Friday, November 6, 2026
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350 साल पुरानी परंपरा वाली जयपुर राजबाड़ी की सोने की दुर्गा की ऐतिहासिक पूजा

पुरुलिया । जिले के जयपुर राजपरिवार की सोने की दुर्गा प्रतिमा की पूजा पूरे राज्य में आकर्षण का केंद्र है। वर्ष 1865 से यहां दुर्गापूजा की परंपरा चली आ रही है। सालभर देवी की सोने की प्रतिमा बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखी जाती है, जबकि पूजा के दिनों में उसे मंदिर में स्थापित किया जाता है। प्रतिमा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस वर्ष प्रतिमा की सुरक्षा के लिए जिला पुलिस ने विशेष व्यवस्था की है।
हाल ही में पुरुलिया के कालीक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध मौतड़ स्थित काली मंदिर में चोरी की घटना के बाद जिले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए जयपुर राजबाड़ी में होने वाली सोने की दुर्गा की पूजा को लेकर भी पुलिस सतर्क है।
जयपुर राजपरिवार के वर्तमान सदस्य प्रशांत नारायण सिंहदेव के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों के कारण उनके पूर्वज जय सिंह 1666 में उज्जैन से पुरुलिया के जंगलमहल क्षेत्र में आए थे। उस समय यहां के भूमिज राजा खामार मुंडा के साथ उनका युद्ध हुआ, जिसमें जय सिंह की जीत हुई। इसके बाद उन्होंने खामार मुंडा की तलवार को कुलदेवी के पास रखकर पूजा शुरू की।
जय सिंह की सातवीं पीढ़ी के मदनमोहन सिंह के पुत्र काशीनाथ सिंह के समय 1864 में पूजा के दौरान मंदिर के फूस की छत में दीपक से आग लग गई। आग में पूरा ठाकुरबाड़ी परिसर जलकर राख हो गया। इस घटना से राजा काफी दुखी हुए। इसके बाद उन्हें स्वप्न में देवी ने बनारस की कनक दुर्गा के स्वरूप में प्रतिमा बनवाकर जयपुर में स्थापित करने का आदेश दिया।
इसके बाद काशीनाथ सिंह बनारस से कारीगरों को लेकर आए। उन्होंने अपने खजाने से एक सेर यानी 108 सोने की अकबरी अशर्फियां कलाकारों को दीं। प्रतिमा के पीछे का सजावटी ढांचा लगभग दो मन चांदी से तैयार किया गया। बनारस के कारीगरों ने एक वर्ष के भीतर प्रतिमा का निर्माण पूरा कर दिया। वर्ष 1865 में प्रतिमा की स्थापना के साथ पूजा शुरू हुई।
वर्ष 1970 में बीरेंद्र नारायण सिंहदेव के समय जयपुर राजबाड़ी में डकैती हुई थी। डकैत घर के आभूषण लूट ले गए, लेकिन लाल कपड़े में लिपटी सोने की दुर्गा प्रतिमा को पहचान नहीं सके। इसके बाद जिला प्रशासन की सलाह पर प्रतिमा को बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखने की व्यवस्था की गई।
इस पूजा की कुछ खास परंपराएं भी हैं। यहां देवी दुर्गा की प्रतिमा द्विभुजा स्वरूप में है। पहले पशुबलि दी जाती थी, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया।
इस राजबाड़ी की एक अन्य विशेष परंपरा चांग मछली अर्पित करने की है। मीठे पानी में पाई जाने वाली छोटी मछली को मिट्टी की थाली पर भूनकर देवी को अर्पित किया जाता है। इसके बाद अपराजिता पूजा की जाती है, जिसका उद्देश्य नकारात्मक शक्तियों का नाश करना है।
इस वर्ष जिला पुलिस अधीक्षक कुमार सनी राज ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से जयपुर राजबाड़ी के मंदिर का दौरा कर रहे हैं। पूरे इलाके में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। रात के समय पुलिस की विशेष गश्ती गाड़ियां तैनात रहेंगी।

नवरात्रि पर बनाएं कुछ मीठा

राजगिरा टिक्की 

सामग्री – 1 कप राजगिरा का आटा , 2 बड़े और मसले उबले हुए आलू,  2 बारीक कटी हुई हरी मिर्च, 1 छोटा चम्मच घिसा हुआ अदरक, 1/2 छोटा चम्मच भुना जीरा पाउडर, सेंधा नमक स्वादानुसार, 2 चम्मच बारीक कटा हुआ हरा धनिया, 1 छोटा चम्मच नींबू का रस, टिक्की सेकने के लिए तेल या घी ।

