Monday, September 21, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 2

एक्जीक्यूटिव पैलेस में दिखा गणेश चतुर्थी पर बप्पा का डबल इंजन  देश

– 11 फीट की प्रतिमा और 3डी वॉल में दिखा विकसित बंगाल का ब्लूप्रिंट

कोलकाता । कोलकाता बागुईहाटी में स्थित एक्जीक्यूटिव पैलेस अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन ने वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी एक खास कलात्मक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण थीम “परिवर्तन डबल इंजन सरकार के साथ विकसित बंगाल की ओर” के साथ मनाया । रविवार को इस भव्य मंडप के उद्घाटन अवसर पर दिलीप घोष ( कृषि विपणन राज्य मंत्री, पश्चिम बंगाल सरकार), तरूणज्योति तिवारी, (विधायक), जीतेन्द्र कुमार तिवारी (विधायक), अमित अग्रवाल (प्रोड्यूशर) के साथ कई अन्य गणमान्य प्रतिष्ठित हस्तियाँ इस मौके पर मौजूद थे।

आगामी छह दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का मुख्य आकर्षण मशहूर कलाकार मिंटू पाल द्वारा तैयार किया गया एक शानदार कलात्मक इंस्टॉलेशन है, जिसमें शाही परिवेश में भगवान गणेश की 11 फीट ऊंची  भव्य प्रतिमा है। सफेद कुर्ता और नारंगी पगड़ी पहने भगवान गणेश ज्ञान, जिम्मेदारी, दूरदर्शी नेतृत्व और सुशासन का प्रतीक बनकर मंडप में विराजमान हुए हैं। मंडप में बनाये गये 10 फीट × 10 फीट की 3डी वॉल ‘परिवर्तन’ के सफर की झलकियों को दर्शकों के समक्ष पेश कर रही है। यह इंस्टॉलेशन गत “4 मई से पहले” और “4 मई के बाद” के चुनिंदा मुद्दों और विकास कार्यों की तुलना करते प्रतीत हो है, जो बंगाल के विकास के सफर को एसोसिएशन के नजरिए से दर्शाता है। मंडप के एक हिस्से में “4 मई से पहले” वाले हिस्से में इन निम्न चुनिंदा झलकियों को रखा गया हैं, जिनमें  मेसी के कोलकाता दौरे के दौरान मची अफरातफरी, आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में ‘अभया के लिए न्याय’ को लेकर जारी आंदोलन, बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने को लेकर सत्ता पक्ष व केंद्र सरकार के बीच खींचतान,  बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की तस्करी शामिल हैं । “4 मई के बाद” शुरू हुए बदलाव के हिस्से में इन चीजें को दिखाने की कोशिश की गई हैं, जिनमें  नई दिल्ली–न्यू जलपाईगुड़ी के बीच बुलेट ट्रेन का शुरू होना, औद्योगिक क्रांति और नए उद्योगों की शुरुआत,  बुलडोजर कार्रवाई के जरिए अवैध निर्माणों को गिराना इस वर्ष गणेश चतुर्थी के मौके पर इस 3डी प्रस्तुति के माध्यम से एसोसिएशन की तरफ से अपने मंडप में एक ऐसे बंगाल के अपने विजन को आकर्षक ढंग से पेश करने की कोशिश की गयी है, जो अधिक प्रगतिशील, आपस में मेल बंधन, औद्योगिक रूप से विकसित और बेहतर अवसरों से भरपूर है। इस मौके पर एक्जीक्यूटिव पैलेस अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के सेक्रेटरी अंकित अग्रवाल ने कहा कि  हमारी थीम ‘परिवर्तन – डबल इंजन सरकार के साथ विकसित बंगाल की ओर’ के जरिए हमारा मुख्य उद्देश्य चुनौतियों से संभावनाओं तक के सफर को दिखाना है । इस समारोह में कॉम्प्लेक्स के सदस्यों, जिनमें संजीव दुदानी (अध्यक्ष), अंकित अग्रवाल (सचिव), एम पी अग्रवाल (कोषाध्यक्ष) के साथ ही राम अवतार अग्रवाल, मनोज बिनानी, कृष्ण अवतार अग्रवाल, आशीष टेकरीवाल, अरुण कुमार अग्रवाल, अभिषेक जैन, अमित अग्रवाल, अंकित गुप्ता, ललित डागा, अमन अग्रवाल, शैंकी जैन, मिठू चंदा, गौतम बसाक, बिश्वरूप बसु, अनिंद्य बसु इस आयोजन को सफल सफल बनाने में सक्रिय थे। गणेश चतुर्थी का जश्न आगामी 18 सितंबर तक चलेगा ।

मोबाइल सिम की तरह पोर्ट करा सकेंगे फास्टैग

मुम्बई, एजेंसी । अब फास्टैग यूजर्स को अपना बैंक बदलने के लिए गाड़ी की विंडशील्ड पर लगा पुराना स्टिकर हटाने या नया फिजिकल टैग लगवाने की जरूरत नहीं होगी। फास्टैग भी मोबाइल सिम की तरह पोर्ट हो जाएगा।
वनटैग नाम की इस नई सर्विस को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने शुक्रवार को मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 के दौरान लॉन्च किया। अभी फास्टैग यूजर को बैंक बदलने के लिए पुराना टैग अकाउंट बंद करना पड़ता था। इसके बाद नए सिरे से ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया पूरी करके नया फिजिकल स्टीकर बनवाना होता था। अब यूजर को पुराना अकाउंट बंद नहीं करना पड़ेगा। एक ही फास्टैग स्टिकर अलग-अलग बैंकों के बीच पोर्टेबल हो जाएगा। टोल प्लाजा पर टैक्स कटने का तरीका बिल्कुल पहले जैसा ही रहेगा, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। आपको टोल पर गाड़ी रोकने या कुछ नया करने की जरूरत नहीं है। बैकएंड में सारा कंप्यूटर सिस्टम नेशनल इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन संभालेगा, जो नए बैंक की जानकारी अपने-आप अपडेट कर देगा।

