Saturday, June 27, 2026
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हिन्दी पत्रकारिता द्विशताब्दी पर जारी हुआ स्मारक डाक टिकट

‘हिन्दी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा’ सहित तीन पुस्तकों का विमोचन, ऐतिहासिक प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केन्द्र

नयी दिल्ली। हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार ने हिन्दी के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ और उसके सम्पादक युगल किशोर शुक्ल के सम्मान में एक स्मृति डाक टिकट और प्रथम दिवस आवरण जारी किया। संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में यहां आईजीएनसीए सभागार में आयोजित कार्यक्रम में ‘हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल की महागाथा’ ग्रंथ का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने शुभकामना संदेश भेजा, जिसे आईजीएनसीए के अध्यक्ष ‘पद्म भूषण’ रामबहादुर राय ने पढ़कर सुनाया।  राय आयोजन की अध्यक्षता कर रहे थे। अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा, “वर्ष 1826 में ‘उदन्त मार्त्तणड’ के प्रकाशन के साथ आरम्भ हुई हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी की यात्रा का यह अहम पड़ाव भारत की चेतना, विचार और जनजागरण का उत्सव है।”
इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा, यह अतिश्योक्ति नहीं होगी, अगर हम कहें कि पत्रकारिता के इतिहास की गाथा भारत के इतिहास की भी गाथा है। आज का आयोजन भारत की वैचारिक चेतना का उत्सव है। उन्होंने कहा, पत्रकारिता कोई पेशा नहीं है, यह राष्ट्र चेतना का आंदोलन है। श्री सिंधिया ने पत्रकारिता में अपने पूर्वजों के योगदान का भी स्मरण किया। उन्होंने कहा, ज़माना बदल जाए, तकनीक बदल जाए, मंच बदल जाए, लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलना चाहिए।
आयोजन में ‘हिन्दी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा’ का विमोचन भी हुआ। ‘पद्म श्री’ विजयदत्त श्रीधर और डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा संपादित यह ग्रंथ हिन्दी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की व्यापक यात्रा का दस्तावेज है। इस पुस्तक में हिन्दी पत्रकारिता के 30 दिग्गजों के लेख शामिल हैं, जो हिन्दी पत्रकारिता के विविध पक्षों के उद्भव, विकास और वर्तमान स्थिति के बारे में बताते हैं। इसके साथ ही, कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्रीकांत सिंह की पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता के हिन्दीतर उन्नायक’ का भी लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक में गैर-हिन्दीभाषी क्षेत्रों के पत्रकारों के हिन्दी पत्रकारिता में योगदान के बारे में बताया गया है।
कार्यक्रम का एक अन्य प्रमुख आकर्षण हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की यात्रा को चित्रित करने वाली विशेष प्रदर्शनी रही। प्रदर्शनी में हिन्दी के अग्रणी समाचारपत्रों, पत्रिकाओं तथा युगनिर्माता संपादकों के दुर्लभ चित्र और ऐतिहासिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए। आगंतुकों ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ से लेकर समकालीन पत्रकारिता तक की विकास-यात्रा को एक ही स्थल पर देखने का अवसर प्राप्त किया। प्रदर्शनी ने पत्रकारिता के इतिहास में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पत्रकारों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री रामबहादुर राय ने कहा, लोकतंत्र है, तो पत्रकारिता है। अकेले पत्रकारिता नहीं हो सकती। उन्होंने सवाल उठाया कि जो भी ऊटपटांग बातें सोशल मीडिया पर चलाई जाती हैं, क्या वो ख़बर है? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, सोशल मीडिया पर जो भी लिखा जा रहा है, वह सब ख़बर नहीं है। कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए श्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा, हिन्दी पत्रकारिता की 200 वर्ष की य़ात्रा प्रतिरोध की यात्रा है। स्वागत वक्तव्य में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, पत्रकारिता के सामने कई चुनौतियां हैं। भाषाई पत्रकारिता के सामने और ज़्यादा चुनौतियां हैं। भारत की हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल भारत की अस्मिता की रक्षा, सांस्कृतिक चेतना का इतिहास है।
आशीष वक्तव्य में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र ने दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी और गणेश शंकर विद्यार्थी को याद करते हुए कहा, उस समय पत्रकारिता में ऐसे-ऐसे लोग थे जिन्होंने देश को सबसे आगे रखा और अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव, शिक्षाविद्, साहित्यकार डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने आयोजन का प्रस्ताव वक्तव्य दिया। कार्यक्रम के दौरान, आईजीएनसीए के मीडिया केंद्र द्वारा हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा पर आधारित एक लघु फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। साथ ही, भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) की कुलपति डॉ. प्रज्ञा पालीवाल तथा प्रो. प्रमोद कुमार ने मंच पर उपस्थित अतिथियों को ‘संचार माध्यम’ पत्रिका का ‘हिन्दी पत्रकारिता : 200 वर्ष’ विशेषांक भेंट किया। आईजीएनसीए की ओर से अतिथियों को स्मृति-चिह्न तथा सप्रे संग्रहालय की ओर से स्मृति-स्वरूप विशेष कलम भेंट की गई। अंत में, आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा ने धन्यवाद ज्ञापन किया, जबकि मंच संचालन प्रसिद्ध न्यूज़ एंकर प्रीति सिंह ने किया।

मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी

रेखा श्रीवास्तव

आज मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी पढ़ी। वैसे यह कहानी पहले भी पढ़ी थी। जितनी बार पढ़ती हूँ, उतनी ही बार कुछ नया लगता है। सबसे बड़ी खास बात लगती है कि उनकी कहानी पात्रों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। स्पष्ट तरीके से लिखती है। यह कहानी भी वैसी ही है। नाम से ही स्पष्ट है कि ज्ञान देने वाली स्त्री। यह एक चिट्ठी है, अपनी प्यारी बहनों के नाम। आज के समय में तो चिट्ठी का नामों निशान नहीं। इसलिए यह और भी ज्यादा प्रासंगिक है। इसके माध्यम से आज की लड़कियों को चिट्ठी का ज्ञान भी होगा। और सबसे बड़ी बात है कि लड़कियाँ जो कम उम्र की होती है, शादीशुदा आदमी से प्रेम कर बैठती है। शादीशुदा इंसान उसके भोले भाले मन का बहुत अच्छे से फायदा उठाता है। वह बहुत ही साधारण भाषा में स्कूल, कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों को बताना चाहती है कि जब वह नौकरी में आयीं, तो उनको अपने ही बॉस शिंदे से प्रेम हो गया। पुरुष अपना घर, परिवार बचाते हुए ही बाहरी प्रेम कैसे जिंदा रखते हैं। वह अपनी मीठी-मीठी बातों से कम उम्र की लड़कियों का दिल ले लेते हैं और उनकी भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं। शिंदे उम्मीद दिलाता रहता है कि वह सारे सुख देगा, लेकिन वहीं बहुत चालाकी से यह भी स्पष्ट करता रहता है कि उसको पत्नी के नाम से ही कितनी चिढ़ है। वह इस कहानी के माध्यम से कहना चाहती है कि यह ज्ञान देने के चक्कर में उनकी गृहस्थी तक टूट सकती है, लेकिन फिर भी वह अपने प्यार के बारे में बताकर युवतियों को बचाना चाहती है। वह लड़कियों को खुलेआम सावधान करती है कि शादीशुदा का बाहरी प्यार छलावा के अलावा कुछ भी नहीं है। वह अपनी पत्नी से प्रेम करें या न करें, लेकिन उनकी गृहस्थी की गाड़ी यथावत चलती रहती है। घर, मकान बनता रहता है, बच्चे भी बड़े होते रहते हैं और सारी जिम्मेदारियाँ भी चलती रहती है। बस, उन सब से थकने पर उन्हें बाहर एक सुकून भरी जगह चाहिए, बस प्रेमिका मात्र उतना ही स्थान बना पाती है। युवतियाँ चाहे कितने भी सपने देख लें, कितने भी साल लगा दें, लेकिन उसकी जिंदगी वैसी ही वैसी ही वीरान रह जायेगी। जब शिंदे को लगता है कि उसकी पत्नी को उसके प्यार के बारे में शक हो सकता है, तो तुरंत अपना तबादला करवा लेता है। यानी अपने घर-गृहस्थी पर कोई आंच नहीं देना चाहता है। कहानी के अंत में वह स्पष्ट करती हैं कि अगर प्रेम करना है तो शादी शुदा औरतें ही शादीशुदा पुरुषों से प्यार करें, जिससे ना ही किसी को कोई उम्मीद हो, प्रेम हो, जब तक प्रेम किये , प्रेम किये वापस अपने खूटे पर। उन्होंने यह बात व्यंग्य में की है, या वास्तव में । यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन उनकी कहानी पढ़ने के बाद सोचने पर विवश करती है। इसलिए शायद मुझे उनकी कहानी अच्छी लगती है। इस कहानी में जहाँ एक तरफ आगाह है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के लिए एक रास्ता भी दिखाया गया है। वहीं, दूसरी तरफ यह भी समझा जा सकता है कि 42 वर्षीय महिला जब कम उम्र में थी अपने ही बॉस से प्रेम कर बैठती है, लेकिन वह चाहती है कि मेरी तरह अन्य कोई लड़की शादीशुदा पुरुष से प्रेम में न फंसे, इसलिए आगाह करने के लिए अपनी बहनों को यह पत्र लिखती है और कहती है कि अगर प्रेम करना ही है तो शादीशुदा महिलाओं को ही शादीशुदा पुरुषों से प्रेम करना चाहिए, जिससे कुछ भी खोने जैसा नहीं होता। प्रेम हुआ तो बढ़िया, नहीं तो अपने खूटे में वापस। मेरे ख्याल से यह शादीशुदा पुरुष, जो कम उम्र की लड़कियों से प्रेम करते हैं, उन्हें सपना दिखाते हैं और वह सालों बाद भी केवल उसको प्रेमिका बना कर रखते हैं। उन पुरुषों का राज खुलेआम खोल कर पुरुषों का चरित्र चित्रण किया है। या फिर यह भी कहना चाहती होंगी कि हम महिलाएं हमेशा कुछ खोये, यह तो कोई जरूरी नहीं। जिस तरफ शादीशुदा पुरुष बाहर प्यार करके कुछ भी खोता नहीं है, उसी तरह महिलाएं भी कुछ खोये नहीं।

