मिदनापुर । विद्यासागर विश्वविद्यालय के कला एवं वाणिज्य संकाय की ओर से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान सम्मेलन 2026 का आयोजन किया गया। इस अवसर पर “समावेशी विकास, सामाजिक न्याय और जलवायु लचीलापन” विषय पर आयोजित संगोष्ठी सम्मेलन में देश-विदेश से सैकड़ों विद्वानों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने हिस्सा लिया।सम्मेलन का उद्घाटन विद्यासागर विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. दीपक कुमार कर ने किया । बतौर मुख्य अतिथि कोलकाता स्थित एसटीएआरईबीएस के निदेशक तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुगत मार्जित उपस्थित थे । ब्लू प्लैनेट पुरस्कार से सम्मानित एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध जलवायु विशेषज्ञ प्रो. मोहन मुनासिंघे , श्रीलंका से विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। वहीं, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य, 16वें वित्त आयोग के सदस्य तथा भारतीय स्टेट बैंक के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया । अपने उद्घाटन संबोधन में कुलपति ने विश्वविद्यालयों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें विषयगत सीमाओं से आगे बढ़कर विभागों के बीच सहयोग, अंतर्विषयक अनुसंधान तथा बहुविषयक अध्ययन को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस सम्मेलन में पाँच प्रमुख विषयगत क्षेत्रों को शामिल किया गया है-पहला गरीबी, असमानता और समावेशी विकास, दूसरा स्वास्थ्य, पोषण और कल्याण, तीसरा शिक्षा, मानव विकास और कौशल निर्माण,चौथा लिंग, समाज और सामाजिक न्याय और पांचवां जलवायु परिवर्तन, सततता और पर्यावरण।इन विषयगत क्षेत्रों के अंतर्गत कुल 126 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गये । सम्मेलन में भारत और विदेशों से कई प्रतिष्ठित विद्वानों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया । इस सम्मेलन का आयोजन विद्यासागर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीपक कुमार कर के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में किया गया । प्रो. अरिंदम गुप्ता आयोजन अध्यक्ष, प्रो. नीलांजना दास चटर्जी संयोजक तथा प्रो. अभिजीत सिन्हा, प्रो. निवेदिता भट्टाचार्य साहू और प्रो. पिनाकी दास सह-संयोजक रहे । इस दो दिवसीय सम्मेलन की आयोजन समिति में कला एवं वाणिज्य संकाय के विभिन्न विभागों के शिक्षक सक्रिय रूप से शामिल रहे । उद्घाटन एवं पहले तकनीकी सत्र का संचालन प्रो.जयजीत घोष,प्रो निवेदिता साहू एवं डॉ. संजय जायसवाल ने किया । दूसरे दिन डायमंड हार्बर महिला विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की माननीय कुलपति प्रो. मीता बनर्जी मुख्य अतिथि थीं । समापन समारोह में कूच बिहार पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति प्रो. संचारी रॉय मुखर्जी उपस्थित रहीं । इस अवसर पर विद्यासागर विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के निदेशक प्रो. मधुमंगल पाल, अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ के निदेशक प्रो. अजय कुमार मिश्रा तथा विद्यासागर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. जयंत किशोर नंदी विशेष अतिथि के रूप में संबोधित किया ।
हमारे जीवन में कोई न कोई ऐसा जरूर होता है, जो हमें सही ज्ञान और मार्ग दिखाता है। वे हमें अच्छे कार्य और सही फैसले लेने में मदद करते हैं। ये लोग हमारे जीवन में गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक भी हो सकते हैं। भारतीय संस्कृति में दो सबसे खास मौकों पर गुरु की अमूल्य भूमिका का जश्न मनाया जाता है। यह है गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस। यद्यपि दोनों ही मौकों पर शिक्षा की भावना का सम्मान किया जाता है। आइए इन दो सबसे जरूरी उत्सवों के बीच के अंतर को गहराई से समझते हैं।
गुरु पूर्णिमा क्या है?
गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में गुरु को समर्पित एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है जो एक शिक्षक या आध्यात्मिक मार्गदर्शक होते हैं। चंद्र पंचांग के मुताबिक गुरु पूर्णिमा आषाढ़ महीने (जुलाई-अगस्त) की पूर्णिमा के दिन पड़ती है। यह दिन ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाले गुरुओं और शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता करने के लिए समर्पित है।
रीति-रिवाज और परंपराएं –इस दिन भक्त अक्सर अपने गुरुओं को श्रद्धा अर्पित करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। लोग सम्मान के रूप में फल, फूल और मिठाइयां चढ़ाते हैं। कई लोग ध्यान में बैठते हैं और आध्यात्मिक प्रवचनों में लीन होकर अपने अंतर्मन और अपने गुरुओं की शिक्षाओं से जुड़ते हैं।
शिक्षक दिवस क्या है? –भारत में शिक्षक दिवस हर साल 5 सितंबर को भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और एक सम्मानित शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है। जब वे राष्ट्रपति बने तो उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का अनुरोध किया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुझाव दिया कि उन्हें मनाने के बजाय हमें अपने शिक्षकों के महत्व को पहचानना चाहिए।
गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के बीच अंतर
गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस दोनों ही ज्ञान प्रदान करने वालों का सम्मान करने का दिन है। फिर भी उनमें कुछ जरूरी अंतर है-
उत्पत्ति और प्रेरणाएं – गुरु पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक और दर्शन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, जो गुरु-शिष्य उत्सव का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर शिक्षक दिवस औपचारिक शिक्षकों और शैक्षणिक समाज में उनके योगदान को आधुनिक रूप से मान्यता प्रदान करने का तरीका है। गुरु पूर्णिमा अलग-अलग धर्मों और आध्यात्मिक शिक्षकों को सम्मानित करने का दिन है, जबकि शिक्षक दिवस मुख्य रूप से स्कूल और विश्वविद्यालय के शिक्षकों पर केंद्रित है।





