Saturday, June 27, 2026
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भवानीपुर कॉलेज में एस.एच.ई. 2.0 एग्ज़ीबिशन कम सेल

कोलकाता ।  विमेन्स सेल (आईक्यूएसी के सहयोग से) द्वारा एस.एच.ई. 2.0 के अंतर्गत गत 9 अप्रैल 2026 को द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के वालिया हॉल में इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, कोलकाता के सहयोग से एक एग्ज़ीबिशन कम सेल का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सामाजिक उत्थान एवं महिला सशक्तिकरण से जुड़ी पहलों को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में उप-प्राचार्या देबजानी गांगुली एवं एनजीओ की सदस्य सुश्री आरती कुर्मी ने अपने विचार व्यक्त किए और समाज में सामूहिक जिम्मेदारी के महत्व पर बल दिया।
इस अवसर पर एनजीओ द्वारा विभिन्न स्टॉल लगाए गए, जिनमें महिलाओं द्वारा निर्मित उत्पादों का प्रदर्शन एवं विक्रय किया गया। डॉ देबजानी गांगुली ने इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क के योगदान की सराहना करते हुए विद्यार्थियों को समाज के वंचित वर्गों के उत्थान हेतु प्रेरित किया। वहीं, सुश्री आरती कुर्मी ने संगठन के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह संस्था महिलाओं को छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू करने में सहायता कर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही है। उन्होंने इस पहल की अग्रणी सुश्री नूपुर सान्याल का भी उल्लेख किया।
यह एग्ज़ीबिशन कम सेल सामुदायिक प्रयासों की शक्ति को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उपस्थित लोगों के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हुई।कार्यक्रम की जानकारी डॉ वसुंधरा मिश्र ने दी।

बिहार का बैकुंठ धाम, श्री बालाजी नरसिंह के रूप में स्थापित हैं भगवान विष्णु

भारत अलग-अलग विविधताओं और अपनी संस्कृति के लिए मशहूर है और यही कारण है कि भारत के जिस भी हिस्से में जाएंगे, वहां के कल्चर, खान-पान और भाषा में बदलाव देखने को मिलेगा। दक्षिण भारत की शिल्प शैली अपने आप में अनूठी है और वहां के मंदिरों की दीवारें खुद इतिहास की साक्षी हैं, लेकिन अब दक्षिण भारतीय मंदिरों के दर्शन करने का आनंद बिहार में मिल जाएगा। बिहार के भोजपुर में श्री बालाजी नरसिंह मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और 12 अप्रैल से मंदिर को सामान्य जनों के लिए खोल दिया गया है। मंदिर खुलने के बाद से लगातार भक्त ‘तिरुपति बालाजी’ की तर्ज पर बने मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंच रहे हैं। खेसारी लाल यादव ने भी मंदिर की तस्वीरें साझा की हैं। ऐसे में आज हम मंदिर के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
‘तिरुपति बालाजी’ की तर्ज पर बने मंदिर को बनाने में 10-11 करोड़ की लागत लगी है और मंदिर को बनने में 10 महीने का लंबा समय लगा है। मंदिर को दक्षिण भारत की शिल्प शैली के साथ बनाया गया है। यही कारण है कि मंदिर ने बिहार में काफी लोकप्रियता हासिल की। मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं की बारीक नक्काशी को उकेरा गया है और मंदिर को अलग-अलग रंगों से रंगा गया है।
मंदिर का मुख्य द्वार और गोपुरम बेहद भव्य तरीके से बनाया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार पर गरुड़ भगवान और बजरंगबली की बड़ी प्रतिमा का निर्माण किया गया है, जबकि मंदिर के गोपुरम पर सूर्य देव की प्रतिमाओं बनाई गई हैं और कई छोटे मंदिरों का निर्माण किया गया है। मंदिर को बैकुंठ धाम की तरह बनाने की कोशिश की गई है, जहां बालाजी नरसिंह अवतार में विश्राम कर रहे हैं।
खास बात यह है कि मंदिर के मुख्य गर्भगृह में मौजूद प्रतिमा को कृष्णशिला पत्थर से बनवाया गया है और प्रतिमा का निर्माण उसी शिल्पकार ने किया है, जिसने अयोध्या में रामलला की मूर्ति का निर्माण किया है। मंदिर की बाकी प्रतिमाओं का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा किया गया है, जबकि गर्भगृह का निर्माण चेन्नई के समीप महाबलीपुरम के कारीगरों से बनवाया गया है।