गर्मियों में बनाएं झटपट बनने वाली रेसिपी

गर्मियों के मौसम में किचन में ज्यादा देर खड़े होकर खाना बनाना किसी चुनौती से कम नहीं लगता। तेज गर्मी और उमस की वजह से कई बार कुछ भारी या ज्यादा मेहनत वाला बनाने का मन ही नहीं करता। ऐसे में लोग ऐसी डिशेस की तलाश करते हैं, जो जल्दी बन जाएं, स्वादिष्ट भी हों और शरीर को हल्का महसूस कराएं। खासतौर पर दोपहर के समय हल्का और फ्रेश खाना खाने का मन ज्यादा करता है। अगर आप भी गर्मियों में रोज-रोज लंबे समय तक किचन में काम करके परेशान हो जाते हैं, तो कुछ आसान और झटपट बनने वाली डिशेस आपके लिए बेहतरीन विकल्प हो सकती हैं। ये डिशेस कम समय में तैयार हो जाती हैं और खाने में भी काफी टेस्टी लगती हैं।
दही चावल देगा ठंडक का एहसास
गर्मियों में दही चावल सबसे आसान और हल्की डिश मानी जाती है। इसे बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता और यह पेट को ठंडक देने में मदद कर सकता है। उबले हुए चावल में ताजा दही, नमक और हल्का तड़का मिलाकर स्वादिष्ट दही चावल तैयार किया जा सकता है। कई लोग इसमें अनार, हरी मिर्च और करी पत्ता भी डालना पसंद करते हैं। यह डिश गर्मियों में पेट को हल्का और ताजा महसूस कराने में मदद कर सकती है।

वेज सैंडविच है झटपट ऑप्शन
अगर ज्यादा कुकिंग का मन नहीं है, तो वेज सैंडविच अच्छा विकल्प हो सकता है। ब्रेड में खीरा, टमाटर, प्याज और हल्का चीज़ या बटर लगाकर इसे कुछ ही मिनटों में तैयार किया जा सकता है। इसे ग्रिल करके या बिना ग्रिल किए भी खाया जा सकता है। बच्चों से लेकर बड़े तक इसे पसंद करते हैं। गर्मियों में हल्की भूख के लिए यह एक आसान और स्वादिष्ट डिश मानी जाती है।