विधि – एक बड़े बर्तन में उबले और मैश किए हुए आलू लें। अब इसमें राजगिरा का आटा, बारीक कटी हरी मिर्च, घिसा हुआ अदरक, भुना जीरा पाउडर, स्वादानुसार सेंधा नमक और बारीक कटा हरा धनिया डालें। इन सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाते हुए आटे की तरह गूंध लें। यदि मिश्रण ज्यादा सूखा लगे, तो इसमें 1 चम्मच पानी या नींबू का रस मिलाकर एक नरम और चिकना गूंथ लें। हाथों पर थोड़ा सा तेल या घी लगाएं ताकि मिश्रण चिपके नहीं। अब मिश्रण से छोटी-छोटी लोइयां तोड़ें और उन्हें हथेलियों के बीच दबाकर गोल टिक्की का आकार दें। अब एक नॉन-स्टिक तवे या पैन को गैस पर गरम करें और उस पर थोड़ा सा घी या तेल फैलाएं। अब तैयार टिक्कियों को तवे पर रखें और धीमी से मध्यम आंच पर सेकें। जब टिक्की एक तरफ से सुनहरी और कुरकुरी हो जाए, तो इसे सावधानी से पलट दें और दूसरी तरफ भी थोड़ा घी लगाकर सेक लें। जब दोनों तरफ से टिक्की एकदम क्रिस्पी और गोल्डन ब्राउन हो जाए, तो इसे प्लेट में निकाल लें। आपकी गरमा-गरम और चटपटी राजगिरा टिक्की तैयार है। इसे व्रत वाली हरी चटनी या फलाहारी दही के साथ सर्व करें।

केसर मखाना रबड़ी

सामग्री – 2 गिलास दूध, 1/2 कटोरी चीनी, 10-12 फूलमखाना, 2 चम्मच काजू, 2 चम्मच किशमिश, 5-6 बादाम, 2 चुटकी केसर पत्ती, 1/4 चम्मच पिसी हुई इलायची ।

विधि – सबसे पहले गैस पर कड़ाही रख कर रबड़ी बनाने के लिए दूध डालकर गरम करके उसे रढ़ने के लिए रखें।बीच बीच में चलाते हुए दूध गाढ़ा करें। फूलमखाना को एक पैन में डाल कर सूखा ही भून लें। दूध गाढ़ा होने पर चीनी,इलायची पाउडर और केसरपत्ती डाले।मेवे काट ले,मखाने को फोड कर चूरा करें और दूध में मिला दें। दूध गाढ़ा होने पर चीनी,इलायची पाउडर और केसरपत्ती डाले।मेवे काट ले,मखाने को फोड कर चूरा करें और दूध में मिला दें। 2-3मिनट और पकाने पर रबडी गाढ़ी हो जायेगी गैस से उतार कर ठंडी करें। फ्रिज में रखकर ठंडी करें।लीजिये तैयार हो गई ठंडी ठंडी केसर मखाना रबड़ी।खायें और खिलाएं।

 

सफेद बालों से निजात पाने के घरेलू तरीके

वृद्धावस्था में आते-आते चेहरे पर झुर्रियों ज्यादा बालों में सफेदी की चिंता सताने लगती है। एक बार बाल सफेद होने के बाद उन्हें काला करना सम्भव नहीं है। इसके लिए बालों का रंगना ही सबसे बेहतर समाधान है। बालों को रंगने के लिए लोग कई तरह हे उपाय करते हैं। प्राचीन काल में महिलाएं अपने बालों को रंगने के लिए जडी-बूटियों का इस्तेमाल किया करती थीं। इससे बालों को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचती थी। आजकल बालों को रंगने के लिए रासानिक खिजाबों को इस्तेमाल किया जाने लगा है। इससे बालों को काफी नुकसान पहुंचता है। यह रसायन सिर की त्वचा में अन्दर तक समा जाते हैं। इनके इस्तेमाल से कई बार त्वचा सम्बन्धी रोग भी हो जाते हैं। इसलिए बालों को रंगने के लिए हमेशा प्राकृतिक चीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। बालों को रंगने सम्बन्धित कुछ आवश्यक बातें-

-एक चुटकी जाफरान को आधा लीटर पानी में 10 मिनट तक भिगो दें। अब इसे छान कर बालों पर लगा लें। यह बालों को रंगने सबसे आसान तरीका है।

-बालों का रंग आपके कुदरती बालों के रंग से बहुत ज्यादा अलग नहीं होना चाहिए। इससे बाल दिखने में भद्दे लगते हैं। बालों का रंग गहरा भूरा या सुनहारा हो तो ज्यादा अच्छा लगता है।

