नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर शनिवार को वीरता पुरस्कारों का ऐलान किया। इस बार सेना के 312 अधिकारियों/जवानों को वीरता और विशिष्ट सेवा पदक दिए जाएंगे। इनमें 6 को शौर्य चक्र दिया जाएगा, इनमें जुलाई 2019 में जम्मू-कश्मीर में विदेशी आतंकी को ढेर करने में शहीद हुए नायब सूबेदार सोमबीर भी शामिल हैं। इनके अलावा लेफ्टिनेंट कर्नल ज्योति लामा, मेजर के. बिजेन्द्र सिंह, नायब सूबेदार नरेंदर सिंह, नायक नरेश कुमार और सिपाही कर्मदेव ओरांव के नाम भी हैं। वहीं, तीन पुलिसकर्मियों को भी इस साल देश का तीसरा बड़ा वीरता पुरस्कार दिया जाएगा। इसमें कमल किशोर, अमन कुमार और चल्लापिला नरसिम्हा राव का नाम है।पिछले साल 27 फरवरी को बडगाम में वायुसेना के एमआई-17 हेलिकॉप्टर क्रैश में शहीद हुए स्क्वाड्रन लीडर सिद्धार्थ वशिष्ठ और निनाद मनदावगन भी वायु सेना मेडल से सम्मानित होंगे।
तीन कोर कमांडरों को उत्तम युद्ध सेवा पदक
उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह समेत 19 अफसरों को परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) दिया जाएगा। वहीं, तीसरी कोर, 14 कोर और 16 कोर के कमांडरों को उत्तम युद्ध सेवा मेडल (यूवाएएसएम) के लिए चुना गया है। अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) के लिए 32 अधिकारियों को चुना गया है। युद्ध सेवा पदक के लिए 8 को, सेना मेडल (एसएम) के लिए 111 को, विशिष्ट सेवा के लिए सेना मेडल 40 को, विशिष्ट सेना पदक के लिए 76 को चुना गया है। ऑपरेशन राइनो और रक्षक में वीरता दिखाने वाले 16 अफसरों और जवानों को भी सम्मानित किया जाएगा।
लेफ्टिनेंट कर्नल ज्योति लामा को मिलेगा शौर्य चक्र
लेफ्टिनेंट कर्नल ज्योति लामा : 11 गोरखा राइफल्स के इस अफसर ने मणिपुर में 14 आतंकियों को पकड़ा था। पिछले साल 23 जुलाई को उन्हें दो आतंकियों के एक गांव में छुपे होने की जानकारी मिली थी। खुफिया जानकारी के आधार पर वे अपनी टीम के साथ उन्हें पकड़ने पहुंचे। दोनों ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी गोलीबारी में उन्होंने दोनों को मार डाला। नायब सूबेदार सोमबीर सिंह : राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात सोमबीर सिंह 22 फरवरी 2019 को तीन आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। एक अभियान के दौरान आतंकियों की फायरिंग में साथी जवान को फंसा देख, वे आगे आए और मोर्चा लेते हुए उसे ढेर कर दिया। इस दौरान उनकी छाती और गर्दन में कई गोलियां लगीं, जिसके कारण वे शहीद हो गए। मेजर कॉनजेंगबम बिजेंद्र सिंह : असम राइफल्स में तैनाती के दौरान मेजर कॉनजेंगबम बिजेंद्र सिंह ने कई आतंकी अभियानों में हिस्सा लिया। लेकिन पिछले साल 22 मार्च को उन्होंने अपने साथियों की आतंकी हमले में जान बचाई, बल्कि इस दौरान दो को खत्म भी किया। नायब सूबेदार नरेंदर सिंह : स्पेशल फोर्सेस के इस जवान की तैनाती जम्मू-कश्मीर में एलओसी पर थी। उन्हें तीन जुलाई 2019 को एलओसी पर आतंकियों की हलचल दिखी। बिना वक्त गंवाए वे हरकत में आए और आतंकियों को घेर लिया। दोनों तरफ से गोलीबारी हुई। इसमें पैराशूट रेजिमेंट के नरेंदर ने दो आतंकियों को मार डाला। नायक नरेश कुमार : उन्होंने राष्ट्रीय राइफल्स में तैनाती के दौरान पिछले साल 23-24 मई की रात को एक आतंकी अभियान में हिस्सा लिया। सर्च ऑपरेशन में आतंकी के एक घर में छुपे होने की जानकारी मिली। वह सीढ़ी पर छुपकर बैठा था। ऐसे में उसे पकड़ने में मुश्किल आ रही थी। तभी नरेश कुमार रेंगकर उस तक पहुँचे और एक ही गोली में उसे खत्म कर दिया। सिपाही कर्मदेव ओरांव : बिहार रेजिमेंट का यह सिपाही एलओसी पर तैनात था। 29 दिसंबर 2018 की दोपहर पाकिस्तानी चौकी से भारी गोलीबारी शुरू हो गई। इसी दौरान कर्मदेव ने 4 आतंकियों को अपनी पोस्ट की तरफ आते देखा। अपनी जान की परवाह न करते हुए उन्होंने आतंकियों पर 9 हथगोले फेंके। इससे दो आतंकी ढेर हो गए।
