Monday, September 21, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 3

लालबाजार में कोलकाता पुलिस को मिले 51 नए वाहन

कोलकाता, नि.सं.। कोलकाता पुलिस के वाहन बेड़े में 51 नए वाहन शामिल किए गए हैं। एक निजी वाहन कंपनी की ओर से कोलकाता पुलिस को 50 दोपहिया वाहन और एक चारपहिया वाहन सौंपा गया। लालबाजार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इन नए वाहनों को औपचारिक रूप से कोलकाता पुलिस के हवाले किया गया। कार्यक्रम में परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह और कोलकाता के पुलिस आयुक्त मौजूद थे। इस अवसर पर नए वाहनों को हरी झंडी दिखाने के साथ ही कोलकाता पुलिस की ओर से रैली का भी आयोजन किया गया। बताया गया कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस इन नए वाहनों का उपयोग आने वाले दिनों में शहर की पुलिस व्यवस्था, आपातकालीन सेवाओं और निगरानी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जाएगा। नए वाहनों के शामिल होने से पुलिस को विभिन्न इलाकों में तेजी से पहुंचने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम के दौरान परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह ने कहा कि इन नए वाहनों के माध्यम से आपातकालीन सेवाओं को लोगों तक और अधिक तेजी से पहुंचाया जा सकेगा। इससे कम समय में पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी। इस दौरान परिवहन मंत्री ने वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था में पायलट कार के स्थान पर बाइक के इस्तेमाल का भी प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि कई बार वीआईपी काफिले के आगे चलने वाली पायलट कार के कारण शहर में यातायात जाम होने की आशंका रहती है। ऐसे में भविष्य में वीआईपी काफिले में पायलट कार की जगह दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, इस संबंध में उन्होंने कोलकाता पुलिस आयुक्त के समक्ष प्रस्ताव रखा। कोलकाता पुलिस के वाहन बेड़े में इन 51 नए वाहनों के शामिल होने से शहर में पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता, आपातकालीन सेवाओं और विभिन्न क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत होने की उम्मीद है।

दुर्गापूजा : बंगाल महाअष्टमी पर राज्य में पूर्ण शराबबंदी 

दुर्गापूजा समितियों को एक लाख रुपये अनुदान की घोषणा

-बड़े आयोजनों से मदद नहीं लेने की अपील

– विसर्जन में डीजे पर रोक

कोलकाता, नि.सं. । पश्चिम बंगाल में इस वर्ष भी दुर्गापूजा आयोजक समितियों को राज्य सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने अष्टमी के दिन शराब की बिक्री पर भी रोक की घोषणा की। उन्होंने कहा कि अष्टमी के दिन शराब की दुकानें बंद रहेंगी और बार में भी शराब उपलब्ध नहीं होगी।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को घोषणा की कि योग्य पूजा समितियों को एक-एक लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। हालांकि, उन्होंने बड़े बजट वाली पूजा समितियों से सरकारी सहायता नहीं लेने की अपील की है। कोलकाता के मिलन मेला प्रांगण में दुर्गापूजा समितियों के साथ बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन समितियों का बजट बड़ा है और जो अपने स्तर पर पूजा आयोजित करने में सक्षम हैं, उन्हें सरकारी आर्थिक सहायता नहीं लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन समितियों के लिए इस राशि के बिना पूजा आयोजित करना मुश्किल होगा, उन्हें सरकार की ओर से एक लाख रुपये दिए जाएंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वह मुख्यमंत्री पद की शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहते। उन्होंने बताया कि राज्य में दुर्गापूजा के लिए सरकारी अनुदान की शुरुआत 25 हजार रुपये से हुई थी, जो बढ़कर एक लाख दस हजार रुपये तक पहुंच गया था। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की अनुदान नीति पर भी सवाल उठाया।

शुभेंदु अधिकारी ने राज्यभर की पूजा समितियों को बिजली के खर्च में भी राहत देने की घोषणा की। उन्होंने आश्वासन दिया कि दुर्गापूजा के दौरान पूजा समितियों को बिजली के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने पूजा के दौरान डीजे बजाने पर पूरी तरह रोक लगाने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में कहीं भी पूजा के दौरान डीजे नहीं बजाया जा सकेगा, खासकर विसर्जन के समय इस नियम का कड़ाई से पालन करना होगा।

राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद इस वर्ष दुर्गापूजा के लिए सरकारी अनुदान जारी रहेगा या नहीं, इसे लेकर चर्चाएं चल रही थीं। पूजा समितियों के साथ मुख्यमंत्री की बैठक के बाद इन अटकलों पर विराम लग गया। सरकार ने एक ओर जरूरतमंद पूजा समितियों को आर्थिक सहायता देने का फैसला किया है, वहीं बड़े बजट वाले आयोजनों से सरकारी धन नहीं लेने की अपील की है।

नेपाल की तबाही ने दिखाया, बदलते हिमालय में आपदा का चेहरा भी बदल रहा है

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर शुरुआती तस्वीर अब काफी हद तक साफ हो गई है। यह कोई सामान्य मानसूनी बाढ़ नहीं थी और न ही पारंपरिक अर्थों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील के अचानक फटने से आई बाढ़।

वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, करीब 5,200 से 5,400 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर करीब 1,200 मीटर नीचे गिरा। इससे बर्फ और चट्टान का तेज़ हिमस्खलन हुआ, जिसने नदी में भारी मात्रा में मलबा पहुंचाया और देखते ही देखते एक तेज़ मलबा-बाढ़ में बदल गया।

घटना सुबह करीब 8:40 बजे हुई। इससे करीब 5.2 तीव्रता का भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ। यह कोई टेक्टोनिक भूकंप नहीं था, बल्कि पहाड़ के अचानक ढहने से पैदा हुआ भूकंपीय संकेत था।

कुछ ही मिनटों में बाढ़ ने नेपाल-चीन सीमा के आसपास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। उपलब्ध निगरानी फुटेज के मुताबिक, भूकंपीय संकेत दर्ज होने के लगभग सात मिनट बाद बाढ़ ने जियारोंग पोर्ट के सीमा परिसर को तबाह कर दिया।

