कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या में पहली बार गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2011 से लगातार बढ़ रही मतदाता संख्या अब घटकर लगभग 6.75 करोड़ रह गई है। यह जानकारी राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय की ओर से जारी अंतिम पूरक सूची के विश्लेषण में सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में, जब वाम मोर्चा के 34 वर्ष के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की सरकार बनी, उस समय राज्य में लगभग 5.62 करोड़ मतदाता थे। इसके बाद हर चुनाव में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही।
चुनावी वर्ष के अनुसार मतदाताओं की संख्या –वर्ष 2011 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 5.62 करोड़, वर्ष 2014 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 6.27 करोड़, वर्ष 2016 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 6.58 करोड़, वर्ष 2019 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 6.98 करोड़, वर्ष 2021 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 7.33 करोड़, वर्ष 2024 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 7.60 करोड़
लेकिन, बंगाल में गत नवंबर से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब यह संख्या घटकर 6.75 करोड़ हो गई है। राजनीतिक दलों ने पहले आरोप लगाया था कि नए और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के नाम तो जोड़े जा रहे थे, लेकिन मृत, स्थानांतरित, लापता और दोहरे नाम वाले मतदाताओं को सूची से हटाने की प्रक्रिया प्रभावी तरीके से नहीं हो रही थी।
चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि इस बार पुनरीक्षण के दौरान मृत, स्थानांतरित, लापता, दोहरे तथा फर्जी मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए हैं, जिसके कारण मतदाता संख्या में यह बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया से मतदाता सूची अधिक पारदर्शी और शुद्ध हुई है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य में इसी महीने दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं।
बंगाल में एसआईआर के बाद 6.75 करोड़ रह गए वोटर
श्री हनुमानः रामभक्ति के विग्रहवान स्वरूप
हनुमान जयंती (02 अप्रैल) पर विशेष
-डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
हनुमान जी महाराज, परात्पर ब्रह्म, सच्चिदानन्द स्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के निष्ठावान सेवक, निष्काम भक्त और उनके अन्तरङ्ग पार्षद हैं। रामभक्ति के विग्रहवान स्वरूप श्री हनुमानजी भक्ति की उच्चतम पराकाष्ठा पर आसीन है और उनके जीवन में प्रेमा भक्ति, तात्विक ज्ञान और निष्काम कर्म योग का समुच्चय विद्यमान है।
श्री हनुमानजी राम मिलन के प्रमुख सेतु हैं और अपने आराधकों को जीवन के चरम लक्ष्य रामभक्ति की और अग्रसर करते हैं, वे रामभक्तों के परम आश्रय और संकटापन्न स्थिति में उनके संकटों का निवारण करते हुए उनके जीवन में शुभ मङ्गल का संचार करने वाले प्रत्यक्ष देवता कहे जाते हैं।
भगवान् श्रीराम की वनगमन लीला में एक प्रमुख पात्र के रूप में उनकी भूमिका अपने स्वामी श्रीराम के निष्ठावान सेवक के रूप में ही नहीं बल्कि कर्तव्य पथ पर पुत्र के समान आज्ञाकारी, बंधु के समान हितकारी, द्विविधा की स्थिति में गुरु के समान पथ प्रदर्शक तथा विषम परिस्थितियों में मित्र के समान सहयोगी के रूप में भी उल्लेख किए जाने योग्य है। वस्तुत: हनुमानजी जैसा निष्ठावान, समर्पित एवं निष्काम भक्त न तो सृष्टि में पहले कभी हुआ और न आगे कभी हो सकता है। उनके बगैर श्रीरामचरित का पूरी तरह बखान नहीं किया जा सकता।
विराट वैभव से परिपूर्ण श्री हनुमानजी विनयशील हैं और रामकाज में अत्यंत लघु रुप धारण कर लेते हैं। हनुमानजी भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो वे अत्यंत लघु रूप में आकाश मार्ग से गमन करते हुए लंका पहुंचे।
