Monday, September 21, 2026
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भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज को एकेडमी लीडर आफ दी ईयर अवार्ड

कोलकाता । दी भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ने सर्वश्रेष्ठ एसोचैम एडु मीट 2026का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त किया है।इस सम्मान का विषय “शिक्षा का भविष्य और कौशल –विजन 2030″रहा। भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज को यह पुरस्कार उसके उन्नत प्रगतिशील एकेडमिक शिक्षा , और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम विश्वविद्यालय की स्थापना आदि में अपना योगदान देने की पहचान बनाने के कारण  है। 21अगस्त 2026को यह ताज कुटीर कोलकाता में ऑस्ट्रेलिया के काउंसलेट जनरल काउंसिल जनरल एच. ई.बर्नार्ड लिंच द्वारा प्रो दिलीप शाह और प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी को सौंपा गया।इस अवसर पर प्रो दिलीप शाह ने अपने वक्तव्य में शिक्षा के भविष्य पर अपने विचार व्यक्त किए। कॉलेज ने उनके सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी के वार्षिक पुरस्कार के लिए नामांकन किया ।यह भवानीपुर परिवार के लिए गौरव की बात है। जानकारी दी डाक्टर वसुंधरा मिश्र ने।

एनसीसी कैडेटों और सशस्त्र बलों के बीच रक्षा सूत्र बांधे

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज के त्रि-सेवा एनसीसी विंग ने, 31 बंगाल बीएन एनसीसी, 2 बंगाल नेवल यूनिट एनसीसी और 1 बंगाल एयर स्क्वाड्रन एनसीसी*, पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय के तत्वावधान में, रक्षा बंधन 2026 को “मेन इन यूनिफॉर्म” के साथ मनाया, जिसकी शुरुआत बहादुर कर्मियों के साथ हुई*बिहार रेजिमेंट की 14वीं बटालियन* अल्बर्ट एक्का ऑडिटोरियम, विजय दुर्ग में।उनके साहस, समर्पण और सेवा के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि के रूप में, एसडब्ल्यू कैडेटों ने राष्ट्र की सेवा के लिए खुद को समर्पित करने वालों के प्रति अपना आभार और स्नेह व्यक्त करते हुए, उपस्थित सभी रैंकों के बीच राखी बांधी और मिठाइयां बांटीं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि इस उत्सव ने एनसीसी कैडेटों और सशस्त्र बलों के बीच बंधन को मजबूत करते हुए सम्मान, सौहार्द और कृतज्ञता की भावना को खूबसूरती से प्रतिबिंबित किया।

 

स्वतंत्रता दिवस पर लें तीन रंगों में घुला स्वाद

तिरंगा सैंडविच – ब्रेड की एक स्लाइस पर हरी पुदीना-धनिया चटनी लगाएं, दूसरी पर पनीर या मेयोनीज की सफेद परत और तीसरी पर गाजर या टमाटर का स्प्रेड लगाएं। तीनों स्लाइस को एक साथ रखकर त्रिकोण आकार में काटें। यह झटपट बनने वाला स्वादिष्ट स्नैक है।
तिरंगा इडली – इडली के बैटर को तीन हिस्सों में बांट लें। एक हिस्से में पालक की प्यूरी, दूसरे को सादा रखें और तीसरे में गाजर की प्यूरी मिलाएं। इडली मोल्ड में तीनों बैटर को अलग-अलग भरकर 10-12 मिनट तक स्टीम करें। नारियल चटनी के साथ परोसें।
तिरंगा ढोकला– बेसन के घोल को तीन हिस्सों में बांटें। पहले में पालक प्यूरी, दूसरे को सादा रखें और तीसरे में गाजर की प्यूरी मिलाएं। तीनों परतों को एक-एक करके स्टीम करें। ऊपर से राई, करी पत्ता और हरी मिर्च का तड़का लगाकर सर्व करें।


तिरंगा पुलाव- चावल को तीन हिस्सों में बांट लें। एक हिस्से में पालक प्यूरी मिलाकर हरा रंग दें, दूसरे को सादा रखें और तीसरे में गाजर का पेस्ट या कद्दूकस की हुई गाजर मिलाकर नारंगी रंग तैयार करें। तीनों चावलों को परतों में सजाकर गर्मागर्म परोसें।