हड्डियों को मजबूत बनाता है मखाना वाला दूध

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बढ़ता वजन एक बड़ी चिंता बन चुका है। ऐसे में अगर कोई आसान उपाय मिल जाए, जो शरीर को नुकसान पहुंचाए बिना असर दिखाए, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है? भारतीय रसोई में मौजूद कुछ चीजें ऐसी हैं, जो वजन को कंट्रोल करने में मदद करती हैं। इनमें से एक है मखाना और दूध का कॉम्बिनेशन। मखाना (फॉक्स नट्स) को जब दूध के साथ मिलाकर लिया जाता है, तो यह एक सुपरफूड बन जाता है। विज्ञान के अनुसार, मखाना और दूध दोनों ही पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, और इनका साथ में सेवन शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है, खासकर वजन कंट्रोल करने में। दरअसल, मखाना में कैलोरी बहुत कम होती है, लेकिन इसमें प्रोटीन और फाइबर अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है और बार-बार भूख नहीं लगती।
मखाना को दूध में उबालकर खाना फायदेमंद होता है, क्योंकि दूध में मौजूद प्रोटीन और कैल्शियम मखाने के फाइबर के साथ मिलकर शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाते हैं। इससे शरीर का फैट तेजी से बर्न होता है और वजन धीरे-धीरे कम होने लगता है।
विज्ञान के अनुसार, मखाना में एंटीऑक्सीडेंट्स भी पाए जाते हैं, जो शरीर में जमा हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। इसके अलावा, इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और फास्फोरस जैसे मिनरल्स होते हैं, जो शरीर के संतुलन को बनाए रखते हैं। दूध में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है, और जब यह मखाने के साथ लिया जाता है, तो इसका असर और भी बढ़ जाता है।
मखाना वाला दूध सिर्फ वजन कंट्रोल नहीं करता, बल्कि यह दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद पोटैशियम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। इसके साथ ही यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में भी सहायक होता है।
मखाना वाला दूध नींद की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए भी एक अच्छा विकल्प है। दूध में मौजूद ट्रिप्टोफैन नामक तत्व दिमाग को शांत करता है और अच्छी नींद लाने में मदद करता है। वहीं मखाना शरीर को रिलैक्स करता है, जिससे तनाव कम होता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है।
इसके अलावा यह पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है। मखाने में मौजूद फाइबर कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है और पेट को साफ रखने में मदद करता है। वहीं दूध आंतों को पोषण देता है, जिससे पाचन प्रक्रिया बेहतर होती है। यह हड्डियों और दिमाग के विकास में सहायक होता है।

सेहत का खजाना है तरबूज

गर्मियों की शुरुआत के साथ ही रिफ्रेशिंग फल खाने की इच्छा बढ़ जाती है क्योंकि तापमान इतना अधिक होता है कि खाने की बजाय, तरल पदार्थ पीने का मन ज्यादा करता है। हर बदलते मौसम में प्रकृति भी अपना रूप बदल लेती है और गर्मियों में रस से भरे ताज़े फलों की बहुतायत होती है। गर्मियों की शुरुआत के साथ रसीले और मीठे तरबूज भी बाजार में आसानी से मिल जाते हैं। आयुर्वेद में तरबूज को सिर्फ फल नहीं माना जाता, बल्कि इसे पित्त शामक फल की संज्ञा दी गई है। तरबूज को ज्येष्ठ के महीने का फल माना गया है क्योंकि उस वक्त तापमान सबसे अधिक गर्म होता है और तरबूज की तासीर ठंडी होती है। भले ही बाजार में अभी से तरबूज और खरबूज बाजार में मिलने लगते हैं, लेकिन फिलहाल उनका सेवन पाचन की समस्या पैदा कर सकता है। मौसम के अनुसार तरबूज खाने के अनगिनत फायदे हैं।
यह सिर्फ शरीर को हाइड्रेटेड नहीं रखता है, बल्कि वजन को भी नियंत्रित करने में मदद करता है। इसमें कैलोरी बहुत कम होती है और पानी की मात्रा ज्यादा होती है। ऐसे में एक बार सेवन के बाद लंबे समय तक भूख का अहसास नहीं होता है और ओवरईटिंग से बचा जा सकता है। तरबूज खाने से शरीर में गर्मियों में पानी की कमी नहीं होती है क्योंकि तरबूज का 90 फीसदी हिस्सा पानी ही होता है। ऐसे में गर्मियों में तरबूज का सेवन लाभकारी है। यह चेहरे पर प्राकृतिक ग्लो लाने में भी मदद करता है और शरीर के तापमान को भी संतुलित रखता है।
तरबूज में विटामिन सी और विटामिन ए अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो चेहरे और बालों की हेल्थ के लिए लाभकारी है। विटामिन सी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी मदद करता है, जिससे गर्मियों में होने वाली अतिसार और जी घबराने की समस्या कम होती है। इसके अलावा तरबूज में एंटीऑक्सीडेंट्स भी मौजूद होते हैं, जो मांसपेशियों को रिकवर करने में मदद करते हैं।
अगर शरीर में सूजन की समस्या है, तब भी तरबूज का सेवन लाभकारी है। पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स मिलकर शरीर मजबूती देने का काम करते हैं। गर्मियों में दोपहर के वक्त तरबूज जरूर खाएं। अगर काटकर खाने के लिए समय नहीं है, तो पुदीने के साथ मिलाकर उसका जूस भी पी सकते हैं, लेकिन जूस को बिना छाने पिएं।

