Monday, September 21, 2026
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भारत के डीपटेक क्षेत्र ने वर्ष 2015 से अब तक 11.4 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित किया: रिपोर्ट

नयी दिल्ली । सोमवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के डीपटेक सेक्टर ने वर्ष 2015 से 2026 के बीच अब तक निजी इक्विटी (पीई) और वेंचर कैपिटल (वीसी) निवेश में लगभग 11.4 अरब डॉलर आकर्षित किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, स्टार्टअप फंडिंग में व्यापक सुस्ती के बावजूद 2025 डीपटेक निवेश के लिए अब तक का सबसे मजबूत वर्ष बनकर उभरा है। इंडियन वेंचर एंड अल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन (आईवीसीए) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 के बाद से डीपटेक क्षेत्र में निवेश गतिविधियों में तेज वृद्धि देखी गई है, जो दुनिया भर में उभरती अत्याधुनिक तकनीकों की ओर बढ़ते निवेश रुझान को दर्शाती है। भारत में विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जेनरेटिव एआई, इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) और बैटरी टेक्नोलॉजी ने निवेशकों को सबसे अधिक आकर्षित किया है। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर और स्पेसटेक ऐसे क्षेत्र रहे हैं जिन्होंने सबसे तेज विकास दर्ज किया है। भारत सरकार की सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों ने भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आईवीसीए के अध्यक्ष रजत टंडन ने कहा कि भारत का डीपटेक इकोसिस्टम अब केवल संभावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से निवेश योग्य अवसरों वाले क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहा है। उन्होंने कहा कि संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी इस परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।

टंडन के अनुसार, भारत को वैश्विक स्तर की डीपटेक कंपनियां तैयार करने के लिए कुछ प्रमुख चुनौतियों पर ध्यान देना होगा। इनमें सीरीज-बी और सीरीज-सी फंडिंग अंतर को कम करना, घरेलू लिमिटेड पार्टनर्स (एलपी) की भागीदारी बढ़ाना, बेहतर एग्जिट अवसर उपलब्ध कराना और नीतिगत ढांचे को और मजबूत बनाना शामिल है।

भौगोलिक दृष्टि से बेंगलुरु डीपटेक निवेश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। पिछले एक दशक में कुल निवेश और सौदों का लगभग आधा हिस्सा इसी शहर में हुआ। हालांकि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अहमदाबाद, कोच्चि और कोलकाता जैसे नए केंद्र भी अब डीपटेक गतिविधियों और निवेश को आकर्षित करने लगे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश फंड्स ने डीपटेक क्षेत्रों में सक्रिय निवेश किया है, जिनमें सबसे अधिक रुचि एआई, जेनरेटिव एआई और सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (सास) क्षेत्रों में देखी गई। इसके बाद स्पेसटेक और डिफेंस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है।

हालांकि रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर भी संकेत किया है। शुरुआती चरण के बाद निवेशकों की संख्या में तेज गिरावट देखने को मिलती है और विकास चरण में पर्याप्त पूंजी उपलब्ध नहीं हो पाती। डीपटेक कंपनियों को व्यावसायिक सफलता तक पहुंचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, जबकि पारंपरिक फंड संरचनाएं अक्सर इतनी लंबी समयावधि के लिए तैयार नहीं होतीं। यही कारण है कि कई डीपटेक स्टार्टअप्स को सीरीज-बी और सीरीज-सी चरण में पूंजी जुटाने में कठिनाई होती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत का डीपटेक निवेश आधार फिलहाल मुख्य रूप से घरेलू निवेशकों पर आधारित है। फैमिली ऑफिस, संस्थागत निवेशक और उच्च नेटवर्थ वाले व्यक्ति (एचएनआई) इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि हाल के वर्षों में वैश्विक निवेशकों और कॉरपोरेट एलपी की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है।

भगवान शिव ने इसलिए गंगा को बांधा जटाओं में

सनातन धर्म की पौराणिक गाथाएं अंतर्मन को तृप्त कर देती हैं। भगवान शिव की जटा से निकली मां गंगा की पवित्र कथा ऐसी ही एक अलौकिक कहानी है। यह प्रसंग केवल एक पावन नदी के उत्पत्ति की पौराणिक व्याख्या भर नहीं है, बल्कि यह सिखाता है कि निश्छल भक्ति ईश्वर को आपके समीप तो ला सकती है, लेकिन उस दिव्य ऊर्जा को संभालने के लिए अनुशासन और मानसिक ठहराव की जरूरत होती है। यही कारण है कि इस पूरी गाथा में देवों के देव महादेव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भगवान शिव दिव्य शक्ति के नियंत्रक बनकर पूरे संसार के रक्षक की भूमिका निभाते हैं। जानते हैं कैसे…

शिव जी ने क्यों गंगा को अपनी जटाओं में बांधा?

इस उत्तर को समझने के लिए सबसे पहले राजा भगीरथ के चरित्र को जानना जरूरी है। भगीरथ को अटूट संकल्प और निष्काम कर्म का सबसे अच्छा उदाहरण माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा भगीरथ के पूर्वजों (राजा सगर के साठ हजार पुत्रों) की आत्माएं मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही थीं। भगीरथ का अटूट विश्वास था कि केवल मां गंगा का पावन जल ही उनके पूर्वजों के पापों से शांति प्रदान कर सकता है।

भगीरथ की तपस्या

भगीरथ की तपस्या कोई साधारण पूजा-पाठ नहीं थी। यह एक अत्यंत कठिन, धैर्यपूर्ण और बिना झुके की जाने वाली साधना थी। भगीरथ ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया ताकि मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति मिल सके। ऐसा ही हुआ, लेकिन शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग से उतरते समय मां गंगा का वेग और प्रवाह इतना तेज था कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर गिरतीं, तो उनके प्रचंड प्रहार से पूरी धरती रसातल में चली जाती और विनाश हो जाता। इससे मां गंगा को अहंकार हो गया।

