Sunday, July 5, 2026
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द हेरिटेज स्कूल, कोलकाता में ‘चोल हेटे चोल’ का आयोजन

कोलकाता । द हेरिटेज स्कूल, कोलकाता ने ‘चोल हेटे चोल’ का आयोजन किया । इस आयोजन में द हेरिटेज स्कूल, द बीएसएस स्कूल, श्री शिक्षायतन स्कूल, द बिड़ला हाई स्कूल, डीपीएस रूबी पार्क, डोलना डे स्कूल और सुशीला बिड़ला गर्ल्स जैसे कोलकाता के प्रख्यात शिक्षण संस्थानों ने भाग लिया। वॉक का उद्घाटन सत्र गत 8 जनवरी को दोपहर 2 बजे द हेरिटेज स्कूल परिसर से आयोजित किया गया था। यह पदयात्रा संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों का प्रचार करने के लिए आयोजित की गयी थी । कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को पहाड़पुर कूलिंग टावर्स लिमिटेड एवं मैराथन धावक वरुण स्वरूप द्वारा किया गया। द हेरिटेज स्कूल की प्रिंसिपल सीमा सप्रू, हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के सीईओ पी.के.अग्रवाल और छात्रों ने संबोधित किया। स्कूल के शिक्षक. द हेरिटेज स्कूल के शिक्षक आकाश बसु, सौरव दत्ता और भाग्यधर पहाड़ इस 24 घंटे की नॉनस्टॉप वॉक में शामिल हुए। द हेरिटेज स्कूल, कोलकाता की प्रिंसिपल सीमा सप्रू ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों के बारे में बड़े पैमाने पर जागरूकता पैदा करना बहुत जरूरी है। मुझे खुशी है कि हमारे छात्रों और शिक्षकों ने इतनी बड़ी पहल की है।”

रोज़गार की चाहत

नेहा जयसवाल
खाली कंधों पर थोड़ा सा भार चाहिए,
बेरोजगार हूं साहब रोजगार चाहिए।
जेब में पैसे नहीं है डिग्री लिए फिरती हूं,
 दिनोदिन अपनी ही नजरों में गिरती हूं।
कामयाबी के घर में खुले किवाड़ चाहिए,
 बेरोजगार हूं साहब मुझे रोजगार चाहिए।।
प्रतिभा की कमी नहीं है भारत की  सड़कों पर ,
दुनिया बदल  देंगे भरोसा करो इन लड़कियों पर।
लिखते लिखते मेरी कलम तक घिस गई,
नौकरी कैसे मिले जब नौकरी ही बिक गई।
नौकरी की प्रक्रिया में अब सुधार चाहिए,
बेरोजगार हूं साहब मुझे रोजगार चाहिए।।
दिन रात करके मेहनत बहुत करती हूं,
सूखी रोटी खाकर ही चैन से पेट भरती हूं।
भ्रष्टाचार से लोग खूब नौकरी पा रहे हैं,
रिश्वत की कमाई खूब मजे में खा रहे हैं।
नौकरी पाने के लिए यहां जुगाड़ चाहिए,
बेरोजगार हूं साहब मुझे रोजगार चाहिए।।
” युवतियों की अंतर्आत्मा की आवाज़”

