तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह को बीसीसीआई ने पॉली उमरीगर पुरस्कार (बेस्ट इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ द ईयर 2018-19) से सम्मानित किया। मुंबई में रविवार को आयोजित हुए वार्षिक पुरस्कार समारोह में उन्हें यह अवॉर्ड मिला। पूनम राउत को महिलाओं में बेस्ट इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ द ईयर (2018-19) का पुरस्कार मिला। उन्हें हाल ही में अर्जुन अवॉर्ड भी मिला था।
पूर्व क्रिकेटर के. श्रीकांत और महिला क्रिकेटर अंजुम चोपड़ा को कर्नल सीके नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया। अंजुम 100 वनडे खेलने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर हैं।
मंयक, शेफाली को बेस्ट इंटरनेशनल डेब्यू पुरस्कार मिला
बेस्ट इंटरनेशनल डेब्यू के लिए मयंक अग्रवाल और शेफाली वर्मा (महिलाओं में) को सम्मानित किया गया। मयंक ने इस साल 9 टेस्ट में तीन शतक और तीन अर्धशतक की मदद से 872 रन बनाए थे। उनका औसत 67.07 रहा। वहीं, 15 साल की शेफाली ने 9 टी-20 में 222 रन बनाए।
बुमराह ने 2018 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था
दुनिया के नंबर एक वनडे गेंदबाज बुमराह ने जनवरी 2018 में टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ डेब्यू किया था। वे दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज में एक पारी में पांच से ज्यादा विकेट लेने वाले इकलौते एशियाई गेंदबाज हैं। उन्होंने टेस्ट में 62 और वनडे में 103 विकेट लिए।
पुजारा ने 8 टेस्ट में 677 रन बनाए
चेतेश्वर पुजारा को 2018-19 में टेस्ट में सबसे ज्यादा रन बनाने के लिए दिलीप सरदेसाई अवॉर्ड दिया गया। उन्होंने 8 टेस्ट में 52.07 की औसत से 677 रन बनाए थे।
इसके अलावा इन खिलाड़ियों को भी सम्मानित किया गया
लाला अमरनाथ बेस्ट ऑल राउंडर अवॉर्ड (2018-19) : शिवम दुबे
साल की श्रेष्ठ महिला क्रिकेटर (सीनियर वर्ग) : दीप्ति शर्मा
घरेलू क्रिकेट में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीम : विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन
बुमराह को पॉली उमरीगर और दिलीप सरदेसाई अवॉर्ड, पूनम यादव सर्वश्रेष्ठ इंटरनेशनल क्रिकेटर
डिजिटल लॉकर में रखे डॉक्यूमेंट्स से भी करा सकेंगे केवाईसी
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने डिजिटल लॉकर प्लेटफॉर्म और डिजिटल दस्तावेजों को मान्यता दे दी है। अब आप अपने निजी दस्तावेज को ऑनलाइन रख सकेंगे और जरूरत पड़ने पर केवाईसी के लिए भी इनका इस्तेमाल कर सकेंगे। केवाईसी पर आरबीआई के ताजा सर्कुलर में कहा गया है कि ग्राहक के डिजिलॉकर अकाउंट को प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए ई-दस्तावेज अब केवाईसा के लिए मान्य होंगे।
डिजिटल लॉकर से जुड़ी खास बातें….
क्या है डिजिटल लॉकर?