जब टूटा मां गंगा का अहंकार

इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए इस कथा में भगवान शिव का आगमन होता है। बता दें, जब गंगा का प्रचंड वेग पृथ्वी की ओर बढ़ा, तब भगवान शिव ने अपने मस्तक पर अपनी जटाएं खोल दीं और गंगा की उस विशाल धारा को जटाओं के जाल में समेट लिया। गंगा शिव की जटाओं में पूरी तरह से बंदी बनकर रह गईं और उनका अहंकार व प्रचंड वेग पूरी तरह शांत हो गया। इसके बाद महादेव ने अपनी जटाओं से गंगा की अत्यंत शांत और छोटी-छोटी धाराएं पृथ्वी पर बहने के लिए मुक्त कीं।

शिव-गंगा की कथा का सार

शिव द्वारा गंगा को धारण करने की घटना में एक रहस्य छिपा हुआ है। कई लोग यह सोचते हैं कि शिव ने गंगा को रोक लिया था, लेकिन वास्तव में उन्होंने गंगा को रोका नहीं था, बल्कि उसे सही दिशा में मोड़ा था। महादेव ने गंगा की शक्ति को न तो खारिज किया और न ही उनके अस्तित्व को दबाया। इसके बजाय वे इतने स्थिर बने कि उस  ऊर्जा को अपने भीतर समा सके। रोज के जीवन में हमारे सामने भी कई तरह की प्रचंड ऊर्जाएं आती हैं, जैसे अत्यधिक क्रोध, लालसा, सफलता, गहरा दुख। यदि ये भावनाएं हमारे जीवन पर सीधे और बेकाबू होकर गिरेंगी, तो हमारे संबंध और मानसिक शांति दोनों छिन्न-भिन्न हो जाएंगे।

(साभार – हर जिंदगी डॉट कॉम)

स्वतंत्रता के रंग फैशन के साथ

स्वतंत्रता दिवस सिर्फ देशभक्ति का पर्व नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति और पहचान को स्टाइलिश तरीके से दिखाने का भी मौका है। हर साल 15 अगस्त के मौके पर लोग तिरंगे के रंगों से प्रेरित आउटफिट्स पहनना पसंद करते हैं। स्कूल, कॉलेज, ऑफिस और सोसाइटी में होने वाले कार्यक्रमों में हर कोई ऐसा लुक चाहता है जो सादगी के साथ-साथ आकर्षक भी लगे।
इस दिन खादी, हैंडलूम और एथनिक वियर की मांग भी बढ़ जाती है क्योंकि ये भारतीयता की भावना को दर्शाते हैं। हालांकि, तिरंगे के रंगों को पहनने का मतलब यह नहीं कि आप पूरी तरह केसरिया, सफेद और हरे रंग में ही नजर आएं। सही रंगों, एक्सेसरीज और कपड़ों के चुनाव से आप एक संतुलित और फैशनेबल लुक पा सकते हैं-
खादी और हैंडलूम वियर
15 अगस्त के मौके पर खादी कुर्ता, साड़ी या हैंडलूम ड्रेस पहनना एक शानदार विकल्प हो सकता है। यह आरामदायक होने के साथ-साथ भारतीय विरासत से भी जुड़ा है।
तिरंगे के रंगों का स्मार्ट इस्तेमाल करें
पूरे तिरंगे रंग पहनने के बजाय किसी एक रंग को मुख्य रखें और बाकी रंगों को एक्सेसरीज में शामिल करें। इससे लुक ज्यादा आकर्षक और संतुलित दिखाई देगा।
एथनिक और फ्यूजन लुक अपनाएं
लड़कियां सफेद कुर्ती के साथ हरा दुपट्टा या केसरिया स्टोल कैरी कर सकती हैं। वहीं लड़के सफेद कुर्ते के साथ नेहरू जैकेट पहनकर स्टाइलिश दिख सकते हैं।
एक्सेसरीज से बढ़ाएं आकर्षण
तिरंगा बैज, स्कार्फ, ब्रेसलेट, झुमके या पॉकेट स्क्वायर जैसी छोटी एक्सेसरीज आपके लुक में देशभक्ति का खास स्पर्श जोड़ सकती हैं।
मेकअप और ग्रूमिंग रखें सिंपल
बहुत ज्यादा मेकअप या हेयर स्टाइल की बजाय नैचुरल और फ्रेश लुक अपनाएं। यह आपके आउटफिट को और बेहतर तरीके से उभारता है। सही कपड़ों और एक्सेसरीज के साथ आप तिरंगे के रंगों में स्टाइलिश भी दिख सकते हैं और देश के प्रति अपना सम्मान भी व्यक्त कर सकते हैं।