गर्मी में नाक से खून बहने लगे तो करें यह उपाय

गर्मी का मौसम अपने साथ कई तरह की सेहत से जुड़ी समस्याएं लेकर आता है। तेज धूप, गर्म हवा और शरीर में पानी की कमी का असर सीधे हमारे शरीर पर पड़ता है। इन्हीं समस्याओं में से एक है अचानक नाक से खून आना, जिसे मेडिकल भाषा में एपिस्टेक्सिस कहा जाता है। खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। डॉक्टरों के अनुसार, गर्मियों में नाक के अंदर की नमी कम हो जाती है, जिससे अंदर की परत सूखकर कमजोर हो जाती है और खून बहने लगता है। नाक के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील होती है। इसमें छोटी-छोटी रक्त नलिकाएं होती हैं, जो सूखने पर जल्दी फट सकती हैं। गर्म हवा और कम ह्यूमिडिटी के कारण यह परत और ज्यादा ड्राई हो जाती है। जब कोई व्यक्ति जोर से नाक साफ करता है, छींकता है, तो ये नलिकाएं टूट सकती हैं और खून बहने लगता है। इसके अलावा, एलर्जी, साइनस की परेशानी, संक्रमण या किसी चोट के कारण भी यह समस्या हो सकती है।
कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर या खून को पतला करने वाली दवाइयों का असर भी नाक से खून आने की वजह बन सकता है।
जब अचानक नाक से खून आने लगे तो सही तरीके से प्राथमिक उपचार करें। सबसे पहले सीधे बैठ जाए और सिर को हल्का सा आगे की ओर झुकाएं। इससे खून बाहर निकलता है और गले में नहीं जाता। इसके बाद नाक के नरम हिस्से को अंगूठे से कुछ मिनटों तक दबाकर रखें। इस दौरान मुंह से सांस लेना बेहतर होता है। माथे या नाक पर ठंडी पट्टी या बर्फ रखने से भी खून की गति धीमी होती है और जल्दी रुकने में मदद मिलती है। आमतौर पर ये तरीके कुछ ही मिनटों में असर दिखा देते हैं।
अगर किसी को बार-बार नाक से खून आने की समस्या होती है, तो कुछ घरेलू सावधानियां अपनाकर इसे काफी हद तक रोका जा सकता है। नाक के अंदर हल्का सा नारियल तेल या पेट्रोलियम जेली लगाने से नमी बनी रहती है। गर्मियों में ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए ताकि शरीर हाइड्रेट रहे। कमरे में ह्यूमिडिटी बनाए रखने के लिए ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है। इसके अलावा भाप लेना भी नाक के अंदर की सूखापन कम करने में मदद करता है।

आशा भोसले की सांसों की वीणा हुई शांत

मुम्बई । पूरे दक्षिण एशिया में अपनी खनकती आवाज के जादू से करीब आठ दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका पद्म विभूषण आशा भोसले आज अपनी सुरमयी यात्रा को विराम देकर अनंत में विलीन हो गयीं। मुंबई में अपने आवास पर दिल का दौरा पड़ने के बाद कल आशा भोसले को ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। रविवार दोपहर वेंटीलेंटर पर उनकी सांसों की वीणा थम गई और संगीत के सातों सुर शोक में डूब गये। उनके पुत्र आनंद भोसले ने अस्पताल के बाहर मीडिया को बताया कि आज अपराह्न उनकी मां आशा भोसले अपने नश्वर शरीर को छोड़ कर अनंत यात्रा पर चलीं गईं। कल दिन में 11 बजे से लोग उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन करेंगे और अपराह्न चार बजे शिवाजी पार्क स्थित श्मशान में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की जाएगी।

आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को गोआर, सांगली में हुआ था, जो उस समय सांगली की रियासत (अब महाराष्ट्र में) का हिस्सा था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर मराठी और कोंकणी थे। उनकी माता शेवंती (गुजराती) थीं। आशा भोसले के पिता एक सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और मराठी संगीत मंच पर अभिनेता और थे। नौ साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया और उनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और फिर मुंबई चला गया। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्होंने और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने फिल्मों में गाना और अभिनय करना शुरू कर दिया। आशा का पहला फिल्मी गीत मराठी फिल्म ‘माझा बाई’ (1943) का “चला चला नव बाला” था। इसका संगीत दत्ता दावजेकर ने तैयार किया था। उन्होंने 1948 में हिंदी फिल्म ‘चुनरिया’ के लिए “सावन आया” गीत गाया। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म थी, जिससे उन्होंने अभिनय की शुरुआत की। उनका पहला एकल हिंदी फिल्मी गीत 1949 में फिल्म ‘रात की रानी’ के लिए था। 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध 31 वर्षीय गणपतराव भोसले से शादी कर ली।

आशा की शादी कामयाब नहीं रही। उनके पति गणपतराव ने उन्हें घर से निकाल दिया। अपने तीसरे बच्चे की गर्भावस्था के दौरान वह दो बच्चों के साथ मायके लौट आईं। उन्होंने गीत गाकर, पैसे कमाकर और बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपना जीवन जारी रखा। उन्होंने 1950 के दशक में हिंदी फिल्मों के अधिकांश पार्श्व गायकों की तुलना में कहीं अधिक गाने गाए। इनमें से अधिकतर गाने कम बजट वाली फिल्मों में थे। उन्हें शुरुआती लोकप्रियता परिणीता (1953), बूट पॉलिश (1954), सीआईडी (1956) और नया दौर (1957) जैसी फिल्मों के लिए गाए गए गानों से मिली।

कहा जाता है कि ओपी नैय्यर ने आशा भोसले को उनकी पहचान दिलाई। ओपी नैय्यर और आशा भोसले के कुछ गाने मधुबाला (हावड़ा ब्रिज, 1958) और “ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा”, (मेरे सनम, 1965) पर फिल्माए गए “आइए मेहरबान” हैं। “आओ हुज़ूर तुमको” (किस्मत) और “जाइये आप कहाँ” (मेरे सनम) आदि हैं। उन्होंने तुमसा नहीं देखा (1957), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), और कश्मीर की कली (1964) जैसे गाने रिकॉर्ड किए। नैय्यर ने अपने सबसे लोकप्रिय युगल गीतों जैसे “उड़े जब जब जुल्फें तेरी” (नया दौर), “मैं प्यार का राही हूं” (एक मुसाफिर एक हसीना), “दीवाना हुआ बादल” और “इशारों इशारों में” (कश्मीर की कली) के लिए मोहम्मद रफी और आशा जी के युगल गीतों का भी इस्तेमाल किया।

आशा भोसले से संगीतकार रवि ने कई लोकप्रिय गाने गवाये। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘वचन’ के लिए गीत गाए थे। हम सभी को इस फिल्म का मधुर लोरी गीत “चंदा मामा दूर के” याद है, जो बच्चों का सदाबहार पसंदीदा गीत है। उन्होंने कई फिल्मों के लिए भजन भी गाए। उनका एक भजन “तोरा मन दर्पण” (काजल) बेहद लोकप्रिय हुआ था। वक्त, चौदहवीं का चांद, गुमराह, बहू बेटी, चाइना टाउन, आदमी और इंसान, धुंध, हमराज़ आदि जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों के लिए भी गाने रिकॉर्ड किए। सचिन देव बर्मन या एस.डी बर्मन ने काला पानी, काला बाजार, इंसान जाग उठा, लाजवंती, सुजाता और तीन देवियां (1965) जैसी फिल्मों में कई हिट गाने दिए। इनमें सबसे मशहूर गाना बिमल रॉय की फिल्म बंदिनी (1963) का “अब के बरस” था। इसी तरह ज्वेल थीफ (1967) का मोहक गाना “रात अकेली है” भी काफी लोकप्रिय हुआ और यह तनुजा पर फिल्माया गया था।

पंचम के नाम से लोकप्रिय उनके पति राहुल देव बर्मन ने भी आशा भोसले को नयी उंचाई देने में अहम भूमिका निभाई। 1966 में फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ के लिए संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन के साथ युगल गीत गाने पर आशा को खूब लोकप्रियता मिली। बताया जाता है, जब आशा ने नृत्य गीत “आजा आजा” सुना, तो उन्हें लगा कि वह इस पश्चिमी धुन को गा नहीं पाएंगी। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और लगभग 10 दिनों तक इसका अभ्यास किया। “आजा आजा” के साथ-साथ उन्होंने “ओ हसीना जुल्फोंवाली” और “ओ मेरे सोना रे” जैसे गीत भी गाए, जो सफल हुए और उन्हें अलग पहचान मिली। उनके कुछ अन्य प्रसिद्ध गानों में “पिया तू अब तो आजा” (कारवां) और “ये मेरा दिल” (डॉन) “दम मारो दम” (हरे रामा हरे कृष्णा, 1971), “दुनिया में” (अपना देश, 1972), और “चुरा लिया है तुमने” (यादों की बारात, 1973) आदि गीत शामिल हैं।

आरडी बर्मन ने आशा भोसले और किशोर कुमार के युगल गीत भी रिकॉर्ड किए और कुछ प्रसिद्ध गाने “जाने जान” (जवानी दीवानी) और “भाली भाली सी एक सूरत” (बुड्ढा मिल गया) हैं। 1980 के दशक में बर्मन और आशा ने कई गाने और लोकप्रिय युगल गीत “ओ मारिया!” रिकॉर्ड किया। (सागर). राहुल देब बर्मन ने आशा भोसले से कुछ मधुर बंगाली गाने भी गवाए जैसे मोहुये जोमेछे आज मोउ गो”, ”चोखे चोखे कोठा बोलो”, ”चोखे नामे बृष्टि” (‘जाने क्या बात है’ का बंगाली संस्करण), ‘बंशी सुने की घोर थका जाए”, ”सोंध्या बेलाए तुमी आमी” और ”आज गुनगुन गुन गुंजे अमर” (‘प्यार दीवाना’ का बंगाली संस्करण) होता है”।

शंकर-जयकिशन ने भी आशा भोसले के साथ काम किया। “परदे में रहने दो” गाने के लिए उन्हें दूसरा फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। उन्होंने शंकर-जयकिशन के लिए प्रसिद्ध गीत “जिंदगी एक सफर है सुहाना” (अंदाज़, 1971) भी गाया। उन्होंने बूट पॉलिश (1954), श्री 420 (1955), जिस देश में गंगा बहती है (1960), जंगली (1961), एन इवनिंग इन पेरिस (1968), और कल आज और कल (1971) आदि में भी आशा की आवाज का इस्तेमाल किया।

एक अंतराल के बाद आशा भोसले की वापसी ए आर रहमान की “रंगीला” (1994) गाने से हुई। “तन्हा तन्हा” और “रंगीला रे” जैसे गाने खूब लोकप्रिय हुए। उनके हिट गानों में “मुझे रंग दे” (तक्षक), “राधा कैसे ना जले” (लगान, उदित नारायण के साथ युगल गीत), “कहीं आग लगे” (ताल), “ओ भंवरे” (दाउद, केजे येसुदास के साथ युगल गीत), “वेनिला वेनिल्ला” (इरुवर, 1999), “सितंबर माधम” (अलाईपायुथे, 2000) और “धुआं धुआं” शामिल हैं। (मीनाक्षी, 2004) शामिल हैं। आशा भोसले ने संगीतकार अनु मलिक के साथ कई हिट गाने रिकॉर्ड किए हैं। उनके प्रसिद्ध गाने ये लम्हा फिलहाल” (फिलहाल) और ”किताबें बहुत सी” (बाजीगर) आदि हैं। 1950 और 1960 के दशक में, आशा जी ने अनु मलिक के पिता सरदार मलिक के लिए भी गाया था, और सबसे खास तौर पर सारंगा (1960) में।
उन्होंने 2012 में सुर क्षेत्र में जज की भूमिका भी निभाई। 79 वर्ष की आयु में, उन्होंने 2013 में फिल्म ‘माई’ में मुख्य भूमिका के साथ अभिनय की शुरुआत की। इस फिल्म में उन्होंने अल्जाइमर रोग से पीड़ित और अपने बच्चों द्वारा त्यागी गई 65 वर्षीय मां का किरदार निभाया। आशा जी ने मई 2020 में आशा भोसले ऑफिशियल नाम से अपना यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया।
आशा भोसले का एक और गुण था—खाना पकाना। एक बार एक समाचार पत्र को दिए एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उनका गायन करियर सफल नहीं होता तो क्या होता, तो उन्होंने कहा था, “मैं बावर्ची बन जाती। मैं चार घरों में खाना बनाकर पैसे कमा लेती।” उन्होंने दुबई, कुवैत, आबू धाबी, दोहा, बहरीन और काहिरा में रेस्तरां खोला था। रेस्तरां की इस श्रृंखला की देखरेख वाफी ग्रुप करता है।
आशा भोसले ने आठ दशकों में 12 हजार से अधिक गीत गाये और तीन पीढ़ियों की नायिकाओं को उन्होंने अपनी आवाज़ दी। उन्हें अपने शानदार करियर में अनगिनत पुरस्कार और सम्मान मिले जिनमें प्रमुख 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स (7 सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका सहित), दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 2000 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पद्म विभूषण शामिल हैं। 2001 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया। वर्ष 2011 में संगीत इतिहास में सबसे ज्यादा स्टूडियो रिकॉर्डिंग करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता देते हुए गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में उनका नाम दर्ज किया गया। वर्ष 2021 में उन्हें महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अलावा, उन्हें आईआईएफए, बीएफजेए और कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया और डॉक्टरेट की तीन मानद उपाधियां प्रदान की गयीं।

आत्मनिर्भर भारत लक्ष्य की प्राप्ति में भारतीय भाषाओं की भूमिका पर संगोष्ठी

कोलकाता ।  नराकास, कोलकाता (कार्यालय-2) के तत्वावधान में सीएसआईआर-केन्द्रीय काँच एवं सिरामिक अनुसंधान संस्थान, कोलकाता में दिनांक गत 30 मार्च को ‘आत्मनिर्भर भारत लक्ष्य की प्राप्ति में भारतीय भाषाओं की भूमिका’  विषय पर पूर्ण दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी में नराकास के सदस्य कार्यालयों के प्रतिनिधियों के अलावा देशभर के कई अन्य कार्यालयों से राजभाषा कार्मिक ऑनलाइन शामिल हुए। अपने स्वागत सम्बोधन में सीएसआईआर-सीजीसीआरआई एक प्रशासन नियंत्रक सुप्रकाश हलदर ने आशा जताई कि इस आयोजन से सभी को भारतीयों भाषाओं में कार्य करने में सहायता मिलेगी। अपने अध्यक्षीय अभिभाषण में नराकास अध्यक्ष, प्रो. बिक्रमजीत बसु ने जर्मनी, फ्रांस, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया आदि का उदाहरण देते हुए सभी से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के ज्यादा से ज्यादा उपयोग की अपील की। संगोष्ठी में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भारतीय भाषाओं के योगदान को केंद्र में रखते हुए कुल चार सत्रों आयोजन किया गया। प्रथम सत्र में आईआईटी खड़गपुर के वरिष्ठ हिंदी अधिकार डॉ. राजीव कुमार रावत ने ‘आधुनिक कम्प्यूटिंग ई-टूल्स के उपयोग’ पर अपनी प्रस्तुति तथा अनुभव सभी के साथ साझा किया। द्वितीय सत्र में राजभाषा विभाग, भारत सरकार के क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय में उपनिदेशक (कार्यान्वयन), डॉ. विचित्रसेन गुप्त ने ‘सरकारी कार्यालयों में राजभाषा का  प्रभावी कार्यान्वयन’ विषय पर अपने ज्ञानवर्धक व्याख्यान से संगोष्ठी में शामिल कार्मिकों को अवगत करवाया तथा उनसे भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अपना सार्थक योगदान देने का आह्वान किया। भोजनोपरांत आयोजित तृतीय सत्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग की प्रो. राजश्री शुक्ला ने नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा पर जोर को रेखांकित करते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत लक्ष्य की प्राप्ति में भारतीय भाषाओं की भूमिका’ पर व्याख्यान दिया। अंतिम सत्र में यूको बैंक के मुख्य प्रबंधक (राजभाषा) सत्येन्द्र कुमार शर्मा में ‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी’ विषय पर व्याख्यान-सह-प्रस्तुति के माध्यम से सभी को प्रौद्योगिकी के उचित उपयोग से अपने राजभाषा एवं हिंदी के कार्यों को सुगम बनाने की दिशा में जागरूक किया। चारों सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः डॉ. वंशी कृष्ण बल्ला, ज्योतिर्मय सिकदर, अजयेन्द्र नाथ त्रिवेदी तथा मुनमुन गुप्ता द्वारा किया गया। संगोष्ठी के आयोजन में डॉ. विमलेश कुमार त्रिपाठी प्रशांत तिवारी तथा सत्यजीत नारायण सिंह द्वारा भी योगदान दिया गया।