अमेरिका में किया गया सम्मानित जोधपुर : जोधपुर के मुस्टैश हॉस्टल काे देश का सर्वश्रेष्ठ हॉस्टल का पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के बीच लोकप्रिय पोर्टल हॉस्टल वर्ल्ड डॉट कॉम ने दिया है। अमेरिका में आयोजित 18वें हॉस्टल पुरस्कार समारोह में करीब 12 अलग-अलग कैटेगरी में पुरस्कार बांटे गए। इनमें कंट्री कैटेगरी में जोधपुर की मुस्टैश हॉस्टल चेन को भारत का बेस्ट हॉस्टल चुना गया।
न्यूयॉर्क टाइम्स की ओर से हाल में जोधपुर को दुनिया का 12वां टॉप डेस्टिनेशन माना गया है। यहां की ब्ल्यू सिटी, ऐतिहासिक प्रतीक, परंपरागत लाख चूड़ी, मसाला, मिठाइयां आदि पर्यटकों को खूब पसंद आती हैं। अब एक ट्रेवलर पोर्टल ने शिप हाउस किला रोड स्थित मुस्टैश हॉस्टल चेन काे सर्वश्रेष्ठ माना है, जिसने बेहद कम समय में विदेशी पर्यटकों के बीच अपनी पहचान बनाई है।
हॉस्टल वर्ल्ड डॉट कॉम की ओर से सोलो ट्रेवलर, फिमेल सोलो, मेल सोलो, बेस्ट न्यू हॉस्टल, मोस्ट पॉपुलर, रेटिंग क्राइटेरिया, कंट्री साइज- स्मॉल, मीडियम, लार्ज, एक्स्ट्रा लार्ज, कॉन्टिनेंट, एशिया, यूरोप, अफ्रीका, नॉर्थ अमेरिका और अदर विनर्स-हॉस्टल चेन कैटेगरी।
1.1 मिलियन टूरिस्ट के कमेंट्स के आधार पर चुना
यूं तो भारत में कई देसी और विदेशी हॉस्टल की चेन चल रही है। कई युवा इस स्टार्टअप बिजनेस से जुड़े हैं, लेकिन कंट्री कैटेगरी में इंडिया से केवल मुस्टैश जोधपुर हॉस्टल को ही चुना गया। यह पोर्टल दुनियाभर के पर्यटकों की ओर से दिए जाने वाली राय, कमेंट्स को आधार बनाता है, जो पर्यटक अपने दोस्तों के साथ या अकेले घूमने जाते हैं और जिस शहर में रहते हैं, वहां की खासियतें, बुरे अनुभव, यादगार पल और सर्विस को लेकर जो राय या समीक्षा देते हैं। उसके आधार पर चयन किया जाता है। पोर्टल ने 1.1 मिलियन टूरिस्ट की समीक्षा के आधार पर पुरस्कारों की घोषणा की है।
मेहरानगढ़ जाने वाली मुख्य सड़क पर शिप हाउस के नजदीक यह हॉस्टल है। 48 बेड हैं, जहां टूरिस्ट रहते हैं। सामने मस्जिद और पास में मंदिर। पर्यटकों की भारत की यही विभिन्नता पसंद आती है। दिनभर यहां अजान व घंटियों की आवाज आती है। नेट से लेकर फूड, बेड से लेकर क्लीनिंग आकर्षित करती है। आईटीबीपी के रिटायर्ड डीआईजी डॉ. जीआर चौधरी और विक्रम मिलकर हॉस्टल चला रहे हैं। यह चेन जयपुर बेस्ड हॉस्टल की है।
आधार, चावल, डब्बा, हड़ताल और शादी सहित 26 नए भारतीय शब्द शामिल
नयी दिल्ली : ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी के अद्यतन संस्करण में आधार, चावल, डब्बा, हड़ताल और शादी सहित 26 नए भारतीय अंग्रेजी शब्दों को जगह मिली है। शब्दकोश का 10वां संस्करण गत शुक्रवार को जारी किया गया जिसमें कुल 384 भारतीय अंग्रेजी शब्द हैं। साथ ही चैटबोट, फेक न्यूज और माइक्रोप्लास्टिक सहित करीब 1,000 नए शब्दों को भी इस शब्दकोश में जगह मिली है।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस ने कहा कि शब्दकोश सालों से भाषा में आ रहे बदलाव और विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और यह सुनिश्चित किया गया है कि नए संस्करण में इस्तेमाल भाषा और उदाहरण प्रासंगिक और समय के अनुरूप अद्यतन हों।
शब्दकोश का नया संस्करण ऑक्सफोर्ड लर्नर्स डिक्शनरी की वेबसाइट और ऐप पर संवादनात्मक सुविधा से युक्त है। वेबसाइट में दृश्य-ध्वनि शिक्षण, वीडियो वाल्कथ्रू(सॉफ्टवेयर), स्वयं अध्ययन गतिविधियां और परिष्कृत आई-राइटर और आई-स्पीकर टूल्स जैसे अद्यतन सुविधाएं हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में प्रबंध निदेशक (शिक्षण विभाग) फातिमा दादा ने बताया, ‘‘इस संस्करण में 26 नए भारतीय अंग्रेजी शब्दों को जगह मिली है जिनमें 22 मुद्रित संस्करण में है जबकि चार डिजिटल संस्करण में हैं।’’
कुछ अन्य भारतीय अंग्रेजी शब्द जिनको शब्दकोश में जगह मिली है वें हैं आंटी (पहले से मौजूद ऑन्ट शब्द का भारतीय स्वरूप), बस स्टैंड, डीम्ड यूनिवर्सिटी, एफआईआर, नॉन-वेज, रिड्रेसल, टेम्पो, ट्यूब लाइट, वेज और वीडियोग्राफ।
