Friday, November 6, 2026
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भारतीय मूल की नावी पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार

नयी दिल्ली । नॉर्वे की नोबेल समिति ने भारतीय मूल की नवनेथम ‘नावी’ पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान क‍िया है। यह पुरस्‍कार उन्‍हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए द‍िया गया है। नोबेल पुरस्कार सम‍ित‍ि के अनुसार, साल 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जा रहा है, जिसने असाधारण साहस और ईमानदारी के साथ एक ज्‍यादा व्यापक वैश्विक कानूनी व्यवस्था की दिशा में नेतृत्व किया है। इस साल के विजेता ने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई है कि युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार के मामलों में कानूनी कार्रवाई हो। सम‍ित‍ि ने बताया क‍ि शांति पुरस्कार पाने वाली नावी पिल्लै ने देशों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराया है और हिंसा और संघर्ष के पीड़ितों के लिए उम्मीद जगाई है। नावी पिल्लै हमारे समय में अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों की महान पैरोकारों में से एक हैं। उनका शानदार करियर हमें कानून के वैश्विक शासन का समर्थन करने, उसे मजबूत करने और उसका विस्तार करने की जरूरत की याद दिलाता है। न्याय और मानवीय गरिमा के प्रति नावी पिल्लै की प्रतिबद्धता उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है, जो एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया बनाना चाहते हैं।
नोबेल पुरस्कार सम‍ित‍ि के अनुसार, नावी पिल्लै का सार्वभौमिक कानूनी सिद्धांतों के प्रति समर्पण और सही-गलत को लेकर उनका मजबूत दृष्टिकोण उनके लंबे करियर की पहचान रहा है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रंगभेद के दौर में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मी पिल्लै ने वकील बनकर कानूनी क्षेत्र में नई मिसाल कायम की। उन्होंने गहरे सामाजिक भेदभाव, नस्लीय अलगाव और बहिष्कार जैसी चुनौतियों का सामना किया। नेल्सन मंडेला और रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्य लोगों का बचाव करने से लेकर हमारे समय के महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मामलों में न्यायाधीश के रूप में सेवा देने तक, उनके पूरे सफर में न्याय के लिए संघर्ष की एक समान धारा दिखाई देती है।
सम‍ित‍ि ने कहा क‍ि इस वर्ष की सम्मानित हस्ती नावी पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और उसके प्रभाव को काफी बढ़ाया है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट, रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में काम किया है। वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त भी रह चुकी हैं और हाल तक कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्ष थीं। आज नावी पिल्लै उस मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) की न्यायाधीश हैं, जिसमें म्यांमार पर नरसंहार का आरोप है।
सम‍ित‍ि ने बताया क‍ि ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय अदालत के मामलों में नावी पिल्लै ने दिखाया है कि कानूनी उपाय युद्ध और हिंसा को रोकने में मददगार हो सकते हैं। नावी पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ी संस्थाओं को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी स्वतंत्र सोच, विशेषज्ञता और दृढ़ता ने उन्हें हमारे समय की सबसे सम्मानित अंतरराष्ट्रीय न्यायविदों में से एक बना दिया है।

