Thursday, October 1, 2026
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इन ऐप के साथ खुद कीजिए अपनी सुरक्षा

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औरतों की सुरक्षा आज के समय में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। रोजाना बढ़ती वारदातों ने महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल कर दिया है। कामकाजी महिलाओं के लिए तो स्थिति और भी बदतर है। ऐसे में अपनी सुरक्षा का जिम्मा सबको खुद उठाना पड़ेगा। इसी तकलीफ को खत्म करने के लिए कंपनियों ने कुछ ऐसे स्मार्टफोन ऐप्स निकाले हैं जो उनकी सुरक्षा में काफी मददगार साबित हुए हैं।

बी सेफ  ( bSafe)

इस ऐप में आप अपने परिवार व दोस्तों का एक नेटवर्क बना सकते हैं। जब भी आप किसी मुसीबत में होंगी, इस ऐप के अलार्म को दबाने से आपके ग्रुप पर एक अलर्ट पहुंच जाएगा कि आप सुरक्षित नहीं हैं। इसी ऐप के जरिए वे लोग आपको ट्रैक भी कर सकते हैं। साथ ही ये ऐप आपको वीडियो और ऑडियो रिकार्ड करने का भी विकल्प देता है।

  हिम्मत  (Himmat)

दिल्ली पुलिस द्वारा जारी किए गए इस ऐप को खास तौर पर देर रात तक काम करने वाली महिलाओं के लिए बनाया गया है। इसके SOS अलर्ट को दबाने के बाद ना ही सिर्फ आपके परिवार और दोस्तों को खतरे की जानकारी मिलेगी बल्कि पुलिस कंट्रोल रूम को भी इसकी जानकारी हो जाएगी।

सेफ्टीपिन    (Safetipin)

सेफ्टीपिन ऐप में जीपीएस ट्रैकिंग के साथ-साथ एमरजेंसी कॉन्टेक्ट नंबर और सुरक्षित रास्तों की दिशा सेव होती है। जो रास्ते सुरक्षित नहीं हैं उनके लिए भी ये ऐप आपको अलर्ट कर देगा।

 रक्षा   (Raksha)

रक्षा ऐप की खासियत यह है कि यह बिना खोले भी काम करता है। अपने फोन के वॉल्यूम वाले बटन को तीन सेकेंड तक दबाने से ही यह आपके परिवार व दोस्तों को बता देगा कि आप मुसीबत में हैं। इस ऐप में SOS भी है जो आपके इंटरनेट बंद होने पर आपके परिवार को एसएमएस भेज देगा।

स्मार्ट 24 X7  (Smart 24X7)

तुरंत मदद पाने के लिए इस ऐप से बेहतर कुछ नहीं है। किसी भी एमरजेंसी की स्थिति में पैनिक बटन दबाने से आपके परिवार को आपकी जानकारी तुरंत मिल जाएगी। साथ ही आपको आसपास के अस्पताल, पुलिस स्टेशन या फायर स्टेशन से तुरंत मदद मिलेगी।

कैब के सुरक्षा फीचर

लगभग सभी कामकाजी महिलाएं रेडियो टेक्सी (कैब) का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन कैब्स में बढ़ती छेड़खानी की वजह से वह अकेले सफर करने से डरती हैं।
वहीं कुछ कैब कंपनियों ने इस समस्या को समझते हुए अपने ऐप में ट्रैकिंग का फीचर शामिल किया हैं। कैब में बैठते ही आप जब ये ऐप खोलेंगे तो वह आपके रूट की जानकारी आपके परिवार के एक सदस्य को स्वत: मिल जाएगी और वो शख्स आपका रास्ता और कैब को ट्रैक कर पाएगा।

 

उर्दू की लोकप्रिय कहानियां अब अंग्रेजी में

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नयी दिल्ली  :  उर्दू साहित्य के दीवानों के लिये खुशी की खबर है कि अब वह उर्दू की 25 बेहतरीन कहानियों को अंग्रेजी भाषा मे भी पढ़ सकते हैं।

‘‘उर्दू की कालजयी कहानियां’’ नाम से इन कहानियों का संकलन एवं अनुवाद मुहम्मद उमर मेमन ने किया है। वह विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य और इस्लामिक अध्ययन के प्रोफेसर हैं। उन्होंने इस संकलन में इस्मत चुगतई, राजिंदर सिंह बेदी, मुन्शी प्रेमचंद और सआदत हसन मंटो जैसे लेखकों की कहानियां शामिल की हैं।

मेनन ने इस किताब के परिचय में उर्दू कहानियों के विकास का उल्लेख किया है। इसमें 1930 के उत्तरार्ध में प्रगतिशील विचारधारा के उद्भव और अंतत: आधुनिकतावादी दौर में उर्दू भाषा में इस विधा की शुरूआत करने वाले प्रेमचंद से लेकर मौजूदा दौर तक की अग्रणी एवं प्रयोगवादी उर्दू कहानियों को शामिल किया है। संकलन की हर कहानी अपने समय के समाज का चित्रण करती है। इसमें प्रेमचंद की उत्कृष्ट कृति ‘कफन’ और विभाजन की भयावहता दर्शाने वाली मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ भी शामिल हैं।

 

अंटार्कटिका की गर्म गुफाओं में हो सकती है जीव जन्तुओं की अनदेखी दुनिया : अध्ययन

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मेल्बर्न : वैज्ञानिकों का मनना है कि अंटार्कटिका ग्लेशियरों के भीतर गर्म गुफाओं में जीव जन्तुओं और वनस्पतिओं की रहस्मयी दुनिया हो सकती है।

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (एएनयू) की ओर से किए गए अध्ययन में पाया गया कि अंटार्कटिका के रोस द्वीप में सक्रिय ज्वालामुखी माउंट इरेबस के इर्द गिर्द के क्षेत्र में झरनों के बहाव ने बड़ी गुफा का जाल बना दिया है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि इन गुफाओं से मिले मृदा के नमूनों के अध्ययन से इसमें शैवाल , मॉस और छोटे जन्तुओं के अंश पाए गए।

एएनयू फेनर स्कूल ऑफ इंन्वॉयरमेंट एंड सोसाइटी के सी फ्रासर ने कहा, ‘‘गुफाएं अंदर बेहद गर्म हो सकती हैं। कुछ गुफाओं में तापमान 25 डिग्री सेल्सियस तक भी हो सकता है। आप वहां टी शर्ट भी पहन कर आराम से रह सकते हैं।’’ पोलर बायलोजी जनरल में प्रकाशित अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता फ्रेसर ने कहा, ‘‘गुफा के मुहाने में रोशनी है और कुछ गुफाओं में जहां बर्फ की पर्त पतली है वहां अंदर की ओर रोशनी के फिल्टर्स हैं।’’ उन्होंने कहा कि माउंट इरेबस की अधिकतक गुफाओं से मिले डीएनए अंटार्कटिका में अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले मॉस, शैवाल और अकशेरुकी जीवों सहित पेड़ों और जानवरों के डीएनए से मिलते जुलते हैं।

उन्होंने कहा कि इस अध्ययन से एक झलक मिलती है कि अंटार्कटिका की बर्फ के अंदर क्या हो सकता है। वहां वनस्पतियों और जंतुओं की नई प्रजातियां भी मौजूद हो सकती हैं। ’’ वैज्ञानिक ने कहा, ‘‘ अगला कदम गुफाओं को अधिक नजदीकी से देखना और किसी जीवित जीव जन्तु की तलाश करना है। अगर वहां वे मौजूद हैं तो एक नई दुनिया का पता लग पाएगा।’’

 

आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने  का त्योहार है नवरात्रि

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वैदिक ऋषियों ने प्रकृति को मातृ-शक्ति की संज्ञा दी और प्रकृति और पुरुष के रूप में सृजन शक्ति को पूजनीय बनाया है। पुरुष स्वरूप शिव है और प्रकृति स्वरूप शक्ति। शिव और शक्ति के सम्मिलन से ही जीवन का सृजन होता है। नवरात्र मां दुर्गा की आराधना का पर्व है।

मां दुर्गा के 9 स्वरूप हैं : पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथा कुष्मांडा, पांचवां स्कंदमाता, छटा कात्यायनी, सातवां कालरात्रि, आठवां महागौरी और नौवां सिद्धिदात्री।

शिव के अलावा केवल दुर्गा ही एक ऐसी देवी हैं, जो त्रिनेत्र धारिणी हैं। उनका बायां नेत्र चंद्रमा का प्रतीक है, जो हमारे भीतर स्थित लालसा, मोह और कामना को व्यक्त करता है। उनका दायां नेत्र सूर्य का प्रतीक है, जो हमारे भीतर स्थित तेज, कर्म क्षमता और शक्ति का सूचक है और उनके मध्य भाग में स्थित उनका तीसरा नेत्र अग्नि का प्रतीक है, जो ज्ञान, विवेक और बुद्धि का सूचक है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुरों के राजा महिषासुर को यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी मानव, देव या असुर उसको पराजित नहीं कर सकता। यह वरदान देते समय सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने उससे पूछा कि क्या मानव, देव या असुर की इस सूची में स्त्री को भी शामिल कर लिया जाए, ताकि कोई स्त्री भी उसे पराजित नहीं कर पाए? क्षह सुनकर उसका अहंकार जाग उटा, उसे लगा कि किसी स्त्री को पराजित करना भला कौन-सा कठिन काम होगा, इसलिए उसने इस वर को ठुकरा दिया।

दुर्गा का शाब्दिक अर्थ है, दुर्ग या किला। एक ऐसी सुरक्षित जगह, जिसे जीतना या काबू में करना बेहद मुश्किल हो, इसे हमारी रक्षा के लिए घर की स्त्री निर्मित करती है। दुर्गा इस विशाल सृष्टि की जननी हैं और सभी जीवों का पालन-पोषण करती हैं, घर की देवी यही भूमिका अपने परिवार के लिए निभाती है।

इस कहानी में हम दुर्गा को ज्ञान, बुद्धि और विवेक के रूप में देखते हैं, जो सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक बंधनों से परे हैं, वे सामूहिक शक्ति का प्रतीक हैं, महिषासुर अज्ञान, अहंकार और हमारी लालसाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उसके मायावी होने और निरंतर रूप बदलने का आशय है हमारा अनियमित व्यवहार और हमारी विनाशकारी भावनाएं।

जैसे हमारी बुद्धि लगातार भोग की एक लालसा से दूसरी लालसा की ओर आकर्षित होती है और उनके पीछे भागती है। असुर का अत्यधिक क्रोध हमारी वही वृत्ति है, जो बिना कुछ सोचे-समझे अपनी लालसाओं की राह में आने वाली हर चीज को ध्लस्त करना चाहती है। यह आज के समाज में व्याप्त कलुष को भी प्रदर्शित करता है।

भलानी प्रकृति हैं और शिव पुरुष हैं, यह हिंदू धर्म की आधारभूत अवधारणा है। दोनों बराबर के साझीदार हैं और इस सृष्टि को रचने और चलाने में। मगर पुरुष का अहंकार पशुपतिनाथ को पशु बनाए रखता है।

नवरात्र के नौ दिनों में हर दिन अलग स्वरूप का पूजन किया जाता है। देवी का पूजन और आराधना की पद्धति शिव की आराधना और पूजा से जरा अलग है। यह अंतर नवरात्र के देवी-पूजन में याद रखने की जरूरत है।

क्या ध्यान रखें?

– नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

– जागरण, भजन, हवन आदि भी करें।

– नौ दिनों में जमीन पर ही सोएं, ब्रह्मचर्य का पालन करें।

– कुमारी पूजन जरूर करें।

– दुर्गा की पूजा में लाल रंग के फूलों का उपयोग करें

– बेला, कनेर, केवड़ा, चमेली, पलाश, अशोक, केसर और कदंब के फूलों से भी पूजा की जा सकती है।

क्या न करें?

– फूजा में दूर्वा (यह गणेशजी को प्रिय है), तुलसी और आंवला (विष्णु को प्रिय) का प्रयोग न करें।

– आक और मंदार के पुष्पों का प्रयोग न करें।

(साभार)

सबसे प्यारी सहेली ने दी सेलेना को नयी जिन्दगी

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काफी समय से लाइमलाइट से दूर रहीं 25 वर्षीय अमेरिकन सिंगर सेलेना गोमेज ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपनी एक फोटो शेयर की है। यह तस्वीर आपका दोस्ती पर विश्वास बढ़ा जाती है और भावुक भी कर देती है।

दरअसल सेलेना गोमेज ने किडनी ट्रांसप्लांट करवाया है। जिसके लिए उन्हें अपनी किडनी उनकी बेस्ट फ्रेंड और टीवी स्टार फ्रेंसिया रेसा ने दी है। साल 2015 में ल्युपस नामक बीमारी से पीड़ित होने की वजह से सेलेना को किडनी ट्रांसप्लांट करवाना था।
ल्युपस नाम की बीमारी की वजह से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होने लगती है। ये ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर के रोग प्रतिरोधक सेल ही मुख्य सेल्स को मारने लगते हैं ।

सेलेना गोमेज ने सोशल मीडिया पर अपनी फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘मुझे पता है कि मेरे फैंस इस बात को नोटिस कर रहे हैं कि मैं इन दिनों दिखाई क्यों नहीं दे रही हूं। मैं किसी म्यूजिक एलबम का प्रमोशन क्यों नहीं कर रही? इसके लिए मैं बता दूं कि हाल ही में मैंने किडनी ट्रांसप्लांट करवाया है। मेरी बेस्ट फ्रेंड फ्रेंसिया ने मुझे नई जिंदगी दी। अब में धीरे-धीरे रिकवर कर रही हूं’ ।

सेलेना ने अपनी दोस्त फ्रेंसिया के बारे में लिखा, ‘मेरी खूबसूरत फ्रेंड ने मुझे बहुत ही अनमोल तोहफा दिया है। उसने अपनी जिंदगी की परवाह किए बिना मुझे अपनी एक किडनी दे दी। इसके लिए तुम्हे बहुत-बहुत शुक्रिया दोस्त। आई लव यू सिस्टर’।

 

लिटिल थेस्पियन ने पूरी की रंगकर्म की 23 साल की सृजन यात्रा

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अपराजिता की ओर से

रंगकर्म सृजन का अनूठा माध्यम है जिसमें समाज को बदलने की शक्ति है और झकझोर देने की शक्ति भी है मगर रंगमंच के संसार में अपनी पहचान बनाना इतना आसान काम नहीं है। आज भी रंगमंच को जीवनयापन का माध्यम मानने और बनाने में संकोच पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, ऐसी स्थिति में उमा झुनझुनवाला के लिए राह आसान नहीं थी। उनके सृजन कर्म की कहानी शीघ्र ही हम आपके लिए लाएँगे मगर आश्वस्त करने वाली बात यह है कि पृष्ठभूमि अलग होने के बावजूद रंगमंच की राह इनकी एक ही रही और इस राह पर चलते हुए जिस नन्हे पौधे का जन्म हुआ, अब वह एक वट वृक्ष का आकार ले चुका है और इसकी जड़ें फैलती जा रही है। रंगमंच  के संसार को उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम की जोड़ी ने और समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैै। रंगमंच को एक नया आयाम देना हिन्दी की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को सहेजना है और इसके लिए टिकट खरीद कर नाटक देखना एक दायित्व भी है और सहयोग भी। जिस तरह बूँद – बूँद से सागर भरता है, उसी प्रकार हमारा और आपका छोटा सा सहयोग भी इस विरासत को समृद्ध करेगा। लिटिल थेस्पियन के 23 वर्ष पूरे करने पर अपराजिता की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ और संस्था के सहयोग से प्राप्त एक आलेख जो इस सृजन यात्रा को सामने रखता है। –

रंगमंच को नयी भाषा और कलेवर देने की कोशिश लिटिल थेस्पियन

1994 में स्थापना के बाद से ही लिटिल थेस्पियन रंगकर्म के लिए प्रतिबद्ध है।  साहित्यिक और सामाजिक नाटकों के मंचन के माध्यम से समाज में कला और संस्कृति का विकास इस संस्था का मूल उद्देश्य है। लिटिल थेस्पियन हिंदी और उर्दू इन दोनों भाषाओं में नाटकों के नियमित प्रदर्शन के साथ कार्यशालाओं का सञ्चालन, सेमिनार और राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन भी करता है | कोलकाता में ये हिंदी का एकलौता राष्ट्रीय नाट्य उत्सव है – कथा कोलाज उत्सव(2010-11), जश्न-ए-टैगोर(2011-12), बे-लगाम मंटो(2012-13), जश्न-ए-रंग(2014), कृष्ण और भीष्म(2015) और जश्न-ए-रंग(2016).

लिटिल थेस्पियन ने कहानी और कविता की पाठ प्रस्तुति में अभिनय पक्ष की महत्ता को एक आवश्यक अंग मानते हुए भारतीय भाषा परिषद के साथ मिलकर इसके प्रशिक्षण के लिए तीन महीने का एक डिप्लोमा कोर्स, “कविता और कहानी का नाटकीय पाठ” भी 2016 प्रारम्भ किया है। लिटिल थेस्पियन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है रंगमंच की सर्वप्रथम उर्दू-पत्रिका रंगरस का प्रकाशन जिसे देश भर से सराहना मिल रही है। लिटिल थेस्पियन अब तक अपने इस सफ़र में 17 सम्पूर्ण नाटक, 38 कहानियाँ तथा 8 एकांकियों का मंचन कर चुका है जिनमे से 12 उर्दू, 2 नेपाली तथा शेष हिंदी में हैं.

 

नाटकों में –

  1. रूहें (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम),
  2. बलकान की औरतें (नाटक- जुलेस तास्का, निर्देशन- मुश्ताक़ काक),
  3. धोखा (नाटक- राहुल वर्मा, निर्देशन- अजहर आलम),
  4. कबीरा खड़ा बाज़ार में (नाटक- भीष्म सहनी, निर्देशन- अजहर आलम),
  5. रेंगती परछाइयाँ (नाटक- उमा झुनझुनवाला, निर्देशन- अजहर आलम),
  6. अलका (नाटक- मनोज मित्रा, निर्देशन- उमा झुनझुनवाला),
  7. गैंडा (नाटक- यूजीन यूनेस्को, निर्देशन- अजहर आलम),
  8. पतझड़ (नाटक- टेनेसी विलिएम्स, निर्देशन- अजहर आलम),
  9. सवालिया निशान (नाटक- इस्माइल चुनार, निर्देशन- अजहर आलम),
  10. यादों के बूझे हुए सवेरे (नाटक- इस्माइल चुनारा, निर्देशन- उमा झुनझुनवाला),
  11. हयवदन (नाटक- गिरीश कर्नाड, निर्देशन- अजहर आलम),
  12. शुतुरमुर्ग (नाटक- ज्ञानदेव अग्निहोत्री, निर्देशन- अजहर आलम),
  13. रक्सी को सृष्टिकर्ता (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम),
  14. कांच के खिलौने (नाटक- टेनेसी विलिएम्स, निर्देशन- अजहर आलम),
  15. लोहार (नाटक- बलवंत गार्गी, निर्देशन- अजहर आलम),
  16. सुलगते चिनार (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम) और
  17. महाकाल (अविनाश श्रेष्ठ, निर्देशन- अजहर आलम)

 

एकांकियों में–

  1. ओल–ओकून,
  2. पहले आप,
  3. मंटो ने कहा,
  4. नमक की गुड़िया (अज़हर आलम),
  5. तमसिली मुशाएरा,
  6. दर्द का पोर्ट्रेट,
  7. सद्गति और
  8. ब्लैक सन्डे आदि शामिल हैं.

 

कथा मंच के अंतर्गत कथा कोलाज की श्रृंखला (1-8) में

  1. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था,
  2. मंटो की ठंडा-गोश्त, खोल दो, लाइसेंस, औलाद, सहाय, बू और खुदा की कसम,
  3. टैगोर की आखरी रात और दुराशा,
  4. प्रेमचंद की बड़े भाई साहब और सद्गति,
  5. अज्ञेय की बदला,
  6. मोहन राकेश की मवाली,
  7. इकबाल माजिद की सुइंयों वाली बीबी,
  8. कृष्ण चंदर की पेशावर एक्सप्रेस, शहज़ादा और दो फर्लांग सड़क,
  9. भीष्म साहनी की माता विमाता,
  10. मुज़फ्फ़र हनफ़ी की बजिया तुम क्यों रोटी हो तथा इश्क़ पर जोर..,
  11. इस्माइल चूनारा की दोपहर,
  12. मधु काकडिया की फाइल,
  13. अनीस रफ़ी की पॉलिथीन की दीवार

 

इसके अलावा अन्य और भी कहानियाँ हैं । मंटो की ठंडा गोश्त, खोल दो, सहाय और औलाद के निर्देशक अजहर आलम हैं तथा बाकी सभी कहानियाँ उमा द्वारा निर्देशित हैं। नाटकों और कहानियों के अनुवाद और लिप्यन्तरण में भी लिटिल थेस्पियन काफी सक्रिय है ताकि प्रख्यात और श्रेष्ठ साहित्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंच सके. मुक्तधारा (रवीन्द्रनाथ टैगोर, अनुवाद- उमा झुनझुनवाला व अज़हर आलम),  बलकान की औरतें (उमा झुनझुनवाला), धोखा (उमा झुनझुनवाला), गैंडा (अजहर आलम), पतझड़ (अजहर आलम), अलका (उमा झुनझुनवाला), सवालिया निशान (अजहर आलम), यादों के बुझे हुए सवेरे (अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला) आदि नाटकों व कहानियों का अंग्रेजी और बंगला से हिंदी और उर्दू में अनुवाद तथा लिप्यन्तरण किया है। भारत रंग महोत्सव तथा देश के सभी महत्वपूर्ण नाट्य उत्सवों में लिटिल थेस्पियन की प्रस्तुतियां लगातार रहती हैं l प्रोडक्शन और निर्देशन के कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों में से पश्चिम बंग नाटक अकादमी का पुरस्कार भी महत्वपूर्ण है। लिटिल थेस्पियन के कर्णधार उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम  के साक्षात्कार की झलक –

साभार – यू ट्यूब

 

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समस्याओं से जूझने की शक्ति देता है साहित्य

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हर युग में दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए के लिए साहित्य की जरूरत पड़ती है। व्यक्ति को विवेकशील, विचारवान और संवेदनशील बनाने के साथ साहित्य समस्याओं को पहचानने की समझ देता है। साहित्य समस्याओं से जूझने की शक्ति देता है। श्री शिक्षायतन कॉलेज आयोजित हिन्दी दिवस समारोह में अतिथि वक्ता के रूप में उपस्थित कवि प्रियंकर पालीवाल ने उक्त विचार रखे। उन्होंने कहा कि साहित्यविहीन समाज संवेदना से दूर आध्यात्मिक मृत्यु को प्राप्त होता है। विषय प्रवर्तन डॉ. प्रीति सिंघी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुई। कॉलेज की प्राचार्या डॉ. अदिति दे ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी देश में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में महत्वपूर्ण है। हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस समारोह में रचनात्मक लेखन, काव्य पोस्टर तथा आशु अभिनय प्रतियोगिता आयोजित की गयी। रचननात्मक लेखन प्रतियोगिता में ए.जे.सी बोस कॉलेज के रणवीर कुमार राय , काव्य पोस्टर प्रतियोगिता में श्री शिक्षायन कॉलेज की अनीषा मिंज को प्रथम स्थान मिला। आशु अभिनय में श्री शिक्षायतन कॉलेज ने सर्वश्रेष्ठ दल तथा बेथुन कॉलेज की छात्रा शुभ स्वपना मुखोपाध्याय ने सर्वश्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार जीता। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. रचना पांडेय तथा दूसरे सत्र का संचालन प्रो. सिन्धु मेहता ने किया। रचनात्मक लेखन की निर्णायक डॉ. मनीषा साव, काव्य पोस्टर के निणार्यक कार्तिक बासफोर थे। नाट्यकर्मी महेश जायसवाल तथा ऋतेश पांडेय ने आशु अभिनय प्रतियोगिता का निर्णय किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अल्पना नायक ने किया।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं प्रभाकर माचवे और उनका सृजन कर्म

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कोलकाता : प्रभाकर माचवे प्रयोगशीलता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने सताईस सालों तक साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और पांच वर्षों तक भारतीय भाषा परिषद में हिंदी भाषा और साहित्य की जो सेवा की वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। हिंदी के मूर्धन्य विद्वान डॉ.इंद्रनाथ चौधरी ने उनकी जन्मशती को महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए यह कहा कि वे छह भाषाओं के जानकार और एक चलता-फिरता इंसाइक्लोपिडिया थे। उनके व्यक्तित्व में विरोधाभास भी अनुपूरक के रूप में काम करते थे। उन्होंने कई ग्रंथों का संपादन किया। उनके जीवन की एक बड़ी घटना महात्मा गांधी के निरीक्षण में उनका विवाह है जो 1940 में सादगीपूर्ण ढंग से नौ आने में हुआ था। वरिष्ठ पत्रकार प्रो. राममोहन पाठक ने कहा कि  प्रभाकर माचवे का व्यक्तित्व एक कुशल संचारक का व्यक्तित्व था। उन्होंने ‘चौथा संसार’ के संपादन के माध्यम से जन समस्याओं और देश की प्रगति के बाधक तत्वों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन पर प्रहार किया। ‘कलकत्ता की चिट्ठी’ नामक उनका स्तंभ पूरे देश में चर्चित हुआ। उन्होंने बिना भेद-भाव के सभी पत्र-पत्रिकाओं के लिए विपुल लेखन किया।

तारसप्तक की काव्य परंपरा का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने बताया कि अज्ञेय के साथ मिलकर प्रभाकर माचवे ने तारसप्तक की योजना बनाई जो साहित्य में प्रयोगों पर जोर देती थी। उनका लक्ष्य था कि जिस तरह विज्ञान में प्रयोग होते हैं उसी तरह साहित्य की प्रगति भी निरंतर प्रयोगों से ही संभव है। अन्यथा समाज और साहित्य में रूढ़ियों का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने स्वागत करते हुए कहा कि प्रभाकर माचवे भारतीय भाषा परिषद के बौद्धिक शिल्पकार थे। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध नाटयविद डॉ.प्रतिभा अग्रवाल ने उनके कुछ संस्मरण सुनाए और उनके व्यक्तित्व के कोमल पक्षों को उद्घाटित किया।  उनका कहना था कि प्रभाकर माचवे सिर्फ कवि नहीं थे वे एक अच्छे चित्रकार भी थे और वैसी बहुज्ञता आज दुर्लभ है। परिषद की मंत्री ने बिमला पोद्दार ने सभा का संचालन किया। धन्यवाद देते हुए नंदलाल शाह ने कहा कि हमे ऐसे व्यक्तित्वों का स्मरण करना चाहिए जिनका सांस्कृतिक निर्माण में महत्वपूर्ण रहा है।

 

राष्ट्रीय परीक्षण शाला में मनाया गया हिन्दी पखवाड़ा

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भारत सरकार, उपभोक्ता मामले विभाग के अधीनस्थ सॉल्टलेक स्थित राष्ट्रीय परीक्षण शाला में 14 सितंबर तक हिन्दी पखवाड़ा-मनाया गया। हिन्दी दिवस के दिन आयोजित पखवाड़ा समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में हिन्दी  दैनिक समाचार पत्र “सलाम दुनिया” की वरिष्ठ पत्रकार सुषमा त्रिपाठी उपस्थित रहीं । इसके अलावा राष्ट्रीय परीक्षण शाला के निदेशक डॉ. पी. कांजीलाल उक्त समारोह में उपस्थित थे । उक्त समारोह का संचालन इस कार्यालय के सहायक निदेशक (राजभाषा) श्री अरूण कुमार मजुमदार ने अत्यंत कुशलता पूर्वक किया।  प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे – हिन्दी निबंध, वाद-विवाद, वार्तालाप, आशुपाठ, कविता पाठ, पोस्टर एवं स्लोगन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया  एवं उसमें विजित प्रतिभागियों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

 

हिन्दी से खेलों और भाषा को लोकप्रिय बनाते हिन्दी के कमन्ट्रेटर

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देश में खेलों को लोकप्रिय करने में भाषा की बहुत बड़ी भूमिका है। भारत में 70 फीसदी जनसंख्या हिन्दी बोलती और पढ़ती है। लिहाजा देश में अगर किसी खेल की टीआरपी बढ़ानी है तो चैनलों को हिन्दी का सहारा लेना ही पड़ेगा। हिंदी बाहुल्य जनसंख्या को देखते हुए देश में टीआरपी के लिए कई चैनल आज हिन्दी में विशेष कमेंट्री कर रहे हैं। विदेश के चैनल देश में शीर्ष बने रहने के लिए हिन्दी को आगे कर रहे हैं। यही हमारी हिंदी के महत्व को जगजाहिर कर रहा है। स्टार नेटवर्क ने हिन्दी में कमेंट्री को बढ़ावा दिया है। कुछ साल पहले लोकप्रिय स्पोर्ट्स चैनल ईएसपीएन में हिन्दी की कमेंट्री क्रिकेट की लोकप्रियता में इजाफा कर चुकी है। क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को भी हिन्दी के जरिए लोकप्रिय किया जा रहा है। स्टार स्पोर्ट्स में प्रो कबड्डी लीग की कमेंट्री हिन्दी में हो रही है। कबड्डी खेल को समझने में हिन्दी सहायक हो रही है। इससे कबड्डी की लोकप्रियता काफी बढ़ रही है। स्टार नेटवर्क ने देश का पहला फ्री टू एयर प्राइवेट स्पोर्ट्स चैनल लांच किया है। जिसमें हिन्दी कमेंट्री को तरजीह दी गई है।

प्रो कबड्डी लीग के अलावा बीसीसीआई के घरेलू क्रिकेट और घरेलू फुटबॉल लीग के मैच भी हिन्दी कमेंट्री के साथ प्रसारित होंगे। स्टार नेटवर्क के अलावा सोनी टीवी, टेन स्पोर्ट्स में भी हिन्दी की कमेंट्री की जा रही है। बीसीसीआई के प्रसिद्ध कमेंटेटर जब आपको स्टार स्पोर्ट्स में हिन्दी में मैच की लाइव कमेंट्री करते हैं तो यह काफी रोचक होता है। हमेशा अंग्रेजी में वार्तालाप करने वाले महान सुनील गावस्कर जब क्रिकेट की बारीकी को हिन्दी में बयां करते हैं तो यह अपने आप में रोमांचक होता है।

गुजरे जमाने के विस्फोटक ओपनर वीरेंद्र सहवाग कहते हैं कि जो जजबात हिन्दी में है वह किसी भाषा में नहीं, सहवाग का यह कहना पूरी तरह सही है। जब खिलाड़ी के कमाल को हिन्दी भाषा में पूरे भाव और जजबात के साथ व्यक्त किया जाता है तो वह खेल और खिलाड़ी के रोमांच को निश्वित रूप से दुगुना कर देता है। क्रिकेट को केवल गावस्कर, कपिल और सचिन ने ही आकर्षक नहीं बनाया बल्कि वह हिन्दी के कमेंटेटरों से भी आकर्षक और लोकप्रिय खेल बना है।

देश में हिन्दी की कमेंट्री को संजय बनर्जी और सुशील दोषी, रवि चतुर्वेदी ने एक हद तक नया आयाम दिया है। दोषी की कमेंट्री से लाखों करोड़ों लोग दशकों तक अभिभूत रहे। उनकी क्रिकेट कमेंट्री दर्शकों को रोमांचित करती थी। मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, सुरैश सरैया, अनंत सितलवाड़ ने भी हिंदी में क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाया। पर दोषी की कमेंट्री लाजवाब रही है। सुशील दोषी जैसे कमेंटटर ने कमेंट्री के लिए नए शब्द दिए, मुहावरे तलाशे।

रेडियो पर तो अच्छे कमेंट्रेटर रहे लेकिन टीवी पर कमेंट्री के लिए अब रिटायर्ड क्रिकटेर आगे आ गए हैं। अगर टीवी पर क्रिकेट को सुने देखें तो सुनील गावस्कर, वसीम अकरम बहुत अच्छी कमेंट्री करते रहे हैं। एक दम सधी हुई और संतुलित। कपिल देव, मोहम्मद कैफ, आकाश चोपड़ा, वीरेंद्र सहवाग, नवजोत सिद्धू भी बेहतर कमेंट्री कर लेते हैं। सुनील गावस्कर अंग्रेजी-हिंदी दोनों में बढ़िया कमेंट्री करते हैं। कई क्रिकेटरों के खेल से अलग होने के बाद कमेंट्रेटर बन जाने से टीवी में सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, रवि चतुर्वेदी जैसे हिन्दी कमेंट्रेटरों को जगह नहीं मिल पाई।