सिखाएं घर के काम और बच्चे को बनाएं स्वतंत्र एवं जिम्मेदार

पूर्ण और आत्मविश्वासी व्यक्तियों के पोषण की हमारी खोज में, बच्चों में स्वतंत्रता की भावना पैदा करना सर्वोपरि है। इसे हासिल करने का एक प्रभावी तरीका उन्हें छोटे-छोटे घरेलू काम सौंपना है। ये साधारण प्रतीत होने वाले कार्य बच्चे के चरित्र को आकार देने, जिम्मेदारी को बढ़ावा देने और आत्मविश्वास पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आइए उन कारणों पर गौर करें कि क्यों बच्चों को घरेलू कामों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना एक पालन-पोषण की रणनीति है।
1. जिम्मेदारी की भावना पैदा करना – जब बच्चों को विशिष्ट कार्य दिए जाते हैं, तो वे जिम्मेदारी का सार सीखते हैं। चाहे उनका बिस्तर बनाना हो या खाने की मेज सजाना हो, ये काम छोटी उम्र से ही कर्तव्य और जवाबदेही की भावना पैदा करते हैं।
2. आत्म-सम्मान बढ़ाना – कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करने से बच्चों को उपलब्धि का एहसास होता है। आत्म-सम्मान में यह वृद्धि उनके जीवन के अन्य पहलुओं में भी काम करती है, जिससे वे चुनौतियों से निपटने में अधिक लचीला और आश्वस्त हो जाते हैं।
3. जीवन कौशल का विकास करना – घरेलू कामकाज व्यावहारिक जीवन कौशल सिखाते हैं जो वयस्कता में अपरिहार्य हैं। बुनियादी सफाई तकनीकों से लेकर समय प्रबंधन तक, बच्चे कौशल का भंडार हासिल करते हैं जो जीवन भर उनके काम आएगा।
4. टीम वर्क और सहयोग को बढ़ावा देना – काम सौंपने में अक्सर भाई-बहनों या परिवार के सदस्यों का सहयोग शामिल होता है। यह टीम वर्क की भावना को बढ़ावा देता है, बच्चों को एक समान लक्ष्य के लिए मिलकर काम करने का मूल्य सिखाता है।
5. अनुशासन स्थापित करना – कामकाज में नियमित रूप से शामिल होने से बच्चों में अनुशासन स्थापित होता है और दिनचर्या स्थापित होती है। वे निरंतरता और संगठन के महत्व को सीखते हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में सफलता के लिए महत्वपूर्ण गुण हैं।
6. प्रयास की सराहना – काम पूरा करना बच्चों को सिखाता है कि प्रयास सीधे परिणामों से जुड़ा होता है। यह समझ एक मजबूत कार्य नीति और उनके प्रयासों में समय और ऊर्जा निवेश करने की इच्छा की नींव रखती है।
7. क्रियाओं और परिणामों के बीच संबंध – कार्य कार्यों और परिणामों के बीच एक ठोस संबंध प्रदान करते हैं। जब बच्चे अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा करते हैं, तो वे अपनी पसंद के स्वाभाविक परिणाम का अनुभव करते हैं, जिससे उन्हें जीवन के मूल्यवान सबक मिलते हैं।
8. समय प्रबंधन कौशल – अपने काम कब करने हैं इसकी योजना बनाने से लेकर उन्हें एक निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करने तक, बच्चे आवश्यक समय प्रबंधन कौशल विकसित करते हैं जो बाद में जीवन में शैक्षणिक और व्यावसायिक गतिविधियों पर लागू होते हैं।
9. व्यावहारिक ज्ञान का निर्माण – घरेलू कामों में व्यस्त रहने से बच्चों को घर के माहौल के बारे में व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है। वे बुनियादी घरेलू वस्तुओं, उनके उपयोग और रखरखाव से परिचित हो जाते हैं, जिससे एक सर्वांगीण शिक्षा में योगदान मिलता है।