लाल किले से ही इसलिए फहराया जाता है तिरंगा

हर साल 15 अगस्त आते ही देश तिरंगे के रंग में रंग जाता है। स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और घरों से लेकर देश के प्रमुख स्मारकों तक स्वतंत्रता दिवस की रौनक दिखाई देती है। इस पूरे राष्ट्रीय उत्सव का सबसे प्रमुख दृश्य नई दिल्ली के लाल किले से सामने आता है, जहां प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। सवाल यह है कि आखिर आजादी के इस सबसे बड़े राष्ट्रीय समारोह के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया? इसका जवाब भारत के लंबे इतिहास, सत्ता के प्रतीक के रूप में लाल किले की भूमिका और आजादी के आंदोलन से जुड़ी इसकी विरासत में छिपा है। लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद के केंद्र में कराया था। इसका निर्माण 1639 में शुरू हुआ और 1648 में पूरा हुआ। यमुना के किनारे बना यह विशाल किला मुगल सत्ता का प्रमुख केंद्र रहा। इसकी लाल बलुआ पत्थर की विशाल दीवारों ने इसे न सिर्फ स्थापत्य की दृष्टि से विशिष्ट बनाया, बल्कि इसे दिल्ली में सत्ता और शासन के सबसे बड़े प्रतीकों में भी शामिल कर दिया। यूनेस्को के अनुसार, लाल किला शाहजहां के दौर से ही सत्ता का प्रतीक रहा और बाद में ब्रिटिश शासन तथा भारत की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का भी साक्षी बना। लाल किले का महत्व केवल मुगल काल तक सीमित नहीं रहा। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेतृत्व सौंपा गया। विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया और लाल किले पर भी ब्रिटिश सैन्य कब्जे का दौर शुरू हुआ। 1857 के बाद किले के कई हिस्सों में बदलाव किए गए और कुछ ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान भी पहुंचा।
जब भारत आजाद हुआ तो देश को ऐसे प्रतीक की जरूरत थी, जो सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय स्वाभिमान का भी प्रतिनिधित्व करे। लाल किला इस भूमिका के लिए स्वाभाविक रूप से सामने आया। यह वही स्थान था जो सदियों तक दिल्ली की राजनीतिक सत्ता का केंद्र रहा था और जिसने मुगल शासन से लेकर ब्रिटिश दौर तक सत्ता के बदलाव देखे थे।
यही वजह है कि आजादी के बाद लाल किले को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह से जोड़ने का निर्णय धीरे-धीरे एक मजबूत परंपरा में बदल गया। खास बात यह है कि लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा की शुरुआत 15 अगस्त 1947 को नहीं, बल्कि 16 अगस्त 1947 को हुई थी। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।
इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि आज 15 अगस्त को लाल किले से होने वाला समारोह केवल उसी दिन की पहली ध्वजारोहण घटना को दोहराने की परंपरा नहीं है, बल्कि आजादी की उस ऐतिहासिक विरासत का विस्तार है, जो स्वतंत्र भारत के शुरुआती दिनों में लाल किले से जुड़ गई।
लाल किले को चुनने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण उसका ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व है। जिस इमारत को कभी शासकों की शक्ति और साम्राज्य का प्रतीक माना जाता था, उसी की प्राचीर से स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री तिरंगा फहराता है। यह बदलाव अपने आप में बेहद शक्तिशाली संदेश देता है- सत्ता अब किसी साम्राज्य की नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की जनता और उसके लोकतांत्रिक गणराज्य की है।
लाल किले की पहचान दिल्ली और भारत के राजनीतिक इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। यूनेस्को भी इसे भारत की स्वतंत्रता के पहले समारोह के स्थल के रूप में दर्ज करता है और बताता है कि आज भी यहीं स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है।
15 अगस्त की सुबह प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराने के बाद राष्ट्रगान और औपचारिक सलामी होती है। इसके बाद प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं। इस संबोधन में सरकार की उपलब्धियों, चुनौतियों, नीतियों और आने वाले वर्षों की दिशा का उल्लेख किया जाता है।
इस समारोह को केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाता। यह वह अवसर होता है जब देश का नेतृत्व सीधे नागरिकों से संवाद करता है। लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण देश के कोने-कोने तक पहुंचता है और स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदानों के साथ-साथ भविष्य के भारत की तस्वीर भी सामने रखता है।
लाल किला आज केवल स्वतंत्रता दिवस समारोह का स्थल नहीं है। यह भारत की ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। लाल किला परिसर को 2007 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था।
इसलिए हर 15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो वह सिर्फ एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं होता। उसके पीछे सदियों का इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियां और लोकतांत्रिक भारत की पहचान जुड़ी होती है। यही वजह है कि लाल किले से होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह आज देश की आजादी और राष्ट्रीय गौरव का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।

जब हिंसा की राह छोड़कर रैंप पर चलीं पूर्व नक्सल महिलाएं

रायपुर । रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के कार्यक्रम में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने संघर्ष से बदलाव की कहानी सामने रख दी।
बस्तर की पूर्व महिला नक्सलियों ने पारंपरिक छत्तीसगढ़ी हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक किया। कभी हिंसा और संघर्ष के रास्ते पर रहीं इन महिलाओं ने आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौटकर नई जिंदगी शुरू की है।
कोसा सिल्क और हाथ से बुने कपड़ों में रैंप पर उतरीं महिलाओं का दर्शकों ने जोरदार तालियों से स्वागत किया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी कार्यक्रम में उनसे मुलाकात कर उनके नए सफर के लिए शुभकामनाएं दीं।
यह रैंप वॉक सिर्फ फैशन का हिस्सा नहीं था। यह पुनर्वास, आत्मसम्मान और नई शुरुआत की तस्वीर बनी। मुख्यधारा में लौटने के बाद कई पूर्व नक्सली महिलाएं अब रोजगार, सामाजिक काम और दूसरे नए अवसरों से जुड़ रही हैं।
बस्तर जैसे लंबे समय तक नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्र की इन महिलाओं का मंच पर आत्मविश्वास के साथ सामने आना दिखाता है कि सही अवसर मिलने पर जिंदगी की दिशा बदली जा सकती है।