-जब बाल सफेद होना शुरू हो जाएं तो आंवला, रीठा, शिकाकाई को लोहे के बर्तन में 2-3 दिन तक भिगो दें। इसके बाद इसे उबालकर छान लें। बालों को धोने के लिए इसका इस्तेमाल करें। इससे बाल काले होना शुरू हो जाएंगे।

-500 ग्राम अखरोट के छिलकों को आधा लीटर पानी में 15 मिनट तक उबाल लीजिए। इसे बालों पर लगाने से बालों का रंग गहरा हो जाता है।

-2 कप मेहंदी में एक चम्मच कॉफी का पाउडर, एक अण्डे की जर्दी और एक बडी चम्मच रम या ब्रांडी को हल्के गर्म पानी में घोल कर पेस्ट बना लें। इसे बालों पर लगाने से बालों का रंग गहरा भूरा हो जाता है।

-बालों को काला रंग देने के लिए मेहंदी में थोडासा कॉफी पाउडर या कत्था चूर्ण मिला लें।

-रीठा, आंवला, शिकाकाई को रात भर लोहे की कडाही में भिगोकर रखदें। सुबह इसे उबालकर इसमें मेहंदी, एक चम्मच कत्था, एक चम्मच कॉफी पाउडर, एक अण्डा मिलाकर बालों में लगा लें। इसेे 3-4 घन्टे तक सिर में लगा रहने दें।

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ऐसे जल्दी गलाएं टमाटर

सब्जी, दाल या ग्रेवी बनाते समय टमाटर का जल्दी गलना कई बार जरूरी होता है, लेकिन कुछ टमाटर पकने में उम्मीद से ज्यादा समय ले लेते हैं। खासकर जब टमाटर थोड़े सख्त हों या उन्हें बड़े टुकड़ों में डाल दिया गया हो, तो मसाले अच्छी तरह पक जाने के बाद भी टमाटर अलग नजर आते हैं। ऐसे में बार-बार चम्मच चलाने या तेज आंच बढ़ाने के बजाय खाना पकाने के तरीके में छोटा-सा बदलाव करना ज्यादा काम आ सकता है। टमाटर को सही आकार में काटना, मसाले के साथ अच्छी तरह भूनना और जरूरत के मुताबिक थोड़ा पानी देकर ढककर पकाना जैसे आसान तरीके अपनाए जा सकते हैं।
टमाटर को छोटे और बराबर टुकड़ों में काटें
टमाटर जितने बड़े टुकड़ों में होंगे, उन्हें नरम होने में उतना ही समय लग सकता है। इसलिए अगर किसी सब्जी या ग्रेवी में टमाटर जल्दी गलाना चाहते हैं तो उन्हें छोटे और लगभग बराबर आकार के टुकड़ों में काटें। छोटे टुकड़े गर्मी के संपर्क में ज्यादा आते हैं और जल्दी नरम हो सकते हैं। अगर आप ग्रेवी के लिए टमाटर इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उन्हें बारीक काटने या पीसकर डालने से भी खाना जल्दी तैयार हो सकता है। बस टमाटर को बहुत पहले काटकर खुला न छोड़ें, खासकर गर्म मौसम में।
तेल में मसाले के साथ टमाटर को अच्छी तरह भूनें
टमाटर डालते ही उसे सिर्फ चम्मच से मिलाकर छोड़ देने के बजाय मसाले और तेल के साथ अच्छी तरह भूनना जरूरी है। प्याज और बाकी मसाले पकने के बाद टमाटर डालें और मध्यम आंच पर लगातार बीच-बीच में चलाते रहें। जैसे-जैसे टमाटर गर्म होगा, वह नरम होकर अपना रस छोड़ने लगेगा। इस दौरान मसाला भी टमाटर के साथ अच्छी तरह मिल जाता है और ग्रेवी का स्वाद ज्यादा गहरा हो सकता है। ध्यान रखें कि आंच बहुत तेज न हो, वरना टमाटर नरम होने से पहले ही मसाला नीचे चिपक सकता है।
थोड़ा पानी डालकर ढक दें
अगर टमाटर जल्दी गलाना है तो उसमें थोड़ी मात्रा में पानी डालकर पैन को कुछ समय के लिए ढक देना आसान तरीका है। भाप बनने से टमाटर जल्दी नरम हो सकते हैं और मसाला भी सूखने से बचता है। पानी बहुत ज्यादा डालने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि टमाटर खुद भी पकते समय काफी नमी छोड़ते हैं। कुछ मिनट ढककर पकाने के बाद ढक्कन हटाएं और जरूरत के अनुसार ग्रेवी को पकने दें। इससे टमाटर अच्छी तरह गलकर मसाले के साथ मिल सकते हैं।
चुटकी भर नमक शुरुआत में डालें
टमाटर को मसाले में डालने के बाद शुरुआत में थोड़ी मात्रा में नमक मिलाने से वह जल्दी अपना पानी छोड़ सकता है। इससे टमाटर नरम होने की प्रक्रिया में मदद मिल सकती है। हालांकि नमक की कुल मात्रा का ध्यान रखें, क्योंकि बाद में बाकी सामग्री और मसालों के साथ स्वाद बदल सकता है। इसलिए शुरुआत में जरूरत के हिसाब से थोड़ा नमक डालें और खाना लगभग तैयार होने पर स्वाद चखकर बाकी नमक एडजस्ट करें।
पके हुए टमाटर चुनने से आधा काम आसान
अगर आपके पास विकल्प हो तो खाना पकाने के लिए बहुत सख्त या कच्चे टमाटर की जगह अच्छे से पके हुए टमाटर चुनें। पके टमाटर अपेक्षाकृत नरम होते हैं और पकाते समय आसानी से टूटकर ग्रेवी में मिल जाते हैं। सूप, करी या ऐसी ग्रेवी जिसमें टमाटर का बेस चाहिए, वहां ज्यादा पके टमाटर खासतौर पर उपयोगी हो सकते हैं। इस तरह सही टमाटर चुनने, छोटे टुकड़े करने और ढककर पकाने जैसे छोटे बदलावों से किचन में खाना जल्दी तैयार करने में मदद मिल सकती है।