देवी के नौ स्वरूप और दुर्गा सप्तशती का क्या है संबंध

 शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर रविवार से हो रही है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दौरान घरों और मंदिरों में देवी आराधना के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाता है। दुर्गा सप्तशती को ‘देवी माहात्म्य’ या ‘चंडी पाठ’ भी कहा जाता है। यह मार्कंडेय पुराण का एक भाग है, जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास ने की है। इस ग्रंथ में 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी दुर्गा की संपूर्ण कथा, रहस्य, कवच, अर्गला, कीलक और उनके विभिन्न प्रकट होने के प्रसंग वर्णित हैं। दुर्गा सप्तशती में यह बताया गया है कि कैसे महाशक्ति ने समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे महाअसुरों का वध किया। सप्तशती के पहले अध्याय में दैत्य मधु कैटभ के वध, दूसरे अध्याय में देवताओं के तेज से मां दुर्गा के अवतरण और महिषासुर सेना के वध की कहानी है। तीसरे अध्याय में महिषासुर और उसके सेनापति के वध के बारे में बताया गया है। चौथा अध्याय इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा मां की स्तुति, पांचवें अध्याय में चंड मुंड द्वारा राक्षस शुम्भ के सामने देवी की सुंदरता का वर्णन और छठे अध्याय में धुम्रलोचन वध का वर्णन है।
सातवें अध्याय में चंड मुंड वध और आठवें में रक्तबीज के वध के बारे में बताया गया है। अध्याय नौ और दस में निशुम्भ शुम्भ वध की कथा है। ग्यारहवें अध्याय में देव और देवी की स्तुति करके वरदान के बारे में जानकारी दी गई है। बारहवें और तेरहवें अध्याय में देवी के चरित्र की महिमा और वैश्य सुरथ की कथा है, जिसे देवी का वरदान मिला था।
देवी के ये प्रकटीकरण और उनके युद्ध के रूप ही आगे चलकर ‘नवदुर्गा’ की उपासना की परंपरा का आधार बने। दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक हैं, जिन्हें तीन भागों में बांटा गया है। प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) और उत्तर चरित्र (महासरस्वती)। ये तीनों ही महाशक्ति के मूल स्वरूप हैं, जिनसे नौ अलग-अलग देवियों (नवदुर्गा) की आराधना का विधान पुष्ट होता है।
मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भय, शोक और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती जाती है। इसका पाठ विशेष रूप से नवरात्रों में किया जाता है और ये अचूक फल देने वाला होता है।
दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग श्लोकों का अलग महत्व है। इन श्लोकों को पढ़ने से भक्तों को कई लाभ होते हैं।
“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥” यह मंत्र किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत, पारिवारिक सुख, और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
“ऊं जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥” इस मंत्र का जाप जीवन में विजय पाने, संकटों को टालने और मां दुर्गा की कृपा से उन्नति प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
“शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥” यह मंत्र चारों ओर एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, डर और शत्रुओं से रक्षा होती है।
“सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥” इस मंत्र के जरिए तीनों लोकों की पीड़ा हरने वाली मां से गुप्त या प्रत्यक्ष शत्रुओं के विनाश और जीवन की बड़ी बाधाओं को शांत करने की प्रार्थना की जाती है।
“सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति नसंशयः॥” इस मंत्र के जाप से मां दुर्गा की अनुकंपा से घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

जीएसटी अधिकारियों के पास अब नहीं होगा गिरफ्तारी का अधिकार

– घटाई गयी जुर्माने की राशि
नयी दिल्ली, एजेंसी । जीएसटी काउंसिल की 57वीं बैठक में आज कई कड़े फैसले लिए गए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बैठक की अध्यक्षता की। राज्यों के वित्त मंत्री इसमें शामिल हुए। जीएसटी परिषद ने जीएसटी 2.0 के तहत जीएसटी अधिकारियों के हाथ से गिरफ्तारी के अधिकार को खत्म कर दिया है। आसान रेजिस्ट्रेतशन जैसे व्यापक नीतिगत सुधारों पर भी फैसला लिया है। इनका उद्देश्य भरोसे पर आधारित टैक्स‍ व्यवस्था के जरिये कारोबार करना आसान बनाना है। गुरुवार को घोषित सुधार 1 अप्रैल, 2027 से लागू होंगे। यह अगले फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत है। सबसे बड़े फैसलों में काउंसिल ने जीएसटी के तहत गिरफ्तारी की शक्ति को हटा दिया है। साथ ही अभियोजन के लिए मॉनेटरी सीमा को 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये करने को मंजूरी दे दी है। काउंसिल ने न्यूनतम सजा के प्रावधान को भी हटा दिया। व्यक्तिगत मामलों में सजा की प्रकृति, चाहे जुर्माना, कारावास या दोनों, को न्यायिक विवेक पर छोड़ दिया। जहां कोई खास जुर्माना तय नहीं है, वहां लागू सामान्य जुर्माना 25,000 रुपये से घटाकर 10,000 रुपये कर दिया जाएगा।
संशोधित ढांचे के तहत, जो करदाता देर से रिटर्न दाखिल करते हैं, गलती करते हैं या भुगतान में देरी करते हैं, उन्हें ऐसी चूक के लिए अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई के बिना, टैक्सन वसूली, ब्याज और आनुपातिक दंड का सामना करना पड़ेगा।