डिजिटल लॉकर या डिजिलॉकर एक तरह का वर्चुअल लॉकर है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे जुलाई 2015 में लॉन्च किया था, हालांकि इससे जुड़े नियमों को 2017 में नोटिफिाई किया गया था। सरकार का दावा है कि एक बार लॉकर में अपने डॉक्यूमेंट अपलोड करने के बाद उन्हें फिजिकली रखने की जरूरत नहीं होती है।
कैसे काम करता है डिजिलॉकर
स्मार्टफोन के एप स्टोर से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की डिजिलॉकर एप डॉउनलोड कर सकते हैं। इसे खोलेंगे तो स्क्रीन पर साइन इन तथा साइन अप के विकल्प दिखाई देंगे। अकाउंट बनाने के लिए साइन अप करना होगा। वैसे ही जैसे ई-मेल अकाउंट बनाते हैं।
यूजरनेम-पासवर्ड तय कर लेने के बाद आधार नंबर डालकर आगे बढ़ें। फिर वैरिफिकेशन के लिए ओटीपी डालकर आगे बढ़ें। आगे बढ़ते ही आपकी स्क्रीन पर आधार कार्ड, एलपीजी सब्सक्रिप्शन वाउचर जैसे सरकार द्वारा इश्यू किए गए दस्तावेजों की सूची होगी।
बैक करेंगे तो स्क्रीन पर फोल्डर होंगे। ऊपर अपलोड का साइन होगा, जिसकी मदद से आप स्मार्टफोन में फाइल या एप में सेव अपने डॉक्यूमेंट्स को इस पर अटैच कर सकते हैं। इन्हें डॉक्यूमेंट व माय सर्टिफिकेट या नए फोल्डर में मूव किया जा सकता है।
जब आप मैन्यू के विकल्प पर जाते हैं तो आपको अपलोड डॉक्यूमेंट, इश्यूड डॉक्यूमेंट, प्रोफाइल और अबाउट अस के अलावा क्यूआर कोड स्कैनर का कोड भी दिखाई देगा। स्कैनर से आप डिजिलॉकर के जरिए उपलब्ध हो रहे दस्तावेजों की सत्यता जांच करते हैं।
ये हैं 5 फायदे
डिजिलॉकर पर दस्तावेज सुरक्षित करने का अर्थ यह भी है कि आपको भौतिक रूप से इन्हें साथ लाने-लेजाने की जरूरत नहीं है।
रेसीडेंड (हमारे) द्वारा यहां अपलोड दस्तावेजों की सत्यता संबंधित विभाग द्वारा प्रमाणित कर जी जाती है। इनकी प्रमाणिकता बढ़ाने के लिए हम इन पर ई-सिग्नेचर भी कर सकते हैं।
इन्हें जिस रिक्वेस्टर (संस्थान जहां दस्तावेज मांगे गए हैं) को पेश करना चाहते हैं, वह इन्हें ऑनलाइन हासिल कर सकता है।
आप किसी रजिस्टर्ड रिक्वेस्टर के साथ अपने ई-डॉक्यूमेंट की लिंक ई-मेल के जरिए शेयर भी कर सकते हैं।
रेसीडेंड द्वारा चाहा गया दस्तावेज इश्युअर (जारी करने वाला विभाग) सीधे उसके डिजिलॉकर में भेज सकता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
कन्याकुमारी का रॉक मेमोरियल, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने की थी साधना
विवेकानंद रॉक मेमोरियल तमिलनाडु के कन्याकुमारी शहर में स्थित प्रसिद्ध स्थल है। सन 1892 में स्वामी विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैरकर इस विशाल शिला पर पहुंच गए। इस सुनसान स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिए मार्ग दर्शन मिला था। यहां बहुत ही सुंदर मंदिर के रूप में विवेकानंद स्मारक भवन बनाया गया है। विवेकानंद जयंती पर बहुत से लोग यहां आते हैं। इस बार स्वामी विवेकानंद जयंती रविवार 12 जनवरी को है। जानते हैं स्वामी विवेकानंद से जुड़ी इस जगह की खास बातें।
शिला पर मिला जीवन लक्ष्य और मार्गदर्शन
वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि 1893 में विश्व धर्म सभा में शामिल होने से पहले विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैरकर इस विशाल शिला पर पहुंच गए। इस निर्जन स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था।
सूर्य और चंद्रमा दिखाई देते हैं आमने-सामने
स्वामी विवेकानंद के संदेशों को साकार रूप देने के लिए ही 1970 में उस विशाल शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। भारत ही नहीं पूरी दुनिया से लोग समुद्र की लहरों से घिरी इस विरासत को देखने के लिए अाते हैं। अप्रैल में पड़ने वाली चैत्र पूर्णिमा पर यहां चन्द्रमा और सूर्य दोनों एकसाथ एक ही क्षितिज पर आमने-सामने दिखाई देते हैं। इस स्मारक का प्रवेश द्वार अजन्ता तथा एलोरा गुफा मन्दिरों के समान है जबकि इसका मण्डपम बेलूर (कर्नाटक) के श्री रामकृष्ण मन्दिर के समान है।
70 फीट ऊँचा गुम्बद
यह विवेकानंद स्मारक भवन बहुत ही सुंदर मंदिर के रूप में बनाया गया है। इसका मुख्य द्वार अत्यंत सुंदर है। इसका वास्तुशिल्प अजंता-एलोरा की गुफाओं के प्रस्तर शिल्पों से लिया गया लगता है। नीले तथा लाल ग्रेनाइट के पत्थरों से निर्मित स्मारक पर 70 फीट ऊंचा गुंबद है। यह समुद्रतल से करीब 17 मीटर की ऊंचाई पर एक पत्थर के टापू की चोटी पर स्थित है। यह स्थान 6 एकड़ के क्षेत्र में फैला है। यह स्मारक 2 पत्थरों के शीर्ष पर स्थित है और मुख्य द्वीप से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है। जो समुद्र के भीतर दूर से ही दिखाई देता है। सूर्योदय अौर सूर्यास्त के समय बहुत ही सुंदर लगता है।
साढ़े 8 फीट ऊँची कांसे की मूर्ति
भवन के अंदर चार फीट से ज्यादा ऊंचे प्लेट फॉर्म पर परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद की मूर्ति है। यह मूर्ति कांसे की बनी है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फीट है। यह मूर्ति इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है।
श्रीपद और विवेकानन्द मण्डपम
मेमोरियल में श्रीपद मण्डपम और विवेकानन्द मण्डपम नाम के दो मण्डप हैं। श्रीपद मण्डपम श्रीपद पराई पर स्थित है जो कि एक पवित्र स्थल है जिसे देवी कन्या कुमारी का आशीर्वाद प्राप्त है। विवेकानन्द मण्डप के चार भाग हैं – सभा मण्डपम्, ध्यान मण्डपम्, सामने का प्रवेशद्वार और मुख मण्डपम्। ध्यान मण्डपम वह ध्यान करने वाला हॉल है, जहां पर्यटक ध्यान कर सकते हैं।
25 वर्ष की उम्र में परिवार छोड़कर स्वामी विवेकानंद बने विश्व प्रसिद्ध् आध्यात्मिक गुरु
भारत के नाम का डंका विदेशों में बजाने वाले स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती युवा दिवस के रूप में मनायी जाती है। 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक कायस्थ परिवार में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त उस समय कलकत्ता हाईकोर्ट के एक वकील थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।