प्रथम पूज्य गणपति में समाहित है बुद्धि, विवेक और मंगल का संदेश

गणेश चतुर्थी (14 सितंबर) पर विशेष

-उदय कुमार सिंह

देशभर में गणेशोत्सव की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। 14 सितंबर से शुरू होने वाले इस महोत्सव की धूम 25 सितंबर तक रहेगी। लोग श्रद्धा-भक्ति के साथ भगवान गणेश का पूजन-अर्चन कर संपूर्ण मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। वास्तव में विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, गणनायक, एकदंत, लंबोदर और गजानन जैसे अनेक नामों से पूजे जाने वाले भगवान गणेश भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में गणपति का स्मरण करने की परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें बुद्धि, विवेक, विद्या और शुभारंभ का देवता माना गया है। यही कारण है कि विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, पूजा, व्यापार और शिक्षा जैसे मांगलिक कार्यों में सबसे पहले गणेश पूजन किया जाता है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। हालांकि परंपरा के अनुसार कई परिवार डेढ़, तीन, पांच या सात दिन बाद भी अपनी सुविधा और कुलाचार के अनुसार गणपति विसर्जन करते हैं।
गणेशोत्सव अब केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह कला, लोकसंस्कृति, सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक चेतना से जुड़ा व्यापक पर्व बन चुका है। महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव ने सामाजिक एकता और स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जनजागरण का माध्यम बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में बसे भारतीय समुदायों तक पहुंच गया।
गणेश : बुद्धि और मंगल के प्रतीकसनातन परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का अधिष्ठाता माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन करने से कार्य निर्विघ्न संपन्न होता है। गणेश शब्द की व्याख्या ‘गणों के ईश’ के रूप में की जाती है। वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा शिवगणों के अधिपति माने जाते हैं।
धार्मिक परंपराओं में गणेश को विद्या, बुद्धि, सिद्धि, समृद्धि और आनंद से भी जोड़ा गया है। बुधवार को भी गणेश आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, गणना और व्यापार से जोड़ा जाता है। हालांकि इससे जुड़े फल धार्मिक और ज्योतिषीय विश्वासों का हिस्सा हैं।
गणेश चतुर्थी का धार्मिक महत्वभाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि को भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था। श्रद्धालु इस दिन विधि-विधान से गणपति की स्थापना कर दूर्वा, मोदक, लड्डू और पुष्प अर्पित करते हैं। घरों और पंडालों में पूजा, आरती, भजन-कीर्तन तथा अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अंतिम चरण में गणपति प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक भाव में इसे भगवान गणेश के अपने धाम लौटने और अगले वर्ष फिर आने के निमंत्रण से जोड़ा जाता है।
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को होगी। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर से 15 सितंबर की सुबह तक रहने के बावजूद पर्व का पालन उदयातिथि के अनुसार 14 सितंबर को किया जाएगा।
महाराष्ट्र से देशव्यापी जनोत्सव तकगणेश पूजा की परंपरा प्राचीन है लेकिन महाराष्ट्र में इसे सार्वजनिक और व्यापक सामाजिक उत्सव का स्वरूप अपेक्षाकृत आधुनिक दौर में मिला। मराठा शासन और पेशवा काल में गणेश आराधना को विशेष महत्व प्राप्त था। बाद में सार्वजनिक गणेशोत्सव को व्यापक स्वरूप देने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा।
1893 में पुणे में तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य धार्मिक आयोजन को सामाजिक एकता, जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना के मंच के रूप में विकसित करना था। ब्रिटिश शासन के दौर में बड़े राजनीतिक जमावड़ों पर कई तरह की पाबंदियां थीं। ऐसे समय में धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाने का माध्यम बने।
सार्वजनिक गणेशोत्सव ने महाराष्ट्र में सामूहिक भागीदारी और राष्ट्रवादी चेतना को मजबूत किया। बाद के वर्षों में इसकी लोकप्रियता महाराष्ट्र से बाहर भी फैलती गई। आज मुंबई, पुणे, नागपुर, हैदराबाद, बेंगलुरु, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई सहित देश के अनेक शहरों में बड़े सार्वजनिक आयोजन होते हैं।
’भारतीय प्रवासी समुदाय के विस्तार के साथ गणेशोत्सव दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, मलेशिया और मॉरीशस सहित अनेक देशों में भारतीय समुदाय गणेश चतुर्थी पर पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता है। विदेशों में यह पर्व भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है।
दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक प्रतीक मिलते हैं। इंडोनेशिया सहित कई देशों में गणेश की ऐतिहासिक प्रतिमाएं भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव के पुराने प्रसार की ओर संकेत करती हैं। हालांकि इन क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी भारत जैसी एकरूप परंपरा में मनाई जाती रही हो, ऐसा कहना उचित नहीं होगा।
क्यों हैं गणपति प्रथम पूज्य? –भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने को लेकर पुराणों और लोकपरंपराओं में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें गणेश और उनके बड़े भाई कार्तिकेय से जुड़ी कथा सबसे प्रसिद्ध है। कथानुसार एक बार दोनों भाइयों के बीच श्रेष्ठता को लेकर प्रश्न उठा। भगवान शिव ने कहा कि जो पूरे संसार की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार होकर निकल पड़े। गणेश का वाहन मूषक था। उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए माता-पिता की परिक्रमा की और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही संपूर्ण संसार हैं।
गणेश की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का वर दिया। धार्मिक परंपरा में यह कथा शक्ति और गति के मुकाबले बुद्धि और विवेक की महत्ता का प्रतीक मानी जाती है। इसका संदेश है कि हर चुनौती का समाधान केवल शारीरिक सामर्थ्य या गति से नहीं बल्कि सूझबूझ से भी संभव है।
गणेश के स्वरूप में छिपे जीवन-संदेशभगवान गणेश का स्वरूप प्रतीकों से समृद्ध माना जाता है। उनका विशाल मस्तक व्यापक चिंतन, छोटी आंखें एकाग्रता और बड़े कान अधिक सुनने की क्षमता का प्रतीक माने जाते हैं। उनकी सूंड सक्रियता और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का संकेत देती है।
विशाल उदर को जीवन में मिलने वाली अच्छी-बुरी परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करने और उन्हें पचाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। इसी कारण उन्हें ‘लंबोदर’ कहा जाता है। उनका एक टूटा हुआ दांत उन्हें ‘एकदंत’ नाम देता है। धार्मिक व्याख्याओं में इसे त्याग, ज्ञान और उद्देश्य के प्रति समर्पण का प्रतीक माना गया है।