शब्दकोश के ऑनलाइन संस्करण में जिन चार भारतीय अंग्रेजी शब्दों को शामिल किया गया है वे हैं करंट (बिजली के लिए), लूटर, लूटिंग और उपजिला।
फातिमा ने कहा, ‘‘प्रचलन और सामान्य इस्तेमाल शब्दों को शामिल करने का मुख्य आधार है। हम पूरी दुनिया में अंग्रेजी बोलने के दौरान इस्तेमाल किए गए शब्दों का आकलन करते हैं जिसके बाद वे शब्द गहन परीक्षण प्रक्रिया से गुजरते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी भाषा का संरक्षक है। इसलिए इन शब्दों को इस प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा।’’
फातिमा ने बताया कि शब्दकोश के ऐप पर 86,000 शब्द, 95,000 वाक्यांश, 1,12,000 अर्थ और 2,37,000 उदाहरण हैं। उल्लेखनीय है कि इस शब्दकोश का 77 साल का इतिहास है। मूल रूप से इसे 1942 में जापान में प्रकाशित किया गया था और 1948 में पहली बार ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने इसका प्रकाशन किया। लर्नर शब्दकोश इसके संस्थापक अल्बर्ट सिडनी हॉर्नबी के मूल्यों पर आधारित है जिनका उद्देश्य दुनियाभर में इस भाषा को सीखने वाले लोगों को अंग्रेजी भाषा के अर्थ को समझने में मदद करना था।
भिंड : एक समय कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम रहे भिंड जिले में अब बेटियों के प्रति सोच बदल रही है। जिन गाँवों में बेटियों को घर से निकलने की आजादी नहीं थी, आज वहां की बेटियां पुलिस और प्रशासन में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रही हैं। यही वजह है कि वर्ष 2011 की जनगणना में भिंड जिले का लिंगानुपात जहां प्रदेश में सबसे कम 1000 बेटों पर 855 बेटियों का था, वह आज बढ़कर 1000 बेटों पर 929 बेटियों तक पहुंच गया है। लिंगानुपात के लिए लंबे समय बदनाम रहे बंथरी गाँव की 10 बेटियां पुलिस सेवा में कार्यरत हैं। पहले गाँव के लोगों का मानना था कि बेटियां घर में ही अच्छी लगती हैं। लेकिन, गाँव की बेटी त्रिवेणी राजावत ने सब इंस्पेक्टर बनकर इस सोच को बदल दिया। इसके बाद एसआई कीर्ति राजावत, सब इंस्पेक्टर शिवानी जादौन, आरक्षक रुचि राजावत, दीपा राजावत, प्रेमलता राजावत, संध्या राजावत, मनीषा राजावत, हिमानी राजावत, सोनम राजावत ने त्रिवेणी को अपनी प्रेरणा मानते हुए पुलिस ज्वाइन की।
हवलदार सिंह का पुरा गाँव में सुरेंद्र सिंह तोमर की पांच बेटियां और दो बेटे हैं। बड़ी बेटी रानी श्योपुर में प्रधान आरक्षक, दूसरी नीतू ग्वालियर और तीसरी सीता दतिया में आरक्षक हैं। इनकी दो छोटी बहनें भी पुलिस की तैयारी कर रही हैं। सुरेंद्र बताते हैं कि दस साल पहले परिवार के लोग ही बेटियों के मुंह में तंबाकू रखकर मार देते थे। लेकिन मेरी बेटियों की सफलता को देखते हुए लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं।
अमृतसर : पंजाब के अमृतसर में रहने वाले सरकारी शिक्षक बलजिंदर सिंह ने 71 हजार टूथपिक्स को आपस में जोड़कर तिरंगा बनाया है। उन्हें इसे बनाने में महीने का वक्त लगा। बलजिंदर ने कहा कि मेरा यह काम 71वें गणतंत्र दिवस को समर्पित किया गया है। मैं 40 से ज्यादा दिनों से रोजाना घंटों काम कर अपने झंडा को बना रहा हूं। गणतंत्र दिवस को तीन दिन रह गए हैं। राजपथ पर इस बार कुल 22 झांकियां गुजरेंगी। इनमें 16 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों की और 6 अन्य झांकियां विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और एनडीआरएफ की हैं। इसके लिए दिल्ली में जगह-जगह सुरक्षा कड़ी की जा रही है।
नयी दिल्ली : भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म पुरस्कारों की घोषणा गत शनिवार को की गयी केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए विजेताओं में से इस बार कुल आठ खिलाड़ियों को यह सम्मान मिलेगा। कुछ खिलाड़ियों को पद्म विभूषण और कुछ को पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।
इन्हें मिलेगा सम्मान
छह बार की विश्व चैंपियन एमसी मैरी कॉम को पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा जाएगा। वह राज्यसभा सांसद भी हैं। मणिपुर की 36 साल की मैरी कॉम ने लंदन ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता था।
विश्व चैंपियन और ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट पीवी सिंधु को पद्म भूषण से नवाजा जाएगा।
भारतीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कप्तान बमबम देवी को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। मणिपुर की रहने वाली बमबम देवी को अर्जुन अवॉर्ड भी मिल चुका है।
टीम इंडिया के पूर्व तेज गेंदबाज जहीर खान को पद्म श्री सम्मान के लिए चुना गया है। जहीर 2011 में वर्ल्ड कप विजेता टीम इंडिया के सदस्य थे।
भारतीय तीरंदाज तरुणदीप राय गोरखा समुदाय से आते हैं। उन्हें भी अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है। तरुणदीप को भी पद्मश्री के सम्मान के लिए चुना गया है।
भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल को भी पद्मश्री के सम्मान के लिए चुना गया है। 15 साल की उम्र में अपने अंतरराष्ट्रीय फील्ड हॉकी करियर की शुरुआत करने वाली रानी 2010 वर्ल्ड कप में भाग लेने वाली भारत की सबसे युवा खिलाड़ी बनी थीं।
भारतीय निशानेबाज जीतू राय को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। जीतू ने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता था।
73 साल के पूर्व हॉकी प्लेयर एमपी गणेश ने भारतीय टीम के कप्तान रहे हैं। वह भारतीय हॉकी टीम के कोच भी रहे। उन्हें 1973 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। एमपी गणेश को भी पद्मश्री से नवाजा जाएगा।
नयी दिल्ली : भारतीय संविधान-दुनिया के किसी प्रभुत्व-सम्पन्न देश का सबसे लंबा लिखा गया संविधान है, जिसे हम हमेशा डॉ. बी. आर. आंबेडकर से जोड़ते है। ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का रचियेता होने का श्रेय प्राप्त है। लेकिन, बहुत ही कम लोग उस शख्स के बारे में जानते हैं, जिन्होंने खुद अपने हाथों से पूरे संविधान को लिखा!
26 नवंबर 1949 को संविधान का पहला ड्राफ्ट बनकर तैयार हुआ और ये किसी उत्कृष्ट कृति से कम नहीं है। हमारे संविधान के हर एक पेज के बॉर्डर को नन्दलाल बोस और उनके छात्रों ने डिज़ाइन किया और इसे खूबसूरत कलाकृतियों से सजाया।
लेकिन संविधान के प्रस्तावना और अन्य विषय-वस्तुओं को ज़िन्दगी दी, प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने। 17 दिसंबर 1901 को कैलिग्राफर्स/सुलेखकों के घर में जन्में प्रेम बिहारी ने बहुत ही कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया। उनका लालन-पोषण उनके दादाजी मास्टर राम प्रसादजी सक्सेना और चाचा, महाशय चतुर बिहारी नारायण सक्सेना ने किया। उनके दादाजी पारसी और अंग्रेजी भाषा के स्कॉलर थे। यहाँ तक कि उन्होंने अंग्रेजों को भी पारसी भाषा पढ़ाई थी। प्रेम बिहारी ने कैलीग्राफी अपने दादाजी से सीखी
दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से ग्रैजुएशन पास करने के बाद प्रेम बिहारी कैलीग्राफिक आर्ट में मास्टर हो गए थे इसलिए जब भारतीय संविधान बनकर प्रिंट होने के लिए तैयार था तो जवाहरलाल नेहरू ने उनसे इसे फ्लोइंग इटैलिक स्टाइल में हाथ से लिखने की गुजारिश की। नेहरू ने उनसे पूछा कि इस काम की वह कितनी फीस लेंगे। इस पर उन्होंने कहा-
“एक पैसा भी नहीं। मेरे पास भगवान की दया से सब कुछ है और मैं अपनी ज़िन्दगी में खुश हूँ, पर मेरी एक शर्त है कि इसके हर एक पन्ने पर मैं अपना नाम और आखिरी पन्ने पर अपना और दादाजी का नाम लिखूंगा। ”
.उनकी इस शर्त को मानकर, भारत सरकार ने प्रेम बिहारी को भारतीय संविधान अपने हाथों से लिखने का अनमोल काम सौंपा। उन्हें संविधान हॉल (बाद में संविधान क्लब हो गया) में एक कमरा दिया गया। उस समय संविधान में, कुल 395 आर्टिकल, 8 शेड्यूल, और एक प्रस्तावना थी। प्रेम बिहारी को यह काम पूरा करने में 6 महीने लगे।
भगवती देवी के इस सस्ते और किफायती प्रयोग से किसान की मेहनत और माटी दोनों रहेंगे सुरक्षित!