 

पुरुषों को भी हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर : डब्ल्यूएचओ

नयी दिल्ली । ब्रेस्ट कैंसर का नाम सुनते ही आमतौर पर हमारे मन में महिलाओं की तस्वीर आती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि पुरुष भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं? विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर के करीब 99 प्रतिशत मामले महिलाओं में पाए जाते हैं, जबकि लगभग 0.5 से 1 प्रतिशत मामले पुरुषों में होते हैं। संख्या भले ही कम हो, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुरुषों में इस बीमारी का खतरा नजरअंदाज कर दिया जाए। हर साल अक्टूबर को ‘ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह’ के रूप में मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को बीमारी के बारे में जागरूक करना, समय पर पहचान और इलाज के महत्व को समझाना और इससे प्रभावित लोगों को समर्थन देना है।
महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले काफी कम होते हैं। इसी वजह से कई बार पुरुष अपने शरीर में होने वाले बदलावों को गंभीरता से नहीं लेते। ब्रेस्ट में गांठ, निप्पल के आसपास बदलाव, निप्पल से किसी तरह का स्राव या त्वचा में असामान्य परिवर्तन जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज भी बीमारी की स्थिति और उसके प्रकार के आधार पर किया जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर का उपचार महिलाओं में अपनाए जाने वाले इलाज के सिद्धांतों के अनुरूप ही होता है। इसी कारण पुरुषों के लिए भी समय पर डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है।
ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ लड़ाई में शुरुआती पहचान को सबसे अहम माना जाता है। अगर बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है। यही वजह है कि लोगों को शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है।
दुनियाभर में ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कैंसरों में शामिल है। साल 2022 में करीब 23 लाख महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था, जबकि लगभग 6.70 लाख महिलाओं की इस बीमारी से मौत हुई। हालांकि, इलाज और सर्वाइवल की स्थिति अलग-अलग देशों में काफी अलग है। इसका एक बड़ा कारण शुरुआती जांच, सही समय पर बीमारी की पहचान और प्रभावी इलाज तक समान पहुंच का न होना है।

दुर्गोत्सव 2026 : आसनसोल के हाजरा बाड़ी में जीवित दीमक की बांबी में विराजती हैं मां दुर्गा

