Wednesday, June 24, 2026
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1973 में हैंडबॉल कोच ने बनायी भारत का महिला क्रिकेट एसोसिएशन

 टीम ने 3 साल बाद पहली टेस्ट सीरीज खेली
दुनिया के कई देशों में पुरुष क्रिकेट की तरह ही महिला क्रिकेट का भी क्रेज बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात करें तो वुमन इंटरनेशनल क्रिकेट एसोसिएशन 1926 में बना। हालांकि, इस एसोसिएशन के बनने के बाद पहला महिला टेस्ट मैच 1934 में खेला गया। इस दौरान भारत में महिला क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियां शुरू ही नहीं हुई थीं। करीब चार दशक बाद हमारे देश में महिला क्रिकेट से जुड़ी हलचल शुरू हुई।
भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन
बात 1973 की है। हैदराबाद में हैंडबॉल और सॉफ्टबॉल के एक कोच और प्रशंसक थे। नाम था महेंद्र कुमार शर्मा। एक बार उनकी कुछ स्टूडेंट्स ने लड़कों को क्रिकेट खेलते देखा। उन्हें पसंद आया तो वो भी खेलने चली गईं। बस, यहीं से शर्मा के दिमाग में महिला क्रिकेट एसोसिएशन बनाने का विचार जन्मा। इसी साल भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WCAI) अस्तित्व में आया। शर्मा ने इंग्लैंड के महिला क्रिकेट एसोसिएशन से संपर्क किया। उनके प्रयास रंग लाए। कुछ महीने बाद इंटरनेशनल क्रिकेट एसोसिएशन ने भी डब्लूसीएआई को मान्यता दे दी।
पहला दौरा और बराबरी की टक्कर
1976 में वेस्ट इंडीज की महिला क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आई। यह किसी भी विदेशी महिला क्रिकेट टीम का पहला भारत दौरा था। कुल 6 टेस्ट मैच इस सीरीज में खेले गए। तीसरा टेस्ट पटना में 25 हजार दर्शकों की मौजूदगी में खेला गया। इसे भारत ने जीता। हालांकि, छठवां और आखिरी टेस्ट जीतकर विंडीज ने सीरीज 1-1 से बराबर करा ली। इसके दो साल बाद यानी 1978 में दूसरे महिला विश्वकप का आयोजन भारत में किया गया। टीम इंडिया ग्रुप स्टेज भी पार नहीं कर सकी।
फिर बदले हालात
1997 में भारत ने दूसरी बार महिला क्रिकेट विश्वकप की मेजबानी की। हमारी टीम सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 19 रन से हार गयी। ईडन गार्डन्स में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल खेला गया। इसे करीब 80 हजार फैन्स ने देखा। 2005 में भारत ने पहली बार महिला विश्वकप फाइनल खेला। कप्तान थीं मिताली राज। उस वक्त राज 22 साल की थीं। 2006 में डब्लूसीएआई का विलय बीसीसीआई में हो गया। 2017 में भी टीम इंडिया विश्वकप के फाइनल में पहुंची। लेकिन, इंग्लैंड ने 9 रन से खिताबी जीत हासिल कर ली।
शांता रंगास्वामी
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पहली कप्तान थीं शांता रंगास्वामी। अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में भारत की तरफ से पहला टेस्ट शतक भी शांता के ही नाम दर्ज है। 2017 में बीसीसीआई ने रंगास्वामी को लाइफटाइम अची‌वमेंट अवॉर्ड प्रदान किया था।

साड़ी पहनकर क्रिकेट खेलने उतरीं मिताली

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की अनुभवी बल्लेबाज मिताली राज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में मिताली साड़ी पहनकर क्रिकेट खेलते हुए दिखाई दे रही हैं। इस वीडियो को मिताली ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकांउट पर शेयर किया है, जिसके कैप्शन में उन्होंने लिखा, ‘साड़ी बहुत कुछ कहती है आपसे भी अधिक। यह आपको कभी भी फिट होने के लिए नहीं कहती, यह आपको अलग दिखना सिखाती है। चलिए इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020 पर एक अनमोल चीज की शुरुआत करते हैं। इस महिला दिवस से अपनी शर्तों पर जीना शुरू करते हैं।’इस वीडियो को तीन लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। 37 साल की मिताली ने पिछले साल ही टी-20 क्रिकेट से संन्यास ले लिया था। वह अभी महिला वन-डे टीम की कप्तान हैं।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को खुला खत, ‘विमेन’ और ‘सेक्सिस्ट’ की परिभाषा बदलने की माँग

नयी दिल्ली : अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) से ठीक पहले महिला कार्यकर्ता समूहों ने मिलकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को एक खुला पत्र लिखकर एक बार फिर डिक्शनरी से ‘वूमन’ शब्द के ‘सेक्सिस्ट’ होने की परिभाषा बदलने की मांग की है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में इनके पर्यायवाची शब्दों को रूप में ‘बिच’ और ‘मेड’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की निंदा की गई है। इस पर यूनिवर्सिटी ने बदलाव की बात मान ली है।
ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्जियन’ के मुताबिक, महिलावादी पार्टी नेताओं ने 12 अन्य दलों के साथ मिलकर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘विमन’ और ‘सेक्सिस्ट’ शब्द के अर्थ की पत्र लिखकर आलोचना की है जबकि पुरुष यानी मैन शब्द की परिभाषा बहादुरी, साहस और कठोरता जैसे उदाहरणों से की गई है। पत्र में कहा गया है कि इस तरह की परिभाषा से महिलाएं हतोत्साहित होंगी और इससे महिलाओं की नकारात्मक तस्वीर पेश होती है। पत्र में लिखा गया कि परिभाषा बदलने से लैंगिक समानता पर बड़ा असर देखा जा सकता है। इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इन दोनों ही शब्दों की परिभाषा अब बदली जा रही हैं। प्रवक्ता ने बताया कि आगामी दिनों में सभी प्लेटफॉर्मों पर ये बदलाव देखे जा सकेंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि इसमें थोड़ा वक्त लगेगा क्योंकि ये रातोंरात नहीं बदले जा सकते हैं।
ऑनलाइन याचिका में 32 हजार हस्ताक्षर
इस संबंध में 32 हजार से भी ज्यादा लोगों ने जियोवानार्डी की ऑनलाइन याचिका पर दस्तखत भी किए हैं। इस याचिका में कहा गया है कि ऑक्सफोर्ड की इंगलिश डिक्शनरी ने वूमन को परिभाषित करने के लिए जो उदाहरण दिए हैं वे बहुत ही निराशाजनक हैं।

होली खेलें मगर सुरक्षित रंगों के साथ

रंगों का त्योहार होली में अब कुछ ही दिन रह गए हैं। इसको लेकर लोगों ने तैयारियां शुरू कर दी है। बात चाहे पकवान बनाने की हो या फिर रंगों और पिचकारियों की खरीदारी की, सभी तैयारियों में लगे हैं। होली का बाजार भी सज कर तैयार हो चुका है। हम सभी जानते हैं कि बाजार में कई तरह के केमिकल वाले रंग बिकते हैं, जिससे होली खेलने पर हमारी त्वचा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में हमें हर्बल रंगों का चुनाव करना चाहिए। अब चुनौती ये है कि हर्बल रंगों की पहचान कैसे करें। रंगों की खरीदारी करते हुए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे दुकानदार हमें केमिकल युक्त रंग देकर ठग ना पाए।रंगों की खरीदारी की बात आती है, तो हमारी टेंशन इस बात को लेकर बढ़ जाती है कि हम असली रंगों की पहचान कैसे करें! आइए, जानते हैं इस बारे में विस्तार से और साथ ही शुभजिता प्रतिनिधि दीपा ओझा ले चल रही हैं रंगों के बाजार में –

पैकेजिंग को जाँचें
रंग खरीदते वक्त उसकी पैकेजिंग की अच्छे से जांच करें। पैकेजिंग पर रंगों को बनाने में उपयोग हुई सामग्रियों को ध्यान से पढ़ें। अगर उसमें यह लिखा है कि रंग का निर्माण गुलाब, हल्दी, आदि सामग्रियों को लेकर किया गया है, तो वह कलर नैचुरल होगा। आप उसे खरीद सकते हैं।

रंगो को ध्यान से देखकर उसका चुनाव करें
केमिकल वाले रंगों में स्पार्कल होता है, जिससे ये रंग काफी चमकीले दिखते हैं। चमकीलेपन से इसका पता दूर से ही देखकर लगाया जा सकता है। ऐसे में खरीदारी के दौरान आप रंगों को हाथ में उठाकर देखें कि उसमें स्पार्कल तो नहीं है। कुदरती रंग हल्के होते हैं। डिब्बाबंद रंगों के बारे में पता करना है कि यह कुदरती है या नहीं, तो आप इस बाबत दुकानदार से पूछ सकते हैं।
पैच टेस्ट
अगर आपको पता करना है किन-किन रंगों के प्रयोग से आपकी त्वचा पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में आप अपना स्किन पैच टेस्ट करवाइए। इससे आप को पता चल जाएगा किस तरह के रंगों से आपकी स्किन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एक्सपायरी डेट को जरूर जाँचें
रंगों की खरीदारी के दौरान इस बात का जरूर ध्यान रखिए कि उस पर एक्सपायरी डेट लिखी हुई है या नहीं। आमतौर पर नैचुरल रंगों में प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इसकी एक्सपायरी डेट 6-7 महीने की होती है।
लैब टेस्ट सर्टिफिकेट
रंग खरीदते हुए इस बात का जरूर ध्यान रखें कि उसके पैकट पर लैब टेस्ट सर्टिफिकेट नंबर जरूर लिखा हो। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑर्गेनिक कलर्स बनाने वाले निर्माता रंगों को लेकर की गयी जाँच के बाद पैकेट पर लैब टेस्ट सर्टिफिकेट नंबर दर्ज करते हैं।

जब निभाना हो सासू माँ से रिश्ता

शादी केवल दो इंसानों को नहीं बल्कि दो परिवारों को जोड़ती है। शादी के बाद जब लड़की अपने ससुराल आती है तो उस दौरान वह परिवार का केंद्र बन जाती है। ऐसे में रिश्तों के भीतर तारतम्यता स्थापित करना उसके लिए एक चुनौती भरा काम हो जाता है। नए परिवार के साथ घुलने-मिलने में थोड़ा समय तो जरूर लगेगा। शादी के बाद नए परिवार में आने के बाद लड़की को सास अगर बहु समझदारी और प्रेम का परिचय दे तो सास के साथ एकजोड़ता स्थापित हो सकती है और कोशिश करिए कुछ इस तरह –
अपना रवैया बदलें
अगर आपकी सास आपके हर काम में कमियां ढूंढतीं हैं और उनकी ये आदत खत्म होने की बजाए दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में जरुरत है कि आप अपने रवैये में बदलाव करें। हर काम में आप उनको सफाई देने की बजाए शांत रहने की कोशिश करें। बेवजह की नोकझोंक उनके साथ बंद कर दें। हो सकता है कि आपके द्वारा प्रतिउत्तर ना करने से आपकी सास का व्यवहार बदल जाए। ऐसे में संयम से काम लेना बेहतर होगा।
तारीफ करने दें
ज्यादा से ज्यादा अपनी सास की तारीफ कीजिए। अगर वो अपनी तारीफ खुद करती हैं तो उनकी हां में हां मिलाइए। ऐसे में आप दोनो की नोकझोंक कब खत्म हो जाएगी पता भी नही चलेगा।
तकरार से बचें पर बात जरूर करें
आपको ऐसा लगता है कि ज्यादा बात करने से सास के साथ झगड़े की आशंका बन जाती है तो समझदारी इसी में है कि चुप रहें। उनको बहस करने का एक भी मौका मत दीजिए। उनके साथ तकरार से करने से बचिए मगर बात बन्द न करें। उनके साथ उनकी तरह बनें….आपसी समझदारी बढ़ेगी।
जरूरत पड़े तो बच्चे को लेकर बात करें
अपने बच्चे और सास के बीच के रिश्ते में बाधा ना बनें मगर जरूरत पड़े तो बात जरूर करें। दादी और पोता-पोती के बीच का रिश्ता काफी मधुर होता है। वो आपसे ज्यादा आपके बच्चों को प्यार करेंगी।  बच्चे अपने ग्रैंड पैरेंट्स से बहुत कुछ सीखते भी हैं। वो उन्हें सही गलत की समझ भी हमेशा देते हैं मगर कई बार लाड़ – प्यार में गलतियाँ नजरअन्दाज भी करते हैं। ऐसी स्थिति में विनम्रता और समझदारी के साथ अपनी बात समझाएँ। बात जरूर बनेगी।
आदेश न दें मगर मदद लें
आप घर की बहू हैं कोई मशीन नहीं कि सारे काम एकसाथ कर लेंगी। आप उतना ही काम करें जितना आप कर सकती हैं। जरूरत से ज्यादा काम की वजह से तनाव, थकान और चिड़चिड़ापन होगा। आप सासू माँ से बात करके अपनी परेशानी बाँट सकते हैं। बात करने के लहजे पर ध्यान दें। प्रेम और विनम्रता से बात करेंगी तो उनको अच्छा लगेगा और वह बिन कहे ही आपकी परेशानी को समझकर आपकी मदद के लिए आ जायेंगी…मगर पहल आपको करनी होगी।

 

वसीम जाफर ने कहा क्रिकेट को अलविदा

नयी दिल्ली : वसीम जाफर ने गत शनिवार को खेल के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर दी। भारतीय टीम के लिए सलामी बल्लेबाजी का मोर्चा संभाल चुके मुंबई के इस खिलाड़ी ने 41 साल की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कहा। भारतीय टीम के लिए 2000 में डेब्यू करने वाले जाफर ने 31 टेस्ट में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए एक दोहरा शतक, पांच शतक और 11 अर्द्धशतकों के बूते 1944 रन बनाए थे। 2006 में वेस्टइंडीज के खिलाफ सेंट जोंस में उन्होंने अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ 212 रन की पारी खेली थी। हालांकि उन्हें सिर्फ दो ही वन-डे में खेलने का मौका मिला। 2008 में आखिरी बार टीम इंडिया के लिए खेलने के बाद वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सक्रिय हो गए। वहां उन्होंने जमकर बवाल मचाया। अपने पूरे करियर में वसीम जाफर ने 434 मैच (टेस्ट, वन-डे, प्रथम श्रेणी, लिस्ट ए) खेलते हुए 72 शतक और 26, 213 रन बनाए। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन से कई रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले जाफर का जन्म 16 फरवरी 1978 को मुंबई में हुआ था। दाएं हाथ के इस शानदार बल्लेबाज को घरेलू भारतीय क्रिकेट का भगवान भी कहा जाता है। करीब दो दशक तक खेलने के बाद भी इस खिलाड़ी के भीतर कभी रन बनाने की भूख खत्म नहीं हुई।
1996/97 में मुंबई की ओर से अपना कॅरियर शुरू करने वाले वसीम ने 9 दिसंबर 2019 को घरेलू क्रिकेट का सबसे बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम किया था। 41 साल की उम्र में 2019-20 का सीजन खेलते हुए जाफर 150 रणजी मैच खेलने वाले भारत के पहले और इकलौते क्रिकेटर बने थे।
यह कारनामा उन्होंने विदर्भ की ओर से आंध्र के खिलाफ किया था। इस सूची में उनके बाद सबसे ज्यादा रणजी मैच खेलने का रिकॉर्ड देवेंद्र बुंदेला के नाम है, जबकि अमोल मजूमदार 136 मैचों के साथ तीसरे स्थान पर हैं। घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड 40 शतक जड़ने वाले वसीम साल 2018 में रणजी ट्रॉफी के इतिहास में 11000 रन बनाने वाले पहले क्रिकेटर बने थे। जाफर ने टेस्ट क्रिकेट में साल 2000 में द. अफ्रीका के खिलाफ अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया था। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने अपना पहला शतक नागपुर (2006) में लगाया था। वसीम जाफर ने पहला फाइनल 1996-97 सीजन में खेला था। मुंबई के लिए 18 साल खेलने के बाद उन्होंने 2015-16 में विदर्भ की तरफ से खेलना शुरू किया।
फर्स्ट क्लास और लिस्ट ए में खेले कुल 342 मैचों में उन्होंने 23,457 रन बनाए हैं। फर्स्ट क्लास (57) और लिस्ट ए (10) दोनों मिलाकर जाफर ने 67 शतक लगाए हैं। वसीम जाफर घरेलू क्रिकेट के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने कभी कोई फाइनल मुकाबला नहीं हारा है।
जाफर 1996-97 से 2012-13 के बीच 8 बार रणजी ट्रॉफी जीतने वाली मुंबई टीम का हिस्सा रहे और फिर लगातार दो बार से (2017-18, 2018-19) उन्होंने विदर्भ को खिताब जितवाने में अहम भूमिका निभाई। बीते सीजन भी उनके बल्ले से 11 मैचों में 69.13 की औसत से 4 सेंचुरी के साथ 1037 रन निकले थे। मई 2019 में वसीम जाफर को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने मीरपुर स्थित अपनी अकादमी के लिए बल्लेबाजी सलाहकार नियुक्त किया था, उनका कार्यकाल अप्रैल 2020 तक का है। बीसीबी ने उनके साथ एक वर्ष का अनुबंध किया था। शुरुआत में वह अंडर-16 और अंडर-19 आयुवर्ग के क्रिकेटरों को टिप्स देते थे। उसके बाद उन्हें भारत के एनसीए की तर्ज पर हाई परफोर्मेंस यूनिट का दायित्व सौंपा जाना था।

पत्नी की सहमति के बिना कोई व्यक्ति किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पत्नी की सहमति के बिना कोई व्यक्ति किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता है। बच्चे को गोद लेने के लिए व्यक्ति को पत्नी की इजाजत लेनी होगी। साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि विधिवत समारोह के बगैर बच्चे को गोद लेने को ‘गोद लेना’ नहीं कहा जा सकता।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि गोद लेना तभी वैध माना जा सकता है जब हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 की धारा 7 और 11 का पालन किया गया हो। किसी बच्चे को गोद लेने के लिए पत्नी की सहमति लेना जरूरी है। साथ ही गोद लेने के समारोह का प्रमाण भी होना चाहिए। पीठ ने आंध्र प्रदेश की महिला एम वानजा द्वारा गोद लिए जाने के समारोह का प्रमाण न देने पर यह मानने से इनकार कर दिया कि उसे किसी ने गोद लिया था। यह कहते हुए पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। याचिकाकर्ता वानजा ने अपने मौसा को ही अपना पिता बताया था लेकिन उसकी मौसी का दावा था कि याचिकाकर्ता उसकी गोद ली हुई बेटी नहीं है।
याचिकाकर्ता ने सम्पत्ति में माँगी थी हिस्सेदारी
दरअसल, यह मामला सम्पत्ति विवाद से जुड़ा है। वानजा ने याचिका दायर कर अपनी मौसी के कब्जे वाली सम्पत्ति पर हिस्सेदारी माँगी थी। याचिकाकर्ता के जैविक माता-पिता की मौत उसके बचपन में ही हो गयी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि माता-पिता की मौत के बाद उसकी मौसी व मौसा ने उसे गोद लिया था। वर्ष 2003 में उसके मौसा की मौत हो गयी। वह गोद ली हुई बेटी के नाते सम्पत्ति में अपनी हिस्सेदारी माँग कर रही थी।
मौसी ने सम्पत्ति का बँटवारा करने से किया इनकार
उसकी मौसी ने अपनी सम्पत्ति का बंटवारा करने से इनकार कर दिया तो वानजा ने ट्रायल कोर्ट में याचिका दायर की लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए उसके दावे को नकार दिया। इसके बाद आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी थी। लिहाजा उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह साबित करता हो कि तय प्रावधानों के तहत उसे गोद लिया गया था। यहाँ तक कि याचिकाकर्ता की दादी का भी यह कहना था कि उसके मौसा व मौसी ने उसे गोद नहीं लिया था बल्कि उसकी परवरिश की थी।

जम्मू-कश्मीरः स्कूली पाठ्यक्रम में जुड़ा नया अध्याय, बच्चे पढ़ेंगे राज्य पुनर्गठन कानून

जम्मू : जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा बोर्ड (जेकेबीओएसई) ने दसवीं कक्षा के राजनीति विज्ञान विषय के पाठ्यक्रम में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 से जुड़ा एक अध्याय शुरू किया है। किताब सामाजिक विज्ञान लोकतांत्रिक राजनीति-2 के अध्याय आठ के चौथे खंड में राज्य के पुनर्गठन से संबंधित अध्याय को शामिल किया गया है। पिछले साल पांच अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटा दिया था और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था।
जोड़े गए नए अध्याय में पिछले साल अगस्त में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उपनियम (1) को छोड़कर अनुच्छेद 370 के सभी खंड निष्प्रभावी होने की जानकारी दी गई है।
पुनर्गठन कानून 31 अक्तूबर, 2019 से प्रभावी हुआ और राज्य दो केंद्र शासित हिस्सों में बंटने के बाद सीधे केंद्र के नियंत्रण में आ गया। अध्याय में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद राज्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के बारे में भी विस्तार से बताया गया है।
इसी अध्याय में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के भारत के साथ आने से लेकर अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा को मिली शक्तियों और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के बारे में भी जानकारी दी गयी है।
ज्ञात हो कि शीत सत्र में फरवरी के अंत में स्कूल खुलने के साथ ही दसवीं कक्षा का नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुआ है, जबकि जम्मू के गर्म क्षेत्रों में दसवीं कक्षा की परीक्षाएं चल रही हैं। इन क्षेत्रों में नया सत्र अप्रैल से शुरू होगा।

स्वाधीनता संग्राम में स्त्रियों ने निभाई थी सशक्त भूमिका, ये हैं संविधान को तराशने वाली महिलाएं

नयी दिल्ली : भारतीय स्वाधीनता संग्राम में स्त्रियों की सशक्त भूमिका थी, जिन्होंने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन में हिस्सा लिया। पहले उनकी भूमिका की सराहना भागीदार की जगह मददगार के रूप में होती थी कि मर्दों के जेल जाने पर उन्होंने परिवार को कैसे मजबूती के साथ संभाला या गुप्त गतिविधियों में भाग लेने वाले क्रांतिकारियों को किस प्रकार शरण दी और प्रेरणास्रोत के रूप में काम किया। परंतु बाद में उनके योगदान का पुनर्मूल्यांकन किया गया और स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी सीधी सहभागिता को पहचाना गया। महात्मा गांधी ने सीता, दमयंती एवं द्रौपदी को स्त्रियों के आदर्श के रूप में देखा, जिनमें गृहस्थ तथा सार्वजनिक कार्यों का अद्भुत सम्मिश्रण था। उनका स्पष्ट मत था कि स्वराज्य की लड़ाई में स्त्रियों की महती भूमिका होगी। प्रारंभ में तो गाँधीजी ने उन्हें खादी, स्वदेशी तथा गरीबों की सेवा जैसे रचनात्मक कार्यों में लगाया, किंतु असहयोग आंदोलन ने भारतीय नारियों की मुक्ति का मार्ग खोल दिया। बड़ी संख्या में स्त्रियां आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगीं।
स्वाभाविक रूप से जब संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया, तो 299 सदस्यों वाली सभा में 15 महिलाएं भी निर्वाचित हुईं। ये थीं- दक्ष्याणी वेलायुधन, अम्मू स्वामीनाथन, हंसा जीवराज मेहता, लीला राय, दुर्गाबाई देशमुख, बेगम एजाज रसूल, कमला चौधरी, सुचेता कृपालानी, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, सरोजिनी नायडु, राजकुमारी अमृत कौर, एनी मैस्केरीन, विजय लक्ष्मी पंडित तथा रेणुका राय। इन सब का जीवन बड़ा तपा-तपाया था, जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। इनकी पृष्ठभूमि अलग-अलग थी। एक ओर जहां विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृतकौर जैसी अभिजात वर्ग की महिलाएं थीं, तो दूसरी ओर दक्ष्याणी जैसी दलित। संविधान सभा की प्रारंभिक बैठकों में अस्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सारगर्भित उद्बोधनों के बाद समा बांधा भारत कोकिला सरोजिनी नायडु ने।
राजेंद्र प्रसाद को बधाई देते हुए उन्होंने एक शेर पढ़ा, बुलबुल को गुल मुबारक, गुल को चमन मुबारक रंगीन ताबियां को रंगे सुखन मुबारक। उन्होंने बाबू सच्चिदानंद सिन्हा तथा बाबू राजेंद्र प्रसाद, दोनों के गुणों की चर्चा करते हुए कहा कि उनके बारे में लिखने के लिए सोने की कलम को मधु में डुबाकर लिखना होगा। बाद में महिला अधिकार से संबंधित कानूनों को बनाने में उन्होंने अहम योगदान दिया। संविधान की शुरुआत होती है ‘हम भारत के लोग’ से और उद्येश्यिका में ये शब्द एक महिला सदस्या पूर्णिमा बनर्जी के सुझाव पर डाले गए, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि संविधान का निर्माण भारत के लोगों ने किया है, विदेशी हुक्मरानों ने नहीं।

दक्ष्याणी वेलायुधन 34 वर्ष की उम्र में संविधान सभा की सबसे कम उम्र की सदस्या बनीं। वह पहली दलित महिला स्नातक थीं। कोचीन के पुलाया समुदाय से आनेवाली दक्ष्याणी ने अलग निर्वाचण क्षेत्र या आरक्षण का समर्थन नहीं किया। नवंबर 1948 में उनका जोरदार भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने आशा व्यक्त की कि अछूत नाम का कोई समुदाय भविष्य में रहेगा ही नहीं। अम्मू स्वामीनाथन बचपन से ही एक क्रांतिकारी थीं। 24 नवंबर 1949 को संविधान सभा में उन्होंने कहा,
‘बाहरी लोग कहते रहे हैं कि भारत ने स्त्रियों को बराबर का हक नहीं दिया। अब हम कह सकते हैं कि जब भारतीयों ने अपना संविधान स्वयं बनाया है, तो उन्होंने महिलाओं को अन्य नागरिकों के साथ बराबरी का हक दिया है।’
हंसा जीवराज मेहता असहयोग एवं स्वदेशी आंदोलनों में सक्रिय रहीं। 1919 में वह पत्रकारिता की पढ़ाई करने इंग्लैंड गईं, जहां उनकी मुलाकात सरोजिनी नायडु से हुई, जो दोनों के बीच आजीवन दोस्ती में बदल गई। संविधान सभा में भारतीय महिलाओं की ओर से राष्ट्रीय ध्वज देश को सौंपने का उन्हें गौरव प्राप्त हुआ। हंसाबेन ने राजकुमारी अमृत कौर के साथ मिलकर समान नागरिक संहिता पर जोर दिया। उन्होंने आरक्षण एवं अलग निर्वाचन क्षेत्र का विरोध करते हुए कहा कि महिलाओं को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक न्याय चाहिए। दुर्गाबाई देशमुख ने 12 साल की उम्र से असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया।
संविधान सभा में उन्होंने पैतृक संपत्ति में स्त्रियों के हक का जोरदार समर्थन किया। बेगम एजाज रसूल एक इंकलाबी महिला थीं, जिन्होंने 1937 में पर्दा का परित्याग कर दिया और एक अनारक्षित सीट से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए चुनी गईं। वह संविधान सभा की अकेली मुस्लिम महिला सदस्या थीं। सुचेता कृपालानी ने 14 अगस्त को संविधान सभा में वंदे मातरम्, सारे जहां से अच्छा तथा जन-गण मन का गान किया। यह जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (नियति के साथ एक मुलाकात) भाषण के ठीक पहले हुआ। मालती नबकृष्ण चौधरी, जिन्हें गाँधी जी प्यार से तूफानी तथा रबींद्रनाथ ठाकुर मीनू कहते थे, लगातार रचनात्मक कामों में सक्रिय रहीं। पति नबकृष्ण चौधरी के साथ मिलकर वह शिक्षा के प्रचार-प्रसार में लगी रहीं।
विजयलक्ष्मी पंडित एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जो कई बार जेल गईं। संविधान सभा में उनका कार्यकाल बमुश्किल आठ महीने का रहा, क्योंकि देश के आजाद होते ही उन्हें सोवियत संघ में भारत की पहली राजदूत नियुक्त किया गया।
भारत सरकार की पहली कैबिनेट मंत्री राजकुमारी अमृत कई महत्वपूर्ण कामों के लिए याद की जाती हैं। संविधान की इन 15 महिला शिल्पियों में कई ऐसी हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी नहीं जानती हैं। किंतु स्वाधीनता संग्राम तथा संविधान निर्माण में उनकी सशक्त भूमिका थी और उनका योगदान अविस्मरणीय है।