हमारे देश का किसान पूरे देश के लिए खाद्यान्न उत्पादन करता है। लेकिन, पूरे देश की थाली सजाने वाले इन अन्नदाताओं को खेती करने के दौरान विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। किसानों को होने वाली इन समस्याओं में से एक समस्या का नाम है ‘दीमक’। दीमक एक प्रकार का कीट होता है, जो फसलों की बर्बादी का कारण बनता है। एक अनुमान के अनुसार हमारे भारत में दीमक की वजह से फसलों को बहुत नुकसान पहुँचता है। दीमक कई प्रकार के होते हैं और ये मिट्टी के अंदर अंकुरित पौधों को चट कर जाते हैं। ये कीट जमीन में सुरंग बनाकर पौधों की जड़ों को खाते हैं, कभी-कभी तो ये तने तक को खा जाते हैं। अब आप समझ सकते होंगे कि दीमक की वजह से किसान को कितनी तकलीफ़ और कितना नुकसान होता होगा। लेकिन हमारी आज की कहानी की किरदार, इस महिला किसान ने दीमक से बचाव का रास्ता ढूंढ निकाला द बेटर इंडिया’ से मुखातिब होते हुए राजस्थान के सीकर जिले के दांतारामगढ़ गाँव में रहने वाली यह प्रगतिशील महिला किसान भगवती देवी कहती हैं,
“दीमक फसलों को बेहद हानि पहुंचाने वाला कीट है, जो फसलों को किसी भी अवस्था में घेर लेता है। यह कीट किसी भी मौसम, नमी, सूखा, गर्मी, सर्दी या किसी भी परिस्थिति में लग जाता है। इस कीट की वजह से विभिन्न फसलों को 10-15% तक या इससे भी अधिक हानि पहुंचती है।”
खेत बना प्रयोगशाला
भगवती देवी के खेत में खेजड़ी, बबूल, बेर, अरड़ू, शीशम, सफेदा और नीम के वृक्ष मुख्य रूप से लगे हुए हैं। इसके अलावा भी कुछ अन्य प्रजातियों के पेड़ पौधे हैं। इन पेड़ों की लकड़ियां हर वर्ष खेत में सफाई के दौरान खेत के चारों ओर बनी सीमा पर डाल दी जाती हैं।
एक दिन की बात है, जब उन्होंने खेत से जलाने के लिए लकड़ियां लीं तो पाया कि दूसरी लकड़ियों के मुकाबले सफेदे (यूकेलिप्टस) की लकड़ी पर बहुत ज्यादा दीमक है। उन्होंने सोचा कि क्यों न सफेदे की लकड़ी को एक प्रयोग के तौर पर खेत में फसलों के बीचों-बीच रख दिया जाए, जिसके चलते दीमक फसल को छोड़कर सफेदे की इस लकड़ी को खाने के लिए आ जाए।
पहला प्रयोग 2004 में किया
भगवती बताती हैं, “अपनी सोच को मूर्त रूप देने के लिए मैंने पहली बार इस प्रयोग को साल 2004 में गेहूं की एक फसल पर आज़माया। अपने प्रयोग को करते हुए मैंने इस फसल को देरी से 30 दिसम्बर को बोया। इस देरी के पीछे तर्क यह था कि देरी से बोई गई फसल पर दीमक का प्रकोप ज्यादा रहता है।”
उन्होंने ढाई फीट लम्बे व तीन इंच व्यास की सफेदे की लकड़ी के टुकड़े को 10×10 वर्गमीटर में गेहूं की दो कतारों के बीच इस तरह जमीन के समानान्तर रखा कि उसका आधा भाग जमीन में रहे। प्रयोग करने पर पाया गया कि गेहूं की फसल में दीमक का कोई प्रकोप हुआ ही नहीं। इतना ही नहीं, लकड़ी के नीचे जहां दीमक थी, उसके पास के दाने ज्यादा सुडौल और चमकदार थे।
इस बात से यह भी ज्ञात हुआ कि दीमक भी केंचुए की तरह ही भूमि को उपजाऊ बनाने में मदद करते हैं। मैं अपनी फसल में बिना किसी कीटनाशक का उपयोग किए दीमक को नियंत्रित करना चाहती थी। अपने अनुभव से जब मैनें सफेदे की लकड़ी को फसल में रखकर प्रभावशाली ढंग से दीमक का नियंत्रण किया तो मेरे सामने विभिन्न फसलों में इस प्रयोग को करने की भी चुनौती खड़ी थी। मुझे इस बात की भी खुशी है कि मैंने अनाज के अलावा दलहनी एवं तिलहनी फसलों और सब्जियों में भी इस प्रयोग को किया और हर बार जीत मिली। इस सफलता से मेरा हौसला कुछ नया करने को बढ़ता गया।।”