भारत में जल्द शुरू हो सकता है पॉलीमर नोटों का ट्रायल

-सरकार ने 10 और 20 रुपये के 2 अरब नोटों को दी मंजूरी

नयी दिल्ली । भारत में मुद्रा प्रणाली को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने 10 रुपए और 20 रुपए के पॉलीमर बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। मंगलवार को संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार ने दोनों मूल्यवर्गों में एक-एक अरब (100 करोड़) पॉलीमर नोट जारी करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान कर दी है। राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपने केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश के आधार पर आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 25 के तहत यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था। इस प्रस्ताव में फील्ड ट्रायल के बाद सफल परिणाम मिलने पर इन मूल्यवर्गों में पॉलीमर नोटों को नियमित रूप से जारी करने की भी योजना शामिल है। वित्त मंत्री ने कहा, “सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। आरबीआई के अनुसार, इन पॉलीमर बैंक नोटों को मौजूदा कागज आधारित नोटों के साथ समानांतर रूप से जारी करने का प्रस्ताव है।”
पॉलीमर बैंक नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक आधारित पदार्थ से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं और नमी, धूल तथा सामान्य घिसावट का बेहतर सामना कर सकते हैं। दुनिया के कई देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन में पहले से ही पॉलीमर नोटों का उपयोग किया जा रहा है।
पॉलीमर नोटों की आयु कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है, जिससे बार-बार नोट छापने की आवश्यकता कम होती है। इसके अलावा इनमें उन्नत सुरक्षा विशेषताएं जोड़ना भी आसान होता है, जिससे नकली नोटों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।
निर्मला सीतारमण ने संसद को बताया कि आरबीआई की ओर से सरकार को सूचित किया गया है कि इन नोटों के लिए आवश्यक खरीद प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए फिलहाल यह बताना संभव नहीं है कि पॉलीमर नोटों को आम जनता के बीच कब तक जारी किया जाएगा और इस पूरी परियोजना पर कितना खर्च आएगा।
इस महीने की शुरुआत में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट अभी जारी है।
उन्होंने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से कहा था, “पॉलीमर नोटों पर अभी परीक्षण चल रहा है। बाजार में लाने से पहले इन नोटों की पूरी तरह जांच की जाएगी।”
इस दौरान, आरबीआई गवर्नर ने यह भी संकेत दिया कि केंद्रीय बैंक फील्ड ट्रायल के नतीजों का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद ही व्यापक स्तर पर इनके प्रचलन को लेकर अंतिम फैसला करेगा।
संजय मल्होत्रा के अनुसार, आरबीआई का लक्ष्य वित्त वर्ष 2027-28 तक पॉलीमर नोटों को प्रचलन में लाना है। यदि ट्रायल सफल रहता है, तो यह भारतीय मुद्रा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

विभाजन की विभीषिका और फिल्मी गीतों में रोता हिन्दुस्तान

कैलाश चन्द्र

भारत का विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था। 1947 में एक राजनीतिक सीमा खींची गई, लेकिन उसके साथ करोड़ों मनुष्यों के जीवन, परिवार, स्मृतियों और संबंधों पर भी एक ऐसी रेखा खिंच गई जिसकी पीड़ा पीढ़ियों तक बनी रही। अभी भी हजारों परिवारों में वो कसक शेष है। उनके घर छूटे, गाँव छूटे, खेत-खलिहान छूटे, रिश्ते छूटे और सबसे बढ़कर वह मिट्टी छूट गई जिसे लोग अपना देश, अपना वतन कहते थे।

विभाजन की त्रासदी को इतिहास की पुस्तकों में आंकड़ों, घटनाओं और राजनीतिक निर्णयों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है; लेकिन उसकी मानवीय पीड़ा को समझने के लिए साहित्य, कविता, कहानी और सिनेमा की ओर देखना पड़ता है। हिन्दी सिनेमा ने विभाजन को अनेक बार परदे पर उतारा और फिल्मी गीतों ने उस पीड़ा को ऐसी भावनात्मक भाषा दी, जिसे सुनकर आज भी विस्थापन की वेदना को अनुभूत किया जा सकता है।

विभाजन के बाद बने भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा भले ही निश्चित हो गई, लेकिन स्मृतियों की कोई सीमा नहीं बनी। गीतों में बार-बार वही प्रश्न लौटता रहा—जिस घर को अपना समझकर जीवन बिताया, उसे अचानक पराया कैसे मान लें?

“वतन” जब एक स्मृति बन गया

स्वतंत्रता से पहले ‘वतन’ शब्द का अर्थ था—अपनी धरती, अपना देश और स्वतंत्रता की आकांक्षा। लेकिन विभाजन के बाद ‘वतन’ का एक नया अर्थ उभरा—वह जगह जहाँ मनुष्य का बचपन बीता था।अब वतन केवल भारत या पाकिस्तान नहीं था। किसी के लिए लाहौर वतन था, किसी के लिए अमृतसर, किसी के लिए रावलपिंडी, मुल्तान, पेशावर, ढाका या कराची। किसी के लिए वतन वह गांव था जहाँ पीढ़ियों से घर खड़ा था।

यही कारण है कि विभाजन पर बने अनेक गीतों में राष्ट्र की तुलना में घर, मां, मिट्टी, गलियां, बचपन और बिछुड़े रिश्ते अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं।विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी यही थी कि लाखों लोगों को यह निर्णय स्वयं नहीं लेना था कि उनका घर कहां होगा। सीमाओं ने उनके लिए तय कर दिया कि वे अब कहाँ के नागरिक हैं।

‘वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो…’ 1948 की फिल्म ‘शहीद’ स्वतंत्रता के तुरंत बाद आई महत्वपूर्ण फिल्मों में थी। इसका गीत— “वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो…” यह स्वतंत्रता और बलिदान की भावना का गीत था। लेकिन 1947 के बाद ‘वतन’ शब्द का भाव और भी जटिल हो गया था। स्वतंत्रता मिली थी, मगर उसी स्वतंत्रता की कीमत विभाजन और विस्थापन के रूप में भी सामने आई। एक ओर स्वतंत्रता का पर्व था, दूसरी ओर शरणार्थियों की बिलखती टोलियां। एक ओर अपना तिरंगा लहरा रहा था, दूसरी ओर अपने घरों से उजड़े लोग अपने भविष्य की तलाश में भटक रहे थे। यही भारतीय इतिहास का वह विरोधाभास है जिसे केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं समझा जा सकता।

