Friday, November 6, 2026
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9 नवंबर से कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती

-एनपीपीए ने 543 ब्रांडों की दवाओं का शुल्क बदला
नयी दिल्ली। कैंसर के इलाज पर होने वाला लाखों रुपये का खर्च अब कई मरीजों और उनके परिवारों के लिए कुछ हद तक कम हो सकेगा। केंद्र सरकार के फैसले के बाद 9 नवंबर से देशभर में कैंसर की कई जरूरी दवाएं पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो जाएंगी। दवाओं की कीमतों में इतनी बड़ी कटौती की गई है कि कुछ दवाएं 80 से 90 फीसदी तक सस्ती हो गई हैं। सरकार के तहत काम करने वाली नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए ) ने कैंसर की दवाओं के 543 ब्रांडों की कीमतों में संशोधन किया है। इसके साथ ही सरकार ने 137 एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है। माना जा रहा है कि इससे बाजार में मरीजों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध होंगी और इलाज का बोझ कुछ हद तक घटेगा। नयी कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी। कई ऐसी दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल कैंसर के इलाज में बड़े पैमाने पर किया जाता है और उनके दाम में कटौती की गई है। अनारजोल की कीमत 695।76 रुपये से घटाकर 73 रुपये कर दी गई है। अजासाइटिन इंजेक्शन का दाम 6,337 रुपये से घटकर 1,495 रुपये हो गया है। बेवासिजाब इंजेक्शन की कीमत 21,767 रुपये से घटाकर 5,930 रुपये कर दी गई है। डेसानट 20 का दाम 2,812 रुपये से घटकर 1,085 रुपये रह गया है। एनूटा की कीमत 6,578 रुपये से घटाकर 2,232 रुपये कर दी गई है। सरकार का कहना है कि ट्रेड मार्जिन पर सीमा तय करने और कीमतों की समीक्षा का मकसद मरीजों तक जरूरी दवाएं अधिक किफायती दर पर पहुंचाना है। नई दरें लागू होने के बाद देशभर में कैंसर उपचार से जुड़ी कई प्रमुख दवाएं पहले की तुलना में काफी कम कीमत पर उपलब्ध होंगी।

केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 3 प्रतिशत बढ़ा

-48 लाख कर्मचारियों, 68 लाख पेंशनर्स को फायदा
– नयी दरें 1 जुलाई, 2026 से लागू

नयी दिल्ली । केंद्र सरकार के 48 लाख कर्मचारियों और 68 लाख पेंशनर्स की दिवाली थोड़ी और रोशन हो गई है। सरकार ने त्योहार से ठीक 10 दिन पहले उनके महंगाई भत्ते में 3 प्रतिशत बढ़ोतरी कर दी है। ताजा बढ़ोतरी के बाद कर्मचारियों और पेंशनर्स का महंगाई भत्ता यानी डीए 63 प्रतिशत हो जाएगा। सरकार इस पर 10 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगी। बुधवार 28 अक्टूबर को कैबिनेट ने नई दरें 1 जुलाई, 2026 से लागू करने को मंजूरी दी है। पिछले महीनों का एरियर भी दिवाली से पहले खाते में भेजा जाएगा। अप्रैल में सरकार ने डीए में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। इसके साथ ही महंगाई भत्ता 60% पर पहुंच गया था। अगर किसी कर्मचारी की बेसिक 18,000 रुपये है, तो 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी के हिसाब से हर महीने 540 रुपये का इजाफा होगा। अगर किसी वरिष्ठ अधिकारी की बेसिक सैलरी 56,100 रुपये है, तो उनकी मासिक तनख्वाह में लगभग 1,683 रुपये की सीधी बढ़ोतरी होगी। केंद्र सरकार हर साल कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए डीए और डीआर में दो बार संशोधन करती है। पहला संशोधन आमतौर पर जनवरी से और दूसरा जुलाई से प्रभावी होता है। सरकार ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर महंगाई का आकलन करती है और उसी अनुपात में भत्ते बढ़ाने का निर्णय लेती है।

विजयादशमी पर भरें मनोहारी स्वाद

 गुजराती फाफड़ा

 

सामग्री – 2 कप (200 g) बेसन, छना हुआ, 1/2 छोटा चम्मच अजवाइन, हथेलियों के बीच हल्का मसला हुआ, 1/4 छोटा चम्मच पापड़ खार, या विकल्प के रूप में 1/4 छोटा चम्मच बेकिंग सोडा, 1/2 छोटा चम्मच नमक, या स्वादानुसार, आटे के लिए 2 बड़े चम्मच तेल, और तलने के लिए तेल, लगभग 1/2 कप पानी,छिड़कने के लिए चुटकी भर कुटी काली मिर्च या काला नमक (वैकल्पिक)।

विधि -पापड़ खार (या बेकिंग सोडा) और नमक को पानी में घोल लें। एक चौड़े बर्तन में बेसन और अजवाइन मिलाएं, 2 बड़े चम्मच तेल डालें और उंगलियों से मसलकर मिलाएं। थोड़ा-थोड़ा पानी डालते हुए नरम लेकिन सख्त आटा गूंथें जो हाथों में न चिपके। तेल लगी उंगलियों की गांठों से आटे को 4 से 5 मिनट तक दबाकर गूंथें जब तक वह चिकना और लचीला न हो जाए, फिर ढककर 15 मिनट आराम दें। मध्यम आंच पर तलने के लिए तेल गरम करें। आटे से नींबू के आकार की लोई तोड़ें। लोई को हल्के तेल लगे लकड़ी के तख्ते पर रखें। हथेली के निचले हिस्से से दबाते हुए एक मज़बूत झटके में अपने से दूर धकेलें, ताकि वह पतली, लंबी पट्टी में खिंच जाए। पट्टी को चपटे चाकू या पलटे से धीरे से उठाकर गरम तेल में डालें। 1 से 2 मिनट तक, एक बार पलटते हुए, कुरकुरा और हल्का सुनहरा होने तक तलें। भूरा न होने दें। जाली या पेपर टॉवल पर निकालें और चाहें तो काली मिर्च या काला नमक छिड़कें। बाकी आटे के साथ यही दोहराएं।

टिप्स: खींचने का तरीका आने में कुछ प्रयास लगते हैं। यदि पट्टियाँ टूटें, तो आटे में थोड़ा और पानी डालकर गूंथें। यदि वे पतली न खिंचें, तो तख्ते पर थोड़ा और तेल लगाएं।

 

चमचम

सामग्री – 1 कप छेना,1 कप चीनी, 3 कप पानी,1/2 कप खोया / मावा, 1/4 कप नारियल का बुरादा, 1/4 चम्मच इलायची पाउडर, 5-6 केसर के धागे ।

विधि – सबसे पहले छेना को हाथों से मसल के चिकना कर लें। बाद में छोटे-छोटे गोले बना लें। फिर एक बर्तन में चीनी और पानी डालकर चाशनी बनाएं और फिर छेना के गोले डाल दें। लगभग 15 मिनट तक तेज गैस पर पकाएं। जब ठंडा हो जाए तब गोले को बीच से काटें। फिर खोया, इलायची और केसर भरें। अंत में नारियल का बुरादा लपेट कर परोसें।

इन 7 जगहों पर नहीं जलाया जाता रावण का पुतला

भारत में दशहरा यानी विजयदशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान राम की विजय की स्मृति में देश के अनेक हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। हालांकि, भारत की सांस्कृतिक विविधता ऐसी भी परंपराओं को संजोए हुए है, जहां दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। इन स्थानों पर रावण से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं, पारिवारिक संबंधों की कथाएं और धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और महाराष्ट्र तक ऐसे कई स्थान हैं, जहां रावण को अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। आइए जानते हैं देश के सात ऐसे स्थानों के बारे में। 1. बिसरख, उत्तर प्रदेश: रावण का ननिहाल मानी जाती है यह जगह
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्थित बिसरख गांव रावण से जुड़ी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसे रावण का ननिहाल माना जाता है। यहां रावण से संबंधित मंदिर और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। गांव के कुछ लोग रावण को विद्वान और भगवान शिव का भक्त मानते हैं। इसी आस्था के कारण यहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने की परंपरा अन्य स्थानों से अलग मानी जाती है। बिसरख की पहचान देश के उन चुनिंदा स्थानों में होती है, जहां रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को विशेष महत्व दिया जाता है।
2. मंदसौर, मध्य प्रदेश: रावण का ससुराल मानी जाती है यह नगरी
मध्य प्रदेश का मंदसौर रावण से जुड़ी एक अलग मान्यता के कारण प्रसिद्ध है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, मंदोदरी का संबंध इसी क्षेत्र से था। इसी वजह से मंदसौर को रावण का ससुराल भी कहा जाता है। यहां रावण की पूजा करने वाले लोग उसे केवल रामायण के युद्ध में पराजित हुए राजा के रूप में नहीं देखते, बल्कि मंदोदरी से उसके संबंध के कारण भी सम्मान देते हैं। स्थानीय परंपराओं में रावण के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाई देता है। हालांकि, इस मान्यता से जुड़ी कथाओं को स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

3. रावनग्राम, मध्य प्रदेश: दशहरे पर होती है रावण की पूजा

मध्य प्रदेश के रावनग्राम में भी रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। यहां दशहरे के अवसर पर रावण की पूजा किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोगों की आस्था में रावण का विशेष स्थान है और उसके पुतले के दहन के बजाय पूजा को महत्व दिया जाता है। यह परंपरा दर्शाती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण से जुड़े पात्रों को लेकर अलग-अलग लोकविश्वास विकसित हुए हैं। इन परंपराओं को समझने के लिए स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं को जानना जरूरी है।

4. जोधपुर, राजस्थान: रावण से जुड़ी है स्थानीय समुदायों की आस्था

राजस्थान के जोधपुर में भी रावण से जुड़ी धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। यहां कुछ समुदाय स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं और उसे अपना पूर्वज मानकर सम्मान देते हैं। इसी कारण इन समुदायों के बीच दशहरे पर रावण की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। जोधपुर में रावण से जुड़ी मान्यताएं राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता का एक उदाहरण हैं। यहां यह परंपरा इस बात को भी सामने लाती है कि किसी धार्मिक या पौराणिक पात्र को लेकर अलग-अलग समुदायों की धारणाएं एक जैसी नहीं होतीं।

5. काकिनाड, आंध्र प्रदेश: रावण के साथ होती है भगवान शिव की पूजा

आंध्र प्रदेश के काकिनाड में रावण से जुड़ा मंदिर प्रसिद्ध है। रावण को रामायण में भगवान शिव का परम भक्त बताया गया है और इसी रूप को यहां की कुछ धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व दिया जाता है। यहां रावण के साथ भगवान शिव की पूजा किए जाने का उल्लेख मिलता है। रावण की शिवभक्ति, उसकी विद्वत्ता और धार्मिक साधना से जुड़ी कथाएं इस परंपरा का आधार मानी जाती हैं। यह स्थान उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जहां दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले के दहन के बजाय उससे जुड़ी आस्था को महत्व दिया जाता है।

6. कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश: रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यता

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में भी रावण की पूजा से संबंधित लोकमान्यताओं का उल्लेख मिलता है। प्रचलित कथा के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी मान्यता के कारण कुछ स्थानीय लोगों के बीच रावण के प्रति श्रद्धा का भाव है। कहा जाता है कि यहां कुछ लोग रावण का पुतला जलाने से बचते हैं और उसकी पूजा को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, इस परंपरा का स्वरूप अलग-अलग स्थानों और समुदायों में भिन्न हो सकता है। इसलिए इसे पूरे कांगड़ा जिले की एक समान परंपरा नहीं माना जाना चाहिए।

7. गढ़चिरौली, महाराष्ट्र: आदिवासी समुदायों में रावण से जुड़ी मान्यताएं

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में कुछ आदिवासी समुदायों के बीच रावण और उसके पुत्र से जुड़ी अलग धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन समुदायों की परंपराओं में रावण को सम्मान देने और उसकी पूजा करने का भाव दिखाई देता है। इसी वजह से कुछ स्थानों पर दशहरे के दौरान रावण के पुतले का दहन करने के बजाय पूजा की जाती है। यह परंपरा भारत के आदिवासी समाजों की सांस्कृतिक विविधता और उनकी अपनी धार्मिक मान्यताओं को सामने लाती है। हालांकि, सभी आदिवासी समुदायों की मान्यताएं एक जैसी नहीं हैं।

दशहरे की परंपराएं बताती हैं भारत की सांस्कृतिक विविधता

दशहरा देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। अधिकांश स्थानों पर रावण दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जबकि कुछ क्षेत्रों में रावण से जुड़ी स्थानीय कथाओं, उसकी विद्वत्ता, शिवभक्ति या पारिवारिक संबंधों के कारण उसे सम्मान दिया जाता है। बिसरख, मंदसौर, जोधपुर और अन्य स्थानों की ये परंपराएं बताती हैं कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत कितनी विविध है। इन मान्यताओं को समझते समय स्थानीय इतिहास, लोककथाओं और समुदायों की आस्था के बीच अंतर को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

(साभार – खास खबर)

दशहरा पर दशहरी देने की परंपरा क्या है

आजकल दशहरी शब्द बहुत प्रचलन में है। यह परंपरा से उपजा शब्द है। विजयादशमी पर दशहरी देना उत्तर भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में निभाई जाने वाली एक पुरानी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा है। इसे स्थानीय बोलचाल में ‘दशहरी’ या ‘दशहरी भेंट’ कहा जाता है। अक्सर यह बच्चों को दी जाती है।

क्या होता है दशहरी देना?

दशहरा के दिन छोटे अपने से बड़ों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते हैं। बदले में बड़े बुजुर्ग छोटों को, विवाहित बेटियों, बहनों, भांजों और घर आए मेहमानों को उपहार, पान, मिठाई, शमी के पत्ते या कुछ नकद रुपए देते हैं। इसी दिए जाने वाले नेग या उपहार को दशहरी कहा जाता है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में कार्यस्थल के सहयोगियों, कारीगरों और घरेलू सहायकों को भी विजयादशमी के शुभ अवसर पर उपहार या बोनस के रूप में दशहरी देने का रिवाज है।

दशहरी का धार्मिक और सामाजिक महत्व

आशीर्वाद और समृद्धि: दशहरी को केवल पैसा या उपहार नहीं, बल्कि बड़े-बुजुर्गों के शुभ आशीर्वाद और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि विजयादशमी पर मिला नेग घर में समृद्धि लाता है।

पारिवारिक संबंधों में मधुरता: दशहरा उत्सव के दिन घर की बेटियों और बहनों को दशहरी देकर सम्मानित किया जाता है, जिससे रिश्तों में प्रेम और मिठास बनी रहती है।

सोना पत्ती और आरोग्य का प्रतीक: कुछ स्थानों पर शमी वृक्ष के पत्तों को ‘सोना’ मानकर एक-दूसरे को भेंट किया जाता है और साथ में दशहरी दी जाती है, जो विजय, सुख और आरोग्य की कामना को दर्शाता है।

बुराई पर अच्छाई का जश्न: रावण वध और धर्म की विजय के इस पावन पर्व पर अपनी खुशी को अपनों के साथ साझा करने का यह एक सुंदर माध्यम है।