गणेश का वाहन मूषक भी अपने भीतर प्रतीकात्मक अर्थ समेटे है। धार्मिक व्याख्या में मूषक को चंचल मन, इच्छाओं और भटकती प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। विशाल गणेश के साथ छोटे मूषक की कल्पना इस संदेश को व्यक्त करती है कि बुद्धि और विवेक से मन की चंचलता पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
चार भुजाओं में जीवन-दर्शनभगवान गणेश के चार हाथों में विभिन्न वस्तुओं का चित्रण मिलता है। इनमें पाश, अंकुश, मोदक और वरद अथवा अभय मुद्रा प्रमुख हैं। धार्मिक व्याख्याओं में पाश को आसक्ति पर नियंत्रण, अंकुश को मन को सही दिशा देने, मोदक को ज्ञान से मिलने वाले आनंद और वरदहस्त को कृपा एवं संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।
हालांकि गणेश के स्वरूप और हाथों में धारण की जाने वाली वस्तुओं की व्याख्या विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मिलती है। यह विविधता भारतीय धार्मिक प्रतीक परंपरा की विशेषता है।
गणेश जन्म और महाभारत से जुड़ी कथाएं -भगवान गणेश के जन्म को लेकर विभिन्न पुराणों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। सबसे लोकप्रिय कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसे द्वारपाल बनाया। जब भगवान शिव वहां पहुंचे तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। विवाद बढ़ने पर शिव ने उसका मस्तक अलग कर दिया। बाद में माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने हाथी का मस्तक लगाकर उसे पुनर्जीवन दिया। इसी कारण गणेश ‘गजानन’ कहलाए।
गणेश का संबंध महाभारत की रचना की प्रसिद्ध कथा से भी जुड़ा है। धार्मिक परंपरा के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की और भगवान गणेश ने उसे लिपिबद्ध किया। कथा के अनुसार गणेश ने लगातार लिखने की शर्त रखी, जबकि व्यास ने प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझने के बाद ही उसे लिखने की शर्त रखी। इस कथा ने गणेश को लेखन, ज्ञान और बुद्धि के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
श्रद्धा से सामाजिक सहभागिता तकआधुनिक समय में गणेशोत्सव का स्वरूप धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुका है। सार्वजनिक पंडालों में पूजा के साथ संगीत, नाटक, कला प्रदर्शनियां, सामाजिक जागरूकता अभियान और सेवा कार्य आयोजित किए जाते हैं। पर्व का एक नया पक्ष पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है। कई स्थानों पर मिट्टी की प्रतिमाओं, प्राकृतिक रंगों, कृत्रिम विसर्जन कुंडों और प्लास्टिक के सीमित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी का संदेश भी जुड़ रहा है।
गणेशोत्सव की खासियत यही है कि इसमें धर्म, लोकजीवन, कला और सामुदायिक सहभागिता एक साथ दिखाई देती है। घर में स्थापित छोटी प्रतिमा हो या सार्वजनिक पंडाल में विराजमान विशाल गणपति, दोनों के केंद्र में श्रद्धा और उत्सव की सामूहिक भावना रहती है।
लोकमान्य तिलक ने जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव को सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास किया था, वह परंपरा बदलते समय के साथ नए रूपों में आगे बढ़ रही है। आज यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का माध्यम भी बन गया है।
भगवान गणेश का स्वरूप भारतीय चिंतन में बुद्धि, विवेक, धैर्य, विनम्रता और मंगल का संदेश देता है। गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाला उत्सव इसी भाव को व्यक्त करता है कि जीवन में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत श्रद्धा और विवेक के साथ हो। ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष विघ्नों पर विजय, बुद्धि की प्रधानता और मंगल की कामना की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।

(साभार – हिंदुस्थान समाचार)

भारत की आजादी के बाद, देश के सामने एक बड़ा सवाल था: राष्ट्रभाषा क्या हो? इस सवाल को लेकर भारत के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। यह सिर्फ एक भाषा का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और पहचान से जुड़ा हुआ था। इस विवाद को सुलझाने में जिन दो महान शख्सियतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे थे के. एम. मुंशी और एन. जी. आयंगर। उनके प्रयासों से ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिल पाया, जिसकी याद में हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं। आइये आज आपको बताते हैं हिंदी कैसे बनी भारत की राजभाषा और क्यों मनाया जाता है 14 सितंबर को हिंदी दिवस। भारत की आजादी के बाद, देश के सामने एक बड़ा सवाल था: राष्ट्रभाषा क्या हो?