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि लंका की भूमि पर कदम रखने के पहले जहां उन्होंने अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की सीमा में प्रवेश किया, वहीं जब लंका नगरी में माता सीता की खोज शुरू की, तब भी लघु रूप धारण कर सर्वप्रथम अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए सीताजी का अनुसंधान करने लगे।
हनुमानजी शुद्ध भक्त हैं इसलिए अहंकार रहित हैं और उनके द्वारा रामकाज निष्पादन हमें प्रेरित करता है कि किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटा हो जाना ही ठीक है। अहंकार महान् उद्देश्यों की पूर्ति में सदैव बाधक होता है, परिणामस्वरूप अहंकार से कोई महान् कार्य अपने मुकाम पर पहुंचने में पूरी तरह सफल नहीं होता इसलिए हनुमानजी अपने स्वामी श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो अपने मुख में राम नाम की विराट सत्ता को स्थापित कर लिया किंतु अपने स्वरूप को अत्यंत लघु आकार देते हुए लंकापुरी में सीता माता की खोज करने लगे।
धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान् शिव द्वारा अपने स्वामी श्रीराम की सेवा की तीव्र अभिप्सा के निमित्त उन्होंने ग्यारहवें रुद्र के रूप में वायुदेव केसरी और देवी अञ्जना के पुत्र हनुमान के रूप में जन्म लिया और भगवान् श्रीराम की सेवा की अपनी अभिलाषा पूरी की। पुराणों के अनुसार चूंकि भगवान् विष्णु ने रामावतार में पुरुष रुप धारण किया था और भगवान् शिव उनकी सेवा के अभिलाषी थे, ऐसे में यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर सेवा करते तो यह दास भाव के अनुकूल नहीं होता इसलिए उन्होंने मनुष्य से निम्नतर वानर योनि में जन्म लेकर दास भाव से अपने स्वामी भगवान् श्रीराम की सेवा की।
श्रीरामचरितमानस के अनुसार हनुमानजी ने गतिमान सूर्यदेव से तादात्म्य स्थापित करते हुए उनसे शिक्षा ग्रहण की, अपने दिव्य गुणों से वे सूर्यदेव के भी स्नेह भाजन हुए और उनसे प्रखर बुद्धि, दिव्य ज्ञान सहित तेज, ओज, बुद्धि और बल पा गए।
वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि एवं हनुमान बाहुक में गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि जब श्री हनुमान विद्या अध्ययन हेतु भगवान् सूर्य के पास गए तो सूर्यदेव ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि मैं सदैव गतिमान हूं और तुम्हारे लिए मेरे सामने बैठना संभव नहीं इसलिए मैं तुम्हे कैसे शिक्षा दूंगा? तभी हनुमानजी ने सूर्याभिमुख होकर आकाश मार्ग में गमन करना शुरू कर दिया और उनके समक्ष उनसे संपूर्ण शिक्षा ग्रहण की। उधर स्वर्ग स्थित देवताओं ने जब यह अद्भुत एवं विस्मयकारी दृश्य देखा तो सब के सब हतप्रभ रह गए और हनुमानजी के धैर्य, शौर्य, साहस और वीरता की प्रशंसा करने लगे।
हमारे वेद्, उपनिषद् एवं पौराणिक ग्रंथों में भगवान् श्रीराम के पावन नाम की बड़ी महिमा का बखान किया गया है और हनुमानजी महाराज तो भगवान् श्रीराम के अतिप्रिय दास हैं, रुद्रावतार हैं और रुद्र अर्थात शिव सतत रामनाम में ही रत रहते हैं, ऐसे में रुद्रावतार हनुमानजी हर क्षणांश अपने प्रभु के नाम का ही स्मरण किया करते हैं।
श्री बुधकौशिक मुनि रामरक्षा स्तोत्र में भगवान् शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद का उल्लेख करते हुए, रामनाम की महिमा का वर्णन करते हैं-राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने।।
अर्थात है देवी ! राम राम राम इस प्रकार तीन बार राम नाम का उच्चारण सहस्त्र नाम के तुल्य है इसलिए मैं सदैव राम नाम में ही रमण करता हूं ।
श्री हनुमानजी पर ब्रह्म एवं शक्ति की महती कृपा थी और वे इसी शक्ति से अनुप्राणित हुए। वाल्मीकि कृत रामायण सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि भगवान् श्रीराम और भगवती सीता द्वारा प्रदत्त आशीर्वाद से श्री हनुमानजी अजर अमर हैं और कल्प पर्यन्त पृथ्वी लोक में उनका निवास बना रहेगा।
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम के आज्ञानुसार सीता माता की खोज कर लौटे हनुमानजी को प्रभु ने अपना सर्वस्व कहा जाने वाला दिव्य आलिंगन प्रदान कर उन्हें कृत-कृत कर दिया और जब प्रभु अपनी लीलाओं का संवरण कर अपने नित्य धाम जाने लगे तब उन्होंने हनुमानजी को कहा कि हनुमान! तुम मेरी कथा में ही मेरी भावना कर कल्प पर्यन्त इस पृथ्वी लोक पर निवास करते हुए स्वयं मेरी कथा सुनना और रसिकों को भी सुनाया करना।
ऋषि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम ने हनुमानजी को कहा कि जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं स्थिर रहेंगी और जब तक मेरी कथा संसार में रहेगी, तुम्हारे शरीर में प्राण रहेंगे और तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। भगवान् श्रीराम की कृपा के साथ ही सीताजी ने भी हनुमानजी पर कृपा करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया कि है तात्! तुम बल और शील के निधान, अजर अमर और गुणों की निधि होओ और श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें।
श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव मुनि, राजा परीक्षित को कहते हैं कि राजन् ! किम्पुरुष वर्ष में भगवान् श्री राम के चरणारविन्दों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्री हनुमानजी अन्य किन्नर गणों सहित भक्ति पूर्वक उनकी उपासना करते हैं। वहां अन्य गंधर्वों सहित आर्ष्टिषेण अपने स्वामी भगवान् श्री राम की परम कल्याणमयी गुणगाथाओं का गान किया करते हैं, हनुमानजी उस कथा का श्रवण करते हैं और अपने प्रभु की स्तुति में मग्न रहते हुए रसिकों को भी राम कथा रुपी अमृत प्रदान करते हैं।
परब्रह्म श्रीराम और आद्या शक्ति सीता के कृपा प्राप्त श्री हनुमानजी महाराज अजर अमर हैं, सब युगों में वर्तमान है और अपने आराधकों को संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें रामभक्ति पथ पर अग्रसर करते हैं, वे रामकथा के अमर गायक हैं। यद्यपि हनुमानजी की विद्यमानता व्यापक रूप से सब जगह है, तथापि जहां-जहां राम का कीर्तन गाया जाता है, वहां वे मौजूद होते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं-
यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम्।।
अर्थात जहां-जहां रघुनाथ श्रीराम का कीर्तन, स्मरण, जप या कथा होती है, वहां-वहां नेत्रों में अश्रुपूरित आनंद लिए हनुमानजी उपस्थित हो जाते हैं। ऐसे राक्षसों के लिए काल स्वरूप श्री हनुमानजी को प्रणिपात किया जाना चाहिए।
(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)
न्याय का प्रतीक घंटा: क्यों बजाते हैं घंटी और क्या है इसका महत्व
भारतीय भाषा परिषद में महादेवी जयंती का आयोजन
कोलकाता। भारतीय भाषा परिषद की ओर से महादेवी वर्मा की जयंती के अवसर पर “महादेवी वर्मा और स्त्री विमर्श” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि अमूमन जब भक्तिकाल की बात होती है तो मीरा को हाशिए पर रख कर देखा जाता है और जब छायावाद की बात होती है तो महादेवी वर्मा को हाशिए पर रख कर देखा जाता है। स्त्रियों के दो बड़े आभूषण रहे हैं- मौन और आँसू। महादेवी का लेखन स्त्री विवशता को चुनौती देता है। महादेवी वर्मा की स्त्री चेतना में बाजार के रंगीन प्रलोभनों के प्रति विरोध का स्वर है। महादेवी वर्मा के यहाँ स्वानुभव के साथ संवेदना भी है। विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की डॉ. श्रुति कुमुद ने कहा कि महादेवी वर्मा अपनी सीमा को अपनी शक्ति बना लेती हैं। आज स्त्री-विमर्श एक गाली की तरह देखा जा रहा है। यह देखना जरूरी है कि भविष्य के गर्भ में स्त्रीवाद का स्वरूप क्या होगा? आज कैंसिल कल्चर को स्त्रियों के ख़िलाफ़ ट्रॉलिंग के टूल्स के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। युवा हस्ताक्षर के रूप में हिंदी विभाग, विद्यासागर विश्वविद्यालय के शोधार्थी सुषमा कुमारी ने कहा कि महादेवी वर्मा ने अपने समय की उन तमाम समाजिक रूढ़ियों, अन्याय और अत्याचारों का विरोध किया जो भारतीय समाज को अपंग बनाने में सहायक था। शोधार्थी रूपेश कुमार यादव ने कहा कि महादेवी वर्मा का रचना-संसार पुरुष वर्चस्व के ख़िलाफ़ एक सशक्त प्रतिरोध है। इस अवसर पर महादेवी वर्मा पर बनी फ़िल्म ‘पंथ रहने दो अपरिचित’ की प्रदर्शनी भी हुई।
इस अवसर पर घनश्याम सुगला,प्रो. हितेन्द्र पटेल, डॉ नंदिता बनर्जी, प्रो.दिलीप शाह, श्री आशीष झुनझुनवाला, विमला पोद्दार, डॉ सुशीला ओझा, ज्योति शोभा, शिखा सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि आधी आबादी का आख्यान है महादेवी वर्मा का साहित्य। यही वजह है कि महादेवी वर्मा ने मनमाना और मनचाहा में मनचाहा को चुना।
लिटिल थेस्पियन का 15वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह ‘जश्न-ए-अज़हर’ सम्पन्न
कोलकाता । लिटिल थेस्पियन का 15वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह ‘जश्न-ए-अज़हर’ कोलकाता के ज्ञान मंच में आयोजित हुआ। लिटिल थेस्पियन के 15वें राष्ट्रीय नाट्य उत्सव ‘जश्न-ए-अज़हर’ के छठवें और अंतिम दिन का समापन ज्ञान मंच के प्रांगण में 29 मार्च 2026 को हुआ। पश्चिम बंग नाट्य अकादमी, सूचना और सांस्कृतिक विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार और अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव के छठवें दिन ,विवेचना रंगमंडल, जबलपुर द्वारा सत्यनारायण पटेल के नाटक ‘पर पाज़ेब ना भीगे’ का मंचन किया गया। यह नाटक एक लोक कथा पर आधारित है, जिसमें एक बंजारे की प्रेम कहानी को दर्शाया गया है। कोलकाता के ज्ञान मंच में 24 से 29 मार्च 2026 तक चलने वाले नाट्य उत्सव के प्रथम दिन की शुरुआत उद्घाटन समारोह से हुई जिसमें मुख्य सम्मानित अतिथि के तौर पर उपस्थित थे , विश्वम्भर नेवर ( छपते छपते अखबार के संपादक ), कल्लोल भट्टाचार्य (नाट्य निर्देशक, एबोंग आमरा), डॉ. अजय रॉय (संगीतकार) और जयंत देशमुख (नाट्य निर्देशक, एकरंग,( मुंबई)उपस्थित रहे । प्रथम दिन के दूसरे सत्र में मुरारी रायचौधरी (संगीतकार) को 5वाँ अज़हर आलम स्मृति पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने 500 नाटकों के लिए संगीत तैयार किया, जिसमें लगभग 300 ऐसे गीत शामिल थे जिन्हें उन्होंने खुद लिखा और उनकी धुनें तैयार कीं। उन्होंने नंदिकर, सायक, लिटिल थेस्पियन, अन्य थिएटर, पदातिक जैसे बड़े नाट्य संस्थाओं के लिए मंच प्रस्तुतियों का संगीत तैयार किया है। तीसरे सत्र में नाट्य संस्था एकरंग, मुंबई द्वारा पगला घोड़ा का मंचन जयंत देशमुख के निर्देशन में हुआ।

जश्ने अज़हर के चौथे दिन के पहले सत्र में थिएटर समीक्षक प्रेम कपूर को सम्मानित किया गया। वे एक पत्रकार, कला और थिएटर समीक्षक, और कुशल अनुवादक हैं। 1962 से पत्रकारिता में सक्रिय कपूर ने ‘विचार प्रवाह’ और ‘जनसंसार’ जैसे प्रकाशनों में सहायक संपादक के रूप में कार्य किया है। उनकी थिएटर समीक्षाएँ ‘जनसंसार’, ‘जनसत्ता’, ‘छपते-छपते’, ‘प्रभात वार्ता’, ‘कलयुग वार्ता’ और ‘राजस्थान पत्रिका’ में प्रकाशित हुई हैं। दूसरे सत्र में एस.एम. अजहर आलम का नाटक ‘चाक’ उमा झुनझुनवाला के निर्देशन में लिटिल थेस्पियन समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया। पाँचवे दिन (28 मार्च 2026) अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा माइम कलाकार सोमा दास को सम्मानित किया गया। सोमा दास ने अपने करियर की शुरुआत 5 साल की उम्र में अपने पिता स्वर्गीय मानिक लाल मजूमदार के मार्गदर्शन में की थी। बाद में उन्होंने पद्मश्री निरंजन गोस्वामी से सीखा। वे ‘सोमा माइम थिएटर’ की संस्थापक/निदेशक हैं और उन्हें ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार, 2016’ से सम्मानित किया गया है। उत्सव के दूसरे सत्र में मृणाल माथुर द्वारा लिखित और अमित रौशन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पश्मीना’ का मंचन किया गया। ‘पश्मीना’ एक शहीद सैनिक के माता-पिता की कश्मीर घाटी की मार्मिक यात्रा की कहानी है, जहाँ उनके साथ उनके पड़ोसी, एक कश्मीरी पंडित, डॉ. कौल का दुख भी जुड़ा होता है। इस महोत्सव को पश्चिंमबंग नाट्य अकादमी, सूचना और सांस्कृतिक विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार और अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गयी है ।
आईआईटी खड़गपुर ने चारनोक हॉस्पिटल से मिलाया हाथ
रिसर्च और क्लिनिकल एक्सीलेंस को लेकर साथ करेंगे काम
कोलकाता । इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) खड़गपुर ने 26 मार्च, 2026 को चारनोक हॉस्पिटल के साथ एक रणनीतिक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया। यह स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में इनोवेशन, रिसर्च और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आईआईटी खड़गपुर के डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती और चारनोक हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक प्रशांत शर्मा की मौजूदगी में इस एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया। इस सहयोग का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में हो रहे अत्याधुनिक शोध और क्लिनिकल प्रैक्टिस में उसके उपयोग के बीच की खाई को दूर करना है। आईंआईटी खड़गपुर स्वास्थ्य सेवा से जुड़े अपने शैक्षणिक और शोध परिणामों का उपयोग चारनोक अस्पताल के क्लिनिकल परिवेश में करेगा। यह साझेदारी निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित होगी: आईआईटी द्वारा विकसित डायग्नोस्टिक और डिजिटल हेल्थ-टेक का सत्यापन और बेंचमार्किंग, एआई, एमएल और ट्रांसलेशनल शोध के लिए क्लिनिकल डेटा का संग्रह और विश्लेषण, चिकित्सकों और इंजीनियरों के लिए संयुक्त शोध, प्रशिक्षण और आउटरीच कार्यक्रम, क्लिनिकल और सामुदायिक परिवेश में प्रौद्योगिकी विकास की गति को तेज करना । इस मौके पर आरिसर्च और क्लिनिकल एक्सीलेंस को लेकर ईआईटी खड़गपुर के डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती ने कहा, आईआईटी खड़गपुर और चारनोक हॉस्पिटल के बीच यह सहयोग वैज्ञानिक रिसर्च को क्लिनिकल प्रैक्टिस के साथ जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम है। आईआईटी खड़गपुर में हम ऐसी टेक्नोलॉजी डेवलप करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिनका समाज पर असल असर हो। यह पार्टनरशिप हमारे इनोवेशन को सुलभ, मरीज़-केंद्रित हेल्थकेयर समाधानों में बदलने के लिए एक ज़रूरी मंच देती है। इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च को क्लिनिकल विशेषज्ञता के साथ मिलाकर, हमारा लक्ष्य डायग्नोस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ और ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रगति को तेज करना है, जिससे आखिरकार एक ज़्यादा मज़बूत और भविष्य के लिए तैयार हेल्थकेयर इकोसिस्टम बनाने में मदद मिलेगी। चारनोक हॉस्पिटल के एमडी प्रशांत शर्मा ने कहा, आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के साथ पार्टनरशिप करना चारनोक हॉस्पिटल के लिए एक बड़ा मौका है। यह सहयोग इनोवेशन और रिसर्च से प्रेरित विश्व-स्तरीय हेल्थकेयर देने की हमारी प्रतिबद्धता को और मज़बूत करता है।
भारतीय आभूषणों की विरासत : अतीत से वर्तमान तक एक निरंतर यात्रा
संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा संरक्षित मूर्तियाँ उजागर करती हैं भारतीय शिल्प, सौंदर्य और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्भुत संगम भारत में आभूषण केवल सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सशक्त प्रतीक रहे हैं।बदलते समय के साथ इनके स्वरूप में परिवर्तन अवश्य हुआ है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि प्राचीन आभूषण शैलियाँ समय-समय पर आधुनिक फैशन में पुनः उभरती रहती हैं। यह प्रवृत्ति भारतीय परंपरा की गहरी जड़ों और उसकी निरंतरता को दर्शाती है। संचालनालय द्वारा संरक्षित मूर्तियाँ इस सांस्कृतिक यात्रा का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। इन मूर्तियों में अंकित आभूषण न केवल उस समय की शिल्पकला और तकनीकी दक्षता को दर्शाते हैं, बल्कि समाज की सौंदर्य दृष्टि और जीवन शैली को भी जीवंत रूप में सामने लाते हैं।

द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की शुंगकालीन यक्षी प्रतिमा, भरहुत से प्राप्त, भारतीय आभूषणों के प्रारंभिक विकसित स्वरूप को दर्शाती है। विकसित कमल के मध्य अंकित इस प्रतिमा में मोतियों के पंचवली हार, कर्ण-कुंडल और बहु-लड़ी हारावली का सुंदर अंकन है। यक्षी अपने हाथों में सनाल पद्म धारण किए हुए हैं। यक्षी के चेहरे पर हल्की मुस्कान और शिरो-सज्जा में बालों का व्यवस्थित विन्यास उस समय की सौंदर्य दृष्टि को दर्शाता है।

9वीं–10वीं शताब्दी की हरिहर प्रतिमा में शिव और विष्णु का संयुक्त स्वरूप अंकित है। आधे भाग में जटा मुकुट और दूसरे भाग में किरीट मुकुट, दोनों देवताओं की पहचान को स्पष्ट करते हैं। अन्य आभूषणों में केयूर, शिव सर्प कुंडल तथा विष्णु सूर्यवृत कुंडल, एकावलीहार, यज्ञोपवीत, उरूदाम धारण किए हुए हैं। हरि का वाहन गरुड मानव रूप में आलेखित हैं, तथा हरका वाहन नंदी भी प्रदर्शित हैं।

11वीं शताब्दी की परमारकालीन शिव-पार्वती प्रतिमा में ‘रावणानुग्रह’ का दृश्य अंकित है। शिव-पार्वती को कैलाश पर्वत पर अपने –अपने वाहन नंदी एवं सिंह पर बैठा दिखाया गया हैं। पार्वती जटा मुकुट धारण किए हुए हैं। पाद पीठ पर रावण को कैलाश पर्वत उठाने के लिए घुटने के बल मुड़े हुए दिखाया गया हैं। गणेश, कार्तिकेय, ब्रह्मा-विष्णु के साथ विद्याधर एवं गन्धर्वों का आलेखन हैं। शिव के कानों में चक्राकार कर्ण कुंडल, गले में एकावली (मुक्तामाला) तथा उसके ऊपर तीन लड़ी वाला हार दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त भुजाओं में केयूर (भुजबंध) अलंकरण को और समृद्ध बनाते हैं। एक बनमाला भी नीचे की ओर झूलती हुई दिखाई गई है, जिसे पुष्पमाला के रूप में सजाया गया है। पार्वती के कानों में भिन्न प्रकार के कुंडल; एक ओर चक्र कुंडल और दूसरी ओर ताटंक दर्शाए गए हैं। गले के आभूषण में हारावली मध्य भाग से नीचे की ओर झूलती हुई दिखाई देती है, और भीतर की ओर स्तन सूत्र का भी अंकन है।

11 वीं शताब्दी की कलचुरी कला में आभूषणों की सूक्ष्मता और जटिलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। सुरसुंदरी स्खलित वसना प्रतिमा की भावांकन में सरलता,चक्र-कुंडल, एकावली, चंद्रहार, स्तनसूत्र, कुचबंध, केयूर, कंकण धारण किए हुए हैं। इस प्रतिमा में नायिका के स्नानोपरांत वस्त्र धारण करने का आलेखन हैं।

11-12वीं शताब्दी की कच्छप घात शैली की वैष्णवी प्रतिमा में क्षेत्रीय कला का प्रभाव स्पष्ट है। भुजाओं में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए हैं। देवी किरीट मुकुट कुंडल, हार, स्तनहार, कटी मेखला, वैजयंतीमाला, नूपुर, कंगन, बाजूबंध आदि आभूषणों से अलंकृत हैं। पाद पीठ पर परिचारक देवी से आशीर्वाद ले रहा हैं।
उमा-महेश्वर अपने –अपने वाहन सिंह एवं नंदी पर बैठे हुए जटा मुकुट, हार, बाजूबंद, कटी मेखला, नूपुर धारण किए हैं। प्रतिमा में उमा-महेश्वर को एक दूसरे की ओर निहारते हुए दिखाया गया हैं। चतुर्भुजी शिव की भुजाओं में त्रिशूल, सर्प, कमल पुष्प अंकित हैं। पार्वती की दाहिनी भुजा शिव के स्कन्ध एवं बांयी भुजा में दर्पण लिए हैं।

समभंग में स्थानक देवी के घुटने के नीचे का भाग खंडित हैं। द्विभुजी देवी की दायीं भुजा में अक्षमाला, बांयी भुजा में कमंडल का अंकन हैं। अलंकृत केश दोनों कंधों पर फैले हुए हैं। देवी कर्ण कुंडल, ग्रैवेयक, केयूर, कटीमेखला, पारदर्शी अधोवस्त्र आदि से अलंकृत हैं।
संयुक्त निदेशक डॉ. मनीषा शर्मा के शब्दों में, भारतीय आभूषण केवल अलंकरण नहीं, बल्कि समय, समाज और संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़ हैं। इन मूर्तियों में अंकित प्रत्येक कुंडल, हार और कटि मेखला अपने युग की सौंदर्य दृष्टि और सांस्कृतिक मूल्यों की कहानी कहती है। संचालनालय में संरक्षित ये धरोहर हमें यह समझने का अवसर देती हैं कि परंपरा कभी स्थिर नहीं होती; वह निरंतर विकसित होती है, फिर भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी रहती है। आज के आभूषणों में जो रूप दिखाई देते हैं, वे इन्हीं प्राचीन परंपराओं की पुनरावृत्ति हैं, जो अतीत और वर्तमान के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करती हैं।
गर्मियों के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं सत्तू के 7 पारंपरिक व्यंजन
गर्मियों के मौसम में, जैसे-जैसे सूरज की तपिश बढ़ने लगती है, शरीर को किसी ऐसी चीज़ की तलब होती है जो न केवल ऊर्जा दे, बल्कि भीतर से ठंडक का एहसास भी कराए। ‘सत्तू’ उत्तरी भारत का वह ‘देसी सुपरफ़ूड’ है जो प्रोटीन, फ़ाइबर और आयरन से भरपूर होता है। ऐसे में यहां व्यस्त सुबहों के लिए सत्तू की 7 झटपट और पारंपरिक रेसिपीज दी गई हैं।।।
क्लासिक सत्तू शरबत: ज़्यादातर भारतीय घरों के लिए, यह गर्मियों में ताज़गी देने वाला सबसे बढ़िया ड्रिंक है। दो बड़े चम्मच पारंपरिक सत्तू के आटे को ठंडे पानी, भुने हुए जीरे के पाउडर, काले नमक, नींबू के रस और कटी हुई पुदीने की पत्तियों के साथ मिलाएं यह एक स्वादिष्ट और पौष्टिक ड्रिंक है जो आपको घंटों तक पेट भरा हुआ और ऊर्जावान महसूस कराता है।
मीठा सत्तू ड्रिंक: दिन की एक शानदार शुरुआत के लिए, सत्तू को गर्म दूध या पानी में तब तक फेंटें जब तक वह एक चिकना घोल न बन जाए। इसे गुड़ या शहद से मीठा करें, और ऊपर से केले के टुकड़े और बादाम डालें। आयरन से भरपूर और प्राकृतिक रूप से मीठा, यह ड्रिंक सभी उम्र के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
सत्तू छाछ: सत्तू को गाढ़े दही या छाछ, एक चुटकी नमक और एक हरी मिर्च के साथ ब्लेंड करें। प्रोबायोटिक्स से भरपूर, यह ड्रिंक पाचन में मदद करता है और ऊर्जा बढ़ाता है, जिससे यह सुबह या शाम के नाश्ते के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन जाता है।
सत्तू चीला: सत्तू को सूजी, पानी, कटी हुई प्याज़ और अदरक के साथ अच्छी तरह फेंटकर एक स्वादिष्ट घोल तैयार करें। इसे एक गर्म तवे पर डालकर स्वादिष्ट, नमकीन पैनकेक बनाएं। प्रोटीन से भरपूर ये पैनकेक कुछ ही मिनटों में पक जाते हैं और ताज़ी हरी चटनी के साथ परोसे जाने पर इनका स्वाद लाजवाब लगता है।
सत्तू एनर्जी बॉल्स: सत्तू को पिघले हुए घी, पिसे हुए गुड़ और एक चुटकी इलायची पाउडर के साथ मिलाएं। इस मिश्रण को छोटे, एक-बाइट के आकार के गोलों में बनाएं, जो वीकेंड पर पहले से खाना तैयार करके रखने के लिए एकदम सही हैं। सुबह नाश्ते में इन पोषक तत्वों से भरपूर दो गोलों को खाएं यह चलते-फिरते नाश्ता करने का एक आसान, मीठा और पौष्टिक तरीका है।
सत्तू शेक: सत्तू, एक पका हुआ केला, दूध और एक चुटकी इलायची पाउडर को ब्लेंड करें। यह क्लासिक सत्तू शेक एक स्वादिष्ट स्वाद देता है और साथ ही प्रोटीन की अच्छी-खासी मात्रा भी देता है, जिससे आप अपने अगले भोजन तक बिना कुछ और खाए-पिए पेट भरा हुआ महसूस करते हैं।
सत्तू टोस्ट: सत्तू को नींबू के रस, कटी हुई हरी धनिया की पत्तियों, और प्याज़ व अदरक के पेस्ट के साथ मिलाकर एक मिश्रण तैयार करें। इसे टोस्ट किए हुए साबुत अनाज वाले ब्रेड पर अच्छी तरह फैलाएं और ऊपर से थोड़ी सी काली मिर्च छिड़कें। यह एक कुरकुरा और संतोषजनक ओपन-फेस्ड नाश्ता है जो कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का एकदम सही संतुलन प्रदान करता है
ई कॉमर्स कम्पनियों पर राम भरोसे है ग्राहकों की डेटा सुरक्षा
सुषमा त्रिपाठी
कोलकाता । क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने कोई सामान मंगाया ही नहीं मगर किसी ने आपके साथ ऑर्डर शेयर कर सामान मंगवाया। आपको वह ऑर्डर दिख रहा है और ई कॉमर्स पोर्टल लगातार आपको फोन कर रहा है। आप कह रहे हैं कि आपने सामान मंगाया नहीं और वह आप पर दबाव डाले जा रहा है कि आप खुद ही ऑर्डर कैंसिल कर दें। पहली बात तो यह है कि जब आपने सामान मंगाया ही नहीं तो आप पर ऑर्डर कैंसिल करने का दबाव बनाना ही बेतुका है। दूसरी बात दबाव डालकर ऑर्डर कैंसिल करना सीधे -सीधे उपभोक्ता अधिकारों का हनन है। यह डेटा सुरक्षा से जुड़ा मामला है और सीधे साइबर अपराधियों को न्योता देता है। कम्पनियों की वेबसाइट पर खराब सामान मिलना तो आम बात है मगर इस समस्या पर बात कम ही होती है।
