बालाचंद्रा 250 परिवारों को महीने के तीसरे रविवार को पालमलाई में 5-5 किलो चावल, 1-1 किलो दाल भी देते हैं
कोयम्बटूर : तमिलनाडु के जिले तूतूकुडी में रहने वाले 63 साल के बालाचंद्रा पिछले डेढ़ साल के रोज 250 आदिवासियों के लिए खाने का पैकेट बांट रहे हैं। वह रोज जिले की पहाड़ी बस्तियों पानप्पल्ली, कोंडानुर, जम्बुकंडी, कुट्टुपुली और थेक्कालूर में जाते हैं और लोगों को घर-घर जाकर स्वादिष्ट खाना देते हैं। खाना देने का समय रोज दिन में 11 बजे से 12 बजे की बीच होता है। इसके अलावा सभी परिवारों को महीने के तीसरे रविवार को पालमलाई में 5-5 किलो चावल, 1-1 किलो दाल देते हैं।
वह कहते हैं, ‘‘मैं 14वीं शताब्दी के कावेरीपत्तनम के संत पत्तिनाथर से प्रभावित होकर जरूरतमंदों की मदद करता हूं।’’ तमिलनाडु में पत्तिनाथर नाम से दो संत कवि हुए हैं। इनमें एक का जीवन काल 10वीं सदी और दूसरे का 14वीं सदी है।
अब मैं खुद से किए गए वादे को पूरा कर रहा हूं
बालचंद्रा कहते हैं, ‘‘मैं तूतूकुडी के सम्पन्न कारोबारी परिवार से हूं। मैंने काफी पैसा कमाया है। जब मैंने कारोबार शुरू किया था, तब से विचार था कि मैं जरूरतमंदों को भोजन कराउंगा। मैंने अपने जीवन के 60 साल परिवार को दिए। उनकी सभी जरूरतें पूरी कीं। अब मैंने व्यवसाय छोड़ दिया है। सभी तरह की प्रतिबद्धताओं से मुक्त हूं। अब मैं खुद से किए गए वादे को पूरा कर रहा हूं। आदिवासियों के खाना बनाने का काम थडगाम में रहने वाली एक महिला करती है। प्रतिदिन के खाने पर करीब 6 हजार रुपए खर्च होता है।’’
परिवार सब अपनी-अपनी जगह सेट
अपने बारे में बालाचंद्रा कहते हैं, ‘‘परिवार में पत्नी, बेटा और दो बेटियां हैं। बेटा कोयम्बटूर के मल्टी स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में एमडी है। बेटियां अपने-अपने घर विदेशों में सेटल हो गईं। पत्नी का जन्म स्थान कोयम्बटूर के पास है। वह अपने आखिरी दिन वहीं बिताना चाहती है।’
60 की उम्र तक करोबार किया, अब रोज 6000 रुपये खर्च कर 250 आदिवासियों को खाना बाँटते हैं
57 किलो वजन घटाकर जेन एटकिन्स बनी मिस ग्रेट ब्रिटेन
मंगेतर ने मोटी कहकर तोड़ा था रिश्ता
लंदन : 26 साल की जेन एटकिन्स ने उसके मोटापे के कारण उसे छोड़ने वाले मंगेतर को पांच साल बाद ही सही, लेकिन ऐसा जवाब दिया जिसकी कल्पना भी शायद उसने न की हो। नॉर्थ ईस्ट लिंकनशायर के ग्रिम्सबी की रहने वाली जेन ने इन सालों में 57 किलो वजन कम करके न सिर्फ खुद को फिट बनाया, बल्कि पिछले दिनों मिस ग्रेट ब्रिटेन का खिताब भी जीता। पांच साल में जेन को अपनी जिंदगी का हमसफर भी मिला और उन्होंने उससे शादी भी की। शादी के बाद ऐसे किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन जब मिस ग्रेट ब्रिटेन में नियम बदलने के बाद शादीशुदा महिलाओं को उसमें हिस्सा लेने की इजाजत मिली तो जेन ने इसमें हिस्सा लिया और जीत भी गयीं। वह कहती हैं कि जिंदगी के इस मोड़ पर पहुंचकर उन्हें जो खुशी हो रही है, वह पहले कभी नहीं हुई।

जब रिश्ता खत्म हुआ तो लगा सब खत्म हो गया
जेन ने कहा, मैं जीतने के बाद अभी भी शॉक में हूं, इसलिए अपनी खुशी शब्दों में बयां नहीं कर सकती हूं। सच कहूं तो मुझे अब भी यकीन नहीं आ रहा है कि मैं ब्रिटेन की सबसे खूबसूरत महिला बन चुकी हूं, मिस ग्रेट ब्रिटेन, यह एक ऐसी सच्चाई है जिस पर यकीन करने में मुझे वक्त लगेगा और जो लोग मेरी पुरानी तस्वीरें देख चुके हैं या मुझसे मिल चुके हैं, उनके लिए तो यह यकीन से परे है।
जब मैं अपने एक्स ब्वॉयफ्रेंड से मिली थी तो मेरा वजन 88 किलो था जो धीरे-धीरे 114 किलो तक पहुंच गया। हम दोनों शादी करने वाले थे, लेकिन मेरे बढ़ते वजन के कारण उसने मुझे छोड़ दिया। जब वह मुझे छोड़कर गया तो लगा कि मेरी तो दुनिया ही खत्म हो गई है। मैं हफ्तों तक रोती रही और तनाव होने पर खाना ही मेरा साथ देता। हालांकि तब मेरे साथ सबसे अच्छी चीज जो हुई, वह था मेरा जिम ज्वाइन करना। जब से मैंने जिम जाना शुरू किया है, मैं एक अलग जेन ही बन गई हूं।
पहला गाना 2018 में आया
मिस ग्रेट ब्रिटेन बनना एक अलग ही एहसास है। तीन साल पहले तक तो मैं सोच भी नहीं सकती थी कि ऐसे किसी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लूंगी। अब इसकी विजेता बन गयी हूं। मेरी बॉडी में काफी बदलाव आया है, लेकिन मेरा व्यक्तित्व वैसा ही है और इसी के कारण मैं कॉन्टेस्ट जीत पाई हूं। जेन एक मॉडल होने के साथ-साथ कंट्री सिंगर भी हैं और 2018 में उनका पहला गाना रिलीज हुआ था। अब वह इस साल अपना एक और गाना रिलीज करने वाली हैं।
15 मिनट में ही ब्रेस्ट कैंसर का पता लगा लेती है गीता की डिवाइस
25 हजार महिलाओं की जाँच हुई, 30 अस्पतालों में उपलब्ध
बेंगलुरु : गीता मंजूनाथ के हेल्थ स्टार्टअप ‘निरामई’ ने ऐसी एआई बेस्ड थर्मल सेंसर डिवाइस बनाई है, जो ब्रेस्ट कैंसर की पहचान शुरुआती स्टेज में ही कर लेती है। यानी तब, जब इस बीमारी के लक्षण महसूस भी नहीं होते। गीता बताती हैं कि अभी देश में मेमोग्राफी से ब्रेस्ट कैंसर को डिटेक्ट किया जाता है। 45 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह तरीका उतना सफल नहीं है। लेकिन थर्मल सेंसर डिवाइस छाती के घटते-बढ़ते तापमान पर नजर रखती है, तस्वीरें लेती है। उनका विश्लेषण कर असामान्यता की पहचान करती है। इसमें सिर्फ 10-15 मिनट लगते हैं। इस डिवाइस से 5 एमएम के छोटे ट्यूमर की पहचान भी आसानी से हो जाती है।
इससे जांच के अच्छे नतीजे मिले तो उसी रिसर्च टीम के साथ ‘निरामई’ की नींव रखी। हमारी डिवाइस से अब तक 25 हजार से ज्यादा महिलाओं की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। बेंगलुरू, मैसूरु, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, दिल्ली जैसे 12 शहरों और 30 से ज्यादा अस्पतालों में यह डिवाइस इस्तेमाल हो रही है। संस्था को निवेशकों से 50 करोड़ रुपये का फंड भी मिला है। हाल ही में गेट्स फाउंडेशन ने निरामई को रिवर ब्लाइंडनेस की रोकथाम के लिए सॉफ्टवेयर बनाने का जिम्मा दिया है।
चचेरी बहनों की मौत के बाद कुछ करना चाहती थी
अपने परिवार में ब्रेस्ट कैंसर से हुई मौतों को देखकर गीता सहम गई थीं। इसके बाद उन्होंने इस दिशा में कुछ करने की ठानी थी। वे बताती हैं, ‘कुछ साल पहले मेरी दो चचेरी बहनों की मौत 30 साल से भी कम उम्र में ब्रेस्ट कैंसर से हो गयी थी। अगर कैंसर का समय पर पता चल जाता, तो वे बच सकती थीं। इसके लिए मैं कुछ करना चाहती थी। मैंने अपने एक साथी से थर्मोग्राफी पर बात की। यह इंफ्रारेड इमेज के आधार पर विश्लेषण की तकनीक है। मैंने एक छोटी रिसर्च टीम तैयार की और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से कैंसर की जल्द पहचान करने में सक्षम एक डिवाइस बनाई।
देश में सिर्फ 66 महिलाएं ही ब्रेस्ट कैंसर से बच पाती है
स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1 लाख महिलाओं में से 26 ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं। यह देश में सबसे तेजी से बढ़ता कैंसर है। इधर, लेन्सेट की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 60% मामलों में कैंसर समय पर डायग्नोज ही नहीं हो पाता। इस वजह से 66% महिलाएं ही सर्वाइव कर पाती हैं, जबकि विकसित देशों में 90% तक महिलाएं इस कैंसर से लड़कर ठीक हो जाती हैं। इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए बेंगलुरू की एक आईटी प्रोफेशनल संघर्ष कर रही हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
कोरोनावायरस के कारण अजलान शाह टूर्नामेंट टला, अब सितंबर-अक्टूबर में होगा
कोरोनावायरस के कारण अजलान शाह हॉकी टूर्नामेंट की तारीख आगे बढ़ा दी गई है। यह टूर्नामेंट मलेशिया के इपोह शहर में 11 से 18 अप्रैल तक होना था। अब 24 सितंबर से 3 अक्टूबर के बीच होगा। चीन में कोरोनावायरस से 2912 लोगों की मौत हो गई। चीन के बाहर सबसे ज्यादा 4212 संक्रमण के मामले दक्षिण कोरिया में सामने आए। यहां 22 मौतें हुईं। मलेशिया में अब तक 29 संक्रमित मिले हैं।
यह टूर्नामेंट हर साल मलेशिया में होता है। पिछली बार दक्षिण कोरिया ने खिताब जीता था। उसने फाइनल में भारत को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से शिकस्त दी थी। टीम इंडिया ने 6 बार 1985, 1991, 1995, 2009 और 2010 यह खिताब जीता है।
कतर मोटोजीपी रेस रद्द
कोरोनावायरस के कारण ही कतर में होने वाली मोटोजीपी सीजन की पहली बाइक रेस रद्द कर दी गई। यह रेस 8 मार्च से राजधानी दोहा में होने वाली थी। मोटोजीपी का दूसरा राउंड थाईलैंड में 22 मार्च को आयोजित होना है। इंटरनेशनल मोटरसाइकिलिंग फेडरेशन (आईएमएफ) ने कहा, ‘‘इटली, कतर सहित कई देशों के बीच यात्रा प्रतिबंधों के कारण लोसैल सर्किट पर होने वाली रेस नहीं होगी। हालांकि, मोटो-2 और मोटो-3 वर्ल्ड चैम्पियनशिप रेस तय समय पर ही होगी। इसके लिए सभी टीमों के राइडर्स पहले ही पहुँच चुके हैं।
माधुरी कनितकर देश की तीसरी महिला ले. जनरल बनीं, पति राजीव पहले से इसी रैंक पर
पहले लेफ्टिनेंट जनरल दम्पति होने का गौरव भी है
नयी दिल्ली : सेना में महिलाओं को कमांड पोस्टिंग देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गत शनिवार को मेजर जनरल माधुरी कनितकर को लेफ्टिनेंट जनरल की रैंक के लिए प्रमोशन दे दिया गया। इससे साथ ही कनितकर पति-पत्नी सेना में लेफ्टिनेंट जनरल की रैंक पाने वाले पहले दंपती बन गए हैं। माधुरी के पति राजीव भी भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल हैं। माधुरी कनितकर भारतीय सशस्त्र बलों में लेफ्टिनेंट जनरल रैंक तक पहुंचने वाली तीसरी महिला अधिकारी हैं।
माधुरी शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। वह पिछले 37 साल से सेना में कार्यरत हैं। पिछले साल उनका चयन लेफ्टिनेंट जनरल पद के लिए हुआ था। लेफ्टिनेंट जनरल कनितकर ने नई दिल्ली में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तहत डिप्टी चीफ, इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (डीसीआइडीएस) मेडिकल का कार्यभार संभाला। माधुरी कनितकर एएफएमसी में टॉपर रही हैं, वह प्रेसिडेंशियल मेडल से भी नवाजी गयीं।
इससे पहले दो महिलाओं को मिली कमांड पोस्ट
सशस्त्र बलों में सबसे पहले नौसेना में वाइस एडमिरल डॉ. पुनीता अरोड़ा को यह उपलब्धि हासिल हुई थी। वायुसेना की महिला एयर मार्शल पद्मावती बंदोपाध्याय इस पद पर पहुंचने वाली दूसरी महिला हैं। इनके बाद माधुरी कनितकर को लेफ्टिनेंट जनरल बनाया गया है। माधुरी कनितकर एएफएमसी में टॉपर रही हैं। वह प्रेसिडेंशियल मेडल से भी नवाजी गईं। वह एम्स से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। वह प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक और तकनीकी सलाहकार बोर्ड की सदस्य भी हैं।
शादी का कार्ड छापने वाले और कैटरर को देना होगा वर-वधू की उम्र का सबूत
राँची : बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने नई पहल की है। इसके तहत शादी के कार्ड छापने वाले और कैटरिंग करने वालों को रजिस्टर रखना करना होगा। इसमें वर-वधू की उम्र का सबूत होगा। इसके अलावा मैरिज होम संचालक को भी आयु प्रमाणपत्र लेना होगा। इससे पहले से ही जानकारी हो जाएगी कि कहाँ बाल विवाह हो रहा है या नहीं। चाइल्ड लाइन के सिटी एडवाइजरी बोर्ड में चाइल्ड मैरिज रोकने डीडीसी अनन्य मित्तल ने जिला समाज कल्याण पदाधिकारी (डीएसडल्ब्ल्यूओ) सुमन सिंह को आदेश दिया। बोर्ड की बैठक में सीडब्ल्यूसी के चेयरमैन और सदस्यों और चाइल्ड लाइन से संबंधित लोगों ने कहा कि कई बार शादी के मौके पर ही कार्रवाई करने से अभिभावक के साथ नाबालिग को भी सामाजिक ताने सुनने पड़ते हैं।
24 बाल विवाह के मामले आए सामने
रांची जिले में बीते 10 माह में 24 बाल विवाह के मामले सामने आए हैं। जिला बाल संरक्षण यूनिट (डीसीपीयू) के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2019 से जनवरी 2020 तक 24 बाल विवाह के मामलों में सबसे ज्यादा 7 मामले जून में आए थे। जबकि, इस वर्ष जनवरी में दो मामले आए हैं। वहीं, बीते 10 माह में 223 मामले रांची सीडब्ल्यूसी के सामने तस्करी के आ चुके हैं। जबकि, 10 माह में पोस्को के 74 मामले आए हैं। मई और सितंबर में पोस्को के 9-9 मामले आए थे, जबकि इस वर्ष जनवरी में 6 मामले आए।
मारिया शारापोवा अब आर्किटेक्चर की पढ़ाई करेंगी या अपना कैंडी बिजनेस बढ़ाएंगी
न्यूयॉर्क (क्रिस्टोफर क्लेरे) : पिछले हफ्ते मारिया शारापोवा का एग्जिट इंटरव्यू लेते समय उनसे पूछा गया कि क्या अब वे कोचिंग देंगी? 6 फीट 2 इंच लंबी शारापोवा कुछ देर के लिए रुकीं और कहा- नहीं। उन्होंने वापसी के रास्ते भी बंद कर दिए हैं। आमतौर पर महिला टेनिस में खिलाड़ी अलविदा कहने के बाद वापसी कर लेती हैं। तीन बच्चों की मां 36 साल की किम क्लिस्टर्स ने हाल ही में कोर्ट पर वापसी की। वे 7 साल से ज्यादा समय से कोर्ट से दूर थीं।
23 ग्रैंड स्लैम चैंपियन सेरेना विलियम्स दो साल की बेटी की मां हैं और रिकॉर्ड 24वें ग्रैंड स्लैम की तलाश में हैं। लेकिन शारापोवा का वापसी का कोई इरादा नहीं हैं। पूछने पर बताती हैं- नहीं, मैंने सभी को वादा किया है कि वापसी नहीं करूंगी। रूस की शारापोवा ने 26 फरवरी को 32 साल की उम्र में टेनिस को अलविदा कह दिया था। वे संन्यास लेने वाली दूसरी युवा सुपरस्टार हैं। शारापोवा कहती हैं, ‘हर खिलाड़ी के हालात अलग-अलग होते हैं। हर खिलाड़ी की जिंदगी में चीजें अलग-अलग तरह से चल रही होती हैं। खासतौर पर महिला खिलाड़ियों की जिंदगी में। सेरेना भी कुछ समय के लिए दूर हुईं थीं। लेकिन उनकी वापसी में परिवार ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। सिर्फ वही हैं जो 24 ग्रैंड स्लैम का रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं।’ उनका कहना है, ‘मुझे नहीं पता कि माँ बनने के बाद खिलाड़ी दोहरी जिम्मेदारी कैसे निभा लेते हैं। मैं कभी माँ बनने के बाद खुद को खेलते हुए नहीं देख सकती। आपको बच्चों के लिए समय नहीं मिल पाता। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि मैं अपनी माँ येलेना से दो साल दूर रही हूं। जब मैं 6 साल की उम्र में पिता यूरी के साथ रूस से अमेरिका आई थी, तब वीसा संबंधी दिक्कतों के कारण मां हमारे साथ नहीं आ सकी थीं। मेरा मानना है कि भगवान ने सभी के लिए कुछ न कुछ अच्छा सोच रखा होता है। इसलिए हमें ज्यादा प्लानिंग नहीं करनी चाहिए। हम योजनाएं बनाते रहते हैं और भगवान हंस रहा होता है, क्योंकि वह तो हमारे लिए कुछ सोच चुका है।’
डोपिंग के कारण शारापोवा पर दो साल का बैन लगा था। तब उन्हें ड्रग चीट और शाराडोपा तक कहा गया था। इस बारे में शारापोवा का कहना है, ‘वह समय काफी खराब था। लेकिन मैंने पूरी ईमानदारी से उस मामले में अपनी बात रखी थी। जब मैंने वापसी की, उस समय सभी ने वैसा ही प्यार बनाए रखा, जैसा पहले करते थे।’ शारापोवा 17 साल की उम्र में उस समय ग्लोबल स्टार बनी थीं, जब उन्होंने 2004 विंबलडन फाइनल में नंबर-1 सेरेना को हराया था। उसके बाद वे ब्रॉन्ड बन गई थीं। फोर्ब्स के अनुसार, वे लगातार 11 साल सबसे ज्यादा कमाई करने वाली महिला खिलाड़ी थीं। 2015 में उनकी कमाई 30 मिलियन डॉलर (करीब 216 करोड़ रुपए) थी।
शारापोवा का कहना है, ‘मेरी जिंदगी में बिजनेस के साथ-साथ कई चीजें हैं, जो अब करूंगी।’ शारापोवा दो साल से ब्रिटेन के बिजनेसमैन एलेक्जेंडर गिलकेस को डेट कर रही हैं। एलेक्जेंडर ऑनलाइन ऑक्शन साइट के फाउंडर हैं। शारापोवा कहती हैं, ‘एलेक्जेंडर का मेरी लाइफ में पॉजिटिव प्रभाव पड़ा है। मैं खुश हूं कि वे मेरे साथ हैं। पहले वे मेरी व्यस्त जिंदगी को देखकर ‘हरिकेन मारिया’ कहते थे। लेकिन अब मैं उन्हें भी ज्यादा से ज्यादा समय दे सकूंगी।’
बड़ी कंपनियों से एंडोर्समेंट डील आगे भी जारी रहेगी
शारापोवा अपने एजेंट मैक्स एसिनबड से सलाह लेती हैं। मैक्स कहते हैं, ‘रिटायरमेंट के बाद भी शारापोवा की नाइकी, इवियन और पोर्शे से एंडोर्समेंट डील जारी रहेगी। उनकी रुचि आर्किटेक्चर की पढ़ाई में है। वे अपनी कैंडी कंपनी ‘शुगरपोवा’ को आगे बढ़ाने पर भी फोकस करेंगी। वे जल्द ही बिजनेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेंगी।
जीएसटी हेल्पडेस्क के लिए नया टोल-फ्री नंबर शुरू, 12 भाषाओं में मिलेगी जानकारी
नयी दिल्ली : गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स नेटवर्क (जीएसटीएन) ने जीएसटी हेल्पडेस्क के लिए एक नया टोल-फ्री नंबर ‘1800 103 4786’ शुरू किया है। इस इनडायरेक्ट टैक्स से जुड़े सवालों या समस्या के समाधान के लिए इस नंबर पर संपर्क किया जा सकता है। यह टोल-फ्री नंबर 365 दिन काम करेगा।
इस पर सुबह नौ बजे से शाम नौ बजे तक कॉल किया जा सकता है। नए टोल-फ्री नंबर की शुरुआत के साथ जीएसटी हेल्पडेस्क के रूप में काम कर रहे पुराने नंबर 0120-24888999 को सेवा से हटा दिया गया है। जीएसटीएन ने एक बयान में यह जानकारी दी। इसके मुताबिक जीएसटी हेल्पडेस्क के सिस्टम को और बेहतर और पारदर्शी बनाया गया है। इसके साथ ही टैक्सपेयर्स की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नए फीचर्स लॉन्च किए गए हैं।
इस हेल्पडेस्क पर अब 10 और नई भाषाओं में जानकारी ली जा सकती है। अब तक जीएसटी हेल्प डेस्क पर सिर्फ हिन्दी और अंग्रेजी में ही जानकारी मिलती थी। अब बंगाली, मराठी, तेलुगू, तमिल, गुजराती, कन्नड़, ओडिया, मलयालम, पंजाबी और असमी भाषा में भी आप जीएसटी हेल्पडेस्क एजेंट से बात कर सकेंगे।
तिरुचिरापल्ली के जम्बूकेश्वर मंदिर में खुदाई, मिले कलश में भरे 505 सोने के सिक्के
तिरुचिरापल्ली : दक्षिण भारत के ज्यादातर मंदिर प्राचीन काल में बने हुए हैं। इनमें तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के तिरुवनैकवल स्थित जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर भी है। इसका निर्माण चोल वंश के राजा कोचेन्गनन चोल ने करवाया था। इस शिव मंदिर में चल रही खुदाई के दौरान 504 छोटे सोने के सिक्कों और 1 बड़े सिक्के से भरा कलश निकला। मंदिर प्रशासन ने इन सिक्कों को पुलिस के हवाले कर दिया है।
पुलिस के अनुसार, कलश में मिले सोने के सिक्कों का वजन 1.716 किलो है। अनुमान है कि ये सिक्के करीब 10वीं-12वीं शताब्दी तक के हो सकते हैं। मंदिर के अधिकारियों के अनुसार सिक्कों पर अरबी लिपि के अक्षर हैं।
शिलालेख में मंदिर से जुड़े धन की जानकारी
मंदिर प्रशासन के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण करीब 1800 साल पहले चोल राजवंश के शासनकाल में हुआ था। मंदिर से जुड़े 156 शिलालेख मिले थे, जिनमें चोल राजवंश के शासक परांतक प्रथम के समय का शिलालेख सबसे पुराना है, जो कि नौवीं शताब्दी का है। इसमें ही मंदिर के जीर्णोद्धार और धन के बारे में जानकारी मिलती है। चोल राजाओं के बाद भी समय-समय पर इस मंदिर की देखरेख और पुननिर्माण का कार्य करवाया गया।
वर्तमान के तिरुवनैकवल में जहां मंदिर है, वहां प्राचीनकाल में जामुन के पेड़ों का जंगल था। मंदिर के पीछे एक चबूतरा बना है, जिस पर जामुन का प्राचीन पेड़ अभी भी है। मंदिर को प्राप्त शिलालेख के अनुसार, प्राचीनकाल में जामुन के पेड़ के नीचे ही भगवान शिव ने उनके दो भक्तों को दर्शन दिए थे। तब से वहां शिवलिंग स्थापित है। इसलिए, इस मंदिर का नाम जम्बूकेश्वर पड़ा। जम्बू का हिंदी अर्थ जामुन होता है।
शिव-पार्वती के मंदिरों के कारण कहा जाता है जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर
तिरुवनैकवल में स्थित जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर भगवान शिव-पार्वती का प्रमुख मंदिर है। इस शिवलिंग को पंचतत्व लिंगों में से एक जलतत्व लिंग के रूप में जाना जाता है। करीब सौ बीघा क्षेत्र में फैले इस मंदिर के तीन आंगन हैं। मंदिर प्रवेश करते ही जो आंगन है, वहां लगभग 400 स्तम्भ बने हैं। आंगन में दाहिनी ओर एक सरोवर है, जिसके मध्य में मंडप बना है।
श्री जम्बूकेश्वर मंदिर पांचवें घेरे में है। इस जगह श्री जंबूकेश्वर लिंग बहते हुए पानी के ऊपर स्थापित है और लिंगमूर्ति के नीचे से लगातार जल ऊपर आता रहता है। आदि शंकराचार्य ने यहां पर श्री जम्बूकेश्वर लिंग मूर्ति की पूजा अर्चना की थी। यहां शंकराचार्य की मूर्ति भी है। जम्बूकेश्वर मंदिर की तीसरी परिक्रमा में सुब्रह्मण्यम मंदिर है। यहां भगवान शिव का पंचमुखी लिंग भी स्थापित है।
जम्बूकेश्वर मंदिर के प्रांगण में देवी पार्वती का विशाल मंदिर है। यहां पर देवी की पूजा जगदम्बा रूप में की जाती है। इसलिए, इन्हें अखिलंदेश्वरी कहते हैं। इस मंदिर के पास ही गणेशजी का भी मंदिर है, जिसकी स्थापना आदिशंकराचार्य द्वारा की गई है। मंदिर प्रशासन द्वारा बताया जाता है कि पहले देवी की मूर्ति में बहुत तेज था, इस वजह से कोई दर्शन नहीं कर पाता था। लेकिन, आदिशंकराचार्य ने मूर्ति के कानों में हीरे से जड़े हुए श्रीयंत्र के कुंडल पहना दिए, जिससे देवी का तेज कम हुआ। इस मंदिर के आसपास मरिअम्मन और लक्ष्मी मंदिर के साथ अन्य मंदिर भी बने हुए हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
सीवी रमन से लेकर मिसाइल वीमेन टेसी थॉमस….लम्बा है विज्ञान की प्रगति का सफर
हर साल 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। साल 1928 में 28 फरवरी के ही दिन भौतिक वैज्ञानिक सीवी रमन ने ‘रमन इफेक्ट’ का आविष्कार किया गया था, जिसके बाद साल 1986 से हर साल इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है औऱ इस बार भी मनाया गया। पारदर्शी वस्तुओं से गुजरने पर प्रकाश की किरणों में आने वाले बदलाव पर की इस महत्वपूर्ण खोज के लिए सीवी रमन को 1930 में फिजिक्स के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। खास बात यह है कि फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार पाने वाले सीवी रमन भारत ही नहीं बल्कि एशिया के भी पहले वैज्ञानिक थे। कुछ वैज्ञानिकों से मिलिए –
विज्ञान के क्षेत्र में महिलाएँ
रितु करिधल- इसरो में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत रितु करिदल चंद्रयान -2 की मिशन निदेशक रही हैं। वह मार्स ऑर्बिटर मिशन की डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर भी रही हैं। इन्होंने चंद्रयान-2 की शुरुआत करने वाली महिला के रूप में प्रसिद्धि पाई।
नंदिनी हरिनाथ- बेंगलुरु में इसरो सैटेलाइट सेंटर के रॉकेट वैज्ञानिक, नंदिनी 20 साल से यहां अपनी पहली नौकरी के रूप में काम कर कर रही है। इस दौरान वह 14 मिशनों पर काम कर चुकीं हैं। मंगलयान मिशन के लिए वह डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर थी।
डॉ. गगनदीप कांग- रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन और अमेरिकन एकेडमी ऑफ माइक्रोबॉयोलॉजी की फेलो बनने वाली पहली भारतीय महिला डॉ. कांग, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट की कार्यकारी निदेशक हैं। देश में बच्चों के हिसाब से डायरिया रोकने के लिए रोटावायरस वैक्सीन विकसित करने का श्रेय डॉ. गगनदीप कांग को जाता है।
डॉ. टेसी थॉमस- डीआरडीओ में वैज्ञानिकी प्रणाली की महानिदेशक डॉ. टेसी थॉमस 1988 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला हैदराबाद से जुड़ीं। इन्होने लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के लिए गाइडेड योजना तैयार की, जिसका प्रयोग सभी अग्नि मिसाइलों में किया जाता है।
डॉ. चंद्रिमा शाह- भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की पहली महिला अध्यक्ष बनने वाली चंद्रिमा राष्ट्रीय इम्यूनोलोजी संस्थान, दिल्ली में प्रोफेसर ऑफ एमिनेंस हैं और वे इस संस्थान की निदेशक भी रह चुकी हैं। उन्होंने 1980 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी।
क्या है रमन प्रभाव
रमन प्रभाव बताता है कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुजरता है तो उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में बदलाव दिखता है। यानी जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में फैल जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है। प्रकाश के क्षेत्र में किए गए उनके काम का आज भी कई क्षेत्रों में प्रयोग हो रहा है। रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल दुनिया भर के केमिकल लैब में होता है, इसकी मदद से पदार्थ की पहचान की जाती है। औषधि क्षेत्र में कोशिका और उत्तकों पर शोध के लिए और कैंसर का पता लगाने तक के लिए इसका इस्तेमाल होता है। मिशन चंद्रयान के दौरान चांद पर पानी का पता लगाने के पीछे भी रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का ही योगदान था।
एक यात्रा ने बदल दी थी जिंदगी
सी. वी. रमन ने ही पहली बार बताया था कि आसमान और पानी का रंग नीला क्यों होता है? दरअसल रमन एक बार साल 1921 में जहाज से ब्रिटेन जा रहे थे। जहाज की डेक से उन्होंने पानी के सुंदर नीले रंग को देखा।
उस समय से उनको समुद्र के पानी के नीले रंग पर रेलीग की व्याख्या पर शक होने लगा। जब वह सितंबर 1921 में वापस भारत आने लगे तो अपने साथ कुछ उपकरण लेकर आए।
सीवी रमन ने उपकरणों की मदद से आसमान और समुद्र का अध्ययन किया। वह इस नतीजे पर पहुंचे कि समुद्र भी सूर्य के प्रकाश को विभाजित करता है, जिससे समुद्र के पानी का रंग नीला दिखाई पड़ता है।
जब वह अपने लैब में वापस आए तो रमन और उनके छात्रों ने प्रकाश के बिखरने या प्रकाश के कई रंगों में बंटने की प्रकृति पर शोध किया।
उन्होंने ठोस, द्रव्य और गैस में प्रकाश के विभाजन पर शोध जारी रखा। फिर वह जिस नतीजे पर पहुंचे, वह ‘रमन प्रभाव’ कहलाया।
असिस्टेंट अकाउटेंट जनरल भी रहे सीवी रमन
सर सीवी रमन का जन्म ब्रिटिश काल के दौरान भारत में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी (तमिलनाडु) में सात नवंबर 1888 को हुआ था। उनके पिता गणित और भौतिकी के प्राध्यापक थे। उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेन्सी कॉलेज से बीए किया और साल 1905 में वहां से गणित में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वह इकलौते छात्र थे। इसके बाद उन्होंने इसी कॉलेज में एमए में एडमिशन लिया और मुख्य विषय के तौर पर फिजिक्स को चुना। हालांकि, विज्ञान के क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं होने के कारण सी.वी. रमन ने कोलकाता में 1907 में असिस्टेंट अकाउटेंट जनरल की नौकरी की। लेकिन विज्ञान के लिए उनका लगाव बना रहा और वह इंडियन एशोसिएशन फार कल्टीवेशन आफ साइंस और कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं में शोध करते रहे। साल 1928 में उन्होंने रमन प्रभाव का आविष्कार किया,जिसके के लिए 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार और 1954 में उनको सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था। सीवी रमन का 82 साल की आयु में 1970 में निधन हुआ था।