इस सवाल को लेकर भारत के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। यह सिर्फ एक भाषा का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और पहचान से जुड़ा हुआ था। इस विवाद को सुलझाने में जिन दो महान शख्सियतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे थे के. एम. मुंशी और एन. जी. आयंगर। उनके प्रयासों से ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिल पाया, जिसकी याद में हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं। आइये आज आपको बताते हैं हिंदी कैसे बनी भारत की राजभाषा और क्यों मनाया जाता है 14 सितंबर को हिंदी दिवस –

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद भाषा विवाद
1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद, भाषा को लेकर एक नया विवाद शुरू हुआ। उत्तरी भारत के कई सदस्यों का मानना था कि हिंदी ही राष्ट्रीय एकता की नींव बन सकती है और इसे राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए। वहीं, दक्षिणी राज्यों के सदस्यों को लगा कि हिंदी को उन पर थोपा जा रहा है। उनका तर्क था कि संविधान में अगले 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी जाए, ताकि वे हिंदी को सीखने और अपनाने के लिए तैयार हो सकें। इसके अलावा, कुछ मुस्लिम सदस्यों ने हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग की, जिसे उर्दू और देवनागरी दोनों लिपियों में लिखा जा सके।
मुंशी-आयंगर फॉर्मूला: एक ऐतिहासिक समझौता
इस भाषाई विवाद को खत्म करने के लिए 2 सितंबर, 1949 को संविधान सभा के सदस्य के. एम. मुंशी और एन. जी. आयंगर ने एक समझौता फॉर्मूला पेश किया। इसे ही मुंशी-आयंगर फॉर्मूला के नाम से जाना जाता है। 12 सितंबर, 1949 को जब एन. जी. आयंगर ने यह फॉर्मूला पेश किया, तो उन्होंने इसे “विभिन्न मतों के बीच एक कठिन समझौता” बताया।
इस फॉर्मूले के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:
• हिंदी को भारत संघ की राजभाषा और देवनागरी को उसकी आधिकारिक लिपि माना गया।
• अंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय पद्धति को स्वीकार करने का सुझाव दिया गया, न कि पारंपरिक देवनागरी अंकों को।
• यह तय हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, विधेयकों, अधिनियमों और अध्यादेशों की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी।
• सरकार का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए काम करे, ताकि वह भारत की मिली-जुली संस्कृति को अभिव्यक्त कर सके।

14 सितंबर को क्यों मनाते हैं हिंदी दिवस?
मुंशी-आयंगर फॉर्मूले को लेकर बहस 14 सितंबर, 1949 को शाम 6 बजे समाप्त हुई। इसी दिन संविधान सभा में हिंदी को देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। इस ऐतिहासिक निर्णय के सम्मान में, हिंदी के महत्व को बढ़ाने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए 14 सितंबर, 1953 को पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिंदी न केवल एक भाषा है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है।

(साभार – वेब दुनिया)

आ: धरती कितना देती है

-सुमित्रानंदन पंत

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।

औ’ जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।

मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।

देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी –
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।

निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।

तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है

यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर

रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की – जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।

गणेश चतुर्थी विशेष : दस दिनों ही क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी

हर साल भाद्रपद महीने की चतुर्थी आते ही चारों ओर ‘गणपति बप्पा मोरया’ की गूंज सुनाई देने लगती है। ढोल-नगाड़ों की थाप पर बप्पा का स्वागत होता है और लगातार 10 दिनों तक पूरे भारत में भक्ति का एक अद्भुत माहौल बना रहता है। लेकिन क्या कभी आपके मन में यह सवाल आया कि विघ्नहर्ता का यह उत्सव 10 दिनों तक ही क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे दो बेहद ख़ास पौराणिक कथाएं छिपी हैं।

महाभारत का लेखन और बप्पा का तप – इस उत्सव का सबसे मुख्य संबंध महाभारत के निर्माण से जुड़ा है। कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत जैसा महान और विशाल ग्रंथ लिखने के लिए एक ऐसे लेखक की आवश्यकता थी जो बिना रुके निरंतर लिख सके। इसके लिए उन्होंने बुद्धि के दाता भगवान गणेश से प्रार्थना की। गणपति जी लेखन के लिए तैयार तो हो गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि उनकी कलम एक पल के लिए भी नहीं रुकेगी। इस पर वेदव्यास जी ने भी चतुरता से एक शर्त जोड़ दी कि बप्पा हर श्लोक को समझकर ही लिखेंगे। इस प्रकार बप्पा जब कठिन श्लोकों का गूढ़ अर्थ समझते, उतने समय में वेदव्यास जी अगले श्लोक की रचना कर लेते।

यह कठिन लेखन कार्य लगातार 10 दिनों तक बिना किसी विश्राम के चलता रहा। लगातार लिखने के कारण बप्पा के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया। अनंत चतुर्दशी (दसवें दिन) को जब ग्रंथ पूरा हुआ, तब वेदव्यास जी ने बप्पा को शीतल जल से स्नान कराया ताकि उनके शरीर की तपन शांत हो सके। बस, तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि हम 10 दिनों तक बप्पा को घर में विराजित कर उनका ध्यान रखते हैं और दसवें दिन जल में विसर्जित कर उन्हें शीतलता प्रदान करते हैं।