10. उत्साहवर्धक पहल – जैसे-जैसे बच्चे अपने निर्धारित कार्यों के आदी हो जाते हैं, वे अक्सर अतिरिक्त कार्यों को पहचानने और उन्हें पूरा करने की पहल करते हैं। यह सक्रिय व्यवहार उनकी स्वतंत्रता को और बढ़ाता है।
11. औजारों और उपकरणों को संभालना सीखना – कुछ कार्यों में औज़ारों और उपकरणों का उपयोग शामिल होता है। इन वस्तुओं को सुरक्षित रूप से संभालना सीखने से न केवल क्षमता का निर्माण होता है बल्कि जिम्मेदारी की स्वस्थ समझ को भी बढ़ावा मिलता है।
12. वयस्कता की तैयारी – घरेलू कामकाज के माध्यम से हासिल किए गए कौशल वयस्कता की चुनौतियों के लिए नींव के रूप में काम करते हैं। चाहे घर संभालना हो या करियर में उत्कृष्ट प्रदर्शन करना हो, ये अनुभव अमूल्य साबित होते हैं।
13. समस्या-समाधान क्षमताओं को बढ़ाना – कामकाज अक्सर अप्रत्याशित चुनौतियाँ पेश करते हैं। बच्चे इन व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से अपने पैरों पर खड़ा होकर सोचना, परिस्थितियों के अनुरूप ढलना और प्रभावी समस्या-समाधान कौशल विकसित करना सीखते हैं।
14. पात्रता कम करना – जब बच्चे घर के कामकाज में सक्रिय रूप से योगदान करते हैं, तो इससे अधिकार की भावना कम हो जाती है। वे समझते हैं कि परिवार का हिस्सा होने के नाते साझा ज़िम्मेदारियाँ शामिल होती हैं।
15. व्यक्तिगत रुचियों के अनुरूप कार्य तैयार करना – बच्चे की रुचियों के आधार पर कार्यों को अनुकूलित करने से कार्य अधिक आकर्षक हो जाते हैं। चाहे वह बागवानी हो, खाना बनाना हो, या आयोजन करना हो, कामों को रुचियों के साथ जोड़ना उत्साह जगाता है।
16. खुले संचार को प्रोत्साहित करना – काम सौंपने और चर्चा करने से परिवार के भीतर खुले संचार को बढ़ावा मिलता है। बच्चे महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी गई है और यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण पारिवारिक संबंधों को मजबूत करता है।
17. स्वामित्व की भावना का निर्माण – काम पूरा करने से स्वामित्व और अपनेपन की भावना आती है। बच्चे समझते हैं कि घर के सुचारु संचालन में उनका योगदान अभिन्न है।
18. प्रगति का जश्न मनाना – काम के पूरा होने को स्वीकार करना और उसका जश्न मनाना, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, सकारात्मक व्यवहार को मजबूत करता है। यह उत्सव बच्चों के लिए प्रेरक कारक बनता है।
19. सहानुभूति का पोषण – ऐसे काम जिनमें पालतू जानवरों की देखभाल करना या जरूरतमंद परिवार के सदस्यों की सहायता करना शामिल है, बच्चों में सहानुभूति विकसित करते हैं। वे दूसरों की भलाई के बारे में सोचना सीखते हैं और दयालु दृष्टिकोण विकसित करते हैं।
20. उम्र और क्षमता के अनुसार काम करना – काम सौंपते समय अनुकूलनशीलता महत्वपूर्ण है। बच्चे की उम्र और क्षमता के अनुसार कार्यों को तैयार करना यह सुनिश्चित करता है कि जिम्मेदारियाँ चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ प्राप्त करने योग्य भी हों। निष्कर्षतः, घरेलू कामों को बच्चे की दिनचर्या में शामिल करना स्वतंत्रता और आत्मविश्वास को बढ़ावा देने का एक समग्र दृष्टिकोण है। ये छोटे-छोटे कार्य दुनिया का सामना करने के लिए तैयार जिम्मेदार और सक्षम व्यक्तियों के भविष्य की नींव तैयार करते हैं।
(साभार – न्यूज ट्रैक)