समय के साथ भगवती देवी आगे बढ़ने लगीं। उनके प्रयोगों को देखने और उनके फार्म हाउस का निरीक्षण करने राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर के तत्कालीन कृषि अनुसंधान निदेशक डॉ. एमपी साहू आए। भगवती ने उनको मिर्च की फसल में दीमक नियंत्रित करने का सफल प्रयोग करके भी दिखाया। निदेशक साहू उनके इस प्रयोग को देखने के बाद बहुत प्रभावित हुए और इस प्रयोग को उन्होंने अपने अनुसंधान केन्द्र पर करने के दिशा-निर्देश दिए।
इनके कई नाम है – उत्तर में तवायफ, दक्षिण में देवदासी, गोवा में नायिका, बंगाल में बाजी, ब्रिटिश के लिए नौच गर्ल्स फिर भी ये सारे नाम अश्लीलता का पर्याय है। लेकिन, वे सभी एक मजबूत व स्वतंत्र महिलाएं थीं। एक सदी से भी पुरानी बात है जब भारत ने अपनी एकजुटता दिखाकर खुद को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद किया था। भारत ने अपने स्वतंत्रता की पहली लड़ाई साल 1857 में लड़ी थी, जिसकी गूंज दशकों तक दबाई नहीं जा सकी और जिस कारण आज़ादी के सपने को सच्चाई में बदल पाना संभव हो पाया। हम उस आंदोलन से तो भली-भांति परिचित हैं, जिसकी शुरुआत सिपाहियों की एक टुकड़ी द्वारा की गयी थी और जो फैलती हुई देश के अधिकांश हिस्सों में पहुँच गयी। पर हम इस कहानी के जिस पहलू को नहीं जानते वो उन लोगों की है, जिन्होंने इस आन्दोलन को संभव बनाया।
ये एक ऐसी लड़ाई थी जिसे मंच पर खड़े कुछ नेता अपने दम पर नहीं लड़ सकते थे। बल्कि, यह लड़ाई सही मायने में उन अनगिनत लोगों ने लड़ी जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर अपने देश को रखा। इन लोगों की कहानियाँ या तो भूली जा चुकी हैं, या तो इतिहास के पन्नों में धूमिल हो रही हैं और कुछ की तो मिट भी गयी है।
अजीजून बाई
उस समय देश के लिए किया गया तवायफ़ों का योगदान भी कुछ ऐसा ही है। ये ऐसी बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थीं जिनके आत्म-बलिदान की कहानियों का शायद ही कहीं ज़िक्र मिले। इनमें से एक हैं आजीज़ूनबाई जिनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है। कौनपोर की घेराबंदी
भारतीय सैनिक ब्रिटिश अफसरों के विरुद्ध खड़े हो गए थे। हर तरफ तनाव का माहौल था। इसी समय जून 1857 में एक घटना हुई। भारतीय सैनिक जब कौनपोर (कानपुर) की घेराबंदी कर रहे थे उसी वक्त ब्रिटिश अफसरों ने उन्हें घेर लिया। उस समय इन सैनिको के साथ एक तवायफ भी थी जो इनसे कंधे से कंधा मिला कर लड़ रही थी। यह तवायफ थी अज़ीज़ुंबाई जिन्हें मर्दाना कपड़ों में, पिस्तौल, मेडल से लैस घोड़े पर सवार देखा गया था।
इस दिलचस्प कहानी का किसी भी पाठ्यपुस्तक में कोई उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि इसका जिक्र आज भी स्थानीय कहानियों, ऐतिहासिक रिपोर्ट व शोध के कागजों में मिल जाता है। जवाहरलाल विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर वुमन्स स्टडीज़ के असोसिएट प्रोफेसर लता सिंह द्वारा लिखे गए पेपर में इसका वर्णन है। लता सिंह के अनुसार मुख्यधारा के इतिहास में इन औरतों के कार्यों को लुप्त कर दिया गया है फिर भी अज़ीज़ुंबाई का नाम कई लेखों में मिल जाता है। वीडी सावरकर, एसबी चौधरी जैसे लेखकों ने भी उनका उल्लेख किया है और साथ ही इस लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रशंसा भी की है। ऐसा भी माना जाता है कि नाना साहिब के प्रारंभिक जीत के अवसर में जब कानपुर मे झंडा फहराया जा रहा था तब वह उस रैली में मौजूद थीं। कानपुर में आज भी अज़ीज़ून का नाम लोगों के दिमाग में जीवित है। अज़ीज़ुंबाई एक जासूस, खबरी और सेनानी थीं। उनका जन्म लखनऊ में एक तवायफ के घर हुआ था । उसके बाद वह कानपुर के ऊमराव बेगम के लूरकी महल में चली गयीं।
