Monday, September 21, 2026
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जानिए पाव भाजी की कहानी

पाव भाजी भारत के मुंबई (बॉम्बे) शहर का एक लोकप्रिय व्यंजन है, जिसमें टमाटर की ग्रेवी में पकी हुई सब्जी की करी (भाजी) को नरम पाव के साथ परोसा जाता है। भाजी सब्जी के व्यंजन का पारंपरिक भारतीय नाम है, जबकि पाव या पाओ पुर्तगालियों द्वारा रोटी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जिसे उन्होंने 1500 के दशक के मध्य में मुंबई में अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान पेश किया था। पाव भाजी का जन्म भले ही हमारी मुंबई में हुआ हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता और जरूरत को जन्म देने में 1860 के दशक के अमेरिकी गृह युद्ध की एक अहम भूमिका रही है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में, जब अमेरिका में गृह युद्ध चल रहा था, तब कपास की वैश्विक आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। ऐसे में, ब्रिटिश शासकों ने भारत, खासकर मुंबई (तब बॉम्बे) की कपड़ा मिलों से बड़े पैमाने पर कपास का उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया।

भाजी की उत्पत्ति  – इस व्यंजन की उत्पत्ति 1850 के दशक में मुंबई के कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूरों से हुई थी। उनके दोपहर के भोजन का समय इतना कम होता था कि वे पूरा भोजन नहीं कर पाते थे, इसलिए वे भारी भोजन के बजाय हल्का भोजन पसंद करते थे, क्योंकि कर्मचारियों को दोपहर के भोजन के बाद कठिन शारीरिक श्रम में लौटना पड़ता था। इस व्यंजन का आविष्कार उन कपड़ा मिल मजदूरों की दोपहर के भोजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया गया था। उन्हें सस्ता, आसान, जल्दी तैयार होने वाला और हल्का, फिर भी पौष्टिक भोजन चाहिए था। एक विक्रेता ने मेनू में उपलब्ध अन्य व्यंजनों की सामग्री या भागों का उपयोग करके यह व्यंजन बनाया। रोटी या चावल की जगह पाव का इस्तेमाल किया गया, और भारतीय रोटी या चावल के साथ परोसी जाने वाली करी को मिलाकर एक मसालेदार व्यंजन बनाया गया: “भाजी”। यह देर रात का पसंदीदा स्ट्रीट फूड भी बन गया। तब से, यह भारतीय फास्ट फूड में अच्छी तरह से समाहित हो गया है, और इसमें मक्खन और मसालेदार करी का स्वाद समाहित हो गया है, जो भारतीयों को बहुत पसंद है।

शुरू में यह मिल मजदूरों का ही भोजन हुआ करता था। शुरुआत में, पाव भाजी सिर्फ मिल मजदूरों का भोजन थी, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। यहीं पर मुंबई के चतुर स्ट्रीट वेंडरों का कमाल सामने आया। उन्होंने इन मिल मजदूरों की जरूरत को समझा। उन्होंने बची हुई सब्जियों को एक साथ मैश किया, उनमें मसाले डाले और उन्हें एक खास ब्रेड रोल के साथ परोसना शुरू किया। यह एक ऐसा “फास्ट फूड” था जो उन दिनों में मजदूरों के लिए एकदम सही था।

और यहीं पर ‘पाव’ का इतिहास भी जुड़ता है। पाव शब्द पुर्तगाली शब्द ‘ पाओ’ से आया है, जिसका अर्थ है ब्रेड। पुर्तगाली भारत में ब्रेड लाए थे, और मुंबई में यह पाव के रूप में लोकप्रिय हुआ। शुरुआत में, भाजी के साथ चपाती या चावल परोसे जाते थे, लेकिन जल्दी ही पाव को इसके लिए सबसे बेस्ट पाया गया, क्योंकि यह सस्ता था और खाने में भी आसान।

रात में देर तक काम करने वाले कपास व्यापारियों ने भी इसे खाना शुरू कर दिया। ये व्यापारी अक्सर देर रात तक बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज में काम करते थे, क्योंकि अमेरिका से कपास की दरें टेलीग्राम के जरिए आती थीं। देर रात घर जाकर खाना बनाना उनकी पत्नियों के लिए मुश्किल था, इसलिए उन्होंने पाव भाजी को एक आसान और टेस्टी विकल्प के रूप में अपनाया। लेकिन समय के साथ, यह व्यंजन रेस्तरां में भी अपनी जगह बनाने लगा और मध्य मुंबई के साथ-साथ शहर के अन्य हिस्सों में भी फैल गया, और अंततः पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया। और अब तो यह अमेरिका में भी उपलब्ध है!

क्या आप जानते हैं कि अकेले मुंबई में ही लगभग 1.5 करोड़ लोग हर दूसरे दिन पाव भाजी खाते हैं! पाव भाजी न केवल स्वादिष्ट है बल्कि पौष्टिक भी है। यह 100 प्रतिशत शाकाहारी है!

पाव भाजी कैसे बनाई जाती है?

भजी आलू, फूलगोभी, मटर, गाजर और प्याज जैसी स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जियों के मिश्रण से बनाई जाती है। इसे भजी मसाले के साथ मिलाया जाता है, जो चाट मसाले के समान होता है लेकिन थोड़ा अधिक तीखा होता है।

भाजी को पाव के साथ परोसा जाता है – जो नरम, मक्खन से लथपथ बन होते हैं। एक अतिरिक्त स्वाद के रूप में, भाजी के ऊपर पनीर भी डाला जा सकता है!

(साभार – मनप्रास डॉट कॉम एवं दैनिक जागरण)

भारतीय परम्परा का अटूट अंग है मखाना

भारतीय परंपरा में मखाना का एक लंबा स्थान रहा है। इसे एक शुद्ध, पूजा और व्रत का भोजन माना जाता है, जिसका इस्तेमाल अनुष्ठानों (पंचमेवा के रूप में), प्रसाद और समारोहों में होता है। आयुर्वेद में इसे एक पौष्टिक और शरीर को ठंडा रखने वाला भोजन माना गया है। यह खास तौर पर मिथिला क्षेत्र की संस्कृति का मुख्य हिस्सा है, जहाँ इसे सदियों से उगाया और खाया जाता रहा है। भारत में, मखाना लंबे समय से सिर्फ एक स्नैक से कहीं बढ़कर रहा है – यह एक अनुष्ठान और व्रत का भोजन है जो बिहार के मिथिला क्षेत्र की संस्कृति में गहराई से जुड़ा हुआ है। यह हिंदू पूजा में इस्तेमाल होने वाले पंचमेवा (पांच ड्राई फ्रूट्स) में से एक है, इसे देवताओं को चढ़ाया जाता है, और शादियों और त्योहारों में इसका खास महत्व होता है। क्योंकि इसे शुद्ध माना जाता है और व्रत के दौरान इसे खाने की मनाही नहीं है, इसलिए यह व्रत का एक मुख्य भोजन बन गया है – आज भी नवरात्रि और एकादशी के दौरान लोग इसे खूब खाते हैं।