फ्रूट और स्प्राउट्स सलाद रहेगा हेल्दी
गर्मियों में फ्रूट और स्प्राउट्स सलाद खाना काफी फायदेमंद माना जाता है। इसमें कटे हुए फल, अंकुरित दालें, नींबू और हल्का मसाला मिलाकर स्वादिष्ट सलाद तैयार किया जा सकता है। यह शरीर को एनर्जी देने के साथ ताजगी भी बनाए रखने में मदद करता है। खास बात यह है कि इसे बनाने के लिए गैस जलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। हेल्दी और हल्का खाना पसंद करने वालों के लिए यह शानदार विकल्प हो सकता है।

बेसन चीला और ठंडी चटनी का लें मजा
बेसन चीला भी गर्मियों में जल्दी बनने वाली टेस्टी डिश मानी जाती है। बेसन में प्याज, टमाटर और हल्के मसाले मिलाकर कुछ ही मिनटों में चीला तैयार किया जा सकता है। इसे हरी चटनी या दही के साथ खाया जाए, तो इसका स्वाद और बढ़ जाता है। यह हल्का होने के साथ पेट भरने वाला विकल्प भी माना जाता है। कम मेहनत में स्वादिष्ट खाना बनाने के लिए ऐसी डिशेस गर्मियों में काफी काम आ सकती हैं।

यह है सही तरीके से कंडीशनर लगाने का तरीका

बालों को खूबसूरत और चमकदार बनाए रखने के लिए सिर्फ शैम्पू करना ही काफी नहीं होता है। बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि उनके बाल रूखे और बेजान रहते हैं लेकिन इसकी मुख्य वजह कंडीशनर का गलत इस्तेमाल या इसे बिल्कुल न लगाना हो सकता है। कुछ लोग कंडीशनर को बॉडी लोशन की तरह इस्तेमाल करते हैं या लगाने के तुरंत बाद बाल धो लेते हैं जिससे बालों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है। अगर आप भी रेशमी और मुलायम बाल चाहते हैं तो कंडीशनर लगाने का सही तरीका और इसके प्रकारों को समझना बेहद जरूरी है।
​कंडीशनर लगाने से पहले बालों को ऐसे करें तैयार
​शैम्पू करने के तुरंत बाद टपकते हुए गीले बालों पर कभी भी कंडीशनर न लगाएं। ऐसा करने से कंडीशनर बालों की सतह पर टिक नहीं पाता और पानी के साथ बह जाता है। शैम्पू करने के बाद अपने हाथों से बालों का अतिरिक्त पानी हल्के हाथों से निचोड़ लें। ध्यान रखें कि बालों को ज़ोर से न रगड़ें और न ही तौलिये से झटके से सुखाएं क्योंकि इससे बालों की बाहरी परत को नुकसान पहुंच सकता है। जब बाल हल्के नम रह जाएं तब कंडीशनर का इस्तेमाल करें ताकि वह बालों के अंदर तक समा सके।

​कंडीशनर लगाने का सही और प्रभावी तरीका
​अक्सर लोग कंडीशनर को स्कैल्प यानी सिर की त्वचा पर लगा लेते हैं जो कि बिल्कुल गलत है। कंधे तक लंबे बालों के लिए एक चौथाई चम्मच जितनी मात्रा पर्याप्त होती है। इसे सिर्फ बालों के बीच के हिस्से से लेकर नीचे सिरों तक लगाएं। अपनी उंगलियों या चौड़े दांतों वाली कंघी की मदद से इसे पूरे बालों में समान रूप से फैलाएं। जब आपको बाल चिकने और सुलझे हुए महसूस होने लगें तो समझें कि कंडीशनर सही तरीके से लग चुका है।

​समय का रखें ध्यान और ऐसे करें साफ
​कंडीशनर लगाने के बाद उसे कम से कम दो से पांच मिनट तक बालों में लगा रहने दें। इस दौरान आप अपना कोई दूसरा काम कर सकते हैं। बालों को धोते समय हमेशा ठंडे या हल्के गुनगुने पानी का ही इस्तेमाल करें। ठंडा पानी बालों की नमी को लॉक करने में मदद करता है। बालों को तब तक अच्छी तरह धोएं जब तक कि पूरा चिपचिपापन निकल न जाए। अगर बालों में कंडीशनर रह जाएगा तो बाल भारी और तैलीय दिखने लगेंगे।

