह चूल्हा पांडवों के इस इलाके में ठहराव का मूक गवाह है।

प्रसिद्ध भीम चूल्हा मोहम्मद गंज बराज के पास अवस्थित है| पर्यटन स्थल के रूप में सैलानी एक साथ दोनों जगहों का भ्रमण कर आनंदित होते हैं। भीम चूल्हा के बगल में पहाड़ी के पास पत्थर की तराशा हुआ हाथी भी दर्शनीय है जिसकी लोग अपने श्रद्धा के अनुसार पूजा पाठ भी करते है। बरवाडी से डेहरी भारतीय रेल लाइन भी भीम चूल्हा के नीचे से होकर गुजरती है।

भीम द्वापर युग में सबसे ज्यादा बलवान थे। उनके बल का अंदाजा इस चूल्हे को देख लगाया जा सकता है। बता दें कि झारखंड के पलामू जिले में एक ऐसा स्थान है, जहां द्वापर से जुड़ी कई निशानी देखने को मिलती है। इसमें एक निशानी ऐसी है, जिसके नाम से इस स्थान को जाना जाता है। पलामू के मोहमादगंज प्रखंड में एक स्थान भीम चूल्हा के नाम से प्रसिद्ध है। ये एक पर्यटक स्थल है।
यहां दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं। पलामू जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर मोहमादगंज प्रखंड में यह स्थान है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांच पांडव माता कुंती के साथ झारखंड में इस स्थान पर रहा करते थे। इस दौरान वो यहां खाना पकाया करते थे। खाना पकाने के लिए भीम ने 170 टन का चूल्हा तैयार किया था। पुजारी गंगा तिवारी ने बताया कि यहां सैकड़ों वर्ष पुराना शिव मंदिर है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु पूजा अर्चना करने आते हैं। 14 जनवरी को यहां मेले का आयोजन होता है। इस अवसर पर हजारों लोग आते हैं।

मान्यता है कि मंदिर में मांगी हुई श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। यहां पूजा करने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। पांचों पांडव से जुड़ी कई निशानी देखने को मिलती है। मंदिर के नीचे एक गुफा छिपा है, जिसकी गहराई का पता आज तक कोई नहीं लगा पाया। लोग बताते हैं कि उसी गुफा में पांच पांडव माता कुंती के साथ रहा करते थे। इसके अलावा उनके साथ एक हाथी भी था। मान्यता है कि युग बदलने के बाद वह पत्थर का बन गया।
भीम चूल्हा को पर्यटक विभाग द्वारा विकसित किया गया है। इसके साथ यहां पार्क, वॉच टावर और चूल्हे के ऊपर कराह बनाया गया है, ताकि लोग देख-समझ सकें कि इस चूल्हे पर माता कुंती द्वारा खाना बनाया गया होगा। इसके साथ यहां से प्रकृति का खूबसूरत नजारा और भीम बराज देखने को मिलता है। वॉच टावर से पुरा नजारा बेहद खूबसूरत दिखता है।
(साभार – नवभारत टाइम्स एवं न्यूज 18)