मखाना का इतिहास लगभग 7,80,000 साल पहले गेशर बेनोट याकोव के प्रागैतिहासिक बीजों से शुरू होता है, फिर चीन में नियोलिथिक खेती और भारत और पूर्वी एशिया में हज़ारों सालों तक पूजा, व्रत और औषधीय इस्तेमाल से होते हुए इसके 2022 के मिथिला मखाना जीआई टैग और आज के ग्लोबल सुपरफूड तक पहुँचता है। बहुत कम खाद्य पदार्थों की इतनी लंबी और दिलचस्प कहानी होती है।

प्राचीन उत्पत्ति: इज़राइल के गेशर बेनोट याकोव में मिले यूरियाले फेरोक्स के फॉसिल बीज लगभग 7,80,000 साल पुराने हैं – जो इंसानी भोजन के सबसे पुराने प्रमाणों में से एक हैं।

शुरुआती खेती: नियोलिथिक चीन (यांग्त्ज़ी घाटी) में इसे उगाया गया था, और भारत, चीन, कोरिया और जापान में इसका लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है।

विज्ञान में नाम: 1805 में सैलिसबरी ने यूरियाले वंश का वर्णन किया था।

सांस्कृतिक महत्व: यह व्रत का एक पारंपरिक भोजन है, पंचमेवा का हिस्सा है, और मिथिला क्षेत्र में पूजा और आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल होता है।

आधुनिक युग: “मिथिला मखाना” को 2022 में जीआई टैग मिला; 2025 में इसके लिए नेशनल मखाना बोर्ड की घोषणा हुई, और अब यह एक ग्लोबल सुपरफूड बन चुका है।

मखाना बहुत ही पुराना है। इज़राइल के गेशर बेनोट याकोव नाम की पुरातात्विक जगह से इसके पौधे, यूरियाले फेरोक्स, के फॉसिल बीज मिले हैं, जो लगभग 7,80,000 साल पुराने माने जाते हैं। यह फॉक्स नट को शुरुआती इंसानों द्वारा खाए जाने वाले सबसे पुराने पौधों में शामिल करता है। ये आज की फसल नहीं हैं, बल्कि वही जंगली प्रजाति हैं, जो यह दिखाता है कि इंसान बहुत पुराने समय से यूरियाले बीजों को इकट्ठा करके खा रहे हैं।

इसके बहुत समय बाद, मखाना की खेती शुरू हुई। हज़ारों साल पहले चीन की यांग्त्ज़ी नदी घाटी (कुआहुकिआओ, हेमुडु और तियानलुओशान जैसी जगहों पर) में नियोलिथिक काल के दौरान इसे उगाया गया था। भारत, चीन, कोरिया और जापान में इसके इस्तेमाल का इतिहास बहुत लंबा है। चीन और जापान में पारंपरिक दवाइयों और कुकिंग में इन बीजों को जाना जाता है – चीनी दवाइयों में कियान शि के रूप में और जापान में हासू नो मी के तरीके से – यही वजह है कि मखाना को अक्सर कमल के बीज (लोटस सीड) के साथ मिला दिया जाता है। इस कन्फ्यूज़न को हम फॉक्स नट बनाम कमल का बीज में दूर करते हैं। बिहार के मिथिला क्षेत्र में, मखाना एक शुद्ध अनुष्ठान भोजन बन गया: पूजा में इस्तेमाल होने वाले पंचमेवा में से एक, देवताओं को चढ़ाया जाने वाला, व्रत के दौरान खाया जाने वाला और आयुर्वेद में जिसका काफी महत्व है।

मखाने के बीजों को इकट्ठा करने के लिए सबसे पहले तालाब के अंदर गोता लगाकर या इन्हें बांस के जरिए पानी से बाहर निकाला जाता है, फिर बड़े-बड़े बर्तन में एकत्रित करके उन बीजों को लगातार हिलाते हैं और उसके ऊपर लगी गंदगी की साफ-सफाई करके उन्हें पानी से बार-बार धोया जाता है। फिर उसे चटाई पर सुखाया जाता है। उसके बाद लोहे की बड़ी-बड़ी कई छलनियों की सहायता से उनको साइज के हिसाब से अलग करके स्टोर किया जाता है।[2][3]

मखाने के बीज जब पूरी तरह सूख जाते हैं तब उन्हें फ्राई करके उससे मखाने या ‘फूल मखाना’ बनाए जाते हैं। मखाने के बीजों से फूल मखाना तैयार करने के लिए एक तय समय के अंदर ही यह सारा प्रोसेस पूर्ण करना होता है, अन्यथा इनके खराब होने की अधिक सम्भावना होती है। इसके अलावा इन्हें फ्राई करने के बाद बांस के पात्र में भण्डारित करते समय एक खास कपड़े से ढंककर रखा जाता है और तापमान सही रखने के लिए पात्र के आसपास गोबर का लेप किया जाता है।

कुछ घंटों के पश्चात उन्हें पुन: फ्राई करके पहले की प्रक्रिया दोहराई जाती है। अगर एक बार फ्राई करने में ही बीज फट गया तो उसमें से सफेद मखाना बाहर निकलता है। फिर उन्हें लकड़ी के तख्तों पर इकट्‍ठा किया जाता है। अंतत: कड़ी मेहनत के बाद स्वादिष्ट मखाना तैयार होता है।

मखाने में कैल्शियम, एंटी-ऑक्सीडेंट, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, फैट, मिनरल, फॉस्फोरस के अलावा भी कई पौष्टिक तत्व और आवश्यक गुण पाते हैं। अत: मखाने के सेवन से हम अनिद्रा, तनाव, हार्ट अटैक, मधुमेह, जोड़ों के दर्द, पाचन में गडबड़, झुर्रियां, कब्ज, किडनी आदि रोगों में फायदा देने वाले मखाने का सेवन करना लाभदायी माना जाता है।