स्वामी विवेकानंद ने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया था, संन्यास धारण कर लिया था। वे विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु थे। उनके कुछ ऐसे विचार भी हैं जिनको अपनाकर कोई अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म महासभा हुई थी, जिसमें विवेकानंदजी ने भाषण दिया। इस भाषण के बाद उन्हें काफी ख्याति मिली थी। उनके इस भाषण के प्रभाव से ही कई अंग्रेजी लोग भारत की संस्कृति से प्रभावित हुए और आध्यात्मिक सुख के लिए भारत भी आए। स्वामी विवेकानंद के कुछ ऐसे विचार, जिनका ध्यान रखने पर आप सफलता हासिल कर सकते हैं।
स्वामी विवेकानंद के विचार
जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिए, नहीं तो लोगों का आप पर से विश्वास उठ जाता है।
हम वो हैं, जो हमें हमारी सोच ने बनाया है। इसलिए इस बात का धयान रखें कि आप क्या सोचते हैं। जैसा आप सोचते हैं वैसे बन जाते हैं।
जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।
जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आए, आप यकीन कर सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर चल रहे हैं।
हम जितना ज्यादा बाहर जाए और दूसरों का भला करें, हमारा हृदय उतना ही शुद्ध होगा और परमात्मा उसमें वास करेंगे।
भला हम भगवान को खोजने कहां जा सकते हैं, अगर उसे अपने हृदय और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते।
आपको अंदर से बाहर की ओर विकसित होना है। कोई तुम्हें पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता. तुम्हारी आत्मा के आलावा कोई और गुरु नहीं है।
पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।
किसी भी चीज से मत डरो। तुम अद्भुत काम करोगे। यह निर्भयता ही है जो पलभर में परम आनंद लाती है।
किराए से परेशान थी , 35 साल पुरानी वैन संवारी, बनाया चलता-फिरता घर
एडिनबर्ग : 25 साल की कैटलिन मॉने लगातार बढ़ते जा रहे बिल और किराए से इतनी परेशान हो गई कि उसने एक वैन को ही अपना घर बना लिया। स्कॉटलैंड के पेस्ले शहर में रहने वाली कैटलिन ने इसके लिए तीन हजार पाउंड में 35 साल पुरानी एक वैन खरीदी और अब उसे संवारकर चलते-फिरते घर में तब्दील कर रहीं हैं। कैटलिन कहती हैं कि भले ही उसके फ्लैट का किराया बाकी फ्लैट्स के मुकाबले काफी कम हो, लेकिन फिर भी उसे इतनी रकम देना बेफिजूल लगता है, क्योंकि सारा दिन तो वह कॉलेज और बाकी कामों के लिए घर से बाहर रहती हैं। ऐसे में 250 पाउंड (करीब 23,403 रुपए) हर महीने बेकार जा रहे थे, तभी उन्होंने वैन को घर बनाया।
जल्द कार में किचन भी फिट करेंगी कैटलिन
कैटलिन ने बताया, “मैं काफी समय से किराए के घर पर रह रही थी और कई बार ऐसा होता जब सिर्फ रात को सोने के लिए ही घर जाती, क्योंकि पूरा दिन पहले कॉलेज फिर काम में बीत जाता। यह सोचकर काफी बुरा लगता कि सिर्फ कुछ घंटे की नींद पूरी करने के लिए ही मैं घर जाती थी। आधा महीना बीतने पर वैसे ही सेविंग्स कम हो जाती है। ऐसे में बिल और किराए का खर्च काफी परेशान कर देता।
मुझे वैन को घर बनाने का आइडिया अपनी एक दोस्त से आया। मैं हमेशा उससे वैन में रहने के आइडिया के बारे में बात करती और जब मुझे मौका मिला तो मैंने खुद वैन को घर बना डाला। अब मैं इसमें छोटी सी किचन फिट करूंगी। यह वैन भले ही पुरानी हो लेकिन चलती भी है।”