आसनसोल। पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा को लेकर अनेक लोकविश्वास और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक अनोखी परंपरा आसनसोल के ऊषाग्राम के न्यू घुसिक गांव स्थित हाजरा बाड़ी में देखने को मिलती है। यहां मां दुर्गा की पूजा मिट्टी की प्रतिमा बनाकर नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से बनी दीमक की बांबी को देवी का स्वरूप मानकर की जाती है। लगभग 200 वर्षों से चली आ रही इस पूजा की परंपरा अपनी अनूठी मान्यता के कारण लोगों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है।
हाजरा परिवार में दुर्गापूजा की शुरुआत पारंपरिक तरीके से मिट्टी की प्रतिमा बनाकर की जाती थी। लोककथा के अनुसार, लगभग दो शताब्दी पहले पूजा के दौरान एक अप्रत्याशित घटना घटी। भोग सजाने के समय दीपक की लौ से प्रतिमा के बालों में आग लग गई। इसके बाद परिवार ने उस वर्ष प्रतिमा की पूजा बंद कर घट पूजा की। मान्यता थी कि खंडित अथवा जली हुई प्रतिमा की पूजा करना उचित नहीं है। इसके बाद पूजा की जिम्मेदारी हरिपद हाजरा से दिवाकर हाजरा के हाथों में आई। इसी दौरान मंदिर के चबूतरे पर अचानक दीमक की बांबी दिखाई देने लगी। धीरे-धीरे उसका आकार बढ़ने लगा। दिवाकर हाजरा ने जब उसे हटाने का विचार किया तो उन्हें स्वप्न में देवी का आदेश मिला कि उसी प्राकृतिक स्वरूप में उनकी उपस्थिति है।
परिवार की मान्यता के अनुसार, मुख्य बांबी के आसपास छोटी-छोटी बांबियां भी दिखाई देने लगीं, जिन्हें गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और कार्तिकेय के स्वरूप से जोड़कर देखा गया। इसके बाद परिवार ने बांबी को वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर मां दुर्गा के रूप में उसकी पूजा शुरू कर दी।
आज भी हाजरा बाड़ी में इसी परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पूजा के दौरान ढाक की आवाज, धूप-धूने की सुगंध और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है। यहां देवी की पूजा के लिए मिट्टी की प्रतिमा बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि परिवार की आस्था में प्रकृति की गोद में बनी दीमक की बांबी ही मां दुर्गा का स्वरूप है। आसनसोल की यह अनूठी पूजा परंपरा लोकआस्था, प्रकृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का एक विशिष्ट उदाहरण मानी जाती है।

निजी दायरे से फिर सार्वजनिक उत्सव बनी नवद्वीप की 51 साल पुरानी दुर्गापूजा

दीपंकर एडबार

नवद्वीप (नदिया) । पश्चिम बंगाल के नवद्वीप स्थित फांसीतला मोड़ की श्रीश्री कृष्णकाली बारोयारी समिति की दुर्गापूजा इस वर्ष एक खास वजह से चर्चा में है। पांच दशक से अधिक पुरानी इस पूजा को स्थानीय निवासियों की पहल पर फिर से सार्वजनिक स्वरूप देने की कोशिश की गई है। लंबे समय तक गोपाल मंदिर में आयोजित होने वाली यह पूजा धीरे-धीरे निजी आयोजन जैसी बन गई थी। अब क्षेत्र के लोगों की मांग और सामूहिक प्रयास से इसे दोबारा सर्वजन की भागीदारी वाला उत्सव बनाने की पहल की गई है।

श्रीश्री कृष्णकाली बारोयारी समिति की ओर से आयोजित इस पूजा में स्मृति संघ सहयोग कर रहा है। आयोजकों के अनुसार, इस आयोजन की पहचान पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाज और सादगीपूर्ण धार्मिक परंपरा से जुड़ी रही है। यहां देवी दुर्गा की एकचाला प्रतिमा स्थापित की जाती है, जिसे पारंपरिक ‘डाकेर साज’ से सजाया जाता है। इस शैली में प्रतिमा की सजावट पूजा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।

पूजा में फांसीतला मोड़ के अलावा पाताल साधु सरणी, स्टीमरघाट रोड, बागानियापाड़ा और मणिपुर बाई लेन सहित आसपास के इलाकों के लोगों की भी भागीदारी रहती है। आयोजकों का मानना है कि पूजा को फिर सार्वजनिक स्वरूप देने से स्थानीय लोगों के बीच सामुदायिक जुड़ाव को मजबूती मिलेगी।

पूजा समिति के संयुक्त सचिव सौरभ घोष और राजकुमार चक्रवर्ती ने बताया कि पहले यह पूजा गोपाल मंदिर में होती थी। स्थानीय निवासियों की पहल से अब इसे फिर सामूहिक आयोजन का रूप दिया गया है। समिति के सलाहकार आशीष कुमार पाल ने कहा कि लंबे समय तक सार्वजनिक पूजा का स्वरूप लगभग निजी आयोजन जैसा हो गया था। स्थानीय लोगों की मांग पर इसे फिर सर्वजन की पूजा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

पंचमी की शाम पूजा का उद्घाटन होगा। इस अवसर पर नवद्वीप के विधायक श्रुति शेखर गोस्वामी, नगरपालिका प्रशासक प्रसनजीत कुंडू, नगरपालिका के कार्यकारी अधिकारी संजीव कुमार राहा और नवद्वीप थाने के प्रभारी बरुण गाइन के उपस्थित रहने की संभावना है।

धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक पहल भी जोड़ी गई है। उद्घाटन के दिन पूर्व बर्धमान जिले के चांदपुर आधार कॉलोनी के 100 से अधिक स्कूली बच्चों को नए कपड़े दिए जाएंगे।

षष्ठी को देवी का बोधन होगा। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दौरान फल के साथ विभिन्न प्रकार के अन्नभोग, खिचड़ी, पांच तरह की सब्जियां, पुष्पान्न, परमान्न और मिठाइयां अर्पित की जाएंगी। महाष्टमी की दोपहर करीब 1,500 लोगों के बीच खिचड़ी, पांच तरह की सब्जियां और परमान्न प्रसाद के रूप में वितरित करने की योजना है।

दशमी को पारंपरिक रूप से खई, चिउड़ा, मुरकी और दही का भोग लगाया जाएगा। शाम को शोभायात्रा के साथ प्रतिमा का विसर्जन फांसीतला घाट पर होगा। इसी रात नवद्वीप के प्रसिद्ध रास उत्सव से जुड़ी श्रीश्री कृष्णकाली माता की काठामो पूजा भी आयोजित की जाएगी।

51 वर्षों की परंपरा के बीच इस वर्ष का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों की पहल पर पूजा को फिर सार्वजनिक स्वरूप में लाने का प्रयास यह संकेत देता है कि धार्मिक परंपराओं की निरंतरता में सामुदायिक भागीदारी की अहम भूमिका होती है।

पांच शताब्दियों की विरासत सहेजे हुए है रानाघाट की घोषबाड़ी दुर्गापूजा

दीपंकर एडबार

रानाघाट (नदिया) । पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट में घोषबाड़ी का दुर्गापूजा उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। परिवार की मान्यताओं के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत 1520 ईस्वी में हुई थी। पांच शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पूजा से जुड़ी कई प्राचीन रस्में आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।

परिवार के प्रचलित इतिहास के मुताबिक, हुगली जिले के आकना से चैतन्यचरण घोष 1520 में ब्रह्मडांगा आकर बसे थे। ब्रह्मडांगा को बाद में रानाघाट के नाम से जाना जाने लगा। बताया जाता है कि चैतन्यचरण घोष ने वहां मंदिर स्थापित कर दुर्गापूजा शुरू की थी। उनके निःसंतान रहने के कारण निधन के बाद पूजा की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई मकरंद घोष के वंशजों ने संभाली। परिवार का दावा है कि वर्तमान में 29वीं पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

हालांकि, पूजा की शुरुआत से संबंधित 1520 की तारीख की स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेजों से पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस विवरण को परिवार की मौखिक और पारंपरिक ऐतिहासिक मान्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।

घोषबाड़ी की पूजा की एक खास पहचान प्रतिमा निर्माण से जुड़ी मिट्टी की परंपरा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, पूजा के शुरुआती दौर में इस्तेमाल की गई मिट्टी का कुछ हिस्सा आज भी सुरक्षित रखा गया है। हर वर्ष उस पुरानी मिट्टी का थोड़ा हिस्सा नई मिट्टी में मिलाकर पूजा के लिए पाटा तैयार किया जाता है। इस परंपरा को पूर्वजों की स्मृति और वर्तमान पीढ़ी के बीच संबंध बनाए रखने का माध्यम माना जाता है।

पूजा की रस्मों में भी कई विशिष्टताएं हैं। जहां सामान्य तौर पर दुर्गापूजा की प्रमुख रस्में षष्ठी से शुरू होती हैं, वहीं घोषबाड़ी में पंचमी के दिन ही देवी का बोधन किया जाता है। अधिवास के समय परिवार का एक पुरुष सदस्य ‘रक्षा प्रदीप’ जलाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार, यह दीपक विसर्जन तक जलता रहता है।

विसर्जन के बाद पाटा तोड़कर उसी दीपक की लौ से घर के अलग-अलग कमरों में दीप जलाए जाते हैं। इसके बाद केले के पत्ते पर 108 बार दुर्गा का नाम लिखा जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार, उस पत्ते को चूर्णी नदी में विसर्जित किया जाता है या तुलसी के पौधे के पास रखा जाता है।

भोग और अन्य रस्मों में भी अलग-अलग नियमों का पालन किया जाता है। अष्टमी के दिन पका हुआ भोग चढ़ाया जाता है, जबकि अन्य दिनों में कच्चा भोग देने की परंपरा है। नवमी को थोर और केले के फूल से बने व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। इसी दिन पारंपरिक कीचड़ खेलने की रस्म भी निभाई जाती है। दशमी पर शुक्तो, मछली और चावल अर्पित कर देवी को विदाई दी जाती है। उस दिन ताजे फूलों के बजाय पहले से चढ़ाए गए फूलों के इस्तेमाल की परंपरा भी परिवार में प्रचलित है।

परिवार के सदस्यों के अनुसार, पहले यहां 51 बकरे और भैंसों की बलि देने की परंपरा थी। उनका कहना है कि 1934 में स्वप्नादेश के बाद बकरे की बलि बंद कर दी गई। बाद के वर्षों में बलि की परंपरा पूरी तरह समाप्त हो गई। यह बदलाव दर्शाता है कि पुरानी परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ समय के अनुसार कुछ धार्मिक प्रथाओं में भी परिवर्तन आया है।

रानाघाट का इतिहास केवल प्रशासनिक बदलावों और शहरी विकास तक सीमित नहीं है। घोषबाड़ी जैसी पारिवारिक पूजा स्थानीय समाज की स्मृतियों, धार्मिक विश्वासों और सांस्कृतिक पहचान को समझने का अवसर देती है। पांच शताब्दियों से अधिक पुरानी मानी जाने वाली यह पूजा इस बात का उदाहरण है कि पारिवारिक परंपराएं किस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हुए किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख सकती हैं।

दुर्गोत्सव 2026 : 331 साल से कायम है रानाघाट की ‘सदु-बाउनी’ दुर्गापूजा की परंपरा

दीपंकर एडबार

रानाघाट (नदिया) । समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और पूजा के आयोजन का स्वरूप भी बदल गया, लेकिन पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट स्थित पुरोहित पाड़ा की ‘सदु-बाउनी’ दुर्गापूजा की परंपरा आज भी कायम है। 331वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी यह ऐतिहासिक पूजा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकजुटता की भी मिसाल है। इस पूजा की शुरुआत एक बाल विधवा सदु देवी की धार्मिक निष्ठा और संकल्प से जुड़ी मानी जाती है।

स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, सदु देवी अपने ससुराल कालना से दुर्गापूजा की परंपरा को अपने मायके ब्रह्मडांगा लेकर आई थीं। यही क्षेत्र वर्तमान में रानाघाट के पुरोहित पाड़ा के नाम से जाना जाता है। उस समय ब्राह्मण परिवारों की महिलाओं को ‘बाउनी’ कहकर संबोधित करने की परंपरा थी। इसी आधार पर पूजा का नाम ‘सदु-बाउनी’ पड़ा। एक महिला की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे इलाके की सांस्कृतिक पहचान बन गई।

इस पूजा के इतिहास में 1971 का वर्ष महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे पहले तक पूजा पारिवारिक स्तर पर आयोजित होती थी। बाद में इसे सार्वजनिक रूप दिया गया। इस बदलाव के साथ पूजा की जिम्मेदारी किसी एक परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे मोहल्ले ने इसकी परंपरा को आगे बढ़ाने का दायित्व संभाल लिया। आज परिवार के मूल सदस्य भले ही मौजूद नहीं हैं, लेकिन स्थानीय निवासी उनकी विरासत को संजोकर रखे हुए हैं।

पूजा के आयोजन में मोहल्ले के बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक की सक्रिय भागीदारी रहती है। महिला और पुरुष सभी मिलकर विभिन्न तैयारियों और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं। इस तरह यह आयोजन केवल देवी की आराधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संबंध बनाए रखने और सामाजिक एकता मजबूत करने का माध्यम भी बनता है।

सदु-बाउनी पूजा की खासियत इसकी सदियों पुरानी परंपराओं में भी दिखाई देती है। षष्ठी के दिन देवी को कलाइ की दाल का भोग लगाया जाता है। वहीं, दशमी के दिन पांता भात, कचू की साग और चॉलता से तैयार खट्टी सामग्री अर्पित की जाती है। इसके अलावा गन्ना, कद्दू और केले की प्रतीकात्मक बलि देने की परंपरा भी आज तक जारी है। इन रीति-रिवाजों को नई पीढ़ी भी श्रद्धा के साथ निभाती है।

हालांकि, समय के साथ पूजा के बाहरी स्वरूप में बदलाव आया है। पहले प्रतिमा पर पारंपरिक मिट्टी की सजावट होती थी, जबकि अब आकर्षक डाकेर साज का इस्तेमाल किया जाता है। विसर्जन की व्यवस्था में भी बदलाव आया है। इसके बावजूद पूजा की मूल परंपराओं और धार्मिक आस्था को बनाए रखने का प्रयास जारी है।

331 वर्षों की इस यात्रा में सदु-बाउनी पूजा ने साबित किया है कि किसी परंपरा की असली ताकत केवल उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उसे जीवित रखने वाले लोगों की भागीदारी में होती है। एक बाल विधवा की भक्ति से शुरू हुई यह पूजा आज रानाघाट के पुरोहित पाड़ा की सामूहिक विरासत बन चुकी है। बदलते समय के बीच यह आयोजन इतिहास, संस्कृति और सामाजिक एकजुटता की एक जीवंत मिसाल बना हुआ है।

त्योहारों में गमछे की मांग बढ़ी, लेकिन करघों पर घटते जा रहे बुनकर

दीपंकर एडबार

रानाघाट (नदिया) । बंगाल में दुर्गापूजा की तैयारियां शुरू होते ही पारंपरिक सूती गमछे की मांग एक बार फिर बढ़ने लगी है। दुर्गापूजा, कालीपूजा और जगद्धात्री पूजा से लेकर विवाह, उपनयन और अन्नप्राशन जैसे सामाजिक-धार्मिक आयोजनों में आज भी गमछे का इस्तेमाल जारी है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी तौलिये के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद पसीना पोंछने, आसानी से साथ ले जाने और जल्दी सूखने जैसी खूबियों के कारण सूती गमछे की अपनी अलग जगह बनी हुई है। लेकिन बाजार में मांग कायम रहने के बावजूद इस पारंपरिक उत्पाद को बनाने वाले करघे धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं।

कारीगरों के अनुसार, समस्या मांग की कमी से ज्यादा उत्पादन लागत और बाजार कीमत के बीच बढ़ते अंतर की है। सूत और बिजली की कीमत बढ़ने के साथ-साथ पावरलूम पर तैयार होने वाले सस्ते पॉलिएस्टर मिश्रित गमछों ने हाथ से बुने गमछों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

दशकों से इस पेशे से जुड़े कारीगर कंचन विश्वास के अनुसार, कभी नदिया के गमछे की मांग बंगाल के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी थी। मुंबई सहित कई शहरों में इसकी आपूर्ति होती थी और विदेशों तक भी माल भेजा जाता था। लेकिन अब वह बाजार काफी सिमट गया है। उनका कहना है कि महंगे सूत और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण कारीगरों को उचित मजदूरी देना मुश्किल हो रहा है। नतीजतन नई पीढ़ी इस पेशे में आने से कतरा रही है।

अनुभवी कारीगर अरुण मित्र के मुताबिक, एक शुद्ध सूती गमछे की कीमत करीब 120 से 132 रुपये पड़ती है। इसके मुकाबले पावरलूम पर बने पॉलिएस्टर गमछे 60-70 रुपये में बाजार में उपलब्ध हैं। कीमत में लगभग आधे का अंतर होने के कारण आम खरीदारों का एक वर्ग सस्ते विकल्प की ओर जा रहा है। इससे हाथ से बुने सूती गमछों का बाजार लगातार दबाव में है।

त्योहारों के दौरान हालांकि ऑर्डर कुछ बढ़ जाते हैं। पूजा-पर्व और सामाजिक आयोजनों के कारण गमछे की मांग में मौसमी तेजी आती है। लेकिन कारीगरों का कहना है कि बढ़े हुए ऑर्डर का फायदा उनकी आय में उसी अनुपात में नहीं पहुंचता। कच्चे माल, बिजली और मजदूरी की बढ़ती लागत के कारण अतिरिक्त उत्पादन का मुनाफा बेहद सीमित रह जाता है।

सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। कारीगरों का दावा है कि पूरे दिन काम करने और एक से अधिक करघे या मशीन चलाने के बावजूद 400-500 रुपये प्रतिदिन कमाना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में युवा पीढ़ी इस पारंपरिक पेशे के बजाय दूसरे रोजगार की तलाश कर रही है।

इससे बंगाल के गमछा उद्योग के सामने एक अजीब स्थिति पैदा हो गयी है-बाजार में गमछे की मांग अभी भी है, लेकिन उसे बनाने वाले हाथ लगातार कम हो रहे हैं।

कारीगरों और उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कच्चे माल की कीमत, बाजार तक पहुंच, उचित मजदूरी और सस्ते मशीन निर्मित उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर प्रभावी सरकारी सहायता जरूरी है। अन्यथा आने वाले वर्षों में बंगाल का पारंपरिक गमछा बाजार में तो दिखाई देगा, लेकिन उसे बनाने वाले पारंपरिक करघे और कारीगर धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं।