Friday, November 6, 2026
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 भारत ने लिखी नई इबारत, जीते 85 पदक 

नयी दिल्ली । एशियाई खेल 2026 भारत के लिए सिर्फ पदकों की संख्या बढ़ाने वाला अभियान नहीं रहा बल्कि कई खेलों और स्पर्धाओं में नए इतिहास लिखने वाला संस्करण भी साबित हुआ। उपलब्धियों की सूची पर नजर डालें तो भारत ने कम-से-कम 15 ऐसी उपलब्धियां दर्ज की हैं, जिन्हें पहली बार या ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज किया गया है। इसके अलावा कई खिलाड़ियों ने लंबे अंतराल के बाद देश को पदक दिलाया, पुराने रिकॉर्ड में सुधार किया और कई नए खिलाड़ियों ने पदार्पण करते हुए पदक जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

आधिकारिक उपलब्धि तालिका के अनुसार, भारत के 310 पदार्पण करने वाले खिलाड़ियों में से 83 ने पदक जीते। इनमें 43 महिलाएं और 40 पुरुष शामिल हैं। यानी लगभग 26.77 प्रतिशत पदार्पण करने वाले भारतीय खिलाड़ी एशियाई खेलों में पदक जीतने में सफल रहे। पदार्पण करने वाले पदक विजेताओं ने कुल 41 पदक जीते, जिनमें 14 स्वर्ण, 12 रजत और 15 कांस्य शामिल हैं।

एमएमए से सॉफ्ट टेनिस तक पहली बार भारत की दस्तक

भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धियों की शुरुआत उन खेलों से हुई, जहां इससे पहले एशियाई खेलों में देश का पदक खाता नहीं खुला था।

सुचिका तारियाल ने महिला पारंपरिक 60 किग्रा वर्ग में पदक जीतकर एमएमए में भारत का पहला एशियाई खेल पदक हासिल किया। वहीं, जय मीणा ने पुरुष एकल में कांस्य पदक जीतकर सॉफ्ट टेनिस में भारत को पहला एशियाई खेल पदक दिलाया।

शूटिंग में भी दो स्पर्धाओं में भारत ने पहली बार पदक जीते। महेश्वरी चौहान, परिनाज धालीवाल और राइजा ढिल्लों ने महिला स्कीट टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता, जबकि परिनाज धालीवाल और अनंतजीत सिंह नरूका ने स्कीट मिश्रित टीम स्पर्धा में कांस्य अपने नाम किया। दोनों उपलब्धियां इन स्पर्धाओं में भारत के पहले एशियाई खेल पदक के रूप में दर्ज हुईं।

रोइंग में सतनाम सिंह और सलमान खान ने पुरुष डबल स्कल्स में कांस्य जीतकर इस स्पर्धा में भारत को पहला एशियाई खेल पदक दिलाया। एथलेटिक्स में बारानिका एलंगोवन ने महिला पोल वॉल्ट में कांस्य जीतकर इस स्पर्धा में भारत का पहला एशियाई खेल पदक हासिल किया।

शूटिंग में पहली बार स्वर्ण, तीरंदाजी में ऐतिहासिक कामयाबी

शूटिंग में कमलजीत और सुरूची इंदर सिंह ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। यह इस स्पर्धा में भारत का पहला एशियाई खेल स्वर्ण रहा। स्क्वैश में अनाहत सिंह ने महिला एकल में रजत पदक जीता। वह एशियाई खेलों में महिला एकल फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और भारत को इस स्पर्धा में पहला महिला एकल रजत पदक दिलाया।

वुशु में नाओरेम रोशिबिना देवी ने 60 किग्रा महिला सांडा में रजत पदक जीतकर लगातार तीन एशियाई खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनने की उपलब्धि हासिल की।

शूटिंग में कायनान चेनाई और नीरू ने ट्रैप मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीता। यह एशियाई खेलों में इस स्पर्धा में भारत का पहला स्वर्ण था। दोनों ने 40 में से 34 निशाने लगाकर नया एशियाई रिकॉर्ड भी बनाया।

तीरंदाजी में अंकिता भकत, कुमकुम अनिल मोहोद और कीर्ति ने महिला रिकर्व टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। यह इस स्पर्धा में एशियाई खेलों में भारत का पहला स्वर्ण था। वहीं धीरज बोम्मदेवरा और कुमकुम अनिल मोहोद ने रिकर्व मिश्रित टीम में रजत पदक जीता, जो इस स्पर्धा में भारत का पहला रजत था।

मुक्केबाजी और नौकायन में भी नए अध्याय

मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन ने महिला 75 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इस भार वर्ग में एशियाई खेलों का भारत का पहला स्वर्ण हासिल किया।

नौकायन में नेत्रा कुमानन ने महिला डिंगी स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। यह इस स्पर्धा में भारत का पहला एशियाई खेल पदक था।

सेपकटकरॉ में भारतीय टीम ने पुरुष क्वाड्रेंट स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। यह एशियाई खेलों में पुरुष क्वाड्रेंट स्पर्धा में भारत का पहला पदक था।

इस तरह पहली बार पदक जीतने वाले खेलों और स्पर्धाओं की सूची में एमएमए, सॉफ्ट टेनिस, शूटिंग की कई स्पर्धाएं, रोइंग, पोल वॉल्ट, स्क्वैश, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, नौकायन और सेपकटकरॉ शामिल रहे।

मीराबाई से हॉकी तक, पुराने इंतजार भी खत्म

भारत की ऐतिहासिक उपलब्धियां केवल पहली बार पदक जीतने तक सीमित नहीं रहीं। मीराबाई चानू ने महिला 49 किग्रा भारोत्तोलन में रजत पदक जीतकर अपने करियर का पहला एशियाई खेल पदक हासिल किया और भारत के 28 साल लंबे भारोत्तोलन पदक सूखे को समाप्त किया।

सावन बरवाल के नाम भी पुरुष मैराथन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। तालिका के अनुसार यह 1982 के बाद भारत का पुरुष मैराथन में पहला एशियाई खेल पदक और देश के बाहर इस स्पर्धा में पहला ऐसा पदक था।

क्रिकेट में शेफाली वर्मा ने महिला टी20 में शतक लगाया। तालिका इसे एशियाई खेलों में किसी भारतीय महिला का पहला शतक और महिला क्रिकेट के एशियाई खेल इतिहास का पहला शतक बताती है। स्मृति मंधाना ने भी 11,000 अंतरराष्ट्रीय रन पूरे करने वाली पहली महिला क्रिकेटर बनने की उपलब्धि दर्ज की।

टेबल टेनिस में मनुष शाह और दिया चितले ने मिश्रित युगल में कांस्य जीता। यह एशियाई खेलों के इतिहास में भारत का टेबल टेनिस में चौथा और मिश्रित युगल में दूसरा पदक था।

कुश्ती में लगातार सफलता

कुश्ती में सुनील कुमार ने 87 किग्रा ग्रीको-रोमन में कांस्य पदक जीतकर एशियाई खेलों में लगातार दो संस्करणों में पोडियम पर पहुंचने वाले पहले भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान की उपलब्धि हासिल की।

नितेश कुमार ने 97 किग्रा ग्रीको-रोमन में रजत जीतकर एशियाई खेलों के फाइनल में पहुंचने वाले और रजत जीतने वाले भारत के इतिहास के केवल दूसरे ग्रीको-रोमन पहलवान बनने की उपलब्धि हासिल की। तालिका में उनके प्रदर्शन को 1962 के रजत पदक विजेता मारुति माने के 64 साल बाद की उपलब्धि के रूप में दर्ज किया गया है।

सुजीत कलकल ने पुरुष 65 किग्रा फ्रीस्टाइल में स्वर्ण जीतकर इस भार वर्ग में स्वर्ण जीतने वाले भारत के तीसरे पहलवान बनने का रिकॉर्ड बनाया। उनसे पहले योगेश्वर दत्त ने 2014 और बजरंग पूनिया ने 2018 में यह उपलब्धि हासिल की थी।