कैलाश से धरती पर बप्पा का आतिथ्य – एक अन्य मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को बप्पा का प्राकट्य हुआ था। माना जाता है कि इन 10 दिनों के लिए गणपति जी महाराज अपने धाम कैलाश पर्वत से उतरकर सीधे पृथ्वी लोक पर अपने भक्तों के बीच रहने आते हैं। इन दस दिनों में भक्त बप्पा को अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी सेवा करते हैं, उन्हें मोदक और विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाते हैं तथा अपने दुख-दर्द साझा करते हैं। दसवें दिन बप्पा भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर पुनः कैलाश लौटने की तैयारी करते हैं, इसलिए भारी मन से लेकिन अगले वर्ष जल्दी आने के वादे के साथ उनका विसर्जन किया जाता है।

(साभार – वेब दुनिया)

एआई से 1980 की फोटो बना रहे हैं तो हो जाएं सावधान!

अमरेश द्विवेदी

आजकल सोशल मीडिया पर 1980 के दशक जैसी विंटेज फोटो बनाने का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। लोग अपनी सामान्य तस्वीरों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से पुरानी फिल्मों, कैमरा क्वालिटी और उस दौर के फैशन के अंदाज में बदलकर इंस्टाग्राम, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर रहे हैं। कुछ सेकंड में तैयार होने वाली ये तस्वीरें देखने में भले ही आकर्षक लगें, लेकिन इनके पीछे मौजूद डेटा प्राइवेसी और साइबर सिक्योरिटी के जोखिमों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

जरा सोचिए, आपने अपने मोबाइल से अपनी एक सामान्य फोटो चुनी और उसे किसी एआई ऐप या वेबसाइट पर अपलोड कर दिया। कुछ ही सेकंड में आपकी तस्वीर 1980 के दशक की पुरानी और विंटेज फोटो में बदल जाती है। तस्वीर पसंद आती है और आप उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। इसके बाद लाइक और कमेंट का इंतजार शुरू हो जाता है, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि जिस फोटो को आपने कुछ सेकंड पहले किसी एआई ऐप या वेबसाइट पर अपलोड किया था, वह अब कहां है? क्या वह तस्वीर केवल आपके मोबाइल में वापस आई है या उस सर्वर पर भी स्टोर हुई है? क्या ऐप उसे कुछ समय बाद डिलीट करता है या लंबे समय तक अपने सिस्टम में रख सकता है? क्या उस फोटो का इस्तेमाल सेवा को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है? और सबसे अहम सवाल- आपकी फोटो के साथ आपकी निजी जानकारी कितनी सुरक्षित है?

आज के डिजिटल दौर में चेहरे की तस्वीर केवल एक तस्वीर नहीं रह गई है। यह आपकी डिजिटल पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक लगातार विकसित हो रही है और कई ऑनलाइन सेवाएं फोटो और अन्य व्यक्तिगत डेटा के साथ काम करती हैं। यही वजह है कि किसी अनजान एआई ऐप या वेबसाइट पर अपनी फोटो अपलोड करने से पहले उसकी प्राइवेसी पॉलिसी और डेटा इस्तेमाल करने की शर्तों को समझना जरूरी है। अगर किसी सेवा की शर्तों में यह स्पष्ट नहीं है कि अपलोड की गई तस्वीर कितने समय तक रखी जाएगी, उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा या उसे किन पक्षों के साथ साझा किया जा सकता है, तो सावधानी बरतना बेहतर है।

एआई तकनीक ने तस्वीरों और वीडियो को बदलना बेहद आसान बना दिया है। इसी तकनीक का गलत इस्तेमाल करके डीपफेक भी बनाए जा सकते हैं। किसी व्यक्ति के चेहरे को दूसरी तस्वीर या वीडियो में लगाकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लग सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एआई ऐप पर फोटो अपलोड करते ही आपकी तस्वीर डीपफेक बन जाएगी। लेकिन इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आपकी तस्वीरों की संख्या जितनी ज्यादा होगी, उनका गलत इस्तेमाल किए जाने का जोखिम भी बढ़ सकता है। खासकर ऐसी तस्वीरों को लेकर ज्यादा सावधानी जरूरी है जिनमें चेहरा साफ दिखाई देता हो।

साइबर सुरक्षा का खतरा केवल फोटो अपलोड करने तक सीमित नहीं है। कई बार लोग सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे किसी ट्रेंड के पीछे भागते हुए अनजान लिंक पर क्लिक कर देते हैं और फिर किसी ऐप को जरूरत से ज्यादा परमिशन दे देते हैं। अगर कोई ऐप फोटो एडिट करने के नाम पर कैमरा, गैलरी, कॉन्टैक्ट्स या अन्य संवेदनशील जानकारी तक पहुंच मांग रहा है, तो एक बार जरूर सोचें कि उसे वास्तव में उस परमिशन की जरूरत क्यों है। हर परमिशन खतरनाक नहीं होती। उदाहरण के लिए, फोटो एडिटिंग ऐप को किसी तस्वीर तक पहुंच की जरूरत हो सकती है। लेकिन अगर किसी साधारण ऐप की मांग उसकी वास्तविक जरूरत से मेल नहीं खाती, तो परमिशन देने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।

फर्जी वेबसाइट से बचना भी जरूरी

साइबर अपराधी अक्सर वायरल ट्रेंड का फायदा उठाते हैं। किसी लोकप्रिय एआई फोटो ट्रेंड के नाम पर फर्जी वेबसाइट या ऐप तैयार किया जा सकता है और लोगों को वहां अपनी तस्वीर या व्यक्तिगत जानकारी अपलोड करने के लिए आकर्षित किया जा सकता है। कुछ मामलों में फर्जी वेबसाइटें यूजर से इंस्टाग्राम, फेसबुकया ईमेल का पासवर्ड डालने के लिए भी कह सकती हैं। यह बेहद खतरनाक हो सकता है। किसी एआई फोटो टूल को इस्तेमाल करने के लिए अगर आपसे सोशल मीडिया का पासवर्ड मांगा जा रहा है, तो तुरंत रुकें और वेबसाइट की विश्वसनीयता की जांच करें। अनजान लिंक पर लॉगिन जानकारी दर्ज करना साइबर अपराधियों को आपका अकाउंट सौंपने जैसा हो सकता है।

एआई ट्रेंड अपनाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

1980 के दशक की विंटेज फोटो बनाना अपने आप में गलत नहीं है। एआई का इस्तेमाल मनोरंजन और क्रिएटिविटी के लिए किया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि इसका इस्तेमाल समझदारी और सावधानी के साथ किया जाए। ऐप या वेबसाइट किस कंपनी की है, इसकी जानकारी जांचें। उसकी प्राइवेसी पॉलिसी जरूर पढ़ें। देखें कि आपकी फोटो कितने समय तक स्टोर की जा सकती है। यह समझें कि कंपनी आपके डेटा का इस्तेमाल किस उद्देश्य से करती है। अनजान या संदिग्ध ऐप को जरूरत से ज्यादा परमिशन न दें। फर्जी वेबसाइट पर इंस्टाग्राम, फेसबुक या ईमेल का पासवर्ड कभी न डालें। ऐप डाउनलोड करने से पहले उसके डेवलपर और रिव्यू की जांच करें। बेहद निजी या संवेदनशील तस्वीरें किसी अनजान एआई प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने से बचें। सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें सार्वजनिक करने से पहले प्राइवेसी सेटिंग्स की समीक्षा करें। किसी भी वायरल लिंक पर आंख बंद करके क्लिक न करें।

एक छोटी सी लापरवाही बन सकती है बड़ी समस्या

डिजिटल दुनिया में सबसे बड़ा खतरा अक्सर तकनीक नहीं, बल्कि लापरवाही होती है। हम कई बार किसी ट्रेंड को देखकर बिना सोचे-समझे ऐप इंस्टॉल कर लेते हैं, फोटो अपलोड कर देते हैं या किसी लिंक पर क्लिक कर देते हैं। एक तस्वीर अपलोड करने से तुरंत कोई साइबर अपराध हो जाएगा, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन अपनी डिजिटल पहचान और निजी डेटा को लेकर सावधानी बरतना आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।

एआई हमारे लिए एक उपयोगी और शक्तिशाली तकनीक है। यह तस्वीरों को नया रूप दे सकती है, पुराने दौर की यादें वापस ला सकती है और मनोरंजन के नए तरीके दे सकती है। लेकिन इसका इस्तेमाल करते समय यह याद रखना जरूरी है कि हर ऑनलाइन सुविधा के साथ डेटा सुरक्षा की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

इसलिए अगली बार जब कोई 1980 की विंटेज फोटो वाला ट्रेंड आपके सामने आए, तो तस्वीर बनाने से पहले कुछ सेकंड रुककर जरूर सोचें—क्या यह ऐप भरोसेमंद है? मेरी फोटो कहां जाएगी? उसे कितने समय तक रखा जाएगा? और मैं अपनी निजी जानकारी किसके साथ साझा कर रहा हूं?

ट्रेंड कुछ दिनों में बदल जाएगा, लेकिन आपकी डिजिटल पहचान लंबे समय तक आपके साथ रहेगी। इसलिए एआई का इस्तेमाल करें, लेकिन अपनी प्राइवेसी और सुरक्षा को नजरअंदाज करके नहीं।याद रखें-डिजिटल दुनिया में आपकी पहचान ही आपकी सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति है।

(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)

