20वीं सदी के सबसे बेहतरीन गीतकार और कवि में से एक रहे साहिर लुधियानवी का 08 मार्च को जन्म हुआ था। साहिर के गीतों और शायरी को आज भी लोग खूब पसंद करते हैं। उन्होंने अपने गीतों और शायरियों के जरिए जुल्मों और गैर-बराबरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। साहिर लुधियानवी शब्दों के सच्चे जादूगर थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर साहिर लुधियानवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…पंजाब के लुधियाना के करीमपुरा में 08 मार्च 1921 को साहिर लुधियानवी का जन्म हुआ था। वह एक पंजाबी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। साहिर का असली नाम अब्दुल हई है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा लुधियाना से पूरी की। कॉलेज टाइम से ही वह अपने शेर और शायरी के लिए प्रख्यात हो गए थे। साहिर एक भारतीय कवि और संगीतकार थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए तमाम गाने भी लिखे।साहिर लुधियानवी ने अपने काम से फिल्म जगह में अच्छी जगह बनाई थी। साल 1949 में आई फिल्म ‘आजादी की राह’ से उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने 4 गाने लिखे थे। फिर साल 1951 में आई फिल्म ‘नौजवान’ के लिए साहिर ने गाने लिखे। उनको सबसे अधिक सफलता साल 1951 में आई फिल्म ‘बाजी’ से मिली थी। इन गानों के संगीतकार एस डी बर्मन थे। उस दौरान साहिर को गुरुदत्त की टीम का हिस्सा माना जाता है। बर्मन के साथ साहिर की आखिरी फिल्म ‘प्यासा’ थी। इसके बाद दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गए। जिसका कारण बर्मन और साहिर की राहें अलग हो गईं।साहिर लुधियानवी की कविताएं और शायरी दत्ता नायक को काफी ज्यादा पसंद थीं। जिस कारण साहिर ने दत्ता नायक के साथ तमाम फिल्मों के लिए गाने लिखे थे। साहिर लुधियानवी ने फिल्म ‘चंद्रकांता’, ‘दास्तान’, ‘मिलाप’, ‘इज्जत’ और ‘दाग’ के लिए भी गाने लिखे थे।बताया जाता है कि साहिर लुधियानवी ने लता मंगेशकर से ज्यादा फीस की डिमांड की थी। साहिर का कहना था कि भले ही उनको लता से एक रुपए ही ज्यादा दिया जाए, लेकिन उनको लता से ज्यादा फीस दी जाए। जिसके कारण साहिर और लता के बीच मतभेद हो गए थे। वहीं 25 अक्तूबर 1980 को 59 साल की उम्र में साहिर लुधियानवी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। जिसके बाद उनको मुस्लिम रीति-रिवाज के साथ जुहू में दफनाया गया था।
खेल के मैदान में परचम लहराती बेटियां
देश की आधी आबादी आज के दौर में किसी से कम नहीं हैं। देश की बेटियों ने हर क्षेत्र में देश का मान बढ़ाया है। साल 2025 में कुछ ऐसी महिला एथलीटहुईं हैं जिन्होंने मैदान की सीमाओं को लांघकर सफलता की एक नई इबादत लिखी है। क्रिकेट के मैदान से लेकर शतरंज की बिसात तक महिला खिलाड़ियों ने अपने हुनर का लोहा मनवाया है। हमारी इस खास रिपोर्ट में उन चुनिंदा महिलाओं के बारे में बताते हैं जो खेल जगत में सुपरविमेन बन कर उभरी हैं –
स्मृति मंधाना – दुनिया की बेहतरीन महिला क्रिकेटरों में से एक भारत की स्टार बल्लेबाज स्मृति मंधाना ने अपने क्रिकेट करियर में कई उपलब्धियां अपने नाम की है। उन्होंने न केवल अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से टीम इंडिया को पहली बार महिला वनडे वर्ल्ड कप का चैंपियन बनाया। खास बात ये है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ महज 50 गेंदों में शतक जड़कर विराट कोहली के सबसे तेज भारतीय अंतर्राष्ट्रीय शतक का रिकॉर्ड ध्वस्त किया। उनके इसी असाधारण प्रदर्शन के लिए उन्हें बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्स विमेन ऑफ द ईयर 2025 के प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। मंधाना ने वनडे वर्ल्ड कप 2025 के 9 मैचों में 54.25 की औसत से 434 रन बनाकर भारत की सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बनी थीं।