यही इस आपदा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जिस खतरे को पहचानकर लोगों को चेतावनी दी जाए, उसके लिए समय ही नहीं था।

एक हजार से ज्यादा मौतेंहजारों अब भी लापता

1 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में कम से कम 987 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 मौतें दर्ज की गई हैं। दोनों तरफ मिलाकर मृतकों की संख्या 1,000 से ज्यादा हो चुकी है।

नेपाल में करीब 3,900 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें 38 देशों के 583 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।

कई शव बाढ़ के साथ बहकर नेपाल में घटनास्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर और भारत के उत्तर प्रदेश तक पहुंचे हैं।

नेपाल में रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और चितवन समेत कई जिले प्रभावित हुए हैं। सड़कें और पुल टूटे हैं, गांवों का संपर्क टूटा है और कई जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है।

कम से कम 13 जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और करीब 431 मेगावाट क्षमता के संयंत्र बिजली ग्रिड से बाहर हो गए हैं। निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है।

प्रारंभिक सरकारी अनुमान के मुताबिक नुकसान 200 अरब नेपाली रुपये से ज्यादा हो सकता है। पुनर्निर्माण की लागत इससे कई गुना अधिक होने का अनुमान है।

यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ नहीं थीलेकिन खतरा उससे कहीं ज्यादा जटिल हो सकता है

हिमालय में ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ को लेकर पिछले कुछ वर्षों में काफी चर्चा हुई है।

जीएलओएफ में आम तौर पर किसी ग्लेशियल झील में पानी बढ़ने और उसके प्राकृतिक बांध के टूटने जैसी प्रक्रिया होती है। ऐसी झीलों की निगरानी करके संभावित जोखिम का कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है।

रसुवा में घटनाक्रम अलग था। यहां खतरा एक ऊंचे और अस्थिर पर्वतीय हिस्से से अचानक शुरू हुआ। बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा नीचे गिरा, उसने मलबे और पानी को तेजी से आगे धकेला और कुछ ही मिनटों में नदी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आ गई।

यानी जिस जगह से आपदा शुरू हुई, वह उस बुनियादी ढांचे से बहुत ऊपर थी जिसे बचाने के लिए चेतावनी प्रणाली बनाई गई थी।

हिमालयी क्षेत्र में काम करने वाली अंतर-सरकारी संस्था आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ डॉ. फारूक आजम के मुताबिक, यह अचानक शुरू होने वाली ऐसी आपदा थी, जिसमें चेतावनी जारी करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला।

इस तरह की घटनाओं के लिए यह एक गंभीर चुनौती है। किसी नदी में पानी बढ़ने का पता लगाने वाला सेंसर तब तक उपयोगी हो सकता है, जब तक पानी नीचे की ओर पहुंचने में पर्याप्त समय ले। लेकिन अगर पहाड़ का एक हिस्सा अचानक टूटकर कुछ ही मिनटों में घाटी तक पहुंच जाए, तो पारंपरिक चेतावनी प्रणाली की सीमा सामने आ जाती है।

क्या जलवायु परिवर्तन इसके पीछे है?

यहीं वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है।

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि 26 अगस्त की इस खास घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन ने पैदा किया। वैज्ञानिक अभी यह समझ रहे हैं कि ढलान के टूटने के पीछे कौन से भौगोलिक और पर्यावरणीय कारक काम कर रहे थे।

लेकिन व्यापक वैज्ञानिक तस्वीर चिंता बढ़ाती है।

आईसीआईएमओडी की एचकेएच ग्लेशियर आउटलुक 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं। पिछले 50 वर्षों के रिकॉर्ड में करीब 89 प्रतिशत वर्षों में ग्लेशियरों का द्रव्यमान संतुलन नकारात्मक रहा है। वर्ष 2000 के बाद यह नुकसान और तेज हुआ है।

इसी दौरान हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में पर्माफ्रॉस्ट भी गर्म हो रहा है। पर्माफ्रॉस्ट यानी ऐसी जमीन जो लगातार जमी रहती है। इसके पिघलने से चट्टानी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और मिट्टी का कटाव, भूस्खलन तथा ढलान के अचानक टूटने का खतरा बढ़ सकता है।

इसलिए जलवायु परिवर्तन का संबंध किसी एक घटना के साथ सीधे जोड़ने के बजाय वैज्ञानिक अब एक बदलते पर्वतीय तंत्र को देख रहे हैं।

गर्म होता वातावरण बर्फ, ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट और चट्टानों के बीच उन संबंधों को बदल रहा है, जो सदियों से अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं।

हिमालय सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने की कहानी नहीं है

क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक अध्ययन में भारतीय हिमालय में ब्लैक कार्बन और बर्फ की सतह के तापमान के बीच भी संबंध पाया गया है।

अध्ययन के मुताबिक, 2000-09 और 2010-19 के बीच ब्लैक कार्बन की मात्रा में करीब 7.74 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2000-09 में हिमालयी बर्फ की सतह का औसत तापमान करीब -11.27 डिग्री सेल्सियस था, जो 2020-23 में बढ़कर -7.13 डिग्री सेल्सियस हो गया।

ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह पर जमा होकर उसकी सूर्य की रोशनी परावर्तित करने की क्षमता घटाता है। इससे सतह अधिक गर्म हो सकती है और बर्फ तथा ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

दूसरी तरफ, बर्फ की चादर के घटने और जल्दी पिघलने से नदियों में पानी पहुंचने का समय भी बदल रहा है।

यानी हिमालय में बदलाव सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि ग्लेशियर कितनी तेजी से पीछे हट रहे हैं। सवाल यह भी है कि बदलती बर्फ, गर्म होती जमीन और अस्थिर होती ढलानें भविष्य में किस तरह की नई आपदाएं पैदा कर सकती हैं।

