Friday, November 6, 2026
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माँ दुर्गा से हमें क्या सीखना चाहिए?

आनंद श्रीवास्तव

देवी पक्ष चल रहा है। हर हिंदू हिंदीभाषी घर में माँ दुर्गा की स्तुति हो रही है और पूजा-अर्चना का क्रम जारी है। वहीं, हिंदू बांग्लाभाषी परिवार उत्साह और उल्लास के साथ उत्सव-त्योहार मना रहे हैं। बंगाल में माँ दुर्गा बेटी के रूप में आती हैं और उनका खुले दिल से स्वागत किया जाता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि माँ से हमें क्या सीखना चाहिए?
माँ में शक्ति, समृद्धि और सद्बुद्धि का ऐसा अद्भुत संगम है, जो जीवन का बीजमंत्र है। हम माँ से अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप सब कुछ माँगते हैं और उनसे दया की अपेक्षा करते हैं, लेकिन माँ के गुणों को अपने भीतर उतारने और उनके जैसा बनने का साहस हममें नहीं होता।
माँ दुर्गा की दस भुजाएँ उनकी दस विशिष्ट शक्तियों का प्रतीक हैं। उनकी भुजाओं में सुशोभित विभिन्न अस्त्र-शस्त्र देवताओं द्वारा उन्हें प्रदान किए गए हैं। प्रत्येक अस्त्र अपने भीतर एक विशेष संदेश समेटे हुए है।
त्रिशूल भगवान शिव द्वारा प्रदत्त है, जो तम, रज और सत्त्व—तीनों गुणों के संतुलन तथा अंधकार, आलस्य और आवेग पर विजय का प्रतीक है। तलवार ज्ञान, बुद्धि और तीक्ष्ण विवेक का प्रतीक है। सुदर्शन चक्र भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ ब्रह्मांडीय अनुशासन और धर्म की स्थापना का प्रतीक है। कमल का फूल ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त माना जाता है, जो पवित्रता, आध्यात्मिक जागृति और संसार की विषय-वासनाओं के बीच अपनी आत्मिक पहचान बनाए रखने का संदेश देता है।
वज्र देवराज इंद्र की ओर से आंतरिक शक्ति, दृढ़ता और साहस का प्रतीक है। भाला अग्निदेव द्वारा प्रदत्त अस्त्र है, जो तेज, ऊर्जा और बुराई का सीना चीरकर आगे बढ़ने की क्षमता का प्रतीक है। कुल्हाड़ी और परशु अन्याय तथा नकारात्मकता का विनाश करने की शक्ति को दर्शाते हैं। गदा धर्म के प्रति सत्यनिष्ठा, दृढ़ता और शक्ति का प्रतीक है। वहीं, ढाल और कवच सुरक्षा, आत्मरक्षा और विपत्तियों का सामना करने की क्षमता का संदेश देते हैं।
ये सभी माँ की शक्तियों के प्रतीक हैं, जिन्हें विभिन्न देवताओं ने उन्हें प्रदान किया। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है—जब देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र माँ को सौंपे, तो क्या यह केवल उनकी उदारता थी, या इसके पीछे अपनी रक्षा की आवश्यकता भी थी?
पौराणिक कथाओं में हम देखते हैं कि जब-जब देवताओं पर संकट आया, तब-तब माँ दुर्गा ने उनके उद्धार का मार्ग प्रशस्त किया। मधु-कैटभ के संकट से लेकर रक्तबीज, चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ, महिषासुर और दुर्गमासुर जैसे दैत्यों के संहार तक, माँ ने बार-बार अपनी शक्ति और सामर्थ्य का परिचय दिया। देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए माँ का आह्वान किया और माँ ने उन्हें निराश नहीं किया।
लेकिन यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब देवताओं ने माँ को अस्त्र-शस्त्र दिए और माँ ने उनका उपयोग देवताओं की रक्षा के लिए किया, तो माँ के व्यक्तित्व में ऐसा क्या था, जिससे हमें अपने जीवन में सीख लेनी चाहिए?
माँ के पास केवल अस्त्र-शस्त्र नहीं थे, बल्कि एक पवित्र हृदय, सक्रिय मस्तिष्क और अद्भुत विवेक भी था। अस्त्र-शस्त्र देवताओं ने अवश्य दिए, लेकिन उनका उचित समय पर, उचित उद्देश्य के लिए और उचित तरीके से इस्तेमाल करने का कौशल माँ के पास था। उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और विवेक से उन शक्तियों को सार्थक बनाया और देवताओं को असुरों के आतंक से मुक्ति दिलाई।
यही माँ की सबसे बड़ी विशेषता है। शक्ति का होना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है उस शक्ति का सही दिशा में उपयोग करना। केवल साधन मिल जाने से विजय नहीं मिलती; विजय के लिए विवेक, साहस, धैर्य और सही निर्णय लेने की क्षमता भी आवश्यक है।
माँ का हृदय इतना उदार और पवित्र था कि उन्होंने कभी अपने स्वार्थ को प्राथमिकता नहीं दी। उन्होंने देवताओं को वरदान दिया कि जब-जब वे संकट में पड़कर उनका स्मरण करेंगे, तब-तब माँ उनकी रक्षा के लिए प्रकट होंगी। यह केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश भी है।
माँ दुर्गा इसलिए हमें अधिक प्रिय हैं, क्योंकि वे हमें केवल आशीर्वाद नहीं देतीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में साहस कैसे बनाए रखा जाए, कठिनाइयों के बीच विवेक कैसे बचाए रखा जाए और दूसरों की सहायता करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह कैसे किया जाए।
माँ हमें साहस देती हैं, सहनशीलता सिखाती हैं, प्रेम का अर्थ समझाती हैं और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने की प्रेरणा देती हैं।
इस देवी पक्ष में माँ से केवल अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना न करें, बल्कि यह संकल्प भी लें कि हम उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। हमारी शक्ति किसी को दबाने के लिए नहीं, बल्कि निर्बल का सहारा बनने के लिए हो; हमारी बुद्धि स्वार्थ साधने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और न्याय का मार्ग चुनने के लिए हो; और हमारा हृदय इतना उदार हो कि हम दूसरों के दुःख को भी अपना समझ सकें।
क्योंकि माँ की सच्ची आराधना केवल उनके सामने सिर झुकाने में नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने आचरण में उतारने में है।
जय माँ दुर्गा!