 

रावण दहन का प्रचलन कब से हुआ प्रारंभ

-जानिए सबसे पहले किसने जलाया पुतला

प्रतिवर्ष हिंदू मास आश्‍विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को रावण दहन करके दशहरा मनाया जाता है। रावण दहन कब से किया जा रहा है और क्या है इसका इतिहास? रावण दहन की परंपरा का इतिहास काफी दिलचस्प है और धार्मिक मान्यताओं तथा ऐतिहासिक संदर्भों दोनों में इसके अलग-अलग पहलू देखने को मिलते हैं।

  1. पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विजय उत्सव की शुरुआत: त्रेतायुग में भगवान श्री राम द्वारा आश्विन शुक्ल दशमी को लंकापति रावण का वध करने की खुशी में पहली बार यह उत्सव मनाया गया था। यह पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।

प्रतीकात्मक पुतला दहन: प्राचीन समय में मिट्टी या लकड़ी से रावण की छोटी आकृतियां बनाकर दहन करने की परंपरा थी।

रामलीला का प्रभाव: 16वीं-17वीं शताब्दी में स्वामी रामानंद और गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस की रचना के बाद उत्तर भारत में ‘रामलीला’ का प्रचलन शुरू हुआ।

विशाल पुतला दहन: 19वीं शताब्दी के बाद रामलीला के अंतिम दिन विजयादशमी की कथा को जीवंत करने के लिए घास-फूस, कागज और पटाखों से विशाल पुतले बनाने और जलाने का रिवाज शुरू हुआ।

  1. आधुनिक भारत में रावण दहन की शुरुआत

सामूहिक परंपरा: किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा पुतला जलाने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं है। यह रामलीला मंडलियों और स्थानीय रियासतों द्वारा शुरू की गई एक सामूहिक सांस्कृतिक परंपरा है।

विस्थापन और सार्वजनिक रूप : 1947-48 के विभाजन के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थी परिवारों के आगमन के साथ यह आयोजन बड़े सार्वजनिक सांस्कृतिक पर्व के रूप में स्थापित हुआ।\

प्रमुख शहर व शुरुआत वर्ष :

रांची 1948: आधुनिक भारत में बड़े स्तर पर पहला रावण दहन पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों द्वारा किया गया।

दिल्ली 1953: ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 अक्टूबर 1953 को पहली बार कपड़ों से बने रावण का दहन हुआ।

पटना 1955: गांधी मैदान में इसकी नींव 1954 में पड़ी और 1955 से विस्थापित सिख परिवारों द्वारा आयोजन शुरू किया गया।

नागपुर: यहाँ पहली बार लगभग 35 फीट ऊंचे पुतले को रस्सियों और सीढ़ियों की मदद से खड़ा कर दहन किया गया था।

  1. क्षेत्रीय विविधताएं और उत्सव के रूप

उत्तर भारत

हिमाचल प्रदेश (कुल्लू): हफ्ते भर चलने वाले इस उत्सव में पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ ग्राम देवताओं की झांकियां निकाली जाती हैं और रघुनाथ जी की वंदना से पर्व का शुभारंभ होता है।

पंजाब: 9 दिन के उपवास के बाद पारंपरिक मिठाइयों व उपहारों से अतिथियों का स्वागत किया जाता है और मैदानों में मेले व रावण दहन का आयोजन होता है।

उत्तर प्रदेश (सहारनपुर): शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ पर विशाल आश्विन मेला लगता है और शिवालिक घाटी माता के जयकारों से गूँज उठती है।

पूर्वी भारत (दुर्गा पूजा)

बंगाल, ओडिशा और असम: यहाँ यह मुख्य रूप से दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। भव्य पंडालों में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर षष्ठी से दशमी तक विशेष पूजन होता है।

विशेष परंपराएं: विजयादशमी पर पुरुष ‘कोलाकुली’ (आलिंगन) करते हैं और महिलाएं ‘सिंदूर खेला’ कर देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।