मुक्केबाजी में परवीन ने महिला 65 किग्रा वर्ग का स्वर्ण जीतकर एशियाई खेलों के इतिहास में स्वर्ण जीतने वाली तीसरी भारतीय महिला मुक्केबाज बनने की उपलब्धि हासिल की।

44 साल बाद महिला हॉकी में स्वर्ण

भारतीय महिला हॉकी टीम ने भी ऐतिहासिक वापसी की। टीम ने स्वर्ण पदक जीतकर 44 साल का इंतजार खत्म किया। इससे पहले भारत ने महिला हॉकी में आखिरी बार 1982 के एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता था।

बॉक्सिंग में भारत के अभियान को भी तालिका ने सबसे सफल अभियानों में शामिल किया है। एशियाई खेल 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने कुल छह पदक-तीन स्वर्ण और तीन कांस्य जीते। तालिका के अनुसार स्वर्ण पदकों के लिहाज से यह भारत का मुक्केबाजी में सबसे सफल एशियाई खेल अभियान रहा, जिसने 2010 के प्रदर्शन को पीछे छोड़ा, जब भारत ने दो स्वर्ण, तीन रजत और चार कांस्य सहित कुल नौ पदक जीते थे।

पदार्पण करने वालों ने भी छोड़ी मजबूत छाप

एशियाई खेल 2026 में भारत के 310 खिलाड़ी पहली बार एशियाई खेलों में उतरे। इनमें से 83 खिलाड़ी पदक जीतने में सफल रहे। इनमें 43 महिलाएं और 40 पुरुष हैं। इन पदार्पण करने वाले पदक विजेताओं ने कुल 41 पदक जीते- 14 स्वर्ण, 12 रजत और 15 कांस्य।

खेलवार आंकड़ों में कबड्डी के 15 पदार्पण खिलाड़ियों में सभी 15 पदक विजेता रहे और उन्होंने दो स्वर्ण पदक जीते। एथलेटिक्स में 51 पदार्पण खिलाड़ियों में 14 ने पदक जीते और उनके खाते में एक स्वर्ण, तीन रजत और छह कांस्य सहित 10 पदक रहे।

शूटिंग में 17 पदार्पण खिलाड़ियों में 13 ने पदक जीते। उन्होंने तीन स्वर्ण, छह रजत और दो कांस्य सहित कुल 11 पदक हासिल किए। क्रिकेट में 20 पदार्पण खिलाड़ियों में 10 पदक विजेता रहे और उन्होंने एक स्वर्ण पदक जीता।

तीरंदाजी में नौ पदार्पण खिलाड़ियों में सभी नौ पदक विजेता बने। उनके खाते में चार स्वर्ण और दो रजत सहित छह पदक रहे। मुक्केबाजी में छह पदार्पण खिलाड़ियों में दो ने पदक जीते और उनके खाते में एक स्वर्ण और दो कांस्य सहित दो पदक दर्ज हैं।

रोइंग में 15 पदार्पण खिलाड़ियों में एक पदक विजेता रहा, जबकि स्क्वैश में चार में से तीन पदार्पण खिलाड़ियों ने पदक जीते और कुल दो कांस्य हासिल किए। कुश्ती में 10 पदार्पण खिलाड़ियों में दो ने पदक जीते—एक स्वर्ण और एक रजत। सेपकटकरॉ में 14 पदार्पण खिलाड़ियों में तीन पदक विजेता रहे और उन्होंने एक कांस्य पदक जीता।

पदार्पण करने वाले खिलाड़ियों की व्यक्तिगत सूची यह भी दिखाती है कि कुछ खिलाड़ियों ने अपने पहले ही एशियाई खेल में एक से अधिक पदक जीते। एथलेटिक्स में विशाल थेन्नारासु कायलविझी और मनु थेक्किनालिल साजी ने मिश्रित चार गुणा 400 मीटर रिले में रजत और पुरुष चार गुणा 400 मीटर रिले में कांस्य हासिल किया। यशवीर सिंह ने पुरुष भाला फेंक में पदक जीता, जबकि सावन बरवाल ने पुरुष मैराथन में पदक हासिल किया।

महिला एथलेटिक्स में किरण पहल ने चार गुणा 400 मीटर महिला रिले में स्वर्ण और मिश्रित चार गुणा 400 मीटर रिले में रजत जीता। बारानिका एलंगोवन ने महिला पोल वॉल्ट में पदक हासिल किया।

बैडमिंटन में आयुष शेट्टी, थारुन मन्नेपल्ली और हरिहरन अम्साकरुणन पुरुष टीम के पदक अभियान का हिस्सा रहे। क्रिकेट में प्रतीका रावल, भारती फुलमाली, जी. कमालिनी, श्री चरणी, श्रेयंका पाटिल, राधा यादव, अरुंधति रेड्डी, रेणुका ठाकुर और अन्य पदार्पण खिलाड़ियों ने महिला टीम के स्वर्ण में योगदान दिया।

कबड्डी में भी पदार्पण खिलाड़ियों की बड़ी संख्या ने पदक जीते। महिला और पुरुष दोनों टीमों के कई खिलाड़ी पहली बार एशियाई खेलों में उतरकर स्वर्ण पदक जीतने वाली टीमों का हिस्सा बने। निशानेबाजी, तीरंदाजी, कुश्ती और स्क्वैश में भी कई पदार्पण खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत और टीम स्पर्धाओं में पदक हासिल किए।

नए नाम, नए खेल और नए रिकॉर्ड

एशियाई खेल 2026 की उपलब्धियों की यह तस्वीर बताती है कि भारत का अभियान केवल पारंपरिक पदक जीतने वाले खेलों तक सीमित नहीं रहा। एमएमए, सॉफ्ट टेनिस, सेपकटकरॉ, नौकायन और पोल वॉल्ट जैसी स्पर्धाओं में पहली बार पदक जीतने के साथ भारत ने कई नई दिशाओं में अपनी मौजूदगी दर्ज की।

दूसरी ओर, तीरंदाजी, शूटिंग, कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों में खिलाड़ियों ने पुराने रिकॉर्ड और उपलब्धियों को आगे बढ़ाया। सबसे खास बात यह रही कि 83 पदार्पण खिलाड़ी पदक जीतने में सफल रहे। इनमें 14 स्वर्ण पदक विजेता शामिल हैं।

इस लिहाज से एशियाई खेल 2026 भारत के लिए केवल पदकों का अभियान नहीं, बल्कि नए खेलों में प्रवेश, ऐतिहासिक सूखे की समाप्ति, पुराने रिकॉर्ड में सुधार और नई पीढ़ी के पदक विजेताओं के उभरने का संस्करण भी बनकर सामने आया।

संध्या: अभिनय और समर्पण की मिसाल 

-की थी असली शेरों के साथ शूटिंग

मुंबई । 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में जन्मीं विजया देशमुख (संध्या) का परिवार थिएटर की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता था, जिसने उनके भीतर कला के बीज बोए। बेहतर करियर अवसरों की तलाश में वह अपनी बहन वत्सला देशमुख के साथ बंबई (अब मुंबई) आ गईं। उनका सिनेमाई सफर तब शुरू हुआ, जब उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी. शांताराम की मराठी फिल्म ‘अमर भूपाली’ (1951) के लिए एक समाचार पत्र के विज्ञापन का जवाब दिया। ऑडिशन के दौरान शांताराम उनकी विशिष्ट आवाज से बेहद प्रभावित हुए, जो उनकी दूसरी पत्नी और प्रसिद्ध अभिनेत्री जयश्री से काफी मिलती-जुलती थी। इसी फिल्म के साथ विजया को उनका नया सिनेमाई नाम ‘संध्या’ मिला। फिल्म में उन्होंने ‘गुणवती’ का किरदार निभाया और यह संगीतमय कृति इतनी कलात्मक रूप से सफल रही कि इसे 1952 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रतिष्ठित ‘पाल्मे डी ओर’ के लिए नामांकित किया गया।
संध्या अपने करियर की शुरुआत में कोई प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना नहीं थीं। इसके बावजूद 1955 की रंगीन फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के लिए उन्होंने मशहूर नर्तक गोपी कृष्ण के साथ तालमेल बिठाने के लिए महीनों तक प्रशिक्षण लिया। इस फिल्म में ‘नीला’ के रूप में उनका शिव तांडव और भावपूर्ण प्रदर्शन उनके असाधारण परिश्रम का प्रमाण है। 1955 में हिंदी फिल्म झनक झनक पायल बाजे को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ (1957) में उन्होंने ‘चंपा’ नामक एक खिलौने बेचने वाली महिला की भूमिका निभाई। यह फिल्म इतनी प्रभावशाली थी कि इसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और हॉलीवुड फॉरेन प्रेस द्वारा सैमुअल गोल्डविन अवार्ड (गोल्डन ग्लोब) से सम्मानित किया गया।
इस फिल्म के गीत ‘सैयां झूठों का बड़ा सरताज निकला’ में सिर पर टोकरी का संतुलन, हाथ में ‘रावणहत्था’ वाद्ययंत्र और चलते हुए जटिल भाव-भंगिमाएं उनके मल्टीटास्किंग कौशल को दर्शाती हैं।
सिनेमा के प्रति उनका जुनून केवल नृत्य मुद्राओं तक सीमित नहीं था। 1961 में आई फिल्म ‘स्त्री’ में उन्होंने वास्तविक शेरों के साथ अभिनय करने के लिए शेर प्रशिक्षकों के साथ रहकर उनकी गतिविधियों को समझा और बिना किसी ‘बॉडी डबल’ के खतरनाक दृश्य फिल्माए।
लगभग 40 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘चंद्रकला’ नामक एक तमाशा नर्तकी की चुनौतीपूर्ण और बोल्ड भूमिका निभाई, जो एक आदर्शवादी स्कूल मास्टर के पतन का कारण बनती है। इस फिल्म ने महाराष्ट्र के पारंपरिक ‘लावणी’ लोक नृत्य को अभूतपूर्व सम्मान और मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचाया।
गीत ‘मला लागली कुणाची उचकी’ ने सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया और इस प्रदर्शन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर (मराठी) पुरस्कार मिला। 1975 में ‘चंदनाची चोली अंग अंग जाली’ के लिए उन्हें पुनः यह पुरस्कार मिला। संध्या और वी. शांताराम का विवाह 22 दिसंबर 1956 को हुआ था। उन्होंने महबूब खान जैसे बड़े और प्रतिष्ठित निर्देशकों के आकर्षक प्रस्ताव भी ठुकरा दिए और अपना संपूर्ण करियर केवल शांताराम के विजन को समर्पित किया।
1970 के दशक के अंत में अभिनय से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली। 2009 में ‘नवरंग’ की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर वी. शांताराम पुरस्कार समारोह में उनकी उपस्थिति एक अत्यंत दुर्लभ घटना थी। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने राजकमल स्टूडियो परिसर में ही एक बेहद एकांत और शांत जीवन व्यतीत किया। 4 अक्टूबर 2025 को उम्र संबंधी बीमारियों के कारण मुंबई में उनका निधन हो गया और दादर के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

पहली ग्रामोफ़ोन लेडी गौहर जान की स्मृति में नृत्य नाटिका

– भारत में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग के 125 साल की स्मृति में आयोजन

कोलकाता । कोलकाता की संस्था “सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन”,“और” गुरुग्राम की संस्था “द परफॉर्मिंग आर्ट ट्राइब “ की ओर से सत्यजित राय सभागार में देश की पहली ग्रामोफ़ोन लेडी गौहर जान की स्मृति में एक अनोखा डांस ड्रामा” तवायफ़नामा” पेश कर स्त्री सशक्तिकरण तथा राष्ट्र निर्माण में भूली बिसरी गायिकाओं योगदान को जीवित कर दिया।

गौरतलब है कि देश में ग्रामोफ़ोन की पहली रिकॉर्डिंग 11नवंबर 1902को कोलकत्ता में हुआ था और गौहर जान की रिकॉर्डिंग हुई थी।इस तरह अब इस संगीत यात्रा का 125वां वर्ष शुरू हो रहा है। दिल्ली के “रज़ा फाउंडेशन “भारतीय विद्या भवन कोलकाता तथा “स्त्री दर्पण के सहयोग से हिंदी के वरिष्ठ कवि  पत्रकार  अरविन्द कुमार उर्फ़ विमल कुमार की कविताओं की पुस्तक “तवयाफ़नामा  “पर आधारित यह डांस ड्रामा पेश किया गया जिसमें 33भूली बिसरी गायिकाओं का जिक्र है ।

समारोह में वक्ताओं ने कहा कि कोलकाता  बनारस और लखनऊ की तरह देश का  सांस्कृतिक साहित्यिक केंद्र था। नई पीढ़ी को इस विरासत से अवगत कराने में मदद मिली । सांस्कृतिक पुर्ननिर्माण मिशन के प्रमुख संजय जायसवाल और स्त्री लेखा पत्रिका के संपादक अरविन्द कुमार द्वारा यहाँ जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार बीते जमाने की मशहूर अदाकारा मधुबाला की समकालीन वनमाला  की शिष्य सोमा बनर्जी के निर्देशन में एक घंटे का यह शो हुआ जिसमें बारह महिला कलाकारों ने भाग लिया । गौहर जान, जद्दन बाई,बेगम अख्तर  जैसी अनेक गायिकाओं पर केंद्रित इस डांस ड्रामे में आजादी की लड़ाई एवं समाज सेवा में इन गायिकाओं के योगदान को दिखाया गया। विज्ञप्ति में कुमार ने कहा कि “तवायफ़नामा” किताब में कोठे की 33 भूली बिसरी गायिकाओं के दर्द जीवन संघर्ष और संगीत में उनकी उपलब्धियों को कविताओं में दर्ज किया गया है क्योंकि इतिहास में इन गायिकाओं को जगह नहीं दी गयी  जबकि इन्होंने आजादी की लड़ाई में  गांधी जी और क्रान्तिकारियों की मदद की थी.इन्होंने हिंदुस्तानी मौसिकी का इतिहास रचा है और उसकी विरासत को बचाया है।समारोह में  स्त्री लेखा के नया अंक भी लोकर्पित हुआ जो गौहर जान की याद में निकला है।इस अवसर पर भारत में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग के 125 साल पर एक स्मारिका भी जारी की गयी। समारोह में भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं प्रसिद्ध आलोचक शंभुनाथ,  भारतीय रेलवे के महाप्रबंधक एवं चर्चित लेखक यतीश कुमार, आलोचक गीता दूबे एवं अल्पना नायक ने विचार व्यक्त किये और चिंता व्यक्त की कि इतिहास में इन गायिकाओं को जगह नहीं मिली।

डांस ड्रामा की निदेशक सोमा  बनर्जी का कहना है कि हम नृत्य के जरिये इन गायिकाओं का एक इतिहास लिखने का काम कर रहे हैं। डांस ड्रामा में मुख्य पात्र गौहर जान की भूमिका द लिटिल थेप्सियन की प्रमुख उमा झुंझुनवाला की रंगकर्मी पुत्री गुंजन अजहर ने किया। कोलकाता की सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पारमिता मैत्रा की पुत्री एवं बिरजू महाराज की शिष्य निलोपा मोइत्रा अपने नृत्य से तवायफ़नामा नृत्य नाटिका का शुभारंभ किया।