मखाना की एक लंबी औषधीय परंपरा भी है। आयुर्वेद में इसे एक पौष्टिक, शरीर को ठंडा रखने वाला और आसानी से पचने वाला भोजन माना जाता है, और पारंपरिक चीनी चिकित्सा में बीजों (कियान शि) का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है। “दवा के रूप में भोजन” की यह विरासत भी एक वजह है कि मखाना को अब एक फंक्शनल सुपरफूड के रूप में बेचा जाता है – हालांकि आधुनिक हेल्थ दावों का आधार सबूतों पर होना चाहिए, जिसके बारे में हमने क्या मखाना हेल्दी है और मखाना के न्यूट्रिशन में विस्तार से बताया है।
मखाना के इतिहास का आधुनिक अध्याय पहचान और मान्यता के बारे में है। सदियों से मखाना बिहार के मिथिला क्षेत्र की एक क्षेत्रीय विशेषता थी, जिसे मल्लाह समुदाय द्वारा उगाया और प्रोसेस किया जाता था, और यह ज्ञान पीढ़ियों से चला आ रहा है। अगस्त 2022 में, इस विरासत को आधिकारिक तौर पर तब मान्यता मिली जब भारत सरकार ने “मिथिला मखाना” को जीआई टैग दिया – यह बिहार का पाँचवाँ जीआई उत्पाद था। यह टैग इसके नाम की रक्षा करता है और इसे इसके मूल क्षेत्र से जोड़ता है।

भारत के मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी करीब तीन-चौथाई है और राज्य वैश्विक आपूर्ति का लगभग 80-85 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर बिहार में होती है। सुपौल, सहरसा और मधेपुरा जैसे कोसी बेसिन के जिले तथा मिथिला और सीमांचल क्षेत्र इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्र हैं।

2024-25 में भारत में मखाना का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा और औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर थी। 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और औसत उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर हो गई। बिहार में 2025-26 में उत्पादन 60,000 मीट्रिक टन रहा।

पारंपरिक तालाब आधारित खेती के साथ अब फील्ड-सिस्टम खेती और बेहतर किस्मों, जैसे स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1, को भी बढ़ावा मिल रहा है। इससे उत्पादकता बढ़ाने और खेती से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिली है।

जीआई टैग के लिए आवेदन मिथिलांचल फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के सहयोग से 2018 में स्थापित) द्वारा किया गया था और इसमें दरभंगा, मधुबनी, कटिहार और अन्य जिले शामिल हैं। मखाना का सबसे ताज़ा बदलाव एक ग्लोबल हेल्थ स्नैक के रूप में इसका उभरना है। लंबे समय तक इसे सिर्फ एक “व्रत का भोजन” या बुज़ुर्गों के खाने की चीज़ माना जाता था, लेकिन अब इसे दुनिया भर में सेहत को लेकर जागरूक लोगों के लिए एक प्रीमियम, लो-कैलोरी, हाई-प्रोटीन सुपरफूड के रूप में नई पहचान मिली है, जिसमें पेरी-पेरी, मसाला, कैरामेल जैसे फ्लेवर आते हैं। 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसे एक “सुपरफूड” बताया, और उसी साल के केंद्रीय बजट में इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए एक नेशनल मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की गई। आज यह इंडस्ट्री हज़ारों करोड़ की है और दुनिया का ज़्यादातर मखाना भारत में पैदा होता है, और इसमें भी सबसे ज़्यादा हिस्सा बिहार का है। यह एक अनोखा सफर है: शुरुआती इंसानों द्वारा इकट्ठा किया गया एक जंगली बीज, जिसे प्राचीन एशिया में उगाया जाने लगा, फिर भारतीय पूजा में इसे पवित्र माना गया, पश्चिमी वनस्पति विज्ञान में इसका वर्गीकरण हुआ, और अंत में इसे आधुनिक सुपरफूड के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया।

(साभार – द क्रंचेस )

 

जनगणना ड्यूटी पर तैनात शिक्षकों को ‘ऑन ड्यूटी’ दिखाना होगा : कलकत्ता हाईकोर्ट

कोलकाता, नि.सं.। जनगणना के काम में लगाए जाने वाले शिक्षकों को एक साथ स्कूल में पढ़ाने और जनगणना की ड्यूटी करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि जिस शिक्षक को जनगणना के काम में लगाया जाएगा, उसे प्रशासनिक तौर पर ‘ऑन ड्यूटी’ माना जाएगा। साथ ही, स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए संबंधित स्कूल प्रबंधन को वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था करनी होगी।

न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने जनगणना में शिक्षकों की तैनाती से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यदि किसी शिक्षक को जनगणना की जिम्मेदारी दी जाती है तो राज्य को इसकी जानकारी संबंधित स्कूल प्रबंधन को देनी होगी। इसके बाद स्कूल प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना होगा कि उस शिक्षक की अनुपस्थिति में विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

मामले की सुनवाई के दौरान शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता फिरदौस शमीम ने अदालत को बताया कि कई शिक्षक दिन में स्कूल में पढ़ाने के बाद शाम चार बजे के बाद जनगणना के काम में लगाए जा रहे हैं। एक साथ दो जिम्मेदारियां निभाने के कारण शिक्षकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षक एक समय में एक ही काम करेंगे। जो शिक्षक जनगणना के काम में लगाए जाएंगे, उनसे उस दौरान स्कूल में कक्षाएं नहीं कराई जा सकतीं। संबंधित स्कूल को पहले से यह जानकारी देनी होगी कि किन शिक्षकों को जनगणना की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था करना संबंधित प्रबंधन की जिम्मेदारी होगी।

शिक्षकों की ओर से अदालत में कहा गया कि वे जनगणना की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इस अवधि को आधिकारिक तौर पर ‘ऑन ड्यूटी’ माना जाना चाहिए। साथ ही, बड़ी संख्या में शिक्षकों को एक साथ जनगणना के काम में लगाने से स्कूलों की नियमित पढ़ाई बाधित होने की आशंका भी जताई गई।

इससे पहले अदालत ने बड़ी संख्या में स्कूल शिक्षकों को एक साथ जनगणना के काम में लगाए जाने पर सवाल उठाया था। न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने कहा था कि राज्य एक साथ बड़ी संख्या में शिक्षकों को तैनात करने के बजाय कुछ शिक्षकों को चरणबद्ध तरीके से इस काम में लगा सकता था, ताकि स्कूलों में पढ़ाई का काम प्रभावित न हो।

अदालत ने दूर-दराज से स्कूल आने वाले शिक्षकों की व्यावहारिक परेशानियों पर भी सवाल उठाया था। न्यायमूर्ति राव ने पूछा था कि शिक्षक आखिर कब स्कूल में पढ़ाएंगे और कब जनगणना का काम करेंगे।

समस्या के समाधान के लिए अदालत ने रोटेशन के आधार पर चार-पांच शिक्षकों को जनगणना के काम में लगाने का सुझाव भी दिया था। जरूरत पड़ने पर एक दिन के अंतराल पर शिक्षकों से यह काम कराने की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया था।