‘ऐ मेरे प्यारे वतन…’

विभाजन की पीड़ा को सीधे-सीधे व्यक्त करने वाले गीतों में फिल्म ‘काबुलीवाला’ (1961) का गीत “ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल कुर्बान” अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह गीत वास्तव में अफगानिस्तान पूर्व का गांधार से दूर रह रहे एक व्यक्ति की मातृभूमि के प्रति भावनात्मक पुकार है। लेकिन विभाजन के बाद के भारतीय मानस ने इसमें अपने बिछड़े हुए वतन की पीड़ा भी महसूस की। जब कोई व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर हो जाता है, तो ‘वतन’ भौगोलिक स्थान नहीं रहता—वह स्मृति बन जाता है।और स्मृति को कोई सीमा नहीं रोक सकती। यही कारण है कि यह गीत विभाजन की सामूहिक स्मृति के संदर्भ में भी मार्मिक प्रतीत होता है।

‘वो सुबह कभी तो आएगी’

साहिर लुधियानवी की कविता और फिल्मी गीतों में स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक बेचैनी दिखाई देती है। “वो सुबह कभी तो आएगी…” यह केवल भविष्य की आशा नहीं है; यह उस पीढ़ी की आकांक्षा है जिसने स्वतंत्रता देखी, लेकिन स्वतंत्रता के साथ गरीबी, विस्थापन, हिंसा और सामाजिक असमानता भी देखी। विभाजन के बाद करोड़ों लोगों के सामने एक नया जीवन शुरू करने की चुनौती थी। उनके लिए आजादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था; वह सुरक्षित घर, सम्मानजनक जीवन और अपनेपन की तलाश भी थी। इसलिए उस समय के गीतों में उत्सव के साथ-साथ उम्मीद और पीड़ा दोनों साथ चलते हैं।

‘जिन्हें नाज है हिन्द पर…’

सिनेमा ने विभाजन की पीड़ा को केवल विस्थापितों की कहानी बनाकर नहीं छोड़ा। उसने स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई सामाजिक विषमताओं पर भी प्रश्न उठाए।साहिर की रचनाओं में यह प्रश्न बार-बार दिखाई देता है कि यदि देश स्वतंत्र हो गया है तो क्या हर नागरिक स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मानित भी हुआ? यही प्रश्न ‘प्यासा’ जैसे सिनेमा में दिखाई देता है। विभाजन के बाद का भारत केवल राष्ट्रनिर्माण का भारत नहीं था; वह अपने आपको (स्व, चित्ति) खोजता हुआ भारत भी था।

‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…’ ‘प्यासा’ (1957) का संसार सीधे विभाजन की कहानी नहीं कहता, लेकिन उसके भीतर युद्धोत्तर और विभाजनोत्तर समाज की बेचैनी सुनाई देती है। साहिर लुधियानवी की दृष्टि में मनुष्य की कीमत धन और सत्ता से बड़ी है।विभाजन ने मनुष्य को अचानक ‘शरणार्थी’, ‘हिन्दू’, ‘मुस्लिम’, ‘सिख’, ‘भारतीय’ या ‘पाकिस्तानी’ जैसी पहचान में बांट दिया था। लेकिन उसके पहले वह एक मनुष्य था—जिसका घर था, परिवार था, पड़ोसी थे और स्मृतियाँ थीं। विभाजन के गुनहगार कौन? क्या सिनेमा की कला एवं मनोरंजन की मानवीय दृष्टि इस मूल सत्य को बार-बार याद दिला सकी? ऐसे कुछ प्रश्न भी मन में चिरस्थायी है।

‘अजीब दास्तां है ये…’

फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ (1960) का गीत—“अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहाँ ख़तम…” विभाजन पर लिखा गीत नहीं है, लेकिन इसके भाव विभाजन की कहानी को समझने में अद्भुत रूपक बन जाते हैं।विभाजन भी ऐसी ही एक ‘अजीब दास्तान’ था।एक दिन तक जो पड़ोसी थे, वे अचानक दूसरी ओर के लोग हो गए। जो घर अपना था, वह पराया हो गया। जो मार्ग नित्य का था, वह सीमा के उस पार चला गया। और जिन रिश्तों को पीढ़ियों ने बनाया था, वे राजनीति के एक निर्णय से टूट गए।

‘घर आया मेरा परदेसी…’

भारतीय सिनेमा में घर लौटने का भाव बार-बार आता है। लेकिन विभाजन की पीढ़ी के लिए घर लौटना हमेशा संभव नहीं था।कई लोगों के घर अब दूसरे देश में थे। कई घरों में दूसरे लोग बस चुके थे। कई घर जल चुके थे। कई घरों का केवल नाम बचा था।इसलिए फिल्मी गीतों में ‘घर’ का भाव विभाजन के बाद विशेष रूप से मार्मिक बन जाता है।

घर केवल चार दीवारें नहीं था। घर था—आंगन, नीम का पेड़, पड़ोसी, मंदिर-गुरुद्वारे, मठो की आवाजें, खेत, कुआं, स्कूल, बाजार और बचपन की स्मृतियां।

जब यह सब छूट गया, तो विस्थापन केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहा; वह स्मृति का स्थायी घाव बन गया।

‘कर चले हम फ़िदा…’ और विभाजन के बाद का सैनिक

1964 की फिल्म ‘हकीकत’ का गीत— “कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो…” 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में था। यह विभाजन पर आधारित गीत नहीं है, लेकिन स्वतंत्र भारत के उस मानस को व्यक्त करता है जिसने 1947 के बाद राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा को सर्वोच्च कर्तव्य के रूप में देखा। विभाजन के बाद सीमाएं केवल नक्शे पर बनी रेखाएं नहीं थीं। वे करोड़ों लोगों के जीवन की वास्तविकता बन गई थीं।1947 के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में तनाव और युद्धों ने उस विभाजन की स्मृति को लगातार जीवित रखा।इसलिए सैनिकों पर बने गीतों में एक ओर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प है, तो दूसरी ओर उस विभाजित उपमहाद्वीप की लगातार चलती पीड़ा भी कहीं न कहीं मौजूद है।