इंडोनेशिया में गूंज रहा गणपति बप्पा का नाम

-ज्वालामुखी के किनारे 700 साल से विराजमान विघ्नहर्ता

गणेश चतुर्थी आते ही भारत में हर तरफ गणपति बप्पा की धूम देखने को मिलती है। मंदिरों से लेकर घरों और पंडालों तक गणेश जी की पूजा होती है। लेकिन, भगवान गणेश की आस्था सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। हजारों किलोमीटर दूर इंडोनेशिया में भी गणेश जी को ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि से जोड़कर पूजा जाता है। वहां एक ऐसी जगह भी है, जो गणेश भक्तों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। यहां भगवान गणेश की एक प्रतिमा ज्वालामुखी के किनारे विराजमान है और लोगों की मान्यता है कि गणेश जी उन्हें ज्वालामुखी के खतरे से बचाते हैं। यह अनोखी प्रतिमा इंडोनेशिया के पूर्वी जावा में स्थित माउंट ब्रोमो पर है। माउंट ब्रोमो एक सक्रिय ज्वालामुखी है और अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं के लिए भी दुनियाभर में मशहूर है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा करीब 700 साल पुरानी है और इसे इस इलाके में रहने वाले तेंगर समुदाय के पूर्वजों ने स्थापित किया था। इस क्षेत्र में गणेश पूजा और हिंदू परंपराओं की जड़ें सदियों पुरानी हैं।
माउंट ब्रोमो पर गणेश जी की यह प्रतिमा यहां रहने वाले लोगों की विश्वास का प्रतीक है। स्थानीय लोग मानते हैं कि गणेश जी इस खतरनाक ज्वालामुखी से आसपास के गांवों की रक्षा करते हैं। इसलिए यहां भगवान गणेश को एक तरह से संरक्षक के रूप में भी देखा जाता है। भक्त यहां फूल, फल और अन्य सामग्री चढ़ाकर पूजा-अर्चना करते हैं और इलाके की खुशहाली की कामना करते हैं। यह आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।
इंडोनेशिया में हिंदू संस्कृति का इतिहास बहुत पुराना है। भले ही आज देश की आबादी में हिंदुओं की संख्या कम है, लेकिन हिंदू धर्म और संस्कृति का असर देश के कई हिस्सों में साफ दिखाई देता है। खासकर बाली और जावा के कुछ इलाकों में मंदिर, धार्मिक परंपराएं और हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा हैं। तेंगर समुदाय भी ऐसी ही पुरानी परंपराओं को बचाकर रखे हुए है।
इंडोनेशिया के पर्यटन विभाग के अनुसार, ब्रोमो इलाके के कई स्थानीय लोग हिंदू मान्यताओं को मानते हैं और ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित हिंदू परंपरा के देवताओं की पूजा करते हैं। माउंट ब्रोमो करीब 800 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 2,392 मीटर है। यहां का विशाल रेत का मैदान, ज्वालामुखी का धुआं और सूर्योदय का नजारा दुनिया भर से लोगों को अपनी तरफ खींचता है।
इंडोनेशिया दुनिया के सबसे ज्यादा ज्वालामुखी वाले देशों में शामिल है। यह देश प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में स्थित है, जहां भूकंप और ज्वालामुखी गतिविधियां लगातार होती रहती हैं। ऐसे में माउंट ब्रोमो जैसे सक्रिय ज्वालामुखी के बिल्कुल करीब गणेश जी की प्रतिमा का होना स्थानीय लोगों की आस्था को और भी खास बनाता है। लोगों के लिए गणेश प्रतिमा मुश्किल हालात में विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है।

बेटियों को फुटबॉल के मैदान तक पहुंचाने का अभियान चला रही बांकुड़ा की भारती मुड़ी

कोलकाता । एक दिन अखबार में छपी फुटबॉल प्रतियोगिता की छोटी-सी खबर ने एक बच्ची के मन में सवाल पैदा किया। बच्ची ने अपनी मां से पूछा- “मां, लड़कियां भी फुटबॉल खेलती हैं?” मां ने उस सवाल को सिर्फ जवाब देकर खत्म नहीं किया, बल्कि उसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। भारती ने इसी जुनून को 17 वर्षों से संभालकर रखा है और गांव की बेटियों को फुटबॉल के मैदान तक पहुंचाने का अपना अभियान आज भी जारी रखा है।
यह कहानी बांकुड़ा जिले के डोमुरुमी गांव की भारती मुड़ी की है। वर्ष 2009 में बेटी तानिया मुड़ी के सवाल से शुरू हुआ उनका फुटबॉल से जुड़ाव आज गांव और आसपास की अनेक बच्चियों के लिए उम्मीद बन चुका है। भारती पिछले करीब 17 वर्षों से लड़कियों को बिना किसी शुल्क के फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रही हैं।
भारती मुड़ी ने बताया कि वर्ष 2009 में उनकी बेटी तानिया ने एक अखबार में पढ़ा था कि किसी लड़की को फुटबॉल प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला है। खबर पढ़ने के बाद तानिया ने अपनी मां से कहा कि मां, देखो, लड़कियां भी फुटबॉल खेलती हैं। बेटी की बात भारती के मन में ऐसी बसी कि उन्होंने तय कर लिया कि उनके गांव की लड़कियां भी फुटबॉल खेलेंगी।
उन्होंने बेटी से कहा कि फुटबॉल टीम बनाने के लिए कम से कम 10 लड़कियों की जरूरत होगी। इसके बाद भारती आसपास के गांवों और मोहल्लों में गईं। उन्होंने बच्चियों और उनके परिवारों से बात की और लड़कियों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित करना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। ग्रामीण इलाके में लड़कियों के लिए खेल की सुविधाएं सीमित थीं। फुटबॉल को लेकर भी परिवारों में वह माहौल नहीं था, जो शहरों में देखने को मिलता है। लेकिन भारती पीछे नहीं हटीं। धीरे-धीरे कुछ बच्चियां उनके साथ जुड़ीं और मैदान में प्रशिक्षण शुरू हुआ। समय के साथ बच्चियों की संख्या बढ़ती गई और भारती का यह प्रयास एक निरंतर अभियान में बदल गया।
सबसे खास बात यह रही कि भारती ने इस प्रशिक्षण के लिए कभी बच्चियों से फीस नहीं ली। सीमित साधनों के बीच उन्होंने अपने स्तर पर लड़कियों को फुटबॉल की बुनियादी तकनीक, खेल की समझ और मैदान पर अनुशासन सिखाने का काम जारी रखा।
भारती के लिए फुटबॉल केवल एक खेल नहीं है। उनके लिए यह गांव की बेटियों को आत्मविश्वास देने का जरिया है। वह चाहती हैं कि ग्रामीण इलाके की लड़कियां भी मैदान पर उतरें, अपनी प्रतिभा दिखाएं और अपने लिए एक नई पहचान बनाएं।
आज जब बड़े शहरों में खिलाड़ियों के लिए आधुनिक अकादमियां, प्रशिक्षक और तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहीं डोमुरुमी जैसे ग्रामीण इलाके में भारती का प्रयास अलग दिखाई देता है। न कोई बड़ी अकादमी, न प्रशिक्षण के नाम पर फीस और न ही किसी बड़े संस्थान का सहारा। इसके बावजूद उन्होंने करीब 17 वर्षों तक बच्चियों को फुटबॉल से जोड़े रखा।
सोशल मीडिया पर सामने आए उनके वीडियो ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। इनमें भारती को साड़ी पहनकर मैदान में बच्चियों को फुटबॉल का अभ्यास कराते देखा जा सकता है। मैदान उनके लिए सिर्फ खेल की जगह नहीं, बल्कि उन बेटियों के सपनों की जगह है, जिन्हें वह वर्षों से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
एक अखबार में फुटबॉल खेलती लड़की की तस्वीर और बेटी के मासूम सवाल का जवाब भारती मुड़ी ने शब्दों से नहीं, बल्कि मैदान में बच्चियों को उतारकर दिया।
डोमुरुमी की भारती मुड़ी की कहानी इस बात की मिसाल है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक मां का संकल्प, एक बेटी का सवाल और गांव की कुछ बच्चियों का जुनून भी एक लंबी कहानी की शुरुआत कर सकता है।

गणेश चतुर्थी पर बनाएं स्वादिष्ट मोदक

1. खजूर-ड्राई फ्रूट्स मोदक
इस मोदक में आपको अलग से चीनी डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके लिए आप खजूर को पीसकर उसमें बारीक कटे हुए बादाम, काजू और अखरोट मिला लें। अब मिश्रण को मोदक के सांचे में भरकर मोदक का शेप दे दें। आपका खजूर-ड्राई फ्रूट्स वाला मोदक तैयार है।
2. नारियल-खजूर मोदक
आप चाहें तो नारियल और खजूर वाला मोदक भी बना सकती हैं। इसके लिए कद्दूकस किए नारियल को थोड़ा सा भूनकर उसमें खजूर का पेस्ट मिला दें और मिश्रण को मोदक का आकार दें।
3. तिल-ड्राई फ्रूट्स मोदक
अगर आप कुछ अलग बनाना चाहती हैं तो तिल वाले मोदक भी बना सकती हैं। इसके लिए तिल को थोड़ा सा भूनकर पीस लें और इसमें कटे हुए काजू-बादाम मिला दें। इसकी बाइंडिंग के लिए थोड़ा खजूर का पेस्ट डालें और सांचे से मोदक तैयार कर लें।
4. मखाना मोदक
मखानर तो हम सभी खाते हैं, लेकिन अगर आप इससे मोदक बनाना चाहती हैं, तो यह भी एक अच्‍छा ऑप्‍शन रहेगा। इसके ल‍िए मखाने को भूनकर पीस लें। अब इसमें ड्राई फ्रूट्स का पाउडर और खजूर का पेस्ट मिलाएं, फिर इस मिश्रण को मोदक के सांचे में दबाकर निकाल लें।
5. बादाम मोदक
बादाम का मोदक भी खूब पसंद किया जाता है। इसका स्‍वाद भी सबसे अच्‍छा होता है। इसे बनाने के लिए बादाम को पीसकर उसमें थोड़ा दूध डालकर सॉफ्ट मिश्रण तैयार कर लें। अब इसमें चीनी की जगह खजूर का पेस्ट मिलाएं और लो फ्लेम पर पकाकर मोदक बना लें।
6. काजू मोदक
आपने आजतक काजू कतली ही खाई होगी, लेक‍िन इस बार आप बप्‍पा के ल‍िए काजू का मोदक भी बना सकती हैं। इसके ल‍िए काजू को पीसकर पाउडर बना लें और उसमें थोड़ा दूध डालकर मिश्रण तैयार कर लें। मिठास के लिए खजूर का पेस्ट मिला दें, फिर इसे मोदक के सांचे में भर दें। आपका काजू मोदक तैयार है।
7. कोकोनट-ड्राई फ्रूट्स मोदक
नारियल और ड्राई फ्रूट्स मोदक भी आप ट्राई कर सकती हैं। इसके ल‍िए नार‍ियल और ड्राई फ्रूट्स को थोड़ा सा भूनकर पाउडर बना लें और इसके बाद इसमें खजूर का पेस्ट मिला दें। जब मिश्रण तैयार हो जाए तो मोदक बना लें।
8. कोको मोदक
अगर आपको चॉकलेट फ्लेवर पसंद है तो आप कोको पाउडर वाला मोदक भी बना सकती हैं। इसके लिए मखाने या ड्राई फ्रूट्स के पाउडर में बिना चीनी वाला कोको पाउडर और खजूर का पेस्ट मिला लें। इसके बाद मोदक बना लें।
9. पीनट मोदक
अगर आपके पास काजू या बादाम नहीं है तो आप पीनट मोदक भी बना सकती हैं। इसके लिए भुनी हुई मूंगफली को पीसकर उसका पाउडर बनाएं। अब इसमें खजूर का पेस्ट मिलाकर अच्छी तरह गूंथ लें। इसके बाद मोल्‍ड में डालकर मोदक बना लें।

10. अंजीर-ड्राई फ्रूट्स मोदक
अंजीर वाले मोदक भी लोगों को खूब अच्‍छे लगते हैं। हालांकि, यह आपको थोड़ा महंगा पड़ सकता है, लेकि‍न स्‍वाद जबरदस्‍त होता है। इसे बनाने के लिए सूखे अंजीर को थोड़ी देर भिगोकर पीस लें। अब इसमें कटे हुए बादाम और काजू मिलाएं और इस मिश्रण को मोदक का शेप दे दें।