Friday, November 6, 2026
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सुंदरबन से कृष्णनगर तक, मां की प्रतिमा कंधे पर उठाने आते हैं ये मजदूर

दीपंकर एडबार

कृष्णनगर (नदिया) । साल भर कोई मछली पकड़कर परिवार चलाता है, कोई खेतों में काम करता है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी करता है। लेकिन दुर्गापूजा आते ही इनकी रोजमर्रा की जिंदगी कुछ समय के लिए बदल जाती है। सुंदरबन के दूरदराज इलाकों से हर साल मजदूरों का एक दल कृष्णनगर पहुंचता है। इनका काम है दुर्गा प्रतिमाओं को कंधे पर उठाकर पूजा मंडप तक पहुंचाना और विसर्जन के समय उन्हें घाट तक ले जाना।

पूजा से पहले ही इन लोगों की कृष्णनगर में आमद शुरू हो जाती है। कुम्हारों की कार्यशालाओं से प्रतिमाओं को वाहनों पर चढ़ाना, उन्हें रस्सियों से सुरक्षित बांधना और मंडप तक पहुंचाना-इन सभी कामों में उनकी जरूरत पड़ती है। पूजा खत्म होने के बाद विसर्जन के दौरान भी प्रतिमाओं को उठाने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर रहती है।

सुंदरबन से कृष्णनगर पहुंचना भी आसान नहीं है। पहले नाव या लॉन्च से नदी पार करनी पड़ती है। इसके बाद ट्रेन या बस से लंबा सफर तय कर वे कृष्णनगर पहुंचते हैं। परिवार से दूर रहकर कई सप्ताह तक यहीं रहना पड़ता है। हालांकि, पूजा के इन महीनों की कमाई उनके परिवारों के लिए काफी अहम होती है।

लेकिन इनके लिए यह काम केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। देवी की प्रतिमा को अपने कंधे पर उठाने के साथ उनकी आस्था भी जुड़ी हुई है। प्रतिमा उठाने वाले बिमल सरोदा पिछले 10-12 वर्षों से कृष्णनगर आ रहे हैं।

उन्होंने कहा, “पिछले 10-12 साल से कृष्णनगर आ रहा हूं। पूजा के समय अच्छा काम मिल जाता है, इसलिए हर साल आता हूं। लेकिन मां की प्रतिमा को अपने कंधे पर उठाना अलग ही खुशी देता है। कई पूजा समितियां भी हमारी मदद करती हैं।” श्यामल नस्कर भी हर साल पूजा के दौरान करीब दो महीने कृष्णनगर में रहते हैं। उन्होंने कहा, “प्रतिमा उठाना मेहनत का काम है, लेकिन हमें खुशी मिलती है। काली पूजा और जगद्धात्री पूजा के समय भी हम यहां आएंगे। कृष्णनगर की जगद्धात्री पूजा के विसर्जन में मां की प्रतिमा को कंधे पर उठाना हमारे लिए गर्व की बात है।”

दुर्गापूजा के बाद ये मजदूर फिर सुंदरबन लौट जाते हैं और अपने पुराने काम में जुट जाते हैं। लेकिन अगले साल पूजा का मौसम आते ही उनकी राह फिर कृष्णनगर की ओर मुड़ती है। उनके लिए यह सफर सिर्फ कुछ महीनों की अतिरिक्त कमाई का नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा एक सालाना सिलसिला भी है।

कालिगंज की ‘बाबू बाड़ी’ में 200 साल पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा कायम

दीपंकर एडबार

कालिगंज (नदिया) । जमींदारी व्यवस्था भले ही इतिहास बन चुकी हो, लेकिन कालिगंज की रॉय चौधरी परिवार की हवेली में दो सौ साल से अधिक पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा आज भी जारी है। साल के अधिकांश समय शांत रहने वाली यह पुरानी हवेली दुर्गापूजा के दौरान फिर से गुलजार हो उठती है। स्थानीय लोग इसे ‘बाबू बाड़ी’ के नाम से जानते हैं।

परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस वंश के मूल पुरुष पूर्णचंद्र गुप्तशर्मा ढाका के गोयेशपुर से आकर यहां बसे थे। उनके पुत्र हराधन गुप्तशर्मा के समय परिवार का जमींदारी से जुड़ाव शुरू हुआ। बाद में ब्रिटिश शासन की ओर से ‘रॉय चौधरी’ उपाधि मिलने के बाद वह हराधन रॉय चौधरी के नाम से जाने गए। परिवार का दावा है कि घर में दुर्गापूजा हराधन रॉय चौधरी के समय से पहले भी होती थी। हालांकि, उनके दौर में पूजा में जमींदारी परिवार की भव्यता जुड़ी। इसी समय से 17 फुट ऊंचे पारंपरिक एकचाला ढांचे पर दुर्गा प्रतिमा बनाने की परंपरा शुरू हुई। मूल ढांचा आज भी मौजूद है। हालांकि, बाद में प्रतिमा निर्माण की सुविधा के लिए इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। प्रतिमा निर्माण का काम रथयात्रा के दिन से शुरू होता है।

इस पूजा की एक खास पहचान प्रतिमा की पारंपरिक रंग-सज्जा भी है। देवी का रंग पीला और महिषासुर का रंग हरा रखा जाता है। पूजा की तैयारियों और अनुष्ठानों में परिवार की महिलाएं भी पुरुषों के साथ सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं।

पंचमी को बेलतला में घट स्थापना के साथ पूजा की औपचारिक शुरुआत होती है। षष्ठी की पूजा ठाकुरघर में होती है और शाम को बेलतला में अधिवास का आयोजन किया जाता है। सप्तमी के दिन परिवार की गृहदेवी भुवनेश्वरी को घर से दुर्गामंडप में लाया जाता है। इसके बाद प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा होती है। भुवनेश्वरी तीन दिनों तक मंडप में विराजमान रहती हैं।

गृहदेवी भुवनेश्वरी से जुड़ा भी एक पुराना इतिहास है। परिवार के सदस्यों के मुताबिक, चादरा के केदार राय की गृहदेवी भुवनेश्वरी कभी इस परिवार में भी पूजित थीं। वर्ष 1994 में उस प्रतिमा के चोरी हो जाने के बाद नई भुवनेश्वरी प्रतिमा की स्थापना की गई।

