Monday, September 21, 2026
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इस बार रक्षाबंधन पर खुद को भावुकता के भ्रमजाल से निकालिए

महिलाओं ने सोशल मीडिया पर रायता फैला दिया है । कल तक जो ताने,उलाहने, तंज और कटुक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से निकलती थीं, आज सोशल मीडिया पर कैमरे के सामने निकल रही हैं । घर, ससुराल, देवर, भौजाई, ननद और रिश्तेदारों को कोसने वाले मीम वायरल हो रहे हैं । रील के जवाब में रील बन रही है…लोग तमाशा देख रहे हैं और तमाशे से कमाई हो रही है । देखा जाए तो कोई किसी से कम नहीं है । ननदें भौजाइयों पर मायका छीन लेने का आरोप लगा रही हैं तो भौजाइयां ननदों को आफत मान रही हैं । कंटेंट के नाम पर हर दूसरी रील में बार – बार कचरा परोसा जा रहा है । इधर रक्षाबंधन आ रहा है तो कई किसिम की बहनें आपको देखने को मिल जाएंगी । किसी को गरीब भाई को राखी नहीं बांधनी और अमीर भाई को राखी बांधनी है । भाई – बहन के झगड़ों से सजे एआई वीडियो हर जगह फैले हुए हैं । विज्ञापनों के युग में संबंध भी अब विज्ञापन और कंटेंट बनकर रह गये हैं ।
भौजाइयां अपने घर को अपना साम्राज्य मान रही हैं और देवर, ननद या किसी और का दखल उनके लिए आक्रमण की तरह है । इसे रोकने के लिए वह किसी भी तरह का प्रपंच रचने से बाज नहीं आ रही हैं और यही हाल ननदों का भी है । बहनों का भावुक होना उनकी सबसे बड़ी समस्या है और किसी पर भावनात्मक रूप से निर्भर होकर उम्मीद बांध लेना रुलाता है । परदे पर बहनों को नायक की छवि मजबूत करने के लिए टूल बनाया जा चुका है मगर उसके हिस्से के अधिकार लिखे नहीं गये और आज जब कानून उसे कुछ देना चाहता है तो बहनों को माताओं के जरिए वंचित किया जा रहा है ।
दलील यह है कि वह तो सब कुछ शादी में ले जा चुकी इसलिए उसका हक नहीं बनता । एक ही घर में रहकर भाई – बहनों की जीवनशैली में जमीन – आसमान का अंतर हो सकता है । भौजाइयों की असुरक्षा उनसे कांड करवाती है । वह अपनी ननदों को पराया और अवांछित महसूस करवाने का एक मौका नहीं छोड़तीं और उनको यह उम्मीद है कि ननदें उनको सम्मान दें और समाज में अच्छी बहू की छवि को वह चमका सकें । उनको ननद या देवर नहीं गूंगे प्राणी चाहिए जो चाबी भरने पर उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहे । भौजाइयों के पक्षपात को देवाज्ञा समझकर उसे स्वीकार कर ले और परिवार की शांति के नाम पर माताओं ने अपनी बहुओं को यह छूट दे रखी है । अगर रक्षाबंधन जैसे त्योहार न होते तो मुझे लगता है कि बहनों को मायके में रहने का मौका भी नहीं मिलता । भाइयों ने अक्सर तमाशा देखा है और कई बार अपने परिवार परिसीमन प्रक्रिया में बहनों को बाहर कर रखा है । ननद चाहे उम्र में बेटी की उमर की हो मगर भौजाइयों की प्रतियोगिता जारी रहती है । भौजाइयों को लगता है कि ननदों को घर में रहने देना उन पर अहसान करना है…उसे बस पड़ी रहना चाहिए । अभी बहुत सी दहेज हत्याएं हुईे और हो रही हैं । सब ज्ञान बांट रहे हैं कि लड़कियों को मायके लौट आना चाहिए …पिता उसे घर ले आएं और माता उसका ध्यान रखे …मगर यह बहुत अव्यावहारिक है । जब तक माता – पिता हैं, बेटी घर में रह भी ले मगर उसके बाद क्या होगा……भाई उस पर तंज कसेंगे और हर रोज उसे बोझ बताकर आत्मविश्वास कतरते रहेंगे और उस पर अगर वह विवाहित हुआ तो उस बेटी की भौजाई उसे इतना प्रताड़ित करेगी, मानसिक रूप से इतना परेशान करेगी कि वह लड़की मानसिक रोगी बन जाएगी या फिर नौकरों से भी बदतर जीवन जीएगी । आप स्त्री हों या पुरुष हों, किसी पर पूरी तरह निर्भर होंगे तो वह आपको जरखरीद नौकर ही समझेगा इसलिए यह कहना बंद कीजिए कि मायका स्त्री की शरणस्थली बन सकता है ।
एक ही घर में रहते हुए वह लड़की रसोई में नहीं जा सकेगी….उसे अधिकार नहीं होगा कि वह खुलकर सांस ले सके । एक ही रसोई में अलग – अलग पकवान बनेंगे और उसके हिस्से में खाने के साथ एक दिन पुरानी सब्जी भी होगी या फिर कुछ खास बना हो तो वह घर के बच्चों या पति के लिए रख लिया जाएगा । उस घर के बच्चे उसे देखकर आगे बढ़ जाएंगे और उसे अलग – थलग रहना होगा…आखिर क्यों ऐसी जिन्दगी बितानी चाहिए किसी को भी ।
माता – पिता नहीं रहे तो कोई पूछने वाला नहीं और अगर रहे तो अपनी आंखों के सामने अपनी बच्ची की हालत देखकर रोज मरेंगे । लोग आएंगे…तमाशा देखेंगे….और चल देंगे । कितनी अजीब बात है..जिस घर में स्त्री जन्म लेती है, बड़ी होती है…उसी घर में अछूत बना दिया जाना समाज की दृष्टि में न्यायसंगत है और यही सामाजिकता है । क्या इससे बड़ी विडम्बना है कहीं…?
हमारे यहां त्योहार भी समाज का चेहरा देखकर मनाए जाते हैं । वह स्टेटस सिम्बल है । बहनों की राखी में सामाजिकता का भाव बस चुका है । आओ..राखी बांधो और उपहार या नकद लेकर चलती बनो । आप इसे प्यार कहते हैं…जहां संबंधों के नाम पर औपचारिकता ही बची रही है । एक ही घर में जन्म लेने पर भी बहनों के हिस्से में पीजी और होटल ही रह जाते हैं और यह भी सामान्य है ।
आखिर कब तक झूठ बोलते रहेंगे लड़कियों को…उनको सच का सामना करना सिखाइए । समय आ गया है कि लड़कियां संबंधों की भूल -भूलैया से बाहर निकलकर अपनी जमीन तैयार करना सीखें । इज्जत के नाम पर अनचाही शादी लड़कियों का भाग्य बना दिया जाता है, उससे समझौतों की उम्मीद की जाती है और यह भी कि वह अधिकारों और सम्पत्ति के हक की बात न करे । यह भी सच है कि अपनी उम्मीदें खुद से ऱखना ही समझदारी है । अपनी इच्छाओं के लिए किसी पर भी निर्भर क्यों रहना है और क्यों भाई को एटीएम समझना है ।
जरूरत से ज्यादा अधिकार जताना अपना सम्मान कम करता है फिर चाहे जितना भी बुरा लगे । मत मांगिए न साड़ी और महंगे तोहफे । जहां आपका कोई अधिकार ही नहीं , वहाँ किसी से कोई उम्मीद और संबंध की ख्वाहिश क्यों ? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि अब बहनों को झूठा दिलासा देना बंद कर देना चाहिए कि हर मुश्किल घड़ी में वह मायके पर निर्भर रह सकती है ।
लड़कियां कब तक दूसरों के भरोसे अपनी जमीन खोजती रहेंगी और उनको क्यों नहीं अपने लिए आवाज उठानी चाहिए ? अब यह मान लीजिए कि पक्षपात होता है और यह इसलिए होता है क्योंकि चीजें आपके हाथ में नहीं हैं । आपकी जिम्मेदारियां आपका फर्ज हैं मगर कोई आपके लिए करे तो वह अहसान कर रहा है । समाज को हिप्पोक्रेसी की आदत लग चुकी है ।
इस बार रक्षाबंधन पर बस की मुफ्त टिकटों से आगे बढ़िए, इस बार औपचारिकता निभाने के लिए दिये गये उपहारों को खारिज करना सीखिए । ऐसी कोई चीज मत मांगिए जिसकी कीमत आपका आत्मसम्मान है । फरममाइश मत कीजिए बल्कि जो खाने या पहनने का मन हो, खुद खरीद लीजिए । अपने काम खुद कीजिए और अपनी जिन्दगी से ऐसे रिश्तों को जितना दूर रख सकती हैं, रखिए ।
जहां अपनापन नहीं है, वहां अपनापन जताना पानी पर लकीर खींचना है…जिसका कोई फायदा नहीं है । जरूरी नहीं कि आप सबको साथ लेकर चलेंगी तो दुनिया भी आपको साथ लेकर चलेगी । जो आपका नहीं है, वह आपका नहीं है…एक बात यह समझ में आ गयी कि अपना वही होता है जो हम अर्जित करते हैं । हम चाहें जितनी भी बड़ी बातें करें मगर परिवारों में साम्राज्यवादी मानसिकता की दीमक लग चुकी है । अगर लोग बदले हैं तो खुद को बदलकर शांति से दूरी बना लेना ही समझदारी है ।

भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज में मनाया गया 80वां स्वतंत्रता दिवस

-डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि दी गई
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज द्वारा 80वें स्वतंत्रता दिवस पर क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्रामी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि दी गई। इस पावन अवसर पर ध्वजारोहण समारोह में कॉलेज के मैनेजमेंट प्रमुख पदाधिकारियों में नलिनी पारख,बुलबुल भाई,रेणुका भट्ट,प्रोफेसर दिलीप शाह, उमेश भाई, राजू भाई और प्रदीप सेठ , बृजभूषण सिंह आदि की उपस्थिति रही।कॉलेज के उपाध्यक्ष श्री मिराज डी शाह ने स्वागत वक्तव्य में शिक्षाविद और स्वतंत्रता संग्रामी,बंगाल के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विषय में बताया ,साथ में उन्हें श्रद्धांजलि दी और पंद्रह अगस्त की हार्दिक शुभकामनाएं दी। ध्वजारोहण के अवसर पर मैनेजमेंट के सभी पदाधिकारियों और एनसीसी की ओर से जल थल और वायु सेना के गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। वंदे मातरम् और राष्ट्रगान द्वारा झंडे का सम्मान दिया गया। मार्च पास्ट करते हुए आईसीएसई और आईएससी के विद्यार्थियों और एनसीसी के कैडेट्स द्वारा झंडे को सलामी दी गई।भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज के इनेक्ट कलेक्टिव ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व को नाट्य रूपांतरित अभिनय द्वारा प्रस्तुति दी। भवानीपुर गुजराती सोसायटी स्कूल के आईसीएससी और आईएससी की ओर से छात्र छात्राओं ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज के क्रीसेंडो कलेक्टिव के छात्र-छात्राओं ने देश भक्ति से ओत-प्रोत गीतों और फ्लेम के विद्यार्थियों ने शास्त्रीय नृत्य वंदे मातरम की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर एंटी रैगिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को प्रथम ,द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वालों को पुरस्कृत किया गया। सर्वश्रेष्ठ परंपरागत वेशभूषा के लिए स्त्री पुरुष को अलग-अलग पुरस्कृत किया गया जिनमें विद्यार्थियों के साथ शिक्षक शिक्षिकाओं को भी शामिल किया गया। डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी वाइस प्रिंसिपल ने सभी के समक्ष देश भक्ति से संबंधित प्रश्न भी पूछे।रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने अपने एक संदेश में कहा कि आजादी का मतलब हमारे लिए विचारों की आजादी है विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा को निखारना है और धन्यवाद ज्ञापन किया।

भवानीपुर कॉलेज के सीनियर एनसीसी कैडेट  सम्मानित 

कोलकाता । भवानीपुर कॉलेज के सीनियर कैडेट कैप्टन मोहम्मद तनवीर अहमद (बी.कॉम, सेमेस्टर चार) को 13 अगस्त 2026 को आईएचए फेडरेशन द्वारा बैज ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया  । यह सम्मान उनके राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) में अनुकरणीय प्रदर्शन के साथ-साथ सामाजिक सेवा और सामुदायिक विकास कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी की सराहना के लिए प्रदान किया गया। डॉक्टर वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए कहा कि अनुशासन, नेतृत्व, सामुदायिक कल्याण और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता एनसीसी के माध्यम से प्रचारित मूल मूल्यों को दर्शाती है ।

बांग्लादेश के विभाजन और विस्थापनाओं का उपन्यास ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए

डॉक्टर वसुंधरा मिश्र ,भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज, कोलकाता

अलका सरावगी का जन्म 17 नवम्बर, 1960 को हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में‘कलि-कथा वाया बाइपास’, ‘शेष कादम्बरी’, ‘कोई बात नहीं’, ‘एक ब्रेक के बाद’, ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’, ‘एक सच्ची-झूठी गाथा’, ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’,
‘गांधी और सरलादेवी चौधरानी’ (उपन्यास); ‘कहानी की तलाश में’, ‘दूसरी कहानी’, ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह) आदि हैं। जर्मन, फ्रेंच, इटैलियन, स्पेनिश, अंग्रेजी तथा अनेक भारतीय भाषाओं में उनकी कृतियों के अनुवाद हुए हैं।
उनके पहले ही उपन्यास ‘कलि-कथा वाया बाइपास’ को ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ तथा ‘शेष कादम्बरी’ उपन्यास को ‘बिहारी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।
‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ अलका सरावगी जी का उपन्यास विभाजन और विस्थापन की गहरी अंतर छायाएं लिए हुए है ।इतिहास और देश काल का यह उपन्यास एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें मनुष्य को अपनी जड़ों से उखाड़ कर फिर बसने की त्रासदी का अद्भुत चित्रण है। इस उपन्यास का हर पृष्ठ मनाविक मनोभावनाओं, रिश्तों के विभाजन और विस्थापनाओं और दर्द की विभिषिका को बयान करती है।किस प्रकार से राजनीतिक परिस्थितियां मनुष्य काअचानक ही किसी भूकंप की तरह घर बार नष्ट कर देता है और उसे अनचाहे कष्ट झेलने के लिए बाध्य करता है।न चाहते हुए भी व्यक्ति को अपने अस्तित्व, नाम, धर्म ,लिंग, रंग ,नस्ल आदि को भूल कर , परिस्थितियों के साथ स्वयं को संचालित और समझौता करना पड़ता है।
‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ एक ऐसा ही उपन्यास है जिसमें इतिहास के काले पन्नों की कथा, अंतर्कथा और राजनीतिक परिदृश्यों के परत दर परत लिखा शब्दकोश है।
तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान की सीमा पर हुए विभाजन कई साल बाद तक होते रहे ।दंगों तथा मुक्ति वाहिनी के संग्राम के वर्ष रहे हैं ,जहां लगातार विस्थापन होते रहे।
‘पूर्वी पाकिस्तान से लेकर दंड कारण्य तक फैली हिंदू शरणार्थियों की व्यथा गाथा ,और मारवाड़ी -बंगाली संबंधों का एक अद्भुत विन्यास है।’ यह वरिष्ठ आलोचक भाषाविद्और रचनाकार हरीश त्रिवेदी जी ने इस पुस्तक के विषय में कहा है जो शत प्रतिशत सही है।

पाकिस्तान और भारत के विभाजन पर हिंदी में कई उपन्यास लिखे गए हैं । हिंदी के प्रसिद्ध लेखक यशपाल का उपन्यास झूठा सच जो भारत विभाजन पर अपने महाकाव्यात्मक स्वरूप में इस त्रास का उद्घाटन करता है।
विभाजन पर भीष्म साहनी द्वारा ‘तमस ‘की रचना जो आजाद भारत में हुए दंगों के कारण अपने शहर रावलपिंडी के दंगे की याद दिलाती है जिनकी आग गांव तक फैल गई थी। 1986 87 में यह दूरदर्शन के माध्यम से एकाएक चर्चित हुआ था ।
इसी तरह मंजूर एहतेशाम का ‘सूखा बरगद’ जिसमें स्वतंत्रता के बाद भारत के विभाजन के परिणाम स्वरूप आए सामुदायिक जीवन के बदलाव की कथा है ।भारतीय मुस्लिम समाज के अंतर विरोध और द्वंद्व को उपन्यासकार ने बेहद मार्मिक ढंग से उद्घाटित किया है ।
असगर वजाहत जी का ‘जिस लाहौर नइ वेख्या’ यह भी भारत विभाजन की एक घटना पर आधारित है जिसमें भारत से पाकिस्तान गए एक मुस्लिम परिवार को एक हिंदू परिवार की कोठी मिली है और उसमें रहने वाली बुढ़िया भारत जाने को तैयार नहीं जबकि उसके घर वाले सब चले गए ।समाज में मौजूद कट्टर और धर्म का धंधा कर रहे लोग स्थितियों को बिगाड़ते हैं ।असगर वजाहत ने निराशा और अंधकार में भी मनुष्यता और सद्भावना का उजास खोजा है।
‘सिक्का बदल गया है’ कृष्णा सोबती जी का उपन्यास विभाजन पर लिखी एक कहानी है जहां पाकिस्तान के एक मुस्लिम बहुल गांव में अकेली हिंदू बची शाहनी की कथा है ।इसी तरह अज्ञेय की ‘शरणागत ‘कहानी और मोहन राकेश का ‘मलबे का मालिक’ आदि अनेक उपन्यास विभाजन पर लिखे गए।
अलका सरावगी की मनुष्यता के निर्वाचन की मार्मिक दास्तान वाया ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ उपन्यास जो संभवतः बांग्लादेश हिंदी में 2021में प्रथम प्रकाशित होता है।
डेढ़ चप्पल पहन कर घूमता है यह काला लंबा दुबला शख़्स कौन है ।हर बात पर वह इतना खुश कैसे दिखता है। उसे भूलने का बटन देने वाला श्याम धोबी कहां छूट गया कुलभूषण को । कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए बीते इतिहास का विस्फोटक पहलू है। इसकी कथा में कथाओं की अंतर्कथा,आप बीती में गुंथी कहानी प्याज की परतों की तरह खुलती चली जाती है । उपन्यास का नायक कुलभूषण पिछली आधी सदी से उजड़ा हुआ है। देश घर नाम जाति गोत्र तक छूट गया उसका फिर भी अर्ज कर रहा है ।मां-बाप का दिया कुलभूषण जैन नाम दर्ज कीजिए। इस किरदार के आसपास के संसार में कोई दरवाजा ताला नहीं है लेकिन फिर भी इसके पास कई तिजोरियों के रहस्य दफन है। एक लाइन ऑफ कंट्रोल, दो देश ,तीन भाषा, 5 से अधिक दशक कुलभूषण ने सब देखा जिया समझा है। जिन त्रासदियों को हम इतिहास का गुजारा समय मान लेते हैं ,वह वर्तमान तक जाकर कैसे बेखबरी से हमारे इर्द-गिर्द भटकती रहती हैं। यह उपन्यास उसे अचूक इतिहास दृष्टि के साथ दर्ज करता है। पूर्वी बंगाल से आजादी से चलता लगातार विस्थापन भारत में शरणार्थियों को बंगाल से बाहर राम सीता के निर्वासन की तरह दंडक वन में बसने की सारी कथाएं एक मार्मिक आख्यान को रचते हैं। कथा के भीतर इसकी सिरा सिरा में बिंधा हुआ एक मानवीय आशय है जो किरदार की निरीहता और प्रवहता को पाठक के मन में संकेत कर देता है। इतिहास भूगोल संस्कृति सांप्रदायिकता जाति व्यवस्था समाज और इन सब के बीच फंसे लोगों को जानने और समझने के लिए खुद निराश्रित जैसे किरदार कुलभूषण की दुनिया में यूं ही चलते फिरते मिलेंगे। उनकी बातों में आए तो फंसे ना आए तो कुलभूषण के जीवन में घुस नहीं पाएंगे ।
भारत को आजादी मिली किंतु देश विभाजन की कीमत पर मुसलमान को धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान मिला किंतु भारत ने धर्म पर आधारित राष्ट्रीयता के सिद्धांत को नहीं माना। यहां धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ किंतु हिंदू मुसलमान में सांप्रदायिकता की समस्या का अंत तब भी नहीं हुआ ।भारत विभाजन के समय संपूर्ण उत्तर भारत सांप्रदायिकता की आग में जल उठा था। हजारों लोग मारे गए लाखों लोग विस्थापित हुए तथा स्त्रियों और बच्चों के साथ और मनुष्य का अत्याचार हुए। देश की विशाल जनसंख्या अपना वतन छोड़कर भारत या पाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में बसने को विवश हुई। भारत के इतिहास में यह सबसे बड़ी अमानवीय त्रासदी थी जिसे हिंदी लेखकों ने अनेक ढंग से अपने उपन्यासों में अत्यंत यथार्थ रूप में चित्रित किया है।