लता सिंह ऐसा मानती हैं कि उनका लखनऊ के सांस्कृतिक माहौल से दूर कानपुर के छावनी में जाने का कारण स्वतंत्रता के प्रति उनका जुनून हो सकता है। इन लेखों के अनुसार अज़ीज़ूनबाई को भारतीय सैनिकों का करीबी माना गया है।खासकर उन्हें घुड़सवार सेनानी शामसुद्दीन का करीबी माना गया है जिनकी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका रही है। लता सिंह आगे बताती हैं, “अज़ीज़ून का घर सिपाहियों के मिलने का अड्डा भी था। उन्होंने महिलाओं का एक ऐसा समूह बनाया जो निडर हो कर साथ देने, हथियारों से लैस सिपाहियों का मनोबल बढ़ाने, उनके घाव को साफ करने और हथियारों को वितरित करने को तैयार थीं। अज़ीज़ून ने अपने मुख्यालय में एक गन बैटरी भी तैयार की थी। ये बैटरी व्हीलर प्रवेश के उत्तर में व राकेट कोर्ट और चैपल ऑफ इज के मध्य में स्थित थी। घेराबंदी के पहले दिन से ही इस बैटरी ने प्रवेशद्वार में गोले दागे व गोलीबारी की। व्हीलर एनट्रेंचमेंट की घेराबंदी के समय वह सैनिकों के साथ थीं।” एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार उन्हें हर समय पिस्तौल पकड़े हुए देखा जा सकता था। भीषण गोलीबारी के बाद भी वह अपने दोस्तों के साथ रहती थीं जो कि द्वितीय रेजीमेंट के घुड़सवार थे। वह ऐसी कई तवायफ़ों में से एक थी जो भारत की आज़ादी के लिए पूरी बहदुरी से लड़ी, कभी पर्दों में रहकर, कभी बिना किसी पर्दे के! गुमनाम नायिकाएँ
अज़ीज़ुंबाई के अलावा एक और नाम भी है होससैनी, जोकि बीबीघर नरसंहार के प्रमुख साजिशकर्ताओं में से एक थी। इस नरसंहार में 100 से अधिक अंग्रेज महिलाओं व बच्चों की हत्या कर दी गयी थी।
गौहर जान
ऐसी ही एक और तवायफ थी गौहर जान, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के लिए स्वराज कोश में सक्रिय रूप से राशि जमा की थी। विक्रम सम्पत द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘माइ नेम इज़ गौहर जान’ के अनुसार, गांधीजी के अनुरोध पर गौहर जान राशि एकत्रित करने के लिए एक समारोह का आयोजन करवाने को इस शर्त पर तैयार हुईं थीं कि वह खुद इस समारोह में शामिल होंगे। हालांकि गांधीजी इस शर्त को मानने में असमर्थ रहे फिर भी गौहर जान ने जमा की हुई राशि का आधा भाग इस आंदोलन के लिए दान कर दिया।
लता सिंह लिखती हैं, “अज़ीज़ुंबाई जैसी महिलाओं के हिस्सेदारी के बारे में सैकड़ों कहानियाँ होंगी पर उनमें से अधिकतर का रिकॉर्ड नहीं रखा गया। लखनऊ में आंदोलन के वक्त इनकी भूमिका को ‘गुप्त’ व ‘उदार कोषाध्यक्ष’ के रूप में देखा जाता है।
यहाँ वह उन महिलाओं का ज़िक्र करती हैं जो अंग्रेज़ सैनिको के विरुद्ध सड़कों पर उतरीं। घूँघट की आड़ में उनमें से कई खबरियों का काम करती थीं तो कई धनराशि द्वारा इस आंदोलन को सहयोग देती थीं। अवध के आखिरी नवाब वाजिद आली शाह की पत्नी, बेगम हज़रत महल उन्हीं में से एक थीं।
कई लेखों के अनुसार वह शादी के पहले एक तवायफ थीं लेकिन आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने निर्वासित पति की जगह ले ली थी। उन्होंने भारतीय सेना को लखनऊ पर कब्जा करने में मदद की थी, हालांकि यह कब्जा अधिक दिन तक रह नहीं पाया।
अपनी सक्रिय भागीदारी के बदले इन तवायफ़ों को कड़े अंजाम भुगतने पड़े। सन् 1900 आने तक इनके सामाजिक व आर्थिक जीवन ने अपनी चमक खो दी थी।
पर इसके बाद भी वे रुकी नहीं। इनके योगदानों का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि किस तरह उनके भीतर भी निःस्वार्थ देश प्रेम भरा हुआ था। असहयोग आंदोलन के दौरान (साल 1920-1922), वाराणसी में तवायफ़ों की एक टोली ने तवायफ सभा बनाकर इस स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। लता सिंह के अनुसार, हुस्ना बाई ने इस सभा का नेतृत्व किया और इसके सदस्यों से विदेशी सामानों का बहिष्कार करने का अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने एकजुट होकर गहनों के बजाय लोहे की कड़ियाँ पहनने को कहा। इन सब के बावजूद भी दुनिया ने इन्हें और इनके योगदानों को भूल जाना ठीक समझा।