‘संदेशे आते हैं…’

फिल्म ‘बॉर्डर’ (1997) का गीत— “संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं…”सैनिक और उसके परिवार के बीच की दूरी का गीत है। लेकिन विभाजन की पीढ़ी के लिए ‘दूरी’ का अर्थ इससे भी बड़ा था। कई परिवारों में दूरी केवल कुछ महीनों या वर्षों की नहीं थी। वे पीढ़ियों तक अपने बिछुड़े रिश्तेदारों से नहीं मिल पाए। एक पत्र सीमा पार नहीं जा सकता था। एक संदेश वर्षों तक नहीं पहुंचता था। किसी भाई को पता नहीं था कि बहन कहां है। किसी मां को नहीं पता था कि उसका बेटा जीवित है या नहीं। इसलिए “संदेशे आते हैं” जैसी भावनाएं विभाजन की सामूहिक स्मृति से भी जुड़ जाती हैं।

विभाजन और ‘मां’ का रूपक

भारतीय सिनेमा में मातृभूमि को ‘मां’ कहने की परंपरा पुरानी है। ‘मदर इंडिया’ में मां केवल परिवार की मां नहीं है; वह भारतीय किसान समाज और धरती का प्रतीक बन जाती है।विभाजन ने ‘माँ’ के इस रूपक को और जटिल बना दिया। जिस धरती को मां माना गया, वही धरती दो राष्ट्रों में बांट दी गई।

एक व्यक्ति कह सकता था—“मेरा देश भारत है।” दूसरा कह सकता था—“मेरा देश पाकिस्तान है।” लेकिन दोनों की स्मृतियों में कभी-कभी वही नदी, वही खेत, वही भाषा और वही संस्कृति जीवित थी। इसलिए विभाजन की सबसे गहरी पीड़ा शायद यह थी कि राजनीतिक सीमा ने स्मृतियों का विभाजन नहीं किया।

फिल्मी गीतों में ‘बिछड़ना’ : विभाजन का सबसे मानवीय शब्द

विभाजन को समझने के लिए एक शब्द सबसे महत्वपूर्ण है—बिछड़ना। लोग केवल देश से नहीं बिछड़े। वे— घर से बिछड़े, परिवार से बिछड़े, दोस्तों से बिछड़े, पड़ोसियों से बिछड़े, अपनी भाषा के वातावरण से बिछड़े, अपनी मिट्टी से बिछड़े।इसीलिए हिन्दी फिल्मों के प्रेम, विरह और घर-वापसी के अनेक गीत विभाजन की स्मृतियों के साथ नए अर्थ ग्रहण करते रहे। गीतों ने उन भावनाओं को शब्द दिए जिन्हें इतिहास की भाषा अकसर व्यक्त नहीं कर पाती।

सिनेमा ने विभाजन को कैसे याद रखा?

विभाजन की प्रत्यक्ष स्मृति पर आधारित फिल्मों में बाद के दशकों में कई महत्वपूर्ण उदाहरण सामने आए। ‘गरम हवा’ (1973) ने विभाजन के बाद भारत में रह गए एक मुस्लिम परिवार की असुरक्षा और विस्थापन की मनःस्थिति को सामने रखा। ‘तमस’ (1987) ने विभाजन की हिंसा को कठोर यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया। ‘अर्थ’ और अन्य फिल्मों ने अलग-अलग स्तरों पर टूटते परिवारों और बदलते सामाजिक संबंधों को सामने रखा। बाद में ‘पिंजर’ (2003) ने विभाजन के बीच स्त्री, अपहरण, धर्म और मानवता के प्रश्नों को उठाया। ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसे सिनेमा ने विभाजन के शरणार्थी बने एक बच्चे की कहानी को राष्ट्रीय उपलब्धि की यात्रा से जोड़ा। मिल्खा सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण बन गया कि विभाजन की राख से भी नई जीवन-गाथा जन्म ले सकती है।

विभाजन : पीड़ा से पुनर्निर्माण तक

विभाजन की कहानी केवल विनाश की कहानी नहीं है। यह पुनर्निर्माण की कहानी भी है। करोड़ों विस्थापितों ने नए शहर बसाए। नई दुकानें खोलीं। नए उद्योग खड़े किए। बच्चों को पढ़ाया। नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया। भारत ने भी अपनी लोकतांत्रिक यात्रा शुरू की। इसलिए विभाजन के गीतों में आँसू के साथ आशा भी दिखाई देती है। जीवन का प्रेरणादायी जीवंत संघर्ष दिखाई देता है। घर छूटा, लेकिन जीवन नहीं छूटा। मिट्टी छूटी, लेकिन स्मृति नहीं छूटी। रिश्ते टूटे, लेकिन मानवता की संभावना नहीं टूटी।

गीतों में बचा हुआ वह हिन्दुस्तान

विभाजन की विभीषिका को केवल मृत्यु और विस्थापन के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिए उस बूढ़े व्यक्ति की आंखों में देखना होगा जो आज भी लाहौर की अपनी गली को याद करता है। उस मां की स्मृति सुननी होगी जिसका बेटा सीमा के उस पार रह गया। दूसरी ओर से कह सकते हैं कि बेटा सीमाओं की रक्षा करते वहीं पर इस दुनिया से ही विदा हो गया है। बहुत सी स्मृति बंटवारे ने खड़ी की है। उस शरणार्थी परिवार की कहानी सुननी होगी जिसने दिल्ली, अमृतसर, जयपुर, मुंबई या किसी दूसरे शहर में अपना जीवन फिर से शुरू किया और उस गीत को सुनना होगा जिसमें कोई दूर बैठा व्यक्ति कहता है—

“ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल कुर्बान…”

क्योंकि विभाजन ने नक्शा बांटा था, स्मृतियां नहीं। उसने राजनीतिक सीमाएं बनाई थीं, भावनाओं की सीमाएं नहीं। उसने लोगों को अलग देशों का नागरिक बना दिया, लेकिन उनकी भाषा, संगीत, भोजन, लोक-स्मृतियों और बचपन की गलियों को एक झटके में अलग नहीं कर पाया। इसीलिए भारतीय सिनेमा के गीतों में विभाजन आज भी कभी वतन की पुकार, कभी घर की याद, कभी बिछड़े रिश्ते, कभी सैनिक का बलिदान और कभी नई पीढ़ी के पुनर्निर्माण के रूप में सुनाई देता है।

“तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम….” जिस वतन की धरती को मैं छू नहीं सकता, उसकी हवा ही मेरे पास आ जाए तो मैं उसे भी अपने सौभाग्य की तरह स्वीकार करूंगा। यही भाव विभाजन के बाद विस्थापित पीढ़ी की सबसे गहरी पीड़ा को व्यक्त करता है—वतन से दूरी इतनी बढ़ गई कि वहां से आती हवा भी मिलन का माध्यम बन गई।

इतिहास कहता है—1947 में भारत का विभाजन हुआ। लेकिन गीत कहते हैं—एक पीढ़ी अपने भीतर एक पूरा घर लेकर विस्थापित हुई थी। और शायद यही विभाजन की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है— सीमा जमीन पर खिंची थी, लेकिन उसकी रेखा मनुष्यों के हृदयों पर भी पड़ी। जमीन बंट गई, देश बंट गए, पर स्मृतियों का हिन्दुस्तान आज भी गीतों में, भावना और एहसास में जीवित है। जो कह रहा है कि तुम्हारा प्यारा अखंड भारत कहां है जिसे दिल ढूंढ़ रहा है। जिसे दिल ढूंढ़ रहा है।
(हिन्दुस्थान समाचार से  साभार)

हर महीने पानी में डूबा रहता है जलकेश्वर नाथ मंदिर

– मान्यता है स्वयं मां गंगा करती हैं जलाभिषेक

-कन्हर नदी के तट पर स्थित है रहस्यमय शिवालय

भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि सावन शुरू होते ही जिले के छोटे-बड़े सभी शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सुबह से ही कतार में लगकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इसी आस्था और परंपरा के बीच बलरामपुर जिले में एक ऐसा शिवालय भी है, जो अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और धार्मिक मान्यताओं के कारण लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

यह शिवालय रामानुजगंज से करीब दो किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत लुर्गी में कन्हर नदी के तट पर स्थित है। इसे जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की खासियत यह है कि यहां दो स्थानों पर शिवलिंग स्थापित हैं। नदी के बिल्कुल करीब नीचे की ओर स्थित शिवालय बरसात के मौसम में कन्हर नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ पानी में डूब जाता है। वहीं, इसके ऊपर स्थित दूसरे शिवालय में श्रद्धालु इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं।

कन्हर नदी का जलस्तर बारिश के दिनों में बढ़ जाता है। ऐसे में नदी के किनारे सबसे नीचे स्थित जलकेश्वर नाथ मंदिर और वहां स्थापित शिवलिंग पानी में डूब जाता है। नदी का पानी कम होने के बाद शिवलिंग दोबारा श्रद्धालुओं के दर्शन और पूजा के लिए दिखाई देने लगता है।कन्हर नदी, दो शिवालय और चार महीने तक पानी में डूबा रहने वाला शिवलिंग इस स्थान को आस्था, प्रकृति और रहस्य का अनोखा संगम बनाते हैं।

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि कन्हर नदी गंगा के समान पवित्र है और बरसात के चार महीनों में मां गंगा स्वयं जलकेश्वर नाथ का जलाभिषेक करती हैं। यही धार्मिक मान्यता इस स्थान को क्षेत्र के दूसरे शिवालयों से अलग पहचान देती है।

जलकेश्वर नाथ मंदिर की एक और खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। कन्हर नदी के एक किनारे छत्तीसगढ़ का रामानुजगंज क्षेत्र है, जबकि नदी के उस पार झारखंड की सीमा शुरू होती है। यही वजह है कि इस शिवालय में केवल स्थानीय श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

महाशिवरात्रि के दौरान जब नदी का जलस्तर जब कम होता है और नीचे स्थित शिवालय तक पहुंच संभव होती है, तब यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। लोग भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कन्हर नदी को उत्तरवाहिनी और गंगा के समान पवित्र माना जाता है। कन्हर नदी का उद्गम जशपुर जिले के क्षेत्र से माना जाता है और आगे चलकर यह सोन नदी में मिलती है। सोन नदी का आगे गंगा नदी से संगम होता है। इसी धार्मिक और भौगोलिक संबंध के कारण स्थानीय लोगों में कन्हर नदी के प्रति गहरी आस्था है।

स्थानीय निवासी और शिवभक्त रमेश कुमार बताते हैं कि लुर्गी गांव में कन्हर नदी के किनारे भगवान शिव का घाट और मंदिर स्थित है। सावन और शिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग यहां पूजा करने पहुंचते हैं। उनके अनुसार कन्हर नदी के किनारे स्थित इस शिवालय की आसपास के गांवों में काफी मान्यता है।

श्रद्धालु मीणा कुमारी भी जलकेश्वर नाथ मंदिर को आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र मानती हैं। उनका कहना है कि गांव और आसपास के क्षेत्र के लोगों की भगवान शिव में गहरी आस्था है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’