​अपनी जरूरत के हिसाब से चुनें सही कंडीशनर
​बाजार में अलग-अलग जरूरतों के लिए कई तरह के कंडीशनर उपलब्ध हैं। सामान्य बालों के लिए रिंस-आउट कंडीशनर सबसे अच्छा होता है जिसे हर बार शैम्पू के बाद लगाकर धो दिया जाता है। अगर आपके बाल केमिकल ट्रीटमेंट या हीटिंग टूल्स की वजह से बहुत ज्यादा ड्राई और डैमेज हो गए हैं तो हफ्ते में एक या दो बार डीप कंडीशनिंग ट्रीटमेंट का इस्तेमाल करें, जिसे दस से बीस मिनट तक बालों में छोड़ना होता है। इसके अलावा लीव-इन कंडीशनर भी एक बेहतरीन विकल्प है जिसे बाल धोने के बाद लगाया जाता है और धोया नहीं जाता। यह दिनभर बालों को धूप और प्रदूषण से बचाता है।

​वेगा हॉट कर्ल हेयर ब्रश से दें बालों को परफेक्ट लुक
​कंडीशनिंग के बाद बालों को सुखाने स्टाइल करने और उनका वॉल्यूम बढ़ाने के लिए एक अच्छे स्टाइलिंग टूल की जरूरत होती है। इसके लिए वेगा हॉट कर्ल हेयर ब्रश मॉडल नंबर एच वन पीआर बी एक शानदार विकल्प है। यह ब्रश आपके बालों को सुखाने के साथ-साथ उन्हें एक बेहतरीन वॉल्यूम और इन-टर्न या आउट-टर्न कर्ल्स देता है। सही कंडीशनिंग के बाद जब आप इस वेगा ब्रश का इस्तेमाल करते हैं तो बालों का रूखापन पूरी तरह खत्म हो जाता है और आपको पार्लर जैसा लुक घर पर ही मिल जाता है।

एक अगस्त से बंगाल में शुरू होगी जनगणना

कोलकाता । पश्चिम बंगाल में आगामी एक अगस्त से जनगणना का कार्य शुरू किया जाएगा। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को राज्य सचिवालय नवान्न में आयोजित पत्रकार वार्ता में इसकी घोषणा की। उन्होंने बताया कि जनगणना की प्रक्रिया अगस्त 2026 से शुरू होकर फरवरी 2027 तक चलेगी।

मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी नागरिकों से जनगणना कार्य में सक्रिय सहयोग करने की अपील करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया देश और राज्य दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की जनसांख्यिकीय स्थिति विशेष महत्व रखती है, क्योंकि राज्य की लगभग 600 किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। उन्होंने दावा किया कि सीमा के कुछ हिस्सों में अब तक फेंसिंग नहीं होने और पूर्ववर्ती सरकार द्वारा सीमा सुरक्षा बल को जमीन उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव आया है। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि पहली बार डिजिटल माध्यम से जनगणना कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, जबकि पश्चिम बंगाल में यह कार्य अपेक्षाकृत देर से आरंभ हो रहा है। बावजूद इसके, राज्य सरकार तय समय सीमा के भीतर जनगणना पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने लोगों से अपील की कि सभी नागरिक सही और सटीक जानकारी देकर प्रशासन का सहयोग करें, ताकि जनगणना प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो सके।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने जनगणना प्रक्रिया में हुई देरी के लिए पूर्ववर्ती सरकार और पूर्व मुख्य सचिव को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यह कोई कैबिनेट का विषय नहीं था, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर लिया जाने वाला निर्णय था। मुख्यमंत्री के अनुसार, पूर्व मुख्य सचिव राजनीतिक सहमति का इंतजार करते रहे, जिसके कारण जनगणना कार्य समय पर शुरू नहीं हो पाया।

 

 

 अजीम शायर बशीर बद्र

– वसुधा ‘कनुप्रिया’

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

उर्दू के मशहूर शायर, पद्मश्री बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में भोपाल स्थित अपने निवास पर निधन हो गया। आप कई वर्षों से डिमेंशिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे।

उर्दू शायरी की दुनिया में बशीर बद्र ने आम आदमी की संवेदना, रिश्तों की नर्मी, टूटते भरोसे और प्रेम की तड़प को बेहद सादा लेकिन गहरे अंदाज़ में अभिव्यक्त किया है। उनकी शायरी ने साहित्यिक मंचों से लेकर आम जनमानस के दिलों तक एक ख़ास जगह बनाई।

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। बचपन से ही साहित्य और भाषा के प्रति उनका रुझान रहा था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में वहीं से उर्दू साहित्य में पीएचडी. की उपाधि अर्जित की। वे कुछ समय तक अध्यापन कार्य से भी जुड़े रहे। साहित्यिक वातावरण और उर्दू अदब की समृद्ध परम्परा ने उनके व्यक्तित्व और शायरी को गढ़ा।