दुर्गा पूजा 2026 : परंपरा, कला और बदलते उत्सव का एक सांस्कृतिक अध्ययन

आनंद श्रीवास्तव

दुर्गा पूजा बंगाल की पहचान है। यहाँ पूजा और त्योहारों को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप और सामूहिक उत्सव के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। लोग पूरी शिद्दत से शारदीय दुर्गोत्सव के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। फिर पंचमी से दशमी तक बंगाल की धरती माँ दुर्गा की स्वर्णिम आभा से इस तरह आलोकित हो उठती है कि उसकी चमक से बंगाल के जनमानस का चेहरा भी पुलकित हो उठता है।
वर्ष 2026 सौभाग्य से ऐसा अवसर लेकर आया, जब इस उत्सव के बदलते स्वरूप का अध्ययन किया जा सका। पिछले कई वर्षों की तुलना में इस बार पूजा की प्रक्रिया और उसके समग्र स्वरूप में जो भिन्नताएँ दिखाई दीं, उन्हें चिह्नित करने से पहले कुछ विशिष्ट पंडालों और प्रतिमाओं पर चर्चा करना आवश्यक है।
कोलकाता और उसके आसपास दुर्गा पूजा के प्रमुख आकर्षणों को मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में देखा जा सकता है—उत्तर कोलकाता, दक्षिण कोलकाता और उत्तर 24 परगना के कुछ महत्त्वपूर्ण हिस्से। इसके अतिरिक्त, नदिया जिले के कल्याणी की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।
इस सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब से करते हैं। हालाँकि यहाँ जयपुर के प्रसिद्ध हवा महल को केंद्र में रखकर पंडाल का निर्माण किया गया है, लेकिन पिछले कई वर्षों की तुलना में इस बार इसकी भव्यता कुछ फीकी प्रतीत होती है। श्रीभूमि के पंडाल की भव्यता में कुछ गिरावट दिखाई देती है। हालाँकि, यहाँ माँ दुर्गा की प्रतिमा आकर्षण का प्रमुख केंद्र है, जो अपनी भव्यता और कलात्मक सौंदर्य के कारण दर्शकों का ध्यान आकर्षित करती है।
चोरबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा अपनी कलात्मकता, ध्वनि-संयोजन और अनूठी शिल्पकला के कारण एक सौम्य एवं विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करती है। वहीं, ताला प्रत्यय का पंडाल अपने विशाल बजट और डिटैचमेंट अर्थात् विरक्ति की अवधारणा पर आधारित विषयवस्तु के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र है। यह पंडाल एक अद्भुत कलाकृति प्रस्तुत करता है, जिसे उत्तर-आधुनिक कला का एक विशिष्ट उदाहरण माना जा सकता है। इस पंडाल की प्रतिमा भी अपनी विशिष्ट कलात्मकता और आकर्षक स्वरूप के कारण दर्शकों को प्रभावित करती है।
बागबाजार की प्रतिमा हमेशा की तरह इस बार भी अपनी सजीवता और पारंपरिक स्वरूप के साथ माँ दुर्गा की साकार छवि प्रस्तुत करती दिखाई देती है। इसकी प्रतिमा में परंपरा और आस्था का जो सहज समन्वय देखने को मिलता है, वह इसे विशिष्ट बनाता है।
यदि मध्य कोलकाता की बात करें, तो संतोष मित्रा स्क्वायर का पंडाल देशभक्ति के रंगों से सराबोर दिखाई देता है। यहाँ भारत के समकालीन इतिहास से जुड़ी कई झाँकियाँ एक साथ देखने को मिलती हैं। पूरा पंडाल ‘वंदे मातरम्’ की थीम पर आधारित है। भारत का मानचित्र भी अत्यंत खूबसूरती के साथ उकेरा गया है। यह महज एक पूजा पंडाल नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है।
कॉलेज स्क्वायर का पंडाल अपनी झील की खूबसूरती के साथ ‘अल्बर्ट म्यूजियम’ की थीम पर आधारित है। यहाँ स्थापत्य कला और प्राकृतिक परिवेश का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो इस स्थान के आकर्षण को और बढ़ा देता है।
अब दक्षिण कोलकाता के प्रमुख आकर्षणों की चर्चा करें। चेतला अग्रणी क्लब ने ‘विश्वरूपे विद्युपिनी’ थीम के अंतर्गत लगभग 100 फीट ऊँचे रथ की भव्य वास्तुकला को साकार किया है। इसकी विशालता और स्थापत्य सौंदर्य दर्शकों को आकर्षित करते हैं।
सुरुचि संघ, न्यू अलीपुर का पंडाल कमल के फूल की थीम पर आधारित है। यह भारतीय संस्कृति की गरिमा को उजागर करता है। यहाँ कला और संस्कृति का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो पंडाल को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
गुजरात के सोमनाथ मंदिर को आधार बनाकर एकडालिया एवरग्रीन क्लब ने भव्य वास्तुकला का परिचय दिया है। मंदिर की स्थापत्य परंपरा से प्रेरित यह पंडाल भारतीय सांस्कृतिक विरासत की गौरवशाली छवि प्रस्तुत करता है।
दमदम के तरुण संघ ने भी भारतीय संस्कृति के विविध रंगों के साथ-साथ पौराणिक एवं आध्यात्मिक गाथाओं को अत्यंत खूबसूरती से उकेरा है। इसकी विषयवस्तु में भारतीय परंपरा, आस्था और कलात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर मेल दिखाई देता है।
इसके अतिरिक्त, कल्याणी के आईटीआई मोड़ और ए-9 स्क्वायर के पंडाल भी अपनी भव्य विषयवस्तु के कारण विशेष महत्त्व रखते हैं। आईटीआई मोड़ के पंडाल की प्रकाश-सज्जा और माँ दुर्गा की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। वहीं, कल्याणी के ए-9 स्क्वायर में पंचकेदार की थीम के माध्यम से भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की सुंदर झलक देखने को मिलती है।
आकर्षण का एक अन्य प्रमुख केंद्र नैहाटी के राजेंद्रपुर में निर्मित ‘द्वारिका नगरी’ की थीम पर आधारित पंडाल है। यह अपनी विशिष्ट विषयवस्तु के कारण दर्शकों का ध्यान आकर्षित करता है।
कुल मिलाकर, इस बार दुर्गा पूजा के पंडालों में भारतीय अस्मिता और ऐतिहासिक गौरव को रेखांकित करने का पुरजोर प्रयास किया गया है। इन प्रयासों में सनातन संस्कृति की सुंदर झलक दिखाई देती है, जो नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं को समझने का अवसर प्रदान कर सकती है। इस प्रकार, दुर्गा पूजा केवल उत्सव मनाने का माध्यम न रहकर सांस्कृतिक चेतना के विकास का अवसर भी बन सकती है।
पूजा पंडालों में इस बार एक सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि पहले की तुलना में डीजे का शोर और अत्यधिक तेज आवाज में बजने वाले गानों का प्रचलन अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। अधिकांश पंडालों में मधुर आगमनी गीत अथवा उनकी विषयवस्तु के अनुरूप संगीत सुनाई देता है। कहीं कृष्ण की ध्वनि गूँजती है, तो कहीं माँ दुर्गा की स्तुति, रामभजन और हनुमान चालीसा वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं। पंडालों में इन भक्तिमय ध्वनियों के बीच श्रद्धालु भक्ति और आध्यात्मिकता के भाव का सहज अनुभव कर सकते हैं।
एक और अच्छी बात यह है कि इस बार दुर्गा पूजा के मूल महत्त्व और धार्मिक अनुष्ठानों को समझाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कई स्थानों पर पूजा की पारंपरिक गरिमा और आध्यात्मिक भाव को बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता है। यह बदलाव उत्सव के मूल उद्देश्य और धार्मिक महत्त्व को पुनः रेखांकित करता है।
कहीं-कहीं ‘वंदे मातरम्’ की ध्वनि भी सुनाई देती है, जो उत्सव के वातावरण में राष्ट्रीय गौरव के भाव को और प्रबल करती है।
इस बार की दुर्गा पूजा का एक और उल्लेखनीय पक्ष यातायात एवं सुरक्षा व्यवस्था है। ट्रैफिक पुलिस और सामान्य पुलिस की कार्यप्रणाली सहज, व्यवस्थित और प्रशंसनीय दिखाई देती है। श्रद्धालुओं की सहायता करने तथा भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिसकर्मियों की सक्रिय भूमिका सराहनीय है। जनता की मदद करने और व्यवस्था बनाए रखने में उनकी कार्यप्रणाली सहज एवं प्रशंसनीय प्रतीत होती है।
दुर्गा पूजा अपने साथ खुशियों, उल्लास और आकर्षण की एक नई ऊर्जा लेकर आई है। यह उत्सव हमें अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ-साथ कला, संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिकता के विविध आयामों से परिचित कराता है।
माँ दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद आप सभी पर सदैव बना रहे। सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। इसी मंगलकामना के साथ आप सभी को शारदीय दुर्गोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

देवी दुर्गा सम्मान 2026 : संतोष मित्रा स्क्वायर बना सर्वश्रेष्ठ पंडाल

कोलकाता । पश्चिम बंगाल में हर्षोल्लास के साथ मनाए जा रहे दुर्गा पूजा उत्सव के बीच राज्य के सूचना एवं संस्कृति विभाग की ओर से देवी दुर्गा सम्मान 2026 के विजेताओं की घोषणा कर दी गई है। शुक्रवार को कोलकाता के नंदन परिसर में आयोजित एक विशेष संवाददाता सम्मेलन में पुरस्कृत पूजा कमेटियों के नामों का ऐलान किया गया।

संवाददाता सम्मेलन में राज्य की सूचना एवं संस्कृति राज्य मंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती, विधायक रुद्रनील घोष, दोला कुंडू मंडल, पद्मश्री नारायण चक्रवर्ती, कौशिक बसाक और डॉ. राकेश कुमार पांडे जैसे गणमान्य लोग उपस्थित थे। इस वर्ष पुरस्कारों के लिए गठित निर्णायक मंडल में सरूप प्रसाद घोष, रेशमी दासगुप्ता, डॉ. राकेश पांडे, दोलन कुंडू मंडल और रुद्रनील घोष शामिल रहे।

पुरस्कार विजेताओं का विवरण साझा करते हुए बताया गया कि सर्वश्रेष्ठ पूजा यानी सर्वोच्च सम्मान संतोष मित्रा स्क्वायर, वृंदावन गार्डन दुर्गा पूजा समिति और चोरबागान सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति को दिया गया है।

सर्वश्रेष्ठ प्रतिमा के लिए मुदियाली क्लब, टाला बारोवारी दुर्गोत्सव समिति, बेहाला अरुणोदय समिति और अहीरीटोला सार्वजनिक को चुना गया है।

सर्वश्रेष्ठ आलोकसज्जा का पुरस्कार संतोषपुर एवेन्यू साउथ, बकुलबागान सार्वजनिक दुर्गोत्सव और शिवमंदिर सार्वजनिक दुर्गोत्सव ने जीता है। सर्वश्रेष्ठ मंडप का सम्मान खिदिरपुर 25 पल्ली क्लब और आमरा कजन कल्याण समिति को मिला है।