7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल

प्रकृति अपने अनोखे और दुर्लभ चमत्कारों से समय-समय पर लोगों को हैरान करती रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय फूल लोगों का ध्यान खींच रहा है। अपनी अनोखी बनावट और दुर्लभता के कारण इसे लोग ‘हिमालयी हीरा’ या ‘डायमंड फ्लावर’ कह रहे हैं। क्या है हिमालयी हीरा‘? सोशल मीडिया पर जिस पौधे को ‘डायमंड फ्लावर’ कहा जा रहा है, उसका वैज्ञानिक नाम रियम नोबाइल (Rheum nobile) है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे पदमचाल या केन्जो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पारदर्शी और चमकदार संरचना इसे अन्य पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है, यही वजह है कि इसे ‘हिमालयी हीरा’ की उपाधि मिली है।
जीवन में सिर्फ एक बार खिलता है फूल

इस पौधे की सबसे अनोखी विशेषता इसका जीवन चक्र है। जहां अधिकांश पौधे हर साल फूल देते हैं, वहीं रियम नोबाइल अपने पूरे जीवन में केवल एक बार ही फूल देता है। इस प्रक्रिया में करीब 7 से 15 साल का समय लग सकता है। फूल खिलने के बाद धीरे-धीरे पौधे का जीवन चक्र समाप्त होने लगता है।

ऊंचाई में इंसान को भी दे सकता है टक्कर

यह दुर्लभ पौधा अपनी लंबाई के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 3.2 फीट से 6.5 फीट तक पहुंच सकती है। वायरल वीडियो में यह पौधा पहाड़ों के बीच इंसानों के बराबर या उनसे भी ऊंचा दिखाई देता है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है।

13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर होता है विकसित

रियम नोबाइल सामान्य स्थानों पर नहीं उगता। यह हिमालय के दुर्गम और ठंडे इलाकों में समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर (करीब 13,000 फीट) या उससे अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है। कम ऑक्सीजन और बेहद कम तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इसका विकसित होना प्रकृति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

वीडियो के बाद संरक्षण की उठी मांग

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग इस दुर्लभ पौधे को छूते और तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सोशल मीडिया यूजर्स ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतने दुर्लभ पौधों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनका संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी प्रकृति के इस अनमोल उपहार को देख सकें।

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल से तैयार किया हृदय वाल्व टिशू

मेलबर्न। ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने चिकित्सा जगत में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। टीम ने स्टेम सेल से इंसानी हृदय के वाल्व जैसा ऊतक (टिशू) तैयार किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में खासकर बच्चों में हृदय वाल्व से जुड़ी गंभीर बीमारियों के इलाज का नया रास्ता खोल सकती है। सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार, मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमसीआरआई) के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में प्रयोगशाला में तैयार किए गए हृदय वाल्व के ऊतक, मानव शरीर में मौजूद वाल्व की तरह बढ़ते और व्यवहार करते नजर आए। यह शोध ‘सेल स्टेम सेल’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस तकनीक से अब यह समझना आसान होगा कि इंसानी हृदय के वाल्व जन्म से लेकर वयस्क होने तक कैसे विकसित होते हैं और बीमारी या संक्रमण की वजह से उनमें किस तरह का बदलाव आता है।
एमसीआरआई की हार्ट रीजेनरेशन ग्रुप की टीम लीडर हॉली वोगेस ने कहा कि यह सफलता क्षतिग्रस्त हृदय वाल्व की मरम्मत के लिए ऐसे उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिनमें शरीर की अपनी कोशिकाओं का इस्तेमाल किया जा सके।
दुनिया भर में करीब 2.8 करोड़ लोग हृदय वाल्व की बीमारी से पीड़ित हैं। इसके पीछे जन्मजात समस्याएं, संक्रमण और उम्र के साथ वाल्व का कमजोर होना जैसे कई कारण हो सकते हैं। मौजूदा समय में क्षतिग्रस्त वाल्व को दोबारा स्वस्थ करने का कोई ऐसा उपचार नहीं है, जो बीमार को एकदम तंदुरुस्त कर दे। ऐसे में कई मरीजों को वाल्व बदलने की सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है। इस शोध की खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने तैयार किए गए ऊतक का इस्तेमाल रूमेटिक हार्ट डिजीज (आरएचडी) को समझने के लिए भी किया। जब शोधकर्ताओं ने आरएचडी से जुड़े सूजनकारी प्रोटीन इन ऊतकों के संपर्क में लाए, तो ऊतक कठोर हो गए और उनमें ऐसे जैविक संकेतक दिखाई दिए, जो रोगग्रस्त मानव हृदय वाल्व में पाए जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में आरएचडी का असर वहां की स्वदेशी आबादी पर अपेक्षाकृत अधिक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नया प्रयोगशाला मॉडल इस बीमारी को समझने और भविष्य में इसके बेहतर उपचार विकसित करने में मदद कर सकता है।
एमसीआरआई के प्रोफेसर एंजो पोरेल्लो ने कहा कि भविष्य में इसी तकनीक से ऐसे हृदय वाल्व बनाए जा सकते हैं, जो मरीज के शरीर के साथ बढ़ें और बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढाल सकें। अगर यह तकनीक आगे के परीक्षणों में सफल रहती है, तो बच्चों के लिए इसका महत्व और भी बढ़ सकता है। वर्तमान वाल्व प्रत्यारोपण की एक बड़ी चुनौती यह है कि बच्चे के बढ़ने के साथ वाल्व को भी बदलने की जरूरत पड़ सकती है। वैज्ञानिकों की उम्मीद है कि स्टेम सेल से तैयार होने वाले वाल्व इस समस्या का समाधान देने में मदद कर सकते हैं।