बशीर बद्र ने स्वयं स्वीकार किया था कि वे परम्परागत उर्दू शायरी से गहरे प्रभावित रहे। मीर, ग़ालिब, फ़िराक़ और जिगर जैसे शायरों की परम्परा से उन्होंने बहुत कुछ सीखा, लेकिन अपनी शैली बिल्कुल अलग विकसित की। उनकी शायरी में कठिन फ़ारसी नहीं, बल्कि संवेदना युक्त सादा भाषा रही। शायरी में इसी सादगी और गहराई के कारण देश और दुनिया में उनके लाखों मुरीद हैं। उन्होंने प्रेम, अकेलापन, बिछोह और बदलते सामाजिक मूल्यों को बड़े सहज ढंग से अपने अशआर में व्यक्त किया।
उनके कई शेर अक़्सर लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं –

“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”

और

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

या

“दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

इन पंक्तियों में जीवन का अनुभव और मानवीय संवेदना ख़ूबसूरती से पेश किये गए हैं।

बशीर बद्र देश और विदेश के अनेक प्रतिष्ठित मुशायरों में शामिल हुए। भारत के बड़े साहित्यिक मंचों से लेकर पाकिस्तान, दुबई, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन तक उनकी ग़ज़लों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उनकी प्रस्तुति में एक विशेष ठहराव और सादगी थे। वे मंच पर ऊँची आवाज़ या नाटकीयता के बजाय भावनात्मक संप्रेषण के लिए जाने जाते थे। उनकी लोकप्रियता का कारण यह भी था कि वे कठिन उर्दू के बजाय ऐसी भाषा में शे’र कहते थे जिसे हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के पाठक आसानी से समझ सकें।

उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया।

उनकी ग़ज़लों के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें “आस”, मुसाफ़िर, उजालों की परियां, मैं बशीर हूँ प्रमुख हैं।

बढ़ती उम्र के साथ वे डिमेंशिया सहित कई बीमारियों से ग्रस्त हो गए। धीरे-धीरे उनकी स्मृति कमजोर होती चली गई। बताया जाता है कि वे कई परिचित लोगों और अपनी ही रचनाओं को पहचानने में कठिनाई महसूस करने लगे थे। उनकी पत्नी और बेटे ने कई बार इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया में पोस्ट किया कहाँ बद्र साहब अपनी की शायरी नहीं पहचान पाते थे।

कल, 28 मई 2026 को भोपाल में बशीर बद्र का निधन हो गया। उनकी शायरी हमेशा उनके मुरीदों के बीच उन्हें ज़िंदा रखेगी।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

उत्तराखंड की बेटी और शिव की अर्धांगिनी मां नंदा देवी

उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है और इस देवभूमि में मां नंदा देवी में विराजमान हैं। इस पावन धरा में माता रानी को सिर्फ देवी ही नहीं, बल्कि अपनी बेटी के रूप में पूजा जाता है। इसलिए उनकी पूजा में पूजा में श्रद्धा के साथ-साथ अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव भी देखने को मिलता है। ऐसी मान्यता है कि मां नंदा देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी (माता पार्वती) माना जाता है। गुरुवार को माता रानी की महिमा का उल्लेख उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का भव्य वीडियो शेयर किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, “अल्मोड़ा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक मां नंदा देवी का पावन मंदिर श्रद्धा, आस्था और विश्वास का दिव्य केंद्र है। पर्वतीय शिल्पकला से सुसज्जित यह प्राचीन मंदिर आदिशक्ति भगवती मां नंदा देवी को समर्पित है। आप भी अल्मोड़ा जनपद आगमन पर मां नंदा देवी के दर्शन अवश्य करें।”
‘मां नंदा देवी’ उत्तराखंड की आराध्या और हिमालय की संरक्षक देवी हैं, जिन्हें माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। उन्हें कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में ‘आनंद देने वाली देवी’ के रूप में पूजा जाता है। यह संपूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति और आस्था का मुख्य केंद्र हैं।
ऐसी मान्यता है कि देवी हर 12 साल में अपने मायके नौटी गांव आती हैं। इस अवसर पर कुमाऊं मण्डल नंदा राजजात यात्रा के तहत 280 किमी लंबी अत्यंत कठिन पदयात्रा निकाली जाती है, जो होमकुंड तक जाती है। यह यात्रा देवी नंदा के मायके (नौटी गांव, चमोली) से उनके ससुराल (कैलाश पर्वत) जाने की विदाई का प्रतीक है। इस यात्रा का नेतृत्व एक विशेष चार सींग वाले काले मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) द्वारा किया जाता है, जो देवी का वाहन माना जाता है।
इसी के साथ ही भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का भी विशेष महत्व है, जिसे नंदा अष्टमी भी कहा जाता है। इस अवसर पर बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ त्योहार मनाया जाता है। खास बात यह है कि इस दिन केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है।