दक्षिण भारत (द्रविड़ प्रदेश)

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक: यहाँ रावण दहन नहीं होता। नौ दिनों में तीन देवियों (3 दिन लक्ष्मी, 3 दिन सरस्वती और 3 दिन दुर्गा) का पूजन होता है। यह समय बच्चों के विद्यारंभ के लिए शुभ माना जाता है।

मैसूर का दशहरा (कर्नाटक): पूरे मैसूर महल को रोशनी से सजाया जाता है और अलंकृत हाथियों के साथ शहर में भव्य जुलूस निकाला जाता है।

पश्चिमी भारत

गुजरात: मिट्टी का अलंकृत ‘गरबो’ (घड़ा) देवी का प्रतीक माना जाता है। गरबा और डांडिया रास मुख्य आकर्षण हैं और इस अवसर पर आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है।

महाराष्ट्र: 9 दिन माँ दुर्गा की पूजा के बाद दशमी को ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना होती है। बच्चे विद्यारंभ के लिए पूजन करते हैं और यह दिन गृह-प्रवेश व खरीदारी के लिए शुभ मुहूर्त माना जाता है।

मध्य भारत

छत्तीसगढ़ (बस्तर): यहाँ दशहरा राम की विजय पर नहीं, बल्कि कुलदेवी माँ दंतेश्वरी को समर्पित है। यह पर्व पूरे 75 दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत ‘काछिन गादि’ से होकर ‘मुरिया दरबार’ व ‘ओहाड़ी पर्व’ पर समाप्त होती है।

उत्तर-पश्चिम भारत

जम्मू और कश्मीर: यहाँ 9 दिनों तक केवल जल पीकर कठिन व्रत रखा जाता है और झील के बीच स्थित प्रसिद्ध ‘माता खीर भवानी’ मंदिर के दर्शन करने की प्राचीन परंपरा है।

(साभार – वेबदुनिया)

दिवाली तक नहीं लगेगा यूपीआई पर चार्ज

नयी दिल्ली, एजेंसी । नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने का फैसला दिवाली के बाद तक टाल दिया है। एनपीसीआई ने मंगलवार को जारी आधिकारिक बयान में बताया कि यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने त्योहारों के सीजन को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है। अब यह शुल्क दिवाली के तुरंत बाद लागू किया जाएगा, हालांकि इसकी सटीक तारीख अलग से घोषित होगी। यह शुल्क सभी यूपीआई भुगतानों पर नहीं लगेगा, बल्कि तय शर्तों के तहत आने वाले कुछ कारोबारी लेनदेन पर ही लागू होगा। एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के बदले दुकानदार या कारोबारी को बैंक और पेमेंट प्रोसेसर को देना पड़ता है। इस शुल्क का इस्तेमाल भुगतान व्यवस्था से जुड़े अलग-अलग भागीदारों की लागत को पूरा करने और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने में किया जाता है। सरकार और एनपीसीआई ने स्पष्ट किया है कि एमडीआर न तो कोई टैक्स है और न ही सरकार या एनपीसीआई की ओर से वसूला जाने वाला शुल्क। छोटे दुकानदारों के लिए राहत की बात यह है कि मौजूदा क्यूआर कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपये तक का भुगतान स्वीकार करने वाले पात्र मर्चेंट शून्य-एमडीआर व्यवस्था के तहत बने रहेंगे। इसका मतलब है कि तय शर्तें पूरी करने वाले इन छोटे कारोबारियों से एमडीआर नहीं लिया जाएगा। सरकार का कहना है कि छोटे कारोबारियों को डिजिटल पेमेंट अपनाने में परेशानी न हो, इसलिए उनके लिए यह राहत जारी रखी गई है।

फ्रांस के सुपरमार्केट्स पर साइबर अटैक

-480 से ज्यादा दुकानों के फ्रिज 50 डिग्री तक गर्म
– खाना खराब हुआ, कई जगह आग लगी

पेरिस,एजेंसी। फ्रांस में सैकड़ों सुपरमार्केट्स के रेफ्रिजरेशन सिस्टम पर सोमवार को बड़ा साइबरअटैक हुआ। इससे 480 से ज्यादा दुकानों के फ्रिज और फ्रीजर का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैकरों ने कई स्टोर्स के रेफ्रिजरेशन सिस्टम को डीफ्रॉस्टिंग मोड में डाल दिया। इससे ताजा और फ्रोजन खाना खराब हो गया। कई स्टोर्स में आग भी लग गई। फ्रांस की बड़ी रिटेल कंपनियों ने इसे अब तक का ऐसा पहला और बेहद गंभीर हमला बताया।
साइबर हमले के बाद फ्रांस की रिटेल फेडरेशन ने बताया कि कुछ प्रभावित स्टोर फिर चलने लगे हैं लेकिन फ्रिजों को बंद रखा गया है। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने नेशनल साइबरसिक्योरिटी एजेंसी को जांच के आदेश दिए हैं। फ्रांस दूसरे यूरोपीय देशों के साथ मिलकर यह भी जांच कर रहा है कि वहां और कंपनियां प्रभावित हुई हैं या नहीं। पेरिस प्रॉसिक्यूटर ऑफिस ने इसे बड़े स्तर का हमला बताया। ऑफिस के मुताबिक, पूरे फ्रांस में कई बड़े फूड रिटेलर्स के इंटरनेट से जुड़े फ्रिजों को निशाना बनाया गया।
सुपरमार्केट में फ्रिज और फ्रीजर को आमतौर पर कंट्रोल पैनल से चलाया जाता है। ये पैनल पूरे स्टोर के ठंडक वाले सिस्टम को कंट्रोल करते हैं। इंटरनेट से जुड़े होने के कारण मेंटेनेंस करने वाली कंपनियां दूर बैठकर भी इनकी सेटिंग बदल सकती हैं। अगर कोई हैकर इस सिस्टम तक पहुंचने में कामयाब हो जाए, तो वह फ्रिज और फ्रीजर की सेटिंग बदल सकता है। ऐसा करने के लिए हैकर सिस्टम की सुरक्षा में मौजूद किसी कमजोरी का फायदा उठाता है। इस तरह वह फ्रिज और फ्रीजर की ठंडक कम कर सकता है या डीफ्रॉस्टिंग शुरू कर सकता है। डीफ्रॉस्टिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें फ्रिज या फ्रीजर में जमी बर्फ पिघलाई जाती है।
प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक, फ्रांस की साइबर सिक्योरिटी एजेंसी ने डेनमार्क की कंपनी डैनफॉस के सॉफ्टवेयर में एक कमजोरी की पहचान की है। इसी कंपनी के बनाए सिस्टम से सुपरमार्केट के फ्रिज और फ्रीजर कंट्रोल होते हैं।

रेलवे के 11.40 लाख कर्मचारियों को 78 दिन का दीपावली बोनस

नयी दिल्ली, एजेंसी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेलवे के 11.40 लाख अराजपत्रित कर्मचारियों के लिए 78 दिन के उत्पादकता आधारित बोनस को मंजूरी दी है। इस पर करीब 2,009.61 करोड़ रुपये खर्च होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह निर्णय लिया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को कैबिनेट के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रेलवे कर्मचारियों के लिए 78 दिन के बोनस को मंजूरी दी गयी है। इससे करीब 11.40 लाख कर्मचारियों को लाभ होगा। उन्होंने कहा, “यह मेहनती रेलवे कर्मचारियों के लिए दीपावली का उपहार है, जो दिन-रात काम करते हैं। जब हम त्योहार मनाते हैं, तब वे मैदान में, पटरियों पर, रेल इंजनों के भीतर और कार्यशालाओं में दिन-रात काम करते हैं। ऐसे सभी रेलवे कर्मचारियों के लिए यह दीपावली का उपहार करीब 2,009 करोड़ रुपये का बोनस है।” मंत्री ने कहा, “व्यावहारिक रूप से रेलवे के कुल 12 लाख कर्मचारियों में से करीब आधे की भर्ती राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के कार्यकाल में हुई है।” रेलवे कर्मचारियों को हर साल दुर्गा पूजा और दशहरा के आसपास उत्पादकता आधारित बोनस दिया जाता है। इस बार पात्र कर्मचारियों को 78 दिन के वेतन के बराबर बोनस मिलेगा। प्रति पात्र कर्मचारी बोनस की अधिकतम राशि 17,951 रुपये निर्धारित की गई है। इस बोनस से ट्रैक मेंटेनर, लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर (गार्ड), स्टेशन मास्टर, पर्यवेक्षक, तकनीशियन, तकनीशियन हेल्पर, पॉइंट्समैन, मंत्रालयिक कर्मचारियों और अन्य समूह ‘सी’ कर्मचारियों को लाभ होगा।

नवंबर से फोन-स्क्रीन पर कॉलर का नाम दिखाना जरूरी

नयी दिल्ली । आपके फोन पर जब भी किसी का कॉल आएगा, तो स्क्रीन पर उस व्यक्ति का नंबर और नाम दोनों दिखेंगे। जिस आई डी से सिम खरीदी, वही नाम डिस्प्ले होगा। इससे फर्जी कॉल पहचानने में मदद मिलेगी। दूरसंचार विभाग ने टेलिकॉम ऑपरेटर्स को 1 नवंबर 2026 से ये सेवा शुरू करने का निर्देश दिया है। यूजर को इस सर्विस को अलग से एक्टिवेट करने की जरूरत नहीं होगी। जिस भी व्यक्ति ने आपको फोन किया है, आपकी मोबाइल स्क्रीन पर उसका नाम दिखेगा। अगर फोन करने वाले व्यक्ति का नाम आपकी कॉन्टैक्ट लिस्ट है तो वही नाम दिखेगा। अगर उसका नंबर सेव नहीं है तो सिम लेते वक्त फोन करने वाले ने जो नाम दर्ज कराया था, वह दिखेगा।
अगर कॉल किसी दूसरे देश यानी इंटरनेशनल नंबर से आ रही है तो स्क्रीन पर किसी का नाम नहीं होगा, सिर्फ इंटरनेशनल कॉल लिखा नजर आएगा। हर टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर को अपने यूजर्स के नाम और उनके मोबाइल नंबरों को लिंक करने वाला एक नया डेटाबेस तैयार करना होगा। जब आपको कॉल आएगा तो कंपनी डेटाबेस से नाम फेच करके तुरंत आपकी स्क्रीन पर दिखाएगी। कॉल कटते ही सिस्टम उस नाम को अपनी मेमोरी से तुरंत मिटा देगा, ताकि आपका डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहे। वहीं जिन लोगों ने प्राइवेसी के लिए अपना नाम छिपाने की सर्विस ली हुई है, उनका नाम स्क्रीन पर शो नहीं होगा। बिजनेस या बल्क सिम इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को अपने ट्रेडमार्क या रजिस्टर्ड बिजनेस नेम दिखाने का विकल्प मिलेगा। इसके लिए उन्हें ट्रेडमार्क रजिस्ट्री या जीएसटी पोर्टल पर रजिस्टर्ड नाम का वेरिफिकेशन और दस्तावेज ऑपरेटर को देने होंगे। फर्जी कॉल्स, साइबर फ्रॉड, स्पैम कॉल्स और ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी। फर्जी नामों से सिम चला रहे लोगों की पहचान आसान हो जाएगी और यूजर्स को थर्ड-पार्टी एप्स जैसे ट्रू कॉलर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।