शुरुआती चेतावनी से आगे की तैयारी

रसुवा की घटना का सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि शुरुआती चेतावनी प्रणाली जरूरी है, लेकिन हर आपदा के लिए पर्याप्त नहीं है।

जहां चेतावनी के लिए कुछ घंटे या दिन मिल सकते हैं, वहां निगरानी और लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हजारों जानें बचा सकता है। लेकिन बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने जैसी घटना में बुनियादी ढांचे को बचाने या लोगों को निकालने के लिए कुछ मिनट भी नहीं मिल सकते।

ऐसे में जमीन के इस्तेमाल की योजना की भूमिका बढ़ जाती है।

हिमालयी घाटियों में सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएं, बस्तियां और दूसरे बुनियादी ढांचे किस जगह बनाए जा रहे हैं, यह सवाल अब केवल इंजीनियरिंग का नहीं है। यह बदलती जलवायु और पर्वतीय खतरों का भी सवाल है।

आईसीआईएमओडी ने हिमालय के लिए भूमि उपयोग की योजना को मजबूत करने, बुनियादी ढांचे की पूरी उम्र के दौरान बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रभाव का आकलन करने और स्थानीय तथा पारंपरिक ज्ञान को आपदा योजना में शामिल करने की जरूरत बताई है।

ऐतिहासिक रूप से हिमालयी समुदायों ने कई जगहों पर ऊंची जमीन और नदी की मुख्य धारा से दूर रहने को प्राथमिकता दी थी। आधुनिक निर्माण ने कई इलाकों में नदी किनारों और बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों तक विस्तार किया है।

रसुवा की घटना ऐसे फैसलों को फिर से देखने का संकेत देती है।

क्योंकि हिमालय में अगली बड़ी आपदा जरूरी नहीं कि किसी ऐसी जगह से आए, जिसे आज हम खतरे की सूची में जानते हैं।

वह किसी बर्फीली ढलान के भीतर छिपी अस्थिरता से शुरू हो सकती है। कुछ मिनटों में मलबे की नदी बन सकती है। और तब चेतावनी प्रणाली से ज्यादा मायने रखेगा कि हमने पहले से क्या तैयारी की थी ।

(साभार – क्लाईमेट कहानी)

जीवन की धारा में अपने को बहने दो

-भगवतीचरण वर्मा
देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ’ जानो
इसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो
लेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो,
जीवन की धारा में अपने को बहने दो
तुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो।
वैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्ध ज्ञानी हो
तुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी हो
लेकिन अचरज इतना, तुम कितने भोले हो
ऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले हो
बन कर मिट जाने की एक तुम कहानी हो।
पल में रो देते हो, पल में हँस पड़ते हो,
अपने में रमकर तुम अपने से लड़ते हो
पर यह सब तुम करते – इस पर मुझको शक है,
दर्शन, मीमांसा – यह फुरसत की बकझक है,
जमने की कोशिश में रोज़ तुम उखड़ते हो।
थोड़ी-सी घुटन और थोड़ी रंगीनी में,
चुटकी भर मिरचे में, मुट्ठी भर चीनी में,
ज़िन्दगी तुम्हारी सीमित है, इतना सच है,
इससे जो कुछ ज्यादा, वह सब तो लालच है
दोस्त उम्र कटने दो इस तमाशबीनी में।
धोखा है प्रेम-बैर, इसको तुम मत ठानो
कडु‌आ या मीठा ,रस तो है छक कर छानो,
चलने का अन्त नहीं, दिशा-ज्ञान कच्चा है
भ्रमने का मारग ही सीधा है, सच्चा है
जब-जब थक कर उलझो, तब-तब लम्बी तानो।
–रचनाकार: भगवतीचरण वर्मा
–प्रस्तुति: शारदा सुमन

गुमनाम रहे महान क्रन्तिकारी अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त

अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त यह ऐसे दो नाम है जो आज बहुत खोजने के बाद भी नहीं मिलते | योद्धाओं जैसी वीरगति पाने वाले अनाथ बंधू एवं मृगेंद्र दत्त के नाम को चाटुकार इतिहासकारों ने इतिहास से मिटाने की हर संभव कोशिश की, क्योँकि इन्होने चरखे को छोड़ अस्त्रों को अपना हथियार बना कर अंग्रेजों की जड़ों को हिला कर रख दिया था | यह कितनी शर्म की बात है कि बेहद ही कम उम्र में बड़े अंग्रेज अधिकारीयों को मौत के घाट उतारने वाले जिन वीरों का इतिहास स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए थे, जन जन तक पहुँचाया जाना चाहिए था, जिनका समाज में पूज्यनीय स्थान होना चाहिए था, भारत की तथाकथित सेकुलर नीति और खुद से खुद के लिए गढ़ी गई सत्ता नीति के चलते इतिहासकारों की लिखी लाइनों में इन्हें जगह देने लायक भी नहीं समझा गया | दरअसल ऐसे वीर योद्धाओं का इतिहास यदि समाज जान जाएगा तो स्वयं को सम्पूर्ण आजादी का श्रेय देने वाले परिवार की पूछ परख ही समाप्त हो जाएगी | यदि स्वतंत्र भारत के लोग अनाथ बंधू एवं मृगेंद्र दत्त समेत उन गुमनाम क्रांतिकारियों का गौरवशाली इतिहास जान जायेंगे, जो अपनी जान हथेली पर लेकर घूमते थे एवं आजादी हेतु अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में न्योछावर करने को तत्पर रहते थे तो स्वाभाविक ही भारतीयों में उनके प्रति आदर की भावना जागृत होगी, फिर चरखे वाले नेताओं को कौन पूछेगा | बस यही एक कारण है कि अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त जैसे वीर क्रन्तिकारी, आज इतिहास में स्थान नहीं पा सके है | आइये जानते है अनाथ बंधू एवं मृगेंद्र दत्त जैसे भारत माता के वीर सपूतों के बारे में |

बंगाल की धरती पर जन्मे दो मित्र थे अनाथ बन्धु तथा मृगेन्द्र कुमार दत्त, जिनके बलिदान से शासकों को अपना निर्णय बदलने को विवश होना पड़ा | उन दिनों बंगाल के मिदनापुर जिले में क्रान्तिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं | इससे परेशान होकर अंग्रेजों ने वहां जेम्स पेड्डी को जिलाधिकारी बनाकर भेजा | वह बहुत क्रूर अधिकारी था | छोटी सी बात पर 10-12 साल की सजा दे देता था | क्रान्तिकारियों ने शासन को चेतावनी दी कि वे इसके बदले किसी भारतीय को यहां भेजें, पर शासन तो बहरा था सो बात नहीं सुनी गई | अतः एक दिन जेम्स पेड्डी को गोली से उड़ा दिया गया | अंग्रेज इससे बौखला गये | अब उन्होंने पेड्डी से भी अधिक कठोर राबर्ट डगलस को भेजा | एक दिन जब वह अपने कार्यालय में बैठा फाइलें देख रहा था, तो अचानक दो युवक उसके सामने आये और उसे गोली मार दी | डगलस वहीं ढेर हो गया | दोनों में से एक युवक तो भाग गया, पर दूसरा प्रद्योत कुमार पकड़ा गया | शासन ने उसे फांसी की सजा दी |

दो जिलाधिकारियों की हत्या के बाद भी अंग्रेजों की आंख नहीं खुली अबकी बार उन्होंने बीईजे बर्ग को भेजा | बर्ग सदा दो अंगरक्षकों के साथ चलता था | इधर क्रान्तिवीरों ने भी ठान लिया था कि इस जिले में किसी अंग्रेज जिलाधिकारी को नहीं रहने देंगे | बर्ग फुटबाल का शौकीन था और टाउन क्लब की ओर से खेलता था | 02 सितम्बर, 1933 को टाउन क्लब और मौहम्मदन स्पोर्टिंग के बीच मुकाबला था | खेल शुरू होने से कुछ देर पहले बर्ग आया और अभ्यास में शामिल हो गया | अभी बर्ग ने शरीर गरम करने के लिए फुटबाल में दो-चार किक ही मारी थी कि उसके सामने दो खिलाड़ी, अनाथ बन्धु और मृगेन्द्र कुमार दत्त आकर खड़े हो गये | दोनों ने जेब में से पिस्तौल निकालकर बर्ग पर खाली कर दी | वह हाय कहकर धरती पर गिर पड़ा और वहीं मर गया |

यह देखकर बर्ग के अंगरक्षक दोनों पर गोलियाँ बरसाने लगे | इनकी पिस्तौल तो खाली हो चुकी थी, अतः जान बचाने के लिए दोनों दौड़ने लगे, पर अंगरक्षकों के पास अच्छे शस्त्र थे | दोनों मित्र गोली खाकर गिर पड़े | अनाथ बन्धु ने तो वहीं प्राण त्याग दिये. मृगेन्द्र को पकड़ कर अस्पताल ले जाया गया | अत्यधिक खून बह जाने के कारण अगले दिन वह भी चल बसे | घटना के बाद पुलिस ने मैदान को घेर लिया | हर खिलाड़ी की तलाशी ली गयी | निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय के पास भी भरी हुई पिस्तौलें मिलीं | ये तीनों भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य थे | यदि किसी कारण से अनाथ बन्धु और मृगेन्द्र को सफलता न मिलती, तो इन्हें बर्ग का वध करना था | पुलिस ने इन तीनों को पकड़ लिया और मुकदमा चलाकर मिदनापुर के केन्द्रीय कारागार में फांसी पर चढ़ा दिया |

तीन जिलाधिकारियों की हत्या के बाद अंग्रेजों ने निर्णय किया कि अब कोई भारतीय अधिकारी ही मिदनापुर भेजा जाये | अंग्रेज अधिकारियों के मन में भी भय समा गया था | कोई वहां जाने को तैयार नहीं हो रहा था | इस प्रकार क्रान्तिकारी युवकों ने अपने बलिदान से अंग्रेज शासन को झुका दिया। आज उन वीरों के बलिदान दिवस पर देश की जनता से एक प्रश्न पूछा जाना आवश्यक है कि क्या आज़ादी के स्वर्ण ग्रन्थ में इनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना नहीं चाहिए ? क्या अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त सहित निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय जैसे वीर योद्धाओं की जीवनियां विद्यालयों में नहीं पढाई जानी चाहिए ?

(साभार – क्रांतिदूत डॉट इन)

ऑटो ड्राइवर के बेटे ने आईआईटी-मद्रास में बनाई जगह

90 प्रतिशत रीढ़ की हड्डी की विकलांगता और सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित

नयी दिल्ली । अक्सर कहा जाता है कि सपने देखना तो आसान है, लेकिन उन्हें हकीकत में बदलना उतना ही मुश्किल। हालांकि, कुछ लोगों के लिए यह रास्ता और भी कठिन हो जाता है, जब वे किसी शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे हों। कुछ ऐसी की कहानी है महज 17 वर्ष के जे. संतोष की। जे. संतोष ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास में जगह बनाई है, लेकिन उनकी इस जर्नी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वे जन्म से ही 90 प्रतिशत स्पाइनल मस्कुलर डिसेबिलिटी (एसएमए) और सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपने पक्के इरादे से अपनी मंजिल तक की राह बना ली। आईआईटी-मद्रास ने गुरुवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट शेयर कर जानकारी दी कि जे. संतोष ने आईआईटी मद्रास के डेटा साइंस और एप्लीकेशन में चार वर्ष के बैचलर ऑफ साइंस (बीएस) प्रोग्राम में एडमिशन प्राप्त किया है। पिछले वर्ष स्कूल के साथ आईआईटी मद्रास का दौरा न कर पाने के बाद, संतोष ने अब दूसरी कोशिश में क्वालिफायर पास करके इस इंस्टीट्यूट में अपनी जगह बना ली है।
आईआईटी-मद्रास ने आगे जानकारी दी कि जे. संतोष एक सामान्य परिवार से आते हैं, जहां उनके पिता एक ऑटो ड्राइवर हैं। उनको इस प्रोग्राम के बारे में गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘तमिलनाडु वॉलंटियर्स’ से पता चला। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा कोर्स चुना, जिसे ज्यादातर घर से ही किया जा सकता है। ‘आईआईटी-मद्रास फॉर ऑल’ पहल के जरिए, उन्हें शुरुआती दौर में ‘तमिलनाडु वॉलंटियर्स’ से आमने-सामने मदद मिलेगी, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ट्रेनिंग भी शामिल है। इसके साथ ही वे उनके पहले वर्ष की ट्यूशन फीस का खर्च भी उठाएंगे।
आईआईटी-मद्रास ने बताया कि जे. संतोष का लक्ष्य अपनी डिग्री पूरी करना और आईटी सेक्टर में सुनहरा करियर बनाना है। वहीं, आईआईटी-मद्रास में जगह बनाकर जे. संतोष ने यह साबित कर दिया है कि लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता चाहे कितना भी मुश्किल क्यों न हो, अगर इरादा पक्का हो तो उसे हासिल किया जा सकता है।

वृंदावन का शक्तिपीठ, मां कात्यायनी का मंदिर

वृंदावन की पावन धरती मां कात्यायनी का शक्तिपीठ मंदिर है। यह मंदिर आस्था और प्रेम का बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां पर स्वयं देवी राधा और गोपियों ने तपस्या की थी। वृंदावन का नाम आते ही मन में सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण की छवि उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रज भूमि की रक्षा और यहां की अधिष्ठात्री देवी मां कात्यायनी हैं। वृंदावन के राधा बाग इलाके में स्थित मां कात्यायनी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपनी सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर के टुकड़े किए थे, तो देवी सती के केश यानी बाल इस स्थान पर गिरे थे। जिस कारण इसको उमा शक्तिपीठ भी कहा जाता है।

मंदिर का निर्माण

इस मंदिर के निर्माण का इतिहास भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। साल 1923 में स्वामी केशवानंद महाराज द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। स्वामी जी ने 33 सालों तक हिमालय की कंदराओं में कठिन तपस्या की थी। इस दौरान उनको एक दिव्य दृष्टि मिली, जिसमें उनको वृंदावन में इस लुप्त शक्तिपीठ को ढूंढने और मंदिर को स्थापित करने का आदेश मिला। स्वामी केशवानंद ने अपने योगबल से इस स्थान को पहचाना था। आज के समय में यह मंदिर भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है।

मंदिर की बनावट और मां की अष्टधातु की प्रतिमा

यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना है, जोकि देखने में काफी भव्य लगता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो सुनहरे शेर खड़े हैं, जोकि मां की शक्ति का एहसास कराते हैं। मंदिर के गर्भगृह में मां कात्यायनी की अष्टधातु की विशाल प्रतिमा है और मां की चार भुजाएं हैं। दाहिनी भुजाओं में वर और अभय मुद्रा है। वहीं बाईं भुजाओं में कमल का पुष्प और तलवार है। मां कात्यायनी के अलावा यहां पर भगवान विष्णु, भोलेनाथ, गणेश जी और सूर्य देव की मूर्तियां भी हैं। जोकि इस मंदिर को पूर्ण पंचदेव मंदिर बनाती हैं। इस मंदिर का संबंध द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण से है। श्रीमद्भागवत पुराण के मुताबिक वृंदावन की गोपियों श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसलिए लिए गोपियों ने पूरे कार्तिक माह यमुना नदी के किनारे मां कात्यायनी की बालू से मूर्ति बनाकर पूजा-अर्चना की थी। गोपियों की भक्ति से प्रसन्न होकर मां कात्यायनी ने उनको वरदान दिया। इस वरदान के चलते शरद पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने 16,108 रूप धारण किए थे। वहीं हर गोपी के साथ रास रचाया था। धार्मिक मान्यता है कि जो भी कुंवारे युवक-युवतियां यहां आकर मां के दर्शन करते हैं, उनके विवाह में आने वाली परेशानी दूर होती है।