अलका सरावगी जी ने कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए में कुलभूषण जैन एक मारवाड़ी परिवार का पुत्र जो बांग्लादेश की गोराई नदी को अपना मानता है ,कुष्टिया का है, विभाजन के कारण अपने नाम को भी बदल कर मानो अपने जीवन को बचा रहा था । ऐसे कई सवालों का उत्तर उपन्यास में निहित है जो विस्थापन और विभाजन की त्रासदी को दर्शाता है।
अपनी धन संपत्ति मकान जमीन जायदाद और रिश्तों को छोड़कर आना, कहीं और बसना जहां पर अपना कुछ भी नहीं है ,अपने देश की मिट्टी भी नहीं है, यह बहुत ही मार्मिक उपन्यास है।

आईसीबीआई के कार्यक्रम में पहुंचे शमिक भट्टाचार्य

कोलकाता। इंटरनेशनल चेंबर ऑफ बिजनेस एंड इंडस्ट्री (आईसीबीआई) ने ज्ञानवर्धक टॉक शो का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इसमें राज्यसभा के माननीय सदस्य और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), पश्चिम बंगाल के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य शामिल हुए। कार्यक्रम में विनीता अग्रवाल (कार्यक्रम की संयोजक), महेश कुमार केडिया, आदित्य मुरारका और विष्णु सुरेका (संस्थापक ट्रस्टी) भी मौजूद थे। इस कार्यक्रम में प्रमुख उद्योगपति, उद्यमी, पेशेवर और व्यापार जगत के लोग शामिल हुए, जो पश्चिम बंगाल के भविष्य पर एक ज्ञानवर्धक चर्चा के लिए शामिल हुए।

“पश्चिम बंगाल: पिछले 50 वर्षों में हमने क्या खोया है और अगले 10 वर्षों में हम क्या हासिल करने की योजना बना रहे हैं” शीर्षक वाले इस सत्र में राज्य के आर्थिक बदलाव, औद्योगिक पुनरुद्धार, बुनियादी ढांचे के विकास, रोजगार सृजन, शिक्षा और निवेश के अवसरों पर ध्यान केंद्रित किया गया। भट्टाचार्य ने एक विकसित और समृद्ध पश्चिम बंगाल के लिए अपना दृष्टिकोण साझा किया और नीतिगत सुधारों, उद्यमिता तथा सरकार और उद्योग के बीच सहयोग के महत्व पर जोर दिया। इस इंटरैक्टिव चर्चा सत्र में सवाल-जवाब का एक जीवंत दौर भी शामिल था, जिसमें सदस्यों ने व्यवसायों को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर विचार साझा किए और राज्य के आर्थिक इकोसिस्टम को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की गई।

इस मौके पर बोलते हुए राज्यसभा के माननीय सदस्य और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी  के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा, मौजूदा समय में पश्चिम बंगाल एक अहम और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। हमारी प्राथमिकता इस राज्य में बिजनेस के अनुकूल ऐसा माहौल बनाना है, जहाँ बिना किसी गैर-जरूरी दखल के निवेश, उद्यमिता और रोजगार को बढ़ावा मिल सके।प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि 100 करोड़ और उससे ज्यादा के निवेशकों को पूरा समर्थन मिलना चाहिए और उन्हें किसी भी स्तर पर कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। आर्थिक विकास के साथ-साथ, हम वंचित वर्गों के कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। हमारा मकसद एक ऐसा बंगाल बनाना है जो पारदर्शी, निवेशकों के अनुकूल और विकास-उन्मुख हो। हमे साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि विकास का फायदा समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। आईसीबीआई जैसे प्लेटफार्म इन सभी पक्षों को एक साथ लाने, उनकी चिंताओं को समझने और अगले दशक में एक ‘विकसित पश्चिम बंगाल’ बनाने की दिशा में मिलकर काम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

इस मौके पर मीडिया से बात करते हुए संस्थापक ट्रस्टी महेश कुमार केडिया ने कहा, आज के कार्यक्रम को मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि व्यापार जगत के लोग पश्चिम बंगाल के भविष्य को वृहद आकार देने वाले मुद्दों पर नीति-निर्माताओं के साथ जुड़ने में गहरी रुचि रखते हैं। आईसीबीआई में हमारा उद्देश्य ऐसे सार्थक मंच बनाना है जहां विचार, नीतिगत दृष्टिकोण और उद्योग की अपेक्षाएं एक साथ आ सकें। हम अपना दृष्टिकोण साझा करने के लिए समिक भट्टाचार्य के साथ इस उत्साहपूर्वक आयोजन में भाग लेने के लिए अपने सभी सदस्यों का दिल से आभार प्रकट करते हैं।

इस अवसर पर संस्थापक ट्रस्टी आदित्य मुरारका ने कहा, इस बेहद खास उत्साहपूर्ण कार्यक्रम में भागीदारी और चर्चाओं की गुणवत्ता उन मंचों की आवश्यकता को फिर से साबित करती है, जो नीति-निर्माताओं और व्यापार जगत के बीच रचनात्मक बातचीत को प्रोत्साहित करते हैं। आज के सत्र ने हमारे सदस्यों को पश्चिम बंगाल के आर्थिक भविष्य और आगे आने वाले अवसरों के बारे में बहुमूल्य दृष्टिकोण प्राप्त करने में सक्षम बनाया। आईसीबीआई ऐसे विचारकों को एक साथ लाने के लिए प्रतिबद्ध है जो जानकारीपूर्ण बातचीत और सार्थक कार्रवाई के लिए प्रेरित कर सकें।