रक्षाबंधन स्पेशल : भाई-बहन के रिश्ते पर बने ये गाने हैं सबसे खास

रक्षाबंधन आते ही घरों में एक अलग तरह की रौनक देखने को मिलती है। बाजारों में रंग-बिरंगी राखियां सज जाती हैं और मिठाइयों की खुशबू आने लगती है। इस त्योहार की खुशी सिर्फ राखी बांधने और मिठाई खिलाने तक सीमित नहीं है। कुछ चीजें ऐसी हैं, जो हर साल इस दिन की यादों को और खास बना देती हैं। इनमें बॉलीवुड के वो गाने भी शामिल हैं, जो भाई-बहन के रिश्ते को कभी प्यार, कभी भावुकता और कभी मस्ती के साथ सामने लाते हैं। यही वजह है कि रक्षाबंधन के मौके पर इन गानों के बिना त्योहार की रौनक कुछ अधूरी सी लगती है। ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ – साल 1959 में आई फिल्म ‘छोटी बहन’ का यह गाना आज भी रक्षाबंधन की पहचान बना हुआ है। लता मंगेशकर की आवाज में इस गीत में एक बहन अपने भाई से रिश्ते को निभाने की बात कहती है। इसके भाव सीधे दिल तक पहुंचते हैं। यही कारण है कि 67 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी जब राखी का त्योहार आता है, तो यह गाना कई घरों में जरूर सुनाई देता है। इस गाने में शंकर-जयकिशन की धुन और शैलेंद्र के लिखे बोल हैं। फिल्म ‘छोटी बहन’ में बलराज साहनी, नंदा और रहमान जैसे कलाकार नजर आए थे। ‘फूलों का तारों का’ – साल 1971 की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का यह गीत भाई-बहन के प्यार को बेहद प्यारे अंदाज में दिखाता है। किशोर कुमार की आवाज में गाया गया यह गीत भाई की अपनी बहन के लिए भावनाओं को दिखाता है। गाने में भाई-बहन के बीच के रिश्ते की झलक मिलती है, इसमें बचपन की शरारत के साथ-साथ एक-दूसरे के लिए गहरा प्यार भी होता है। यह गाना राखी के दिन ही नहीं, बल्कि दूसरे खास मौकों पर भी याद किया जाता है।

‘बहना ने भाई की कलाई से’ – साल 1974 में आई फिल्म ‘रेशम की डोरी’ का यह गीत सुमन कल्याणपुर की आवाज में है। धर्मेंद्र और सायरा बानो पर फिल्माया गया यह गीत राखी के त्योहार से जुड़ी बहन की भावनाओं को जाहिर करता है। इसमें बहन अपने भाई की लंबी उम्र और खुशियों की कामना करती नजर आती है। गीत की सादगी ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

‘धागों से बांधा’ – अक्षय कुमार की फिल्म ‘रक्षा बंधन’ का यह गाना भाई-बहन के रिश्ते को नए अंदाज में पेश करता है। अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल की आवाज में यह गाना भाई-बहन के साथ बड़े होने, बचपन की यादों और एक-दूसरे के लिए किए गए छोटे-बड़े त्याग की बात करता है। इसकी धुन और भाव आज की पीढ़ी को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।

‘तैनू संग रखना’ – फिल्म ‘जिगरा’ का यह गाना भाई-बहन के रिश्ते की गहराई को दिखाता है। अरिजीत सिंह की आवाज इस गाने के भाव को शानदार बनाती है। फिल्म की कहानी में भाई और बहन का रिश्ता ही सबसे अहम है, इसलिए यह गीत रक्षाबंधन के मौके पर आज की पीढ़ी को आसानी से जोड़ता है।
–आईएएनएस

फिराक गोरखपुरी : आईसीएस की नौकरी छोड़ी, जेल गए

फिराक गोरखपुरी का नाम उर्दू शायरी की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका असली नाम रघुपति सहाय था और उन्होंने अपनी शायरी से उर्दू गजल को एक नई पहचान दी। उनकी जिंदगी सिर्फ शेर और गजलों तक सीमित नहीं थी। इसमें पढ़ाई में शानदार सफलता, सरकारी नौकरी, देश की आजादी की लड़ाई, जेल, राजनीति और साहित्य का लंबा सफर शामिल था। उन्होंने आजादी की लड़ाई के लिए अपनी अच्छी-खासी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। उनकी शुरुआती गजलों को मशहूर लेखक प्रेमचंद का साथ भी मिला था। फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनका परिवार पढ़ा-लिखा और संपन्न था। उनके पिता गोरख प्रसाद खुद साहित्य में रुचि रखते थे और कविता लिखते थे। फिराक ने बचपन से ही उर्दू और फारसी सीखी। आगे चलकर उन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में अपनी पढ़ाई जारी रखी। पढ़ाई में वह काफी तेज थे। बीए की परीक्षा में उन्होंने पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया। इसी दौर में साहित्य और शायरी के प्रति उनका लगाव तेजी से बढ़ने लगा।
साल 1916 में, जब फिराक करीब 20 साल के थे और बीए के छात्र थे, उन्होंने अपनी पहली गजल कही। उस समय मशहूर लेखक प्रेमचंद भी गोरखपुर में थे और दोनों के बीच अच्छे संबंध थे। प्रेमचंद ने फिराक की शुरुआती प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने उनकी शुरुआती गजलों को आगे पहुंचाने में मदद की और उन्हें ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम तक भेजा। यही वह समय था जब फिराक के भीतर का शायर धीरे-धीरे लोगों के सामने आने लगा।
पढ़ाई पूरी करने के बाद फिराक को सरकारी नौकरी मिली। उनका चयन पीसीएस के साथ आईसीएस के लिए भी हुआ। उस समय आईसीएस में जाना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। यह एक ऐसा करियर था जिसमें अच्छी नौकरी और सम्मान दोनों मिलते थे। लेकिन देश उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर फिराक ने सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला किया।
आजादी की लड़ाई में शामिल होने की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा। जेल से बाहर आने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस के काम से जोड़ा और वह कुछ समय तक कांग्रेस कार्यालय में अवर सचिव रहे।
बाद में फिराक ने राजनीति से अलग होकर शिक्षा और साहित्य को अपना मुख्य रास्ता बनाया। साल 1930 के आसपास वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े और वहां अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने लगे। वह हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार थे। उनकी शायरी में प्रेम, इंसानी भावनाओं, जिंदगी और समाज की कई तस्वीरें दिखाई देती हैं। उन्होंने गजल के साथ नज्म, रुबाई और दूसरी काव्य विधाओं में भी लिखा।
फिराक की प्रमुख रचनाओं में ‘रूह-ए-कायनात’, ‘गुले-नग्मा’, ‘गुले-राना’, ‘शबनमिस्तान’ और ‘रूप’ जैसी किताबें शामिल हैं। उनकी किताब ‘गुले-नग्मा’ ने उन्हें साहित्य की दुनिया में सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें 1960 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और 1969 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह उर्दू साहित्य के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बने।
साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार भी मिला। 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी की फेलोशिप दी गई। आगे चलकर उन्हें गालिब अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ, और उनकी शायरी ने उर्दू साहित्य में अपनी अलग जगह बनाई।
फिराक गोरखपुरी का निधन 3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में हुआ। वह करीब 85 साल के थे। उनके जाने के बाद भी उनकी शायरी लोगों के बीच बनी रही।

बंगाल के छात्रविहीन स्कूलों में 19,502 शिक्षक, 4,133 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं

-6,769 स्कूलों में केवल एक शिक्षक कार्यरत

कोलकाता, नि.सं.। पश्चिम बंगाल की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों और छात्रों की उपलब्धता को लेकर गंभीर असंतुलन सामने आया है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 4,133 ऐसे स्कूल हैं जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है। इस मामले में पश्चिम बंगाल अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाद देश में दूसरे स्थान पर है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन छात्रविहीन स्कूलों में 19,502 शिक्षक तैनात बताए गए हैं। इससे शिक्षकों की तैनाती और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य में 6,769 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक कार्यरत है। इन स्कूलों में 2.29 लाख से अधिक छात्र पढ़ रहे हैं। ऐसे में एक ही शिक्षक को पढ़ाई के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में प्रति शिक्षक करीब 30 छात्र हैं। इस मामले में केवल झारखंड का अनुपात अधिक है, जहां एक शिक्षक पर 36 छात्र हैं। वहीं, राज्य में एक स्कूल में औसतन केवल छह शिक्षक हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और मेघालय में यह औसत पांच शिक्षक प्रति स्कूल है।  यूडीआईएसई के आंकड़े राज्य में स्कूलों में छात्रों की संख्या में भारी अंतर भी दिखाते हैं। पश्चिम बंगाल के कुल 93,147 स्कूलों में करीब आठ प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां 10 से भी कम छात्र हैं। दूसरी ओर, 8.5 प्रतिशत स्कूलों में 500 से अधिक छात्र पढ़ते हैं। राज्य सरकार ने आंकड़ों में सामने आए इस अंतर के एक हिस्से के लिए निजी स्कूलों द्वारा सही जानकारी अपलोड नहीं किए जाने को जिम्मेदार ठहराया है। शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने कहा कि स्कूलों को यूडीआईएसई पोर्टल पर छात्रों, शिक्षकों और भवन की स्थिति से जुड़ी जानकारी अनिवार्य रूप से अपलोड करनी होती है, लेकिन कुछ निजी स्कूलों ने अब तक आंकड़े अपलोड नहीं किए हैं। इससे राज्य की पूरी तस्वीर प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि स्कूलों को जल्द से जल्द आंकड़े अपलोड करने के लिए कहा गया है और जानकारी पूरी होने के बाद राज्य की स्थिति में बदलाव दिखाई देगा। बर्मन ने पिछले 15 वर्षों में शिक्षक भर्ती में अनियमितताओं को भी कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी का एक कारण बताया। उन्होंने कहा कि सरकार इस असंतुलन को दूर करने के लिए काम कर रही है। जिन स्कूलों में शिक्षकों की संख्या जरूरत से अधिक है, वहां से शिक्षकों को शिक्षक-विहीन या शिक्षक-कमी वाले स्कूलों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सरकार को उम्मीद है कि साल के अंत तक इस समस्या का समाधान कर लिया जाएगा।

रक्षाबंधन पर पौष्टिक हो मिठास

डेट्स रोल

सामग्री – 1 कप बीज निकाले हुए खजूर , ¼ कप बादाम – ,¼ कप काजू, ¼ कप अखरोट, 2 टेबलस्पून नारियल का बुरादा, ½ टीस्पून इलायची पाउडर,1 टेबलस्पून तिल

विधि – खजूर बहुत सख्त हों तो उन्हें 5-10 मिनट गुनगुने पानी में भिगोकर अच्छी तरह सुखा लें। बादाम, काजू और अखरोट को मिक्सर में दरदरा पीस लें। अब खजूर डालकर दोबारा ब्लेंड करें। मिश्रण चिपचिपा होकर एक साथ आने लगे तो मिक्सर बंद कर दें। इसमें इलायची पाउडर और नारियल का बुरादा मिलाएं। मिश्रण को प्लेट पर निकालकर हाथों से अच्छी तरह मिलाएं। इसे रोल का आकार दें और ऊपर से तिल या नारियल लगाएं। 10 मिनट फ्रिज में रखकर छोटे टुकड़ों में काट लें।

मखाना लड्डू


सामग्री -1 चम्मच मखाने, 2 बड़े चम्मच भुनी हुई मूंगफली, आधा कप पिसा हुआ गुड़, 2 बड़े चम्मच घी, 15-20 काजू, 10-15 बादाम, 10-15 पिस्ता, 1 बड़ा चम्मच कद्दू के बीज, 1 छोटा चम्मच तिल के बीज, 2 बड़े चम्मच सूखा नारियल, 1 छोटा चम्मच अलसी के बीज
विधि – मखाने से लड्डू बनाने के लिए एक पैन में गुड़ डालकर चाशनी बनाएं। अब दूसरे पैन में घी डालकर मखाने को रोस्ट कर लें और सुनहरा होने पर गैस बंद कर दें। पैन से मखाने निकालकर दूसरे सामग्री को भून लें जैसे काजू, बादाम, पिस्ता, अलसी, तिल, नारियल, मूंगफली और कद्दू के बीजडालकर भून लें। सभी को क्रश कर लें या मिक्सी में दरदरा क्रश कर लें। लड्डू बनाने के लिए मिश्रण बना लें, इसके लिए एक बड़े बाउल में मखाना और दूसरे नट्स को मिक्स करें फिर उसमें गुड़ की चाशनी डालकर सभी के साथ मिला लें, ताकि लड्डू अच्छे से बना पाएं। मिश्रण और चाशनी को मिक्स करने के बाद हाथों में घी लगाकर छोटे-छोटे लड्डू बना लें। लड्डू को ठंडा होने के बाद इसे एयर टाइट कंटेनर में स्टोर कर इसका सेवन करें।

 

 

राखी के साथ क्यों बांधा जाता है कलावा?

रक्षाबंधन का पर्व भाई और बहन के प्रिश्ते को और ज्यादा मजबूत बनाता है और इस दिन भाई-बहन हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन देते हैं।लवैसे तो इस दिन मुख्य रूप से भाई के हाथों में राखी बांधने की प्रथा है, लेकिन इसके साथ ही कलावा भी बांधा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि बहन राखी के साथ भाई के हाथ में कलावा भी बांधती है, तो भाई की हर बुरी शक्ति से रक्षा होती है। यही नहीं भाई को समृद्धि का आशीर्वाद भी मिलता है।  कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है और इसे बांधने से सभी बाधाओं से सुरक्षा का वरदान मिलता है। आइए आपको बताते हैं राखी के साथ कलावा बांधने के फायदे क्या हैं और इसका महत्व क्या है?

कलाई में कलावा बांधना एक प्रतीकात्मक रिवाज है जो सुरक्षा का आशीर्वाद देता है। मुख्य रूप से रक्षाबंधन के दिन कलावा बांधना आजीवन सुरक्षा, प्रेम और अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है। यदि बहनें रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई में कलावा बांधती हैं तो यह एक सुरक्षा चक्र बना देता है। इससे भाई को सुरक्षा का आशीर्वाद मिलता है और करियर में भी सफलता के योग बनते हैं। रक्षाबंधन के दिन जब बहन भाई की कलाई में कलावा बांधती है तो यह उनके बीच के रिश्ते को और ज्यादा मजबूत बनाता है। कलावा बांधने की प्रक्रिया के साथ बहन अपने भाई की समृद्धि, सफलता और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती है और ईश्वर का आशीर्वाद लेती है। यह सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करने और अपनी शुभकामनाएं देने का एक तरीका माना जाता है।

भाई – बहन ऐसे मजबूत रखें अपना रिश्ता

रक्षा बंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं है जहां बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसे मिठाई खिलाती है। बल्कि यह भाई-बहन के बीच प्यार, विश्वास और अटूट रिश्ते की निशानी है। आज की बदलती लाइफस्टाइल और बिजी रूटीन की वजह से, भाई-बहन अक्सर उतना समय एक साथ नहीं बिता पाते जितना वे बिताते थे। ऐसे में, रक्षा बंधन का त्योहार भाई-बहनों को एक बार फिर से करीब लाने का एक शानदार मौका देता है। अगर आप रक्षा बंधन के मौके पर अपने भाई के साथ अपना रिश्ता और मजबूत करना चाहते हैं, तो कुछ छोटे लेकिन सार्थक कदम उठा सकते हैं।
– एक-दूसरे के लिए समय निकालें और रिश्ते को मजबूत करने के लिए खुलकर बातचीत करें।
-मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ दें, यह किसी भी महंगे तोहफे से कहीं ज्यादा कीमती होता है।
-रक्षाबंधन पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के जरिए पुरानी यादों को ताजा करना और साथ ही भविष्य के लिए रिश्ते को और मजबूत बनाने की कोशिश करना सबसे अच्छा रहता है।
साथ बैठकर पुरानी तस्वीरें देखना, एक-दूसरे की पसंद का खाना बनाना और उसका आनंद लेना, अपने दिल की बातें साझा करना और साथ मिलकर नई योजनाएं बनाना रिश्ते में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
रक्षाबंधन पर एक-दूसरे के लिए समय निकालें
आजकल हर कोई अपने फोन और काम में व्यस्त रहता है। रक्षाबंधन के मौके पर आप अपने भाई के लिए थोड़ा समय निकाल सकती हैं। साथ बैठकर बातें करें, पुरानी यादें ताजा करें और बिना फोन के साथ समय बिताएं आपकी यह छोटी सी कोशिश आपके रिश्ते में अपनापन और नजदीकी बढ़ाएगी।
यादगार पल बनाएं -महंगे तोहफे देने के बजाय यादगार पल बनाएं। साथ में फिल्म देखें, डिनर के लिए बाहर जाएं, साथ में घूमने जाएं या अपनी पसंदीदा कोई गतिविधि करें। भाई-बहनों का साथ में बिताया गया अच्छा समय हमेशा याद रहने वाली यादें बनाता है।
पुरानी यादें ताजा करें – बचपन की तस्वीरें देखें और पुरानी कहानियों को याद करें। आप हंसेंगे और उन पलों को याद करेंगे जिनके बारे में आपने लंबे समय से नहीं सोचा था। बचपन की यादें भाई-बहनों को भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब लाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
दिल से बात करें -भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन इसे शब्दों में बयां नहीं कर पाते। राखी के मौके पर, अपने भाई या बहन को खुलकर बताएं कि वे आपके लिए कितने खास हैं। दिल से की गई तारीफ या बस एक थैंक यू भी आपके रिश्ते को और मजबूत बना सकता है।
मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने का वादा करें – जब भाई-बहन जिंदगी के उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ देते हैं, तो उनका रिश्ता और मजबूत होता है। इस रक्षाबंधन पर, यह वादा करना एक बहुत अच्छा विचार है कि जरूरत पड़ने पर आप हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहेंगे।
पुरानी शिकायतों को भूल जाएं -अगर लंबे समय से कोई मनमुटाव या अनबन चली आ रही है, तो रक्षाबंधन का त्योहार उसे भुलाने का एक बेहतरीन मौका है। हमें छोटी-मोटी बातों को सुलझाने और अपने रिश्ते को फिर से बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए। माफी मांगने या माफी स्वीकार करने से मन का बोझ हल्का हो सकता है और रिश्ता और भी मजबूत बन सकता है

शुभजिता स्वदेशी : एमडीएच मसाले और धर्मपाल गुलाटी

दुनिया में पैसा कमाना कठिन काम है। दुनिया के सफल और नामचीन लोगों ने अपने इरादे और मेहनत से कई बड़े मुकाम हासिल किए हैं। ऐसे ही एक सफल इंसान की कहानी है जो सबको जीने और सफल बनने का नया अंदाज देती है। मसाला किंग के नाम से मशहूर महाशाय धर्मपाल गुलाटी कभी तांगा चलाते थे तांगे से 2 आने में सवारी बैठाने वाला यह व्यक्ति कारोबार जगत की नई ऊंचाइयों को छूता चला गया। सियालकोट के बाजार पंसारिया में धर्मपाल के पिता चुन्नीलाल मिर्च मसालों की एक दुकान चलाते थे जिसका नाम महाशियां दी हट्टी था। यही महाशियां दी हट्टी आज मसालों की दुनिया में एमडीएच के नाम से एक बड़ा ब्रांड बन चुकी हैं। 60 का दशक आते-आते महाशियां दी हट्टी करोलबाग में मसालों की एक मशहूर दुकान बन चुकी थी।
हम बात कर रहे हैं एमडीएच मसाला कंपनी के मालिक महाशय धर्मपाल की। इनका जन्म 27 मार्च 1927 को सियालकोट में हुआ था। 1933 में इन्होंने पांचवी कक्षा की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी। 1937 में महाशय जी ने पिता की मदद से शीशे का छोटा सा बिजनेस शुरु किया। उसके बाद साबुन और दूसरे कई बिजनेस किए लेकिन उनका मन नहीं लगा। बाद में उन्होंने मसालों का कारोबार शुरू किया, जो उनका पुश्तैनी कारोबार था।
27 सिंतबर 1947 में भारत बंटवारे के वक्त महाशय भारत आ गए। उनकी जेब में सिर्फ 1500 रुपए थे। उन्होंने 650 रुपए में एक तांगा खरीदा और चलाने लगे। वह दो आना प्रति सवारी लेते थे। धर्मपाल ने कई बार अपने तांगे पर गांधीजी को बिठाकर शहर घुमाया है। उसके बाद उन्होंने एक खोखा खरीदा और उसमें अपना मसालों का बिजनेस देगी मिर्च वालों के नाम से फिर से शुरु किया। 10 अक्टूबर 1948 में धर्मपाल ने अपना तांगा और घोड़ा बेच दिया। सियालकोट की एक बड़ी दुकान से उठकर धर्मपाल का पूरा परिवार एक छोटे से खोखे में आ पहुंचा। लेकिन आगे चल कर धर्मपाल ने मिर्च मसालों का जो साम्राज्य स्थापित किया उसकी नींव इसी छोटे से खोखे पर रखी गई थी। अखबारों में विज्ञापन के जरिए जैसे-जैसे लोगों को पता चला कि सियालकोट की देगी मिर्च वाले अब दिल्ली में हैं धर्मपाल का कारोबार तेजी से फैलता चला गया।
महाशय धर्मपाल के परिवार ने छोटी सी पूंजी से कारोबार शुरू किया था लेकिन, कारोबार में बरकत के चलते वह दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में दुकान दर दुकान खरीदते चले गए। परिवार ने पाई-पाई जोड़कर अपने धंधे को आगे बढ़ाया और मिर्च-मसालों की बिक्री जब ज्यादा होने लगी तो उनकी पिसाई का काम घर के बजाए अब पहाड़गंज की मसाला चक्की में होने लगा था।
सियालकोट के दिनों से ही मसालों की शुद्धता गुलाटी परिवार के धंधे की बुनियाद थी। यही वजह थी कि धर्मपाल ने मसाले खुद ही पीसने का फैसला कर लिया। लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था। वो भी उन दिनों में जब बैंक से कर्ज लेने का रिवाज नहीं था। लेकिन महाशय धर्मपाल की ये मुश्किल ही उनकी कामयाबी की वजह बन गई। गुलाटी परिवार ने 1959 में दिल्ली के कीर्ति नगर में मसाले तैयार करने की अपनी पहली फैक्ट्री लगाई थी। 93 साल के लंबे सफर के बाद सियालकोट की महाशियां दी हट्टी आज दुनिया भर में एमडीएच के रूप में मसालों का ब्रांड बन चुकी है।
धर्मपाल मसालों की दुनिया में बेमिसाल रहे। उनकी कंपनी सालाना अरबों रुपयों का कारोबार करती है। लेकिन एक तांगे वाले से अरबपति बनने की उनकी ये अदभुत कामयाबी कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा है। दौलत के ढेर पर बैठकर भी महाशय धर्मपाल ईमानदारी, मेहनत और अनुशासन का पुराना पाठ नहीं भूले। उनके मसाले दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं और इसके लिए उन्होंने देश और विदेश में मसाला फैक्ट्रियों का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया है।
दुबई में फैक्ट्री, लंदन, शारजाह, यूएस में ऑफिस है। एमडीएच के पूरी दुनिया में डिस्ट्रिब्यूटर हैं। इसके अलावा गल्फ देशों में भी आपको एमडीएच के मसाले मिलेंगे। ऑस्ट्रेलिया चले जाएं, साउथ अफ्रीका चले जाएं, न्यूजीलैंड चले जाएं, हांगकांग, सिंगापुर यहां तक चीन और जापान में भी एमडीएच है। 40 सुपर स्टॉक हैं पूरे भारत में और 1000 डिस्ट्रिब्यूटर हैं। हर महीने छह लाख आउटलेटस को केटर करते हैं। महाशय धर्मपाल गुलाटी को व्यापार और उद्योग-खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 3 दिसंबर 2020 को 98 वर्ष की उम्र में इनका निधन हुआ।

(साभार – जी न्यूज)