कोलकाता : पश्चिम बंगाल जिला ऑडिशन प्रतियोगिता में “देश के लिए बोलो “विषय पर भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज के चार विद्यार्थियों का चयन किया गया। फेडरल बैंक के संयोजन में भवानीपुर कॉलेज के प्लेसमेंट सभागार में हुई इस प्रतियोगिता के निर्णायक फेडरल बैंक के ट्रेजर अध्यक्ष शौभिक राय रहे। महानगर कोलकाता के पचास विद्यार्थियों ने” देश के लिए बोलो” विषय पर अपने ऑडिशन दिए। प्रो. मोहित शॉ ने भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को सार्वजनिक रूप से से राष्ट्रीय विषयों पर बोलने के लिए प्रेरित किया और अपनी आजीविका के लिए भविष्य में आने वाले अवसरों के प्रति रुझान पैदा की। सभी प्रतिभागियों को अलग अलग विषयों पर बोलने का अवसर दिया। प्रथम चुने गए दस विद्यार्थियों में से भवानीपुर कॉलेज के चार विद्यार्थी स्वप्निल ठाकुर , दृष्टि, अनुराग धंधानिया और करण ठाकुर जिला स्तर पर चुने गए। सेमी फाइनल और फाइनल स्तर पर पुनः ऑडिशन किए जाएंगे जिसमें कोलकाता महानगर के भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को शामिल किया जाएगा। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम की जानकारी दी हुए डॉ वसुंधरा मिश्र ने। सुयश अग्रवाल, अभिक चक्रवर्ती और रोहित घोष चौधरी के संयोजन में कार्यक्रम संपन्न हुआ।
अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में काव्यपाठ ने मन मोहा
कोलकाता : दो दिवसीय तीसरा अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन बुधवार को कोलकाता के शिषिर मंच में सम्पन्न हुआ। इस समारोह में देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों के साथ-साथ अमेरिका, चेकोस्लोवाकिया, इजराइल, नेपाल, बांग्लादेश की विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों ने भी काव्य-पाठ व आलोचना सत्रों में भाग लिया। काव्यपाठ सत्र की अध्यक्षता सुबोध सरकार ने की। उद्घाटन भाषण गुजराती साहित्यकार डॉ.विनोद जोशी ने दिया । बांग्ला कवयित्री कृष्णा, प्रबोध बंद्योपाध्याय, असमिया के प्रदीप सैकिया, ओडिया की स्वप्ना बेहरा और डॉ.वीणापाणि देवता ने अपनी कविताओं से प्रभावित किया। हिन्दी में मृत्युंजय कुमार सिंह ने ‘नालंद के प्रति’ व डॉ.अभिज्ञात ने ‘केवल आक्सीजन की कमी से नहीं मरते हैं बच्चे’ व रोहिंग्याओं के लिए कविता ‘हाशिए की जगह’ का पाठ कर लोगों का मन मोह लिया।
किताब गली…पुस्तक प्रचार अभियान
गोइन्का पुरस्कारों की घोषणा
बेंगलुरू : कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा इस वर्ष के गोइन्का पुरस्कारों की घोषणा कर दी गयी है। कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह जानकारी दी गयी। दक्षिण भारत के साहित्यकारों को इन पुरस्कारों / सम्मानों से इस वर्ष नवाजा जायेगा।

उन्होंने ने बताया कि इस वर्ष बेंगलुरू की प्रख्यात समाज सेविका व हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं अवदान के लिए “शब्द साहित्यिक संस्था” की संस्थापिक सरोजा व्यास जी को “दक्षिण ध्वजधारी सम्मान” से सम्मानित किया जायेगा। संग-संग इक्कीस हजार राशि का “बाबूलाल गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार” इस वर्ष तिरुवनन्तपुरम की निवासी डॉ. पी. लता जी को उनकी मूल हिन्दी कृति “केरल के हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लिए दिया जायेगा। इक्कीस हजार राशि का “पिताश्री गोपीराम गोइन्का हिन्दी-कन्नड़ अनुवाद पुरस्कार” इस वर्ष हिमांशु जोशी जी की चुनिंदा कहानियों के अनूदित पुस्तक “ओन्दु अर्थपूर्ण सत्य” के लिए मैसूरू की डॉ. जे.एस. कुसुमगीता जी को दिया जायेगा।
इक्कीस हजार राशि का “बालकृष्ण गोइन्का अनूदित साहित्य पुरस्कार” इस वर्ष तमिल में अनूदित कहानी संग्रह “दीप शिखा” के लिए तमिलनाडु की मूल और जयपुर – निवासी भाग्यम शर्मा जी को दिया जायेगा। इक्कीस हजार राशि का “सत्यनारायण गोइन्का अनूदित साहित्य पुरस्कार” इस वर्ष सी. राधाकृष्णन की मूल हिन्दी कृति “गीताशास्त्रम्” को मलयालम में अनूदित के लिए तिरुवनन्तपुरम के डॉ. के.सी. अजय कुमार को दिया जायेगा।
विज्ञप्ति द्वारा यह भी सूचित किया गया है कि बेंगलुरू में आयोजित दिनांक 15 मार्च को दोपहर 3: 30 बजे से एक विशेष समारोह में चयनित साहित्यकारों को पुरस्कृत किया जायेगा और सरोजा व्यास जी को सम्मानित किया जायेगा।
अब कोलकाता में बच्चों के लिए फन ऐंड लर्न क्लब
कोलकाता में बच्चों के लिए अपनी तरह का पहला एकीकृत केंद्र है
प्रबीर कानूनगो सेंटर मुंबई के न्यूरोजन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के साथ पश्चिम बंगाल के मरीजों के लिए न्यूरो पुनर्वास थेरेपी करेगा
कोलकाता : महानगर में प्रबीर कानूनगो सेंटर फॉर चिल्ड्रेन सोशलिजेशन (प्रबीर कानूनगो बाल समाजीकरण केंद्र) बंगाल सर्विस सोसायटी, न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट (मुंबई) और ब्लूमिंग डेल एकेडमी (हाई स्कूल) की एक नयी पहल है। मुख्य रूप से बच्चों के सामाजिक कौशल को विकसित करने पर जोर देनेवाले प्रबीर कानूनगो सेंटर फॉर चिल्ड्रेन सोशलिजेशन (पीकेसी) का उद्घाटन मुम्बई के न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन सेंटर के निदेशक व न्यूरोसर्जन डॉ. आलोक शर्मा ने किया। इसके अलावा, इस समारोह में मशहूर अभिनेत्री पापिया अधिकारी, विधायक सुजन चक्रवर्ती, मेयर परिषद सदस्य मेयर देवव्रत मजूमदार, कॉपोर्रेट पब्लिक रिलेशन विशेषज्ञ रीता भिमानी उपस्थित थीं। पीकेसी हमारे देश में अपनी तरह का पहला केंद्र है, जिसका उद्देश्य एक आनंदपूर्ण वातावरण में स्वस्थ संवाद और सामाजिक आदतों का पोषण करना है।