गैर-अनुसूचित कैंसर की दवाओं का ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित

नयी दिल्ली, एजेंसी । कैंसर मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने सभी गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 फीसदी तक सीमित करने का निर्णय लिया है। यह नियम ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित तथा पेटेंट वाली और गैर-पेटेंट वाली दवाओं पर लागू होगा। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य दवाओं की कीमतों में शामिल अत्यधिक ट्रेड मार्जिन को कम करना है, ताकि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक दवाएं मरीजों के लिए अधिक किफायती हो सकें।
सरकार के मुताबिक, इस फैसले से कुछ दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में 70 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इससे कैंसर के इलाज पर होने वाला मरीजों का अपनी जेब से खर्च यानी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर कम होने की उम्मीद है। सरकार ने अनुमान लगाया है कि इस फैसले से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। नए फैसले की खास बात यह है कि इसमें गैर-अनुसूचित श्रेणी की कैंसर रोधी दवाओं को व्यापक रूप से शामिल किया गया है। यानी ब्रांडेड और जेनेरिक, देश में बनी और आयातित तथा पेटेंट और गैर-पेटेंट दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा लागू होगी। इसका मकसद दवा की कीमत और मरीज द्वारा चुकाई जाने वाली वास्तविक राशि के बीच के अंतर को कम करना है।

अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

पणजी (गोवा) । भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ और मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं रहे। 75 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गत 8 अक्टूबर को तड़के दिल का दौरा पड़ने के बाद निधन हो गया। गोवा के पणजी के पास डोना पाउला स्थित अपने अपार्टमेंट में बेहोश पाए जाने के बाद उन्हें एक निजी अस्पताल (मणिपाल अस्पताल) ले जाया गया।

स्मृतिशेष अभिनेता नाना पाटेकर के पुत्र मल्हार और मणिपाल अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. शेखर सालकर ने इसकी पुष्टि की। डॉ. सालकर ने बताया कि उन्हें बचाने के लिए करीब 45 मिनट तक सीपीआर दी गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर सालकर के अनुसार, नाना पाटेकर को सुबह लगभग 5:10 बजे मृत घोषित कर दिया गया। उनके निधन के बाद मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) दर्ज किया गया। अब पोस्टमार्टम कराया जाएगा।

नाना हिंदी और मराठी सिनेमा के चर्चित अभिनेता हैं। उनका जन्म एक जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। वह सिर्फ अभिनेता ही नहीं, बल्कि फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक भी रहे। नाना पाटेकर के अभिनय का आगाज 1978 की फिल्म गमन से हुआ। शुरुआती दौर में उन्होंने मराठी और हिंदी सिनेमा दोनों में अपना हुनर दिखाया। साल 1988 में रिलीज हुई मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे से उनके काम को खास पहचान मिली। 1989 की चर्चित फिल्म परिंदा उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इसमें एक गैंगस्टर के प्रभावशाली किरदार के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

अपने लंबे फिल्मी सफर में उन्होंने कई चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को पर्दे पर जीवंत किया। अंकुश, प्रतिघात, प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी: द म्यूजिकल, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति जैसी गंभीर व संजीदा फिल्मों के अलावा वेलकम और वेलकम बैक जैसी हास्य फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय से उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

आज भी सुरक्षित है आकाशवाणी में महालया के दिन गूंजने वाला 150 साल पुराना शंख

आज भी संभालकर रखा है कोलकाता का गोस्वामी परिवार

-दीपंकर एडबार

कोलकाता । महालया की भोर। शहर अभी नींद में होता है। तभी रेडियो से गूंजती है गंभीर शंखध्वनि और उसके बाद सुनाई देती है बीरेंद्र कृष्ण भद्र की अमर आवाज में चंडीपाठ। बंगाली समाज में यह सिर्फ एक रेडियो कार्यक्रम की शुरुआत नहीं, बल्कि दुर्गापूजा के आगमन का सांस्कृतिक संकेत बन चुका है। लेकिन इस परिचित शंखध्वनि के पीछे भी एक पुरानी कहानी है। उत्तर कोलकाता के गिरिश पार्क स्थित गोस्वामी परिवार के पास आज भी करीब 150 वर्ष पुराना एक शंख सुरक्षित है। परिवार का दावा है कि इसी शंख को कभी आकाशवाणी के स्टूडियो ले जाया गया था और ‘महिषासुरमर्दिनी’ के शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल हुआ था।