शीतल देवी – जहां हम बिना हाथों के किसी भी काम को करने के बारे में सोच के भी डर जाते हैं वहां शीतल देवी देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल बनी हैं। जम्मू-कश्मीर की शीतल देवी अब पैरा आर्चरी की दुनिया में एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। 2025 में उन्होंने अपनी बादशाहत कायम की। इश बेटी ने साउथ कोरिया में आयोजित वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप 2025 में व्यक्तिगत कंपाउंड इवेंट में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया था। शीतल देवी के हाथ नहीं हैं लेकिन वो पैरों और कंधों की मदद से अचूक निशाने के लिए पहचानी जाती हैं। उन्होंने महज 18 साल की उम्र में वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप 2025 के फाइनल में वर्ल्ड नंबर-1 खिलाड़ी को मात देकर देश को गोल्ड दिलाया था।
सुरुचि सिंह – भारत के लिए निशानेबाजी की दुनिया में नया चेहरा बनकर उभरी सुरुचि सिंह ने साल 2025 की सबसे सटीक शूटर बनकर देश का मान बढ़ाया है। उन्होंने म्यूनिख और ब्यूनस आयर्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप में लगातार तीन व्यक्तिगत गोल्ड मेडल जीतकर गोल्डन ट्रेबल का दुर्लभ कारनामा कर दिखाया था। खास बात ये है कि सुरुचि वर्तमान में 10 मीटर एयर पिस्टल श्रेणी में दुनिया की नंबर-1 रैंकिंग वाली महिला निशानेबाज हैं। पेरू के लीमा में हुई आईएसएसएफ वर्ल्ड कप 2025 में जब भारती निशानेबाज सुरुचि सिंह ने महिलाओ की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में गोल्ड जीता था। तब उन्होंने अपने ही देश की मनु भाकर को हराया था।
दिव्या देशमुख – वहीं शतरंज जैसे खेल में पुरुषों का दबदबा होने के बावजूद दिव्या देशमुख ने शतरंज की दुनिया में बड़ा नाम कमाया है। दिव्या ने 2025 में इस खेल में अपनी चालों से दुनिया के दिग्गज ग्रैंडमास्टर्स को मात दी है। दिव्या ने जुलाई 2025 में जॉर्जिया के बाटुमी में आयोजित फिडे महिला शतरंज वर्ल्ड कप 2025 जीतकर इतिहास रचा था। दिव्या ने अनुभवी कोनेरू हम्पी को मात देकर ये खिताब अपने नाम किया था। इसके साथ ही दिव्या इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय महिला बनी हैं। जिसके बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा ग्रैंडमास्टर की उपाधि भी दी गई, जो भारतीय शतरंज के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
(साभार – प्रभासाक्षी)
महिलाओं के प्रति बदला है नजरिया
-रमेश सर्राफ धमोरा
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने और लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए मनाया जाता है। यह जागरूकता बढ़ाने, बाधाओं को तोड़ने और सभी के लिए समान अवसरों को बढ़ावा देने का दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं तो समाज और राष्ट्र मजबूत होते है। यह समानता और अधिकारों के लिए एक वैश्विक आंदोलन है, जो महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक है। यह एक ऐसा दिन है जो महिलाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हर साल 8 मार्च 1911 से पूरे विश्व में मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाना है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की थीम है दान से लाभ है, जो उदारता, सहयोग और सामूहिक प्रगति के मूल्यों को बढ़ावा देता है। यह अभियान इस बात पर प्रकाश डालता है कि महिलाओं का समर्थन करना और लैंगिक समानता को आगे बढ़ाना सभी के लिए व्यापक सामाजिक और आर्थिक लाभ ला सकता है। इस अभियान का मूल विचार यह है कि जब महिलाएं शिक्षा, नेतृत्व, उद्यमिता, विज्ञान, कला और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सशक्त होती हैं, तो इससे मजबूत समुदाय और साझा समृद्धि का निर्माण होता है। सहयोग और समान अवसरों को प्रोत्साहित करके, यह अभियान समाज में समावेशी विकास और सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देना चाहता है। भारत में महिलाओं की सुरक्षा और इज्जत का खास ख्याल रखा जाता है। अगर हम इक्कीसवीं सदी की बात करे तो यहां की महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला काम कर रही है। अब तो भारत की संसद ने भी महिलाओं के लिये लोकसभा व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक पास कर दिया है। उससे आने वाले समय में भारत की राजनीति में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जायेगी। देश में महिलाओं को अब सेना में भी महत्वपूर्ण पदो पर तैनात किया जाने लगा है। जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है।
यहां महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार है। महिलायें देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है तथा विकास में भी बराबर की भागीदार है। आज के युग में महिला पुरुषों के साथ ही नहीं बल्कि उनसे दो कदम आगे निकल चुकी है। महिलाओं के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भारतीय संविधान के अनुसार महिलाओं को भी पुरुषों के समान जीवन जीने का हक है। भारत में नारी को देवी के रूप में देखा गया है। कहा जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। प्राचीन काल से ही यहां महिलाओं को समाज में विशिष्ट आदर एवं सम्मान दिया जाता है।
भारत में वर्षो से महिला सुरक्षा से जुड़े कई कानून बने है। इसमें हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट 1856, इंडियन पीनल कोड 1860, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872, मैरिड वीमेन प्रॉपर्टी एक्ट 1874,चाइल्ड मैरिज एक्ट 1929, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, इंडियन डाइवोर्स एक्ट 1969, मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन एक्ट 1986, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हर्रास्मेंट ऑफ वुमन एट वर्किंग प्लेस एक्ट 2013 आदि। इसके अलावा 7 मई 2015 को लोक सभा ने और 22 दिसम्बर 2015 को राज्य सभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी बदलाव किया है। इसके अन्तर्गत यदि कोई 16 से 18 साल का किशोर जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी कठोर सजा का प्रावधान है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक साल 2023 में भारत में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,05,861 अपराध दर्ज किए गए। इन अपराधों में बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, साइबर अपराध, और अपहरण जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न के सामने आए हैं।जो समाज में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी उदासीनता को दर्शाते हैं। इससे पहले 2022 में 4,45,256 मामले, 2021 में 4,28,278मामले 2020 में 3,71,503 मामले दर्ज किए गए थे।
राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा। राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर से पूरे साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 28,811 शिकायतें मिलीं। इसमें 16 हजार से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश राज्य से आए हैं। आंकड़े हैरान कर देने वाली हैं। क्योंकि आयोग में ये शिकायत गरिमा के अधिकार कैटेगरी के अंतर्गत दर्ज किया गया है। इसके बाद दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2,411 मामले दर्ज किए गए। महाराष्ट्र में 1,343, बिहार में 1,312 और मध्य प्रदेश में 1,165 इतने मामले दर्ज किए गए हैं।
2023 के 12 महीने बाद जारी किए गए इस रिपोर्ट में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध में दहेज उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसे अपराध दर्ज किए गए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की यह रिपोर्ट महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता दिखाती है। आंकड़ों के मुताबिक देश भर में यौन उत्पीड़न के 805 मामले, साइबर अपराध के 605 मामले, पीछा करने की 472 मामले और सम्मान से जुड़े अपराध के खिलाफ 409 शिकायतें दर्ज कराई गईं। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बलात्कार के मामले भी शामिल हैं। साल 2023 में बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के 1,537 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद गरिमा के अधिकार के तहत 8,540, घरेलू हिंसा के 6,274, दहेज उत्पीड़न के 4,797, छेड़छाड़ के 2,349,और महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता के 1,618 मामले दर्ज किए गए।
2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले 2022 की तुलना में कम हुए हैं। 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 30,864 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि 2023 में यह संख्या घटकर 28,278 हो गई। यह एक सकारात्मक संकेत है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। साल 2022 के बाद से शिकायतों की संख्या में कमी देखी गई है। जब 30,864 शिकायतें प्राप्त हुई थी, जो 2014 के बाद से सर्वाधिक आंकड़ा था। जहां तक बात महिलाओं की सुरक्षा की आती है तो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अभूतपूर्व निर्णयों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई प्रबंध किये हैं। आज भारत में महिलायें पहले की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित है। हम एक तरफ महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी का दर्जा देकर उन्हे आगे बढ़ा रहें है। वहीं दूसरी तरफ उनके साथ अत्याचार की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आये दिन हमें महिलाओं के साथ बलात्कार, दुर्व्यवहार होने की घटनाये सुनने को मिलती रहती है। ऐसी घटनाओं से महिला सशक्तिकरण के अभियान को धक्का लगता हैं।देश में महिलाओं के प्रति खराब होते माहौल को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं अपितु हर आम आदमी की भी है। हम सभी को आगे आकर महिला सुरक्षा की लड़ाई में महिलाओं का साथ देना होगा तभी देश की मातृ शक्ति सर उठा कर शान से चल सकेगीं। अब महिलाओं को समझना होगा कि आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। इन परम्पराओं को बदलने का बीड़ा स्वयं महिलाओं को ही उठाना होगा। तभी समाज में उनके प्रति सोच बदल पायेगी।
(साभार – प्रभासाक्षी)
बहनों के हिस्से की जगह तो छोड़िए
हमारे देश की परम्परा में बहनों का महत्व रहा है, हमेशा से रहा है। माता सरस्वती को भगवान शिव का भाई कहा गया है और सरस्वती का एक नाम शिवानुजा भी है। श्रीराम समेत चारों भाइयों की बहन शांता थीं। नारायण माता पार्वती के भाई बने। यम -यमी की कहानी हम जानते हैं, सुभद्रा प्रभु जगन्नाथ और दाऊ बलराम के साथ रथ पर विराजमान दिखती हैं। महाभारत के युद्ध में उनकी बड़ी भूमिका रही है। वीर अभिमन्यु का पालन – पोषण द्वारका में ही हुआ। बिहार में छठ महापर्व है और भगवान सूर्य की आराधना के साथ छठी मइया को भी पूजा जाता है। हम बता दें कि सूर्य भगवान की बहन छठी मैया (जिन्हें षष्ठी देवी या छठ माता भी कहा जाता है) हैं। इन्हें ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन माना जाता है। इसी कारण छठ पूजा के दौरान सूर्य देव के साथ छठी मैया की पूजा की जाती है। कहने की जरूरत नहीं है कि हमने जितनी बहनों के नाम गिनाए, उनमें से कोई भी बेचारी, मोहताज नहीं है। सभी के व्यक्तित्व प्रखर हैं और सृष्टि के संचालन में उनकी भूमिका रही है, उनको अधिकार मिले हैं। बंगाल में बहनों को सम्पत्ति में अधिकार दिया जाता रहा है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत में मातृ सत्ता ही है। हम किसी सत्ता की बात नहीं कर रहे लेकिन क्या विवाह हो या न हो, क्या जिस घर में कन्या पली -बढ़ी. वहाँ उसका कोई अधिकार नहीं? आप खुद सोचिए कि हम अपने समाज को कहां ले आए हैं जिस कन्या को लक्ष्मी की तरह रखने, सरस्वती की तरह सहेजने और शक्ति के समान पूजने की परम्परा रही है, उसी समाज में आज तक लड़कियों को उनके ही घर में एक कमरा तक नहीं मिल पा रहा है। कई विवाह समारोह होते रहे हैं और देखा गया है कि बुआ से अधिक मौसी प्यारी है। यह प्रेम बुरा नहीं पर क्या यह प्रेम इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि घर की बेटी की जगह आप उस लड़की को दे रहे हैं जिसे आए कुछ दिन हुए हैं मगर जो बहन जन्म से लेकर आज तक आपके हर सुख-दुःख में खड़ी रही है, वह आज आपके लिए रिप्लेस करने लायक रिश्ता हो गयी है।
तुलसीदास कह गये हैं –
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥3॥
भावार्थ:-जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। आगे वह कहते हैं * कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥3॥
भावार्थ:-कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥3॥
अब तक मुझे लगता था कि यह रोग युवाओं में है पर हाल की कुछ घटनाओं को देखकर लगा कि यह बीमारी तो बहुत पुरानी है और इसका कारण भी स्त्रियां है। देखिए, परिवार किसी एक रिश्ते में केंद्रित होकर नहीं चल सकता, वह तब चलता है जब आप एक दूसरे के रिश्ते का सम्मान करें। यहां लड़कों ने तो ससुरारि को सम्भालना सीख लिया और ऐसा सीखा कि उन्होंने अपने घर – परिवार को ही बिसार दिया मगर लड़कियों ने अपने मायके को हमेशा अधिक महत्व दिया। ननद उनके लिए सहचरी से अधिक प्रतिद्वन्द्वी रह गयी और आज अधिकांश परिवार सम्पत्ति और वर्चस्व के चक्कर में अपने भाई -बहनों को उसी घर में आश्रित होते देखने के आदी बन चुके हैं, जिसे बनाने में उनके साथ उनके भाई -बहनों की भूमिका रही है। मुझे हैरत के साथ दुःख हुआ जब एक घटना में यह पता चला कि एक विवाह में ननदों को भौजाइयों ने यह कहकर कमरा नहीं दिया कि उसकी बेटी और दामाद आ रहे हैं। शायद वह भौजाई यह भूल गयी कि जिसे आज वह बाहर कर रही है, वह घर भी उसी ननद ने दिया है और उसके पति पर उससे पहले उसकी बहनों का अधिकार है। वह जहां रह रही है, वहां इसलिए रह रही है क्योंकि बहनों ने सम्पत्ति पर वह अधिकार मांगा नहीं जिस पर उसका कानूनी अधिकार है। कहने का मतलब यह कि यह गैरकानूनी है मगर बहनें मायके का चेहरा देखने आती हैं। अब आप बताइए कि अगर कोई हमसे कोई चीज मांगे नहीं तो क्या हमारा उस पर अधिकार बनता है? नहीं बनता क्योंकि यह सीधे बेईमानी है। बहनों का मायके पर नैसर्गिक अधिकार है और इसे कोई भाई- भौजाई नहीं छीन सकता। अच्छा माएं करती हैं तो करती हैं मगर क्या आज की समझदार युवा पीढ़ी अपनी मांओं को ऐसा करने से नहीं रोक सकती। वह भतीजी कह सकती थी कि बुआ का हक है क्योंकि स्त्री सशक्त तभी होगी जब वह एक दूसरे के अधिकार का सम्मान करे। ठीक है आयोजक होटल का प्रबंध कर देते हैं मगर क्या कोई बेटी होटल में दिन काटने के लिए आई है। आखिर क्यों वह अपने घर ही घर में अपरिचित की तरह रहे, क्यों किसी बहन को उसके उस घर में स्थान पाने के लिए संघर्ष करना पड़े, जहां वह जन्मी, पली और बढ़ी है। यह एक सुनियोजित उदासीनता है जिससे लड़कियां इस अपमान के बाद धीरे – धीरे दूरी बना लेती हैं। आज अधिकतर परिवार ऐसे हैं जो विशाल तो हैं मगर एक पीढ़ी के लिए दूसरी पीढ़ी अजनबी है, क्या आप ऐसे परिवार व्यवस्था को बचाने जा रहे हैं। एक ऐसी घटना भी दिखी जहां खुद भाई ने अपने सालों को अपने साथ रखा मगर बहन को पूछा तक नहीं। यहां तक कि आमने – सामने होते हुए भी उससे मिला तक नहीं, जिसे बुआ ने गोद में खिलाया, उस भतीजे ने अभिवादन तक नहीं किया…। क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि हर मकान में बहनों के नाम पर एक पूरा तल होना चाहिेए क्योंकि बेटियां तो बेटियां होती हैं। आपको बुरा लग सकता है मगर ससुराल एक एक्सटेंडड फैमिली है, यह बात लड़कियां बखूबी समझती हैं मगर अपने मायके वालों को ऐसे फिट कर देती हैं कि लड़के का अपना परिवार उसके हाथ से छिटक जाता है और वह कबीर की माया महाठगिनी में ऐसा व्यस्त है कि वह यह सब होने देता है। क्या यह जरूरी नहीं है कि ऐक्सटेंडड फैमिली ऐक्सटेंडड फैमिली की तरह रहे। क्या इससे परिवार की मान- प्रतिष्ठा बढ़ेगी और खुद लड़की वाले अपने स्वार्थ में इतने अंधे हैं कि उनको समझ नहीं आ रहा है कि उनके अधिकारों की सीमा कहां खत्म हो रही हैं। बहुएं बड़े – छोटे का लिहाज नहीं कर रही हैं तो उनको उनकी भाषा में जवाब देना जरूरी है जिस सम्पत्ति पर वह इतना घमंड कर रही है, वह उसके मायके से नहीं मिली बल्कि जिनको वह दुत्कार रही है और पैंतरे दिखा रही है, घर की असली हकदार वही हैं।
परिवार समझे न समझे तो क्या यह समाज और कानून की जिम्मेदारी नहीं है कि ऐसी स्त्रियों और ऐसे पुरुषों की बिगड़ैल मनमानी पर अंकुश लगाकर उनको सीधे रास्ते पर लाये। जब आप बहनों का प्रेम छीनने के लिए खाप पंचायत बन जाते हैं तो उनको अधिकार दिलाने में क्यों पीछे हैं। यह सामाजिक और कानूनी तौर पर बाध्यतामूलक होना चाहिए कि हर परिवार में अगर फ्लैट है तो एक कमरा और अगर मकान है तो पूरा फ्लोर बहनों के लिए रखा जाए। यहां लड़कियों की गलती है कि उन्होंने अपनी परवाह नहीं की और सब कुछ सहती चली गयीं मगर उनका यह रवैया आने वाली पीढ़ी के लिए घातक रहा है इसलिए अब उनको अपने हक की आवाज उठानी होगी और सामने आना होगा।
वेतन के आधार पर समानता नहीं, मानती हैं 33 प्रतिशत महिलाएं
मुंबई । भारत में कार्यस्थलों पर महिलाओं को मिलने वाले वेतन को लेकर तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। एक ओर बड़ी संख्या में महिलाएं मानती हैं कि उन्हें पुरुषों के बराबर वेतन मिल रहा है, वहीं एक बड़ा वर्ग अब भी वेतन असमानता की समस्या महसूस करता है। नौकरी डॉट कॉम की रिपोर्ट ‘व्हाट वूमेन प्रोफेशनल्स वांट’ के अनुसार देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहीं महिलाओं में से 67 प्रतिशत का मानना है कि उनके कार्यस्थलों पर वेतन समानता मौजूद है, जबकि 33 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि अब भी वेतन में अंतर बना हुआ है। यह सर्वे देश के 50 से अधिक उद्योगों में काम करने वाली लगभग 50,000 महिलाओं के अनुभवों पर आधारित है।
रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि वेतन असमानता का अनुभव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्तर पर महसूस किया जाता है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, रियल एस्टेट क्षेत्र की 42 प्रतिशत महिला पेशेवरों ने वेतन अंतर की बात कही। इसके बाद एफएमसीजी क्षेत्र में 38 प्रतिशत और फार्मास्युटिकल तथा लाइफ साइंसेज सेक्टर में भी 38 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन समानता न होने की बात कही। ऑटोमोबाइल सेक्टर में 37 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन अंतर महसूस किया। इसके अलावा रिटेल तथा होटल और रेस्टोरेंट उद्योग में 35 प्रतिशत महिला पेशेवरों ने वेतन अंतर की बात कही। आईटी सर्विसेज और कंसल्टिंग सेक्टर तथा टेलीकॉम/आईएसपी में 34 प्रतिशत महिलाओं ने भी इसी तरह का अनुभव साझा किया। मेडिकल सर्विसेज और अस्पतालों के क्षेत्र तथा ऑयल एंड गैस सेक्टर में 33 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन असमानता की बात कही। रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से पहले जारी की गई है और इसमें यह भी सामने आया है कि महिलाओं के बीच समान वेतन की पारदर्शिता और अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कार्यस्थलों पर ‘इक्वल पे ऑडिट’ और ‘मेंस्ट्रुअल लीव’ की मांग अब तेजी से बढ़ रही है। इस तरह की मांग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत पिछले वर्ष के 19 प्रतिशत से बढ़कर इस वर्ष 27 प्रतिशत हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि यह मांग अधिक आय वर्ग में काम करने वाली महिलाओं में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार उच्च आय वर्ग की लगभग 48 प्रतिशत महिलाएं कार्यस्थलों पर समान वेतन ऑडिट और मासिक धर्म अवकाश जैसे प्रावधानों की जरूरत महसूस करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे महिलाएं संगठन के ऊंचे पदों के करीब पहुंचती हैं, उन्हें वेतन अंतर के संकेत अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। रिपोर्ट के अनुसार कार्यस्थलों पर विविधता से जुड़ी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भर्ती और प्रमोशन में होने वाला पक्षपात है। करीब 42 प्रतिशत महिलाओं ने इसे सबसे बड़ी समस्या बताया। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में 7 आधार अंक अधिक है। चेन्नई में 44 प्रतिशत और दिल्ली-एनसीआर में 43 प्रतिशत महिलाओं ने भी इसी तरह की चिंता जताई। हालांकि चुनौतियों के बावजूद नेतृत्व के अवसरों को लेकर महिलाओं में सकारात्मक रुझान भी दिखाई देता है। सर्वे में शामिल 83 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्हें नेतृत्व की भूमिकाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। यह आंकड़ा पहले 66 प्रतिशत था। खासकर दक्षिण भारत के शहरों में यह रुझान अधिक मजबूत दिखाई देता है।
भवानीपुर कॉलेज के गैर शैक्षणिक कर्मचारियों ने मनाई फूलों की फागुन
कोलकाता । भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के जुबली सभागार में आयोजित फागुन उत्सव मनाया गया जो मुख्य रूप से गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए था। यह फूलों से फागुन का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यार्थियों द्वारा किया गया ।वर्ष में एक बार कॉलेज मैनेजमेंट सभी कर्मचारियों को उपहार, ठंडाई और नाश्ता प्रदान किया जाता है ।कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने इस परंपरा की शुरुआत की थी जो बहुत ही अनोखी और प्रेरक है। एच आर, सिक्युरिटी ,एकाउंट्स, एनसीसी, क्लीनर्स ,क्म्प्यूटर ,सोसाइटी स्पोर्ट्स आदि विभिन्न विभागों के अधिकारियों को सम्मानित किया गया।300 से अधिक कर्मचारियों और शिक्षिकाओं ने भाग लिया। प्रो दिलीप शाह ने इस अवसर पर विद्यार्थियों ने सभी कर्मचारियों के लिए होली से संबंधित शास्त्रीय नृत्य, वेस्टर्न डांस, हास्य नाटिका और क्वीज प्रश्नों द्वारा उनका मनोरंजन किया ।वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने सांस्कृतिक कार्यक्रम का संयोजन किया। कार्यक्रम में सभी विभागों के अधिकारी प्रमुख अधिकारी उपस्थित रहे। अंत में, सभी ने एक दूसरे पर गेंदें फूलों की बौछारें की ।जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
चंग रंगीली फौज ने मनाई रंग लीला फाग
कोलकाता । आईडियल ग्रैंड हावड़ा की रंगीली फौज की महिला सदस्यों ने तीन दिन तक होली उत्सव की धूम मचाई।रंगीली फौज मार्च 2021 से होली समारोहों के लिए राजस्थानी महिलाओं द्वारा टीम बनाई गई है। इस टीम की सात महिला प्रवासी राजस्थानी सदस्यों ने मिलकर राजस्थानी भाषा, संस्कृति और संस्कारों को संरक्षित करने के लिए इस अनोखी टीम को बनाया है। यह हावड़ा और कोलकाता की विभिन्न राजस्थानी समुदायों में अपने कार्यक्रम देती हैं। रुचि बोहरा, सुचित्रा जैन, नीलम संचेती, मनीषा पटावरी, मीनू तोशनीवाल, चन्द्र जैन, सुनीता सुराणा इसकी संस्थापक सदस्याएं हैं।
होली उत्सव के दौरान होली के विशेष संगीत वाद्ययंत्र ‘चंग’ के साथ प्रदर्शन करती हैं जो ऊर्जा और उत्साह से भरा होता है। विभिन्न समुदायों में रंगीली फौज के कार्यक्रमों की सराहना की जाती है। कोलकाता के विभिन्न क्षेत्रों में होली समारोह में महिलाओं की वेशभूषा और राजस्थानी रंगों के साथ गीत नृत्य नाटिका आदि आयोजित करती हैं।धरती धोरा री से लेकर फागण की नोंक झोंक और गुलाल ने प्रेम और आनंद का संदेश दिया। इसकी जानकारी डॉ वसुंधरा मिश्र ने दी।
परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं
रंग हमारी जिंदगी को जीवन देते हैं। कहते हैं कि पानी रंगहीन होता है लेकिन पता नहीं क्यों लगता है रंग का नहीं होना भी तो एक रंग है। उदासी भी एक रंग है जीवन का….अगर हम रंगों को समझने लगें तो जीवन कितना सहज हो जाए..रंगों को समझें और वह जो कहना चाहते हैं, वह भी वह भी समझें। हरियाली का हरा, सूर्य की लालिमा, सोने का पीला रंग, आसमान का नीला, गुलाब का गुलाबी, सृष्टि ने कितने रंग दिए हैं हमको पर क्या कोई भी एक रंग, एक या दो रंगों को चुनकर उपवन सजा सकता है ? उपवन बाहर से चाहे जितना भी सुन्दर लगे और हम खुद को चाहे जितना समझा लें मगर रहेगा वह अधूरा है। यही बात हमारी जिन्दगी के साथ है, यही बात हमारी संस्कृति और हमारे देश के साथ है। रंग कोई भी हो, कैसा भी हो, छोटा या बड़ा नहीं होता, उसका होना ही काफी होता है और कई बार वही रंग हमारी जिंदगी को नयी दिशा दे जाता है। चलिए बात करते हैं हमारे परिवारों की। ऐसा लगता है कि उत्तर आधुनिकतावाद के समय में हमारी संस्कृति ऐसे मोड़ पर आ चुकी है जहां लगता है कि अब लौटने की जरूरत है। आज की नयी पीढ़ी भले ही बौद्धिक स्तर पर सूचनाओं का खजाना हो, तकनीक में महारत रखती हो मगर जिन्दगी सूचनाओं से नहीं चलती, वह चलती है संवेदना से…और आज की पीढ़ी का आई क्यू भले ही बेहतर हो मगर ई क्यू की स्थिति शोचनीय है। आज के बच्चों में बहुत गुस्सा है तो दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि इसका कारण कौन है। वह कारण कोई और नहीं, हम और आप हैं। जिन चीजों को एकल परिवार के मोह में आपने आउटडेटेड समझकर छोड़ दिया, वह दरअसल हमारा रक्षा कवच थी। अपने अनुभव से बताती हूँ…संयुक्त परिवार में रहना चुनौती भरा हो सकता है मगर अपने स्वार्थ को पीछे धकेलकर खुद से पूछेंगे तो समझ सकेंगे कि हमारे परिवारों ही काउंसिलर हुआ करते थे…हमें किसी प्रोफेशनल काउंसिलर की जरूरत नहीं पड़ी। अगर हम भटके तो किसी ताऊ, चाचा, मामा, मौसा या भाई -बहन ने हाथ थामे रखा…डिप्रेशन क्या होता था, तब पता ही नहीं चला। आज के माता-पिता अपनी औलादों के आगे बेबस हैं क्योंकि आपने तकनीक दी, पैसे खर्च किये मगर आप संवेदना नहीं दे सके क्योंकि मशीन संवेदनशील नहीं बना सकती । आपने भौतिक सुखों से परवरिश को बेहतर बनाना चाहा, चलिए आपने समय भी दिया मगर माता- पिता की परवरिश तक की दुनिया सीमित नहीं है, बच्चों को दुलार की जरूरत है। उसे भाई- बहनों का साहचर्य चाहिए, उसे चाचा-बुआ…मौसा…मामा…मौसी का दुलार चाहिए। सच तो यह है कि यह मिथक है कि माता- पिता बच्चे की दुनिया बन सकते हैं। माता-पिता भी इंसान हैं और एक समय के बाद वह भी थकते हैं और तब यही परिवार उनका सहारा बनता है। बच्चों के हाथ में पहले किताब थी, आज माता – पिता खुद नहीं पढ़ते तो बच्चे कहां से पढ़ेंगे। यह समय है कि एकल परिवारों के कर्णधारो को हार मान लेनी चाहिए क्योंकि आप हर बात का विकल्प और हर बात का उत्तर नहीं बन सकते। भाई – बहनों के साथ खेलते – खेलते हार – जीत होती थी तो खेल भावना ऐसे ही विकसित हो जाती थी। शिक्षक हों या पड़ोसी हों या कोई और भी हो, वह एक सीमा तक ही आपके साथ हो सकता है। आप अपने परिवार में रहते हुए जितने समझौते करते थे, आज आप उससे कहीं अधिक समझौते कर रहे हैं। परिवारों में अगर उमर लंबी होती तो भी एकाकीपन नहीं था मगर आज बुजुर्ग अकेले भी हैं और असहाय भी। गांव में चौपाल जमती थी तो वह एक आसरा हुआ करता था। आंगन में जब सब बैठते थे तो वह एक पिकनिक थी। ये सब जीवन के वही रंग हैं जिनको हमने हाथ लगाना बंद कर दिया और जिंदगी बदरंग बना ली है। समस्याएं, चुनौतियां, दुःख…हर जगह हैं मगर परिवार हौसला देता है और याद रहे परिवार का मतलब पूरा परिवार..क्योंकि एकल परिवार एक ईकाई हो सकता है मगर अब वह विकल्प काम नहीं कर रहा है। परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
सम्पादक
समझिए रंगों का मनोविज्ञान
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, यह मन के भीतर जमे हुए भावों को धो देने का अवसर भी है। सर्दियों के बाद जैसे प्रकृति में नई कोंपलें फूटती हैं, वैसे ही यह पर्व हमारे भीतर दबे हुए तनाव, शिकायत और दूरी को पिघलाने का संदेश देता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होली एक सामूहिक “इमोशनल रिलीज़” का माध्यम है। हम सामान्य दिनों में अपने क्रोध, ईर्ष्या या दुख को दबाकर रखते हैं, पर इस दिन हँसी, रंग और संगीत के बीच मन हल्का हो जाता है। रंग लगाना केवल चेहरे पर गुलाल लगाना नहीं, बल्कि संबंधों पर जमी धूल को साफ करना भी है। जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तो अनकही दूरियाँ भी कुछ कम हो जाती हैं।
रंगों का भी अपना मनोवैज्ञानिक अर्थ है। लाल ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है, पीला आशा और सकारात्मकता का, हरा संतुलन और विकास का, और नीला शांति का संकेत देता है। ये रंग हमें याद दिलाते हैं कि जीवन एक ही भावना का नाम नहीं, बल्कि कई भावों का सुंदर संगम है।
होली हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में कभी-कभी “बेखौफ” होना जरूरी है ..थोड़ा खुलकर हँसना, गले मिलना, और अपने भीतर के बच्चे को जीने देना। यही सहजता मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। अंततः, होली हमें यह संदेश देती है कि मन के अंधेरे को जलाकर, रिश्तों में नए रंग भरना ही सच्ची खुशी है। रंगों से भी अधिक महत्वपूर्ण है वह अपनापन, जो इस दिन दिलों को जोड़ देता है।
होली पर बेहतरीन कविताओं से चुनिंदा अंश
होली हर्ष और उल्लास का पर्व है। इस दिन लोग भी गिले, शिकवे बुलाकर प्यार का रंग लगाते हैं। कवियों ने इस प्यार के त्यौहार पर अनेक सुंदर रचनाएं लिखी हैं।
केशर की कलि की पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
केशर की, कलि की पिचकारी
पात-पात की गात सँवारी
राग-पराग-कपोल किए हैं
लाल-गुलाल अमोल लिए हैं
तरू-तरू के तन खोल दिए हैं
आरती जोत-उदोत उतारी
गन्ध-पवन की धूप धवारी
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
रंगों की रँगरेली पेलीकाम्य कपोली कुंज किलोली
अंगों की अठखेली ठेली
मत्त मतंगी मोद मृदंगी
प्राकृत कंठ कुलेली रेली
सुख से हँसना
जी भर गाना
मस्ती से मन को बहलाना
पर्व हो गया आज-
साजन! होली आई है!
हँसाने हमको आई है!
साजन! होली आई है!
इसी बहाने
क्षण भर गा लें
दुखमय जीवन को बहला लें
ले मस्ती की आग-
साजन! होली आई है!
जलाने जग को आई है!
देखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारी
तेरी पिचकारी की तक़दीद में ऐ गुल हर सुबह
साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी
जिस पे हो रंग फिशाँ उसको बना देती है
सर से ले पाँव तलक रश्के चमन पिचकारी
बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में
अभी आ बैठें यहीं बनकर हम तंग पिचकारी
हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का ‘नज़ीर’
पहुँचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी
साभार- कविताकोश