कैटलिन ने बताया, “पिछले साल अगस्त में मैं अपने पालतू डॉगी के साथ इसी वैन में दो सप्ताह के लिए नीदरलैंड्स गई थी। दो सप्ताह के ट्रिप में एक बार भी गाड़ी खराब नहीं हुई। इस साल ग्रेजुएट होने के बाद मैं इस वैन से पहले स्कॉटलैंड घूमूंगी, फिर इंग्लैंड और उसके बाद यूरोप। मैं डिजिटल एडिटिंग के पेशे से जुड़ी हूं। इसलिए मैं अपने सफर की भी डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहूंगी। हालांकि, मेरे परवार को मेरे इस वैन में जिंदगी भर के लिए शिफ्ट होने को लेकर संशय है मगर मेरे ब्वॉयफ्रेंड रेयान को इससे कोई प्रॉब्लम नहीं। वह भी मेरी तरह घूमने का शौकीन है और इसलिए हमारा सफर काफी अच्छा बीतेगा।
10 साल से पक्षियों को दाना खिला रहा है ट्रैफिक पुलिसकर्मी
लोग ‘बर्डमैन कॉप’ के नाम से जानते हैं
बारीपदा : ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी पिछले 10 साल से कबूतर और अन्य पक्षियों को दाना खिला रहा है। इस वजह से सूरज कुमार को लोग बर्डमैन कॉप कहकर पुकारते हैं। वे जब सड़क पर दाना लेकर निकलते हैं, तो पक्षी उनके हाथ पर आकर बैठ जाते हैं। वे कहते हैं इससे मुझे सुकून मिलता है।
52 साल के सूरज शहर के कई इलाकों में भूखे पक्षियों को दाना डालते हैं। वे कहते हैं कि मुझे खुशी होती है, जब वे मेरे पास आते हैं और मेरे हाथ से खाना खाते हैं। कभी-कभी वे उस वक्त भी आकर मेरे कंधे में बैठ जाते हैं, जब मैं ड्यूटी पर होता हूं। इसी वजह से इलाके के लोग उनकी सराहना भी करते हैं।
सूरज ने बताया कि पक्षी उसे भरी भीड़ में पहचान सकते हैं। स्थानीय लोग भी बताते हैं कि कबूतर हर सुबह उनका इंतजार करते देखे जा सकते हैं। वे भोजन निकालने से पहले ही सूरज की तरफ आने लगते हैं। सूरज बताते हैं कि मुझे अच्छा लगता है कि इन कबूतरों और पक्षियों की वजह से पहचान मिली। मैं गायों और अन्य जानवरों को भी खाना खिलाता हूं। सभी हर रोज मेरा इंतजार करते हैं। अब मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता हूं। सूरज के सीनियर अफसर भी तारीफ करते हैं। अफसर अभिमन्यु नायक कहते हैं कि वह हर काम में बेहद वक्त के पाबंद हैं। ड्यूटी भी उतनी ईमानदारी से करते हैं।
उत्तराखंड में एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए शुरु होगी पेंशन योजना
उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने दीपिका की ‘छपाक’ से प्रभावित होकर एसिड अटैक पीड़ितों के लिए पेंशन योजना शुरु करने की घोषणा की है। महिला एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य ने खबर की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि हम इसके जरिए पीड़ितों की मदद करना चाहते हैं, जिससे वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
रेखा आर्य के अनुसार इस योजना के लागू होने के बाद एसिड अटैक सर्वाइवर को हर माह 5-6 हजार रुपए दिए जाएंगे। इन रुपयों से उन्हें अपने सपने पूरे करने में मदद मिलेगी। आंकड़ों के अनुसार राज्य में इस समय एसिड अटैक पीड़ितों की संख्या करीब 11 है। उन्होंने कहा कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगे और लड़कों को शिक्षित करना चाहिए कि महिलाओं से कैसे व्यवहार करें।
इंटरनेट ने दुनिया को जोड़ा लेकिन हम आत्मीयता को तरस गए : मार्क जकरबर्ग
कैलिफॉर्निया : फेसबुक के फाउंडर और सीईओ मार्क जकरबर्ग (35) को डाउन टाइम चाहिए, क्योंकि वे परिवार और दोस्तों को वक्त देना चाहते हैं। उन्होंने अपने सालाना ब्लॉग और कमेंट्स में ये बातें शेयर कीं। जकरबर्ग ने लिखा- ”हम सभी को अपने लिए स्पेस की जरूरत है ताकि खुद को वक्त दे सकें, इस दौरान यह चिंता नहीं होनी चाहिए कि हमारी शख्सियत क्या है। मुझे इसकी काफी जरूरत है, क्योंकि मेरी जिंदगी बहुत ज्यादा सार्वजनिक हो चुकी है। मुझे परिवार और दोस्तों के लिए वक्त चाहिए लेकिन मार्क जकरबर्ग के तौर पर नहीं बल्कि एक इंसान के तौर पर। मुझे उम्मीद है कि यह बात हर व्यक्ति तक पहुंचेगी।”
“इंटरनेट के जरिए हमारे दायरे, संस्कृतियों और मौकों का विस्तार हुआ। लेकिन, इतने बड़े समुदाय का हिस्सा होने की चुनौतियां भी हैं। इससे हम आत्मीयता को तरस गए। जब मैं एक छोटे कस्बे में पला-बढ़ा तो अपने लिए वक्त और इसका अहसास होना आसान था, लेकिन अरबों लोगों के बीच अपनी अलग भूमिका तलाशना मुश्किल होता है।” “इस दशक में कुछ बेहद अहम सामाजिक ढांचे फिर से आत्मीयता का अहसास करवाने में हमारी मदद करेंगे। इस क्षेत्र में इनोवेशन को लेकर मैं बहुत ज्यादा उत्साहित हूं। अगले 5 साल में हमारा डिजिटल-सामाजिक माहौल बहुत अलग होगा, फिर से निजी बातचीत पर जोर बढ़ेगा। इससे छोटे-छोटे समुदाय बनाने में मदद मिलेगी जिनकी हम सभी को जरूरत है।”
“इस दशक में साल दर साल चुनौतियों की बजाय लंबी अवधि पर फोकस करूंगा। इस बारे में समझने की कोशिश कर रहा हूं कि मुझे दुनिया से क्या उम्मीदें हैं, 2030 में मेरी जिंदगी कैसी होगी? तब तक मेरी बेटी मैक्स, हाईस्कूल में पढ़ रही होगी। हमारे पास ऐसी तकनीक होगी कि किसी व्यक्ति के दूर होते हुए भी उसकी वास्तविक मौजूदगी का अहसास कर पाएंगे। वैज्ञानिक रिसर्च बहुत सी बीमारियों से बचाने और उनके इलाज में मददगार साबित होंगे, इससे हमारी जिंदगी ढाई साल बढ़ जाएगी।”
“मेरी समझ से फेसबुक युवाओं की कंपनी है जो नई पीढ़ी के मुद्दों पर केंद्रित है। चान-जकरबर्ग इनिशिएटिव के जरिए हम ऐसे प्रयासों पर फोकस कर रहे हैं जिनसे हमारे बच्चों की पीढ़ी को मदद मिल सके। इनमें बीमारियों की रोकथाम और प्राथमिक शिक्षा को बच्चों की जरूरत के मुताबिक बनाने जैसे लक्ष्य शामिल हैं। इसके लिए हम अगले एक दशक में युवा उद्यमियों, वैज्ञानिकों और ऐसे अन्य विशेषज्ञों को ज्यादा मौके और फंडिंग देने पर फोकस करेंगे।”
यूपीएससी / भारतीय आर्थिक सेवा और भारतीय सांख्यिकीय सेवा 2019 में ओडिशा के अंशुमान आगे
नयी दिल्ली : संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने भारतीय आर्थिक सेवा 2019 और भारतीय सांख्यिकीय सेवा 2019 का परिणाम जारी कर दिया है। यूपीएससी के नोटिफिकेशन के मुताबिक, भारतीय आर्थिक सेवा 2019 और भारतीय सांख्यिकी सेवा 2019 के लिए 32-32 उम्मीदवारों का चयन हुआ है। भारतीय आर्थिक सेवा 2019 में ओडिशा के अंशुमान कैमिला और भारतीय आर्थिक सेवा 2019 में हर्षित अग्रवाल ने पहला स्थान प्राप्त किया है। परीक्षा 28-30 जून 2019 को हुई थी। इंटरव्यू दिसम्बर और पर्सनैलिटी टेस्ट जनवरी 2020 में आयोजित किया गया था। रिजल्ट यूपीएससी की आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर देखा जा सकता है।