होल्डिंग सेंटर खुलते ही बोरा-बिस्तर के साथ पहुंचने लगे बांग्लादेशी

-हकीमपुर सीमा पर लगी लंबी कतारें

बशीरहाट (उत्तर २४ परगना) । पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगातार घुसपैठिये को लेकर केंद्र सरकार सख्त रवैया अपना रखी है। बंगाल के नये मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हिरासत केंद्र खोलने की घोषणा की। उन्होंने अवैध बांग्लादेशियों (बांग्लादेशी घुसपैठियों) की पहचान और त्वरित ‘निर्वासन’ की भी घोषणा की। बंगाल सरकार के इस नये फरमान के बाद सीमा के पास लंबी कतारें देखी गईं। सैकड़ों बांग्लादेशी नागरिक, जो इतने लंबे समय से भारत में छिपे हुए थे और भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए थे, घर लौटने के लिए स्वरूपनगर के हकीमपुर सीमा पर पहुंच गए हैं। लोग कांटेदार तार पार करने का प्रयास हो रहा है। कई बार बांग्लादेशी सुरक्षा गार्ड से उनकी झड़प हो जा रही है।

स्वरूपनगर में बांग्लादेशियों की भीड़ – उत्तर 24 परगना जिले के स्वरूपनगर स्थित हकीमपुर सीमा चौकी पर मंगलवार सुबह से ही लंबी कतारें देखी जा रही हैं। बांग्लादेशी नागरिक जमा हो रहे हैं, जो लोग भारत में अवैध रूप से रह रहे थे या दलालों के माध्यम से देश में प्रवेश कर चुके थे। उन्होंने अब बांग्लादेश लौटने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। कतार में खड़े लोग यह स्वीकार कर रहे हैं कि वे इस देश में कानूनी रूप से नहीं रह रहे थे। जब एक व्यक्ति से पूछा गया, तो उसने कहा- सरकार हमें अब और रहने नहीं दे रही है, हमें बता रही है कि क्या करें। सरकार चाहती है कि हम अपने देश लौट जाएं। कुछ लोगों का कहना है कि जब वे इस देश में आए थे, तो वे दुकानों में काम करते थे, जबकि अन्य लोग वेट्रेस के रूप में काम करते थे।

कैसे शुरू होती है निर्वासन प्रक्रिया – केंद्रीय गृह मंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों का पता लगाया जाएगा, उन्हें देश से निकाला जाएगा और निर्वासित किया जाएगा। सत्ता में आने के एक महीने के भीतर ही भाजपा सरकार ने यह प्रक्रिया शुरू कर दी। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि घुसपैठिए के पकड़े जाने पर उसे सीधे निर्वासित करने या बांग्लादेश भेजने की व्यवस्था की जाएगी। बीएसएफ को सौंपने से पहले उन्हें रखने के लिए जिलों में हिरासत केंद्र भी खोले गए हैं। ये केंद्र केंद्र के दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्य में खोले गए हैं।

 

 

जन आबादी में परिवर्तन पर बनी उच्च स्तरीय कमेटी

नयी दिल्ली । सरकार ने मंगलवार को घुसपैठ और अन्य कारणों से देश में हो रहे अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय परिवर्तन की जांच के लिए एक पैनल का गठन किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर इस कदम के बारे में जानकारी साझा की, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2025 को की थी। शाह ने एक्स पर पोस्ट किया कि अवैध जनसांख्यिकीय परिवर्तन के लिए घुसपैठ और अन्य कारण किसी भी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती पेश करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इसी चुनौती से निपटने के लिए, 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्च स्तरीय समिति’ की घोषणा की थी। मुझे आपको यह सूचित करते हुए खुशी हो रही है कि सरकार ने अब इस समिति का गठन कर दिया है। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नौलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ श्री दुर्गा शंकर मिश्रा (सेवानिवृत्त आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (सेवानिवृत्त आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि सदस्य होंगे। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (विदेशी-I) इस समिति के सदस्य सचिव के रूप में कार्य करेंगे। देश के लिए जनसांख्यिकीय परिवर्तन को एक प्रमुख चिंता का विषय बताते हुए गृह मंत्री शाह ने कहा कि समिति एक व्यापक मूल्यांकन करेगी और समाधान प्रस्तुत करेगी। उन्होंने आगे कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा है जो न केवल हमारी संप्रभुता से जुड़ा है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गहन परिवर्तन और आदिवासी समाज के संरक्षण से भी संबंधित है। यह समिति अवैध आप्रवासन और अन्य अप्राकृतिक कारणों से पूरे भारत में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का व्यापक मूल्यांकन करेगी, धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर असामान्य जनसंख्या स्थानांतरण के पैटर्न का विश्लेषण करेगी और इसके लिए एक योजनाबद्ध और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी।

गर्मियों में ठंडक देकर तनाव दूर करती है फूलों की चाय

चाय की उत्पत्ति पांच हजार साल से भी पुरानी है, लेकिन आज भी यह पेय उतनी ही लोकप्रिय है। सर्दी, बारिश और यहां तक कि भीषण गर्मी में भी इसे पीने वाले कोई कोताही नहीं करते। दुनिया भर में 21 मई को चाय दिवस मनाया जाता है। दूध वाली चाय तनाव दूर करने में कारगर है। हालांकि, गर्मियों में चाय प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन और सेहतमंद विकल्प फूलों से बनी हर्बल टी भी है। कमल, गुड़हल, गुलाब, मौलश्री और पारिजात जैसे फूलों से बनी चाय न सिर्फ गर्मी की थकान और जलन से राहत देती है, बल्कि पूरे दिन ताजगी और एनर्जी भी बनाए रखती है। गर्मियों में गरम चाय पीने से पसीना बढ़ता है और शरीर और गर्म हो जाता है। वहीं, आयुर्वेद फूलों को औषधीय गुणों का खजाना मानता है। इन फूलों से बनी चाय एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होती है, जो इम्युनिटी बढ़ाती है, तनाव कम करती है और शरीर को अंदर से ठंडक प्रदान करती है। इन फूलों की चाय में कमल, मौलश्री, विष्णुप्रिया, कमल, गुड़हल, गुलाब, पारिजात, कृष्ण कमल, लैवेंडर, तेजपत्ता, तुलसी की चाय भी शामिल है।
मौलश्री की चाय:- बुखार, पुरानी खांसी और त्वचा की समस्याओं में रामबाण है और तनाव दूर करने में भी कारगर है।
कमल की चाय:- गर्मी में बुखार, प्यास और जलन से राहत देती है। मन को शांत रखती है और अच्छी नींद लाती है।
गुड़हल की चाय:- विटामिन-सी से भरपूर होती है। ब्लड प्रेशर कंट्रोल करती है, इम्युनिटी बूस्ट करती है और त्वचा को चमकदार बनाती है।
गुलाब की चाय:- मूड अच्छा रखती है, तनाव कम करती है, पाचन सुधारती है और थकान दूर करती है।
पारिजात या हरसिंगार की चाय :- जोड़ों के दर्द, सूजन और सर्दी-जुकाम से बचाव करती है।
कृष्णकमल की चाय:- चिंता, अनिद्रा और तनाव दूर कर अच्छी नींद लाती है।
लैवेंडर की चाय:- रिलैक्सेशन के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। यह थकान मिटाती है और त्वचा निखारती है।
घर पर फूलों की चाय बनाने के लिए एक कप गर्म पानी में 1-2 चम्मच ताजे या सूखे फूल डालें। 5 से 10 मिनट ढककर रखें, फिर छान लें। इसमें स्वाद के अनुसार शहद और नींबू भी मिला सकते हैं। रोजाना 1-2 कप पीने से गर्मी में भी शरीर ठंडा, मन शांत और एनर्जी बनी रहती है।
आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, इन चायों का नियमित सेवन गर्मी से होने वाली समस्याओं जैसे बुखार, थकान, तनाव और कमजोर इम्युनिटी से बचाता है। हालांकि, अगर किसी फूल से एलर्जी हो तो आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।