संक्षिप्त महाभारत

अभिषेक दम्मानी

सत्यवती के लिए कभी हस्तिनापुर का रथ नहीं होता
जो स्त्री मोह फंसे शांतनु का कोई मनोरथ नहीं होता
कुंती ने कौतूहलता में जब सूर्य देव का आह्वान किया
तब प्रत्यक्ष देव ने पुत्र रूप में अपना अंश वरदान दिया
उत्कट इच्छा पर काबू रख जो पांडव ने संयम ना छोड़ा होता
तो धृतराष्ट्र ने अपनी उच्चाकांछा का पृष्ठ नही जोड़ा होता
द्रोणाचार्य ने अर्जुन हित की रक्षा में मर्यादा को लाँघ लिया
और एकलव्य से गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया
अपमानित द्रुपद प्रतिशोध की अग्नि में इस हद तक जला गया
और मित्र वध की तीव्र मंशा में दिव्य पुत्र प्राप्ति को चला गया
दानवीर कर्ण होकर भी हो गया एक ऐसे ऋण का आभारी
और कृतज्ञ मित्रता के आगे एक निष्ठ हो गई निष्ठा सारी
सत्य, अहिंसा और धर्म फिर अन्याय, कपट से हारा था
जब धृतराष्ट्र का पुत्र मोह उसके राज धर्म का हत्यारा था
किसने जाना था षडयंत्रो से लाक्षागृह जलने वाला था
बातों में प्रेम मधुर रखकर यूं अंतर्मन से छलने वाला था
विदुर नीति का कर अनुसरण अगर भरत वंश चल जाता
क्या दृश्य मनोहर होता वह और हर दुर्भाग्य बदल जाता
एकचक्रा नगरी में ब्राह्मण बन पांडवों ने जीवन की शिक्षा ली
जब सबको भोजन बांटने वालों ने खुद के भोजन को भिक्षा ली
दो माता के आधे- आधे शिशुओं का शरीर जुड़कर जब संग हुआ
प्राण चेतना आ गई शिशु में और फिर दो से एक जरासंध हुआ
जब जब मर्यादा का बांध तोड़ कर कोई भी शिशुपाल बनेगा
तब तब गिरीवर धारी का चक्र सुदर्शन उसका काल बनेगा
पूर्ण पुरुषोत्तम होकर भी नटवर ने रणछोड़ नाम स्वीकार किया
और राजधानी को द्वारिका लाकर उसका निष्कंटक विस्तार किया
महलों में रहने वालों ने कैसे अपने दिन काटे वनवासों में
जब पांडवों का भाग्य बदल डाला था शकुनी वाले पासों ने
राज सभा भी मौन विवश थी कोई रोक ना पाया दु:शासन को
और द्रोपदी का चीरहरण भरी सभा में चुनौती था सिंहासन को
जब पांडवों ने अपना अज्ञातवास बताया सेवकों के वेश में
तब जाना कि जीवन कितना दुर्गम हैं दासत्व के परिवेश में
शांति का मूल्य समझता और जो दुर्योधन क्रुद्ध नहीं होता
केवल पांच ग्राम दे देता तो महाभारत का युद्ध नहीं होता
युद्ध ठहर जाने पर ऋषि वेदव्यास ने संजय को संज्ञान दिया
और भूत भविष्य वर्तमान देखने को दिव्य दृष्टि का दान दिया
इच्छा मृत्यु का वर पाकर भी भीष्म ने मृत्यु को जान लिया
और पुनर्जन्म की राजकुमारी अंबा को शिखंडी में पहचान लिया
अगर सुभद्रा अर्जुन से चक्रव्यूह का पूर्ण रहस्य सुनकर सोई होती
तो उत्तरा कदाचित अभिमन्यु वध पर कभी नहीं रोई होती
पितृ वध की क्रोधाग्नि का अश्वत्थामा ने अनुचित उपयोग किया
और पांडव कुल का वध करने को दिव्यास्त्रों का दुरुपयोग किया
जब गांधारी ने अपने निन्यानवे पुत्रों की मृत्यु का अवसाद किया
तब शेष दुर्योधन को एक दृष्टि में वज्र शरीर का आशीर्वाद दिया
किंतु वज्र कवच भी बचा न पाया दंभी दुर्योधन के प्राण को
और धर्म ध्वज ले पांडव आगे बढ़ गए नवयुग के निर्माण को
नाश सुनिश्चित हो जाता है, जब अभिमान शिखर पर जाता है
और एक भूल, निर्णय से फिर संपूर्ण कुटुंब बिखर सा जाता है
जब ह्रदय में पंच दोष की प्रवृत्ति हद से ज्यादा बढ़ जाती है
तब आदर्श जीवन मूल्यों की परिभाषा दुविधा में पड़ जाती है
महाभारत कोई कथा नहीं यह शाश्वत जीवन का सार है
कर्म श्रेष्ठ है, कर्म सर्वोपरि ,कर्म ही जीवन का आधार है
सशक्त समाज की स्थापना ही महाभारत का संदेश है
और कर्तव्य पथ पर अविरल बढ़ना ही गीता का उपदेश है

सर्दियों में रखें त्वचा का खास ख्याल

सर्दी के मौसम में चेहरे की चमक खोने लगती है। ऐसा मौसम में बदलाव के कारण होता है. इस दौरान अगर आप अपने चेहरे की चमक बढ़ाना चाहते हैं तो इन 3 तरीकों को अपना सकते हैं। सर्दी के मौसम में अक्सर त्वचा संबंधी समस्याएं हो जाती हैं। इस मौसम में त्वचा रूखी, पीली और बेजान दिखने लगती है। ऐसा ठंडी हवाओं के संपर्क में आने से होता है। सर्दियों में त्वचा धूप, ठंडी हवा और प्रदूषण के संपर्क में आती है जिससे त्वचा पर बुरा असर पड़ता है। जिसके कारण सर्दियों में त्वचा को खास देखभाल की जरूरत होती है। सर्दियों में अपने चेहरे की चमक बढ़ाने के लिए आप इन तरीकों को अपना सकते हैं –
होममेड फेस पैक लगाएं- त्वचा की चमक बढ़ाने के लिए आप होममेड फेस पैक का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस फेस पैक को बनाने के लिए पपीते को मैश कर लें और फिर इसमें नींबू का रस मिलाएं। इसे अच्छे से मिलाकर चेहरे पर लगाएं। इसे कम से कम 15 मिनट के लिए छोड़ दें. फिर चेहरे को गुनगुने पानी से धो लें.
तेल लगाएं- सर्दियों में अपनी त्वचा को हाइड्रेट करने के लिए अपने चेहरे पर तेल लगाएं। आप रात को सोने से पहले अपने चेहरे पर तेल लगा सकते हैं। इसके लिए अपनी पसंद का तेल इस्तेमाल करें. इसे अपने चेहरे पर लगाएं और हल्के हाथों से मसाज करें। इसे रात भर लगा रहने दें, फिर सुबह अपना चेहरा धो लें।
स्क्रबिंग है फायदेमंद- सर्दियों में अपने चेहरे की चमक बरकरार रखने के लिए आप चावल के स्क्रब का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए चावल और तिल को एक बर्तन में भिगो दें. जब यह अच्छे से भीग जाए तो इसे पीस लें। इसमें शहद मिलाएं और फिर इसे चेहरे और शरीर पर अच्छे से लगाएं। फिर 2 से 3 मिनट के लिए छोड़ दें और स्क्रब करें। फिर त्वचा को अच्छी तरह साफ कर लें।

निःस्वार्थ प्रेम की खामोश आवाज अमृता के इमरोज

मशहूर चित्रकार और अमृता प्रीतम के साथ एक लंबा अरसा गुज़ारने वाले इमरोज़ का निधन हो गया है। वे 97 साल के थे और बीमार थे। अमृता प्रीतम के साथ अपने रिश्ते की वजह से जाने जाते थे। खास बात है कि दोनों ने कभी शादी नहीं लेकिन 40 साल तक एक दूसरे के साथ रहे। अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में साहिर लुधियानवी के अलावा अपने और इमरोज़ के बीच के आत्मिक रिश्तों को भी  बेहतरीन ढंग से क़लमबंद किया। इस किताब में अमृता ने अपनी ज़िंदगी कई परतों को खोलने की कोशिश की है। ‘रसीदी टिकट’ में अमृता ख़ुद से जुड़े हुए कई ब्योरे यहां खुलकर बताती हैं। इमरोज़, अमृता की जिंदगी में आए तीसरे पुरुष थे। हालांकि वह पूरे जीवन साहिर से प्यार करती रहीं। अमृता कई बार इमरोज़ से कहतीं- “अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते।” अमृता इमरोज़ से अक्सर इस तरह के सवाल पूछती थीं, क्योंकि इमरोज़ अमृता की ज़िंदगी में बहुत देर से आये थे। मगर वो दोनों एक ही घर में एक ही छत के नीचे दो अलग-अलग कमरे में रहते थे।
मैं रात को शांति में लिखती थीं, तब धीरे से इमरोज़ चाय रख जाते थे…
अमृता के संग रहने के लिए इमरोज़ ने उनसे कहा था इस पर अमृता ने इमरोज़ से कहा कि “पूरी दुनिया घूमकर आओ फिर भी तुम्हें लगे कि साथ रहना है तो मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार करती मिलूंगी। उस समय इमरोज़ ने अपने कमरे के साथ चक्कर लगाने के बाद उन्होंने अमृता से कहा कि घूम लिया दुनिया, मुझे अभी भी तुम्हारे ही साथ रहना है।” अमृता ने इमरोज़ का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब मैं रात को शांति में लिखती थीं, तब धीरे से इमरोज़ चाय रख जाते थे। ये सिलसिला सालों साल चला। इमरोज़ जब भी अमृता को स्कूटर पर ले जाते तो अमृता अक्सर उंगलियोंं से हमेशा उनकी पीठ पर कुछ लिखती रहती थीं। इमरोज़ भी इस बात से अच्छे से वाक़िफ़ थे कि उनकी पीठ पर वो जो शब्द लिख रहीं हैं वो साहिर हैं।
मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है…अमृता को जब राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया तो इमरोज़ उनके साथ संसद भवन जाते और घंटों बाहर बैठ कर अमृता के लौटने का इंतज़ार करते। अक्सर वहीं पर मौजूद लोग इमरोज़ को ड्राइवर मान लेते। इमरोज़ ने भी अमृता के लिए अपने कॅरियर के साथ समझौता किया। उन्हें बहुत जगह अच्छी नौकरी के अवसर मिले मगर अमृता की ख़ातिर उन्होंने ये अवसर ठुकरा दिये।
क़लम ने आज गीतों का क़ाफ़िया तोड़ दिया
मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है
देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूं
मेरे हाथ से हिज्र का कांटा निकाल दे
जिसने अंधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी
उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी…
(अमृता प्रीतम की एक गज़ल)
(साभार – अमर उजाला)

सर्दियों में पराठा और चीला का आनंद

पुदीना पराठा
सामग्री – 1 कप गेहूं का आटा, 1/2 कप कटी हुई पुदीना पत्तियां, 1/2 छोटा चम्मच कसा हुआ अदरक, 1/4 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर , 2 बड़े चम्मच सूखा पुदीना, 1/2 छोटा चम्मच मक्खन, 2 बड़े चम्मच चाट मसाला, 3 बड़े चम्मच देसी घी, नमक स्वादानुसार
विधि – पुदीना पराठा बनाने के लिए सबसे पहले आटे को छान कर एक मिक्सिंग बाउल में डाल लें। इसके बाद आटे में कटी हुई पुदीने की पत्तियां डालकर मिलाएं। अब आटे में कसा हुआ अदरक, 2 चम्मच तेल और स्वादानुसार नमक डालें और आटे को अच्छे से छान लें. ताकि आटे में पुदीना और अन्य सामग्री अच्छे से मिल जाए। अब थोड़ा पानी डालकर आटा गूंथ लें । इसके बाद आटे को ढककर 15 मिनट के लिए अलग रख दीजिए। तय समय के बाद आटा लें और इसे एक बार फिर से गूंथ लें। इसके बाद आटे की मध्यम आकार की लोइयां बना लीजिए। सबसे पहले एक बाउल लें और उसमें सूखा पुदीना, लाल मिर्च पाउडर और थोड़ा सा नमक डालकर तीनों को मिला लें। अब आटे की एक लोई लें और उसे बेल लें। इसके ऊपर सूखा पुदीना मिश्रण डालें और चारों तरफ फैला दें। अब परांठे को बेल लें और लच्छा परांठे की तरह बेल लें, इसके बाद परांठे को बीच में दबाकर बेल लें। अब एक नॉनस्टिक पैन लें और उसे मध्यम आंच पर गर्म करें। तवा गर्म होने पर उस पर परांठे डालकर तल लें। इसी बीच पराठों के दोनों तरफ घी लगाकर इन्हें क्रिस्पी होने तक तल लीजिए। जब परांठे का रंग सुनहरा भूरा हो जाए तो इसे पैन से उतार लें। सारे पुदीना परांठे इसी तरह तैयार कर लीजिये। अब परांठे को दही या चटनी के साथ परोसें।

चुकंदर चीला


सामग्री –2 मध्यम आकार के चुकंदर (बीट), 2 मध्यम आकार के आलू , 1 (कटी हुई) हरी मिर्च , 2 बड़े चम्मच धनिया पत्ती, 1 छोटा टुकड़ा अदरक, 2 लहसुन, 1/2 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर., नमक – स्वादानुसार, 2 बड़े चम्मच तेल ।
विधि – चुकंदर चीला बनाने के लिए सबसे पहले चुकंदर और आलू को अच्छे से धोकर उबाल लें। इन्हें उबलते पानी में रखें और 15-20 मिनट तक पकाएं। चुकंदर और आलू को ठंडा होने दें। फिर छीलकर कद्दूकस कर लें।अब एक बड़े कटोरे में कद्दूकस किया हुआ चुकंदर और आलू, हरी मिर्च, धनिया के बीज, अदरक, लहसुन, हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, जीरा और नमक मिलाएं। सभी चीजों को अच्छे से मिला लीजिए। – अब एक नॉन स्टिक पैन में तेल गर्म करें। तेल गर्म होने पर चुकंदर के मिश्रण को पैन में डालें और मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक पकाएं, ताकि चीला कुरकुरा हो जाए।. इसमें लगभग 10-12 मिनट का समय लग सकता है। जब चीला सुनहरा हो जाए तो उसे पलट दें और दूसरी तरफ से भी पकाएं, ताकि वह समय पर पक जाए।

सर्दियों की धूप से बच्‍चे बनते हैं लोहे जैसे मजबूत 

सर्दियां में धूप को बहुत पसंद किया जाता है। धूप से सेहत को फायदे भी मिलते हैं और छोटे बच्‍चों एवं शिशु के लिए भी धूप बहुत लाभकारी होती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पीडियाट्रिक विभाग के शोध में भी यह बात साबित हो चुकी हैं क‍ि गर्भवती महिलाओं में विटामिन डी की कमी का असर नवजात शिशुओं में देखने को मिलता है। इससे बच्चों की हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इसे दूर करने के लिए जन्म के 5 से 15 दिन बाद सर्दी में नियमित रूप से शिशु को 15 से 20 मिनट धूप में जरूर ले जाना चाहिए। बच्‍चों की सेहत के ल‍िए धूप अच्‍छी होती है और इस आर्टिकल में हम आपको शिशु या छोटे बच्‍चों को धूप से मिलने वाले फायदों के बारे में बता रहे हैं। –
विटामिन डी म‍िलता है – धूप से शरीर को विटामिन डी बहुत मिलता है। हमारे शरीर को विटामिन डी की जरूरत होती है और इसे बनाने के लिए शरीर को रोज कम से कम 15 मिनट तक यूवी किरणों के सामने बैठना चाहिए।
पील‍िया से बचाव – धूप बिल्‍रूबिन को तोड़ने में मदद करती है। यह एक पीले रंग का तत्‍व होता है जो प्राकृतिक कैटाबोलिक पैथवे में बनता है। इससे बेबी का लिवर बिल्‍रूबिन को और आसानी से प्रोसेस कर पाता है। बिल्‍रूबिन बढ़ने पर शिशु की त्वचा पीली पड़ सकती है। सुबह 15 से 20 मिनट तक धूप में रहने से पीलिया के हल्‍के लक्षण कम हो सकते हैं।
हैप्‍पी हार्मोन का विकास – छोटे बच्चे के दिमाग के विकास के लिए सर्दियों की धूप बहुत जरूरी होती है। धूप में रहने से बच्चे के शरीर में सेरोटोन‍ि हार्मोन की बढ़ोतरी होती है। सेरोटोनिन को हैप्‍पी हार्मोन भी कहते हैं जिससे खुशी और सुरक्षा की भावना आती है। सेरोटोनिन बच्‍चों में नींद और पाचन को नियंत्रित करता है।
डायबिटीज का खतरा टलता है – कम उम्र में ही धूप लेने से डायबिटीज जैसी बीमारियों से बचने में मदद मिल सकती है। धूप से बॉडी को विटामिन डी मिलता है, जो शरीर को इंसुलिन लेवल को नॉर्मल रखने में भी सहायता करता है।
हड्डियां बने मजबूत – हेल्‍थलाइन के मुताबिक धूप से बच्चों को विटामिन डी मिलता है जो कैल्शियम को अवशोषित करने में मदद करता है। इससे बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं।
इतनी देर जरुर बच्‍चों को खिलाएं धूप – सूरज निकलने के एक घंटे बाद और सूरज ढलने से एक घंटे पहले का समय सबसे अच्‍छा होता है। हालांक‍ि बच्चों की त्वचा बहुत संवेदनशील होती है इसलिए 30 मिनट से ज्‍यादा उसे धूप में न बिठाएं। इस समय बच्‍चे की छाती और पीठ पर धूप जरूर लगनी चाहिए।

समानता और अधिकार का सूर्य ही न्याय का प्रभात लाकर गढ़ सकता है स्वस्थ समाज

नया साल आ चुका है। बीते साल में बहुत से खट्टे – मीठे अनुभव हुए और कुछ मायनों में इतिहास भी बना। भारत के लिए यह वर्ष ऐतिहासिक रहा और जब महिलाओं की बात आती है तो इसने उपलब्धि दी, बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण बिल कानून बन चुका है। वहीं महिलाओं के साथ जब अपराध की बात आती है तो युग आज भी बर्बर है। श्रद्धा कांड ने झकझोरा और जब लिख रही हूँ तो महिला पहलवानों के उत्पीड़न और उनकी निराशा के बीच मन फंसा पड़ा है। अगर समाज अन्याय का साथ देता रहा और हर मोड़ पर बृजभूषण ही लड़कियों को मिलते रहे तो उनकी उपलब्धियों को रास्ता कैसे मिलेगा? हस्तिनापुर की द्यूत सभा में दुर्योधन मद में जंघा पीट रहा है और आज भी उसे रोकने वाला कोई नहीं, लड़कियों का मनोबल गिराने के लिए सब के सब खड़े हैं। घर – परिवार, समाज कोई भी स्त्री के सच का साथ नहीं देता और वह भी उस देश में जो महिषासुरमर्दिनी का देश है। स्त्री को देवी मत बनाइए मगर उसके हिस्से का सुख तो उसे मिलना ही चाहिए। आखिर माता – पिता कैसे अपनी बेटियों को अपने बेटों के रहमो करम पर छोड़ देते हैं। आखिर लड़कियां कब समझेंगी कि सुख का रास्ता आत्मसम्मान और अपने अधिकारों की रक्षा से होकर गुजरता है। भावनात्मक जाल में बहनें ही सबसे अधिक फंसी रहती हैं और उनकी भावुकता का लाभ उठाकर उनकी खुशियों पर परिवार कब्जा कर लेता है। सम्पत्ति के अधिकार को अदालत ने मान्यता दे दी मगर किसी भी सरकार में इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे लागू करे। तमाम सरकारी योजनाएं महिलाओं को लॉलीपॉप थमाने जैसी हैं। कभी मुफ्त बस का टिकट तो कभी बैंक खाते में 5-6 हजार रुपये भेज देना, कभी मुफ्त सिलिंडर दे देना और वह भी चुनाव आने पर…मगर स्त्री की पहचान, उसकी अस्मिता को मजबूत करने के लिए, परिवारों में उसकी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए उसकी सम्पत्ति प्राप्त करने के अधिकार को अधिकार मानने के लिए कोई भी कुछ नहीं कर रहा है। असमानता तो स्त्रियां बचपन से ही झेलती हैं और अधिकतर मामलों में अपनी ही मां के अन्याय का शिकार बनती हैं। माताओं की शह पर ही भाई बहनों की पढ़ाई छुड़वाने , नौकरी छीनने से लेकर उनके जीवन के हर फैसले में अजगर की भांति हावी होने का प्रयास करते हैं। अगर किसी स्त्री ने विवाह नहीं किया तो मान लिया जाता है कि उसे भाइयों पर निर्भर रहकर उनकी जूठन पर निर्भर रहना होगा, उनका टूटा – फूटा सामान रखना होगा और घरेलू सहायिका से बदतर जीवन गुजारना होगा। हम ननदों और बुआ पर मीम्स बनाते हैं, कहानियों में वह खलनायिका है मगर संयुक्त परिवार में जब आधे – अधूरे संबंधों को ही आपने तमाम अधिकार दे रखे हैं तो आप कैसे उम्मीद करते हैं कि बाकी रिश्ते जीवित रहेंगे? अगर भारतीय संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और लोग एकल रहना पसन्द कर रहे हैं तो इसका दायित्व उन पर नहीं, बल्कि उस समाज पर है जो सच के साथ और पीड़ित के पास खड़ा नहीं होता। परिवारों में जो भी शक्तिशाली रहता है, उसने अपने लालच की पराकाष्ठा दिखाते हुए छोटे – भाई बहनों के तमाम अधिकारों पर कब्जा जमा रखा है और  आप उसे मान्यता भी देते हैं। आपको पीड़ित की चिन्ता नहीं है, उसके दुःखों से आपको कोई मतलब नहीं है, आपको चिन्ता है कि खोखले सम्मान की जो चादर आपने ओढ़ रखी है, उस पर आंच न आए…तो यह चादर तो एक दिन फटनी ही है। ऐसी स्थिति में परिवार का टूटना तय है। जब तक समाज सच और न्याय की जगह शक्ति के  नाम पर अहंकार को प्रश्रय देगा, तब तक वह आगे नहीं बढ़ सकता। समानता और अधिकार का सूर्य ही न्याय का प्रभात लाकर एक सुखी समाज गढ़ने की क्षमता रखता है।
बहरहाल, व्यस्तताओं के कारण दिसम्बर अंक निकाला नहीं जा सका। नववर्ष के इस अंक में हम बहुत नहीं तो तीन आमुख कथाओं के साथ इसे समाहित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह चुनौतियों सुरंग से निकलकर नये न्याय के आलोक में नववर्ष का प्रभात लाने की यात्रा है। सुरंग से निकला है न्याय का नया सवेरा। यह मिशन उत्तरकाशी से लेकर नयी न्यायिक संहिता और नववर्ष की यात्रा है। हम विश्वास करना चाहते हैं कि नारी शक्ति को उसके हिस्से के सुख का सूरज मिले और अधर्मियों को दंड मिले। घोर निराशा के बीच भी हमें महिला पहलवानों के साथ न्याय की प्रतीक्षा है, हमें प्रतीक्षा है कि बहनों को उनकी सम्पत्ति और भावनात्मक दृढ़ता का अधिकार मिले। नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ आप सभी को शुभ नववर्ष ।

हावड़ा राइटर्स एसोसिएशन की ओर से सम्मानित किये गये साहित्यकार

हावड़ा ।  हावड़ा राइटर्स एसोसिएशन के वार्षिक साहित्यिक सम्मान शिवपुर में इदारा इमदादुल गुर्बा में प्रदान किये गये। हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान डॉ.अभिज्ञात, बांग्ला के लिए अमित मुखोपाध्याय और उर्दू के लिए शब्बीर जुल मनान को दिया गया। संस्था के संस्थापक और विख्यात साहित्यकार स्वर्गीय कैसर शमीम की स्मृति में किसी उर्दू साहित्यकार को दिया जाने वाला कैसर शमीम अवार्ड हलीम साबिर को मिला। एसोसिएशन के सदस्य लेखक का सम्मान डॉ.सुल्तान साहिर को और विशेष
सम्मान से शहनाज रहमत को नवाजा गया। समारोह को संस्था के अध्यक्ष डॉ.मुहम्मद शमसुल हसन अंसारी, सचिव जावेद मजीदी ने सम्बोधित किया। समारोह की अध्यक्षता डॉ.शाहिद अख्तर ने की।