जनगणना के लिए शिक्षकों की तैनाती को लेकर ने यह सवाल भी उठाया था कि क्या केंद्र ने शिक्षकों को इस काम में लगाने का फैसला करने से पहले राज्य सरकार से चर्चा की थी और स्कूल शिक्षकों को ही इस जिम्मेदारी में लगाने की जरूरत क्यों पड़ी।

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज बनने के लिए 3 साल की प्रैक्टिस घटाकर एक साल की

नयी दिल्ली, एजेंसी । उच्चतम न्यायालय ने जज बनने के लिए शुरुआती परीक्षा में शामिल होने के लिए तीन साल के अनिवार्य वकालत के अनुभव को घटाकर एक वर्ष कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने 2-1 के बहुमत से फैसला किया कि जज बनने की परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों को जुडिशियल एकेडमी में ट्रेनिंग लेने के अलावा एक साल का क्लर्कशिप भी करना होगा।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मई 2025 और मार्च 2027 के बीच आयोजित परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को अपने पुराने अनुभव का लाभ मिलेगा। बता दें कि 20 मई 2025 को उच्चतम न्यायालय ने जज बनने के लिए तीन वर्ष तक वकालत के अनुभव की अनिवार्यता बहाल करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं।

वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्वेस ने दायर याचिका में कहा है कि उच्चतम न्यायालय ने पांच लॉ कमीशन की रिपोर्ट पर विचार नहीं किया, जिसमें सर्वसम्मति से जज बनने के लिए बतौर वकील तीन साल की प्रैक्टिस की बात को खारिज की गई है। याचिका में दूसरे न्यायिक वेतन आयोग 2022 के रिपोर्ट का जिक्र किया गया था, जिसमें ऐसी किसी भी बाध्यता को लागू करने के पहले सभी पक्षों से सलाह-मशविरा करने पर जोर दिया गया है।

दरअसल, शुरुआत में जज के पद पर नियुक्त होने के लिए बतौर वकील तीन वर्ष का अनुभव अनिवार्य था लेकिन 2002 में उच्चतम न्यायालय ने तीन वर्ष के अनुभव को समाप्त करते हुए नये लॉ ग्रेजुएट को भी जज के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन करने का रास्ता खोल दिया था।

 

 

तुलसी का साहित्य आज भी समाज और संस्कृति को दिशा देता है : डॉ राहुल अवस्थी

कोलकाता । तुलसी आज अपने समय की अपेक्षा वर्तमान समय में अधिक विरोध झेल रहे हैं, किंतु समाज, इतिहास, संस्कृति और मानस-पटल के केंद्र से उनके रचनात्मक अवदान एवं मानस-समृद्धि को कोई मिटा नहीं सकता। ये उद्गार हैं डॉ राहुल अवस्थी के जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उन्होंने कहा तुलसी पर लगाए गए आरोपों का उत्तर उनकी कृतियों में ही रेखांकित है। रामचरितमानस में उनकी मौलिक उद्भावनाओं का कोई सानी नहीं है। वर्तमान यांत्रिक दौर में तुलसी साहित्य की चर्चा अत्यंत प्रासंगिक है। तुलसी की रचनाएँ आज भी समाज और संस्कृति को दिशा देने की क्षमता रखती हैं।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ताजा टी.वी. के निदेशक एवं छपते–छपते के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर ने तुलसीदास की व्यापक मानवीय दृष्टि को रेखांकित करते हुए कहा, धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर तुलसी ने रामचरितमानस लिखा। उन्होंने वनवासी राम का चित्रण मनुष्य के रूप में किया और समाज को प्रेरणा दी कि मनुष्य अपने कर्मों से पूजा जा सकता है। उन्होंने तुलसी के साहित्य में निहित मानवतावादी चेतना और कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि को विशेष रूप से रेखांकित किया।
अतिथियों का सम्मान अरुण प्रकाश मल्लावत, महावीर बजाज, श्रीमोहन तिवारी ने उत्तरीय, पुस्तक एवं श्रीराम मंदिर का प्रतीक चिह्न देकर किया।
पुस्तकालय के उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आधुनिक युग में रामकथा पर अनेक काव्यों की रचना हुई है, किंतु तुलसीदास द्वारा प्रणीत राम-काव्य अपनी विशिष्टताओं के कारण अद्वितीय है।
पुस्तकालय की गतिविधियों तथा उसकी समृद्ध परंपरा का परिचय पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. कमल कुमार ने तथा पुस्तकालय अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय के प्राथमिक विभाग की छात्राओं द्वारा मंगलाचरण की मनोहारी प्रस्तुति से हुआ। इसके पश्चात् प्राथमिक विभाग की छात्राओं ने रामचरितमानस के चयनित पदों का भावपूर्ण गायन प्रस्तुत किया। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विभाग की छात्राओं ने ‘रामलला नहछू’ की सांगीतिक प्रस्तुति कर वातावरण को भक्तिरस एवं तुलसीमय बना दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में भागीरथ सारस्वत, दीनानाथ पांडेय, लक्ष्मी जायसवाल, रामजी पंडित, विवेक तिवारी, माधव राय, राहुल दास तथा पुस्तकालय के कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