अमेरिका-ईरान दो हफ्ते के संघर्ष विराम पर सहमत, इजराइल भी राजी

-होर्मुज में शांति की आहट, इस्लामाबाद वार्ता की तैयारी
वाशिंगटन/तेल अवीव/लेबनान/इस्लामाबाद। अमेरिका और ईरान दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमत हो गए हैं। ईरान के 10 सूत्री प्रस्ताव पर यह समझौता राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समयसीमा से दो घंटे से भी कम समय पहले हुआ। ट्रंप ने मंगलवार की समय सीमा तय करते हुए तेहरान से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने या फिर समूची सभ्यता को मिटा दिए जाने का सामना करने की चेतावनी दी थी। मंगलवार देर रात ट्रंप की सहमत होने की घोषणा उनकी असाधारण चेतावनी से एकदम उलट रही। यह घोषणा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के मध्यस्थता प्रयासों के बाद सामने आई।
गल्फ न्यूज, अल जजीरा, तसनीम, सीबीएस न्यूज और सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने पुष्टि की है कि अगले दो हफ्तों तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति ईरानी सेना के प्रबंधन में दी जाएगी। अराकची ने बुधवार तड़के अपने एक्स हैंडल पर ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से युद्ध में प्रस्तावित युद्ध विराम के बारे में बयान जारी किया। इसमें कहा गया है कि अमेरिका के 15 और ईरान के 10 सूत्री प्रस्ताव के बाद शांति का यह अवसर मिला है। बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सैन्य प्रमुख का आभार जताया गया है। इसमें कहा गया है कि दो सप्ताह की अवधि के लिए ईरान के सशस्त्र बलों के साथ समन्वय और तकनीकी सीमाओं का ध्यान रखते हुए होर्मुज़ जलडमरूमध्य से सुरक्षित मार्ग संभव होगा। उल्लेखनीय है कि अमेरिका-इजराइल के 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान में अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, कई वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की मौत हो गई थी। इसके बाद छिड़ा युद्ध खाड़ी देशों तक फैल गया। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान ने कड़ा पहरा बैठा दिया। जहाजों के आवागमन पर रोक लगा दिया। इससे सारी दुनिया में तेल और गैस का संकट पैदा हो गया। संघर्ष विराम पर सहमत होने के बावजूद ईरान ने इस बात पर जोर दिया है कि इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत संघर्ष की समाप्ति का संकेत नहीं होगी, बल्कि कूटनीतिक प्रयासों के विस्तार के रूप में होगी। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने अमेरिका-ईरान सीजफायर समझौते को अमेरिका की जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इसे राष्ट्रपति ट्रंप और जाबांज सेना ने मुमकिन बनाया। उन्होंने एक्स पर कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिका के सैन्य अभियान ने प्रशासन को कड़ी बातचीत करने का मौका दिया, जिससे अब एक कूटनीतिक समाधान और लंबे समय तक शांति की राह खुली है। उन्होंने लिखा, “इसके अलावा राष्ट्रपति ने होर्मुज को फिर से खुलवाया।” ईरानी अधिकारी अमेरिका के साथ इस सीजफायर समझौते को ईरान के लिए एक “जीत” के तौर पर पेश कर रहे हैं। वह अब नागरिकों से वादा कर रहे हैं कि अब अगले कदम ईरान की शर्तों पर बढ़ेंगे। वह कह रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान के 10 सूत्री प्रस्ताव को मानकर ही संघर्ष विराम पर सहमति जताई है। वह कह रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद के अधिकतर मुद्दों पर सहमति बन गई है। इस जंग से ईरान को वही मिला जो वह चाहता था।
ईरान ने कहा है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका के साथ होने वाली आगामी इस्लामाबाद वार्ता के लिए किसे भेजा जाएगा, यह अभी तय नहीं है। ईरान ने मीडिया से अपुष्ट खबरों का प्रसारण न करने का अनुरोध किया है। सरकारी न्यूज एजेंसी तसनीम के अनुसार मीडिया के उन तमाम दावों के बावजूद ईरानी वार्ताकारों की टीम को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। सूत्र ने बताया कि ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का सचिवालय ही टीम तय करेगा। बहरीन ने कहा है कि उसकी नागरिक सुरक्षा टीम ने सुबह ईरान की ओर से हुए हमलों के कारण एक जगह लगी आग को बुझाने में सफलता हासिल की है। कतर के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि एक इंटरसेप्शन (हमले को रोकने की कार्रवाई) के दौरान गिरे मलबे की चपेट में आने से चार लोग घायल हो गए। सऊदी अरब ने बताया कि उसने पांच बैलिस्टिक मिसाइलों को बीच में ही रोककर नष्ट कर दिया। ट्रंप ने कहा, नहीं पता 15 दिन में क्या होगाः अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल ट्रुथ पर नया बयान पोस्ट किया है। उन्होंने कहा कि ईरान युद्ध विराम का स्वागत करता है। वह भी लड़ाई से थक चुका है। उन्होंने कहा कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले 15 दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कैसे आगे बढ़ती है। उन्होंने कहा, ”हमें नहीं पता कि इजराइल उस बातचीत में शामिल होगा या नहीं, जिसकी मध्यस्थता पाकिस्तान करेगा।” उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने संघर्ष विराम समझौते की मध्यस्थता में मदद के लिए पाकिस्तान और चीन का आभार जताया है।
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बंगाल में एसआईआर के बाद 6.75 करोड़ रह गए वोटर

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या में पहली बार गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2011 से लगातार बढ़ रही मतदाता संख्या अब घटकर लगभग 6.75 करोड़ रह गई है। यह जानकारी राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय की ओर से जारी अंतिम पूरक सूची के विश्लेषण में सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में, जब वाम मोर्चा के 34 वर्ष के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की सरकार बनी, उस समय राज्य में लगभग 5.62 करोड़ मतदाता थे। इसके बाद हर चुनाव में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही।
चुनावी वर्ष के अनुसार मतदाताओं की संख्या –वर्ष 2011 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 5.62 करोड़, वर्ष 2014 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 6.27 करोड़, वर्ष 2016 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 6.58 करोड़, वर्ष 2019 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 6.98 करोड़, वर्ष 2021 (विधानसभा चुनाव) – लगभग 7.33 करोड़, वर्ष 2024 (लोकसभा चुनाव) – लगभग 7.60 करोड़
लेकिन, बंगाल में गत नवंबर से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब यह संख्या घटकर 6.75 करोड़ हो गई है। राजनीतिक दलों ने पहले आरोप लगाया था कि नए और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के नाम तो जोड़े जा रहे थे, लेकिन मृत, स्थानांतरित, लापता और दोहरे नाम वाले मतदाताओं को सूची से हटाने की प्रक्रिया प्रभावी तरीके से नहीं हो रही थी।
चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि इस बार पुनरीक्षण के दौरान मृत, स्थानांतरित, लापता, दोहरे तथा फर्जी मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए हैं, जिसके कारण मतदाता संख्या में यह बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया से मतदाता सूची अधिक पारदर्शी और शुद्ध हुई है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य में इसी महीने दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

श्री हनुमानः रामभक्ति के विग्रहवान स्वरूप

हनुमान जयंती (02 अप्रैल) पर विशेष

-डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

हनुमान जी महाराज, परात्पर ब्रह्म, सच्चिदानन्द स्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के निष्ठावान सेवक, निष्काम भक्त और उनके अन्तरङ्ग पार्षद हैं। रामभक्ति के विग्रहवान स्वरूप श्री हनुमानजी भक्ति की उच्चतम पराकाष्ठा पर आसीन है और उनके जीवन में प्रेमा भक्ति, तात्विक ज्ञान और निष्काम कर्म योग का समुच्चय विद्यमान है।

श्री हनुमानजी राम मिलन के प्रमुख सेतु हैं और अपने आराधकों को जीवन के चरम लक्ष्य रामभक्ति की और अग्रसर करते हैं, वे रामभक्तों के परम आश्रय और संकटापन्न स्थिति में उनके संकटों का निवारण करते हुए उनके जीवन में शुभ मङ्गल का संचार करने वाले प्रत्यक्ष देवता कहे जाते हैं।

भगवान् श्रीराम की वनगमन लीला में एक प्रमुख पात्र के रूप में उनकी भूमिका अपने स्वामी श्रीराम के निष्ठावान सेवक के रूप में ही नहीं बल्कि कर्तव्य पथ पर पुत्र के समान आज्ञाकारी, बंधु के समान हितकारी, द्विविधा की स्थिति में गुरु के समान पथ प्रदर्शक तथा विषम परिस्थितियों में मित्र के समान सहयोगी के रूप में भी उल्लेख किए जाने योग्य है। वस्तुत: हनुमानजी जैसा निष्ठावान, समर्पित एवं निष्काम भक्त न तो सृष्टि में पहले कभी हुआ और न आगे कभी हो सकता है। उनके बगैर श्रीरामचरित का पूरी तरह बखान नहीं किया जा सकता।

विराट वैभव से परिपूर्ण श्री हनुमानजी विनयशील हैं और रामकाज में अत्यंत लघु रुप धारण कर लेते हैं। हनुमानजी भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो वे अत्यंत लघु रूप में आकाश मार्ग से गमन करते हुए लंका पहुंचे।

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि लंका की भूमि पर कदम रखने के पहले जहां उन्होंने अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की सीमा में प्रवेश किया, वहीं जब लंका नगरी में माता सीता की खोज शुरू की, तब भी लघु रूप धारण कर सर्वप्रथम अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए सीताजी का अनुसंधान करने लगे।

हनुमानजी शुद्ध भक्त हैं इसलिए अहंकार रहित हैं और उनके द्वारा रामकाज निष्पादन हमें प्रेरित करता है कि किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटा हो जाना ही ठीक है। अहंकार महान् उद्देश्यों की पूर्ति में सदैव बाधक होता है, परिणामस्वरूप अहंकार से कोई महान् कार्य अपने मुकाम पर पहुंचने में पूरी तरह सफल नहीं होता इसलिए हनुमानजी अपने स्वामी श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो अपने मुख में राम नाम की विराट सत्ता को स्थापित कर लिया किंतु अपने स्वरूप को अत्यंत लघु आकार देते हुए लंकापुरी में सीता माता की खोज करने लगे।

धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान् शिव द्वारा अपने स्वामी श्रीराम की सेवा की तीव्र अभिप्सा के निमित्त उन्होंने ग्यारहवें रुद्र के रूप में वायुदेव केसरी और देवी अञ्जना के पुत्र हनुमान के रूप में जन्म लिया और भगवान् श्रीराम की सेवा की अपनी अभिलाषा पूरी की। पुराणों के अनुसार चूंकि भगवान् विष्णु ने रामावतार में पुरुष रुप धारण किया था और भगवान् शिव उनकी सेवा के अभिलाषी थे, ऐसे में यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर सेवा करते तो यह दास भाव के अनुकूल नहीं होता इसलिए उन्होंने मनुष्य से निम्नतर वानर योनि में जन्म लेकर दास भाव से अपने स्वामी भगवान् श्रीराम की सेवा की।

