नयी दिल्ली। नोबेल पुरस्कार विजेताओं के साथ शोध पत्र की सह-लेखिका से लेकर शीना बोरा हत्याकांड जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों की निगरानी तक, राजस्थान कैडर की इस भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी नीना सिंह केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की पहली महिला प्रमुख के रूप में अपनी भूमिका में अनुभव का खजाना लेकर आई हैं।
अगस्त में अपने पूर्ववर्ती शील वर्धन सिंह की सेवानिवृत्ति के बाद वह पहले से ही बल के विशेष (अंतरिम) महानिदेशक का पद संभाल चुकी हैं। 1989 आईपीएस बैच की अधिकारी सिंह का राजस्थान पुलिस से लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) तक शानदार कॅरियर रहा है. उन्होंने अपने करियर में कई चीज़ें पहली बार कीं, जिनमें 2021 में राजस्थान पुलिस में महानिदेशक बनने वाली पहली महिला आईपीएस अधिकारी भी शामिल हैं।
बिहार की बेटी – बिहार के दरभंगा जिले की रहने वाली सिंह ने माध्यमिक शिक्षा पटना महिला कॉलेज से पूरी की और फिर दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमफिल करने के लिए दाखिला लिया, लेकिन पुलिस सेवा में शामिल होने के बाद उन्होंने इसे पूरा नहीं किया। सिंह के पास हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से लोक प्रशासन में मास्टर की डिग्री भी है. हार्वर्ड में ही उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो के साथ सिस्टम में सुधार और पुलिस प्रदर्शन में सुधार के विषय पर दो सह-शोध पत्र लिखे थे, जिसमें उन्होंने राजस्थान पुलिस के संदर्भ दिए थे। मणिपुर कैडर आवंटित, आईपीएस अधिकारी को राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी रोहित कुमार सिंह से शादी के बाद उनके कॅरियर की शुरुआत में ही राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया था। उनके पति वर्तमान में केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय में सचिव के पद पर कार्यरत हैं।
जयपुर में पुलिस अधीक्षक के रूप में उन्हें दोपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट के उपयोग को सख्ती से अनिवार्य करने का श्रेय दिया जाता है। वह उप-महानिरीक्षक, जयपुर रेंज और महानिरीक्षक, अजमेर रेंज बनीं। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को पेशेवर उत्कृष्टता के लिए अति उत्कृष्ट सेवा पद के साथ-साथ सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक और राष्ट्रपति पुलिस पदक भी मिला है। सिंह प्रशासक की भूमिका में थीं और उन्होंने राजस्थान पुलिस के विभिन्न विशिष्ट विभागों में काम किया था। नागरिक अधिकार एवं मानव तस्करी विरोधी विभाग की प्रभारी एडीजी बनने से पहले वह एडीजी (प्रशिक्षण) थीं। 2021 में सीआईएसएफ में एडीजी के रूप में प्रतिनियुक्ति पर आने से पहले उन्हें उसी विभाग में डीजी स्तर पर पदोन्नत किया गया था।
सीआईएसएफ में उनका कार्यकाल उनकी दूसरी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति है। उन्होंने 2013 और 2018 के बीच सीबीआई में संयुक्त निदेशक के रूप में काम किया था। उन्होंने सीबीआई के विशेष अपराध क्षेत्र का नेतृत्व किया और उनकी इकाई ने कई मामलों को सुलझाया जिनमें गुरुग्राम के एक स्कूल में एक छात्र की हत्या और हिमाचल प्रदेश में कोटखाई सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला भी शामिल है. उन्होंने सोशलाइट इंद्राणी मुखर्जी की बेटी शीना बोरा की हत्या सहित हाई-प्रोफाइल मामलों की भी निगरानी की थी। उन्हें 2018 में होम कैडर में वापस भेज दिया गया जहां उन्होंने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के रूप में काम किया और 2021 में वे राजस्थान पुलिस में डीजी रैंक की पहली महिला पुलिस अधिकारी बनीं।
शैक्षणिक अधिकारी’ – सीआईएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि चार महीने पहले जब उन्होंने बल के महानिदेशक के रूप में कार्यभार संभाला है। उन्होंने बल और देश भर में काम करने वाली सभी इकाइयों को “प्रेरित” किया है। सीआईएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों में से एक ने कहा कि उनके शैक्षणिक गुणों को सरकार ने भी अच्छी तरह से मान्यता दी है और वह बल को जनादेश के सभी पहलुओं में लागू करने और तैयार करने के लिए उनका उपयोग कर रही हैं। खासकर अंतर-विभागीय संचार में जैसा कि साप्ताहिक सम्मेलनों में देखा गया है, जहां प्रशासन, संचालन और कल्याण पर चर्चा की जाती है.
सीआईएसएफ की स्थापना 1969 में हुई थी और यह गृह मंत्रालय के तहत काम करता है। यह वर्तमान में देश भर में 358 प्रतिष्ठानों को सुरक्षा कवर प्रदान करता है। 13 दिसंबर की सुरक्षा उल्लंघन के बाद हाल ही में गृह मंत्रालय ने सीआईएसएफ को संसद परिसर का सर्वे करने के लिए कहा था।
सीआईएसएफ की पहली महिला प्रमुख बनीं नीना सिंह
अयोध्या का राम मंदिर : जानें- राम मंदिर की 20 विशेषताएं
अयोध्या में भव्य राम मंदिर के पहले चरण का कार्य लगभग पूरा हो गया है. 22 जनवरी को भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी जिसके बाद तमाम रामभक्त अपने आराध्य के दर्शनों के लिए मंदिर आ सकेंगे। अयोध्या में बन रहे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की कई विशेषताएं. श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर इसकी जानकारी दी गई हैं।
ट्रस्ट के मुताबिक राम मंदिर परम्परागत नागर शैली में बनाया जा रहा है। इस मंदिर की लंबाई (पूर्व से पश्चिम) 380 फीट, चौड़ाई 250 फीट तथा ऊंचाई 161 फीट रहेगी। मंदिर का निर्माण तीन मंजिला रहेगा. प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई 20 फीट रहेगी. मंदिर में कुल 392 खंभे व 44 द्वार होंगे. आईए आपको मंदिर की अन्य ख़ास बातों के बारे में बताते हैं –
राम मंदिर की विशेषताएं
– राम मंदिर में मुख्य गर्भगृह में प्रभु श्रीराम का बालरूप (श्रीरामलला सरकार का विग्रह), तथा प्रथम तल पर श्रीराम दरबार होगा।
– मंदिर में 5 मंडप होंगे. नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप व कीर्तन मंडप होगा।
– खंभों व दीवारों में देवी देवता तथा देवांगनाओं की मूर्तियां उकेरी जा रही हैं।
– मंदिर में प्रवेश पूर्व दिशा से, 32 सीढ़ियां चढ़कर सिंहद्वार से होगा।
– दिव्यांगजन एवं वृद्धों के लिए मंदिर में रैम्प व लिफ्ट की व्यवस्था रहेगी।
– मंदिर के चारों ओर चारों ओर आयताकार परकोटा रहेगा। चारों दिशाओं में इसकी कुल लंबाई 732 मीटर तथा चौड़ाई 14 फीट होगी।
– परकोटा के चारों कोनों पर सूर्यदेव, मां भगवती, गणपति व भगवान शिव को समर्पित चार मंदिरों का निर्माण होगा। उत्तरी भुजा में मां अन्नपूर्णा, व दक्षिणी भुजा में हनुमान जी का मंदिर रहेगा।
– मंदिर के समीप पौराणिक काल का सीताकूप विद्यमान रहेगा।
– मंदिर परिसर में प्रस्तावित अन्य मंदिर- महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, निषादराज, माता शबरी व ऋषिपत्नी देवी अहिल्या को समर्पित होंगे।
– दक्षिण पश्चिमी भाग में नवरत्न कुबेर टीला पर भगवान शिव के प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है एवं तथा वहां जटायु प्रतिमा की स्थापना की गई है।
– मंदिर में लोहे का प्रयोग नहीं होगा। धरती के ऊपर बिलकुल भी कंक्रीट नहीं है.
– मंदिर के नीचे 14 मीटर मोटी रोलर कॉम्पेक्टेड कंक्रीट (आरसीसी) बिछाई गई है। इसे कृत्रिम चट्टान का रूप दिया गया है।
– मंदिर को धरती की नमी से बचाने के लिए 21 फीट ऊंची प्लिंथ ग्रेनाइट से बनाई गई है।
– मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से सीवर ट्रीटमेंट प्लांट, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट, अग्निशमन के लिए जल व्यवस्था तथा स्वतंत्र पॉवर स्टेशन का निर्माण किया गया है, ताकि बाहरी संसाधनों पर न्यूनतम निर्भरता रहे।
– 25 हजार क्षमता वाले एक दर्शनार्थी सुविधा केंद्र का निर्माण किया जा रहा है, जहां दर्शनार्थियों का सामान रखने के लिए लॉकर व चिकित्सा की सुविधा रहेगी।
– मंदिर परिसर में स्नानागार, शौचालय, वॉश बेसिन, ओपन टैप्स आदि की सुविधा भी रहेगी।
– मंदिर का निर्माण पूर्णतया भारतीय परम्परानुसार व स्वदेशी तकनीक से किया जा रहा है। पर्यावरण-जल संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. कुल 70 एकड़ क्षेत्र में 70% क्षेत्र सदा हरित रहेगा।
आंख में चोट लगी तो 16 साल के युवा ने बना दी ‘ब्रेल लिपि’
वह खुद नेत्रहीन थे पर नेत्रहीनों के मसीहा माने जाते हैं। महज तीन साल की उम्र में उन्होंने चोट लगने के कारण अपनी आंखों की रोशनी गंवा दी थी इसलिए नेत्रहीनों का दर्द बखूबी समझते थे इसलिए जैसे-जैसे बड़े हुए नेत्रहीनों की राह आसान करने की ठानी और 16 साल की उम्र में एक ऐसी भाषा का आविष्कार कर डाला जिसे नेत्रहीन भी पढ़ सकें। इस भाषा को हम ब्रेल लिपि के नाम से जानते हैं। इसे इसके आविष्कारक लुई ब्रेल की मौत के 16 साल बाद मान्यता मिली जब दुनिया ने उनकी देन को माना । चार जनवरी को हर साल विश्व ब्रेल दिवस मनाया जाने लगा । जानते हैं उन्हीं लुई ब्रेल की कहानी-
फ्रांस में हुआ था लुई ब्रेल का जन्म – चार जनवरी 1809 को लुई ब्रेल का जन्म फ्रांस की राजधानी पेरिस से लगभग 40 किलोमीटर दूर कूपरे नाम के एक गांव में हुआ था। चार भाई बहनों में सबसे छोटे लुई के पिता का नाम सायमन ब्रेल और मां का नाम मोनिका था। लुई के पिता घोड़ों की जीन बनाने वाली फैक्टरी चलाते थे। लुई तीन साल के थे, तभी एक दिन खेल-खेल में चाकू से घोड़े की जीन के लिए चमड़ा काटने की कोशिश करने लगे। उसी दौरान चाकू हाथ से फिसला और उनकी एक आंख में जा लगा। इस चोट के कारण हुए इंफेक्शन से लुई को एक आंख से दिखना बंद हो गया। इस संक्रमण का ऐसा बुरा असर पड़ा कि धीरे-धीरे उनकी दूसरी आंख की रोशनी भी चली गई।
जिस स्कूल में पढ़े, वहीं बने शिक्षक – आंखों की रोशनी जाने के बाद लुई के बचपन के नौ साल ऐसे ही गुजर गए। वह 10 साल के हुए तो पिता ने पेरिस के एक ब्लाइंड स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया। वह पढ़ाई में अव्वल रहे और अपनी अकादमिक प्रतिभा के बल पर उन्हें रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ की स्कॉलरशिप भी मिली। बाद में लुई ब्रेल इसी स्कूल में शिक्षक भी नियुक्त हुए।
पढ़ाई के दौरान बनाया टच कोड – रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड में पढ़ाई के दौरान नेत्रहीनों की समस्या हल करने के लिए लुई ब्रेल ने एक टच कोड (स्पर्श कोड) विकसित कर लिया जिससे देखने में अक्षम लोग बिना किसी की मदद के पढ़ाई कर सकें। इसी दौरान उनकी मुलाकात सेना के कैप्टन चार्ल्स बार्बियर से हो गई। उन्होंने भी एक खास लिपि विकसित की थी, जिसे क्रिप्टोग्राफी लिपि कहा जाता था। यह लिपि सेना के काम आती थी. इसकी मदद से रात के अंधेरे में भी सैनिकों को मैसेज पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आती थी। उन्हीं कैप्टन बार्बियर की मदद और सैना की क्रिप्टोग्राफी लिपि से प्रेरणा लेकर लुई ब्रेल ने बाद में एक और नई तरकीब ईजाद की, जिससे नेत्रहीन पढ़ सकें. इस ईजाद के वक्त लुई ब्रेल की उम्र सिर्फ 16 साल थी।
इस तरह काम करती थी लुई की लिपि – नेत्रहीनों के लिए तैयार की गई लुई ब्रेल की खास लिपि 12 प्वाइंट्स पर आधारित थी। इन सभी 12 प्वाइंट्स को 66 की लाइन में रखते थे। उस समय इसमें फुलस्टॉप, नंबर और मैथ्स के तमाम सिम्बल के लिए कोई जगह नहीं थी. इस कमी को दूर करने के लिए बाद में लुई ब्रेल ने 12 की जगह केवल छह प्वाइंट्स का इस्तेमाल किया। इसके बाद अपनी खास लिपि में 64 लेटर (अक्षर) और साइन (चिह्न) जोड़े. यही नहीं, उन्होंने फुलस्टॉप, नंबर और यहां तक कि म्यूजिक के नोटेशन लिखने के लिए भी जरूरी साइन इसमें शामिल किया।
1829 में प्रकाशित की ब्रेल लिपि – लुई ब्रेल को जब यकीन हो गया कि उनकी बनाई लिपि अब दुनिया के किसी काम आ सकती है तो पहली बार सन् 1824-25 में इसे सबके सामने लेकर आए । इसके बाद और तैयारी की और पहली बार 1829 ईस्वी में इस लिपि की प्रणाली को प्रकाशित किया, जिसे बाद में उन्हीं के नाम पर ब्रेल लिपि कहा गया. हालांकि, इसे जब मान्यता मिली, तब तक वह जीवित नहीं थे।
अब पूरी दुनिया में मान्य है लुई ब्रेल की भाषा – सिर्फ 43 साल की उम्र में छह जनवरी 1852 को लुई ब्रेल ने दुनिया को अलविदा कह दिया। तब तक उनकी लिपि को मान्यता नहीं दी गई थी। लुई ब्रेल की मौत के 16 साल बाद सन् 1868 ईस्वी में ब्रेल लिपि को प्रमाणिक रूप से मान्य करार दिया गया। तबसे लुई ब्रेल की यह भाषा आज भी पूरी दुनिया में मान्य है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिया सम्मान – भले ही जीते जी लुई ब्रेल के काम को दुनिया ने ढंग से न तो सराहा और न ही उसका महत्व समझ पाई पर मरने के बाद उनके काम को प्रशंसा ही नहीं, अपनत्व भी मिला। फिर तो पूरी दुनिया में उनका सम्मान होने लगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2019 में फैसला किया कि लुई ब्रेल के सम्मान में हर साल चार जनवरी यानी उनकी जयंती पर पूरी दुनिया में लुई ब्रेल दिवस मनाया जाएगा। पहली बार उसी साल चार जनवरी को यह दिवस मनाया भी गया और तबसे लगातार हर साल मनाया जाता है।
भारत सरकार ने जारी किया था डाक टिकट – लुई ब्रेल के जन्म के दो सौ साल पूरे होने पर चार जनवरी 2009 को भारत सरकार ने भी लुई ब्रेल के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था, जिस पर उनकी तस्वीर थी। आज विश्व भर के देखने में अक्षम लोगों को ब्रेल लिपि रास्ता दिखा रही है। वे आसानी से इसका इस्तेमाल पढ़ने-लिखने के लिए करते हैं।
भारत का वह साहूकार, अंग्रेज-मुगल भी मांगते थे इनसे उधार
भारत सदियों से दुनिया के लिए एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा. दुनियाभर से कई लोग भारत में व्यापार करने के लिए आए। आज भारतीय उद्योगपतियों का पूरी दुनिया में जलवा और व्यापार है, लेकिन क्या आप सदियों पुराने एक व्यवसायी के बारे में जानते हैं जिनकी ख्याति 400 साल पहले ही दुनियाभर में हो चुकी थी। हम बात कर रहे हैं वीरजी वोरा की, जिनक नाम बहुत कम लोग ही जानते हैं। यह शख्स अंग्रेजों के जमाने में भारत का सबसे अमीर बिजनेसमैन हुआ करता था । इतना नही नहीं वीर जी वोरा ने मुगल काल भी देखा। आइये आपको बताते हैं वीर जी वोरा की कहानी और मशहूर किस्से..
वीरजी वोरा को अंग्रेज मर्चेंट प्रिंस के नाम से जानते थे। बताया जाता है कि वे 1617 और 1670 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी के एक बड़े फाइनेंसर थे। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को 2,00,000 रुपये की संपत्ति उधार दी थी। डीएनए की रिपोर्ट के अनुसार, 16वीं शताब्दी के दौरान वीरजी वोरा की नेटवर्थ लगभग 8 मिलियन डॉलर यानी 65 करोड़ रुपये से ज्यादा थी। सोचिये आज से 400 साल पहले के 65 करोड़ की कीमत खरबों रुपये में होगी। आज के नामी उद्योगपतियों से वे कई गुना अमीर थे.।
मुगल बादशाह ने मांगी थी मदद -ऐतिहासिक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वीरजी वोरा कई सामानों का व्यापार करते थे जिनमें काली मिर्च, सोना, इलायची और अन्य चीजें शामिल थीं. वीरजी वोरा 1629 से 1668 के बीच अंग्रेजों के साथ कई व्यापारिक काम किए। वह अक्सर किसी उत्पाद का पूरा स्टॉक खरीद लेते थे और उसे भारी मुनाफे पर बेच देते थे। वीर जी वोरा एक साहूकार भी था और यहां तक की अंग्रेज भी उससे पैसा उधार लेते थे। कुछ इतिहासकारों की मानें तो जब मुगल बादशाह औरंगजेब भारत के दक्कन क्षेत्र को जीतने के लिए युद्ध के दौरान वित्तीय बाधाओं का सामना कर रहा था, तो उसने पैसे उधार लेने के लिए अपने दूत को वीरजी वोहरा के पास भेजा था।
वीरजी वोरा का व्यवसाय और लेन-देन पूरे भारत और फारस की खाड़ी, लाल सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बंदरगाह शहरों में फैला हुआ था। वीरजी वोरा के पास उस समय के सभी महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों पर एजेंट भी थे, जिनमें आगरा, बुरहानपुर, डेक्कन में गोलकुंडा, गोवा, कालीकट, बिहार, अहमदाबाद, वडोदरा और बारूच शामिल थे। 1670 में वीर जी वोरा ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन एक व्यवसायी के तौर पर उनकी पहचान आज भी कायम है।
ऐसे कीजिए बचे हुए खाने का सही उपयोग
लिटिल थेस्पियन ने आयोजित की नाट्य प्रतियोगिता
कोलकाता । लिटिल थिस्पियन एक बड़े उद्देश्य के तहत हिंदी और उर्दू भाषा-भाषियों युवाओं के लिए नाटक प्रतियोगिता का आयोजन जोगेश माईम अकादेमी में किया गया। लिटिल थेस्पियन की संस्थापक और वरिष्ठ रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला का कहना है कि उनका यह सपना है कि कलकत्ता में भी हिंदी और उर्दू नाटक समृद्ध हो और नये नाट्यदल आगे आए | यहाँ पर हिंदी और उर्दू नाटकों के प्रशिक्षण के लिए कोई नाट्य केन्द्र नहीं,जिसके कारण बंगाल में हिन्दी-उर्दु नाटकों की स्थिति दैन्य है। इस लिए उन्होंने इस नाटक प्रतियोगिता का आयोजन किया है | ताकि इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं में नाटक के प्रति आकर्षण पेदा हो और नये नाट्यदल आगे आएं| उन्होंने कहा कि वो और अज़हर भी इसी तरह कि नाटक प्रतियोगिता में भाग लेते थे और यहीं से उन लोगों ने अपनी संस्था बनाने का निर्णय लिए था |
लिटिल थेस्पियन ने इस प्रतियोगिता का आयोजन इस उद्देश्य से और भी किया है कि नई पीढ़ी रंगमंच की परिभाषा समझे, रंगमंच की समझ हो। नाटक प्रतियोगिता का उद्देश्य एक दूसरों के बीच प्रतिस्पर्धापन करना नहीं बल्कि आज जिन पांच दल इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आए हैं , उनमें से किन्हीं तीन दलों का चयन कर, लिटिल थेस्पियन उन्हें हर चीज मोहिम करवाएगा और पूरी प्रशिक्षण के साथ चयनित दल को लिटिल थिस्पियन के 13वे राष्ट्रीय नाट्य उत्सव ज़श्न-ए-अज़हर के आखिरी दिन उनको मंच प्रदान करेगा। दर्शकों के सामने प्रस्तुति के जरिए इनके अंदर रंगमंच की समझ पैदा होगा | इससे इन में यह समझ आएगी कि एक बेहतरीन नाटक कैसे बन सकता है | इस प्रतियोगिता का एकमात्र उद्देश्य है उन्हें रंगमंच में प्रशिक्षित करना।
प्रथम नाट्य प्रस्तुति खिदिरपुर कॉलेज की टीम राजेंद्र क्रिएटिव ग्रुप (खिदिरपुर कालेज) का नाटक “अब नहीं सहेंगे” जिसके नाटककार और निर्देशक थे राजेन्द्र राय। इस नाटक में नारी शक्ति को केंद्र में रखकर समाज में मोजूदा स्त्रियों को तमाम बुराइयों और समाज की कुप्रथाओं से लड़ने की प्रेरणा देता है।
दूसरा नाट्यदल एस.एम. रशीद थिएटर ग्रुप ने नाटक “ बदलते मौसम के दिन” प्रस्तुत किया जिसके नाटककार शब्बीर अहमद थे तथा निर्देशन आतिबा बतुल ने दिया । ये नाटक पुरूष के जीवन में स्त्री के महत्व को दर्शाता है। तीसरा नाट्यदल का नाम स्टेपिंग स्टोन स्कूल था जिसने मनु भंडारी कि कहानी मजबूरी का मंचन किया| इसका निर्देशन परी सराफ़ ने किया था। ये नाटक पारिवारिक उलझनों को दर्शाने के साथ-साथ रिश्तों के महत्व को उद्घाटित करता है जो आज के आधुनिक समय में कहीं ना कहीं लुप्त होती नज़र आती है। चौथा नाट्यदल स्वांग ड्रामा क्लब (विद्यासागर कालेज) का था जिसने नाटक लाल इश्क का मंचन किया | इस नाटक के नाटककार थे सिप्रा अरोरा। ये नाटक समलैंगिक संबंधों को उद्घाटित करता है और समाज में इस विषय पर विचार करने के लिए विवश किया है। समाज की सोच से ऊपर उठकर अपनी इच्छाओं को प्रकट करने के लिए प्रेरित करता है।
पाँचवाँ वा अंतिम नाटक प्रवासी था जिसे हमारा प्रयास नाट्यदल ने प्रस्तुत किया ,इस नाटक के नाटककार थे श्री रामा शंकर सिंह वा निर्देशक थे शम्भू सिंह। ये नाटक कोराना के दौरान जनता की दर्दनाक स्थितियों को चित्रित करता है कि किस तरह बीमारी से बचते बचते जनता भुखमरी से मरने की स्थिति पैदा होने लगती है। इन पांचों नाटक में से तीन टीम का चयन किया गया है जिनका नाम राजेंद्र क्रिएटिव ग्रुप, एस. एम. रशीद थिएटर ग्रुप एवं सवांग ड्रामा क्लब है और उन तीनों टीम के नाटकों में सुधार करने की जिम्मेदारी खुद लिटिल थेस्पियन की संस्थापक उमा झुनझुनवाला ने ली है। चयन किए हुए प्रतिभागियों की पुनः प्रस्तुति राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले छह दिवसीय नाट्य उत्सव जश्न-ए-अज़हर में होगी जिसके दौरान ही टीमों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पर चयनित कर पुरस्कृत किया जायेगा। यह नाट्य उत्सव 19 से 24 जनवरी 2024 को ज्ञान मंच में होगा।
सार्थक परिवर्तन हमारे सामूहिक प्रयास से संभव
हावड़ा । हिंदी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की ओर से पर्यावरण और राजनीति विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इस कार्यक्रम का शुभारंभ माननीय कुलपति प्रोफेसर डॉ विजय कुमार भारती, बांग्लादेश के विशिष्ट शोधार्थी डॉ सजल रॉय एवं काजी नजरूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ देवाशीष नदी के द्वारा दीप प्रज्वलन से शुरू हुआ ।उद्घाटन संबोधन में कुलपति महोदय ने पर्यावरण पर बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप की ओर संकेत करते संतुलन और सहयोग को बनाए रखने की बात कही।प्रो. प्रेम बहादुर मांझी ने स्वागत वक्तव्य देते हुए सभी वक्ताओं का हार्दिक स्वागत किया। डॉ सजल रॉय ने अपने वक्तव्य में कहा ढाका और कोलकाता सहित बड़ेऔद्योगिक शहरों में औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।साथ ही पर्यावरण संरक्षण की ओर भी इशारा किया जो राजनीतिक सदिच्छा के बिना संभव नहीं है।
डॉ देवाशीष नंदी ने पर्यावरण राजनीति और कूटनीति के संबंधों पर चर्चा करते हुए युद्ध को एक बड़ा कारण माना।साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा करने वाले विकसित देश ही सबसे अधिक पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुल सचिव सुकृति घोषाल सहित अध्यापक जे . के. भारती डॉ. अभिजीत सिंह, प्रो. प्रतीक सिंह, प्रो.मंटू दास,डॉ अजीत कुमार दास, प्रो. विश्वजीत हजाम, प्रो.राजा दत्त, प्रो. संगीता बारी, प्रो. पारोमिता दास, प्रो. प्रशस्ति सिंह, उपस्थित थे । इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का कुशल संचालन राजनीति विज्ञान की प्राध्यापिका प्रो. मधुवंती गांगुली और धन्यवाद ज्ञापन डॉ विकास कुमार साव ने दिया
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55वें गारमेंट बायर्स एंड सेलर्स मीट और बी2बी एक्सपो में 850-900 करोड़ के कारोबार की उम्मीद
पश्चिम बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन का आयोजन
कोलकाता । पश्चिम बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन ने अपने समर्पित सेवा के गौरवशाली 58 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। राज्य में गारमेंट सेक्टर के व्यवसायियों के लिए तीन दिवसीय 55वां गारमेंट बायर्स एंड सेलर्स मीट और बी2बी एक्सपो का आयोजन 8, 9 और 10 जनवरी 2024 को कोलकाता के इको पार्क फेयरग्राउंड में किया गया है। 55वें गारमेंट बायर्स एंड सेलर्स मीट और बी2बी एक्सपो में 900 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड भाग लें रहे हैं। इससे करोड़ों रुपये की आय होने की उम्मीद है। इस एक्सपो में थोक सौदों में 850-900 करोड़ रुपये का व्यापारिक लेनदेन होने की उम्मीद जतायी जा रही है । राज्य की अर्थव्यवस्था को विकसित करने में एसोसिएशन के इस प्रयास के महत्व को ध्यान में रखते हुए, इस कार्यक्रम में राज्य सरकार के साथ बड़े-बड़े उद्योगपति के साथ प्रमुख व्यापारिक घरानों के व्यवसायी इसमें शामिल हुए। इस कार्यक्रम का उद्घाटन सुजीत बोस (अग्निशमन राज्य मंत्री, पश्चिम बंगाल सरकार) ने किया। इस कार्यक्रम में उपस्थित रहनेवाले अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों में निर्मल जैन (संस्थापक, एवरग्रीन होजियरी उद्योग), हरि किशन राठी (डब्ल्यूबीजीएमडीए के अध्यक्ष), विजय करीवाला (डब्ल्यूबीजीएमडीए के वरिष्ठ उपाध्यक्ष), प्रदीप मुरारका (डब्ल्यूबीजीएमडीए के उपाध्यक्ष), देवेन्द्र बैद (डब्ल्यूबीजीएमडीए के माननीय सचिव), डी मित्रा (संयुक्त निदेशक, एमएसएमई- डीएफओ, कोलकाता) के साथ समाज के अन्य क्षेत्र से जुड़ी कई अन्य प्रसिद्ध हस्तियां इसमें शामिल हुए। यह एसोसिएशन एक आधुनिक जीवंत और प्रतिस्पर्धी परिधान उद्योग, मुख्य रूप से एमएसएमई विकसित करने और देश को वैश्विक गारमेंट आपूर्ति श्रृंखला में एक मजबूत केंद्र के रूप में विकसित करने में सक्षम बनाने के लिए अपनी स्थापना के बाद से लगातार गारमेंट मेला और बी2बी एक्सपो का आयोजन करता आ रहा है। अब बायर एंड सेलर्स मीट का यह आयोजन देश के पूर्वी हिस्से में सबसे लोकप्रिय और भरोसेमंद कंपनियों के लिए एक संगम स्थल बन गया है। इस अवसर पर वेस्ट बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हरि किशन राठी ने कहा, पिछले कुछ वर्षों में हमें अपने व्यपारी भाईयों से जो अपार समर्थन मिला है वह अभूतपूर्व है। इस उद्योग के हमारे पूर्व पीढ़ी के लोगों ने ऐसे रास्ते बनाए हैं, जहां से हमे आगे बढ़ने के मार्ग को सरल बनाती हैं। हम खुशी से उनके नक्शेकदम पर चल सकते हैं, और व्यवसाय को आगे बढ़ाने के साथ नयी-नयी नौकरियों का सृजन कर सकते हैं। यह नई पीढ़ी के लिए नया और ब़ड़ा अवसर है। वेस्ट बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के सचिव देवेन्द्र बैद ने कहा कि हमारे एसोसिएशन द्वारा आयोजित खरीदारों और विक्रेताओं की इस तरह के आयोजन ने देश के पूर्वी हिस्से में पिछले पांच दशकों के दौरान लगातार कारोबार में सफलता हासिल की है। यह पूर्वी भारत की सबसे बड़ी रेडीमेड गारमेंट मीट है। इस बैठक को एमएसएमई विभाग द्वारा मंजूरी दे दी गई है, जिससे हमारी बैठक इस क्षेत्र में अपनी तरह की पहली बैठक बन गई है। वेस्ट बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन में उपस्थित अन्य प्रमुख समिति के सदस्यों में श्री कन्हियालाल लखोटिया (कोषाध्यक्ष), प्रेम कुमार सिंहल (संयुक्त कोषाध्यक्ष), अमरचंद जैन, तरूण कुमार झाझरिया, आशीष झंवर, मनीष राठी, कमलेश केडिया, मनीष अग्रवाल, किशोर कुमार गुलगुलिया, विक्रम सिंह बैद, सौरव चांडक, साकेत खंडेलवाल, अजय सुल्तानिया, राजीव केडिया, संदीप राजा, बृज मोहन मूंधड़ा, भुवन अरोड़ा, मोहित दुगड़ के अलावा कार्यकारी समिति के सदस्य और पूर्व अध्यक्ष हरि प्रसाद शर्मा के साथ चांद मल लाढ़ा ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में काफी अहम भूमिका निभाई।
सॉल्टलेक में खुला एचपी घोष अस्पताल
कोलकाता । ईस्टर्न इंडिया हार्ट केयर एंड रिसर्च फाउंडेशन की इकाई एचपी घोष हॉस्पिटल का साल्टलेक के सेक्टर-3 में रविवार को उद्घाटन किया गया। 184 बेड वाले इस मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल का उद्घाटन प्रसिद्ध क्रिकेटर एवं बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने किया।
इस अवसर पर सम्मानीय अतिथि सुजीत बोस (अग्निशमन राज्य मंत्री, पश्चिम बंगाल), बंधन बैंक के एमडी और सीईओ चंद्र शेखर घोष और समाज के अन्य गणमान्य व्यक्ति यहां उपस्थित थे। 75,000 वर्ग फुट में फैले 10 मंजिली इस अस्पताल में अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसाज्जित विदेशी तकनीक की लेटेस्ट मशीने उपलब्ध हैं। अत्याधुनिक तकनीकों के साथ सर्वोत्तम श्रेणी की चिकित्सा सेवाओं से लैस इस अस्पताल में प्रतिष्ठित हेल्थकेयर विशेषज्ञों की पूरी टीम मौजूद है। एचपी घोष अस्पताल में कार्डियोलॉजी, न्यूरो, स्पाइन और ऑर्थोपेडिक उपचार पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। इस अस्पताल में बेहतरीन सेवाओं की पूरी श्रृंखला प्रदान की जायेगी। इस अस्पताल में अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर मौजूद हैं, जिसे सभी आधुनिक और अद्यतन उपकरणों से सुसज्जित किया गया हैं। एच पी घोष अस्पताल के सीईओ श्री सोमनाथ भट्टाचार्य ने कहा, हम इस अस्पताल में मरीजों के लिए विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं लाये हैं। हमारी कोशिश यहां चिकित्सा के हर क्षेत्र में रोगी-अनुकूल समग्र स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देना है, जिससे रोगियों को घर जैसा माहौल फील हो सके। हम इस अस्पताल में मरीजों की सेवा जुनून, करुणा और विशेष अनुभव के साथ करेंगे, जिससे वे जल्द से जल्द स्वस्थ हो सकें।
इस अवसर पर सौरव और डोना गांगुली ने एचपी घोष अस्पताल को एक ऐसी जगह बनाने के लिए बधाई दी, जहां मरीज़ अपनी चिकित्सा आरामदायक और शांत वातावरण में करा सकेंगे। सौरव के साथ डोना ने अस्पताल को स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में उसके नेक प्रयास के लिए शुभकामनाएं दीं।