अष्टमी को परंपरा के अनुसार कुमारी पूजा होती है। नवमी और दशमी के अनुष्ठानों में भी पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। देवी को शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है। हालांकि, दशमी का पांता भात इस पूजा की सबसे अलग परंपराओं में शामिल है। नवमी की रात मिट्टी के बर्तन में चावल पकाकर पानी में रखा जाता है। अगले दिन उसी चावल का पांता भात बनाकर देवी को भोग लगाया जाता है। बाद में केला, दही, कसुंदी समेत अन्य सामग्री के साथ प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है।

समय के साथ पूजा की कुछ पुरानी प्रथाओं में बदलाव भी आया है। परिवार के सदस्य दीपक सेन शर्मा के अनुसार, पहले यहां पशुबलि की परंपरा थी। सप्तमी को सात, अष्टमी को आठ, संधि पूजा में एक और नवमी को नौ पशुओं की बलि दी जाती थी। बाद में परिवार के सदस्यों ने आपसी चर्चा के बाद इस प्रथा को समाप्त कर दिया। आज न जमींदारी व्यवस्था है और न ही हवेली में पहले जैसी चहल-पहल। इसके बावजूद दुर्गापूजा के दौरान परिवार के सदस्य एक साथ जुटते हैं और पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। बदलते समय के बीच 17 फुट का एकचाला ढांचा, गृहदेवी भुवनेश्वरी और दशमी के पांता भात जैसी परंपराएं कालिगंज की ‘बाबू बाड़ी’ की दुर्गापूजा को क्षेत्र के सामाजिक और पारिवारिक इतिहास से जोड़कर रखती हैं।

दुर्गोत्सव 2026 : हाजरा पार्क की दुर्गापूजा में दिखेगी बंगाल की कलात्मकता

कोलकाता । जैसे-जैसे देवी दुर्गा की आराधना और उनके स्वागत का दिन नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे शहर के विभिन्न दुर्गापूजा कमेटी के सदस्य मंडप सज्जा को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इसी कड़ी में हाजरा पार्क दुर्गोत्सव कमेटी के सदस्य अपने 84वें वर्ष में “चिरायत” खास थीम के साथ मंडप की सजावट में जुटे हैं। यह थीम दर्शकों को बंगाल की कलात्मक और सांस्कृतिक जड़ों की गहराई तक ले जाएगी। “चिरायत – द रूट्स ऑफ़ बंगाल: रूटेड इन द पास्ट, इनफिनिट इन कॉन्शियसनेस” (बंगाल की जड़ें: अतीत से जुड़ी, चेतना में अनंत) को पेश किया जा रहा है। इस थीम उन सदाबहार परंपराओं, कारीगरी और लोककला विरासत को दिल से दी गई श्रद्धांजलि है, जिन्होंने पीढ़ियों से बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया है। “चिरायत” थीम बंगाल के अतीत और उसकी बदलती सांस्कृतिक चेतना के बीच के अटूट रिश्ते को दिखाती है। यह एक सरल लेकिन गहरे विचार को सामने लाती है – भले ही समय बदलता है और सभ्यताएं विकसित होती हैं, सच्ची कला की भाषा हमेशा अमर रहती है। यह कॉन्सेप्ट उन परंपराओं को हमेशा याद दिलाता  है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और बंगाल के त्योहारों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और रोजमर्रा की जिंदगी में आज भी दिखाई देती हैं।

यह पंडाल दर्शकों को बंगाल की लोक और पारंपरिक कला शैलियों की जीवंत दुनिया की सैर कराएगा। हाथ से बनी लकड़ी की गुड़िया, बारीक डोकरा मेटल क्राफ्ट, टेराकोटा और कई अन्य स्थानीय कलात्मक परंपराएं मिलकर एक शानदार विजुअल कहानी बताएगी, जो बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत दृश्य होगा।

इस मौके पर हाजरा पार्क दुर्गोत्सव कमेटी के संयुक्त सचिव सायन देब चटर्जी ने कहा, ‘चिरायत’ के जरिए हम लोगों को बंगाल की जड़ों — यानी मिट्टी, परंपराओं और सबसे जरूरी, उन कारीगरों के हाथों तक वापस ले जाना चाहते थे, जिन्होंने पीढ़ियों से हमारी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखा है। हमारी लोक कलाएँ सिर्फ सुंदर वस्तुएं नहीं हैं। उनमें कहानियाँ, यादें, मान्यताएँ और बंगाल की पहचान बसी है। तेजी से बदलती दुनिया में हमें लगा कि इन परंपराओं के पीछे छिपी मानवीय भावना का जीवंत उदाहरण पेश करना और खुद को यह याद दिलाना जरूरी है कि हमारी विरासत हमारी ऐसी पहचान है, जिसे हमें हर पल महसूस करना चाहिए, जिसकी कद्र करनी चाहिए और जिसे हमेशा आगे बढ़ाना चाहिए।

इस साल की प्रस्तुति के कलात्मक विजन को मशहूर कलाकार और मूर्ति-निर्माता बिमान साहा ने साकार किया है। उन्होंने बंगाल की पारंपरिक कला-शैली की गहरी समझ के साथ पूजा मंडप और मूर्ति, दोनों को तैयार किया है। उनके काम का मकसद एक ऐसा अनुभव देना है, जिसमें आने वाले लोग बंगाल की प्राचीन परंपराओं, बनावट और दृश्य-परंपराओं से फिर से जुड़ सकें और साथ ही उन्हें एक आधुनिक कलात्मक नजरिए से महसूस कर सकें। इस कलात्मक परिवेश में देवी दुर्गा को रचनात्मकता, कारीगरी, परंपरा और मानवीय श्रम की गरिमा के प्रतीक के रूप में देखा गया है। उनकी उपस्थिति दुर्गा पूजा के आध्यात्मिक सार को बंगाल की कलात्मक आत्मा से जोड़ती है, साथ ही युवा पीढ़ी को उन सांस्कृतिक परंपराओं को पहचानने, उनका सम्मान करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है जो उन्हें विरासत में मिली हैं।

हाजरा पार्क दुर्गोत्सव कमेटी की पूजा का 84वाँ संस्करण बंगाल की लोक कला और उसके कारीगर समुदायों को अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के केंद्र में रखकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। पिछले संस्करणों में अभिनव इंस्टॉलेशन और थीम-आधारित प्रस्तुतियों के जरिए कई तरह के विषयों को पेश किया गया है।

चिरायत – द रूट्स ऑफ बंगाल: रूटेड इन द पास्ट, इनफिनिट इन कॉन्शियसनेस (अतीत से जुड़ी जड़ें, चेतना में अनंत) के साथ, हाजरा पार्क दुर्गोत्सव आने वाले लोगों को दुर्गा पूजा का अनुभव न केवल आस्था के उत्सव के रूप में, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक यादों के सफ़र के तौर पर करने के लिए आमंत्रित करता है – जिसमें उसकी मिट्टी, उसके कारीगरों, उसकी परंपराओं और उस कालजयी कलात्मक भावना का जश्न मनाया जाता है जो आज भी जीवित है।

अर्चना के रचनाकारों ने स्वरचित कविताएं सुनाईं

कोलकाता । अर्चना संस्था द्वारा स्वरचित कविताएं, गीत और विषय परक विभिन्न प्रस्तुतियां सुनाई गईं जो रचनाकारों की सृजनात्मकता को दर्शाती है। हिंदी भाषा दिवस पर हुई इस काव्य गोष्ठी में राजस्थानी भाषा में भी रचना सुनने को मिली जो भाषा और देशभक्ति को समर्पित है।
उषा श्राफ ने आनलाइन सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया और गोष्ठी का संयोजन और संचालक इंदू चांडक ने किया।कवि चिराग चतुर्वेदी (अयोध्या), डॉ वसुंधरा मिश्र (कोलकाता),भारती मेहता, हिम्मत चौरड़िया (अहमदाबाद),सुशीला चनानी, मृदुला कोठारी,हिम्मत चौरड़िया , संगीता चौधरी कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाई।
हिम्मत चौरड़िया प्रज्ञा ने हिंदी भाषा के लिए अपने विचार व्यक्त करते हुए बावन वर्ण विधा-गीत में इन पंक्तियों के द्वारा अपनी रचना की प्रस्तुति दी।
स्वर व्यंजन का ज्ञान सीख लें, आओ सारे।/तेरह स्वर हैं बड़े निराले, लगते प्यारे।। और गीतिका छंद की बानगी सुनाई।हिन्दी भाषा की यह पुकार है।/करना बढ़-चढ़ कर नित प्रचार है। इंदू चांडक ने श्राद्धपक्ष की महिमा बताते हुए अपनी रचना सुनाई।
पूर्वजों की पुण्य स्मृति,मन में दीप जलाती है।
आलोकित कर हृदय हमारा, जीने की राह दिखाती है।।
और गीत भी सुनाया-कहाँ चली,कहाँ चली/ ये जिन्दगी कहाँ चली।जो जीवन के दर्शन को व्यक्त करने वाली थी।
डॉ वसुंधरा मिश्र ने लम्हे शीर्षक से अपनी रचना कुछ इस तरह अपने अंदाज में सुनाई जो श्रोताओं के हृदय को छू गई,/ उनकी पंक्तियां –काश उन लम्हों को पकड़ पाती जिसने बनाया यह जीवन रंगीन यह इंद्रधनुषी लहरें समंदर की भोलापन इन श्वेत शिखरों विहरते स्वच्छंद उन्मुक्त पक्षी को… बांध लेती हूँ कसकर कहीं कुछ खो ना जाए /रंग बदरंग ना हो जाए/कुछ खो ना जाए। डॉ मिश्र की पहचान शीर्षक की कविता में वे कहती हैं –अनजानों के बीच पहचान ढूंढने आई हूँ सदियों से कोई निशान ढूंढने आई हूँ /जाने कितने नगर छान लिए /सड़कों, गलियों के पथ छोड़ें/ फिर भी, क्यों लगता यह शहर अंजाना -सा।
भारती मेहता ने अहमदाबाद से अपनी रचना सुनाई ।जो जीवन की सच्चाई को दर्शाती है -ज़िन्दगी चरवाहा बन
एक अदृश्य लाठी द्वारा हमें हाँक रही / चल इधर..चलो उधर !* कुछ समेट लिया , कुछ बिखेर दिया/ कुछ उलीच लिया, कुछ अर्घ्य दिया/ गुणीजनों के गुणों को अंजुरी में भर शिक्षा का अर्घ्य दिया ।
सन् 1952 में स्थापित महानगर की सबसे पुरानी संस्थानों में अर्चना ने सन् 1983 से कवि बंधुओं को एक सशक्त मंच प्रदान कर रखा है।प्रत्येक महीने में एक काव्य गोष्ठी आयोजित होती है जिसमें कवि कवित्रियां सम्मिलित हो स्वरचित कविताओं का पाठ करते हैं और सभी एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।”कुछ की तो प्रवहमान, मधु वर्षिणी है
कुछ का आकाश अपना अपना है /कुछ कल उड़ेंगे कुछ उड़ रहे आज /यों उनकी उड़ान अपनी अपनी है ”
लेखक कवि डॉ वासुदेव पोद्दार , साहित्य महोपाध्याय कवि नथमल केडिया, महाकवि गुलाब खंडेलवाल,कवि और साहित्यकार श्याम सुंदर बगड़िया जैसे महान साहित्यकार और कवि इस संस्था के पुरोधा रहे हैं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि स्वरचित कविताएं इस संस्था का वैशिष्ट्य है जो व्यक्ति की कल्पना शक्ति और अनुभूति को हवा देती है।
उषा श्राफ ने बारिश के मौसम पर आधारित अपनी अभिव्यक्ति रखी।पावस की नन्ही बूंदों संग/संदेश सुहाना लाया /जीवन कभी सृजन और /कभी विनाश की कहानी/कह ही जाता हैं /यही सुंदरता है। सुशीला चनानी ने विषय पर दो रचनाएं सुनाई,दिल नहीं है खिलौना / बुद्धि की गठरी बांध ओ मूढ मति।
कवयित्री संगीता चौधरी ने माहिया छंद में अपनी छोटी छोटी रचनाएं १.कहती मेरी दादी /लाखों शीश कटे /तब पाई आजादी। २.कान्हा तुम आ जाओ /बिलख रही कलियां /फिर चीर बढ़ा जाओ।३.दो आंखें पथराई /सुत धन बांँट रहे /क्या लाज नहीं आई। /४.बिन बात फिसलती है /जीभ कतरनी सी /रिश्तों पर चलती है/रचना_मेरी अभिव्यक्ति में हिंदी, /मुझे सरलता देती है।/भय,चिंता और विषाद को,/सहज ही हर लेती है।
मृदुला कोठारी ने हिंदी,राजस्थानी भाषा में कविता और गीत सुना कर अपनी भाषा के महत्व को समझाया। राष्ट्रभाषा हिंदी को करते हैं नमस्कार /वह नहीं है उपेक्षित नहीं है लाचार/और गीत काला धोला बादल आया म्हारे छोटे गांव में /पूनम बावली थिरक रैइ है/पायल बांध्या पांव में ,सुनाया।
चिराग चतुर्वेदी ने आरक्षण के बहुत सारे दोहों द्वारा अपनी बात रखी और आने वाली पीढ़ी को सीख दी।धन्यवाद दिया मृदुला कोठारी ने।

स्त्री अध्ययन केंद्र द्वारा सेवा संकल्प अभियान, 2026

मिदनापुर । नवजागरण के अग्रदूत ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम पर स्थापित विद्यासागर विश्वविद्यालय में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के प्रति समर्पित सेवा के पच्चीस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में चल रहे सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत स्त्री अध्ययन केंद्र ने विश्वविद्यालय के सिस्टर निवेदिता सभागार में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को लक्षित करते हुए लैंगिक समानता पर “महिलाओं की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए अनुकरणीय संकल्प: विद्यासागर की समर्पित सामाजिक सेवा” विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्घाटन माननीय कुलपति प्रोफेसर दीपक कुमार कर ने किया। उन्होंने ऐसे शैक्षणिक वातावरण के महत्त्व पर बल दिया, जहाँ छात्राएँ लैंगिक समानता के अपने मौलिक अधिकार का उपयोग कर सकें तथा स्वयं को ईश्वरचंद्र विद्यासागर के दृष्टिकोण और मिशन से जोड़ सकें।। कला एवं वाणिज्य में स्नातकोत्तर अध्ययन के संकाय परिषद के संकायाध्यक्ष, प्रो. अरिंदम गुप्ता तथा कुलसचिव, डॉ. जयंत किशोर नंदी ने उद्घाटन सत्र की शोभा बढ़ाई। सम्मानित विषय विशेषज्ञ विश्वविद्यालय के पाँच साहित्य एवं भाषा विभाग के संकाय सदस्य थे—प्रोफेसर मोनांजली बंद्योपाध्याय, बांग्ला विभाग; प्रोफेसर इंद्रनील आचार्य, अंग्रेजी साहित्य, भाषा एवं सांस्कृतिक अध्ययन विभाग; डॉ. संजय जायसवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग; डॉ. दुली हेम्ब्रम, एसोसिएट प्रोफेसर, संताली विभाग तथा  श्वेता बसाक चक्रवर्ती, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग। उन्होंने अपने व्याख्यानों के माध्यम से विद्यासागर के जीवन से जुड़े लैंगिक समानता के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया तथा उन्हें समकालीन जीवन और सेवा संकल्प अभियान से जोड़ा। कार्यक्रम का संयोजन स्त्री अध्ययन केंद्र की समन्वयक प्रो जाॅली दास ने किया।

अब पहले ही पता चल जाएगा कहां आ रही बाढ़

– आईआईटी मद्रास के शोध से बढ़ी उम्मीद

नयी  दिल्ली/चेन्नई । कहने को देश की राजधानी दिल्ली सभी संसाधनों से भरपूर है लेकिन जब तेज बारिश होती है तब दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात पैदा होना जैसे आम बात है। मुंबई में कुछ घंटों की तेज बारिश के बाद सड़कों का दरिया बन जाना, चेन्नई में मूसलधार बारिश के साथ जलाशयों और नदियों का दबाव बढ़ना, बेंगलुरु में शहरी जलभराव से जनजीवन प्रभावित होना, हैदराबाद और कोलकाता में भारी वर्षा के बाद निचले इलाकों में पानी भरना, जैसी देश के तेजी से बढ़ते महानगरों के सामने एक जैसी चुनौती उभर रही है। दूसरी ओर इसी चुनौती के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के नेतृत्व में हुआ एक अध्ययन (शोध) शहरी बाढ़ के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाने की दिशा में वैज्ञानिक रास्ता सामने रखता है।

यह शोध आईआईटी मद्रास, जर्मनी के जीएफजेड हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर जियोसाइंसेज, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जेएएक्सए) और काठमांडू विश्वविद्यालय के बीच एक बहुविषयक सहयोग के माध्यम से किया गया, जिसमें वायुमंडलीय विज्ञान, जल विज्ञान, हाइड्रोलिक मॉडलिंग और पृथ्वी अवलोकन में विशेषज्ञता को एक साथ लाया गया।

दरअसल, इस अध्ययन ने वायुमंडल में बनने वाली बारिश से लेकर शहर में पानी पहुंचने और जलाशयों पर पड़ने वाले दबाव तक की पूरी प्रक्रिया को एक साथ समझने का प्रयास किया है। इसमें वायुमंडलीय मॉडलिंग, जल विज्ञान, जल संचयन सिमुलेशन और उपग्रह आधारित पृथ्वी अवलोकन को जोड़ा गया है। शोध का जोर विशेष रूप से शहरी बेसिन स्तर पर अत्यधिक वर्षा का अधिक सटीक पूर्वानुमान तैयार करने पर है।इसके निष्कर्ष नेचुरल हैज़र्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं, जोकि एक पीयर-रिव्यूड, ओपन-एक्सेस अंतरराष्ट्रीय जर्नल है। इस शोध पत्र के सह-लेखक डॉ. एन. निथिला देवी, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास और जीएफजेड हेल्महोल्ट्ज़ सेंटर फॉर जियोसाइंसेज, जर्मनी के अनुभाग 4.4: जल विज्ञान विभाग, डॉ. राकेश तेजा कोंडुरु, पृथ्वी अवलोकन अनुसंधान केंद्र, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जेएएक्सए) के डॉ. कुंदन लाल श्रेष्ठ, काठमांडू विश्वविद्यालय, नेपाल के डॉ. कुंदन लाल श्रेष्ठ और ऑस्कर पॉल, प्रोफेसर सौमेंद्र नाथ कुइरी और प्रोफेसर चंदन सारंगी (संबंधित लेखक) हैं, जो आईआईटी मद्रास से हैं।

इस शोध के महत्व को समझाते हुए, आईआईटी मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. चंदन सारंगी, जो इस शोध के सह-लेखक भी हैं, ने कहा, “शहरी बाढ़ पूर्वानुमान को अक्सर मुख्य रूप से वर्षा से अपवाह की समस्या के रूप में देखा जाता है। शहरी बाढ़ पूर्वानुमान में समस्या यह है कि वर्षा का स्थानिक और समयिक वितरण हमारे मौसम मॉडलों द्वारा ठीक से नहीं दर्शाया जाता है। वर्षा से पहले और उसके दौरान वायुमंडल में होने वाली घटनाएं वर्षा के स्थानिक पैटर्न को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं। एरोसोल-बादल अंतःक्रियाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाकर, हम शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की स्थानिक और कालिक विशेषताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और परिणामस्वरूप बाढ़ के जलमग्न होने के सिमुलेशन में सुधार कर सकते हैं।” वहीं, आईआईटी मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एस.एन. कुइरी का कहना है, “चेन्नई जैसे महानगर के लिए, वर्षा पूर्वानुमान को जल संसाधन प्रबंधन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अत्यधिक वर्षा का समय और स्थानिक वितरण सीधे तौर पर अपवाह, जलाशयों में जल प्रवाह और बाढ़ पूर्वानुमान को प्रभावित करते हैं। एक संयुक्त वायुमंडल-जल विज्ञान-जलीय ढांचा इन परस्पर संबंधित निर्णयों के लिए अधिक भौतिक रूप से सूचित आधार प्रदान कर सकता है।” इस अध्ययन में मौसम अनुसंधान और पूर्वानुमान (डब्ल्यूआरएफ) मॉडल का उपयोग करके 2015 की चेन्नई घटना से संबंधित वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का विभिन्न एरोसोल स्थितियों के तहत अनुकरण किया गया। परिणामी वर्षा क्षेत्रों को हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग के लिए एचईसी-एचएमएस और अड्यार बेसिन पर हाइड्रोलिक और बाढ़ मॉडलिंग के लिए एचईसी-आरएएस के साथ जोड़ा गया।परिणामों से पता चला कि एरोसोल को स्पष्ट रूप से दर्शाने से अड्यार बेसिन पर अनुमानित वर्षा में नियंत्रण सिमुलेशन की तुलना में लगभग 22 फिसद सुधार हुआ। यह सुधार मॉडलिंग श्रृंखला में भी जारी रहा, जिसके परिणामस्वरूप बाढ़ के अनुमानित फैलाव की सटीकता में नियंत्रण मामले की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत सुधार हुआ।

बारिश का अनुमान ही क्यों बन सकता है बाढ़ प्रबंधन की कुंजी

उल्लेखनीय है कि चेन्नई जैसे तेजी से शहरीकरण वाले तटीय शहर के लिए मानसून के दौरान पर्याप्त जलाशय भंडारण बनाए रखना बेहद जटिल संतुलन है। जलाशयों में पानी बहुत अधिक सुरक्षित रखा जाए तो अत्यधिक वर्षा की स्थिति में अतिरिक्त पानी छोड़ने का दबाव बढ़ता है। वहीं अपेक्षाकृत कम भंडारण रखा जाए और बाद में पर्याप्त बारिश हो जाए तो उपलब्ध जल का बेहतर उपयोग प्रभावित होता है।ऐसे में प्रशासन के लिए यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है कि अगले कुछ घंटों या दिनों में किसी विशेष जलग्रहण क्षेत्र में कितनी बारिश होने की संभावना है। सामान्य शहर-स्तरीय मौसम पूर्वानुमान की तुलना में शहरी बेसिन स्तर का अधिक सूक्ष्म पूर्वानुमान जलाशय प्रबंधन और बाढ़ जोखिम आकलन को अधिक उपयोगी बना सकता है।

वायुमंडल से शहर तक पूरी कड़ी जोड़ने का प्रयास

यहाँ आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में किए गए सहयोगात्मक इस अध्ययन में वातावरण, वर्षा, जल विज्ञान और शहरी जल प्रबंधन को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने के बजाय उनके बीच के संबंध को समझने का प्रयास किया गया है। इसमें वायुमंडलीय मॉडलिंग के माध्यम से बारिश पैदा करने वाली परिस्थितियों का अध्ययन किया गया। इसके बाद जल विज्ञान और जल संचयन से जुड़े सिमुलेशन के जरिए यह समझने का प्रयास हुआ कि वर्षा का पानी जलग्रहण क्षेत्रों और जलाशयों में किस प्रकार व्यवहार करता है। उपग्रह आधारित पृथ्वी अवलोकन ने वास्तविक परिस्थितियों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने में सहयोग किया।इस तरह अध्ययन का उद्देश्य बारिश होगी या नहीं के अलावा यह भी समझना रहा कि बारिश के बाद पानी कहां जाएगा और उसका शहरी बाढ़ पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसे भी समझना है।

2015 की चेन्नई बाढ़ बनी महत्वपूर्ण कसौटी

शोध में वर्ष 2015 में चेन्नई में आई विनाशकारी बाढ़ की घटना को महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में लिया गया। उस दौरान अत्यधिक वर्षा ने शहर की जल व्यवस्था और बाढ़ प्रबंधन को गंभीर चुनौती दी थी। शोधकर्ताओं ने यह जांचने का प्रयास किया कि अधिक विस्तृत वायुमंडलीय मॉडलिंग और जल विज्ञान संबंधी सिमुलेशन से ऐसी अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को समझने में कितना सुधार लाया जा सकता है। इससे यह संकेत मिला कि वायुमंडलीय प्रक्रियाओं को जल विज्ञान मॉडल के साथ जोड़ना शहरी बाढ़ के पूर्वानुमान को अधिक व्यापक बनाने में उपयोगी हो सकता है।हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह ढांचा अभी परिचालन बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली नहीं है। यानी इसे तत्काल इस्तेमाल होने वाली बाढ़ चेतावनी व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके लिए अलग-अलग अत्यधिक वर्षा की घटनाओं पर मॉडल का परीक्षण, सत्यापन और लगातार सुधार आवश्यक होगा।

एरोसोल से शहरी उत्सर्जन तक पर नजर

भविष्य के शोध में वायुमंडलीय एरोसोल, क्लाउड कंडेन्सेशन न्यूक्लियाई यानी सीसीएन तथा शहरी उत्सर्जन से जुड़े उच्च-रिजॉल्यूशन आंकड़ों की आवश्यकता होगी। वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कण बादल बनने और वर्षा की प्रक्रियाओं से जुड़े होते हैं। इनके बेहतर अवलोकन से मॉडल को वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने और उसके परिणामों के अधिक सटीक सत्यापन में मदद मिल सकती है, यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तेजी से बढ़ते महानगरों में शहरी उत्सर्जन और भूमि उपयोग में बदलाव स्थानीय मौसम तथा जल प्रबंधन की परिस्थितियों को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल हैं।वास्तविक बाढ़ पूर्वानुमान के लिए गति बेहद महत्वपूर्ण है। यदि अत्यधिक बारिश का संकेत मिलने के बाद परिणाम तैयार होने में लंबा समय लगे, तो उसका उपयोग सीमित हो जाएगा, इसलिए भविष्य की प्रणाली को सटीकता और गति दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।

जल्द दूसरे शहरों तक पहुंच सकती है तकनीक

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस दृष्टिकोण को भविष्य में अन्य वर्षा-प्रवण महानगरों में भी आजमाया जा सकता है। ऐसे शहर जहां तेजी से शहरीकरण हो रहा है, अत्यधिक वर्षा की घटनाएं सामने आ रही हैं और जल भंडारण क्षमता सीमित है, वहां यह मॉडल उपयोगी साबित हो सकता है। अब आईआईटी मद्रास का यह अध्ययन इसी दिशा में एक संभावित वैज्ञानिक रास्ता दिखाता है। वातावरण में बारिश बनने की प्रक्रिया से लेकर जलाशयों में पानी के पहुंचने और शहर में बाढ़ के खतरे तक की पूरी कड़ी को एक साथ समझने का यह प्रयास भविष्य की शहरी बाढ़ चेतावनी प्रणालियों के लिए आधार बन सकता है।फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि भविष्य की शहरी बाढ़ से लड़ाई सिर्फ ज्यादा नालियां और बड़े जलाशय बनाने से समाप्त नहीं होगी, इसके लिए सामाजिक उत्तरदायित्व और तकनीक दोनों को एक साथ आना ही होगा।

भारत में 11 लाख शिक्षक पद खाली : रिपोर्ट

– एक ही शिक्षक के भरोसे 1 लाख स्कूल

नयी दिल्ली ।  दुनिया भर में 5 अक्टूबर को हर साल विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन शिक्षकों के योगदान और सम्मान का प्रतीक है, जो शिक्षा क्षेत्र में सुधार लाते हैं और बेहतर भविष्य तैयार करते हैं। इसे वर्ल्ड टीचर्स डे इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसे सेलिब्रेट करने की शुरुआत साल 1994 में यूनेस्को द्वारा की गई थी। इस मौके पर भारत में शिक्षकों की संख्या पर भी चर्चा होती है। विश्व शिक्षक दिवस पर जहां गुरुओं के योगदान की सरहाना और उनके योगदान को सम्मान देने का मौका मिलता है। वहीं दुनियाभर में शिक्षकों की कमी के आंकड़े सोचने पर मजबूर करते हैं।

 भारत में 11 लाख से अधिक शिक्षक पद खाली

अगर सिर्फ भारत में शिक्षकों की कमी की बात की जाए, तो यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि भारत के स्कूलों में 11 लाख से अधिक (11.16 लाख) शिक्षकों की कमी है। कुल स्वीकृत खाली पदों में से 69% रिक्तियां ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पाई गई है। केंद्रीय विद्यालयों में करीब साढ़े 8 हजार और नोवदय विद्यालयों में 24.8 प्रतिशत पद खाली हैं। जिन राज्यों में शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी है, उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक शामिल हैं। हालांकि यह तब है जब साल दर साल शिक्षकों की संख्या में इजाफा भी हुआ है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ें बताते हैं कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर स्वीकृत पदों की संख्या दर 2021-22 में 19.69 प्रतिशत थी, जो सुधार के साथ साल 2022-23 में 15.17 प्रतिशत पर आ गई है। ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस’ (यूडीआईएसई +) 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 से शिक्षकों की संख्या लगातार बढ़ी है। 2022-23 की तुलना में 2025-26 तक 8.3 प्रतिशत शिक्षकों की संख्या बढ़ी है। यह पहली बार है कि 2026 में देश में 1 करोड़ से ज्यादा टीचर हैं। सिंगल टीचर के भरोसे चल रहे 1 लाख से ज्यादा स्कूल

यूडीआईएसई + 2025-26 के अनुसार, भारत में सभी तरह के स्कूल मैनेजमेंट के तहत 1,00,843 ऐसे स्कूल थे जिनमें सिर्फ एक टीचर था।यह संख्या पिछले साल के मुकाबले लगभग 3 प्रतिशत कम हुई है, लेकिन फिर भी यह देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की एक अहम बात बनी हुई है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, 2025-26 में आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 16,357 ‘एक-टीचर वाले स्कूल’ थे। इसके बाद झारखंड (9,827), महाराष्ट्र (9,269), कर्नाटक (8,042), उत्तर प्रदेश (7,874), राजस्थान (7,200) और पश्चिम बंगाल (6,769) का नंबर आता है। यूडीआईएसई + डेटा से पता चलता है कि स्कूल शिक्षकों की संख्या 2022-23 में 94.83 लाख से बढ़कर 2025-26 में 1.027 करोड़ हो गई है, जो चार साल की अवधि में लगभग 8.3 प्रतिशत की वृद्धि है। नवीनतम यूडीआईएसई + रिपोर्ट स्कूल के विभिन्न स्तरों पर छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार भी दिखाती है। 2025-26 में राष्ट्रीय छात्र-शिक्षक अनुपात बुनियादी स्तर पर 10, प्रारंभिक स्तर पर 12, मध्य स्तर पर 17 और माध्यमिक स्तर पर 21 था।

उच्च शिक्षण संस्थानों में भी अभाव

स्कूलों के साथ-साथ हायर एजुकेशन में भी शिक्षकों की कमी कम नहीं है। संसदीय आंकड़ों पर आधारित एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के केंद्रीय संस्थानों में टीचर्स के 34 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। इनमें प्रोफेसर लेवल के 56.2 प्रतिशत स्वीकृत पद भी शामिल हैं। शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि शिक्षकों की भर्ती और तैनाती मुख्य रूप से राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन द्वारा संभाली जाती है। सरकारी स्कूलों में स्वीकृत संख्या, कार्यरत संख्या और रिक्तियों का प्रबंधन संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा किया जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या में कमी आई है।

यूडीआईएसई + डेटा से पता चलता है कि 2022-23 में भारत में 1,18,190 सिंगल-टीचर स्कूल थे, जिनकी संख्या 2023-24 में घटकर 1,10,971, 2024-25 में 1,04,125 और 2025-26 में 1,00,843 हो गई। यह चार सालों में लगभग 17,347 स्कूलों या करीब 15 प्रतिशत की कमी को दिखाता है।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

पूर्वी भारत का नया ‘ग्रोथ इंजन’ कल्याणी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट

कोलकाता। भारत जिस तेजी से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, उसमें उड्डयन क्षेत्र (एविएशन सेक्टर) और विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे की भूमिका सबसे अहम है। इस विकास की कड़ी में पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने कि बाद राज्य की भूमिका बढ़ती जा रही है। इसी कड़ी में राज्य के के नदिया जिले मे ‘कल्याणी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट’ प्रस्ताव किया गया है। यह केवल एक राज्यस्तरीय परियोजना नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत को देश के समग्र आर्थिक विकास के मुख्य केंद्र में स्थापित करने का एक बड़ा जरिया बनने जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर और मुंबई के बाद कोलकाता को देश का तीसरा ‘मल्टी-एयरपोर्ट’ महानगर बनाने वाली यह परियोजना भारत के विकास को कई स्तरों पर नई गति प्रदान करेगी।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), कल्याणी विश्वविद्यालय, बायोटेक्नोलॉजी पार्क, स्टेडियम और कई औद्योगिक क्लस्टर मौजूद हैं। नया एयरपोर्ट बनने से इस पूरे इंडस्ट्रियल बेल्ट को सीधा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क मिल जाएगा। इससे न केवल विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित होगा, बल्कि मेडिकल टूरिज्म और आईटी सेक्टर को भी जबर्दस्त बूम मिलेगा, जो सीधे तौर पर देश की जीडीपी में सकारात्मक योगदान देगा।
कल्याणी राष्ट्रीय राजमार्ग-12 (एनएच-12) और बेहतरीन रेलवे नेटवर्क से जुड़ा है। इसके साथ ही बांग्लादेश की सीमा से इसकी निकटता इसे एक आदर्श लॉजिस्टिक्स और कार्गो हब बनाती है। कोलकाता का मौजूदा नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट वर्तमान में अपनी अधिकतम क्षमता पर काम कर रहा है। कल्याणी में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनने से मौजूदा एयरपोर्ट का बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा। एयरपोर्ट के आसपास हॉस्पिटैलिटी (होटल), कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, ट्रांसपोर्ट और रिटेल सेक्टर का तेजी से विकास होगा। यह परियोजना न केवल नदिया, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों की तस्वीर बदलेगी, बल्कि यहां के युवाओं को स्थानीय स्तर पर विश्वस्तरीय रोजगार से जोड़कर देश की मानव संसाधन क्षमता का सही उपयोग करेगी।
उन्होंने कहा कि कल्याणी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट सिर्फ उड़ानों का एक नया केंद्र नहीं होगा, बल्कि यह पूर्वी भारत के व्यापार, उद्योग और रोजगार को वैश्विक नेटवर्क से जोड़ने वाला एक ऐसा महासेतु बनेगा।

महिलाओं की सुरक्षा के लिए एनसीडब्ल्यू की नई गाइडलाइंस

-ऐप-बेस्ड कैब सेवाओं पर सख्ती
नयी दिल्ली । राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने सोमवार को ऐप-बेस्ड कैब इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए गाइडलाइंस जारी कीं। इनमें फिजिकल पैनिक बटन, रूट से हटने पर रियल-टाइम अलर्ट, लंबे समय तक या संदिग्ध जगहों पर रुकने की निगरानी और एग्रीगेटर्स द्वारा 24×7 कमांड और कंट्रोल सेंटर बनाने पर जोर दिया गया है। आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने कहा, “इन गाइडलाइंस का मकसद बुकिंग के समय, यात्रा के दौरान और राइड पूरी होने के बाद सुरक्षा और जवाबदेही के मौजूदा उपायों को मजबूत करना है, ताकि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।” एक बयान में कहा गया, “आयोग सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से इन गाइडलाइंस को लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का अनुरोध करता है।”
‘ऐप-आधारित और डिजिटल ट्रांसपोर्ट मोबिलिटी सर्विस का इस्तेमाल करने वाली महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइंस’ में एक तय समयसीमा के भीतर शिकायत निवारण सिस्टम, ड्राइवर और गाड़ी के वेरिफिकेशन और ऐप पर दिखाई गई ड्राइवर या गाड़ी की जानकारी में अंतर होने पर बिना किसी जुर्माने के कैंसिलेशन की सुविधा की भी सिफारिश की गई है।
गाइडलाइंस में एग्रीगेटर्स द्वारा सुरक्षा प्रोटोकॉल और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर की नियमित समीक्षा, तय समय-सीमा में शिकायत निवारण सिस्टम, कानून लागू करने वाली अथॉरिटीज तक शिकायतों को आगे बढ़ाना और समय-समय पर नियमों के पालन और सुरक्षा की रिपोर्टिंग पर भी जोर दिया गया है।
गाइडलाइंस में कहा गया, “ड्राइवर या गाड़ी में कोई भी अनधिकृत बदलाव ऐप में सही ढंग से मार्क किया जाएगा और इसे सुरक्षा से जुड़ी चिंता माना जाएगा। यह मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस, 2025 के क्लॉज 15.4 के अनुसार है, जिसके लिए यात्रा करने वाले ड्राइवर की पहचान वेरिफाई करने के लिए इन-ऐप सिस्टम की जरूरत होती है, और क्लॉज 14.9 के अनुसार, ड्राइवर की साफ और हाई-रिजॉल्यूशन वाली तस्वीर दिखाई जानी चाहिए।”
महिला ड्राइवरों का एक वेरिफाइड पूल बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए एनसीडब्ल्यू गाइडलाइंस में कहा गया, “एग्रीगेटर्स महिला ड्राइवरों का एक वेरिफाइड पूल बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं। उपलब्धता और संभावना के आधार पर अकेले यात्रा करने वाली महिलाओं को ऐप के जरिए महिला ड्राइवर का अनुरोध करने का विकल्प दिया जा सकता है।”
देर रात के समय बेहतर सुरक्षा की मांग करते हुए, गाइडलाइंस में कहा गया, “एग्रीगेटर्स को देर रात के समय काम करने वाले ड्राइवरों के वेरिफिकेशन और निगरानी के लिए बेहतर सिस्टम अपनाना चाहिए।”
गाइडलाइंस में कहा गया, “इन उपायों में ट्रिप शुरू होने पर ड्राइवर की फोटो का अनिवार्य वेरिफिकेशन, ड्राइवर के नशे में होने से निपटने के उपाय, यात्री द्वारा चुने जाने पर भरोसेमंद कॉन्टैक्ट्स के साथ राइड की जानकारी ऑटो-शेयर करना, बेहतर कमांड और कंट्रोल सेंटर मॉनिटरिंग और राइड के आखिर में सुरक्षित ड्रॉप का विकल्प शामिल हो सकता है।”
गाड़ी चलाने वालों के लिए समय-समय पर सुरक्षा और जेंडर-सेंसिटाइजेशन (लिंग-संवेदनशीलता) ट्रेनिंग पर ध्यान देने के अलावा, गाइडलाइंस में काम पर रखने से पहले और उसके बाद समय-समय पर आपराधिक रिकॉर्ड की जांच, पुलिस वेरिफिकेशन और बैकग्राउंड चेक की जरूरत पर जोर दिया गया।

दुर्गोत्सव 2026 : यंग बॉयज क्लब के मंडप में दिखेगा राम राज्य

कोलकाता, नि.सं. । मध्य कोलकाता के तारा चंद दत्ता स्ट्रीट में यंग बॉयज क्लब अपने 57वें वर्ष में कदम रख रहा है । इस बार राम राज्य थीम के साथ शांति, न्याय, सम्मान, सद्भाव और एक आदर्श समाज की सोच पर आकर्षक मंडप का निर्माण किया जा रहा हैं। आयोजक एक ऐसी आदर्श सामाजिक व्यवस्था दिखाना चाहते हैं, जहाँ अन्याय पर न्याय, अपमान पर सम्मान और दमन पर धर्म की जीत हो, और प्रकृति के साथ सद्भाव का सामंजस्य दिखता हो। इस वर्ष के पूजा मंडप की खासियत पर्यावरण के अनुकूल इसकी सजावट है। मशहूर कलाकार देबशंकर महेश द्वारा डिजाइन किए गए इस शानदार पूजा मंडप को पूर्व मिदनापुर के कारीगर प्राकृतिक वस्तुओं, जिनमें सूखी पत्तियां, फल, फूल, बीज और रेशे से तैयार किया जा रहा हैं।
इन सामग्रियों का अनोखा इस्तेमाल पंडाल को एक प्राकृतिक रूप देता है और साथ ही प्रकृति के साथ सद्भाव बनाए रखने की थीम पर भी जोर देता है। रोजमर्रा की इन प्राकृतिक सामग्रियों को एक शानदार कलात्मक रचना में बदलने के लिए बारीक कारीगरी और विस्तृत सजावटी तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है। देवी दुर्गा की मूर्ति मिदनापुर के मशहूर मूर्तिकार कुशाध्वज बेरा ने बनाई है।
पूजा के इस आयोजन को लेकर यंग बॉयज क्लब के मुख्य आयोजक राकेश सिंह ने कहा कि राम राज्य के जरिए, हम दर्शकों के बीच एक ऐसे आदर्श समाज की अपनी सोच पेश कर रहे हैं, जहाँ लोग शांति, सम्मान और आपसी आदर के साथ रहते हैं। हम चाहते हैं कि आने वाले लोग पंडाल की सुंदरता का अनुभव करें और साथ ही इस थीम के पीछे छिपे मूल्यों से भी जुड़ें।
वहीं इस मौके पर, यंग बॉयज क्लब के यूथ प्रेसिडेंट विक्रांत सिंह ने कहा, इस साल की थीम उन मूल्यों पर आधारित है, जो लोगों को एक साथ ला सकते हैं । यंग बॉयज क्लब के को-ऑर्गनाइजर विनोद सिंह ने कहा कि इस साल, इस कॉन्सेप्ट को बेहतर बनाने के लिए प्राकृतिक वस्तुओं, पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक लाइटिंग का इस्तेमाल किया गया है। यह पंडाल मुख्य पूजा समारोह से पहले महापंचमी के दिन लोगों के लिए खुलेगा। आयोजकों ने पूजा के दिनों में बड़े पैमाने पर प्रसाद बांटने की भी योजना भी बनाई है, ताकि यह उत्सव सभी के लिए खुला और सुलभ रहे।