श्रीरामचरितमानस के अनुसार हनुमानजी ने गतिमान सूर्यदेव से तादात्म्य स्थापित करते हुए उनसे शिक्षा ग्रहण की, अपने दिव्य गुणों से वे सूर्यदेव के भी स्नेह भाजन हुए और उनसे प्रखर बुद्धि, दिव्य ज्ञान सहित तेज, ओज, बुद्धि और बल पा गए।

वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि एवं हनुमान बाहुक में गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि जब श्री हनुमान विद्या अध्ययन हेतु भगवान् सूर्य के पास गए तो सूर्यदेव ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि मैं सदैव गतिमान हूं और तुम्हारे लिए मेरे सामने बैठना संभव नहीं इसलिए मैं तुम्हे कैसे शिक्षा दूंगा? तभी हनुमानजी ने सूर्याभिमुख होकर आकाश मार्ग में गमन करना शुरू कर दिया और उनके समक्ष उनसे संपूर्ण शिक्षा ग्रहण की। उधर स्वर्ग स्थित देवताओं ने जब यह अद्भुत एवं विस्मयकारी दृश्य देखा तो सब के सब हतप्रभ रह गए और हनुमानजी के धैर्य, शौर्य, साहस और वीरता की प्रशंसा करने लगे।

हमारे वेद्, उपनिषद् एवं पौराणिक ग्रंथों में भगवान् श्रीराम के पावन नाम की बड़ी महिमा का बखान किया गया है और हनुमानजी महाराज तो भगवान् श्रीराम के अतिप्रिय दास हैं, रुद्रावतार हैं और रुद्र अर्थात शिव सतत रामनाम में ही रत रहते हैं, ऐसे में रुद्रावतार हनुमानजी हर क्षणांश अपने प्रभु के नाम का ही स्मरण किया करते हैं।

श्री बुधकौशिक मुनि रामरक्षा स्तोत्र में भगवान् शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद का उल्लेख करते हुए, रामनाम की महिमा का वर्णन करते हैं-राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने।।

अर्थात है देवी ! राम राम राम इस प्रकार तीन बार राम नाम का उच्चारण सहस्त्र नाम के तुल्य है इसलिए मैं सदैव राम नाम में ही रमण करता हूं ।

श्री हनुमानजी पर ब्रह्म एवं शक्ति की महती कृपा थी और वे इसी शक्ति से अनुप्राणित हुए। वाल्मीकि कृत रामायण सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि भगवान् श्रीराम और भगवती सीता द्वारा प्रदत्त आशीर्वाद से श्री हनुमानजी अजर अमर हैं और कल्प पर्यन्त पृथ्वी लोक में उनका निवास बना रहेगा।

महर्षि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम के आज्ञानुसार सीता माता की खोज कर लौटे हनुमानजी को प्रभु ने अपना सर्वस्व कहा जाने वाला दिव्य आलिंगन प्रदान कर उन्हें कृत-कृत कर दिया और जब प्रभु अपनी लीलाओं का संवरण कर अपने नित्य धाम जाने लगे तब उन्होंने हनुमानजी को कहा कि हनुमान! तुम मेरी कथा में ही मेरी भावना कर कल्प पर्यन्त इस पृथ्वी लोक पर निवास करते हुए स्वयं मेरी कथा सुनना और रसिकों को भी सुनाया करना।

ऋषि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम ने हनुमानजी को कहा कि जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं स्थिर रहेंगी और जब तक मेरी कथा संसार में रहेगी, तुम्हारे शरीर में प्राण रहेंगे और तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। भगवान् श्रीराम की कृपा के साथ ही सीताजी ने भी हनुमानजी पर कृपा करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया कि है तात्! तुम बल और शील के निधान, अजर अमर और गुणों की निधि होओ और श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें।

श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव मुनि, राजा परीक्षित को कहते हैं कि राजन् ! किम्पुरुष वर्ष में भगवान् श्री राम के चरणारविन्दों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्री हनुमानजी अन्य किन्नर गणों सहित भक्ति पूर्वक उनकी उपासना करते हैं। वहां अन्य गंधर्वों सहित आर्ष्टिषेण अपने स्वामी भगवान् श्री राम की परम कल्याणमयी गुणगाथाओं का गान किया करते हैं, हनुमानजी उस कथा का श्रवण करते हैं और अपने प्रभु की स्तुति में मग्न रहते हुए रसिकों को भी राम कथा रुपी अमृत प्रदान करते हैं।

परब्रह्म श्रीराम और आद्या शक्ति सीता के कृपा प्राप्त श्री हनुमानजी महाराज अजर अमर हैं, सब युगों में वर्तमान है और अपने आराधकों को संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें रामभक्ति पथ पर अग्रसर करते हैं, वे रामकथा के अमर गायक हैं। यद्यपि हनुमानजी की विद्यमानता व्यापक रूप से सब जगह है, तथापि जहां-जहां राम का कीर्तन गाया जाता है, वहां वे मौजूद होते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं-

यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम्।।

अर्थात जहां-जहां रघुनाथ श्रीराम का कीर्तन, स्मरण, जप या कथा होती है, वहां-वहां नेत्रों में अश्रुपूरित आनंद लिए हनुमानजी उपस्थित हो जाते हैं। ऐसे राक्षसों के लिए काल स्वरूप श्री हनुमानजी को प्रणिपात किया जाना चाहिए।

(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)