(साभार – अमर उजाला)

68 फीसदी महिलाएं खुद करती हैं अपने पैसे का प्रबंध: सर्वेक्षण

नयी दिल्ली : एक सर्वेक्षण के अनुसार 68 फीसदी महिलाएं या तो अपने पैसे का प्रबंधन खुद कर रही हैं या अपने परिवारों के वित्तीय निर्णय में बराबर की भागीदारी निभा रही हैं। ऑनलाइन वित्त सेवाएं उपलब्ध कराने वाली स्क्रिपबॉक्स के सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 10 फीसदी महिलाएं ही वित्तीय निर्णय लेने की जिम्मेदारी अपने परिवार के किसी पुरुष सदस्य को सौंप देती हैं।
सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर महिलाएं मासिक बचत के नियम को मानती हैं। केवल 30 फीसदी महिलाओं ने ही म्यूचुअल फंड जैसे वित्तीय विकल्पों में निवेश करने की बात कही।
600 से अधिक महिलाओं के बीच हुआ सर्वेक्षण
स्क्रिपबॉक्स ने देशभर में 600 से अधिक महिलाओं के बीच फरवरी 2020 में यह सर्वेक्षण किया। इसमें शामिल होने वाली महिलाओं में 70 फीसदी 30 वर्ष से कम आयु की, 24 फीसदी 30 वर्ष से अधिक आयु और बाकी 50 वर्ष की आयु से अधिक की थीं।
80 फीसदी महिलाएं करती हैं मासिक बचत में भरोसा
सर्वेक्षण के अनुसार, ’68 फीसदी महिलाओं ने स्वीकार किया कि वह अपने वित्तीय फैसले खुद लेती है या अपने परिवार के वित्तीय निर्णयों में बराबर की हिस्सेदारी रखती हैं। 47 फीसदी महिलाएं खुद को वित्तीय साक्षर बनाने के लिए डिजिटल माध्यमों पर भरोसा करती हैं। साथ ही ऑनलाइन माध्यम से निजी वित्त प्रबंधन का परामर्श लेती हैं और करीब 80 फीसदी महिलाएं मासिक बचत में भरोसा करती हैं। जबकि 20 फीसदी से अधिक महिलाएं अपनी मासिक आय का करीब आधा तक बचा लेती हैं।’