अन्य कलाकारों ने बेगम अख्तर, रसूलन बाई, जद्दन बाई, विद्याधरी ,असगरी बाई आदि की भूमिका निभायी। गौहर जान का जन्म आजमगढ़ में हुआ था पर वह बनारस के बाद कोलकाता में बस गयी थीं।नर्गिस की माँ जद्दन बाई भी गौहर जान की सोहबत के लिये बनारस से कोलकाता आयीं तथा बेग़म अख्तर की माँ मशरुती बाई भी अपनी बेटी को गौहर जान से मौसिकी की तालीम दिलाने कोलकाता आई थी। कोलकाता हिंदुस्तानी मौसिकी का बड़ा केंद्र था।

भवानीपुर कॉलेज में युफोनियस 26 का आयोजन

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने 29 सितंबर 2026 को यूफोनियस 2026 की मेजबानी की, जिसमें कोलकाता के 16 कॉलेजों के संगीत प्रेमी और प्रतिभाशाली कलाकारों ने एक साथ विभिन्न प्रस्तुतियां दी। कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलित करके किया गया जिसमें रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह,प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी (वाइस प्रिंसिपल), डॉ वसुन्धरा मिश्र, संगीतज्ञ सौरभ गोस्वामी और निर्णायक गण शामिल हुए।10:00 बजे से आरंभ हुआ
जो शाम तक चला। सभी कार्यक्रम कॉलेज के जुबली हॉल और कॉन्सेप्ट हॉल में आयोजित किए गए जिसमें सात प्रतिस्पर्धी कार्यक्रम हुए ।यह संगीत, प्रदर्शन और युवा प्रतिभाओं के लिए एक जीवंत उत्सव था।
महोत्सव का उद्घाटन समारोह में प्रो दिलीप शाह, रेक्टर और छात्र मामलों के डीन ने अपना स्वागत भाषण दिया। इसके बाद कॉलेज के विद्यार्थियों ने छात्र-छात्राओं ने एक ऊर्जावान प्रदर्शन किया जिसमें फ्लेम्स बॉलीवुड, कॉलेज की बॉलीवुड डांस टीम ने हिस्सा लिया।
प्रो दिलीप शाह और प्रो मिनाक्षी चतुवेर्दी ने इसके बाद विभागाध्यक्षों को सम्मानित किया गया तत्पश्चात फ्लेम्स वेस्टर्न ने जीवंतता के साथ मंच पर अपनी शानदार प्रस्तुति दी।साथ में प्रदर्शन, प्रतियोगिताओं के लिए मूड सेट किया गया।
पहली प्रतियोगिता सोलो वेस्टर्न थी, जहां प्रतिभागियों ने एक के माध्यम से अपनी गायन क्षमताओं का प्रदर्शन किया
विभिन्न प्रकार के पश्चिमी संगीत प्रदर्शन। बीईएससी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, उसके बाद जादवपुर विश्वविद्यालय ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया और टेक्नो इंडिया यूनिवर्सिटी तीसरे स्थान पर रही।इसके साथ-साथ, एकल वाद्ययंत्र प्रतियोगिता में संगीत वाद्ययंत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला का प्रदर्शन किया गया। न्याय किया
कोलकाता स्थित स्वतंत्र संगीतकार, निर्माता, गायक-गीतकार और मल्टी-इंस्ट्रूमेंटलिस्ट श्री स्वयं मजूमदार द्वारा प्रस्तुति दी गई। इस खंड में तबला से लेकर गिटार और बांसुरी तक का प्रदर्शन किया गया इसमें जादवपुर
विश्वविद्यालय विजयी हुआ, उसके बाद सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज रहा।जादवपुर विश्वविद्यालय के साथ सोलो रैपिंग प्रतियोगिता ने उत्सव में एक अलग ऊर्जा भर दी और प्रथम स्थान हासिल किया, उसके बाद बीईएससी और सिस्टर निवेदिता विश्वविद्यालय क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। वेस्टर्न बैंड प्रतियोगिता ने माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया। प्रदर्शनों में हाईवे टू हेल शामिल था । फ्यूचर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट द्वारा, इसके बाद सिस्टर निवेदिता विश्वविद्यालय का प्रदर्शन हुआ।
और जादवपुर विश्वविद्यालय का प्रदर्शन हुआ। बीईएससी मेन ने केयरलेस व्हिस्पर के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, यहाँ तक कि प्राप्त भी किया दर्शकों के साथ गाने के लिए जेवियर्स कॉलेज मेन और सेंट जेवियर्स कॉलेज ओटीएससी ने दूसरा स्थान हासिल कियातीसरे स्थान. इस खंड का समापन MASH X CRESENDO के अतिथि प्रदर्शन के साथ हुआ
श्री स्वयं मजूमदार का अभिनन्दन किया गया।
सोलो ईस्टर्न खंड ने सेंट जेवियर्स कॉलेज पहले स्थान पर है, उसके बाद जादवपुर विश्वविद्यालय और फिर आशुतोष कॉलेज। एकल बॉलीवुड प्रतियोगिता के निर्णायक मल्टी-इंस्ट्रुमेंटलिस्ट नोवोलिन सरकार थे।ओ रंगरेज़, सजदा और दुआ जैसे विशेष प्रदर्शन हुए। दुआ के साथ बीईएससी विजयी हुआ।जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा, जबकि श्री शिक्षायतन कॉलेज और टेक्नो इंडिया विश्वविद्यालय ने संयुक्त रूप से तीसरा स्थान प्राप्त किया।
एक छोटे से ब्रेक के बाद, इंडी पॉप सेगमेंट ने केंद्रीय चरण ले लिया, जिसमें बीईएससी ओटीएससी ने पहला स्थान हासिल किया, जादवपुर यूनिवर्सिटी दूसरे और बीईएससी मेन तीसरे स्थान पर रही।
समापन समारोह के साथ महोत्सव का समापन हुआ, जहां प्रोफेसर दिलीप शाह ने विभाग, समन्वयक और प्रतिभागी। के प्रयासों की सराहना की। वहीं,  जादवपुर विश्वविद्यालय को समग्र विजेता घोषित किया गया। बीईएससी ने ओवरऑल दूसरा स्थान हासिल किया। छात्र समन्वयकों ने विशेष के साथ अपने अनुभव साझा किये
उनके योगदान के लिए एआईएम को धन्यवाद। डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि यह घोषणा भी की गई कि बीईएससी का वार्षिक उत्सव उमंग आ रहा है
।जल्द ही समारोह में उत्साह का एक और स्वर जुड़ गया।

स्वराज की स्थापना का मार्ग भाषा से होकर गुजरता है  : प्रो.प्रेमशंकर त्रिपाठी

कोलकाता । मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियाई अध्ययन संस्थान, कोलकाता तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भाषा का स्वराज’ विषय पर बुधवार को संपन्न हुई। 29–30 सितंबर को आयोजित उक्त संगोष्ठी का आयोजन कुलपति प्रो.कुमुद शर्मा और मौलाना आजाद एशियाई अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष प्रो.राधा रमण चक्रवोर्ती के संरक्षण में संपन्न हुआ,इस संगोष्ठी में हिंदी की वैश्विक उपस्थिति,भाषाई स्वाधीनता, मातृभाषा, औपनिवेशिक विमर्श और भाषा-संस्कृति के संबंधों पर विभिन्न सत्रों में गंभीर अकादमिक चर्चा हुई।

राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत वंदेमातरम् गीत, विश्वविद्यालय कुलगीत तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रभारी प्रो.अमित राय के स्वागत वक्तव्य से हुई। विशिष्ट अतिथि के रूप में विधायक व अधिवक्ता तरुण ज्योति तिवारी ने कहा कि न्याय की भाषा हिंदी होनी चाहिए,गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के उप निदेशक डॉ.विचित्रसेन गुप्ता ने कहा कि कोई भी भाषा में सामर्थ्य नहीं होता बल्कि सामर्थ्य होता है उसके साथ व्यवहार करने वालों में, यदि हमें विश्व भाषा के रूप में हिंदी को देखना है तो भाषाई व्यवहार को आचरण में उतारना होगा डॉ.ब्रजेश त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी के प्रति सम्मान भाव को जन जन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है । उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. सरूप प्रसाद घोष ने कहा कि हमें सभी मातृभाषाओं का सम्मान करते हुए संस्कृत का विशेष सम्मान करना चाहिए जो कि सभी भाषाओं की जननी है तथा कोल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के डॉ. ब्रजेश त्रिपाठी ने ‘भाषा का स्वराज’ विषय पर विभिन्न दृष्टियों से अपना-अपना महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा। सत्र का संचालन डॉ. अभिलाष गोंड ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली ने किया।

संगोष्ठी का अकादमिक सत्र ‘हिंदी की वैश्विक चेतना’ विषय पर आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय,कोलकाता के प्रो. वेद रमण ने की। उन्होंने नोम चोमस्की,महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए भाषा के जीवन में महत्व को रेखांकित किया। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि हमें भाषाओं के बीच वैमनस्य के भाव को दूर करना होगा तब ही भाषा का स्वराज स्थापित होगा सत्र का संचालन सुशील कुमार पाण्डेय ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अमित राय ने किया। संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘उपनिवेशवादी विमर्श में भाषाई स्वराज’ विषय पर द्वितीय अकादमिक सत्र आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने की। सत्र में मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. वसुंधरा मिश्रा, डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी और डॉ. कमल कुमार ने विषय के विभिन्न आयामों पर विचार रखे। कमल कुमार ने कहा कि हिंदी हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के आंदोलनों की भाषा रही है,प्रो.वसुंधरा ने हिंदी भाषा में किये गए महत्वपूर्ण कामों की ओर सभा का ध्यान आकृष्ट किया प्रो सत्यप्रकाश तिवारी ने हिंदी को लेकर किये गए गांधी जी के प्रयासों की चर्चा की प्रो प्रेमशंकर त्रिपाठी ने अपनी परम्पराओं के हवाले से कहा सभी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव हमारी संस्कृति का हिस्सा है यह भाव हमें और हमारी भाषा को विश्व में स्थापित कर सकता है । मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियाई अध्ययन संस्थान के शोधार्थियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन डॉ. अभिलाष कुमार गौड़ ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली ने किया। इसके अतिरिक्त ‘विकसित भारत में हिंदी की भूमिका’ विषय पर निबंध लेखन प्रतियोगिता में बंगोवासी कॉलेज के छात्र नीलेश वर्मा प्रथम तथा काव्य आवृत्ति प्रतियोगिता में प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की छात्रा प्रतीक्षा मुख़र्जी प्रथम स्थान, बेथुन कॉलेज की छात्रा संजना जायसवाल द्वितीय स्थान व सुमित्रा चौहान तृतीय पुरस्कार से सम्मानित की गई। इससे संगोष्ठी के अकादमिक विमर्श के साथ साहित्यिक और रचनात्मक पक्ष को भी मंच मिला।

समापन सत्र की अध्यक्षता क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता के प्रभारी प्रो. अमित राय ने की। इस सत्र के विशिष्ट अतिथि हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष डॉ. शंकर कुमार सान्याल, मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त आईपीएस गंगेश्वर सिंह ने विषय के विभिन्न पक्षों पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। सत्र का संचालन डॉ. चित्रा माली ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभिलाष कुमार गोंड ने किया। भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज के पारस्परिक संबंधों पर चर्चा के बाद प्रतिभागियों को पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

शास्त्री जी, जिनके कहने पर देश ने किया एक दिन का उपवास

60 साल पहले प्रधानमंत्री रहते ही लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई और ये हमारे देश का दुर्भाग्य था। उनके अचानक देहांत की खबर से सारा देश हिल गया था। अपनी साफ-सुथरी छवि और सादगी के लिए प्रसिद्ध शास्त्री करीब 18 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके नेतृत्व में भारत ने 1965 की जंग में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी। ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई थी। कई लोग जहां दावा करते हैं कि शास्‍त्री जी को जहर देकर मारा गया। तो, वहीं कुछ लोग कहते हैं उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। हालांकि उनकी मौत कैसे हुई, इस बारे में आज तक कुछ भी सटीक दावा नहीं किया जा सकता। शास्त्री की सादगी और ईमानदारी का हर कोई कायल रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तो उस समय देश में अनाज की भारी किल्लत हो गई थी। तब शास्त्री ने देशवासियों से अपील की थी कि हफ्ते में केवल एक दिन सभी लोग उपवास रखें। कहते हैं ना कि किसी नियम को अगर दूसरों पर लागू करना हो तो उसका प्रयोग पहले खुद पर करना होता है। शास्त्री जी ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने इस उपवास की शुरुआत अपने परिवार से ही की। सबसे पहले अपने पूरे परिवार को उन्होंने दिनभर भूखा रखा, इसके बाद पूरे देश से अपील की। इसका असर ये हुआ कि पूरे भारत में एक दिन का उपवास लोग रखने लगे।

साफ सुथरी छवि ने पीएम की कुर्सी तक पहुंचाया

लाल बहादुर शास्त्री की साफ सुथरी छवि ने ही उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। दरअसल, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद यह दुविधा थी कि किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए। तब एक नाम सभी के सामने था- लाल बहादुर शास्त्री का। 9 जून 1964 को वह देश के दूसरे प्रधानमंत्री बनें। केवल 18 महीने तक वो इस पद पर रहे।

जब शास्त्री ने दिया पाकिस्तान पर हमले का आदेश

जब पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर हमला किया तो उन्हें ये लग रहा था कि धोती-कुर्ता पहनने वाला छोटे कद का ये प्रधानमंत्री कमजोर है। लेकिन शास्त्री जी ने कड़ा रुख अपनाया और पाकिस्तान पर हमले का आदेश दे दिया। इस दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान थे। पाकिस्तान के इस युद्ध में भी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच अमेरिका ने हस्तक्षेप किया। 1966 में ताशकंद में युद्ध विराम के समझौते पर हस्ताक्षर हुआ लेकिन उसी रात शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

ताशकंद समझौते से नाराज थीं शास्त्री की पत्नी

ताशकंद समझौते के बाद शास्‍त्री दबाव में थे। जानकार बताते हैं कि पाकिस्‍तान को हाजी पीर और ठिथवाल वापस देने की वजह से देश में शास्त्री की आलोचना हो रही थी। तब सीनियर जर्नलिस्ट कुलदीप नैयर उनके मीडिया सलाहकार थे। नैयर ने ही शास्‍त्री के मौत की खबर उनके परिजनों को बताई थी। बीबीसी को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था कि हाजी पीर और ठिथवाल को पाकिस्‍तान को दिए जाने से शास्‍त्री की पत्‍नी खासी नाराज थीं। यहां तक उन्‍होंने शास्‍त्री से फोन पर बात करने से भी मना कर दिया था। इस बात से शास्‍त्री को बहुत चोट पहुंची थी। अगले दिन जब शास्‍त्री के मौत की खबर मिली तो पूरे देश के साथ वह भी हैरान रह गई थीं।

(साभार – इंडिया टीवी)

तैंतीस हजार फीट की ऊँचाई पर कैप्टन स्मित का ऐतिहासिक शौर्य

– डॉ दीपक कोहली

दुबई से तेल अवीव की ओर उड़ान भरते फ्लाईदुबई के विमान संख्या एफजेड 1073 के भीतर तैंतीस हजार फीट की अभूतपूर्व ऊँचाई पर जो दिल नहला देने वाली अप्रत्याशित घटना घटी, उसने न केवल समूचे वैश्विक विमानन जगत की सुरक्षा व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं, बल्कि मानव इतिहास में अदम्य साहस, असाधारण प्रत्युत्पन्नमति और सर्वोच्च कर्तव्यनिष्ठा की एक ऐसी स्वर्णिम इबारत भी लिख दी है जिसे आने वाली सदियाँ अत्यंत गर्व के साथ याद रखेंगी।

शून्य से कई डिग्री नीचे के तापमान और हवा के प्रचंड दबाव के बीच जब कॉकपिट की संकीर्ण परिधि में मृत्यु साक्षात अट्टहास कर रही थी, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस तरह लहूलुहान अवस्था में भी अपने जीवन की अंतिम सांस तक संघर्ष करते हुए एक भीषण त्रासदी को टाला, उसने यह साबित कर दिया कि जब इंसान का संकल्प और कर्तव्यबोध अटूट हो, तो भयानक से भयानक विपत्ति भी उसके आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। सह-पायलट के रूप में साथ बैठे व्यक्ति द्वारा अचानक किए गए हिंसक जानलेवा हमले और विमान को जानबूझकर तेज गति से नीचे की ओर धकेल कर भीषण तबाही में बदलने की आत्मघाती साजिश के बीच कैप्टन स्मित ने जिस अद्वितीय वीरता का परिचय दिया, उसने विमान में सवार एक सौ चौहत्तर से अधिक निर्दोष यात्रियों और क्रू सदस्यों के जीवन की रक्षा तो की ही, साथ ही गगन की गहराइयों में मानवता की विजय का एक अमर जयघोष भी किया।

इस समूचे घटनाक्रम को यदि दैनिक जीवन और अंतरराष्ट्रीय उड्डयन सुरक्षा के बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह केवल एक सनकी व्यक्ति की आपराधिक करतूत या एक पायलट के त्वरित प्रत्युत्तर का सामान्य विवरण भर नहीं है, बल्कि यह संकट प्रबंधन, असीम शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति और अंतर-सांस्कृतिक एकजुटता का वह अनुपम उदाहरण है जो यदा-कदा ही देखने को मिलता है। मध्य आकाश में जब विमान पूरी तरह स्वचालित या अर्ध-स्वचालित प्रणालियों के सहारे अपनी निर्धारित गति से बढ़ रहा था, तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कॉकपिट की सुरक्षा के लिए बने अभेद्य सुरक्षा किलों के भीतर से ही कोई काल बनकर उभर आएगा। सह-पायलट के सिर पर सवार हुए चरमपंथी अथवा विक्षिप्तता के भूत ने जिस क्षण विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेकर उसे जानबूझकर गहरी गिरावट की ओर मोड़ा, उसी क्षण कॉकपिट के भीतर का वातावरण किसी भयावह दुःस्वप्न में बदल गया।

 

अचानक हुए इस तीखे हमले में कैप्टन स्मित गंभीर रूप से घायल हो चुके थे, उनके शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था और शारीरिक वेदना अपने चरम पर थी, किंतु ऐसे संकट के समय में भी उनका मस्तिष्क और विवेक पूरी तरह जागृत था। एक सामान्य मानव स्वभाव ऐसी स्थिति में भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर सकता था या अपनी जान बचाने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में आ सकता था, लेकिन कैप्टन स्मित ने अपने व्यक्तिगत अस्तित्व और पीड़ा को एक तरफ रखते हुए केवल उन सैकड़ों जिंदगियों के बारे में सोचा जो उनके निर्णयों पर टिकी हुई थीं।

कैप्टन स्मित द्वारा लहूलुहान अवस्था में भी हमलावर सह-पायलट से लगातार जूझते रहना और उसी घमासान के बीच एक-एक सेकंड का सही उपयोग करते हुए कॉकपिट का सुरक्षित लॉक खोल देना, उनकी रणनीतिक दूरदर्शिता और असाधारण सूझबूझ को दर्शाता है। ग्यारह सितंबर के कुख्यात आतंकवादी हमलों के पश्चात दुनिया भर में नागरिक विमानन के नियमों को सख्त करते हुए कॉकपिट के दरवाजों को इस तरह डिजाइन किया गया था कि बाहर से कोई भी अवांछित व्यक्ति या उपद्रवी किसी भी सूरत में अंदर प्रवेश न कर सके। लेकिन सुरक्षा की यही अभेद्य दीवार उस दिन एक दोधारी तलवार बन चुकी थी, क्योंकि खतरा बाहर से नहीं बल्कि अंदर से पैदा हुआ था।

ऐसे में यदि कैप्टन स्मित अंतिम क्षणों में साहस का परिचय देकर कॉकपिट का आपातकालीन दरवाजा न अनलॉक करते, तो बाहर मौजूद केबिन क्रू और यात्रियों को कभी भी यह अहसास नहीं हो पाता कि कॉकपिट के भीतर कितना भयानक खेल खेला जा रहा है और विमान तेजी से ज़मीन की ओर क्यों गिर रहा है। उनके द्वारा खोले गए उस एक दरवाजे ने बाहर मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलटों, सजग क्रू मेंबर्स और यात्रियों को अंदर घुसने और हमलावर को काबू में करने का वह जीवनरक्षक मार्ग प्रदान किया जिसने इतिहास की एक सबसे दर्दनाक हवाई दुर्घटना को एक अभूतपूर्व विजय गाथा में तब्दील कर दिया।

इस पूरी घटना का एक अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक पहलू वह वैश्विक मानवीय एकजुटता भी है जो संकट के उस महा-समुद्र में स्वतःस्फूर्त होकर उभरी। जब कॉकपिट का दरवाजा खुला और भीतर का भयावह दृश्य सामने आया, तब जातीय, राष्ट्रीय, धार्मिक और वैचारिक सीमाओं से परे हटकर यात्रियों और क्रू मेंबर्स ने एक जैसा साहस दिखाया। भारतीय कैप्टन के बहते खून और उनके अदम्य संघर्ष को देखकर इज़राइली, यूरोपीय और अन्य देशों के यात्रियों ने बिना एक पल की देरी किए कॉकपिट में प्रवेश किया और हमलावर सह-पायलट को दबोच लिया। यह दृश्य इस बात का सजीव प्रमाण है कि जब मानवता पर कोई बड़ा संकट मंडराता है, तो मनुष्य की अंतरात्मा में छिपा भ्रातृत्व और साहस का भाव जागृत हो जाता है और वह हर प्रकार के पूर्वाग्रहों को भुलाकर एक दूसरे की ढाल बन जाता है। सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर विमान की जो सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई, वह केवल यांत्रिक सफलता नहीं थी, बल्कि विभिन्न देशों के पायलटों, एटीसी कंट्रोलर्स और केबिन क्रू के बीच के उस उत्कृष्ट समन्वय का प्रतिफल थी, जिसकी नींव कैप्टन स्मित मच्छार के प्रारंभिक प्रतिकार और बलिदान ने रखी थी।

हालाँकि, इस साहसिक प्रकरण की अपार सफलता और कैप्टन स्मित की वैश्विक प्रशंसा के बीच, यह घटना विश्व भर की विमानन सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के सामने कई यक्ष प्रश्न भी खड़े करती है जिनका उत्तर ढूँढना अब अनिवार्य हो गया है। दशकों से उड्डयन उद्योग का पूरा ध्यान यात्रियों की सघन चेकिंग, सामान की स्कैनिंग और बाहरी खतरों को रोकने पर केंद्रित रहा है। लेकिन जब खतरा खुद उस व्यक्ति से हो जिसे सैकड़ों लोगों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, तो फिर सुरक्षा के पैमाने क्या होने चाहिए? उड़ान से पूर्व पायलटों और सह-पायलटों की केवल शारीरिक फिटनेस ही काफी नहीं है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य, उनके अवсад के स्तर, उनके उग्रवादी या चरमपंथी झुकाव और उनके व्यक्तिगत तनावों की निरंतर और वैज्ञानिक जाँच किया जाना समय की सबसे बड़ी माँग बन चुकी है। ‘मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग’ और ‘साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग’ को अब केवल औपचारिकता न मानकर एक अनिवार्य, पारदर्शी और कठोर सुरक्षा मानक के रूप में लागू करना होगा। इसके साथ ही, कॉकपिट के भीतर आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए क्रू ट्रेनिंग के नए प्रोटोकॉल विकसित करने होंगे ताकि भविष्य में यदि कभी कोई सह-पायलट या पायलट अचानक हिंसक या असामान्य आचरण करे, तो उसे तुरंत बेअसर करने की तकनीकी व्यवस्था मौजूद हो।

कैप्टन स्मित मच्छार के इस अद्भुत पराक्रम ने संपूर्ण भारतवर्ष को वैश्विक मंच पर एक बार फिर गर्व से भर दिया है। भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के शीर्ष नेताओं द्वारा उनकी मुक्तकंठ से की गई सराहना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि यह उस भारतीय जीवन-मूल्य और संस्कृति का सम्मान है जो ‘आत्मनः मोक्षार्थं जगद्धिताय च’ तथा ‘परोपकारार्थं इदं शरीरम्’ के सिद्धांतों पर आधारित है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न खोना, अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी दूसरों के जीवन की रक्षा करना और अपने पद तथा दायित्व के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहना ही एक सच्चे सैनिक और नायक की पहचान होती है। कैप्टन स्मित ने आकाश की असीम ऊँचाइयों में भारतीय चरित्र के इसी उज्ज्वल पक्ष को अपनी निष्ठा और रक्त से रेखांकित किया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चा लीडर वही होता है जो सबसे विकट परिस्थिति में भी अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर खतरे का सामना करता है और अपने सहयोगियों तथा आश्रितों के लिए एक सुरक्षित मार्ग का निर्माण करता है।

समय के साथ यह घटना पुरानी हो जाएगी, उड़ानों का सिलसिला इसी प्रकार जारी रहेगा और दुनिया अपनी रफ्तार से चलते रहेगी, लेकिन कैप्टन स्मित मच्छार द्वारा कॉकपिट के भीतर दिखाया गया वह साहसिक प्रतिकार उड्डयन इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर हमेशा-हमेशा के लिए अंकित रहेगा। यह गाथा केवल एक दुर्घटना से बचाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपी उस अनंत क्षमता, अदम्य जीजीविषा और निस्वार्थ कर्तव्य-चेतना का एक ऐसा महाकाव्य है जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी भयावह क्यों न हों, संकट कितना भी विशाल क्यों न हो और मृत्यु कितनी भी निकट क्यों न खड़ी हो, यदि मनुष्य का संकल्प सुदृढ़ है और उसका ध्येय पवित्र है, तो वह अंधकार के सबसे गहरे समंदर को चीरकर भी विजय का उजाला बिखेर सकता है।

कैप्टन स्मित का यह प्रयास आने वाले युगों तक हर उस इंसान के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा जो अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भारी संकट, भय या अनिश्चितता का सामना कर रहा होगा, क्योंकि गगन के उस योद्धा ने हमें सिखाया है कि असली नायक वह नहीं जो कभी गिरता नहीं, बल्कि वह है जो गंभीर रूप से घायल होकर भी दूसरों को बचाने के लिए दोबारा खड़ा होता है और इतिहास का रुख मोड़ देता है।

“एमडीजे कपल नंबर-1 सीजन 5” का समापन

कोलकाता । महाबीर डांवर ज्वेलर्स (एमडीजे) ने एक बार फिर कोलकाता के फेयरफील्ड बाय मैरियट में आयोजित बहुप्रतीक्षित ‘कपल नंबर 1 – सीजन 5’ के ग्रैंड फिनाले में प्यार और साथ के इस भव्य उत्सव में निखर कर सामने आई प्यारी जोड़ी को कपल नंबर 1 चुना गया।
इस प्रतियोगिता के दौरान, जोड़ों ने अपने प्यार, कमिटमेंट और आपसी समझ को दिखाने के लिए कई तरह के चैलेंज में हिस्सा लिया, जिसके बाद ग्रैंड फिनाले के लिए टॉप 11 जोड़ों को चुना गया था। इसमें जीतने वाली विजेता प्यारी जोड़ी को बाकू की एक रोमांचक यात्रा के बेहद खूबसूरत ग्रैंड प्राइज से सम्मानित किया गया। जो उनके खूबसूरत प्यार के रिश्तों में जश्न का एक इंटरनेशनल ट्रैवल का अनुभव भी जोड़ती है।
इस कार्यक्रम में एक जूरी शामिल में अभिनेत्री ऋचा शर्मा, सेलिब्रिटी मोटिवेशनल स्पीकर नैना मोरे, बेंचमार्क ग्रुप की सीईओ राधिका नौलखा अग्रवाल और महाबीर डांवर ज्वेलर्स की डिजाइन हेड राजेश्वरी डांवर शामिल थीं। इस शाम में महाबीर डांवर ज्वेलर्स के डायरेक्टर विजय डांवर, अरविंद डांवर, संदीप डांवर और अमित डांवर भी शामिल हुए।
इस मौके पर मीडिया से बात करते हुए महाबीर डांवर ज्वेलर्स के डायरेक्टर विजय डांवर और अमित डांवर ने कहा कि हम इस सीजन में भाग लेने वाले सभी जोड़ों और विजेताओं को बधाई देते हैं। हमें उम्मीद है कि उनका आगे का सफर साथ में और भी खूबसूरत यादों से भरा होगा।
पुरुषों ने ऑफिशियल मेल अपैरल पार्टनर प्रियंका हरलालका के डिजाइन किए गए स्टाइलिश कपड़े पहन कार्यक्रम में समा बांधा, जबकि महिलाओं ने ऑफिशियल फीमेल अपैरल पार्टनर ‘सीक्विन्स एंड पर्ल्स बाय विवेक’ के शानदार क्रिएशन में जलवा बिखेरा।
इस इवेंट को कोलकाता स्थित इवेंट मैनेजमेंट और मीडिया क्यूरेशन कंपनी ‘सैन एंटरटेनमेंट एलएलपी’ ने आयोजित किया था, जो मशहूर हिंदी दैनिक समाचार पत्र ‘सन्मार्ग’ का ऑफिशियल इवेंट और मीडिया डिवीजन है।
शाम का एक मुख्य आकर्षण महाबीर डांवर ज्वेलर्स के ‘रजवाड़ा – द ब्राइडल ज्वैलरी कलेक्शन’ का भव्य अनावरण था। आधुनिक दुल्हन के लिए तैयार किए गए इस कलेक्शन में पारंपरिक भारतीय विरासत की भव्यता और समकालीन सुंदरता का खूबसूरत मेल है।
विजेताओं की सूची: कपल नंबर 1 (सीजन 5)
* आशीष और राजश्री मिमानी – (विजेता)
* कनिष्क और रक्षिता जैन – (पहले रनर-अप)
* सागर और ज्योति गेहानी – (दूसरे रनर-अप)

दुर्गोत्सव 2026 : कोलाज हैै बागुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब की थीम

रीसायकल अखबारों से बन रहा है दुर्गापूजा मंडप

बागुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब इस वर्ष अपने दुर्गापूजा का 73वां साल मना रहा है। इस मौके पर क्लब ने ‘कोलाज’ थीम पर आधारित एक शानदार आर्ट इंस्टॉलेशन पेश किया है, जो कला, समाज, यादों और बातचीत के बदलते तरीकों को एक साथ लाता है।
आर्टिस्ट सोमनाथ तामली के कॉन्सेप्ट पर आधारित इस पूरे आर्ट पैविलियन को हजारों किलो रीसायकल किए गए अखबारों से बनाया गया है। इसमें रोजमर्रा की वस्तुओं को कला के एक बेहतरीन कौशल में बदल दिया गया है। अखबार के पन्ने, शब्द, तस्वीरें और टेक्सचर को मिलाकर पूजा पंडाल को भव्य रूप दिया जा रहा हैं, जिससे यह काफी खूबसूरत और आकर्षक दिख रहा है.
‘कोलाज’ का कॉन्सेप्ट मां दुर्गा की पौराणिक कथाओं से भी गहराई से जुड़ा है। पारंपरिक कथाओं के अनुसार, अलग-अलग देवताओं ने अपनी दैवीय शक्तियों और हथियारों का योगदान देकर देवी दुर्गा का संपूर्ण रूप बनाया था। यह पैविलियन अलग-अलग तत्वों के इस मिलन को सामूहिक शक्ति की ताकत के प्रतीक के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहा है।
पारंपरिक कथा के अनुसार, मां दुर्गा का निर्माण देवताओं की सामूहिक दैवीय ऊर्जा से हुआ था, जिसमें अलग-अलग देवताओं ने अपनी शक्तियां और हथियार दिए थे। इनमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, वरुण, वायु, अग्नि, यम, कुबेर और सूर्य जैसे देवता शामिल हैं।
हर दैवीय योगदान शक्ति के एक अलग हिस्से को दिखाता है। फिर भी, जब ये हिस्से एक साथ आते हैं, तो मां दुर्गा का संपूर्ण और शक्तिशाली रूप बनता है। अलग-अलग तत्वों को मिलाकर कुछ बड़ा बनाना ही ‘कोलाज’ की मुख्य व्याख्याओं में से एक है।
यही सोच इस इंस्टॉलेशन में भी दिखाई गई है, जो रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सत्यजीत रे, सत्येंद्र नाथ बोस, मातंगिनी हाजरा, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद जैसी प्रेरणादायक हस्तियों को श्रद्धांजलि भी देता है। उनके अलग-अलग योगदान मिलाकर बंगाल और भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक और सामाजिक विरासत का एक और ‘कोलाज’ बनाते हैं।
अखबार खुद इस इंस्टॉलेशन का एक ऐसा हिस्सा बन जाता है, जो पुरानी यादें ताजा करता है। मंडप की सजावट और कला में बड़ी मात्रा में अखबारों को लोड कर साइकिल पर उन्हें बांटने के दृश्यों के जरिए इस मंडप में पुराने जमाने के अखबारों वाले कल्चर की याद भी ताजा की जा रही है। साथ ही, यह भी पता चलता है कि कैसे डिजिटल मीडिया ने आज लोगों के जानकारी पाने और उसे शेयर करने के तरीके को बदल दिया है।
इस मौके पर बोलते हुए, बाग़ुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब के सेक्रेटरी स्नेहाशीष देबनाथ ने कहा, इस साल हम अपनी थीम ‘कोलाज’ के जरिए हम समाज, संस्कृति, इतिहास और सामूहिक यादों के अलग-अलग हिस्सों को एक साथ लाकर एक बड़ी कहानी बनाना चाहते थे। जैसे अलग-अलग टुकड़े मिलकर एक अर्थपूर्ण कोलाज बनाते हैं, वैसे ही माँ दुर्गा की पौराणिक कथा में अलग-अलग देवी-देवताओं की दिव्य ऊर्जा और योगदान मिलकर एक शक्तिशाली और संपूर्ण रूप लेते हैं। हमने अपनी कलात्मक इंस्टॉलेशन के जरिए इसी सोच को आगे बढ़ाया है, जिसमें बंगाल और भारत को आकार देने वाले अखबारों, मशहूर हस्तियों और कहानियों को एक साथ लाया गया है। मंडप को हजारों किलो रीसायकल किए गए अखबारों का इस्तेमाल खबरें पढ़ने और शेयर करने के उस कल्चर को सम्मान देने जैसा आकर दिया गया है, जो अब समाज से खत्म हो रहा है। यह हमें उस समय की याद दिलाता है जब अखबार रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे। जब हम अपना 73वां साल मना रहे हैं, तो ‘कोलाज’ विविधता में एकता का जश्न मनाने और खुद को यह याद दिलाने का हमारा तरीका है कि हर व्यक्ति का योगदान, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, तब सार्थक हो जाता है जब वह दूसरों के साथ मिलकर कुछ बड़ा और स्थायी बनाता है।
‘कोलाज’ के जरिए बागुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब कला, पौराणिक कथाओं, विरासत और समकालीन सोच को एक साथ लाने की पूरी कोशिश की गई है, जिससे आने वाले लोगों को दुर्गा पूजा पंडाल के दृश्य आकर्षण से कहीं बढ़कर एक अनुभव मिलता है।

श्री शिक्षायतन कॉलेज में हिन्दी दिवस पर संगोष्ठी

कोलकाता । श्री शिक्षायतन कॉलेज के हिन्दी विभाग द्वारा गत १५ सितम्बर २०२६ को हिन्दी दिवस का आयोजन किया गया l इस समारोह की मुख्या अतिथि थीं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखिका डॉ. अलका सरावगी l कार्यक्रम का आरम्भ गणेश वंदना पर आधारित भाव नृत्य से हुआ जिसे विभाग की छात्राओं, तुहेलिया घोष और सृष्टि शास्वत ने प्रस्तुत किया l तत्पश्चात कार्यक्रम का विधिवत शुराम्भ कॉलेज की प्राचार्या डॉ. तानिया चक्रवर्ती, अतिथि वक्ता डॉ. अलका सरावगी, सचिव, पी. के. शर्मा तथा हिन्दी विभाग की प्राध्यापिकाओं द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ l

प्राचार्या डॉ. चक्रवर्ती ने आपने स्वागत वक्तव्य में हिन्दी के व्यापक सामाजिक – सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी दिवस केवल हिन्दी विभाग का आयोजन नहीं, बल्कि पूरे महाविद्यालय का उत्सव है l समारोह में उर्दू विभाग की अध्यक्ष, डॉ. शाहीन परवीन द्वारा संपादित पुस्तक, “गंगा जमनी तहजीब की तशकील में उर्दू का हिस्सा“ का लोकार्पण भी किया गया जिसने समारोह के बहुभाषिक और समन्वयकारी स्वरुप को विशेष अर्थ प्रदान किया l तत्पश्चात विभागाध्यक्ष अल्पना नायक ने वक्ता का परिचय देते हुए उन्हें व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया l डॉ. अलका सरावगी ने अपने व्याख्यान मे ‘स्मृति, इतिहास और कथा’ पर बोलते हुए सबसे पहले  हिन्दी के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि अंग्रेजी में निष्णात होने तथा अंग्रेजी की पहुँच को जानने के बावजूद भी उन्होंने अपने लेखन का माध्यम हिन्दी इसलिए चुना क्योंकि हिन्दी के साथ जुडी अनुभूतियाँ और संवेदनाएं हजारों सालों से नीचे मिटटी में जमी हुई हैं, वे हमारे पुरखों की स्मृतियों में गुँथी हुई हैं, जिनको लेकर हिन्दी भाषा का साहित्य हमसे जिस तरह से बात करता है वो किसी भी दूसरी भाषा में संभव ही नहीं है । स्मृति, इतिहास और कथा के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि स्मृति जब कथा में इतिहास को संदर्भित करती है तब कथा जरिया बन जाती है कि हम खुद को जान सकें l

इस अवसर पर काव्य आवृत्ति तथा काव्य – पोस्टर की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं l काव्य आवृत्ति में प्रथम स्थान पर रहीं, कलकत्ता विश्वविद्यालय की संजना जयसवाल , द्वितीय स्थान श्री शिक्षायतन कॉलेज की शाईस्ता अली तथा तृतीय स्थान जोगेश चन्द्र चौधुरी कॉलेज के मो. जीशान को मिला l काव्य पोस्टर प्रतियोगिता में बंगाबासी कॉलेज की रुपसा मंडल, बेथुन कॉलेज की इतिका कुमारी साव तथा बंगबासी कॉलेज की तानिया रॉय को क्रमशः प्रथम , द्वितीय और तृतीय स्थान मिला l कार्यक्रम का संचालन विभाग की छात्राओं, निधि दवे तथा अल्फिया मज़हर ने  कुशलतापूर्वक किया l विभाग की प्राध्यापिका, सिन्धु मेहता के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ l