Sunday, April 26, 2026
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तवायफ़’, स्वतंत्रता संग्राम की गुमनाम नायिकाएँ!

इनके कई नाम है – उत्तर में तवायफ, दक्षिण में देवदासी, गोवा में नायिका, बंगाल में बाजी, ब्रिटिश के लिए नौच गर्ल्स फिर भी ये सारे नाम अश्लीलता का पर्याय है। लेकिन, वे सभी एक मजबूत व स्वतंत्र महिलाएं थीं। एक सदी से भी पुरानी बात है जब भारत ने अपनी एकजुटता दिखाकर खुद को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद किया था। भारत ने अपने स्वतंत्रता की पहली लड़ाई साल 1857 में लड़ी थी, जिसकी गूंज दशकों तक दबाई नहीं जा सकी और जिस कारण आज़ादी के सपने को सच्चाई में बदल पाना संभव हो पाया। हम उस आंदोलन से तो भली-भांति परिचित हैं, जिसकी शुरुआत सिपाहियों की एक टुकड़ी द्वारा की गयी थी और जो फैलती हुई देश के अधिकांश हिस्सों में पहुँच गयी। पर हम इस कहानी के जिस पहलू को नहीं जानते वो उन लोगों की है, जिन्होंने इस आन्दोलन को संभव बनाया।
ये एक ऐसी लड़ाई थी जिसे मंच पर खड़े कुछ नेता अपने दम पर नहीं लड़ सकते थे। बल्कि, यह लड़ाई सही मायने में उन अनगिनत लोगों ने लड़ी जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर अपने देश को रखा। इन लोगों की कहानियाँ या तो भूली जा चुकी हैं, या तो इतिहास के पन्नों में धूमिल हो रही हैं और कुछ की तो मिट भी गयी है।

अजीजून बाई

उस समय देश के लिए किया गया तवायफ़ों का योगदान भी कुछ ऐसा ही है। ये ऐसी बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थीं जिनके आत्म-बलिदान की कहानियों का शायद ही कहीं ज़िक्र मिले। इनमें से एक हैं आजीज़ूनबाई जिनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है। कौनपोर की घेराबंदी
भारतीय सैनिक ब्रिटिश अफसरों के विरुद्ध खड़े हो गए थे। हर तरफ तनाव का माहौल था। इसी समय जून 1857 में एक घटना हुई। भारतीय सैनिक जब कौनपोर (कानपुर) की घेराबंदी कर रहे थे उसी वक्त ब्रिटिश अफसरों ने उन्हें घेर लिया। उस समय इन सैनिको के साथ एक तवायफ भी थी जो इनसे कंधे से कंधा मिला कर लड़ रही थी। यह तवायफ थी अज़ीज़ुंबाई जिन्हें मर्दाना कपड़ों में, पिस्तौल, मेडल से लैस घोड़े पर सवार देखा गया था।
इस दिलचस्प कहानी का किसी भी पाठ्यपुस्तक में कोई उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि इसका जिक्र आज भी स्थानीय कहानियों, ऐतिहासिक रिपोर्ट व शोध के कागजों में मिल जाता है। जवाहरलाल विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर वुमन्स स्टडीज़ के असोसिएट प्रोफेसर लता सिंह द्वारा लिखे गए पेपर में इसका वर्णन है। लता सिंह के अनुसार मुख्यधारा के इतिहास में इन औरतों के कार्यों को लुप्त कर दिया गया है फिर भी अज़ीज़ुंबाई का नाम कई लेखों में मिल जाता है। वीडी सावरकर, एसबी चौधरी जैसे लेखकों ने भी उनका उल्लेख किया है और साथ ही इस लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रशंसा भी की है। ऐसा भी माना जाता है कि नाना साहिब के प्रारंभिक जीत के अवसर में जब कानपुर मे झंडा फहराया जा रहा था तब वह उस रैली में मौजूद थीं। कानपुर में आज भी अज़ीज़ून का नाम लोगों के दिमाग में जीवित है।  अज़ीज़ुंबाई एक जासूस, खबरी और सेनानी थीं। उनका जन्म लखनऊ में एक तवायफ के घर हुआ था । उसके बाद वह कानपुर के ऊमराव बेगम के लूरकी महल में चली गयीं।

लता सिंह ऐसा मानती हैं कि उनका लखनऊ के सांस्कृतिक माहौल से दूर कानपुर के छावनी में जाने का कारण स्वतंत्रता के प्रति उनका जुनून हो सकता है। इन लेखों के अनुसार अज़ीज़ूनबाई को भारतीय सैनिकों का करीबी माना गया है।खासकर उन्हें घुड़सवार सेनानी शामसुद्दीन का करीबी माना गया है जिनकी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका रही है। लता सिंह आगे बताती हैं, “अज़ीज़ून का घर सिपाहियों के मिलने का अड्डा भी था। उन्होंने महिलाओं का एक ऐसा समूह बनाया जो निडर हो कर साथ देने, हथियारों से लैस सिपाहियों का मनोबल बढ़ाने, उनके घाव को साफ करने और हथियारों को वितरित करने को तैयार थीं। अज़ीज़ून ने अपने मुख्यालय में एक गन बैटरी भी तैयार की थी। ये बैटरी व्हीलर प्रवेश के उत्तर में व राकेट कोर्ट और चैपल ऑफ इज के मध्य में स्थित थी। घेराबंदी के पहले दिन से ही इस बैटरी ने प्रवेशद्वार में गोले दागे व गोलीबारी की। व्हीलर एनट्रेंचमेंट की घेराबंदी के समय वह सैनिकों के साथ थीं।” एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार उन्हें हर समय पिस्तौल पकड़े हुए देखा जा सकता था। भीषण गोलीबारी के बाद भी वह अपने दोस्तों के साथ रहती थीं जो कि द्वितीय रेजीमेंट के घुड़सवार थे। वह ऐसी कई तवायफ़ों में से एक थी जो भारत की आज़ादी के लिए पूरी बहदुरी से लड़ी, कभी पर्दों में रहकर, कभी बिना किसी पर्दे के!
गुमनाम नायिकाएँ
अज़ीज़ुंबाई के अलावा एक और नाम भी है होससैनी, जोकि बीबीघर नरसंहार के प्रमुख साजिशकर्ताओं में से एक थी। इस नरसंहार में 100 से अधिक अंग्रेज महिलाओं व बच्चों की हत्या कर दी गयी थी।

गौहर जान

ऐसी ही एक और तवायफ थी गौहर जान, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के लिए स्वराज कोश में सक्रिय रूप से राशि जमा की थी। विक्रम सम्पत द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘माइ नेम इज़ गौहर जान’ के अनुसार, गांधीजी के अनुरोध पर गौहर जान राशि एकत्रित करने के लिए एक समारोह का आयोजन करवाने को इस शर्त पर तैयार हुईं थीं कि वह खुद इस समारोह में शामिल होंगे। हालांकि गांधीजी इस शर्त को मानने में असमर्थ रहे फिर भी गौहर जान ने जमा की हुई राशि का आधा भाग इस आंदोलन के लिए दान कर दिया।
लता सिंह लिखती हैं, “अज़ीज़ुंबाई जैसी महिलाओं के हिस्सेदारी के बारे में सैकड़ों कहानियाँ होंगी पर उनमें से अधिकतर का रिकॉर्ड नहीं रखा गया। लखनऊ में आंदोलन के वक्त इनकी भूमिका को ‘गुप्त’ व ‘उदार कोषाध्यक्ष’ के रूप में देखा जाता है।
यहाँ वह उन महिलाओं का ज़िक्र करती हैं जो अंग्रेज़ सैनिको के विरुद्ध सड़कों पर उतरीं। घूँघट की आड़ में उनमें से कई खबरियों का काम करती थीं तो कई धनराशि द्वारा इस आंदोलन को सहयोग देती थीं। अवध के आखिरी नवाब वाजिद आली शाह की पत्नी, बेगम हज़रत महल उन्हीं में से एक थीं।
कई लेखों के अनुसार वह शादी के पहले एक तवायफ थीं लेकिन आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने निर्वासित पति की जगह ले ली थी। उन्होंने भारतीय सेना को लखनऊ पर कब्जा करने में मदद की थी, हालांकि यह कब्जा अधिक दिन तक रह नहीं पाया।
अपनी सक्रिय भागीदारी के बदले इन तवायफ़ों को कड़े अंजाम भुगतने पड़े। सन् 1900 आने तक इनके सामाजिक व आर्थिक जीवन ने अपनी चमक खो दी थी।


पर इसके बाद भी वे रुकी नहीं। इनके योगदानों का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि किस तरह उनके भीतर भी निःस्वार्थ देश प्रेम भरा हुआ था। असहयोग आंदोलन के दौरान (साल 1920-1922), वाराणसी में तवायफ़ों की एक टोली ने तवायफ सभा बनाकर इस स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। लता सिंह के अनुसार, हुस्ना बाई ने इस सभा का नेतृत्व किया और इसके सदस्यों से विदेशी सामानों का बहिष्कार करने का अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने एकजुट होकर गहनों के बजाय लोहे की कड़ियाँ पहनने को कहा। इन सब के बावजूद भी दुनिया ने इन्हें और इनके योगदानों को भूल जाना ठीक समझा।
द कौर्टेसन प्रोजेक्ट द्वारा इनकी कहानियों को सामने लाने का काम करने वाली मंजरी चतुर्वेदी कहती हैं, “हमने कभी सोचा ही नहीं कि तवायफ इतनी महत्वपूर्ण भी हो सकती है कि उनकी कहानियों को लिखा जाए। पर ये कहानियाँ मौखिक कहानियों में प्राचलित हैं।”
इनके कई नाम है – उत्तर में तवायफ, दक्षिण में देवदासी, गोवा में नायिका, बंगाल में बाजी, ब्रिटिश के लिए नौच गर्ल्स फिर भी ये सारे नाम अश्लीलता का पर्याय है। लेकिन, वे सभी एक मजबूत व स्वतंत्र महिलाएं थीं। उनका बौद्धिक व सांस्कृतिक योगदान अपने चरम पर रहा फिर भी यह सब धूमिल होता चला गया और उनकी छवि वेश्या के रूप में ही सिमट कर रह गयी जिसे गौरवशाली इतिहास के पन्नो में जगह नहीं मिल पाई। दरअसल, इन प्रेरणादायक कहानियों को विलुप्त होने देने में हमारा ही नुकसान है।
(साभार – द बेटर इंडिया में प्रकाशित निधि निहार दत्ता का आलेख)

ब्रेथवेट एण्ड कम्पनी लिमिटेड पहुँचे रेलवे बोर्ड के रोलिंग स्टॉक सदस्य राजेश अग्रवाल

 

कोलकाता : राजेश अग्रवाल, सदस्य- रोलिंग स्टॉक, रेलवे बोर्ड, और रेल मंत्रालय ने 24 जनवरी 2020 को ब्रेथवेट एण्ड कम्पनी का दौरा किया। उनके साथ जे.के.शाह, पीसीएमई-एसआर, एस.आर. घोषाल, पीसीएमई-ईआरपी.एन. झा, सीडब्ल्यूई-सेर, एके.भारती, ईडी (आई एंड एल) -आरडीएसओ, श्री एम.ए.आलम, सीएमडी-बीएससीएल भी मौजूद थे। अग्रवाल ने सबसे पहले कंपनी के विक्टोरिया वर्क्स का दौरा किया जहाँ उनका स्वागत कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक यतीश कुमार, सलीम जी पुरुषोत्तमन, निदेशक (उत्पादन) और ए.के.शाही, वर्क्स मैनेजर (आई / सी) ने किया। कार्यशाला में अपने दौरे के दौरान राजेश अग्रवाल ने ईयूआर-बीआरएनएएचएस वैगन्स की रेक को हरी झंडी दिखायी तथा  नए डिजाइन और ड्राइंग कार्यालय का उद्घाटन भी किया। बीओबीवाईएन 22.9 के नए प्रोटोटाइप और बीओबीएसएनएस (25 टन एक्सल लोड) की  तकनीकी मानकों पर भी उन्हों ने चर्चा की, जो माल ढुलाई में भारतीय रेलवे की  मदद करेगा। इसके बाद, उन्होंने अधिकारियों के साथ कॉर्पोरेट कार्यालय और क्लाइव वर्क्स का दौरा किया जहाँ उनके साथ हुई एक बैठक के दौरान कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक यतीश कुमार, ने कम्पनी के वर्तमान उत्पादनों, प्रदर्शनों, वित्तीय, विविधीकरण परियोजनाओं और भविष्य की विकास योजनाओं पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने एमआरआर की सलाह को याद दिलाया कि हमें अपनी सोच को बड़ा रखना चाहिए और अपने कारोबार को 1000 करोड़ के पार ले जाना चाहिए, ब्रेथवेट इस लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर अग्रसर है । कुमार ने यह भी कहा कि वर्तमान में ब्रेथवेट एक ऋण मुक्त कंपनी है। इसकी क्रेडिट रेटिंग भी तीन चरणों में बढ़ गई है।कम्पनी ने अपने एंगस वर्क्स में अगले छह महीनों के अंदर 6 मेगा वॉट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य रखा है। अग्रवाल ने प्रबंधन दल को संबोधित करते हुए, ब्रेथवेट के कर्मचारियों के जबरदस्त प्रयासों, समर्पण और प्रदर्शन की सराहना की।अग्रवाल ने ब्रेथवेट में ऑपरेटिंग ट्रेड यूनियनों के नेताओं के साथ भी मुलाकात की और कंपनी के पुनरुद्धार के लिए उनके उत्साह, प्रयासों, सहयोगों के लिए उन्हें धन्यवाद दिया।उन्होंने आने वाले समय में संगठन के और विकास हेतु 2000 करोड़ रुपये के कारोबार का लक्ष्य निर्धारित किया तथा कर्मचारियों के कल्याण की कामना की। उन्होंने एक लाख रुपये के पुरस्कार की  घोषणा की जिसे कर्मचारियों ने अपनी करतल ध्वनि से सराहा।

 

एडमास यूनिवर्सिटी का तीसरा दीक्षान्त समारोह सम्पन्न

कोलकाता : एडमास यूनिवर्सिटी का दीक्षान्त समारोह गत 22 जनवरी को आयोजित किया गया। दीक्षान्त समारोह में 243 स्नातकों और 63 स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को डिग्रियाँ प्रदान की गयीं। इसके अतिरिक्त स्कूल ऑफ फर्मास्यूटिकल टेक्नोलॉजी के 50 विद्यार्थियों ने डिप्लोमा प्राप्त किया। टेक्नोक्रैट तथा रुमा आचार्य को डी.एससी की उपाधि दी गयी। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उद्यमी औऱ एचसीएल समूह के सह संस्थापक तथा इवॉल्को इंक, सान्ता क्लारा, अमेरिका के चेयरमैन अर्जुन मल्होत्रा उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि जब भी हम कोई काम करें, हमारे पास उसे करने का एक अलग तरीका होना चाहिए। किसी और की तरह बनने की कोशिश न करें। हर व्यक्ति खास होता है और आप (विद्यार्थी) भी खास हैं। प्रधान अतिथि के रूप में मस्कट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के वॉरेन एंड टाउनले रोशेनाउ प्रोफेसर ललित आनन्द मौजूद रहे। दीक्षान्त समारोह को सम्बोधित करते हुए एडमास यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर मधुसूदन चक्रवर्ती विश्वविद्यालय की गतिविधियों की जानकारी दी। इस समय विश्वविद्यालय में 3237 विद्यार्थी और 118 शोधार्थी हैं। एडमास यूनिवर्सिटी के चांसलर प्रो. समित राय ने कहा कि विद्यार्थियों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर विश्वविद्यालय विशेष रूप से स्नातकोत्तर स्तर कई और पाठ्यक्रम लाने पर विचार कर रहा है।

शुभजिता युवा प्रतिभा सम्मान : आवृत्ति

कविता – कारवां गुजर गया

आवृत्ति – दीपा ओझा

कवि – गोपाल दास नीरज

विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं 80 प्रतिशत भारतीय

6 करोड़ लोग करते हैं ध्रूमपान, 3 करोड़ छोड़ना चाहते हैं

पूर्वी भारत में स्ट्राइड्स ने उतारा एनआरटी गम निक्जिट तथा ज्वाएंट फ्लेक्स
कोलकाता : भारत के 80 प्रतिशत लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। 180 मिलियन आर्थेपेडिक मरीज हैं। इसके अतिरिक्त 6 करोड़ लोग ध्रूमपान करते हैं औऱ इनमें से अधिकतर लोग इसे छोड़ना चाहते हैं। बंगलुरू की कन्ज्यूमर हेल्थ केयर कम्पनी स्ट्राइड्स कन्ज्यूमर द्वारा करवाये गये सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है। सर्वेक्षण के मुताबिक 3 करोड़ लोग ध्रूमपान छोड़ना चाहते हैं मगर उनको इसे छोड़ने का तरीका नहीं मालूम। निकोटिन थेरेपी का इस्तेमाल भी महज 10 प्रतिशत लोग ही करते हैं। ने अब पूर्वी भारत में कदम रख दिया है। कम्पनी ने जोड़ों के दर्द के लिए ज्वाइंट फ्लेक्स और ध्रूमपान छुड़ाने वाला गम निक्जिट बाजार में उतारा है। स्ट्राइड्स कन्ज्यूमर प्राइवेट लिमिटेड के बिजनेस हेड (भारत तथा दक्षिण एशिया) हिमाव नाथ ने बताया कि ज्वाएंट फ्लेक्स अमेरिका में 20 साल से एक लोकप्रिय ब्रांड है और भारतीय बाजार को देखते हुए इसे आर्युवेदिक फॉर्मूले के साथ पेश किया गया है। कम्पनी का कहना है कि भारत में उपलब्ध अधिकतर एनाल्जेसिक उत्पाद सिर्फ मांसपेशियों के दर्द का उपचार करते हैं जबकि यह औषधि विशेष रूप से जोड़ों के दर्द को ध्यान में रखकर तैयार की गयी है। वहीं निक्जिट एनआरटी गम है। एनआरटी गम डब्ल्यूएचओ तथा यूएसएफडीए की अनुशंसा वाली थेरेपी है जो 3 माह में ध्रूमपान छुड़वा सकती है। यह 2 मिगा और 4 मिगा के पैक में उपलब्ध है।

नेताजी का तुलादान

गोपालप्रसाद व्यास

देखा पूरब में आज सुबह,
एक नई रोशनी फूटी थी।
एक नई किरन, ले नया संदेशा,
अग्निबान-सी छूटी थी॥

एक नई हवा ले नया राग,
कुछ गुन-गुन करती आती थी।
आज़ाद परिन्दों की टोली,
एक नई दिशा में जाती थी॥

एक नई कली चटकी इस दिन,
रौनक उपवन में आई थी।
एक नया जोश, एक नई ताज़गी,
हर चेहरे पर छाई थी॥

नेताजी का था जन्मदिवस,
उल्लास न आज समाता था।
सिंगापुर का कोना-कोना,
मस्ती में भीगा जाता था।

हर गली, हाट, चौराहे पर,
जनता ने द्वार सजाए थे।
हर घर में मंगलाचार खुशी के,
बांटे गए बधाए थे॥

पंजाबी वीर रमणियों ने,
बदले सलवार पुराने थे।
थे नए दुपट्टे, नई खुशी में,
गये नये तराने थे॥

वे गोल बांधकर बैठ गईं,
ढोलक-मंजीर बजाती थीं।
हीर-रांझा को छोड़ आज,
वे गीत पठानी गाती थीं।

गुजराती बहनें खड़ी हुईं,
गरबा की नई तैयारी में।
मानो वसन्त ही आया हो,
सिंगापुर की फुलवारी में॥

महाराष्ट्र-नन्दिनी बहनों ने,
इकतारा आज बजाया था।
स्वामी समर्थ के शब्दों को,
गीतों में गति से गाया था॥

वे बंगवासिनी, वीर-बहूटी,
फूली नहीं समाती थीं।
अंचल गर्दन में डाल,
इष्ट के सम्मुख शीश झुकाती थीं-

“प्यारा सुभाष चिरंजीवी हो,
हो जन्मभूमि, जननी स्वतंत्र!
मां कात्यायिनि ऐसा वर दो,
भारत में फैले प्रजातंत्र!!”

हर कण्ठ-कण्ठ से शब्द यही,
सर्वत्र सुनाई देते थे।
सिंगापुर के नर-नारि आज,
उल्लसित दिखाई देते थे॥

उस दिन सुभाष सेनापति ने,
कौमी झण्डा फहराया था।
उस दिन परेड में सेना ने,
फौजी सैल्यूट बजाया था॥

उस दिन सारे सिंगापुर में,
स्वागत की नई तैयारी थी।
था तुलादान नेताजी का,
लोगों में चर्चा भारी थी ॥

उस रोज तिरंगे फूलों की,
एक तुला सामने आई थी॥
उस रोज तुला ने सचमुच ही,
एक ऐसी शक्ति उठाई थी-

जो अतुल, नहीं तुल सकती थी,
दुनिया की किसी तराजू से!
जो ठोस, सिर्फ बस ठोस,
जिसे देखो चाहे जिस बाजू से!!

वह महाशक्ति सीमित होकर,
पलड़े में आन विराजी थी।
दूसरी ओर सोना-चांदी,
रत्नों की लगती बाजी थी॥

उस मन्त्रपूत मुद मंडप में,
सुमधुर शंख-ध्वनि छाई थी।
जब कुन्दन-सी काया सुभाष की,
पलड़े में मुस्काई थी॥

एक वृद्धा का धन सर्वप्रथम,
उस धर्म-तुला पर आया था।
सोने की ईटों में जिसने,
अपना सर्वस्व चढ़ाया था॥

गुजराती मां की पांच ईंट,
मानो पलड़े में आईं थीं।
या पंचयज्ञ से हो प्रसन्न,
कमला ही वहां समाई थीं!!

फिर क्या था, एक-एक करके,
आभूषण उतरे आते थे।
वे आत्मदान के साथ-साथ,
पलड़े पर चढ़ते जाते थे॥

मुंदरी आई, छल्ले आए,
जो पी की प्रेम-निशानी थे।
कंगन आए, बाजू आए,
जो रस की स्वयं कहानी थे॥

आ गया हार, ले जीत स्वयं,
माला ने बन्धन छोड़ा था।
ललनाओं ने परवशता की,
जंजीरों को धर तोड़ा था॥

आ गईं मूर्तियां मन्दिर की,
कुछ फूलदान, टिक्के आए।
तलवारों की मूठें आईं,
कुछ सोने के सिक्के आए॥

कुछ तुलादान के लिए,
युवतियों ने आभूषण छोड़े थे।
जर्जर वृद्धाओं ने भेजे,
अपने सोने के तोड़े थे॥

छोटी-छोटी कन्याओं ने भी,
करणफूल दे डाले थे।
ताबीज गले से उतरे थे,
कानों से उतरे बाले थे॥

प्रति आभूषण के साथ-साथ,
एक नई कहानी आती थी।
रोमांच नया, उदगार नया,
पलड़े में भरती जाती थी॥

नस-नस में हिन्दुस्तानी की,
बलिदान आज बल खाता था।
सोना-चांदी, हीरा-पन्ना,
सब उसको तुच्छ दिखाता था॥

अब चीर गुलामी का कोहरा,
एक नई किरण जो आई थी।
उसने भारत की युग-युग से,
यह सोई जाति जगाई थी॥

लोगों ने अपना धन-सरबस,
पलड़े पर आज चढ़ाया था।
पर वजन अभी पूरा नहीं हुआ,
कांटा न बीच में आया था॥

तो पास खड़ी सुन्दरियों ने,
कानों के कुण्डल खोल दिए।
हाथों के कंगन खोल दिए,
जूड़ों के पिन अनमोल दिए॥

एक सुन्दर सुघड़ कलाई की,
खुल ‘रिस्टवाच’ भी आई थी।
पर नहीं तराजू की डण्डी,
कांटे को सम पर लाई थी॥

कोने में तभी सिसकियों की,
देखा आवाज़ सुनाई दी।
कप्तान लक्ष्मी लिए एक,
तरुणी को साथ दिखाई दी॥

उसका जूड़ा था खुला हुआ,
आंखें सूजी थीं लाल-लाल!
इसके पति को युद्ध-स्थल में,
कल निगल गया था कठिन काल!!

नेताजी ने टोपी उतार,
उस महिला का सम्मान किया।
जिसने अपने प्यारे पति को,
आज़ादी पर कुर्बान किया॥

महिला के कम्पित हाथों से,
पलड़े में शीशफूल आया!
सौभाग्य चिह्‌न के आते ही,
कांटा सहमा, कुछ थर्राया!

दर्शक जनता की आंखों में,
आंसू छल-छल कर आए थे।
बाबू सुभाष ने रुद्ध कण्ठ से,
यूं कुछ बोल सुनाए थे-

“हे बहन, देवता तरसेंगे,
तेरे पुनीत पद-वन्दन को।
हम भारतवासी याद रखेंगे,
तेरे करुणा-क्रन्दन को!!

पर पलड़ा अभी अधूरा था,
सौभाग्य-चिह्‌न को पाकर भी।
थी स्वर्ण-राशि में अभी कमी,
इतना बेहद ग़म खाकर भी॥

पर, वृद्धा एक तभी आई,
जर्जर तन में अकुलाती-सी।
अपनी छाती से लगा एक,
सुन्दर-चित्र छिपाती-सी॥

बोली, “अपने इकलौते का,
मैं चित्र साथ में लाई हूं।
नेताजी, लो सर्वस्व मेरा,
मैं बहुत दूर से आई हूं॥ “

वृद्धा ने दी तस्वीर पटक,
शीशा चरमर कर चूर हुआ!
वह स्वर्ण-चौखटा निकल आप,
उसमें से खुद ही दूर हुआ!!

वह क्रुद्ध सिंहनी-सी बोली,
“बेटे ने फांसी खाई थी!
उसने माता के दूध-कोख को,
कालिख नहीं लगाई थी!!
हां, इतना गम है, अगर कहीं,
यदि एक पुत्र भी पाती मैं!
तो उसको भी अपनी भारत-
माता की भेंट चढ़ाती मैं!!”

इन शब्दों के ही साथ-साथ,
चौखटा तुला पर आया था!
हो गई तुला समतल, कांटा,
झुक गया, नहीं टिक पाया था!!

बाबू सुभाष उठ खड़े हुए,
वृद्धा के चरणों को छूते!
बोले, “मां, मैं कृतकृत्य हुआ,
तुझ-सी माताओं के बूते!!

है कौन आज जो कहता है,
दुश्मन बरबाद नहीं होगा!
है कौन आज जो कहता है,
भारत आज़ाद नहीं होगा!!”

केरल में 1500 शेफ ने दुनिया का सबसे लंबा केक बनाया, चीन को पीछे छोड़ा

त्रिसूर : केरल में बुधवार को दुनिया का सबसे लंबा केक बनाने का रिकॉर्ड बना। 6.5 किमी लंबे केक को 1500 से ज्यादा बेकर और शेफ ने मिलकर तैयार किया। इस वेनिला केक का वजन करीब 27 हजार किग्रा था। यह चार इंच (10 सेंटीमीटर) मोटा और चौड़ा था।
हजारों टेबल और डेस्क को जोड़कर उन पर इस केक को बनाया गया। इस दौरान बेकर और शेफ सफेद टी शर्ट और एप्रिन पहने हुए थे। इस बनाने में करीब 4 घंटे का वक्त लगा। करीब 12 हजार किग्रा शक्कर और आटे का इस्तेमाल किया गया। इस इवेंट के हजारों लोग गवाह बने।
गिनीज बुक में नाम दर्ज होगा
इस केक को बेकर्स एसोसिएशन केरल (बेक) ने बनाया। बेक के सचिव नौशाद ने कहा कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने केक की लंबाई को नापा है और यह करीब 6500 मीटर लंबा था, लेकिन उन्होंने अभी इसका प्रमाणपत्र नहीं दिया है। हमें विश्वास है कि यह गिनीज बुक में रिकॉर्ड्स बनाएगा।
चीन का रिकॉर्ड टूट सकता है
नौशाद ने बताया कि यह केक चीन का रिकॉर्ड तोड़ देगा। 2018 में चीन में 3.2 किमी लंबा फ्रूटकेक बनाया गया था। जिसे चाइनीज बेकर्स इन जिझी ने बनाया था। हमारा यह प्रयास दुनिया को हमारे कौशल को दिखाता है। हमने इसे बनाते समय इसके स्वाद, क्वालिटी और स्वच्छता को बरकरार रखा।

खेलो इंडिया यूथ गेम्स में चैंपियन महाराष्ट्र,  जीते 78 स्वर्ण पदक सहित 256 पदक

खेलो इंडिया यूथ गेम्स का तीसरा सत्र रंगारंग समारोह के साथ संपन्न हो गया। महाराष्ट्र की टीम इन खेलों की चैंपियन बनी जिसने 78 स्वर्ण पदक सहित 256 पदक जीते। इस 13 दिवसीय प्रतियोगिता के दौरान महाराष्ट्र ने 78 स्वर्ण, 77 रजत और 101 कांस्य पदक के साथ अपनी लगातार दूसरी खेलो इंडिया युवा खेल ट्रॉफी जीती।
हरियाणा 200 पदक (68 स्वर्ण, 60 रजत और 72 कांस्य पदक) के साथ दूसरे जबकि दिल्ली 122 पदक (39 स्वर्ण, 36 रजत और 47 कांस्य) के साथ तीसरे स्थान पर रहा। समापन समारोह के दौरान चीन के वुशु मार्शल आर्ट्स कलाकारों ने शानदार प्रस्तुति दी। 10 जनवरी को शुरू हुए इन खेलों में 37 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 6800 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। इन खेलों में 20 खेलों की स्पर्द्धाओं का आयोजन किया गया।

चंद्रगुप्त मौर्य पर फिल्म बनाना चाहती हैं कंगना रनौत

मुम्बई : कंगना रनौत की फिल्म मणिकर्णिका ने बॉक्स ऑफिस पर औसत कमाई की थी। इन दिनों बॉलीवुड में एतिहासिक फिल्मों की बाढ़ आ गई है। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तानाजी इसका बेहतरीन उदाहरण है। अभिनेत्री कंगना एक बार फिर ऐसी ही फिल्मों पर दांव लगना चाहती हैं।
इन दिनों कंगना रनौत अपनी आने वाली फिल्म पंगा के प्रमोशन में व्यस्त हैं। बीते दिन अभिनेत्री बिहार की राजधानी पटना पहुंचीं थीं। यहां एक कार्यक्रम के दौरान कंगना ने अपनी इच्छा जाहिर की। मणिकर्णिका फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका निभा चुकी कंगना से यह पूछे जाने पर कि क्या वे बिहार के किसी एतिहासिक व्यक्ति पर कोई फिल्म करना चाहती हैं, कंगना ने कहा ‘मैं चंद्रगुप्त मौर्य पर फिल्म बनाना चाहती हूं’।
कंगना ने बताया कि उन्होंने मुंबई में मणिकर्णिका नाम से एक प्रोडक्शन हाउस खोला है और इसके तहत वह अपनी पहली फिल्म अयोध्या बना रही हैं।