द कौर्टेसन प्रोजेक्ट द्वारा इनकी कहानियों को सामने लाने का काम करने वाली मंजरी चतुर्वेदी कहती हैं, “हमने कभी सोचा ही नहीं कि तवायफ इतनी महत्वपूर्ण भी हो सकती है कि उनकी कहानियों को लिखा जाए। पर ये कहानियाँ मौखिक कहानियों में प्राचलित हैं।”
इनके कई नाम है – उत्तर में तवायफ, दक्षिण में देवदासी, गोवा में नायिका, बंगाल में बाजी, ब्रिटिश के लिए नौच गर्ल्स फिर भी ये सारे नाम अश्लीलता का पर्याय है। लेकिन, वे सभी एक मजबूत व स्वतंत्र महिलाएं थीं। उनका बौद्धिक व सांस्कृतिक योगदान अपने चरम पर रहा फिर भी यह सब धूमिल होता चला गया और उनकी छवि वेश्या के रूप में ही सिमट कर रह गयी जिसे गौरवशाली इतिहास के पन्नो में जगह नहीं मिल पाई। दरअसल, इन प्रेरणादायक कहानियों को विलुप्त होने देने में हमारा ही नुकसान है। (साभार – द बेटर इंडिया में प्रकाशित निधि निहार दत्ता का आलेख)
कोलकाता : राजेश अग्रवाल, सदस्य- रोलिंग स्टॉक, रेलवे बोर्ड, और रेल मंत्रालय ने 24 जनवरी 2020 को ब्रेथवेट एण्ड कम्पनी का दौरा किया। उनके साथ जे.के.शाह, पीसीएमई-एसआर, एस.आर. घोषाल, पीसीएमई-ईआर, पी.एन. झा, सीडब्ल्यूई-सेर, एके.भारती, ईडी (आई एंड एल) -आरडीएसओ, श्री एम.ए.आलम, सीएमडी-बीएससीएल भी मौजूद थे। अग्रवाल ने सबसे पहले कंपनी के विक्टोरिया वर्क्स का दौरा किया जहाँ उनका स्वागत कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक यतीश कुमार, सलीम जी पुरुषोत्तमन, निदेशक (उत्पादन) और ए.के.शाही, वर्क्स मैनेजर (आई / सी) ने किया। कार्यशाला में अपने दौरे के दौरान राजेश अग्रवाल ने ईयूआर-बीआरएनएएचएस वैगन्स की रेक को हरी झंडी दिखायी तथा नए डिजाइन और ड्राइंग कार्यालय का उद्घाटन भी किया। बीओबीवाईएन 22.9 के नए प्रोटोटाइप और बीओबीएसएनएस (25 टन एक्सल लोड) की तकनीकी मानकों पर भी उन्हों ने चर्चा की, जो माल ढुलाई में भारतीय रेलवे की मदद करेगा। इसके बाद, उन्होंने अधिकारियों के साथ कॉर्पोरेट कार्यालय और क्लाइव वर्क्स का दौरा किया जहाँ उनके साथ हुई एक बैठक के दौरान कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक यतीश कुमार, ने कम्पनी के वर्तमान उत्पादनों, प्रदर्शनों, वित्तीय, विविधीकरण परियोजनाओं और भविष्य की विकास योजनाओं पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने एमआरआर की सलाह को याद दिलाया कि हमें अपनी सोच को बड़ा रखना चाहिए और अपने कारोबार को 1000 करोड़ के पार लेजाना चाहिए, ब्रेथवेट इस लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर अग्रसरहै । कुमार ने यह भी कहा कि वर्तमान में ब्रेथवेट एक ऋण मुक्त कंपनी है। इसकी क्रेडिट रेटिंग भी तीन चरणों में बढ़ गई है।कम्पनी ने अपने एंगस वर्क्स में अगले छह महीनों के अंदर 6 मेगा वॉट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य रखा है। अग्रवाल ने प्रबंधन दल को संबोधित करते हुए, ब्रेथवेट के कर्मचारियों के जबरदस्त प्रयासों, समर्पण और प्रदर्शन की सराहना की।अग्रवाल ने ब्रेथवेट में ऑपरेटिंग ट्रेड यूनियनों के नेताओं के साथ भी मुलाकात की और कंपनी के पुनरुद्धार के लिए उनके उत्साह, प्रयासों, सहयोगों के लिए उन्हें धन्यवाद दिया।उन्होंने आने वाले समय में संगठन के और विकास हेतु 2000 करोड़ रुपये के कारोबार का लक्ष्य निर्धारित किया तथा कर्मचारियों के कल्याण की कामना की। उन्होंने एक लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणाकी जिसे कर्मचारियों ने अपनी करतल ध्वनि से सराहा।