गिरिश पार्क के 71/C, डब्ल्यू. सी. बनर्जी स्ट्रीट स्थित गोस्वामी परिवार के सदस्य चंद्रदीप गोस्वामी के अनुसार, इस शंख का संबंध उनके परिवार के प्रख्यात बांसुरीवादक गौर गोस्वामी से है। परिवार की स्मृतियों के मुताबिक, पंकज कुमार मल्लिक और बीरेंद्र कृष्ण भद्र के अनुरोध पर गौर गोस्वामी इस मंगल शंख को आकाशवाणी के स्टूडियो लेकर गए थे। इसके बाद महालया की सुबह प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के शुरुआती वातावरण में शंखध्वनि का इस्तेमाल हुआ।

हालांकि ‘महिषासुरमर्दिनी’ का इतिहास केवल एक शंख की कहानी तक सीमित नहीं है। इसका निर्माण 1930 के दशक की शुरुआत में हुआ था। बाणी कुमार ने देवी दुर्गा और महिषासुर वध की कथा पर आधारित एक संगीतमय प्रस्तुति तैयार की थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1932 में इस तरह के प्रारंभिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई और 1933 में महालया के अवसर पर इसका संशोधित रूप प्रसारित किया गया। 1936 में कार्यक्रम महालया की सुबह के प्रसारण के रूप में अधिक स्थापित हुआ और 1937 में इसका नाम ‘महिषासुरमर्दिनी’ हुआ।

इस कार्यक्रम के निर्माण में बाणी कुमार, पंकज कुमार मल्लिक और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की भूमिका निर्णायक थी। बाणी कुमार की रचना, मल्लिक का संगीत संयोजन और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज ने मिलकर ऐसा रेडियो प्रारूप तैयार किया, जो धीरे-धीरे बंगाली सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन गया।

शंखध्वनि भी इस प्रस्तुति का महज तकनीकी हिस्सा नहीं थी। शुरुआती दौर के प्रसारण से जुड़े विवरणों में कार्यक्रम की शुरुआत में शंख बजाए जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ विवरणों के अनुसार, शुरुआती वर्षों में बाणी कुमार अपने घर से शंख लेकर आते थे और मृत्युंजय बंद्योपाध्याय उसे बजाते थे। बाद के दौर में गौर गोस्वामी समेत कई कलाकार कार्यक्रम के संगीत पक्ष से जुड़े।

‘महिषासुरमर्दिनी’ का प्रारंभिक प्रसारण लाइव होता था। 1962 के बाद रिकॉर्डेड संस्करण का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसके बाद अलग-अलग समय में अलग रिकॉर्डिंग प्रसारित की गईं, लेकिन बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज और शुरुआती शंखध्वनि महालया की पहचान बनी रही।

आज रेडियो के साथ मोबाइल फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस कार्यक्रम को लाखों श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। तकनीक बदल गई, सुनने का तरीका बदल गया, लेकिन महालया की भोर में शंखध्वनि सुनते ही बंगाली समाज के लिए दुर्गापूजा की स्मृतियां फिर जीवित हो उठती हैं।

गिरिश पार्क के उस घर में रखा करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना शंख इसी बदलते समय के बीच एक भौतिक स्मृति की तरह मौजूद है। परिवार के लिए वह पूर्वजों की विरासत है। और बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति के लिए-यह उस दौर की याद है, जब एक शंख, एक रेडियो स्टूडियो और कुछ असाधारण कलाकारों ने मिलकर महालया की सुबह को हमेशा के लिए एक अलग पहचान दे दी।

ढाक की थाप के साथ कृष्णनगर में ‘चाली’ कारीगरों की बढ़ी रफ्तार

दीपंकर एडबार

कृष्णनगर (नदिया) । दूर के गांवों से आती ढाक की आवाज और नदी किनारे लहराते काश के फूलों के बीच दुर्गापूजा का माहौल बन चुका है। लेकिन कृष्णनगर के बागदी पाड़ा में उत्सव का आनंद लेने के बजाय कारीगर दिन-रात काम में जुटे हैं। यहां पारंपरिक ‘चाली’ तैयार करने का काम इन दिनों चरम पर है। बांस, लकड़ी, रस्सी, अखबार, रंगीन कागज, कपड़े और गोंद से कारीगर देवी प्रतिमाओं के पीछे लगने वाली सजावटी संरचनाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।