मीडिया से बात करते हुए आईसीबीआई के फाउंडर ट्रस्टी विष्णु सुरेका ने कहा, हमारा मकसद इस इवेंट के जरिए एक ऐसा भरोसेमंद मंच बनाना हैं, जहाँ इंडस्ट्री, सरकार और प्रोफेशनल्स ऐसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें और इस राज्य के लंबे समय के विकास में योगदान दें सके। हम समिक भट्टाचार्य के आभारी हैं कि उन्होंने अपने विचार साझा किए, और साथ ही अपने सदस्यों, स्पॉन्सर्स और पार्टनर्स का भी धन्यवाद करते हैं, जिनके सहयोग से यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा। हम भविष्य में भी ज्ञान-आधारित ऐसे और भी कार्यक्रम आयोजित करने के लिए उत्साहित हैं।

पीएम केयर्स फंड को मिलने वाले दान में बड़ी गिरावट

नयी दिल्ली ।  पीएम केयर्स फंड को वित्त वर्ष 2024-25 में घरेलू दान में 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यह राशि घटकर करीब 479 करोड़ रुपये रह गई है। नवीनतम ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी दान में भी 18 फीसदी की कमी आई है, जो 92.8 लाख रुपये रहा। हालांकि, 31 मार्च, 2025 तक फंड का कुल शेष बढ़कर 8,452 करोड़ रुपये हो गया है। एक साल पहले यह राशि 7,173 करोड़ रुपये थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस कुल राशि में से 7,846 करोड़ रुपये सावधि जमा में रखे गए हैं। वहीं, 605 करोड़ रुपये बचत बैंक खातों में जमा हैं। वित्त वर्ष 2023-24 में पीएम केयर्स को 681.8 करोड़ रुपये का घरेलू दान मिला था। इसी अवधि में 1.13 करोड़ रुपये का विदेशी दान भी प्राप्त हुआ था। फंड ने 2024-25 में पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना पर 87.8 लाख रुपये खर्च किए। यह पिछले वित्त वर्ष के 15.37 करोड़ रुपये से काफी कम है। वर्ष 2024-25 में कुल भुगतान 87.85 लाख रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष में यह 15.6 करोड़ रुपये था। एक साल पहले यह राशि 7,173 करोड़ रुपये थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस कुल राशि में से 7,846 करोड़ रुपये सावधि जमा में रखे गए हैं। वहीं, 605 करोड़ रुपये बचत बैंक खातों में जमा हैं। वित्त वर्ष 2023-24 में पीएम केयर्स को 681.8 करोड़ रुपये का घरेलू दान मिला था। इसी अवधि में 1.13 करोड़ रुपये का विदेशी दान भी प्राप्त हुआ था। फंड ने 2024-25 में पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना पर 87.8 लाख रुपये खर्च किए। यह पिछले वित्त वर्ष के 15.37 करोड़ रुपये से काफी कम है। वर्ष 2024-25 में कुल भुगतान 87.85 लाख रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष में यह 15.6 करोड़ रुपये था। पीएम केयर्स फंड की वेबसाइट पर उपलब्ध ऑडिट किए गए बयानों के अध्ययन से पता चलता है कि स्वैच्छिक घरेलू योगदान 2020-21 में 7,184 करोड़ रुपये के शिखर पर पहुंच गया था। इसके बाद यह 2021-22 में घटकर 1,896 करोड़ रुपये हो गया। 2022-23 में यह और गिरकर 909 करोड़ रुपये पर आ गया। विदेशी योगदान में भी तेज गिरावट देखी गई है। यह 2020-21 में 495 करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर था। अगले दो वर्षों में यह घटकर 40 करोड़ रुपये और 2.57 करोड़ रुपये हो गया। अब विदेशी योगदान 92.8 लाख रुपये है। यह 2019-20 के पहले वर्ष में 39.7 लाख रुपये के बाद दूसरा सबसे कम आंकड़ा है। नरेंद्र मोदी सरकार ने पीएम केयर्स फंड की स्थापना की थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य किसी भी प्रकार की आपातकालीन या संकटपूर्ण स्थिति से निपटना था। कोविड महामारी जैसी स्थितियों में प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करना भी इसका लक्ष्य था। इसे एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया गया था। प्रधानमंत्री इस फंड के पदेन अध्यक्ष होते हैं। यह फंड पूरी तरह से स्वैच्छिक योगदानों से चलता है। इसे कोई बजट सहायता प्राप्त नहीं होती है।

14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले

-रेवंत रेड्डी 89 केस के साथ सबसे आगे

नयी दिल्ली । सांसदों-विधायकों के आपराधिक मामलों की तेज सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट में अहम जानकारी सामने आई। 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ मामले बताए, रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ सबसे आगे हैं।
सांसदों-विधायकों के आपराधिक मामलों की तेज सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट में अहम जानकारी सामने आई
नयी दिल्ली । नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की तेज सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने बताया कि 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ सबसे ऊपर हैं, जबकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 मामले दर्ज हैं।

शुभेंदु अधिकारी पर 29 मामले दर्ज
एक मीडिया संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ सूची में सबसे ऊपर हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी 29 मामलों के साथ हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू पर 19-19 मामले हैं, जबकि केरल के मुख्यमंत्री वी डी सतीशन पर 18 मामले हैं।

हेमंत सोरेन पर पांच, दो मुख्यमंत्रियों पर चार मामले
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर पांच मामले हैं, महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस और हिमाचल प्रदेश के सुखविंदर सिंह सुक्खू पर चार-चार मामले हैं, और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर दो-दो मामले हैं। रिपोर्ट में सिक्किम के मुख्यमंत्री पी एस तमांग, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के खिलाफ एक-एक मामले का जिक्र है।

हंसारिया की 96 पन्नों की रिपोर्ट के अनुसार, गंभीर आपराधिक मामलों वाले विधायकों का सबसे ज्यादा प्रतिशत बंगाल से है – 292 में से 170 (58 प्रतिशत)। इसके बाद केरल (57 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (56 प्रतिशत), तेलंगाना (49 प्रतिशत), झारखंड और ओडिशा (दोनों 45 प्रतिशत), बिहार (42 प्रतिशत), महाराष्ट्र (40 प्रतिशत) और यूपी का नंबर आता है।
लोकसभा में, 170 सांसदों (कुल 543 की संख्या का 31 प्रतिशत) के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। तेलंगाना में 17 में से 11 सांसदों, केरल में 21 में से 11 सांसदों, बिहार में 40 में से 19 सांसदों, यूपी में 80 में से 34 सांसदों, महाराष्ट्र में 48 में से 17 सांसदों, बंगाल में 42 में से 16 सांसदों और आंध्र प्रदेश में 25 में से 9 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं।
हंसारिया ने बताया कि जुलाई 2026 तक, मौजूदा और पूर्व सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4,192 आपराधिक मामले सुनवाई के लिए लंबित हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा, यानी 1,171 मामले लंबित हैं।
वकील स्नेहा कलिता की ओर से दायर ‘एमिकस’ रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 (33 प्रतिशत) के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं; इनमें से 40 (18%) मामले गंभीर अपराधों से जुड़े हैं ,जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा की सजा हो सकती है।
एमिकस ने कोर्ट से अनुरोध किया कि मौजूदा और पूर्व विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें तय की जाएं और संबंधित हाई कोर्ट को इन मुकदमों की प्रगति पर सक्रिय रूप से नज़र रखने का निर्देश दिया जाए।

व्यस्त शेड्यूल के बाद भी बच्चों से मजबूत होगी बॉन्डिंग

​भागदौड़ भरी जिंदगी में वर्किंग पेरेंट्स के लिए काम और परिवार के बीच बैलेंस बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अक्सर देखा जाता है कि दिनभर की थकावट के बाद माता-पिता बच्चों को समय तो देते हैं लेकिन उनके साथ वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाता। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों को आपके पूरे दिन के समय से ज्यादा आपके क्वालिटी टाइम की जरूरत होती है। अगर आप भी ऑफिस और घर की जिम्मेदारियों के बीच बच्चे के साथ एक मजबूत और सुरक्षित रिश्ता बनाना चाहते हैं तो ये 5 गोल्डन रूल्स आपके बहुत काम आएंगे:

छोटी-छोटी आदतों से बनाएं सुरक्षा का अहसास -बच्चों के साथ रिश्ते की शुरुआत रोजाना की छोटी-छोटी आदतों से होती है। सुबह ऑफिस निकलने से पहले बच्चे को एक प्यार भरी झप्पी दें।

साथ में नाश्ता करने की आदत डालें। ​रात को सोने से पहले उन्हें कोई मजेदार कहानी सुनाएं या उनके दिनभर का हाल जानें। ये छोटी-छोटी आदतें बच्चे के मन में यह विश्वास जगाती हैं कि उसकी दुनिया पूरी तरह सुरक्षित है।

क्वालिटी टाइम बनाम  क्वांटिटी टाइम- गैजेट्स को रखें दूर -बच्चे के पास सिर्फ शारीरिक रूप से मौजूद होना काफी नहीं हैआपका पूरा ध्यान भी उसी पर होना चाहिए।​जब आप बच्चे के साथ हों तो फोन लैपटॉप और टीवी को पूरी तरह दूर रख दें। ​बच्चे से आंखों में आंखें मिलाकर बात करें।​दिनभर में सिर्फ 15-20 मिनट का डिजिटल-फ्री अटेंशन बिना ध्यान दिए बिताए गए घंटों से कई गुना बेहतर असर दिखाता है।

​उनके खेल में खुद बच्चा बनें – बच्चों पर अपनी पसंद थोपने के बजाय उन्हें खुद चुनने दें कि वे क्या और कैसे खेलना चाहते है।​ जब आप उनके साथ खेलें तो पेरेंट न बनकर उनके दोस्त की तरह खेलं।​स्कूल या बाहर से लौटने पर उनसे पूछें— आज तुम्हें सबसे अच्छा क्या लगा। ​जब आप उनके पसंदीदा खेल और बातों में दिलचस्पी लेते हैं तो वे खुलकर अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगते हैं।

डांटने के बाद समझाएं और उनकी भावनाएं समझें – जब बच्चा परेशान या गुस्सा हो तो उसे तुरंत चुप कराने की जगह उसकी भावनाओं को स्वीकार करे। बच्चे से कहें— मैं समझ सकता सकती हूं कि तुम निराश हो। यह वाक्य बच्चे को शांत करने में चमत्कारी असर दिखाता है। अगर कभी गुस्से में डांट पड़ जाए तो बाद में उसे दुलारते हुए ईमानदारी से वजह बताएं और समझाएं कि आपको गुस्सा नहीं करना चाहिए था।

वादों के पक्के बनें – बच्चे अपने माता-पिता के वादों को कभी नहीं भूलते। अगर आपने बच्चे से कोई वादा किया है तो उसे हर हाल में पूरा करें। ​यदि किसी जरूरी वजह से वादा पूरा न हो पाए तो उनसे सच बोलें और कारण समझाएं। ​री-शेड्यूल करें और बाद में उस वादे को जरूर निभाएं। इससे बच्चे के अंदर सच्चाई और भरोसे की नींव मजबूत होती है।​पैरेंटिंग कोई कठिन काम नहीं है बस थोड़े से धैर्य और प्यार की जरूरत होती है। बच्चों को महंगे खिलौने नहीं बल्कि आपका बिना शर्त प्यार और ध्यान चाहिए।