अन्य श्रेणियों में, सर्वश्रेष्ठ सामाजिक जागरूकता के लिए काशी बोस लेन दुर्गा पूजा समिति, बालीगंज कल्चरल एसोसिएशन, चक्रबेड़िया सार्वजनिक और अजेय संहति को पुरस्कृत किया गया है।

सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण अनुकूल पूजा का सम्मान नलिन सरकार स्ट्रीट सार्वजनिक दुर्गोत्सव, पार्क स्ट्रीट स्थित एलन पार्क और राजडांगा नव उदय संघ को दिया गया है। इसके अलावा विशेष पुरस्कार बी.जी. लाइन्स आवासीय दुर्गा पूजा कमेटी, श्याम स्क्वायर, ठाकुरपुकुर स्टेट बैंक सार्वजनिक और समाजसेबी संघ के खाते में गया है।

सर्वश्रेष्ठ सम्मान प्राप्त करने वाली पूजा कमेटियों को पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये का चेक और एक स्मृति चिह्न भेंट किया जाएगा। इन पुरस्कारों का वितरण आगामी 26 अक्टूबर को मिलन मेला प्रांगण में आयोजित होने वाले एक भव्य समारोह में किया जाएगा।

कलकत्ता विवि के पूर्व आचार्य प्रो. लोढ़ा एवं आचार्य शास्त्री के चित्रों का लोकार्पण

‘वाग्मी-विद्वत्ता की प्रतिमूर्ति थे प्रो. कल्याणमल लोढ़ा और आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री’

कोलकाता । कलकत्ता विश्वविद्यालय के चन्द्रमुखी सभागार में हिन्दी विभाग के पूर्व आचार्य-द्वय प्रो. कल्याणमल लोढ़ा एवं आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री के भव्य चित्रों का अनावरण अनुष्ठान संपन्न हुआ। विश्वविद्यालय के अध्यापकीय कक्ष (प्रोफेसर्स रूम) की दीवार पर ये चित्र विभाग के ही पूर्व प्राध्यापक आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल की प्रतिच्छवि के पार्श्व में स्थापित होंगे। हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा भारतीय शिक्षण मंडल, दक्षिण बंग प्रान्त के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘हिन्दी आचार्य परम्परा और कलकत्ता विश्वविद्यालय’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की आचार्य परम्परा का भावपूर्ण स्मरण किया।महानगर के विशिष्ट हिंदी ग्रंथागार सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय की ओर से इन दोनों चित्रों को प्रदान किया संस्था के अध्यक्ष भरत जालान एवं मंत्री दुर्गा व्यास ने। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय की कार्यसमिति के दोनों  दिवंगत सदस्यों की प्रतिच्छवि प्रदान करते हुए हमें आनंद और गौरव की अनुभूति हो रही है। कार्यक्रम की संयोजक, हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि पितृपक्ष के अवसान और मातृपक्ष के आगमन के इस पवित्र समय पर यह आयोजन अपने पूर्व आचार्यों के प्रति कृतज्ञता निवेदन का लघु प्रयास है। उन्होंने इस कार्य के प्रेरक डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी एवं सौजन्य प्रदान करने वाले जालान पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत जालान के प्रति आभार व्यक्त किया। डॉ. राजश्री शुक्ला ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की सुदीर्घ आचार्य परम्परा का उल्लेख करते हुए हिन्दी विभाग के सभी आचार्यों के अवदान का स्मरण किया। समारोह के विशिष्ट वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के अपने विद्यार्थी-काल को याद करते हुए प्रो. कल्याणमल लोढ़ा और आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री के अध्यापकीय कौशल और मनीषी व्यक्तित्व को रेखांकित किया। डॉ. त्रिपाठी ने इन दोनों के साथ आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल को ‘वाग्मी विद्वत्ता की विरल विभूति’ के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि ‘स्वाभिमानी हिन्दी साधक’ के रूप में सुकुलजी; हिन्दी की अस्मिता के संपोषक के रूप में प्रो. लोढ़ा तथा ‘विद्या ददाति विनयम्’ की प्रतिमूर्ति के रूप में आचार्य शास्त्री अविस्मरणीय हैं। अपने प्रभावी वक्तव्य में कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. सत्या उपाध्याय ने प्रो. लोढ़ा एवं आचार्य शास्त्री के व्यक्तित्व-कृतित्व के विविध पक्षों का उल्लेख किया। उन्होंने आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री को भारतीय ज्ञान परम्परा के अधिकारी विद्वान के रूप में याद करते हुए उन्हें श्रेष्ठ अध्यापक, कर्मठ देशभक्त और सम्माननीय राजनेता बताया। कार्यक्रम का प्रारंभ शोधार्थी प्रियंका कुमारी सिंह के शक्ति मंत्र से हुआ तथा शोधार्थी प्रीतम रजक ने भारतीय शिक्षण मंडल के ध्येय श्लोक एवं ध्येय वाक्य का पाठ किया। अतिथियों का स्वागत उत्तरीय, पुष्प गुच्छ और पुस्तक से डॉ. रामप्रवेश रजक, डॉ. अनूपा आर्या (मास्को यूनिवर्सिटी), श्लोक पाण्डेय, डॉ मनीषा त्रिपाठी ने किया । धन्यवाद ज्ञापन किया हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. राम प्रवेश रजक ने। शुभंकर मिश्र के कल्याण मंत्र वाचन से कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी, जादव कृष्ण दास, डॉ. अनूपा आर्या, डॉ. शुभ्रा उपाध्याय इत्यादि प्राध्यापकों के अतिरिक्त शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों आदि की उपस्थिति रही।

हरिदेवपुर के ’41 पल्ली क्लब’ को ‘कॉम्फेक्स दुर्गापूजा इनोवेशन अवार्ड्स

 1 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि देकर किया गया सम्मानित

कोलकाता । दुर्गापूजा पंडाल की सजावट में ‘एक्सपेंडेड पॉलीइथिलीन’ (ईपीई) फोम के रचनात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए ‘कॉम्फेक्स – ईपीई फोम सॉल्यूशंस’ ने ‘कॉम्फेक्स दुर्गा पूजा इनोवेशन अवार्ड्स 2026′ के विजेताओं की घोषणा की। इस पुरस्कार के जरिए कोलकाता की उन पूजा कमेटियों की रचनात्मकता, कारीगरी और नवाचार को सम्मानित किया गया, जिन्होंने इसमें हिस्सा लिया था। विजेताओं की घोषणा में हरिदेवपुर के ’41 पल्ली क्लब’ ने 1 लाख रुपये का प्रथम पुरस्कार जीता है। साल्टलेक के ऐई ब्लॉक समाज कल्याण संघ’ को 50 हजार रुपये का पुरस्कार मिला, जबकि भवानीपुर की रॉय स्ट्रीट सार्वजनीन दुर्गा पूजा कमिटी’ ने 25 हजार रुपये का तीसरा पुरस्कार हासिल किया. विजेताओं को पंडाल डिजाइन में उनके नए दृष्टिकोण और कलात्मक सजावट में ईपीई फोम के रचनात्मक उपयोग के लिए सम्मानित किया गया। तीनों विजेताओं को नकद पुरस्कार के साथ-साथ ट्रॉफियां और प्रमाण पत्र देकर उन सभी का हौसला बढ़ाया गया। जूरी में जाने-माने फिल्म निर्माता अशोक विश्वनाथन, प्रोड्यूसर अमित अग्रवाल और बीडीजी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर आलोक गोयल शामिल थे। इस मौके पर ‘कॉम्फेक्स’ के सुमित भट्ट और उनकी टीम के सदस्यों ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किया।

‘कॉम्फेक्स’ की यह पहल कोलकाता की दुर्गा पूजा में ‘एक्सपेंडेड पॉलीइथिलीन’ (ईपीई) फोम की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। आमतौर पर औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाला ईपीई फोम अब एक बेहतरीन रचनात्मक सामग्री के रूप में उभरा है। इसकी मदद से कलाकार, डेकोरेटर और कारीगर जटिल पैटर्न, अनोखे ढांचे और खास थीम वाले डिजाइन तैयार करने के लिए नए प्रयोग कर पा रहे हैं। इस अवसर पर बोलते हुए, बीडीजी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर आलोक गोयल ने कहा, हम इसमें भाग लेने वाली पूजा कमेटियों द्वारा दिखाई गई बेहतरीन रचनात्मकता और नवाचार (इनोवेशन) को सम्मानित करते हुए बहुत खुश हैं। दुर्गापूजा कला, संस्कृति और कल्पना का उत्सव है। ईपीई फोम का नवाचारी इस्तेमाल यह दिखाता है कि, कैसे नई सामग्री पंडाल की सजावट के लिए शानदार संभावनाएं खोल सकती है। अपने विचार साझा करते हुए कॉम्फेक्स के सीईओ सुमित भट्ट ने कहा, हम दुर्गापूजा पंडाल की सजावट में ईपीई फोम के इस्तेमाल में काफी बढ़ोतरी देख रहे हैं, जो एक बहुउपयोगी और नवाचारी सामग्री के रूप में इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।  कॉम्फेक्स दुर्गा पूजा इनोवेश अवार्ड्स के जरिए, हमारा मकसद ईपीई फोम के इस्तेमाल को बढ़ावा देना, नवाचार को प्रेरित करना और उस बेहतरीन कारीगरी को सम्मान देना है, जो कोलकाता की दुर्गापूजा को कला और संस्कृति का एक अनोखा उत्सव बनाती है।

इस पहल का उद्देश्य ईपीई फोम के रचनात्मक उपयोग के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और कोलकाता की मशहूर दुर्गा पूजा के पंडालों के पीछे छिपी कारीगरी को सबके सामने लाना भी है।

मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन की  थीम है ‘प्राचीन राम मंदिर’

कोलकाता । मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन दुर्गापूजा कमेटी  ने दुर्गोत्सव के 58वें वर्ष में ‘प्राचीन राम मंदिर’ थीम के साथ दुर्गा पूजा समारोह की शुरुआत की। यह थीम पारंपरिक मंदिर वास्तुकला की भव्यता और भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर रही है। मध्य कोलकाता में एमजी रोड मेट्रो स्टेशन के पास स्थित यह पूजा मंडप दुर्गोत्सव 2026 में मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बुधवार को उद्घाटन समारोह में पश्चिम बंगाल सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्री तापस रॉय, पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व पार्षद मीना देवी पुरोहित, समाजसेवी और मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विनय दुबे के साथ मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन के कई अन्य प्रमुख सदस्य और हस्तियां इस मौके पर मौजूद थे। इस साल की थीम ‘प्राचीन राम मंदिर’, भगवान श्रीराम को समर्पित प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला की भव्यता से प्रेरित है। कलाकार चिरंजीब की देखरेख में बनाए गए इस पंडाल में मुख्य रूप से प्लाईवुड और बांस का इस्तेमाल किया गया है। रामायण और भगवान श्रीराम के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का कलात्मक चित्रण इस संरचना का एक अहम हिस्सा है, जो आने वाले लोगों को भारत की पौराणिक और सांस्कृतिक विरासत का एक शानदार दृश्य अनुभव प्रदान करता है। इस थीम को और बेहतर बनाते हुए मशहूर मूर्ति कलाकार कुश बेरा ने पारंपरिक शैली में देवी दुर्गा की मूर्ति बनाई है। इसका रंग पत्थर जैसा है और इस पर मार्बल जैसी फिनिश दी गई है, जो पुराने मंदिरों की मूर्तियों की याद दिलाती है। लाइटिंग आर्टिस्ट गणेश मंडल ने शानदार लाइटिंग डिजाइन से इसकी प्रस्तुति को और भी आकर्षक बना दिया है, जो इसकी बनावट की बारीकियों को उभारता है और एक आध्यात्मिक माहौल बनाता है।

इस उत्सव के बारे में बात करते हुए, मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन के महासचिव सुरेंद्र कुमार शर्मा ने कहा, हम इस वर्ष दुर्गा पूजा उत्सव के 58वें साल में ‘प्राचीन राम मंदिर’थीम जिसमें भारत की शानदार वास्तुकला, समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत को पेश करने की कोशिश की गई है। इस कॉन्सेप्ट के जरिए, हम आने वाले लोगों को एक अनोखा अनुभव देना चाहते हैं, जिसमें भक्ति और कलात्मक उत्कृष्टता का मेल हो। हमारी कोशिश न सिर्फ दुर्गा पूजा के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने की है, बल्कि सभी पीढ़ियों के लोगों के लिए एक यादगार उत्सव बनाने की भी है।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज द्वारा धमाल में गरबा पूजा

कोलकाता । भक्ति, संगीत और नृत्य के मिश्रण के साथ, धमाल 2026 में कॉलेज के मैनेजमेंट पदाधिकारियों में अध्यक्ष रजनीकांत दानी सपत्नी,उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, शिवानी शाह, नलिनी पारख, उमेश ठक्कर आदि गणमान्य पदाधिकारियों ने मां अंबे की आरती की।इस कार्यक्रम में रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह,प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी वाइस प्रिंसिपल का संयोजन रहा जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।औपचारिक दीप प्रज्ज्वलन और पारंपरिक आरती के साथ कॉलेज प्रबंधन के सदस्य आगामी समारोहों के लिए आशीर्वाद मांग रहे हैं। परंपरा और एकजुटता की भावना ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। धमाल कार्यक्रम का शुभारंभ धुनुची और मां दुर्गा के आह्वान पारंपरिक नृत्य द्वारा किया गया जिसमें लगभग पैंतीस से चालीस नृत्यांगनाओं ने भाग लिया।कार्यक्रम 11अक्टूबर ,शाम 5:30 बजे शुरू हुआ। इसके बाद मधुर गीत प्रदर्शन ने शाम की आध्यात्मिक शुरुआत को और बढ़ा दिया।फ्लेम्स ईस्टर्न टीम द्वारा जीवंत धुनुची नाच के साथ उत्सव को पारंपरिक स्पर्श मिला।बंगाली संस्कृति में निहित, भक्ति नृत्य ने अपनी सुंदर गतिविधियों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दियाजीवंत ऊर्जा. प्रदर्शन ने भक्ति और उत्सव के सार को खूबसूरती से दर्शाया।गरबा के साथ उत्सव जारी रहा, क्योंकि आयोजन स्थल लयबद्ध संगीत और जीवंत ऊर्जा से जीवंत हो उठा। छात्र, संकाय सदस्य और कॉलेज प्रबंधन पारंपरिक नृत्य में मंडलियों में घूमते हुए नृत्य में शामिल हुए । छात्र छात्राओं की  उत्साहपूर्ण भागीदारी  ने शाम को जीवंत बना दिया ।सभी लोग गरबा महोत्सव में शामिल हुए जो विद्यार्थियों को एक परिवार की तरह सभी के साथ एक जुट होकर शिक्षक शिक्षिकाएं और प्रबंधन समुदाय ने अपने शैक्षणिक परिवार की जिम्मेदारी साझा की।

संस्कृति और समुदाय का उत्सव गरबा उत्सव के बाद, डांडिया रास ने शाम में उत्साह की एक और परत जोड़ दी। हाथों में डांडिया की छड़ें, प्रतिभागियों ने जोशीले संगीत के साथ नृत्य किया, जिससे माहौल रंगीन हो चला जो हँसी, रंग और उत्साह से भरा हुआ था ।

डॉ वसुन्धरा मिश्र ने बताया कि शाम का समापन बहुप्रतीक्षित डीजे नाइट था। ऊर्जावान युवा विद्यार्थियों की धड़कनों ने सभी को प्रोत्साहित किया।एक साथ नृत्य करें और जश्न मनाया गया, एक विद्युतीय माहौल बना जिसने शाम को यादगार बना दिया।

 

राजेंद्र बाबू की दुर्गापूजा परंपरा आज भी निभा रहा जीरादेई

सीवान । देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का अपनी जन्मभूमि, अपनी मिट्टी और भारतीय संस्कृति से गहरा लगाव था। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचने के बाद भी वे अपनी जड़ों और धार्मिक परंपराओं को नहीं भूले। इसका जीवंत उदाहरण सीवान जिले के जीरादेई में देखने को मिलता है, जहां वर्ष 1953 में उनके द्वारा शुरू करायी गयी दुर्गापूजा की परंपरा आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभायी जा रही है। समय के साथ पीढ़ियां बदल गयीं, लेकिन मां दुर्गा की आराधना से जुड़ी यह परंपरा आज भी गांव की आस्था और ऐतिहासिक विरासत को संजोये हुए है।

ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1953 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने पैतृक आवास के समीप मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर दुर्गापूजा की शुरुआत करायी थी। राष्ट्रपति बनने के बाद भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने वाले राजेंद्र बाबू की यह पहल आज जीरादेई की विशिष्ट पहचान बन गयी है। गांव के लोग इसे केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देशरत्न की स्मृतियों से जुड़ी अमूल्य विरासत मानते हैं।

उसी स्थान पर आज भी स्थापित होती है मां दुर्गा की प्रतिमा

इस परंपरा की खास बात यह है कि जिस स्थान पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की शुरुआत कराते थे, आज भी उसी स्थान पर प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा समिति और ग्रामीण मिलकर पूरे उत्साह के साथ आयोजन की तैयारियों में जुटते हैं। पूजा समिति के अध्यक्ष धर्मेंद्र प्रसाद और सचिन छोटन साह ने बताया कि राजेंद्र बाबू द्वारा जिस स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी, उसी स्थान पर आज भी प्रतिमा स्थापित कर उनकी शुरू की गयी परंपरा को कायम रखा जा रहा है।

नवरात्र में भक्तिमय हो उठता है जीरादेई

नवरात्र के दौरान जीरादेई में भक्ति और श्रद्धा का माहौल छा जाता है। मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के साथ ग्रामीण देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की स्मृतियों को भी नमन करते हैं। यह आयोजन गांव के लोगों को अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत से जुड़ने का अवसर देता है। साथ ही, नयी पीढ़ी को भी यह जानने का मौका मिलता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति का अपनी जन्मभूमि और भारतीय परंपराओं के प्रति कितना गहरा जुड़ाव था।

पद की ऊंचाई नहीं, अपनी मिट्टी से जुड़ाव थी राजेंद्र बाबू की पहचान

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन सादगी, संस्कार और भारतीय परंपराओं के प्रति सम्मान का प्रतीक रहा है। जीरादेई में आज भी जारी दुर्गापूजा की परंपरा उनके इसी व्यक्तित्व की याद दिलाती है। यह आयोजन बताता है कि किसी महान व्यक्तित्व की पहचान केवल उसके पद और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से उसके जुड़ाव से भी बनती है। जीरादेई के ग्रामीण मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ देशरत्न की विरासत को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं।

महिषासुरमर्दिनी’ के रचयिता बाणीकुमार की धुंधली पड़ रही पहचान

हावड़ा । महालया की सुबह रेडियो पर गूंजने वाली ‘महिषासुरमर्दिनी’ की अमर धुन के साथ ही वीरेंद्र कृष्ण भद्र की सशक्त वाणी और पंकज मल्लिक के संगीत निर्देशन की याद ताजा हो उठती है। हालांकि, इस कालजयी कार्यक्रम की रचना और परिकल्पना करने वाले बाणीकुमार की कहानी कुछ अलग है। जिस हावड़ा जिले में उनका जन्म हुआ, वहीं आज उनकी पहचान और स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही हैं। ‘महिषासुरमर्दिनी’ की प्रस्तुति और श्लोकपाठ के लिए वीरेंद्र कृष्ण भद्र तथा संगीत निर्देशन के लिए पंकज मल्लिक को व्यापक रूप से याद किया जाता है। लेकिन इस लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम के रचयिता बाणीकुमार अपने ही जिले में अपेक्षित सम्मान और पहचान से वंचित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा में अमिट छाप छोड़ने वाले इस साहित्यकार को उनकी जन्मभूमि पर भी वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वह हकदार हैं।

बाणीकुमार का वास्तविक नाम वैद्यनाथ भट्टाचार्य था। उनके पूर्वजों का घर हुगली जिले के आतपुर में था, जबकि उनका जन्म 23 नवंबर 1907 को हावड़ा के कानपुर गांव में अपने ननिहाल में हुआ था। इतिहासकार और संस्कृत के विद्वान पंडित विधुभूषण भट्टाचार्य तथा अपर्णा देवी की चार संतानों में वह सबसे बड़े थे। बाणीकुमार की शिक्षा-दीक्षा हावड़ा में हुई। उन्होंने हावड़ा जिला स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद तत्कालीन प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में हासिल की। उनके पिता और दादा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। लिहाजा, अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन करने के बावजूद संस्कृत के प्रति उनका गहरा लगाव बना रहा। संस्कृत के अध्ययन में उनकी विद्वत्ता के लिए उन्हें ‘काव्यसरस्वती’ की उपाधि भी मिली। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को निखारने में हावड़ा जिला स्कूल के शिक्षक करुणानिधान बंद्योपाध्याय की अहम भूमिका रही। उन्होंने बाणीकुमार को काव्य रचना के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर यही रचनात्मक प्रतिभा उनकी विशिष्ट पहचान बनी और उन्होंने ‘महिषासुरमर्दिनी’ जैसे कालजयी कार्यक्रम की रचना और परिकल्पना कर बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया।

बाणीकुमार ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा हावड़ा के कासुंदिया स्थित सुबल कोले लेन में बिताया था। कुछ वर्ष पहले खुरुट बारोवारी के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, महालया के अवसर पर प्रतिमा पर फूल-मालाएं चढ़ाई जाती हैं, लेकिन साल के बाकी दिनों में उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। यह स्थिति उस साहित्यकार की स्मृति के संरक्षण को लेकर सवाल खड़े करती है, जिसकी रचना हर वर्ष लाखों लोगों को महालया की सांस्कृतिक अनुभूति से जोड़ती है।

स्थानीय लोगों को इस बात का मलाल है कि ‘महिषासुरमर्दिनी’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम के रचयिता को उनके अपने जिले में भी उचित पहचान नहीं मिल पाई है। हावड़ा के अनेक लोग आज भी इस तथ्य से अनजान हैं कि बाणीकुमार का जन्म इसी जिले में हुआ था।

बंगाल की सांस्कृतिक चेतना में ‘महिषासुरमर्दिनी’ का स्थान आज भी बेहद खास है। ऐसे में इसके रचयिता बाणीकुमार की स्मृति को संरक्षित करना, उनकी साहित्यिक उपलब्धियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उनकी जन्मभूमि पर उन्हें उचित सम्मान दिलाना जरूरी है। महालया पर उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने तक सीमित रहने के बजाय उनकी विरासत को वर्षभर याद रखने की पहल ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