प्रबीर कानूनगो के पुत्र और अध्यक्ष, बंगाल सर्विस सोसाइटी कृष्णेंदु कानूनगो, ने कहा, ‘‘जब हम तेजी से आगे बढ़ रही दुनिया के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए भागते हैं, तो हमारे बच्चे अकेलेपन के वातावरण में बड़े हो रहे होते हैं, जहाँ उन्हें केवल सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का साथ मिलता है, इसलिए हम बच्चों में पहले से कहीं अधिक उत्परिवर्तन, अवसाद और आक्रामकता के बारे में सुनते हैं। उन्हें किसी से संवाद करने की आवश्यकता है। अभिभावक बनना कठिन है। ऐसे बच्चे का अभिभावक होना और भी कठिन है, जो अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों को सीखने के लिए संघर्ष कर रहा हो या किसी खोल में सिमट गया हो क्योंकि बच्चे के पास संवाद करने के लिए कोई नहीं है। घटनाओं, गतिविधियों, खेलों और वार्तालापों में भागीदारी के साथ-साथ सक्षम चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ताओं का विश्वास, सहायता और समर्थन, इन बच्चों को एक स्वस्थ बचपन में लाने के लिए आवश्यक है। यह ठीक वही है जो हम पीकेसी में कर रहे हैं।’’
पीकेसी 4 -14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को सेवा प्रदान करेगा। केंद्र के दो विंग में गतिविधियों और न्यूरो पुनर्वास उपचारों के माध्यम से सामाजीकरण होंगे। केंद्र के सोशलाइजेशन (समाजीकरण) विंग में पीकेसी द्वारा पेश की जाने वाली गतिविधियों में समूह गेम, फोटोग्राफी, स्टोरी बुक रीडिंग, स्टोरी राइटिंग सेशन, बोर्ड गेम, नेचर वॉक, प्रदर्शन के लिए खुला मंच, हर महीने प्रख्यात व्यक्तियों के साथ बातचीत, बागवानी, पुस्तकालय फिल्म शो, प्रश्नोत्तरी, रचनात्मक पेंटिंग और शिल्प और बहुत कुछ शामिल हैं। सोशलिजेशन विंग की गतिविधियां किसी भी अन्य केंद्र से बहुत अलग और बहुत मामूली शुल्क पर उपलब्ध हैं।
पीकेसी की दूसरी विंग, जो न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट, मुंबई के विशेषज्ञ मार्गदर्शन में स्थापित की जा रही है, मरीजों के लिए न्यूरो पुनर्वास कार्यक्रम मुहैया करवायेगी, इसके तहत स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, प्ले थेरेपी, फिजियोथेरेपी, नृत्य और संगीत थेरेपी की पेशकश की जाएगी। पुनर्वास चिकित्सा जो रोगियों के लिए ऑपरेशन के बाद की जानेवाली देखभाल का हिस्सा है, पुनर्योजी चिकित्सा में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उपचार को सफल व प्रभावी बनाने में संपोषणऔर पुनर्वास का तालमेल बेहद अहम होता है।
यह परियोजना इस मायने में भी विशिष्ट है कि यह अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार धीरज चौधरी के आवास पर स्थित है। मुम्बई के सायन स्थित एलटीएमजी अस्पताल और एलटीएम मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर और न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख और न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. आलोक शर्मा ने कहा, ‘‘ आज तक, ऐसा कोई केंद्र नहीं है, जहां सामाजीकरण को उपचारों के साथ जोड़ा जाता है। इसके अलावा कोलकाता में केवल कुछ ही केंद्र हैं जहां सभी उपचार एक ही छत के नीचे उपलब्ध हैं। बच्चों में ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी आदि जैसे न्यूरोलॉजिकल विकार बढ़ रहे हैं। अब तक हमने पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों के विभिन्न विकारों से पीड़ित लगभग 350 रोगियों का इलाज किया है। आज बच्चों के लिए एकमात्र साथी स्मार्ट फोन और आईपैड है क्योंकि अधिकांश बच्चों के माता-पिता कामकाजी हैं। यह केंद्र सभी बच्चों को स्वस्थ संवाद और उनके अकेलेपन पर काबू पाने का अवसर देगा। इसके अलावा यह गठजोड़ यहां आने वाले बच्चों के लिए चिकित्सा हस्तक्षेप भी सुनिश्चित करेगा। वहीं इस स्थल पर नियमित अंतराल पर न्यूरोजेन की ओर से मेडिकल ओपीडी भी होगा। पूर्वी भारत में बच्चों और रोगियों के लिए ऐसा एकीकृत केंद्र एक वरदान होगा। हमने जो छोटा-सा सर्वेक्षण किया, उससे हमारे ध्यान में यह बात आई कि न केवल पूर्वी भारत में बल्कि नेपाल, बांग्लादेश और भूटान में भी ऐसे केंद्रों का अभाव है। ’’
बंगाल सर्विस सोसायटी के सचिव प्रदीप्त कानूनगो ने कहा, ‘‘सभी उपचार और गतिविधियां सामाजिक कौशल और व्यक्तित्व विकास के लिए निर्देशित हैं। पीकेसी में हम जो करते हैं उसका केंद्र खेल है। हमारी भूमिका एक उपयुक्त आनंदपूर्ण, देखभालपूर्ण, गर्मजोशी और स्वागत करने वाला वातावरण प्रदान कर बच्चों में मित्रता, कौशल-विकास, रचनात्मकता और खेल के माध्यम से खुलने का अवसर प्रदान करना है। हम एक ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जिसमें हमारे बच्चे सहज महसूस करें और उनमें आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान, सहकारी कौशल और स्वतंत्रता विकसित हो सके। यह हमारे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है कि हमारे बच्चों के परिवार क्लब में सहज महसूस करें, इसलिए हम माता-पिता, देखभाल करने वालों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अच्छे संबंधों को विकसित करने और बनाए रखने का प्रयास करते हैं।’’
एक अभिभावक के तौर पर हम अपने बच्चों की सीखने की क्षमता को लेकर चिंतित रहते हैं। सीखना एक ऐसी प्रक्रिया है जो बच्चे की वृद्धि और विकास के अनुरूप होती है। इसलिए जब सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, तो स्वाभाविक है कि माता-पिता चिंतित होने लगते हैं। यह कोई बीमारी नहीं है और न ही विकलांगता। यह एक न्यूरोलॉजिकल रूप से आधारित वृद्धिगत समस्या है जो पढ़ना, लिखना और अंकगणितीय गणनाओं जैसे बुनियादी शिक्षण कौशल में हस्तक्षेप करती है। उन्हें खुद को व्यवस्थित करने, समय प्रबंधन, अमूर्त सोच और स्मृति में कठिनाई हो सकती है। इस तरह की कठिनाई न केवल शिक्षा में, बल्कि उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी समस्याएं पैदा करती हैं, जिससे अलगाव और अकेलापन की समस्या गहराती है। यहां, हम इन बच्चों को न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट मुंबई के विशेषज्ञ मार्गदर्शन के तहत चिकित्सा का अतिरिक्त समर्थन देते हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में काम किया है।
न्यूरोजेन ब्रेन ऐंड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक डॉ. नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कहा, ‘‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस ऑर्डर (एएसडी) बचपन के विकास संबंधी विकारों का एक समूह है, जिसका वर्णन सामाजिक संपर्क और संचार में समस्याओं के आधार पर किया जाता है, जिसके प्रभाव से व्यवहार में कठोरता और दोहराव की समस्या देखने को मिलती है। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। इससे समझने, सोचने की क्षमता, भाषण, बातचीत और संचार, खेलने, सीखने और दूसरों से संबंध मजबूत करने में समस्याएं आती हैं। सामान्य शारीरिक उपस्थिति के बावजूद, बच्चे के दैनिक कामकाज प्रभावित होते हैं। माता-पिता या देखभाल करने वाले के रूप में, सभी को अपने बच्चों के लिए उपचार के सभी संभावित विकल्पों की तलाश होती है। ऑटिज्म प्रबंधन के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक उपचार दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, जिसमें व्यवहार संबंधी कुछ मुद्दों को नियंत्रित करने के लिए दवाइयों के प्रयोग के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप सह व्यावसायिक चिकित्सा, विशेष शिक्षा, भाषण चिकित्सा और फिजियोथेरेपी जैसे नियोजित चिकित्सा कार्यक्रम शामिल होते हैं। न्यूरोजेन प्रत्येक बच्चों के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार के साथ ऑटिस्टिक बच्चों की सफलतापूर्वक मदद करने में सक्षम है। इसी तरह, न्यूरोजेन सेरेब्रल पाल्सी, मस्क्युलर डिस्ट्राफी, इंटेलेक्चुअल डिसबिलिटी रीढ़ की हड्डी की चोट जैसे कई अन्य विकारों का इलाज करने में सक्षम है।
सामाजिक विकास बच्चे के समग्र विकास के कई अन्य हिस्सों से जुड़ा हुआ है, यही कारण है कि कम उम्र में अन्य बच्चों के साथ सामाजीकरण शुरू करना महत्वपूर्ण है। सामाजिक मेलजोल युवा बच्चों को स्वयं की समझ विकसित करने में मदद करता है,और यह भी सीखना शुरू कर देता है कि दूसरे उनसे क्या उम्मीद करते हैं।
अन्य बच्चों के साथ खेलकर, वे ऐसे कौशल सीखते हैं जो उनके पूरे जीवन काम आता है। साझा करना, सीमाएं निर्धारित करना, और समस्याओं को हल करने का गुण सामाजीकरण और बातचीत से आता है। बच्चे अन्य लोगों के लिए सहानुभूति रखना सीखते हैं; यह पहचानने लगते हैं कि कब उनके दोस्त उदास, हताश या खुश हैं! बच्चे अंतत: अपने माता-पिता, भाई-बहन, या यहां तक कि पालतू जानवरों के मामले में भी इन कौशलों का उपयोग करने लगेंगे।
कश्मीरनामा : उम्मीद और अन्त में कुछ अनुत्तरित प्रश्न
भारत में इतिहास लेखन की परम्परा नहीं है..और भ्रांतियों का बड़ा कारण है। सम्भवतः हमारे पूर्वज वर्तमान में रहना पसन्द करते हों और भविष्य की परिकल्पना उनके मष्तिष्क में रही ही न हो..या कभी उनको यह विचार भी न आया हो कि हजारों साल बाद उनसे उनकी प्रामाणिकता का प्रमाण माँगा जायेगा। अगर यह विचार आया होता तो सम्भवतः रामायण या महाभारत के पहले ही उसके लेखन की प्रक्रिया शुरू हो जाती मगर यह भी सही है कि हमें इतिहास के नाम पर जो प्राप्त होता है…वह स्थापत्य और साहित्य में ही प्राप्त होता है…इसके अतिरिक्त हमारे पास हमारे देश के प्राचीन इतिहास के नाम पर ठोस प्रमाण नहीं हैं और बस…इसी का लाभ उठाते हैं हमारे आधुनिक इतिहासकार। होना तो यह चाहिए कि हम किसी भी विचारधारा से हों मगर जब लेखन हो…तो वह निरपेक्ष हो..मतलब जो दायित्व आप पत्रकारों से निभाने की उम्मीद करते हैं, वह जिम्मेदारी बतौर लेखक आपमें होनी चाहिए। निष्पक्ष औऱ निरपेक्ष रहने की जद्दोजहद के बीच जो सॉफ्ट कॉर्नर है…वह बहुत लिखवा भी जाता है और छिपा भी जाता है।
मेरी समझ में लेखन वह है जहाँ लेखक का दृष्टिकोण हावी न हो…2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ पर एक परिचय़ात्मक टिप्पणी सलाम दुनिया में रहते हुए गूगल से उधार ली थी..मगर उसी समय से इच्छा थी कि एक बार यह किताब हाथ में आए..2020 में साल की पहली किताब यही बनी जो हाथ में आई..। अगर जानकारी के लिहाज से देखी जाए तो पुस्तक शानदार है…गहन शोध के बाद लिखी गयी है…हर एक चैप्टर के बाद सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची है..समझौतों का उल्लेख है..बहुत सी बातें और बहुत लोग…ऐसे रहे जो मैंने इस पुस्तक के माध्यम से जाने…मैं उनको नहीं जानती थी..। कश्मीर समस्या को सिलसिलेवार तरीके से समझने में यह किताब बहुत मदद करती है मगर इसके खत्म होते – होते कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
आमुख में जब डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं, ‘कश्मीर समस्या का एक कारण भूगोल है तो दूसरा इतिहास- मुस्लिम बहुल आबादी औॅर भारत पाकिस्तान से मिलती सीमाएँ।’ मगर असल बात वह आगे की पँक्तियों में कहते हैं, ‘आज असल समस्या है अजनबियत औऱ परायेपन का बोध’। लेखक मानते हैं कि यह एक कटु सत्य है कि कश्मीर औऱ उत्तर -पूर्व हमारे देश के ऐसे दो हिस्से हैं जिनके नक्शे में होने को लेकर हम जितने संवेदनशील हैं, वहाँ के हालात, मुश्किलात, आकाँक्षाओं और उम्मीदों के बारे में उतने ही असम्पृक्त। इस किताब में कश्मीर के शैव, बौद्ध परम्परा का स्पष्ट उल्लेख है..यानी कश्मीर में हिन्दू ही पहले से थे…यह एक अकाट्य सत्य है। इस किताब में भ्रष्ट हिन्दू शासकों, मुस्लिम शासकों की क्रूरता..रानियों की व्याभिचारिता और उनके राजनीतिक षडयंत्रों…(देखें..पृष्ठ 29 – बप्पता देवी और मृगावती देवी के मंत्री सुगंधादित्य के साथ सम्बन्ध), रिंचन और कोटा रानी और शाहमीर का प्रसंग (पृष्ठ -41), इस्लाम में भी ऋषि परम्परा का होना (कश्मीर में इस्लाम को लाने वाले नुंग ऋषि), डोगरा, अफगान, मुगल शासकों के अत्याचारों का भी तफ्सील से वर्णन है…मगर बार – बार कश्मीर में मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी का हवाला देते हुए उनकी आजादी की माँग को परोक्ष रूप से जायज ठहराना सही नहीं लगता..। सवाल यह है कि अगर कश्मीर में बहुसंख्यक मुसलमानों की आबादी का हवाला देकर उनके पाकिस्तान में जाने की भावना के खिलाफ नाराजगी नहीं तो बहुसंख्यक हिन्दुओं से इसी आधार पर नाराजगी कैसे हो सकती है और क्यों होनी चाहिए? कश्मीरनामा शेख अब्दुल्ला को नायक की तरह पेश करती है और नेहरू के प्रति भी एक सॉफ्ट कॉर्नर है मगर आरएसएस और संघ परिवार के प्रति उनकी घृणा नहीं छिप पाती…और ऐसी ही जगहों पर सवाल खड़े होते हैं…जब प्रधानमंत्री का घेराव करने वाले जेएनयू के छात्र और विरोधी…लोकतांत्रिक माने जाते हैं तो नेहरू का घेराव करने वाले भाड़े के ट्टटू क्यों हैं लेखक की नजर में, यह स्पष्ट नहीं हो पाया। कश्मीर के लोगों को फिरन और कांगड़ थमाकर उनको लाचार बनाने का काम तो अकबर ने किया मगर क्या वजह है कि सदियाँ बीत जाने के बाद भी कश्मीर के लोग अपने आवरण से बाहर नहीं निकलना चाहते? आप क्यों उम्मीद करते हैं कि आप जिस देश के लोगों को अपना नहीं मान सकते…जो आपकी नजर में बाहरी हैं…वे अपना पेट काटकर आपके राज्य को बचाते रहें…किताब में जूनागढ़ का उल्लेख है मगर एक बात याद रखनी होगी कि आज वहाँ की जनता भी खुद को भारतीय समझती है…भारत से प्यार करती है..इसलिए उसे भी प्यार मिल रहा है।
रही बात मुस्लिम कॉन्फ्रेंस…की जो बाद में अपने हितों को साधने के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस बना तो इसका कारण भारत के प्रति प्रेम नहीं था बल्कि अपना राजनीतिक हित साधना था…जो राज्य अपने हितों…अपनी सुरक्षा के लिए पूरे देश पर निर्भर हो…और इस पर भी कश्मीरियत के नाम पर बिगड़ैल बच्चे की धौंस जमाता रहे…उसके लिए सहानुभूति क्यों होनी चाहिए…?
मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ मुसलमान शाह और राज्यपाल (जैसे शाह ज़ैन-उल-अबिदीन) हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर कई (जैसे सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन) ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर, या राज्य छोड़ने पर या मरने पर मजबूर कर दिया। कहने का मतलब यही है कि जो मुसलमान बने…वह तो हिन्दू ही थे…।
कश्मीरी पंडितों, हिन्दूओं, जगमोहन सबकी एक नकारात्मक छवि है…यह सत्य है कि हिन्दुओं में पाखंड रहे…अत्याचार, निरंकुशता रही…इनमें से किसी का भी समर्थन नहीं किया जा सकता मगर क्या अतीत के अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए वर्तमान नष्ट किया जा सकता है…आप बार – बार मुसलमानों के साथ हुए अन्याय का ब्योरा देते हैं और फिर उनके अपराधों को जस्टिफाई करते हैं.. आपको पैलेट गन दिखते हैं मगर भटके हुए युवाओं के हाथों के पत्थर नहीं देखना चाहते। यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में जब भी कोई आपदा आई..तो भारतीय सेना ही नहीं बल्कि पूरा भारत कश्मीर के साथ खड़ा हुआ मगर बदले में कश्मीर के लोगों से परायेपन के अलावा पूरे देश को क्या मिला? मदन मोहन मालवीय जैसे शख्सियत को आप ‘आग में घी डालने वाला’ बता रहे हैं? यह भी पूछा जाना चाहिए कश्मीरियत की बात करने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस में हिन्दुओं की स्थिति क्या थी? इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि सरदार पटेल कश्मीर पाकिस्तान को देने के हिमायती रहे होंगे? हर युग में हर देश के नियम अलग होते हैं और वर्तमान को ध्यान में रखकर बनते हैं इसलिए सिर्फ डोगरा शासन के समय से चले आ रहा था इसलिए 35 ए को जारी रहना चाहिए. इसका कोई अर्थ नहीं है।
19 जनवरी 1990 की घटना कश्मीर की इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। 19 जनवरी 1990 को नामुराद कट्टरपंथियों ने ऐलान कर दिया कि कश्मीरी पंडित काफिर है। इस ऐलान के साथ कट्टरपंथी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने और इस्लाम कबूल करने के लिए जोर-ज़बरजस्ती करने लगे। कट्टरपंथियों का आतंक कश्मीर मे़ बढता जा रहा था। नतीजतन मार्च 1990 तक लगभग 1 लाख 6 सहस्त्र कश्मीरी पंडितो को अपना घरबार छोड़कर कश्मीर से भागना पड़ा। मार्च 1990 तक कश्मीर में हिंदू समुदाय के हर वर्ग की बड़े पैमाने पर हत्याए हुई। जिसमें हिंदू अधिकारी बुद्धिजीवी से लेकर कारोबारी एवं अन्य लोग भी शामिल थे। कश्मीरी पंडित इस दुनिया की सबसे सहनशील समुदाय है इतने बड़े विस्थापन और अत्याचार के बाद एक भी कश्मीरी पंडित ने ना तो हथियार उठाये और ना ही किसी हिंसक आंदोलन किया। ऐसा उदाहरण विश्व इतिहास में दूसरा नही है।
कश्मीरी पंडितों के मुताबिक, 300 से ज्यादा लोगों को 1989-1990 में मारा गया। इसके बाद भी पंडितों का नरसंहार जारी रहा। 26 जनवरी 1998 में वंदहामा में 24, 2003 में नदिमर्ग गांव में 23 कश्मीरी पंडितों का कत्ल किया गया। तीस साल बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुए किसी भी केस में आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी। हैरानी की बात यह कि सैकड़ों मामलों में तो पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पलायन के बाद, कश्मीरी पंडितों के घरों की लूटपाट की गई, कई मकान जलाए गए। कितने ही पंडितों के मकानों, बाग-बगीचों पर कब्जे किए गए। कई मंदिरों को तोड़ा गया और जमीन भी हड़पी गई। इन सब घटनाओं का आज तक पुलिस में केस दर्ज नहीं हुआ।
कश्मीरी पंडितों के पलायन की जिम्मेदारी भी जगमोहन पर डालने का प्रयास है..मगर कार्रवाई न होती..तब क्या होता..सबसे बड़ी बात क्या कश्मीर का मतलब सिर्फ मुसलमान है…आजादी है…और अगर ऐसा ही है तो जम्मू और लद्दाख के हितों का क्या…? यह सही है कि कश्मीर का शोषण किया गया…सभी ने किया मगर खुद को कश्मीरियों का रहनुमा मानने वालों ने कश्मीर का कब भला किया…धारा 370 तो 70 साल तक रही तो क्यों नहीं कश्मीर खुशहाल हुआ…क्या यह सच नहीं है कि शेख अब्दुल्ला से लेकर फारुक औऱ अब उमर अब्दुल्ला से लेकर मुफ्ती मोहम्मद सईद और अब महबूबा मुफ्ती के लिए कश्मीर उनकी तिजोरियाँ गर्म करने वाला और बादशाहत बरकरार रखने वाले इक्के के अतिरिक्त कुछ नहीं और कश्मीर का सबसे अधिक शोषण तो इन कश्मीरी नेताओं ने ही किया है। कश्मीर में आर्थिक भ्रष्टाचार की कहानियाँ भी कम नहीं…70 साल तक कश्मीर का मतलब कश्मीर घाटी ही रहा है….जम्मू और लद्दाख तो आपकी नजर में होकर भी नहीं थे..उनका प्रतिनिधित्व नहीं रहा…पूछा जाना चाहिए कश्मीर में नेता जब उसके थे…तो वहाँ के लोग इतने पिछड़े कैसे रह गये…क्यों शिक्षा या स्वास्थ्य पर सही तरीके से काम नहीं हुआ।
दफ्तरों में ऑफिस पॉलिटिक्स का एक तरीका यह भी है कि जिसे बर्बाद करना हो…उसे दूसरों से अलग कर दो और सारी दुनिया से काट दो…इतनी तारीफ करो कि वह खुद में ही रहे. फिर वह पूरी तरह निर्भर हो जाएगा…तुम्हारा गुलाम बन जाएगा…अपना विवेक ताक पर रखकर अपना अस्तित्व भूलकर तुम्हारे लिए खुद को लुटा देगा…बस उसे एक झुनझुना पकड़ाने की जरूरत है और एक ऐसी असुरक्षा की भावना पैदा करने की जरूरत है कि वह हर जगह खुद को इतना असुरक्षित समझे कि सही और गलत का फर्क करना भूल जाए…वही सुने जो उसे अच्छा लगे और वही करे जो आप चाहते हो…. या खुद वह चाहता हो.. कश्मीरनामा पढ़ते हुए मुझे कश्मीर और कश्मीर के लोगों पर यह थ्योरी सटीक लगी…।
तथ्य़ों और इतिहास की जानकारियों से भरी पुस्तक हाथ में लेते ही उम्मीद जगती है…काफी कुछ आप जानते हैं मगर अन्त तक आते – आते आप सवालों में उलझ जाते हैं। न चाहते हुए भी सवाल उठते हैं…क्या पुस्तक का उद्देश्य संघ की भर्त्सना, हिन्दू राष्ट्रवाद की आलोचना, शेख अब्दुल्ला को नायक बनाना या नेहरू की गलतियों पर परदा डालना है…। क्या कश्मीरी पंडितों के अन्याय की कहानी का मकसद उनके पलायन औऱ नरसंहार को भुलाना है और अलगाववादी ताकतों और आजादी के नारों का समर्थन है…मुझे उत्तर नहीं मिले। आप बहुसंख्यक का हवाला देकर अगर परोक्ष रूप से कश्मीर की आजादी का समर्थन करते हैं तो आपको हिन्दू राष्ट्रवादियों से भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि उनकी माँग का आधार भी वही है जो आपका है।
जरूरी है कि हम जब इतिहास की बात करें…कहें और लिखें तो अपने विचारों को भरसक दूर रखें…और यही नहीं हो पाता और सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
कश्मीरनामा
लेखक – अशोक कुमार पांडेय
प्रकाशक – राजपाल एंड संस
प्रकाशन वर्ष – 2018
शुभजिता युवा प्रतिभा सम्मान – प्रतिभागी – नैना प्रसाद
प्रतियोगिता – काव्य संगीत
कवि – सूरदास
शिक्षण संस्थान – महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
प्रेम की पीर के कवि घनानन्द की कुछ रचनाएँ

- अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ झिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं॥
घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं॥
2. प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार,
बापुरो हहरि वार ही तैं फिरि आयौ है।
ताही एकरस ह्वै बिबस अवगाहैं दोऊ,
नेही हरि राधा, जिन्हैं देखें सरसायौ है।
ताकी कोऊ तरल तरंग-संग छूट्यौ कन,
पूरि लोक लोकनि उमगि उफ़नायौ है।
सोई घनआनँद सुजान लागि हेत होत,
एसें मथि मन पै सरूप ठहरायौ है॥
3.
प्रीतम सुजान मेरे हित के / घनानंद
कवित्त
कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ।
तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार
सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ।
चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो
सुजान रूप-बावरो, बदन दरसायहौ।
बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय, आय
हाय ! कब आनँद को घन बरसायहौ।। 12 ।।
4.
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै
लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।
वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,
वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है।
वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की,
सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।
अनुपमा का प्रेम

ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा- वह एक माधवीलता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु ग्रहण करने से पूर्व सहयोगी को भी (बताने की) आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।
परन्तु सहयोगी उसे न जान सका। न जानने पर भी अनुमान का प्रेम उत्तरोत्तर वृद्धि पाने लगा। अमृत में विष, सुख में दु:ख, प्रणय में विच्छेद चिर प्रसिद्ध हैं। दो-चार दिन में ही अनुपमा विरह-व्यथा से जर्जर शरीर होकर मन-ही-मन बोली- स्वामी, तुम मुझे ग्रहण करो या न करो, बदले में प्यार दो या न दो, मैं तुम्हारी चिर दासी हूँ। प्राण चले जाएँ यह स्वीकार है, परन्तु तुम्हे किसी भी प्रकार नही छोड़ूंगी। इस जन्म में न पा सकूँ तो अगले जन्म में अवश्य पाऊंगी, तब देखोगे सती-साध्वी की क्षूब्द भुजाओं में कितना बल है। अनुपमा बड़े आदमी की लड़की है, घर से संलग्न बगीचा भी है, मनोरम सरोवर भी है, वहाँ चाँद भी उठता है, कमल भी खिलते है, कोयल भी गीत गाती है, भौंरे भी गुंजारते हैं, यहाँ पर वह घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करने लगी। सिर के बाल खोलकर, अलंकार उतार फेंके, शरीर में धूलि मलकर प्रेम-योगिनी बन, कभी सरोवर के जल में अपना मुँह देखने लगी, कभी आँखों से पानी बहाती हुई गुलाब के फूल को चूमने लगी, कभी आँचल बिछाकर वृक्ष के नीचे सोती हुई हाय की हुताशन और दीर्घ श्वास छोड़ने लगी, भोजन में रुचि नही रही, शयन की इच्छा नहीं, साज-सज्जा से बड़ा वैराग्य हो गया, कहानी किस्सों की भाँति विरक्ति हो आई, अनुपमा दिन-प्रतिदिन सूखने लगी, देख सुनकर अनु की माता को मन-ही-मन चिन्ता होने लगी, एक ही तो लड़की है, उसे भी यह क्या हो गया ? पूछने पर वह जो कहती, उसे कोई भी समझ नही पाता, ओठों की बात ओठों पे रह जाती। अनु की माता फिर एक दिन जगबन्धु बाबू से बोली- अजी, एक बार क्या ध्यान से नही देखोगे? तुम्हारी एक ही लड़की है, यह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।
जगबन्धु बाबू चकित होकर बोले- क्या हुआ उसे?
– सो कुछ नही जानती। डॉक्टर आया था, देख-सुनकर बोला- बीमारी-वीमारी कुछ नही है।
– तब ऐसी क्यों हुई जा रही है? – जगबन्धु बाबू विरक्त होते हुए बोले- फिर हम किस तरह जानें?
– तो मेरी लड़की मर ही जाए?
– यह तो बड़ी कठिन बात है। ज्वर नहीं, खाँसी नहीं, बिना बात के ही यदि मर जाए, तो मैं किस तरह से बचाए रहूंगा? – गृहिणी सूखे मुँह से बड़ी बहू के पास लौटकर बोली- बहू, मेरी अनु इस तरह से क्यों घूमती रहती है?
– किस तरह जानूँ, माँ?
– तुमसे क्या कुछ भी नही कहती?
– कुछ नहीं।
गृहिणी प्राय: रो पड़ी- तब क्या होगा? बिना खाए, बिना सोए, इस तरह सारे दिन बगीचे में कितने दिन घूमती-फिरती रहेगी, और कितने दिन बचेगी? तुम लोग उसे किसी भी तरह समझाओ, नहीं तो मैं बगीचे के तालाब में किसी दिन डूब मरूँगी।
बड़ी बहू कुछ देर सोचकर चिन्तित होती हुई बोली- देख-सुनकर कहीं विवाह कर दो; गृहस्थी का बोझ पड़ने पर अपने आप सब ठीक हो जाएगा।
– ठीक बात है, तो आज ही यह बात मैं पति को बताऊंगी।
पति यह बात सुनकर थोड़ा हँसते हुए बोले- कलिकाल है! कर दो, ब्याह करके ही देखो, यदि ठीक हो जाए।
दूसरे दिन घटक आया। अनुपमा बड़े आदमियों की लड़की है, उस पर सुन्दरी भी है; वर के लिए चिन्ता नही करनी पड़ी। एक सप्ताह के भीतर ही घटक महाराज ने वर निश्चित करके जगबन्धु बाबू को समाचार दिया। पति ने यह बात पत्नी को बताई। पत्नी ने बड़ी बहू को बताई, क्रमश: अनुपमा ने भी सुनी। दो-एक दिन बाद, एक दिन सब दोपहर के समय सब मिलकर अनुपमा के विवाह की बातें कर रहे थे। इसी समय वह खुले बाल, अस्त-व्यस्त वस्त्र किए, एक सूखे गुलाब के फूल को हाथ में लिये चित्र की भाँति आ खड़ी हुई। अनु की माता कन्या को देखकर तनिक हँसती हुई बोली- ब्याह हो जाने पर यह सब कहीं अन्यत्र चला जाएगा। दो एक लड़का-लड़की होने पर तो कोई बात ही नही ! अनुपमा चित्र-लिखित की भाँति सब बातें सुनने लगी। बहू ने फिर कहा- माँ, ननदानी के विवाह का दिन कब निश्चित हुआ है?
– दिन अभी कोई निश्चित नही हुआ।
– ननदोई जी क्या पढ़ रहे हैं?
– इस बार बी.ए. की परीक्षा देंगे।
– तब तो बहुत अच्छा वर है। – इसके बाद थोड़ा हँसकर मज़ाक करती हुई बोली- परन्तु देखने में ख़ूब अच्छा न हुआ, तो हमारी ननद जी को पसंद नही आएगा।
– क्यों पसंद नही आएगा? मेरा जमाई तो देखने में ख़ूब अच्छा है।
इस बार अनुपमा ने कुछ गर्दन घुमाई, थोड़ा सा हिलकर पाँव के नख से मिट्टी खोदने की भाँति लंगड़ाती-लंगड़ाती बोली- विवाह मैं नही करूंगी। – माँ ने अच्छी तरह न सुन पाने के कारण पूछा- क्या है बेटी? – बड़ी बहू ने अनुपमा की बात सुन ली थी। खूब जोर से हँसते हए बोली- ननद जी कहती हैं, वे कभी विवाह नही करेंगी।
– विवाह नही करेगी?
– नही।
– न करे? – अनु की माता मुँह बनाकर कुछ हँसती हुई चली गई। गृहिणी के चले जाने पर बड़ी बहू बोली- तुम विवाह नही करोगी?
अनुपमा पूर्ववत गम्भीर मुँह किए बोली- किसी प्रकार भी नहीं।
– क्यों?
– चाहे जिसे हाथ पकड़ा देने का नाम ही विवाह नहीं है। मन का मिलन न होने पर विवाह करना भूल है! बड़ी बहू चकित होकर अनुपमा के मुँह की ओर देखती हुई बोली- हाथ पकड़ा देना क्या बात होती है? पकड़ा नहीं देंगे तो क्या ल़ड़कियां स्वयं ही देख-सुनकर पसंद करने के बाद विवाह करेंगी?
– अवश्य!
– तब तो तुम्हारे मत के अनुसार, मेरा विवाह भी एक तरह की भूल हो गया? विवाह के पहले तो तुम्हारे भाई का नाम तक मैने नही सुना था।
– सभी क्या तुम्हारी ही भाँति हैं?
बहू एक बार फिर हँसकर बोली- तब क्या तुम्हारे मन का कोई आदमी मिल गया है? अनुपमा बड़ी बहू के हास्य-विद्रूप से चिढ़कर अपने मुँह को चौगुना गम्भीर करती हुई बोली- भाभी मज़ाक क्यों कर रही हो, यह क्या मज़ाक का समय है?
– क्यों क्या हो गया?
– क्या हो गया? तो सुनो… अनुपमा को लगा, उसके सामने ही उसके पति का वध किया जा रहा है, अचानक कतलू खाँ के किले में, वध के मंच के सामने खड़े हुए विमला और वीरेन्द्र सिंह का दृश्य उसके मन में जग उठा; अनुपमा ने सोचा, वे लोग जैसा कर सकते हैं, वैसा क्या वह नही कर सकती? सती-स्त्री संसार में किसका भय करती है? देखते-देखते उसकी आँखें अनैसर्गिक प्रभा से धक्-धक् करके जल उठीं, देखते-देखते उसने आँचल को कमर में लपेटकर कमरबन्द बाँध लिया। यह दृश्य देखकर बहू तीन हाथ पीछे हट गई। क्षण भर में अनुपमा बगल वाले पलंग के पाये को जकड़कर, आँखें ऊपर उठाकर, चीत्कार करती हुई कहने लगी- प्रभु, स्वामी, प्राणनाथ! संसार के सामने आज मैं मुक्त-कण्ठ से चीत्कार करती हूँ, तुम्ही मेरे प्राणनाथ हो! प्रभु तुम मेरे हो, मैं तुम्हारी हूँ। यह खाट के पाए नहीं, ये तुम्हारे दोनों चरण हैं, मैने धर्म को साक्षी करके तुम्हे पति-रूप में वरण किया है, इस समय भी तुम्हारे चरणों को स्पर्श करती हुई कह रही हूँ, इस संसार में तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी पुरुष मुझे स्पर्श नहीं कर सकता। किसमें शक्ति है कि प्राण रहते हमें अलग कर सके। अरी माँ, जगत जननी…!
बड़ी बहू चीत्कार करती हुई दौड़ती बाहर आ पड़ी- अरे, देखते हो, ननदरानी कैसा ढंग अपना रही हैं। देखते-देखते गृहिणी भी दौड़ी आई। बहूरानी का चीत्कार बाहर तक जा पहुँचा था- क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हो गया? कहते गृहस्वामी और उनके पुत्र चन्द्रबाबू भी दौड़े आए। कर्ता-गृहिणी, पुत्र, पुत्रवधू और दास-दासियों से क्षण भर में घर में भीड़ हो गई। अनुपमा मूर्छित होकर खाट के समीप पड़ी हुई थी। गृहिणी रो उठी- मेरी अनु को क्या हो गया? डॉक्टर को बुलाओ, पानी लाओ, हवा करो इत्यादि। इस चीत्कार से आधे पड़ोसी घर में जमा हो गए।
बहुत देर बाद आँखें खोलकर अनुपमा धीरे-धीरे बोली- मैं कहाँ हूँ? उसकी माँ उसके पास मुँह लाती हुई स्नेहपूर्वक बोली- कैसी हो बेटी? तुम मेरी गोदी में लेटी हो।
अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़ती हुई धीरे-धीरे बोली- ओह तुम्हारी गोदी में? मैं समझ रही थी, कहीं अन्यत्र स्वप्न- नाट्य में उनके साथ बही जा रही थी? पीड़ा-विगलित अश्रु उसके कपोलों पर बहने लगे।
माता उन्हें पोंछती हुई कातर-स्वर में बोली- क्यों रो रही हो, बेटी?
अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़कर चुप रह गई। बड़ी बहू चन्द्रबाबू को एक ओर बुलाकर बोली- सबको जाने को कह दो, ननदरानी ठीक हो गई हैं। क्रमश: सब लोग चले गए।
रात को बहू अनुपमा के पास बैठकर बोली- ननदरानी, किसके साथ विवाह होने पर तुम सुखी होओगी? अनुपमा आँखें बन्द करके बोली- सुख-दुख मुझे कुछ नही है, वही मेरे स्वामी हैं…
– सो तो मैं समझती हूँ, परन्तु वे कौन हैं?
– सुरेश! मेरे सुरेश…
– सुरेश! राखाल मजमूदार के लड़के?
– हाँ, वे ही।
रात में ही गृहिणी ने यह बात सुनी। दूसरे दिन सवेरे ही मजमूदार के घर जा उपस्थित हुई। बहुत-सी बातों के बाद सुरेश की माता से बोली- अपने लड़के के साथ मेरी लड़की का विवाह कर लो। सुरेश की माता हँसती हुई बोलीं- बुरा क्या है?
– बुरे-भले की बात नहीं, विवाह करना ही होगा!
– तो सुरेश से एक बार पूछ आऊँ। वह घर में ही है, उसकी सम्मति होने पर पति को असहमति नही होगी। सुरेश उस समय घर में रहकर बी.ए.की परीक्षा की तैयारी कर रहा था, एक क्षण उसके लिए एक वर्ष के समान था। उसकी माँ ने विवाह की बात कही, मगर उसके कान में नही पड़ी। गृहिणी ने फिर कहा- सुरो, तुझे विवाह करना होगा। सुरेश मुँह उठाकर बोला- वह तो होगा ही! परन्तु अभी क्यों? पढ़ने के समय यह बातें अच्छी नहीं लगतीं। गृहिणी अप्रतिभ होकर बोली- नहीं, नहीं, पढ़ने के समय क्यों? परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह होगा।
– कहाँ?
– इसी गाँव में जगबन्धु बाबू की लड़की के साथ।
– क्या? चन्द्र की बहन के साथ ? जिसे मैं बच्ची कहकर पुकारता हूँ?
– बच्ची कहकर क्यों पुकारेगा, उसका नाम अनुपमा है।
सुरेश थोड़ा हँसकर बोला- हाँ, अनुपमा! दुर वह?, दुर, वह तो बड़ी कुत्सित है!
– कुत्सित कैसे हो जाएगी? वह तो देखने में अच्छी है!
– भले ही देखने में अच्छी! एक ही जगह ससुराल और पिता का घर होना, मुझे अच्छा नही लगता।
– क्यों? उसमें और क्या दोष है?
– दोष की बात का कोई मतलब नहीं! तुम इस समय जाओ माँ, मैं थोड़ा पढ़ लूँ, इस समय कुछ भी नहीं होगा!
सुरेश की माता लौट आकर बोलीं- सुरो तो एक ही गाँव में किसी प्रकार भी विवाह नही करना चाहता।
– क्यों?
– सो तो नही जानती!
अनु की माता, मजमूदार की गृहिणी का हाथ पकड़कर कातर भाव से बोलीं- यह नही होगा, बहन! यह विवाह तुम्हे करना ही पड़ेगा।
– लड़का तैयार नहीं है; मैं क्या करूँ, बताओ?
– न होने पर भी मैं किसी तरह नहीं छोड़ूंगी।
– तो आज ठहरो, कल फिर एक बार समझा देखूंगी, यदि सहमत कर सकी।
अनु की माता घर लौटकर जगबन्धु बाबू से बोलीं- उनके सुरेश के साथ हमारी अनुपमा का जिस तरह विवाह हो सके, वह करो!
– पर क्यों, बताओ तो? राम गाँव में तो एक तरह से सब निश्चिन्त हो चुका है! उस सम्बन्ध को तोड़ दें क्या?
– कारण है।
– क्या कारण है?
– कारण कुछ नहीं, परन्तु सुरेश जैसा रूप-गुण-सम्पन्न लड़का हमें कहाँ मिल सकता है? फिर, मेरी एक ही तो लड़की है, उसे दूर नहीं ब्याहूँगी। सुरेश के साथ ब्याह होने पर, जब चाहूँगी, तब उसे देख सकूंगी।
– अच्छा प्रयत्न करूंगा।
– प्रयत्न नहीं, निश्चित रूप से करना होगा। पति नथ का हिलना-डुलना देखकर हँस पड़े। बोले- यही होगा जी।
संध्या के समय पति मजमूदार के घर से लौट आकर गृहिणी से बोले- वहाँ विवाह नही होगा।…मैं क्या करूँ, बताओ उनके तैयार न होने पर मैं जबर्दस्ती तो उन लोगों के घर में लड़की को नहीं फेंक आऊंगा!
– करेंगे क्यों नहीं?
– एक ही गाँव में विवाह करने का उनका विचार नहीं है।
गृहिणी अपने मष्तिष्क पर हाथ मारती हुई बोली- मेरे ही भाग्य का दोष है।
दूसरे दिन वह फिर सुरेश की माँ के पास जाकर बोली- दीदी, विवाह कर लो।
– मेरी भी इच्छा है; परन्तु लड़का किस तरह तैयार हो?
– मैं छिपाकर सुरेश को और भी पाँच हज़ार रुपए दूंगी।
रुपयों का लोभ बड़ा प्रबल होता है। सुरेश की माँ ने यह बात सुरेश के पिता को जताई। पति ने सुरेश को बुलाकर कहा – सुरेश, तुम्हे यह विवाह करना ही होगा।
– क्यों?
– क्यों, फिर क्यों? इस विवाह में तुम्हारी माँ का मत ही मेरा भी मत है, साथ-ही-साथ एक कारण भी हो गया है।
सुरेश सिर नीचा किए बोला- यह पढ़ने-लिखने का समय है, परीक्षा की हानि होगी।
– उसे मैं जानता हूँ, बेटा! पढ़ाई-लिखाई की हानि करने के लिए तुमसे नहीं कह रहा हूँ। परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह करो।
– जो आज्ञा!
अनुपमा की माता की आनन्द की सीमा न रही। फौरन यह बात उन्होंने पति से कही। मन के आनन्द के कारण दास- दासी सभी को यह बात बताई। बड़ी बहू ने अनुपमा को बुलाकर कहा- यह लो! तुम्हारे मन चाहे वर को पकड़ लिया है।
अनुपमा लज्जापूर्वक थोड़ा हँसती हुई बोली- यह तो मैं जानती थी!
– किस तरह जाना? चिट्ठी-पत्री चलती थी क्या?
– प्रेम अन्तर्यामी है! हमारी चिठ्ठी-पत्री हृदय में चला करती है।
– धन्य हो, तुम जैसी लड़की!
अनुपमा के चले जाने पर बड़ी बहू ने धीरे-धीरे मानो अपने आप से कहा,
– देख-सुनकर शरीर जलने लगता है। मैं तीन बच्चों की माँ हूँ और यह आज मुझे प्रेम सिखाने आई है।
इश्किया गजानन मंदिर, जहाँ हर प्रेमी जोड़ा माँगता है मुरादें
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अलग-अलग मापदंडों और पर्यटन के लिहाज से विश्व के जिन 52 श्रेष्ठ पर्यटन स्थलों की सूची जारी की है, उनमें भारत के जोधपुर शहर को 15वां स्थान मिला है। वैसे तो जोधपुर शहर कपल्स के बकेट लिस्ट में हमेशा शामिल होता है। और हो भी क्यों न आखिर इतना खूबसूरत शहर जो है। इस शहर का अंदाज ही रूमानी है। जोधपुर शहर के परकोटे में स्थित गणेश जी का मंदिर भी प्रेमी जोड़ों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। यहां कई जोड़े अपनी शादी की मुराद लेकर आते हैं तभी तो स्थानीय लोग इसे इश्किया गजानन का मंदिर कहते हैं।
प्यार करने वाले लोगों के लिए गणेश जी क्यूपिड का रोल अदा करते हैं। इस मंदिर की यह मान्यता है कि मन्नत मांगने पर रिश्ता बहुत जल्द तय हो जाता है और प्यार करने वालों की मुराद पूरी हो जाती है। यहां आने वाले सभी जोड़ों की यही मुराद होती है कि उनके चाहने से उनकी शादी हो जाए। इसी वजह से गणेश जी को इश्किया गजानन कहा जाता है।
इस नाम से पहले गणेश जी के इस मंदिर को गुरु गणपति के नाम से जाना जाता था। स्थानीय लोगों की माने तो शादी से पहले प्रेमी जोड़ा पहली मुलाकात के लिए इस मंदिर में आया करते थे।
दरअसल, इस मंदिर का इस तरह निर्माण किया गया है कि इसके आगे खड़े लोग दूर से किसी को आसानी से नजर नहीं आते थे। इस कारण यहां प्रत्येक बुधवार को प्रेमी युगलों का जमावड़ा लगा रहता है। कपल्स के मिलने का प्रमुख स्थान होने के चलते भी इस मंदिर का नाम इश्किया गजानन मंदिर पड़ गया। आजकल के युवा भी इस मंदिर में अपनी मुराद लेकर आते हैं। समय बदलने के बावजूद प्रेमी जोड़ों की श्रद्धा बरकरार है। जयपुर घूमने आने वाले पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
(साभार – अमर उजाला)