डेट फंड्स क्या होते हैं, इनमें कैसे होता है निवेश? जानिए

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के बीच इक्विटी फंड काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन हर निवेशक ज्यादा जोखिम लेकर शेयर बाजार में पैसा लगाना नहीं चाहता, ऐसे निवेशकों के लिए डेट फंड्स एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। अगर आप भी डेट फंड्स के बारे में विस्तार से समझना चाहते हैं कि ये क्या हैं, इनमें निवेश कैसे होता है और इनके फायदे-नुकसान क्या हैं, तो चलिए हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं। दरअसल, डेट फंड म्यूचुअल फंड की ऐसी श्रेणी हैं, जो मुख्य रूप से बॉन्ड, सरकारी प्रतिभूतियों, ट्रेजरी बिल, कॉरपोरेट डेट और अन्य निश्चित आय वाले साधनों में निवेश करते हैं, जिनका उद्देश्य निवेशकों के पैसे को अपेक्षाकृत स्थिर आय वाले साधनों में लगाकर रिटर्न हासिल करना होता है। डेट फंड को आसान भाषा में समझें तो ये ऐसे म्यूचुअल फंड हैं, जिनमें आपका पैसा कंपनियों या सरकार द्वारा जारी किए गए डेट इंस्ट्रूमेंट्स में लगाया जाता है। जब कोई कंपनी या सरकार बॉन्ड जारी करके पैसा जुटाती है, तो निवेशक को उस रकम पर ब्याज मिलता है। डेट फंड इसी तरह के कई साधनों में निवेश करके एक पोर्टफोलियो तैयार करते हैं।
डेट फंड की अलग-अलग श्रेणियां होती हैं। इनमें लिक्विड फंड, ओवरनाइट फंड, अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फंड, शॉर्ट ड्यूरेशन फंड, मीडियम ड्यूरेशन फंड, कॉरपोरेट बॉन्ड फंड और गिल्ट फंड जैसी कैटेगरी शामिल हैं। हर कैटेगरी की अवधि, जोखिम और रिटर्न की संभावना अलग हो सकती है।
डेट फंड में निवेश करना म्यूचुअल फंड की अन्य योजनाओं की तरह ही आसान है। निवेशक किसी म्यूचुअल फंड कंपनी, म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म या निवेश ऐप के माध्यम से अपनी जरूरत के अनुसार डेट फंड चुन सकता है। निवेश करने से पहले फंड की कैटेगरी, पोर्टफोलियो में शामिल प्रतिभूतियां, क्रेडिट क्वालिटी, औसत अवधि, खर्च अनुपात और जोखिम स्तर को समझना जरूरी है।
निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार एकमुश्त निवेश या एसआईपी के जरिए भी डेट फंड में पैसा लगा सकता है। हालांकि, डेट फंड चुनते समय केवल पिछले रिटर्न को देखकर फैसला करना सही नहीं है। निवेश का उद्देश्य और वह पैसा कितने समय के लिए निवेश करना है, इसके आधार पर फंड का चुनाव करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर डेट फंड को पूरी तरह सुरक्षित निवेश मान लिया जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। डेट फंड में जोखिम इक्विटी फंड की तुलना में अलग प्रकार का होता है। इसमें मुख्य रूप से क्रेडिट रिस्क और ब्याज दर का जोखिम महत्वपूर्ण होते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, क्रेडिट रिस्क तब होता है जब फंड जिस कंपनी के बॉन्ड में निवेश करता है, उसकी वित्तीय स्थिति खराब हो जाए या वह ब्याज अथवा मूलधन चुकाने में समस्या का सामना करे। वहीं ब्याज दर बढ़ने पर लंबी अवधि वाले बॉन्ड की कीमत प्रभावित हो सकती है। इसलिए ब्याज दरों में बदलाव का असर डेट फंड के रिटर्न पर भी पड़ सकता है।
वहीं, डेट फंड के फायदे की बात करें तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि निवेशक को अपने पोर्टफोलियो में स्थिर आय वाले साधनों का एक्सपोजर मिलता है। इक्विटी फंड की तुलना में इनमें आमतौर पर बाजार की तेज उतार-चढ़ाव वाली स्थितियों का असर कम होता है। इसी वजह से कई निवेशक अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी के साथ डेट फंड का इस्तेमाल विविधीकरण के लिए करते हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डेट फंड उन निवेशकों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं जिनका निवेश लक्ष्य कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक का है और जो अपने पैसे को सीधे किसी एक बॉन्ड या फिक्स्ड डिपॉजिट में लगाने के बजाय विभिन्न डेट इंस्ट्रूमेंट्स में फैलाना चाहते हैं। फंड मैनेजर अलग-अलग प्रतिभूतियों में निवेश करके जोखिम को फैलाने की कोशिश करता है।
यह कहना सही नहीं होगा कि डेट फंड हमेशा एफडी से ज्यादा रिटर्न देते हैं। बैंक एफडी में ब्याज दर पहले से तय होती है, जबकि डेट फंड का रिटर्न बाजार की परिस्थितियों, ब्याज दरों और फंड के पोर्टफोलियो पर निर्भर करता है। इसलिए डेट फंड में मिलने वाला रिटर्न निश्चित नहीं होता।
यही कारण है कि डेट फंड को गारंटीड रिटर्न वाला उत्पाद समझकर निवेश नहीं करना चाहिए। निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित फंड किस तरह की प्रतिभूतियों में पैसा लगा रहा है और उसका जोखिम स्तर क्या है।
डेट फंड का एक महत्वपूर्ण नुकसान यह है कि इनमें रिटर्न की गारंटी नहीं होती। ब्याज दरों में बदलाव, बॉन्ड की क्रेडिट क्वालिटी में गिरावट या बाजार की परिस्थितियों के कारण फंड का एनएवी बढ़ या घट सकता है। कुछ डेट फंड में कम अवधि के बावजूद जोखिम हो सकता है, जबकि लंबी अवधि वाले डेट फंड ब्याज दरों में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
इसके अलावा, डेट फंड में निवेश करने पर फंड मैनेजमेंट और अन्य खर्चों का असर भी रिटर्न पर पड़ता है। इसलिए किसी भी फंड का चयन करते समय केवल उसका पिछला प्रदर्शन देखना पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे निवेशक जो अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी की तुलना में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव वाले निवेश को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए डेट फंड एक विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, सही फंड का चुनाव निवेश की अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार होना चाहिए। छोटी अवधि के लक्ष्य के लिए अलग तरह के डेट फंड और लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए अलग कैटेगरी उपयुक्त हो सकती है।
डेट फंड में पैसा लगाने से पहले क्रेडिट क्वालिटी, ब्याज दर का जोखिम, फंड की अवधि, पोर्टफोलियो में शामिल बॉन्ड, खर्च अनुपात और फंड की कैटेगरी को जरूर समझें। यह भी ध्यान रखें कि डेट फंड बैंक एफडी की तरह निश्चित रिटर्न या मूलधन की गारंटी नहीं देते।

 उनाकोटी,यहां चट्टानों पर उकेरी गईं 99,99,999 मूर्तियां

भारत में कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं, जहां प्राकृतिक खूबसूरती के साथ इतिहास, आस्था और रहस्य का अनोखा मेल देखने को मिलता है। त्रिपुरा का उनाकोटी भी ऐसी ही जगह है, जो अपनी विशाल चट्टानों पर उकेरी गई प्राचीन आकृतियों और भगवान शिव से जुड़ी मान्यताओं के कारण देशभर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच मौजूद यह स्थल उन यात्रियों के लिए खास है, जिन्हें धार्मिक पर्यटन के साथ इतिहास और प्राचीन शिल्पकला को करीब से देखने में रुचि है। एक करोड़ से एक कम मूर्तियों के कारण पड़ा उनाकोटी नाम पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा राज्य में रघुनंदन पहाड़ियों की गोद में स्थित उनाकोटी का नाम ही अपने आप में इसकी सबसे बड़ी विशेषता बताता है। ‘उनाकोटी’ का अर्थ होता है एक करोड़ से एक कम। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां 99 लाख 99 हजार 999 देवी-देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों की गिनती का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन चट्टानों पर बनी विशाल और छोटी-बड़ी आकृतियों की संख्या तथा विस्तार इस स्थान को असाधारण बनाते हैं।

यहां पहुंचने वाले पर्यटक सबसे पहले चट्टानों पर उकेरी गई विशाल आकृतियों को देखकर आकर्षित होते हैं। प्राकृतिक पहाड़ियों के बीच पत्थरों को काटकर बनाई गई ये प्रतिमाएं प्राचीन शिल्पकला की अद्भुत झलक प्रस्तुत करती हैं। भगवान शिव की विशाल प्रतिमा यहां का प्रमुख आकर्षण है। इसके अलावा गणेश, देवी-देवताओं और अन्य धार्मिक आकृतियों के शिल्प भी यहां देखने को मिलते हैं।

विशाल शिव प्रतिमा है सबसे बड़ा आकर्षण

उनाकोटी की पहचान भगवान शिव की विशाल चट्टानी प्रतिमा से भी होती है। इसे स्थानीय स्तर पर उनाकोटेश्वर काल भैरव के नाम से भी जाना जाता है। प्रतिमा के आसपास बनी अन्य आकृतियां और पहाड़ी का प्राकृतिक स्वरूप मिलकर ऐसा दृश्य तैयार करते हैं, जिसे देखकर पर्यटक लंबे समय तक यहां रुकना पसंद करते हैं।

विशाल चट्टान पर उकेरे गए चेहरे की बनावट, सिर पर बने आभूषण और आसपास की अन्य आकृतियां इस पूरे क्षेत्र को बेहद अलग रूप देती हैं। बारिश के मौसम में पहाड़ियों और हरियाली के बीच इन शिल्पों का दृश्य और भी आकर्षक दिखाई देता है।

भगवान शिव से जुड़ी है प्रसिद्ध कथा

उनाकोटी को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं और इनमें भगवान शिव प्रमुख रूप से जुड़े हुए हैं। एक मान्यता के अनुसार भगवान शिव एक करोड़ देवी-देवताओं के साथ काशी की ओर जा रहे थे। रात होने पर सभी ने रघुनंदन पहाड़ियों के पास विश्राम किया। भगवान शिव ने सभी से कहा कि उन्हें सूर्योदय से पहले आगे की यात्रा शुरू करनी होगी।

कहा जाता है कि अगली सुबह भगवान शिव को छोड़कर बाकी देवी-देवता समय पर नहीं उठ सके। इसके बाद भगवान शिव अकेले ही आगे बढ़ गए और अन्य देवी-देवताओं के पत्थर की प्रतिमाओं में बदल जाने की मान्यता है। इसी कथा के कारण इस स्थान को एक करोड़ से एक कम यानी उनाकोटी कहा जाने लगा।

हालांकि यह कथा धार्मिक और स्थानीय लोकविश्वास का हिस्सा है। इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रमाणित नहीं किया गया है। पर्यटक यहां पहुंचकर इस कथा के साथ-साथ वास्तविक चट्टानी शिल्प और प्राचीन कला को भी देख सकते हैं।

कल्लू कुम्हार की कहानी भी है प्रसिद्ध

उनाकोटी से जुड़ी एक दूसरी लोकप्रिय कथा कल्लू कुम्हार की है। लोककथा के अनुसार कल्लू कुम्हार भगवान शिव और माता पार्वती के भक्त थे और वह भी उनके साथ कैलाश जाना चाहते थे। मान्यता है कि माता पार्वती ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक करोड़ देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने को कहा।

कहा जाता है कि कल्लू कुम्हार ने पूरी रात मेहनत करके लगभग एक करोड़ प्रतिमाएं तैयार कर दीं, लेकिन सुबह गिनती करने पर एक प्रतिमा कम निकली। इसी वजह से वह कैलाश नहीं जा सके और इस स्थान का नाम उनाकोटी पड़ गया। यह कथा भी स्थानीय परंपरा और लोकमान्यता के रूप में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।

इतिहास और पर्यटन का अनोखा संगम

उनाकोटी केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा स्थल नहीं है, बल्कि प्राचीन शिल्पकला और इतिहास में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण स्थान है। चट्टानों को काटकर बनाई गई प्रतिमाएं इस क्षेत्र की प्राचीन कलात्मक परंपरा की झलक देती हैं। इन प्रतिमाओं के निर्माण का सटीक समय और इन्हें बनाने वाले शिल्पकारों को लेकर इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग मत मिलते हैं।

कुछ मत इन्हें आठवीं-नौवीं शताब्दी के आसपास का मानते हैं, जबकि इनके निर्माण को लेकर अन्य ऐतिहासिक धारणाएं भी सामने आती रही हैं। इसलिए इनसे जुड़ी निश्चित तारीख या किसी एक शासक के समय में इनके निर्माण का दावा सावधानी के साथ ही किया जाना चाहिए।

हरियाली के बीच घूमने का अलग अनुभव

उनाकोटी की खूबसूरती केवल चट्टानों पर बनी प्रतिमाओं तक सीमित नहीं है। यह पूरा क्षेत्र पहाड़ियों और हरियाली से घिरा हुआ है। मानसून के दौरान आसपास का प्राकृतिक वातावरण और भी मनमोहक हो जाता है। पहाड़ी ढलानों से बहता पानी, घने पेड़ और चट्टानों के बीच दिखाई देती प्राचीन आकृतियां पर्यटकों को अलग तरह का अनुभव देती हैं।

जो लोग सामान्य धार्मिक यात्राओं से अलग कुछ देखना चाहते हैं, उनके लिए उनाकोटी एक शानदार पर्यटन अनुभव हो सकता है। यहां धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, इतिहास और प्राचीन कला को एक ही जगह महसूस किया जा सकता है।

अगर आप त्रिपुरा या पूर्वोत्तर भारत की यात्रा की योजना बना रहे हैं तो उनाकोटी को अपने पर्यटन कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। यह स्थान उन यात्रियों के लिए खास है जो प्राचीन भारतीय कला, धार्मिक परंपराओं, लोककथाओं और प्राकृतिक वातावरण को एक साथ देखना चाहते हैं।

यहां विशाल शिव प्रतिमा और चट्टानों पर बनी अन्य आकृतियां यात्रा का मुख्य आकर्षण हैं। इसके अलावा आसपास का पहाड़ी और हरियाली से भरा वातावरण कुछ समय शांतिपूर्वक बिताने का अवसर भी देता है। यही कारण है कि उनाकोटी आज त्रिपुरा के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में अपनी अलग पहचान बना चुका है।

उनाकोटी से जुड़ी एक करोड़ से एक कम मूर्तियों और कल्लू कुम्हार सहित विभिन्न कथाएं स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित हैं। प्रतिमाओं की वास्तविक संख्या और उनके निर्माण की निश्चित तिथि को लेकर प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी सीमित है।

(साभार – खास खबर)