शिवभक्तिनी अम्मणी अम्माल अरुलमोज़ि

आज से 150 साल पहले एक लड़की तालाब में कूद गई थी। 3 दिन बाद जब बाहर निकली तो…
तिरुवन्नामलाई जिले के चेन्नसमुद्रम में आयी अम्माल और गोपाल पिल्लै के घर अरुलमोज़ि नाम की एक बालिका जन्मी। बचपन से ही वह सामान्य लड़कियों जैसी नहीं थी। उसका मन खेल-कूद में नहीं लगता था। वह पूजा पाठ और एकांत में नमः शिवाय” का जप करती रहती थी। उसके घर से धूप, अगरबत्ती की दिव्य सुगंध आती रहती थी।
उसकी माता को चिंता होने लगी कि इतनी छोटी उम्र में यह क्या करती रहती है। उन्होंने ने सोचा कि शादी हो जाएगी तो घर गृहस्ती में मन लग जायेगा।
एक दिन घर में उसे देखने के लिए कुछ लोग आने वाले थे। जब अरुलमोज़ि को यह पता चला, तो वह बहुत परेशान हो गई। वह “शिवाय नमः” का जाप करती हुई घर से निकल पड़ी और गोमुट्टिकुलम नामक तालाब के पासजाकर अरुणाचलेश्वर से प्रार्थना करते हुए उसमें कूद गई।
लोगों ने उसे बहुत खोजा, पर वह नहीं मिली। माँ का रो-रो के बुरा हाल था। गाँव वाले समझाते – अब मिलनी मुश्किल है बाई”।
तीसरे दिन अचानक जल में हलचल हुई और अरुलमोज़ि जीवित बाहर निकल आई। वह ऐसे प्रकट हुई जैसे कोई दिव्य फूल खिला हो। उसने तालाब से मिट्टी निकाली और भक्तों में बाँट दी, जो अरुणाचलेश्वर के प्रसाद में परिवर्तित हो गई।
तालाब से बाहर निकल कर उसने बताया की स्वयं भोलेनाथ ने उसे योग की दीक्षा दी है अब तो सिद्ध योगिनी बन गयी है। उसी समय से उसका नाम अम्मणी अम्माल हुआ।
इसके बाद अम्मणी अम्माल तिरुवन्नामलाई चली गईं। वहाँ उन्होंने अरुणाचलेश्वर के दर्शन किए और यह संकल्प लिया कि भक्तों की सेवा करना ही भोलेनाथ की सच्ची सेवा है। जो भी भक्त गिरिवलम करने आते वो उनकी सेवा करने लगी।
कुछ समय बाद एक दिन भगवान भोलेनाथ उसके सपने में आएं और आदेश दिया की तिरुवन्नामलाई मंदिर का अधूरा उत्तर गोपुरम बनवाना ही उसका जीवन का उद्देश्य है।
अम्मणी अम्माल ने इस कार्य को अपना प्राण मान लिया और कार्य में जुट गयी। बहुत सारे व्यापारियों ने उनकी मदद की। इस प्रकार गोपुरम का निर्माण पाँच तल तक पहुँच गया।
फिर पैसे ख़त्म हो गए। अम्मणी अम्माल धन की सहायता के लिए मैसूर महाराजा के पास गईं। द्वारपाल ने उन्हें भीतर जाने से रोका, पर उन्होंने अपनी लघिमा सिद्धि से राजमहल के भीतर प्रवेश कर लिया।
राजा ने जब देखा कि वही स्त्री बाहर भी बैठी है और भीतर भी खड़ी है, तो वह उनकी सिद्धि से डर गया। महाराजा ने उनका सम्मान किया और बहुत धन देकर विदा किया। उस धन से छठा और सातवाँ तल बन गया।
फिर धन की कमी हुई तो अम्मणी अम्माल तपश्या में बैठ गईं। भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि जहाँ धन की आवश्यकता हो, वहाँ विभूति देना, वह धन में बदल जाएगी। अम्मणी अम्माल ने वैसा ही किया और अंततः उत्तर गोपुरम तेरह कलशों सहित पूर्ण हो गया। उन्होंने स्वयं उसके कुम्भाभिषेक में भी भाग लिया।
आज भी यह गोपुरम “अम्मणी अम्माल गोपुरम” के नाम से प्रसिद्ध है।
अम्मणी अम्माल ने अपनी योगशक्ति से बहुत सारे लोगों के रोग दूर किए। 50 वर्ष की आयु में थाईपूसम के दिन वे शिव में लीन हो गईं। उनकी जीव समाधि तिरुवन्नामलाई गिरिवलम मार्ग पर ईशान्य लिंग के सामने स्थित है।
आज भी भक्त उनकी समाधि पर जाकर विभूति प्रसाद लेते हैं और विश्वास करते हैं कि अम्मणी अम्माल सूक्ष्म रूप से उनकी प्रार्थना सुनकर मार्गदर्शन करती हैं।
अंग्रेजी शासन के काल में, जब स्त्रियों को आध्यात्मिक स्वतंत्रता कम प्राप्त थी, तब अम्मणी अम्माल ने अकेले अपने वैराग्य, तप, शिवभक्ति और अद्भुत सिद्धि के बल पर तिरुवन्नामलाई का विशाल उत्तर गोपुरम बनवाया। इसलिए वे आज भी एक महान महिला सिद्ध, शिवभक्त और अरुणाचल की दिव्य सेविका के रूप में पूजनीय हैं।

16 साल के अनीश ने अकेले 25 फीट गहरा कुआं खोदकर निकाला मीठा पानी

सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक 16 वर्षीय छात्र ने दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने ग्रामीणों को भी हैरान कर दिया। जैसीनगर क्षेत्र के खजुरिया टगरा टोला (सेमरा गोपालमन) निवासी कक्षा 12वीं के छात्र अनीश फौजदार ने परिवार की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए अकेले ही करीब 25 फीट गहरा कुआं खोद डाला। अनीश ने यह काम किसी मशीन या मजदूर की मदद के बिना फावड़े और कुदाल के सहारे पूरा किया।

गांव में लंबे समय से पानी की समस्या बनी हुई थी। परिवार को भी पानी के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था। ऐसे में अनीश ने स्वयं कुआं खोदने का निर्णय लिया। जब उसने परिवार के सामने यह बात रखी तो शुरुआत में किसी ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। परिजनों को लगा कि कुछ दिन मेहनत करने के बाद वह थक जाएगा और खुदाई का काम छोड़ देगा।

लेकिन अनीश ने अपने इरादे को हकीकत में बदलने की ठान ली थी। उसने अकेले ही खुदाई शुरू कर दी। वह कुदाल से मिट्टी खोदता और बाल्टी की मदद से मिट्टी बाहर निकालता रहा। कुएं की गहराई बढ़ने के साथ काम कठिन और जोखिम भरा होता गया, लेकिन उसने लगातार मेहनत जारी रखी।

कई दिनों की मेहनत के बाद करीब 25 फीट की गहराई पर कुएं में पानी निकल आया। पानी निकलते ही परिवार की लंबे समय से चली आ रही परेशानी काफी हद तक दूर हो गई। अनीश की मेहनत और दृढ़ संकल्प की जानकारी जब ग्रामीणों को हुई तो उसकी चर्चा पूरे इलाके में होने लगी।

अनीश की मेहनत को देखते हुए ग्रामीण उसे प्यार से ‘सागर का छोटा मांझी’ कहने लगे हैं। पढ़ाई के साथ परिवार की जरूरत के लिए इस तरह मेहनत करने वाले अनीश की कहानी ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का उदाहरण बन गई है। यह घटना बताती है कि मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर मेहनत के बल पर कठिन से कठिन लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है।

देश में 8.7 करोड़ युवा पढ़ाई और रोजगार, दोनों से दूर

-नीति आयोग की रिपोर्ट में खुलासा
नयी दिल्ली, एजेंसी। देश में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के करीब 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करने और स्थानीय जरूरतों तथा उभरते क्षेत्रों के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की तत्काल जरूरत पर जोर दिया गया है।
नीति आयोग ने ‘विकसित भारत 2047 के लिए कौशल विकास की नयी कल्पना’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा कि यह अनुमान वर्ष 2021 में किए गए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (78वें दौर) के आंकड़ों पर आधारित है। आयोग ने देश के कार्यबल और शिक्षार्थियों को बेहतर प्रभाव के लिए पांच वर्गों में बांटा है। इनमें स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, औपचारिक एवं अनौपचारिक तथा शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण नहीं लेने वाले युवाओं का वर्ग और महिलाएं शामिल हैं।
नीति आयोग ने कहा, शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण नहीं लेने वाले युवा आय के अभाव और पहले की शिक्षा पर हुए खर्च के कारण कई चुनौतियों का सामना करते हैं। विद्यार्थी अक्सर अपनी मौजूदा आर्थिक जिम्मेदारियों के साथ शुल्क आधारित कौशल प्रशिक्षण प्राप्त नहीं कर पाते हैं।’’ रिपोर्ट में कहा गया कि शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण नहीं लेने वाले युवाओं और महिलाओं के लिए किफायती या सब्सिडी वाले प्रशिक्षण विकल्पों के साथ-साथ जरूरत के अनुसार वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। इसमें कहा गया कि खासकर कम आय वाले परिवारों के विद्यार्थी पहले ही कॉलेज के शुल्क और कई मामलों में निजी ट्यूशन के खर्च से दबाव में रहते हैं।
ऐसे में पारंपरिक डिग्री के साथ अतिरिक्त शुल्क आधारित कौशल प्रशिक्षण में निवेश करना कई लोगों के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं हो पाता। आयोग ने कहा कि इसके कारण कई विद्यार्थी स्नातक के बाद परिवार की आर्थिक मदद के लिए स्थायी आय वाले किसी भी रोजगार को चुन लेते हैं, भले ही वहां वेतन कम हो। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि स्नातक करने वाले केवल 8.25 प्रतिशत लोग ही अपनी योग्यता के अनुरूप काम कर रहे हैं।

कोलकाता : दो दशक में आठ बड़े अग्निकांड, दो सौ से ज्यादा मौतें

कोलकाता । “सिटी ऑफ़ जॉय” के नाम से मशहूर कोलकाता महानगर लगातार हो रहे अग्निकांडों की वजह से “सिटी ऑफ़ भय” में तब्दील होता दिख रहा है। इसी हफ्ते महानगर के एक होटल में लगी आग में नौ लोगों की मौत की घटना के बाद एक बार फिर महानगर में आगलगी से होने वाली वीभत्स मौतों की यादें फिर से सिहरन पैदा करने लगी हैं।

कोलकाता में अग्निकांडों की कहानी सिर्फ लपटों और धुएं की नहीं है। यह हर बार सामने आने वाली उन कमियों की कहानी भी है, जिन पर हादसे के बाद तो सवाल उठते हैं, लेकिन कुछ समय बीतते ही सब कुछ सामान्य हो जाता है। पिछले दो दशकों में शहर ने कारखानों से लेकर अस्पतालों, बाजारों, रेलवे भवनों और होटलों तक कई भयावह अग्निकांड देखे हैं। इन घटनाओं में दो सौ से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है। जांच समितियां गठित होती हैं, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा होती है, दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया जाता है। लेकिन समय बीतने के साथ वही सवाल फिर सामने खड़े हो जाते हैं – आपातकालीन निकास की व्यवस्था कैसी थी? अग्निशमन उपकरण काम कर रहे थे या नहीं? इमारत में मौजूद लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था क्यों नहीं थी?

सत्ता के स्तर पर भी इस दौरान बदलाव कम नहीं हुए। वाम मोर्चे के लंबे शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई और अब राज्य में भाजपा की सरकार है। राजनीतिक चेहरे बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन बड़े अग्निकांडों के बाद सामने आने वाली तस्वीर में बहुत बदलाव नहीं आया।

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तपसिया की फैक्टरी से शुरू हुई भयावह अग्निकांडों की श्रृंखला

22 नवंबर 2006 को तपसिया की एक चमड़ा फैक्टरी में आग लगी। उस समय करीब 40 श्रमिक अंदर काम कर रहे थे। आग लगते ही अफरा-तफरी मच गई। फैक्टरी से बाहर निकलने के लिए केवल एक दरवाजा था और आरोप लगा कि आग लगने के बाद उसकी चाबी नहीं मिल रही थी। श्रमिकों ने किसी तरह ताला तोड़कर बाहर निकलने का रास्ता बनाया।

इस हादसे में नौ लोगों की मौत हुई और 18 लोग घायल हुए। कई श्रमिक बुरी तरह झुलस गए थे। हादसे ने औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों और आपातकालीन निकास व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।

——नंदराम मार्केट: 11 सालों में दो बार लगी आग, सैकड़ो करोड़ का हुआ नुकसान

कोलकाता के बड़ाबाजार स्थित नंदराम मार्केट में 13 जुलाई 2019 को लगी आग ने कारोबारियों को दहला दिया था। नौवीं मंजिल पर कपड़ों के गोदाम में दोपहर करीब तीन बजे आग लगी। दमकल की 20 गाड़ियों और 90 से अधिक कर्मियों की टीम ने करीब चार दिनों तक लगातार कोशिश कर आग को पूरी तरह काबू में किया था। आग में गोदाम पूरी तरह जल गया, जबकि दो दुकानें आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुईं। कारोबारियों ने शुरुआती नुकसान कुछ लाख रुपये बताया था।

इस आग ने जनवरी 2008 की भयावह घटना की याद ताजा कर दी। तब नंदराम मार्केट में करीब सौ घंटे तक आग धधकती रही। करीब चार हजार दुकानें तबाह हो गईं और 12 हजार कारोबारी प्रभावित हुए। उस आग में कारोबारियों को सौ करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ था।

स्टीफन कोर्ट : जब लोगों ने जान बचाने के लिए बहुमंजिली इमारत से लगाई छलांग

23 मार्च 2010 को पार्क स्ट्रीट स्थित स्टीफन कोर्ट में लगी आग ने पूरे शहर को दहला दिया। बहुमंजिला इमारत में आग तेजी से फैलती गई और कई लोग अंदर फंस गए। बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलने पर कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए इमारत से छलांग लगा दी।

कई लोग धुएं और आग के बीच फंसे रहे। इस हादसे में 43 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। स्टीफन कोर्ट की घटना ने यह सवाल बेहद तीखे ढंग से सामने रखा कि घनी आबादी वाले पुराने भवनों में अग्निसुरक्षा मानकों की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी है।

एएमआरआई अस्पताल : जब मरीजों के लिए बाहर निकलना हुआ नामुमकिन

9 दिसंबर 2011 की सुबह ढाकुरिया स्थित एएमआरआई अस्पताल में लगी आग कोलकाता के सबसे भीषण अग्निकांडों में शामिल है। अस्पताल के बेसमेंट में लगी आग के साथ जहरीला धुआं तेजी से फैल गया।

आईसीयू और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए स्थिति सबसे भयावह थी। कई मरीज खुद चलकर बाहर निकलने की स्थिति में नहीं थे। बचाव की कोशिशों के बावजूद 93 लोगों की मौत हो गई।

इस घटना के बाद अस्पतालों की अग्निसुरक्षा, बेसमेंट में ज्वलनशील सामग्री के भंडारण और आपातकालीन निकासी व्यवस्था को लेकर व्यापक सवाल उठे।

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सियालदह का बाजार : नींद में ही मौत के आगोश में समा गए श्रमिक

27 फरवरी 2013 को तड़के सियालदह के सूर्य सेन स्ट्रीट स्थित कागज और प्लास्टिक के बाजार में आग लगी। बाजार के भीतर कई श्रमिक सो रहे थे। आग इतनी तेजी से फैली कि उन्हें संभलने और बाहर निकलने का पर्याप्त मौका नहीं मिला।

कई श्रमिक अंदर ही फंस गए। इस हादसे में 20 लोगों की मौत हुई। एक बार फिर सामने आया कि व्यावसायिक परिसरों में काम करने और रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों का पालन कितना जरूरी है।

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स्ट्रैंड रोड: आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मी भी नहीं लौट सके

9 मार्च 2021 को स्ट्रैंड रोड स्थित पूर्व रेलवे के न्यू कोयलाघाट भवन में भीषण आग लगी। आग पर काबू पाने के अभियान के दौरान नौ लोगों की मौत हुई। मृतकों में रेलवे के एक अधिकारी के अलावा दमकल विभाग के चार कर्मचारी, एक पुलिस अधिकारी और आरपीएफ का एक जवान भी शामिल था।

इस हादसे ने सिर्फ भवन की अग्निसुरक्षा ही नहीं, बल्कि ऊंची इमारतों में बचाव अभियान के दौरान दमकल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के सामने आने वाली चुनौतियों को भी उजागर किया।

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मेछुआ का होटल : फिर वही सवाल, इस बार 14 मौतें

29 अप्रैल 2025 को मेछुआ के एक होटल में लगी आग ने एक बार फिर शहर को झकझोर दिया। इस हादसे में दो बच्चों समेत 14 लोगों की मौत हुई, जबकि 13 लोग घायल हुए।

घटना के बाद मेछुआ और आसपास के इलाकों में चल रहे होटलों की सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव पर सवाल उठे। जांच के लिए कोलकाता पुलिस की विशेष जांच टीम गठित की गई।

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आनंदपुर: 72 घंटे की तलाश और अब भी अस्पष्ट मौतों का आंकड़ा

26 जनवरी 2026 को आनंदपुर के नाजिराबाद इलाके में एक मोमो फैक्टरी के गोदाम में आग लगी। देखते ही देखते आग आसपास के दूसरे गोदामों तक फैल गई। वहां अलग-अलग जिलों से आए श्रमिक मौजूद थे।

कुछ लोग किसी तरह बाहर निकलने में सफल रहे, लेकिन कई अंदर फंस गए। करीब 72 घंटे तक तलाशी अभियान चलाया गया। इस दौरान कई शवों के अवशेष बरामद हुए। शुरुआती तौर पर 18 लोगों की पहचान हुई, जबकि 27 लोगों के लापता होने की शिकायत दर्ज की गई थी। घटना में मृतकों की अंतिम संख्या अब भी स्पष्ट नहीं है।

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न्यू मार्केट की आग ने फिर जगा दिए पुराने सवाल

19 अगस्त 2026 की देर रात न्यू मार्केट इलाके के एक होटल में लगी आग ने एक बार फिर शहर की अग्निसुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया। आग के बाद न केवल उस होटल, बल्कि शहर के अन्य होटलों और गेस्ट हाउसों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे।

क्या होटल में पर्याप्त अग्निशमन उपकरण थे? क्या आपातकालीन निकास सुरक्षित और खुले थे? क्या वहां मौजूद लोगों को आपात स्थिति में बाहर निकालने की पर्याप्त व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।

जान माल का नुकसान रोकने की बड़ी चुनौती

कोलकाता के पिछले दो दशकों का रिकॉर्ड बताता है कि हर बड़े अग्निकांड के बाद व्यवस्था में हलचल जरूर होती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह हलचल स्थायी बदलाव में बदल पाती है?

जांच और कार्रवाई हादसे के बाद जरूरी हैं, लेकिन असली अग्निसुरक्षा हादसे से पहले शुरू होती है। इमारतों की नियमित जांच, आपातकालीन निकास की निगरानी, अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता, बिजली व्यवस्था की जांच और नियमों के उल्लंघन पर समय रहते कार्रवाई -ये ऐसे कदम हैं, जो किसी भी बड़े हादसे को टाल सकते हैं।

कोलकाता में बीते 20 वर्षों में आग ने 200 से अधिक जानें ली हैं। हर घटना के बाद शहर ने एक ही सवाल पूछा है – आखिर अग्निकांड के बाद जागने वाली व्यवस्था हादसे से पहले क्यों नहीं जागती?

 

 

 

 

 

 

 

10 से 14 महीने में बाजार में आ सकता है नया भारतीय मोबाइल ब्रांड : अश्विनी वैष्णव

नयी दिल्ली । केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को कहा कि अगले 10 से 14 महीनों में एक मजबूत भारतीय मोबाइल ब्रांड बाजार में आ सकता है। उन्होंने बताया कि फिलहाल तीन संभावित कंपनियां भारतीय ब्रांड विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं। हालांकि, उन्होंने इन कंपनियों के नाम बताने से इनकार किया।

वैष्णव ने नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (एमपीएमएस) के शुभारंभ के मौके पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा कि भारत ने मोबाइल फोन के निर्माण के क्षेत्र में मजबूत आधार तैयार कर लिया है और अब अगला लक्ष्य अपने भारतीय ब्रांड, भारतीय डिजाइन और अपनी तकनीक विकसित करना है। नई योजना एक अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएगी और पांच साल तक चलेगी। इसके लिए 62,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

मंत्री ने कहा कि भारतीय मोबाइल ब्रांड तैयार करने के लिए डिजाइन भारत का और संबंधित कंपनी के स्वामित्व वाला होना चाहिए। उत्पाद किसी दूसरे ब्रांड की नकल नहीं होना चाहिए। सरकार भारतीय कंपनियों से ऐसा डिजाइन तैयार करने की उम्मीद कर रही है, जो अपने बाजार वर्ग में दुनिया के बेहतर उत्पादों से मुकाबला कर सके।

उन्होंने कहा कि तीन संभावित कंपनियों को डिजाइन तैयार करने की दिशा में काम करने के लिए कहा गया है। कंपनियों को किफायती, प्रीमियम या अन्य श्रेणियों में से अपना बाजार चुनना होगा। वैष्णव ने कहा कि भारतीय ब्रांड के लिए अपनी तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करना सबसे महत्वपूर्ण है और इस मामले में सरकार कोई समझौता नहीं करेगी।

मोबाइल फोन विनिर्माण योजना को आज औपचारिक रूप से शुरू किया गया। योजना का उद्देश्य मोबाइल फोन उत्पादन का स्तर बढ़ाना, देश में मोबाइल के हिस्सों का निर्माण बढ़ाना, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना और घरेलू स्तर पर अधिक मूल्यवर्धन करना है। योजना के तहत भारतीय ब्रांडों को वैश्विक बाजार में पहुंच बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा।

योजना के लिए 62,500 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान है और इसका लक्ष्य पांच वर्षों में करीब 39 लाख करोड़ रुपये का संचयी मोबाइल फोन उत्पादन हासिल करना है। इसके अलावा करीब 60,000 नए प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है।

योजना के तहत मोबाइल फोन निर्माताओं को पात्र बिक्री पर 2.25 से पांच प्रतिशत तक प्रोत्साहन मिलेगा। भारत में प्रमुख हिस्सों की खरीद बढ़ाने पर अतिरिक्त 1.5 प्रतिशत और भारतीय डिजाइन तथा अनुसंधान एवं विकास पर भारतीय ब्रांडों को अतिरिक्त तीन प्रतिशत प्रोत्साहन दिया जाएगा।

वैष्णव ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य केवल मोबाइल फोन की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि भारत में डिजाइन, तकनीक और अपनी बौद्धिक संपदा विकसित करने का मजबूत आधार तैयार करना है। उन्होंने कहा कि भारत अब विदेशी कंपनियों के लिए केवल उत्पादन का केंद्र नहीं रहना चाहता, बल्कि अपने उत्पाद और ब्रांड भी विकसित करना चाहता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पिछले करीब 12 वर्षों में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में तेजी से वृद्धि हुई है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात करीब 11 गुना और मोबाइल फोन उत्पादन 33 गुना बढ़ा है, जबकि मोबाइल फोन निर्यात में करीब 166 गुना वृद्धि हुई है।

कृष्णन ने कहा कि 2014-15 में भारत में बिकने वाले करीब 70 से 75 प्रतिशत मोबाइल फोन आयात किए जाते थे, लेकिन अब भारत मोबाइल फोन का बड़ा निर्यातक बन चुका है। भारत दुनिया में मोबाइल फोन बनाने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है और देश में बिकने वाले लगभग सभी मोबाइल फोन भारत में ही बनाए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि स्मार्टफोन पिछले वर्ष भारत से निर्यात होने वाली सबसे बड़ी एकल वस्तु बना। करीब एक दशक पहले स्मार्टफोन भारत की शीर्ष 100 निर्यात वस्तुओं में भी शामिल नहीं था। अब इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात की तीसरी सबसे बड़ी श्रेणी बन चुका है।

सचिव ने कहा कि मोबाइल फोन विनिर्माण में घरेलू स्तर पर होने वाला मूल्यवर्धन योजना की शुरुआत के समय करीब 15 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 23 प्रतिशत हो गया है। उन्होंने कहा कि सरकार इसे आगे 35 से 40 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

उन्होंने बताया कि देश के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में करीब 25 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जबकि मोबाइल फोन विनिर्माण से करीब 12 लाख रोजगार जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन उद्योग में विकसित तकनीक और कौशल का लाभ लैपटॉप, टीवी, स्मार्टवॉच, ड्रोन, चिकित्सा उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे दूसरे क्षेत्रों को भी मिल रहा है।

कृष्णन ने बताया कि इससे पहले लागू बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के तहत मोबाइल फोन का उत्पादन करीब 11.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जबकि लक्ष्य 8.12 लाख करोड़ रुपये था। इस योजना के तहत निवेश भी निर्धारित लक्ष्य से अधिक रहा।

उन्होंने कहा कि मोबाइल विनिर्माण के पूरे तंत्र में करीब 14 अरब डॉलर का निवेश हुआ है और इस क्षेत्र से करीब 12 लाख रोजगार को समर्थन मिला है। घरेलू स्तर पर मोबाइल के विभिन्न हिस्सों का निर्माण बढ़ने से भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला भी मजबूत हुई है।

वैष्णव ने कहा कि भारत मोबाइल फोन के आयातक देश से अब शुद्ध निर्यातक देश बन गया है। देश में इस्तेमाल होने वाले 99 प्रतिशत से अधिक मोबाइल फोन भारत में ही बनाए जा रहे हैं। भारत दुनिया में मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता है।

उन्होंने कहा कि अब लक्ष्य मोबाइल फोन के निर्माण से आगे बढ़कर उसके महत्वपूर्ण हिस्सों, सामग्री, डिजाइन और तकनीक का निर्माण भी देश में करना है। इससे रोजगार बढ़ेगा और छोटे तथा मझोले उद्योगों, आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को भी फायदा मिलेगा।

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए वैष्णव ने मोबाइल फोन की कीमतों में हाल की बढ़ोतरी पर कहा कि दुनिया भर में मेमोरी चिप की मांग बढ़ी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े डेटा सेंटरों में मेमोरी की बढ़ती जरूरत भी इसकी एक वजह है। उन्होंने कहा कि भारत में मेमोरी चिप का उत्पादन बढ़ रहा है और दुनिया की कई कंपनियां भी अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं। ऐसे में बाजार के सामान्य चक्र के साथ कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद है।

वैष्णव ने कहा कि भारत अब केवल विदेशी कंपनियों के मोबाइल फोन बनाने तक सीमित नहीं है। देश में तैयार मोबाइल के हिस्सों का निर्यात भी शुरू हो गया है और पिछले वर्ष भारत ने चीन को भी कुछ मोबाइल घटकों का निर्यात किया।

उन्होंने कहा कि दस साल पहले की तुलना में भारत ने काफी लंबा सफर तय किया है। अब मोबाइल फोन विनिर्माण का अगला चरण भारतीय कंपनियों, भारतीय डिजाइन और भारतीय तकनीक को आगे बढ़ाने का है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे युवाओं के लिए रोजगार, डिजाइन, उद्यमिता और नए बाजारों में भागीदारी के अवसर बढ़ेंगे।