जौहर का इतिहास और परिस्थिति समझिए

बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इतिहास के एक ऐसे पन्ने को छेड़ दिया, जहां दुख, दर्द, त्याग और वेदना छिपी है… जौहर। उन्होंने मोटे तौर पर जौहर करने वाली औरतों को कायर कहा है। उनकी दलील है कि अगर कोई मुझसे जबरन ‘संबंध’ बनाने आता है, तो क्या मुझे जान दे देनी चाहिए। स्वरा का जवाब है, नहीं।
इस मामले पर कोई भी ठोस राय बनाने से पहले जौहर का इतिहास समझना जरूरी है। आखिर जौहर क्या था… और स्त्रियां इसे क्यों करती थीं।
राजस्थान के इतिहास में जौहर की कई प्रमुख घटनाओं का जिक्र मिलता है। चित्तौड़ में 1303, 1535 और 1568 के तीन जौहर सबसे प्रसिद्ध हैं। 1535 में बहादुर शाह के हमले के बाद रानी कर्णावती की अगुआई में जौहर हुआ। 1568 में अकबर की चित्तौड़ विजय के दौरान जौहर हुआ। रणथंभौर में 1301 में अलाउद्दीन खिलजी और चंदेरी में 1528 में बाबर की जीत के बाद भी जौहर के उल्लेख मिलते हैं।
चित्तौड़ के 1303 वाले जौहर को रानी पद्मिनी से जोड़ा जाता है। हालांकि, पद्मिनी की कहानी का सबसे विस्तृत उल्लेख 1540 में मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत में मिलता है। 1303 के समकालीन स्रोतों में उनका जिक्र नहीं है। लेकिन, कुल मिलाकर ये तो साफ है कि राजस्थान में जौहर की परंपरा रही है। अब सवाल उठता है कि क्यों?
अब फर्ज कीजिए कि आप एक किले के भीतर बंद हैं। दुश्मनों ने चारों तरफ से किले को घेर रखा है। महीनों बीत गए। खाने-पीने का सामान खत्म होता जा रहा है। हर दिन लड़ाई हो रही है। किले की दीवारें टूट रही हैं। आपको पता है कि कहीं से मदद की कोई आस नहीं है।
फिर एक दिन फैसला होता है… आखिरी फैसला। पुरुष आखिरी लड़ाई के लिए किले का दरवाजा खोलकर बाहर निकलेंगे। उन्हें पता है कि वे वापस नहीं आएंगे। इसे ‘शाका’ कहते हैं। जैसे महिलाओं के लिए जौहर था, वैसे पुरुषों के लिए शाका। मतलब कि आत्म बलिदान। शाका में किले के पुरुष केसरिया वस्त्र पहनकर अंतिम लड़ाई के लिए निकलते थे, सिर पर कफन बांधकर।
अब किले के भीतर महिलाएं और बच्चे रह जाती हैं। उनके सामने सवाल रहता है कि जीतने वाली सेना उनके साथ क्या सलूक करेगी। शायद बुरा सलूक, शायद बहुत ही बुरा सलूक। यही अनिश्चितता जौहर की परंपरा की जड़ है। जौहर करने वाली औरतें आग से नहीं डरती थीं, ऐसा कहना इतिहास को छोटा कर देना होगा। वे जरूर डरती होंगी।
आग में जलना दर्दनाक है। जौहर करने वाली महिलाओं में गर्भवती महिलाएं भी रही होंगी। कुछ के हाथ में छोटे बच्चे रहे होंगे। कुछ की गोद में नवजात रहे होंगे। कुछ ने तो ठीक से दुनिया देखी भी नहीं होगी। तो फिर जिंदा आग में जाने का फैसला क्यों करती थीं?
इसका जवाब सिर्फ ‘जबरदस्ती’ का खौफ नहीं कहा जा सकता। बेशक जबरदस्ती होने का डर था। बल्कि ये तकरीबन तय ही था। लेकिन दर्द की दुनिया उससे भी बड़ी है। युद्ध हारने के बाद स्त्रियों का क्या होगा? उन्हें कौन ले जाएगा? बच्चों का क्या होगा? उन्हें किस बाजार में बेचा जाएगा? वे किसकी ‘संपत्ति’ बन जाएंगी। उन्हें खरीदने वाला उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा? क्या पति और बेटे उनकी आंखों के सामने मार दिए जाएंगे?
और सबसे डरावनी बात शायद ये थी कि किसी को नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है।
मध्यकालीन युद्ध में हारने वालों की जिंदगी अक्सर जीतने वालों की गुलाम हो जाती। पुरुषों को मार दिया जाता था। बंदी बना लिया जाता। औरत और बच्चे दास बन जाते। स्त्रियों को घरेलू काम, दरबारों या हरमों में भेजा जा सकता था। उन्हें ‘यौन दासी’ बनाया जा सकता था। यह कोई बाद की फिल्मी कल्पना न थी। दिल्ली सल्तनत के स्रोतों में महिला दासों और उपपत्नियों का विस्तार से जिक्र है।
इसलिए किले में बैठी किसी महिला के लिए डर सिर्फ इतना नहीं था कि उसके साथ जबरदस्ती होगी। डर यह था कि उसकी पूरी जिंदगी अब उसकी नहीं रहेगी। उसका शरीर। उसकी शादी। उसका धर्म। उसके बच्चे। उसका नाम। उसकी पहचान। सब किसी दूसरे के हाथ में जा सकते हैं।
यही वह जगह है, जहां जौहर का मनोविज्ञान शुरू होता है। उनके सामने दो रास्ते होते थे। पहले में मौत तय थी। दूसरे में कुछ भी तय नहीं था। कई बार अनिश्चित और लगातार चलने वाला भय तत्काल मृत्यु से भी ज्यादा असहनीय हो सकता है। आग में उतरने वाली महिला जानती थी कि आगे क्या होगा। चंद पलों में सब खत्म।
लेकिन दुश्मन के हाथ जिंदा पड़ने पर क्या होगा? उन्हें नहीं पता था। शायद किसी को नहीं पता था।
राजपूत समाज में स्त्रियों को घर और कुल मर्यादा भी समझा जाता था। बेशक आज बहुत से लोग इसे पितृसत्तामक कहते हैं। लेकिन, स्त्रियां परिवार, कुल और राज्य की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई थीं। राजा की पत्नी का बंदी बनना सिर्फ एक महिला की निजी त्रासदी नहीं माना जाती। वो पूरे राजवंश की राजनीतिक हार होती थी।
जौहर की हर महिला के पास एक जैसा विकल्प नहीं था। हमारे पास किसी जौहर की सामूहिक महिला गवाही नहीं है। आग में उतरने से पहले हजारों महिलाओं ने क्या सोचा, इसकी कोई डायरी नहीं है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि हर महिला पूरी तरह अपनी इच्छा से गई। लेकिन ये भी नहीं कह सकते कि हर महिला को जबरदस्ती धकेल दिया गया।
कुछ महिलाएं शायद पूरी तरह दृढ़ थीं। कुछ डर रही होंगी। कुछ अपने बच्चों के लिए गई होंगी। कुछ अपने परिवार के साथ। कुछ शायद इसलिए गई होंगी क्योंकि उनके सामने कोई दूसरा सामाजिक रास्ता ही नहीं था। और कुछ के लिए आग सचमुच उस जिंदगी से बेहतर लगी होगी, जिसकी कल्पना उन्होंने दुश्मन के हाथ पड़ने के बाद की थी।
यहीं जौहर का सबसे अहम सवाल पैदा होता है, जिसका स्वरा भास्कर ने जिक्र किया है। क्या किसी महिला के लिए जिंदा रहना हमेशा बेहतर विकल्प था?
आज इसका हां में जवाब देना बहुत आसान है। क्योंकि आज बहुत से लोगों के लिए ‘यौन संबंध’ शायद सिर्फ आनंद का विषय हैं। लेकिन, उस भीषण बर्बरता युग में ऐसा न था। आज तो प्रगतिशील लोग महिलाओं को वैवाहिक जीवन में एक थप्पड़ पर तलाक की वकालत करते हैं। मगर उस स्त्री के बारे में सोचिए, जिसकी हर एक सांस किसी की गुलामी में बीतने वाली थी।
उन महिलाओं के पास बाहर की दुनिया से संपर्क नहीं था। किसी दूसरे शहर में काम खोजने का सवाल नहीं था। कानून उसके अधिकार की रक्षा नहीं करने वाला था। किसी महिला आश्रय गृह का सवाल नहीं था। उसके पास पासपोर्ट नहीं था कि किसी दूसरे देश चली जाए। इसलिए आज की परिस्थितियों के हिसाब से उन्हें कायर बताना या उनके पक्ष को न समझना बहुत गलत होगा।
उन महिलाओं की पूरी दुनिया किले की दीवारों के भीतर थी। युद्ध में हार के बाद वह दुनिया खत्म होने वाली थी। जौहर का विचार शायद इसी जगह सबसे ताकतवर बनता है। जब कोई व्यक्ति सोचने लगता है कि उसकी पुरानी दुनिया पूरी तरह खत्म हो चुकी है, तो उसके लिए ‘बाद में क्या होगा’ की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है।

और जौहर ही क्यों, मरने के तो और भी तरीके हो सकते थे? जहर, कुआं, तालाब…। ये सवाल भी अक्सर उठता है। इसका जवाब भी इतिहास देता है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के 2025 में International Review of the Red Cross में प्रकाशित एक शोध में कहा गया कि युद्ध में जीत के बाद मृत शरीरों के साथ यौन कृत्य होते रहे हैं। कई मामलों में ये यौन इच्छा के बजाय वर्चस्व, अपमान, हिंसा और शत्रु को नीचा दिखाने का मामला होता था।
यही वजह है कि चित्तौड़ की प्रमुख घटनाओं को केवल धार्मिक, जातीय या नारीवाद के चश्मे से देखना गलत होगा। हर जौहर के पीछे अलग युद्ध था। अलग राजनीति थी। अलग शासक थे। लेकिन किले के भीतर बैठी महिलाओं के सामने पैदा होने वाला भय लगभग एक जैसा रहा होगा।
और उस भय से बचने के लिए बहुत सी राजपूत स्त्रियों ने आत्म बलिदान चुना। पुरुषों ने भी चुना। क्या जिन पुरुषों ने युद्ध में हार तय जानकर भी आत्म बलिदान किया, वो कायर थे? फिर स्त्रियों ने भी तो वही किया, बस वो उन्होंने अलग रणभूमि चुनी। बेशक मैं यहां जौहर का महिमामंडन नहीं कर रहा। शायद होना भी नहीं, क्योंकि वो ऐतिहासिक अतीत का भीषण जख्म है।
लेकिन जौहर का मजाक तो नहीं बनना चाहिए। जौहर करने वाली स्त्रियों या शाका करने वाले पुरुषों को कायर नहीं कहा जाना चाहिए। ये उनका अपमान होगा।
(इतिहास की बात फेसबुक पेज से साभार)

विश्व की पहली वीर साम्राज्ञी नागणिका सातकर्णी

राज्य का शासन क्षेत्र महाराष्ट्र से कर्णाटक-कोंकण तक फैला हुआ था जिसकी राजधानी प्रतिष्ठान (पैठण) थी। जब रानी प्रशासनिक बागडोर सम्भाल रही थी तब सीरिया और बेबिलोनिया के आक्रांताओं का चारों ओर प्रभाव था। वे बहुत क्रूर थे, जिस राज्य में प्रवेश करते सबसे पहले वहाँ की महिलाओं को निशाना बनाते थे। वे लाखों की तादाद में आक्रमण करते थे। धन संपत्ति की लूट के साथ संस्कृति का विनाश करना उनका मक़सद होता था।

रानी ने ख़ुद सेना का नेतृत्व किया

सातकर्णि शालिवाहन सम्राट के निधन के बाद जब पूरा राज्य शोक में था तब इनके हमलों ने सातवाहन साम्राज्य को बहुत नुक़सान पहुँचाया। जब रानी नागनिका को आक्रांताओं के हमले का पता चला तो उन्होंने गर्जना करते हुए कहा -“महामन्त्री सुशर्मा, हम शान्तिप्रिय हैं और हम अहिंसा के पुजारी हैं। इसका कोई, मनमाना अर्थ न निकाल ले। किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए। इसलिए हमें अपने राष्ट्र को सामर्थ्यशाली साधन सम्पन्न बनाना चाहिए। दुष्ट और हिंसक प्रवृत्तियाँ कभी समाप्त नहीं होती हैं और ऐसी प्रवृत्तियाँ विश्व-विनाशकारी सिद्ध होती हैं, इसलिए राष्ट्रसेना सुरक्षित, सुसज्जित और प्रशिक्षित होनी चाहिए। कोई शत्रु कभी हम पर आक्रमण नहीं करेगा। भविष्य में हम अपने राष्ट्र में अन्तरिम और बाह्य कैसे भी विद्रोह अथवा आक्रमण को क्षमा नहीं करेंगे ! आप इस समाचार को त्वरित प्रसारित करने की व्यवस्था कीजिए।”

वीरांगना साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी ने इन क्रूर आक्रांताओं के साथ प्रथम लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने अपनी सेना का ख़ुद नेतृत्व किया और अपनी पहले ही सैन्य अभियान में क्रूर आक्रांताओं को शिकस्त दी। रानी ने आक्रांताओं की विशाल सेना को भारी क्षति पहुँचाई थी। बड़ी संख्या में आक्रांता सैनिक मारे गये थे, कुछ अपनी जान बचाकर भाग गये, बाक़ी जो बचे वे रानी के सामने घुटने टेककर हथियार डाल दिये थे ।

अरब में भगवा ध्वज लहराया

साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी अतिकुशल राजनीतिज्ञ भी थी उन्होंने राजनीती के बल पर घोर विरोधी राज्य को भी बिना युद्ध लड़े एक छत्र शासन में ले आई थी। रानी ने शालिवाहन साम्राज्य और वैदिक हिन्दू संस्कृति के सूर्य को कभी अस्त नहीं होने दिया। रानी नागनिका का मानना था कि राष्ट्रनिर्माण हो जाने पर राष्ट्रविकास की संकल्पना को पूर्ण करते समय प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य सीमा रक्षण का होता है जिसमें चूक होना विनाश का बुलावा होता है, राज्य सबल, सुन्दर, विकसित और सम्पन्न तभी हो सकेगा जब राष्ट्र निर्भय होगा। साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी के शासन के दौरान रोम के साथ व्यापार बढ़ा और साम्राज्य समृद्ध हुआ। अंतर्रदेशीय व्यापार में वृद्धि के लिए परिवहन और व्यापार मार्गों में सुधार किया गया, जिससे भारत के उत्तर और दक्षिण के बीच यात्रा आसान हो गई।रानी ने भारत का सनातनी भगवा ध्वज अरब में लहराया था। साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी विश्व की पहली महारानी हैं जिनके नाम का सिक्का निकला था।

आक्रांताओं ने घुटने टेक दिये

साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी एक कुशल महारानी के साथ-साथ सनातन हिन्दू संस्कृति के संरक्षण के लिए अवतरित हुई एक विलक्षण, रण कौशलिनी, युद्ध के 49 कला से निपुण शासिका थी। रानी शत्रुओं के बल और दर्प (घमण्ड) का अन्त तो करती ही थी, साथ ही साथ अगर ज़रूरत होती थी तो शत्रु का पूर्णरूप से माँ दुर्गा की तरह नाश कर देती थी। साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी विश्व की पहली शासिका थी, जिन्होंने युद्ध में नेतृत्व करते हुए खुद भी युद्ध लड़ी थी असुर दलों के विरुद्ध और अरब तक राज्य विस्तार की थी। विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार “रोबर्ट वालमन” ने अपनी पुस्तक “वर्ल्ड फर्स्ट वारियर” में लिखा हैं “साम्राज्ञी नागनिका सातकर्णी ने अरब तक राज्य विस्तार की थी। उनके तलवार के आगे 157 विदेशी आक्रांताओं ने घुटने टेक दिये थे।”

शत्रुओं में ख़ौफ़ था

“शुभांगी भदभदे” नाम की इतिहासकार “साम्राज्ञी नागनिका” नामक उपन्यास में लिखती हैं ” जब आक्रांता निरारि पंचम ने अपनी 1,36,000 दानवी सेना के साथ हमला किया था, तब साम्राज्ञी नागनिका की सेना ने अपनी युद्ध कौशल से भारत की पुण्यभूमि से उसे बहुत बुरी तरह खदेड़ दिया था। साम्राज्ञी नागनिका की मृत्यु के पश्चात भी इन आक्रांताओं की हिम्मत नहीं हो पायी दोबारा आर्यावर्त पे आक्रमण करने की। साम्राज्ञी नागनिका बेबीलोनिया, मेसोपोटमिया और अरबी हमलावरों को भारत से ना केवल खदेडती थी, अपितु उनका पूर्णरूप से विनाश कर देती थी। ताकि ये आक्रमणकारी दोबारा भारत पर आक्रमण करने की सोच भी ना सके। यह प्रसिद्ध लड़ाइयाँ कर्णाटक-कोंकण पैठण में लड़ी गयी थी।”

(साभार – देशपत्र डॉट कॉम)

भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज ने किया गुरु तत्व को प्रणाम

कोलकाता । दी भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज में शिक्षक दिवस मनाया गया। गीत संगीत और शास्त्रीय नृत्य द्वारा सरस्वती वंदना की गई।
रेक्टर और डीन प्रोफेसर दिलीप शाह ने स्वागत व्यक्त किया और गुरु तत्व को प्रणाम किया जिसमें सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दी। इस मौके पर सभी शिक्षक शिक्षिकाओं को गोल्डन मिडास अवार्ड्स दिए गए जिन्होंने अपनी शिक्षा से अपने जादुई स्पर्श से विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की। शिक्षक शिक्षिकाओं को उनकी प्रतिभा और गुणों को नमन किया। शुगर एंड स्पाइस अवार्ड, नारियल अवार्ड, मिर्ची अवार्ड, थंडर बोल्ड अवार्ड, लाउडस्पीकर अवार्ड , फ्री थेरेपी अवार्ड, 1000 शब्द स्माइल , प्रोफेसर इंस्टा अवार्ड, गोल्डन हार्ट अवार्ड, ऑपरेशन परफेक्शन अवार्ड, रोस्ट अवार्ड,केमिकल रिएक्शंस अवार्ड ,पीलर अवार्ड ,चैंपियन आफ चैंपियन अवार्ड, फैशन आइकन अवार्ड आदि अवार्ड शिक्षकों को दिए गए जो बहुत ही रुचिकर रहे।
प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, डॉ देवजानी गांगुली, डॉ शुभब्रत गांगुली, रेक्टर और डीन प्रोफेसर दिलीप शाह, डॉ रेखा नारिवल, डॉ त्रीदीप सेनगुप्ता, डॉ पिंकी सरदार साहा आदि शिक्षक और शिक्षिकाओं को अवार्ड दिए गए जिन्होंने विद्यार्थियों को अपनी शिक्षा से प्रोत्साहित किया गया । इस कार्यक्रम का संचालन किया श्रद्धा सिंह और तरंग अग्रवाल ने। विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रस्तुतियां दी जिनमें बालीवुडनृत्य,वेस्टर्न,लघु नाटिका और फैशन वाक शामिल रहे। सभी शिक्षकों ने कार्यक्रम के अंत में वाडिया हाल में एक साथ अपराह्न भोजन किया और शिक्षक दिवस के कार्ड, दो उपहार सूटकेस और दोहड़ प्राप्त किए। जानकारी डॉ वसुंधरा मिश्र ने दी।