दुर्गोत्सव 2026 : राजगंज के पाल परिवार की प्राचीन पूजा में अष्टमी को होता है सिंदूर खेला

हावड़ा । करीब दो शताब्दी पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा, पूर्वजों की विरासत और एक हृदयविदारक घटना की स्मृति। हावड़ा के संकराइल थाने के राजगंज स्थित पाल परिवार की दुर्गापूजा इन सभी का अनूठा संगम है। समय के साथ भले ही इस पूजा की पुरानी भव्यता कुछ कम हुई हो, लेकिन पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक अनुष्ठानों के पालन में आज भी कोई कमी नहीं आई है। इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि यहां बंगाल के अन्य हिस्सों की तरह दशमी को नहीं, बल्कि अष्टमी के दिन ही सिंदूर खेला होता है। इसके पीछे परिवार के एक युवा सदस्य की असमय मृत्यु से जुड़ी मार्मिक कहानी है।
पाल परिवार के घर के सामने से गंगा नदी बहती है। शरद ऋतु में गंगा की ठंडी हवाओं के साथ काश के फूलों और शिउली की सुगंध इस घर के ठाकुरदालान में देवी के आगमन का संदेश लेकर आती है। दुर्गापूजा का अवसर इस परिवार के लिए मिलन का पर्व भी है। दूसरे जिलों, पड़ोसी राज्यों और विदेशों में रहने वाले परिवार के सदस्य हर साल इस उत्सव में शामिल होने के लिए लौटते हैं।
राजगंज में गंगा के किनारे स्थित विशाल महलनुमा भवन और उससे सटा विस्तृत ठाकुरदालान इस परिवार की ऐतिहासिक विरासत के साक्षी हैं। करीब 188 वर्ष पहले गंगा के कटाव में पुराना घर समा जाने के बाद परिवार के पूर्वज और जमींदार नफरचंद्र पाल ने वर्तमान भवन का निर्माण कराया था।
परिवार के सदस्य स्वरूप पाल के अनुसार, इस दुर्गापूजा की शुरुआत नफरचंद्र पाल के पिता चूड़ामणि पाल ने की थी। चूड़ामणि पाल आंदुल राजबाड़ी के दीवान थे। उनके कार्यों से प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें पुरस्कारस्वरूप काफी जमीन करमुक्त रूप से दी थी। साथ ही आसपास के इलाकों में जमींदारी की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। इसी दौर में परिवार में दुर्गापूजा की शुरुआत हुई।
हालांकि, पाल परिवार की आर्थिक समृद्धि नफरचंद्र पाल के समय में बढ़ी। जमींदारी के साथ-साथ उन्होंने व्यवसाय भी शुरू किया। नफरचंद्र पाल, जिन्हें एनसी पाल के नाम से भी जाना जाता था, के बनाए ईंटों की ख्याति ब्रिटेन तक पहुंची थी। ब्रिटिश शासन के दौरान भी इन ईंटों का इस्तेमाल होता था। उन्हीं के समय में परिवार की दुर्गापूजा का विस्तार हुआ।
नफरचंद्र पाल ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूजा के सुचारु संचालन के लिए देवोत्तर एस्टेट की स्थापना की थी। परिवार के विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से पूरे वर्ष इसमें धन जमा होता है। इसी व्यवस्था के सहारे आज भी पाल परिवार की दुर्गापूजा आयोजित होती है।
परिवार की दुर्गाप्रतिमा एकचाला शैली की है और इसे पारंपरिक डाक की सजावट से सजाया जाता है। प्रतिमा का निर्माण ठाकुरदालान में ही होता है। पुरोहित से लेकर ढाक बजाने वाले तक, सभी पीढ़ियों से इस पूजा का हिस्सा बनते आ रहे हैं। महालया से चंडीपाठ शुरू हो जाता है। वैष्णव परंपरा के अनुसार पूजा होने के कारण यहां पशुबलि नहीं दी जाती। संधिपूजा के दौरान 108 मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। देवी को घर में तैयार बूंदी और अन्य मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है।
लेकिन इस पूजा की सबसे विशिष्ट और भावुक कर देने वाली परंपरा अष्टमी के दिन सिंदूर खेला है। बंगाल में आम तौर पर विजयादशमी के दिन विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर देवी को विदाई देती हैं। इसके विपरीत, पाल परिवार में यह रस्म अष्टमी को ही निभाई जाती है।
इसके पीछे परिवार के एक सदस्य की असमय मृत्यु की कहानी है। बताया जाता है कि परिवार के एक युवा सदस्य की महज 18 वर्ष की उम्र में अष्टमी के दिन मृत्यु हो गई थी। घर के बेटे की अचानक मौत से पूरा परिवार शोक में डूब गया। इसके बावजूद देवी की आराधना में कोई बाधा न आए, इसलिए उस दिन घर में ही शव रखकर सिंदूर खेला सहित सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए गए और अष्टमी को ही देवी का विसर्जन कर दिया गया।
उस घटना के बाद से ही पाल परिवार में अष्टमी के दिन सिंदूर खेला करने की परंपरा चली आ रही है। इस रस्म में परिवार की महिलाओं के साथ गांव और दूर-दराज के इलाकों से आने वाली विवाहित महिलाएं भी शामिल होती हैं।
राजगंज के पाल परिवार की दुर्गापूजा इस तरह इतिहास, आस्था और पारिवारिक स्मृतियों का अनूठा दस्तावेज बनी हुई है। उत्सव की खुशियों के पीछे छिपी एक दुखद घटना की स्मृति आज भी इस परंपरा में जीवित है। करीब दो शताब्दियों से चली आ रही इस विरासत को बनाए रखने के लिए परिवार के वरिष्ठ सदस्य नई पीढ़ी को पारंपरिक रीति-रिवाजों से परिचित करा रहे हैं।