राज्य की अर्थव्यवस्था को ऊँचाइयां देना है लक्ष्य
अंशुमान के पिता चीफ जनरल पोस्टमास्टर हैं और मां उत्कल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर और जानी मानी गायिका हैं। अंशुमान ने ओडिशा टीवी से बातचीत में कहा, मेरी सफलता का श्रेय परिवार को जाता है। उनके आशीर्वाद और सपोर्ट ने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया है। मैं खुश हूं कि मुझे पहला स्थान मिला। मैं राज्य की अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों देने की कोशिश करूंगा।
साझा किया सक्सेस मंत्र, कहा
अंशुमान में अपनी सफलता का रहस्य साझा करते हुए कहा, मैने घंटों पढ़ाई करने को लक्ष्य नहीं बनाया बल्कि रोजाना पढ़ाई का क्रम जारी रखा। कई बार मुझे असफलता का सामना करना पड़ा लेकिन सिविल सर्विसेस के लक्ष्य को हासिल करने में पीछे नहीं हटा। परिवारवालों में हमेशा मुझे लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया और आज मुकाम मिला। उन्होंने कहा, इस परीक्षा में सफलता के लिए सबसे जरूरी बात है पाठ्यक्रम का विस्तृत अध्ययन । अगर तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स ऐसा करते हैं तो सफलता पा सकते हैं।
6 साल के ओलिवर ने जीती कैंसर से जंग, साथियों ने किया शानदार स्वागत
जॉन ओलिवर जिप्पी को तीन साल पहले ल्यूकेमिया कैंसर का पता चला था
27 दिसंबर को उसकी आखिरी कीमियोथैरेपी हुई, अब वह स्वस्थ है
ओहियो (अमेरिका) : कैंसर से लड़ रहा 6 साल का ओलिवर जब अपनी आखिरी दौर की कीमियोथैरेपी के बाद अपने स्कूल पहुंचा तो साथियों और शिक्षकों ने उसका जोरदार स्वागत किया। स्कूल के गेट से क्लास तक खड़े होकर ताली बजाई और उसका हौसला बढ़ाया। जॉन ओलिवर जिप्पी तीन साल बाद स्कूल लौटा था। उसने बताया कि मैंने ऐसे स्वागत की उम्मीद नहीं की थी। मुझे अच्छा लगा। स्कूल का यह वीडियो अब वायरल हो रहा है।
जॉन को 2016 में एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया का पता चला था। तब वह सिर्फ तीन साल था। उसके पिता जॉन जिप्पी ने बताया कि 27 दिसंबर को उसकी आखिरी कीमियोथैरेपी हुई थी। अब वह स्वस्थ है। उसने शुक्रवार से फिर स्कूल जाना शुरू किया है। स्कूल पहुंचते ही उसके स्वागत से वे अभिभूत हो गए।
तीन साल बेहद मुश्किल भरे थे
ओलिवर के माता-पिता ने बताया कि तीन साल बेहद मुश्किल भरे थे। 2016 में एक दिन वह अचानक गिर गया और उसका सिर बेड से जा लगा। हम उसे फौरान डॉक्टर के पास ले गए। बहुत सारे टेस्ट किए गए। एक दिन शाम को डॉक्टर का फोन आया कि उसे फौरन अस्पताल में भर्ती किए जाने की जरूरत है। तब हमें पता चला कि उसे कैंसर है। इलाज के दौरान हमारा जैसे सबकुछ रुक गया था। बस एक ही चिंता रहती कि कैसे भी इसे ठीक किया जाए।
ओलिवर की वापसी पर साथी खुशी से झूम उठे
सेंट हेलन कैथोलिक स्कूल के प्राचार्य पैट्रिक गान्नोन ने बताया कि यह वक्त ओलिवर के लिए बेहद कठिन था, लेकिन क्लास में उसकी वापसी पर उसके साथी बेहद खुश थे। स्कूल से उसे हर तरह का सपोर्ट दिया गया। पिता ने भी कहा कि मैं परिवार, दोस्तों, स्कूल और अस्पताल को शुक्रिया कहना चाहूंगा कि क्योंकि सभी ने मदद और सहयोग किया।