दुर्गापूजा में प्रतिमा भले ही मुख्य आकर्षण होती है, लेकिन उसके पीछे की चाली पूरी सजावट को एक अलग पहचान देती है। कृष्णनगर की चाली अपने पारंपरिक डिजाइन और बारीक हस्तकला के लिए जानी जाती है। बागदी पाड़ा के कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हैं। दुर्गापूजा के साथ कालीपूजा और जगद्धात्री पूजा के दौरान भी यहां काम का दबाव बढ़ जाता है।

कारीगरों के अनुसार, इस बार भी बड़े सामुदायिक पूजा आयोजकों के साथ-साथ घरेलू पूजा के लिए बड़ी संख्या में ऑर्डर मिले हैं। थीम आधारित पूजा के बढ़ते चलन ने चाली के डिजाइन में भी बदलाव किया है। कई पूजा समितियां अपने पंडाल की थीम के अनुरूप विशेष डिजाइन की चाली तैयार करा रही हैं।

कारीगर कार्तिक सांतरा ने कहा, “अभी काम का दबाव काफी ज्यादा है। ऑर्डर समय पर पूरा कर चाली भेजने के लिए तेजी से काम करना पड़ रहा है। आकार और डिजाइन के अनुसार एक चाली तैयार करने में करीब दो दिन लगते हैं। हर साल 300 से अधिक ऑर्डर मिलते हैं।”

कारीगरों के मुताबिक, चाली की कीमत करीब 5,000 रुपये से शुरू होती है। बारीक नक्काशी, बड़े आकार और इस्तेमाल होने वाली सामग्री के आधार पर इसकी कीमत 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। हालांकि बांस, कागज, कपड़ा, गोंद समेत कच्चे माल की कीमत बढ़ने से इस बार उत्पादन लागत भी बढ़ी है।

कारीगरों के लिए चाली बनाना केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक विरासत है। इस काम में धैर्य और बारीकी की खास जरूरत होती है। बदलते समय के साथ पूजा की सजावट में आधुनिकता और नई थीम शामिल हुई हैं, लेकिन कृष्णनगर की पारंपरिक चाली की मांग अब भी बरकरार है।

दुर्गापूजा से पहले बागदी पाड़ा में बढ़ती रफ्तार इसका प्रमाण है। जल्द ही यहां तैयार चाली नदिया जिले के अलग-अलग पूजा मंडपों में पहुंचेंगी और देवी प्रतिमाओं की खूबसूरती में एक और रंग जोड़ेंगी।

धुबुलिया में बंद कमरे में पड़ा ब्रिटिश दौर का सैन्य वाहन

दीपंकर एडबार

धुबुलिया (नदिया) । इतिहास केवल किताबों और संग्रहालयों में सुरक्षित नहीं रहता। कई बार वह किसी पुराने भवन की दीवारों, जंग लगे लोहे या वर्षों से बंद पड़े दरवाजों के पीछे भी मौजूद होता है। नदिया के धुबुलिया थाना क्षेत्र के काठालबागान, स्थानीय रूप से काठालतला इलाके में ऐसा ही एक संभावित ऐतिहासिक अवशेष वर्षों से उपेक्षित पड़ा है। ब्रिटिश दौर की एक पुरानी संरचना के भीतर रखा ठोस लोहे का सैन्य वाहन स्थानीय लोगों के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के इस्तेमाल में था। लेकिन इस दावे की आधिकारिक पुष्टि और वाहन के इतिहास का दस्तावेजी रिकॉर्ड क्या है, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, वाहन कई दशकों से इसी परिसर में मौजूद है। कभी यह इलाका सरकारी कामकाज से जुड़ा था। स्थानीय निवासी झुमा देवी के अनुसार, बचपन में जब भवन कभी-कभार खुलता था, तब अंदर हथियार और युद्ध से जुड़े कई उपकरण भी दिखाई देते थे। अब भवन लंबे समय से बंद है और परिसर लगभग वीरान पड़ा है।

समय के साथ पुरानी इमारत की हालत भी खराब होती गई। कई जगह ईंट की दीवारें टूट चुकी हैं। दीवारों के बीच उग आई झाड़ियां और जंगली वनस्पतियां पूरे परिसर को घेर चुकी हैं। पीछे की ओर टूटे हिस्से से अंदर का कुछ भाग दिखाई देता है, लेकिन सामने का हिस्सा लगभग पूरी तरह झाड़ियों से ढका हुआ है।

सबसे अहम सवाल अब वाहन की वास्तविक पहचान को लेकर है। इसका निर्माण कब हुआ था? इसे किस सैन्य इकाई ने इस्तेमाल किया? क्या इसका द्वितीय विश्व युद्ध से सीधा संबंध था? वर्तमान में यह संपत्ति किस विभाग के अधीन है और इसकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी है—इन सवालों पर स्थानीय स्तर पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।

स्थानीय लोगों की मांग है कि पहले विशेषज्ञों और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के जरिए वाहन की पहचान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जांच की जाए। यदि इसका युद्धकालीन संबंध प्रमाणित होता है, तो इसे संरक्षित कर स्थानीय इतिहास और विरासत से जुड़े एक छोटे संग्रहालय या प्रदर्शनी केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है।

फिलहाल धुबुलिया में इतिहास का एक संभावित महत्वपूर्ण अध्याय बंद दरवाजे के पीछे है। सवाल सिर्फ एक पुराने सैन्य वाहन को बचाने का नहीं, बल्कि उस इतिहास को दस्तावेजबद्ध करने का भी है, जिसके मिट जाने के बाद उसकी वास्तविक कहानी शायद हमेशा के लिए खो सकती है।

दुर्गोत्सव 2026 : दुर्गापूजा से पहले बढ़ी रोशनी की मांग, कृष्णनगर के कारीगर दिन-रात जुटे

दीपंकर एडबार

कृष्णनगर (नदिया) । दुर्गापूजा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचने के साथ ही कृष्णनगर के प्रकाश कारीगरों की व्यस्तता बढ़ गई है। शहर के पूजा मंडपों के अलावा बदकुल्ला, नवद्वीप और आसपास के इलाकों से भी ऑर्डर मिलने के कारण कारीगर एक साथ कई काम पूरा करने में जुटे हैं। पंचमी से पहले अधिकांश मंडपों में रोशनी का काम पूरा करने के लिए कार्यशालाओं में देर रात तक काम चल रहा है।

इस बार पूजा की रोशनी में पारंपरिक सजावट के साथ तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ा है। एलईडी, चेन लाइट, मूविंग लाइट और फानूस लाइट की मांग के साथ थीम आधारित लाइटिंग की मांग बढ़ी है। कई पूजा समितियां मंडप की थीम के अनुरूप विशेष डिजाइन चाहती हैं। कुछ जगहों पर संगीत के साथ तालमेल रखते हुए रोशनी के ऑन-ऑफ होने की व्यवस्था भी की जा रही है।

इस बदलाव का असर प्रकाश कारीगरों के काम करने के तरीके पर भी पड़ा है। अब केवल लाइट तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। मंडप की डिजाइन और थीम के अनुसार फ्रेम तैयार करना, विद्युत कनेक्शन की जांच करना, तैयार उपकरणों को निर्धारित स्थान तक पहुंचाना और वहां जाकर इंस्टॉलेशन करना भी काम का हिस्सा बन गया है।

कृष्णनगर के प्रकाश कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, इस सीजन में शहर के बाहर से मिलने वाले ऑर्डर ने बाजार का दायरा बढ़ाया है। इससे लाइट बनाने वाले कारीगरों के साथ फ्रेम तैयार करने वाले श्रमिकों, इलेक्ट्रीशियन, परिवहन कर्मियों और इंस्टॉलेशन टीमों को भी अतिरिक्त काम मिल रहा है। आवश्यक कच्चे माल का एक बड़ा हिस्सा कोलकाता से मंगाया जाता है, जबकि डिजाइन और तैयार करने का काम स्थानीय स्तर पर होता है।