अक्सर हम अमेजन, बिग बास्केट, फ्लिपकार्ट, मीशो जैसी कम्पनियों से खरीददारी करते हैं मगर कोई भी कम्पनी डेटा सुरक्षा का आश्वासन नहीं देती। ऐसा ही ताजा अनुभव फ्लिपकार्ट के साथ हुआ और यह एक तरह से मानसिक प्रताड़ना और असुरक्षा का मामला है। सवाल यह है कि कोई भी ई कॉमर्स कम्पनी किसी भी तरीके से किसी भी ग्राहक का नम्बर किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ साझा कैसे कर सकती है। ग्राहक की जानकारी और अनुमति के बगैर कोई अनजान और अपरिचित व्यक्ति किसी ई कॉमर्स कम्पनी की आधिकारिक वेबसाइट पर कैसे किसी और की प्रोफाइल में झांक सकता है? जो ई कॉमर्स कम्पनियां हमारे जरिए लाखों – करोड़ों का कारोबार करके अपनी झोली भर रही है, क्या हमारे डेटा को सुरक्षित करना उनकी जिम्मेदारी नहीं है। साइबर अपराधियों और हैकरों पर बहुत बात होती है मगर इन कम्पनियों पर लगाम कौन कसेगा जो कि साइबर अपराधों का बड़ा माध्यम बनती जा रही हैं। क्लाउडएसईके की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है, और अनुमान है कि 2025 तक इससे होने वाला नुकसान चौंका देने वाला ₹20,000 करोड़ तक पहुंच चुका है। इसका मुख्य कारण क्या है? ब्रांड का दुरुपयोग और फर्जी डोमेन, जिनसे अकेले व्यवसायों और उपभोक्ताओं को ₹9,000 करोड़ का नुकसान होने की आशंका हुआ। सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार का सम्मान करता है तो सरकार इसके उल्लंघन पर सख्त क्यों नहीं है ? जरूरी है कि सभी ई कॉमर्स कम्पनियों के लिए ग्राहकों की डेटा सुरक्षा के लिए वेबसाइट को जिम्मेदार ठहराया जाए और ग्राहकों को होने वाली असुविधाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। कहने को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 सोशल मीडिया मध्यस्थों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मार्केटप्लेस की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। यह एआई सहित प्रौद्योगिकियों के उभरते दुरुपयोग को संबोधित करता है और प्लेटफार्मों से गैर-कानूनी सामग्री को हटाने का आदेश देता है। सवाल फिर भी यही है कि आम आदमी इन पेचीदा स्थितियों से कैसे निपटे, खासकर तब जब आपकी आधी से अधिक आबादी साइबर अपराधों और तकनीक को समझने में सक्षम ही नहीं है। 86 प्रतिशत से अधिक घर अब इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। सरकार कहती है कि भारत में साइबर सुरक्षा की घटनाएं वर्ष 2022 में 10.29 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 22.68 लाख हो गई मगर लगाम तो कहीं और लगाने की जरूरत है।
श्रीरामनवमी पर विशेष : श्रीरामनवमी पर प्रभु राम को लगाएं इन 5 चीजों का भोग
पंजीरी – पंजीरी एक साधारण और जल्दी बनने वाला भोग है। इसे बनाना भी काफी आसान होता है। इसके लिए आपको घी में गेहूं के आटे को हल्का रंग चेंज होने तक भून लें। अब इसमें पिसी हुई चीनी मिलाएं। इसके साथ ही गरी का बुरादा, कटे हुए ड्राई फ्रूट्स और इलायची का पाउडर ऐड करें। प्रसाद के लिए ये सबसे अच्छा मानी जाती है।
साबूदाना खीर – राम नवमी पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के लिए भोग में बनाए साबूदाने की खीर। जिन लोगों ने व्रत रखा है वो लोग इसका सेवन कर सकते हैं। इसे बनाने के लिए मीडियम साइज के साबूदाने को दो घंटे के लिए भिगो दें। फिर इसे दूध में पका लें। पूरी तरह से यह गाढ़ा होने लगे, तो इसमें चीनी, इलायची पाउडर और घी में रोस्ट किए हुए ड्राई फ्रूट्स डालें। यदि आप थोड़ा रिच फ्लेवर देना चाहती हैं तो खोया भी डाल सकती हैं।
पंचामृत – पूजा-पाठ हो या फिर व्रत में पंचामृत जरुर बनाया जाता है। हिंदू धर्म में पंचामृत जरुर बनाया जाता है। इसको बनाने के लिए आपको दूध, दही, घी, शहद, चीनी, ड्राई फ्रूट्स और तुलसी के पत्तों को एक बड़े बर्तन मिला लें। इसको आप प्रभु राम को भोग लगा सकते हैं और व्रत में खाया जा सकता है।
नारियल लड्डू – नारियल से बने लड्डू भी प्रसाद के लिए बहुत अच्छे माने जाते हैं। इसे बनाना भी बेहद आसान होता है। इसको बनाने के लिए सबसे पहले नारियल का बुरादा को थोड़े से घी में भून लें। इसको अब दूध में तब तक पकाएं जब तक ये बाइंड न होने लगे। अब इसमें कंडेस्ड मिल्क या चीनी मिलाएं। अब इसके छोटे-छोटे लड्डू बना लें।
सूजी की खीर – भोग के लिए आप सूजी की खीर बना सकते हैं। इसको बनाना बेहद आसान है। सबसे पहले सूजी को घी में हल्का भून लें। अब इसमें दूध डालकर पका लें। इसके बाद चीनी और इलायची डालें। ये खीर जल्दी बनती है और सभी को पसंद भी काफी आएगी।