हालांकि बढ़ते ऑर्डर के साथ समय का दबाव भी बढ़ा है। एक ही समय में कई पूजा मंडपों का काम पूरा करने के लिए कारीगरों को दिन-रात काम करना पड़ रहा है। तैयार रोशनी को अलग-अलग इलाकों में भेजने के साथ वहां इंस्टॉलेशन के लिए टीम भी रवाना की जा रही है।

प्रकाश कारीगरों का कहना है कि पूजा समितियों की पसंद तेजी से बदल रही है। अब सामान्य रोशनी के बजाय अलग और आकर्षक डिजाइन की मांग अधिक है। इससे एक ओर स्थानीय प्रकाश कारोबार को नया बाजार मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर कम समय में अधिक काम पूरा करने की चुनौती भी बढ़ गई है।

पूजा का समय नजदीक आने के साथ कृष्णनगर की कार्यशालाओं में अब अंतिम दौर की तैयारी चल रही है। लक्ष्य स्पष्ट है-पंचमी से पहले अधिकतम ऑर्डर पूरा कर रोशनी को विभिन्न पूजा मंडपों तक पहुंचाना।

दुर्गोत्सव 2026 : 356 साल से जारी है बागची परिवार की दुर्गापूजा

दीपंकर एडबार

करीमपुर (नदिया) । कभी जमींदारी की शान का गवाह रहा नदिया के जामशेरपुर स्थित बागची परिवार का विशाल भवन अब जर्जर हो चुका है। दीवारों से ईंटें झड़ रही हैं, पुरानी इमारतों पर समय के निशान साफ दिखाई देते हैं। लेकिन इस घर की 356 साल पुरानी दुर्गापूजा आज भी उसी परंपरा और श्रद्धा के साथ जारी है। परिवार के अनुसार, 1711 में सृष्टिधर बागची ने इस पूजा की शुरुआत की थी और तब से इसमें कभी विराम नहीं आया।

अविभाजित बंगाल के राजशाही क्षेत्र से बागची परिवार नदिया के जामशेरपुर आया था। स्थानीय गोआला समुदाय के साथ उनके करीबी संबंधों ने इलाके में परिवार की सामाजिक और जमींदारी स्थिति मजबूत करने में भूमिका निभाई। आज भी पूजा की कई महत्वपूर्ण परंपराओं में स्थानीय गोआला और घोष समुदाय की भागीदारी बनी हुई है।

बागची परिवार की दुर्गापूजा का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। यह घर कवि और साहित्यकार जतिंद्रमोहन बागची की स्मृतियों से भी जुड़ा है। ‘काजला दीदी’ के रचयिता जतिंद्रमोहन बागची का नाम इस परिवार और जामशेरपुर से गहराई से जुड़ा रहा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में क्रांतिकारियों की आवाजाही भी इस घर में होती थी। बाघा जतिन और काजी नजरुल इस्लाम जैसी हस्तियों के यहां आने की स्मृतियां भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं।

पूजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक शैली है। यहां एकचाला प्रतिमा स्थापित की जाती है और देवी को डाक की साज से सजाया जाता है। वैष्णव रीति से पूजा होने के कारण मुख्य चार दिनों में शाकाहारी भोग दिया जाता है। लेकिन दशमी पर परंपरा बदलती है। उस दिन कचू शाक और इलीश मछली का विशेष भोग लगाया जाता है।

एक समय बागची परिवार की दुर्गापूजा का वैभव अलग ही था। परिवार के अनुसार, देवी को करीब 400 तोले सोने के आभूषणों से सजाया जाता था और चोरी की आशंका के कारण पूजा के दौरान पुलिस पहरा भी रहता था। पुराने नाटमंदिर में नाटक और जात्रा के आयोजन होते थे तथा कोलकाता से कलाकार आते थे।

आज परिवार की अगली पीढ़ी रोजगार के कारण अलग-अलग जगहों पर रहती है। लेकिन पूजा के दिनों में वे जामशेरपुर लौटते हैं। बड़े थीम पंडाल या आधुनिक सजावट के बजाय विशाल चांदनी के नीचे पारंपरिक पूजा होती है। दशमी के दिन स्थानीय घोष समुदाय को पत्तल पर भोजन कराने के बाद उन्हीं के कंधों पर प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाई जाती है।

जमींदारी का वैभव भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन बागची परिवार की दुर्गापूजा आज भी उस इतिहास को जीवित रखे हुए है।