दंतेवाड़ा: नक्सलियों के गढ़ दंतेवाड़ा में बदलाव की बयार बह रही है। दंतेवाड़ा की युवा पीढ़ी ने बदलाव के लिए शिक्षा को चुना है। इसका असर भी दिख रहा है। दंतेवाड़ा के 68 छात्र-छात्राएं डॉक्टर और इंजीनियर बनेंगे। इनमें ड्रॉपर्स बैच से भी बच्चे शामिल हैं, जिन्होंने अपना सपना साकार किया है। नीट और जेईई की परीक्षा पास करने के बाद छात्र-छात्राओं की खुशी देखी जा सकती है। दंतेवाड़ा से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने सफलता हासिल की है। 68 सफल छात्र-छात्राओं में अधिकांश बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें 12वीं तक की पढ़ाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिली हैं। दरअसल, सभी छू लो आसमान संस्था में पढ़ाई करते थे। दंतेवाड़ा कलेक्टर विनीत नंदनवार ने कहा कि हमने पिछले साल इसकी शुरुआत की थी। अधिकांश बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी पढ़ाई अच्छी नहीं होती है। हमने वैसे बच्चों को सेकंड चांस दिया था। पहली बार रिजल्ट इतना अच्छा आया है। कलेक्टर ने कहा कि इनमें 47 बच्चे ड्रॉपर्स बैच के हैं।कलेक्टर ने कहा कि बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या होती है कि उन्हें करना क्या है। कोई गाइड करने वाला नहीं होता है। कलेक्टर विनीत नंदनवार ने कहा कि मैंने इसे झेला है। मैंने जिले में करीब 2000 से अधिक बच्चों को गाइड किया है। उन्हें मैं बताया कि कैसे आपको पढ़ाई करनी है। इन्हीं चीजों को लेकर हमने मार्गदर्शन कार्यक्रम चलाया है। दंतेवाड़ कलेक्टर विनीत नंदनवार ने बताया कि नक्सल प्रभावित इलाकों से 68 बच्चों ने NEET और JEE में सफलता हासिल की है। उन्होंने बताया कि यह अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसमें ऐसे बच्चे शामिल हैं जिन्हें 12वीं तक की शिक्षा के लिए पर्याप्त सुविधाएं भी नहीं मिली। वहीं, एक सफल छात्रा ने कहा कि यहां अलग से पढ़ाई होती है। उसमें मैंने अलग से रुचि दिखाई है। नीट और जेईई की परीक्षा बहुत कठिन होती है। हम सभी बहुत पिछड़े इलाके से आते हैं। प्रशासन की मदद से हमें बहुत अच्छे शिक्षक मिले। यहां कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। अब हमारे सपने पूरे होंगे।
वॉशिंगटन: आम तौर पर माना जाता है कि हमारी पृथ्वी पूरी तरह गोल है। लेकिन अगर इसका पूरा पानी हटा दिया जाए तो यह जगह-जगह पिचकी और उभरी दिखाई देगी। इसी तरह एक और धारणा है कि पृथ्वी पर सभी जगहों पर गुरुत्वाकर्षण समान है, लेकिन ऐसा नहीं है। वैज्ञानिकों नें हिंद महासागर में एक अनोखी चीज खोजी है, जिसे ग्रेविटी होल कहा जाता है। महासागर की इस गहराई में गुरुत्वकार्षण बल बाकी पृथ्वी से कमजोर पड़ जाता है। ग्रेविटी होल से जुड़ा एक नया अध्ययन सामने आया है, जिसमें दावा किया गया है कि वैज्ञानिकों ने इसके कारण का पता लगा लिया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ग्रेविटी होल प्राचीन समुद्र के अवशेष हैं, जो करोड़ों वर्ष पहले खत्म हो गया। ग्रेविटी होल पृथ्वी की सबसे रहस्यमय गुरुत्वाकर्षण विसंगति मानी जाती है। इसे इंडियन ओशियन जियोइन लो (IOGL) के नाम से जाना जाता है। यह विशाल ग्रेविटी होल 30 लाख वर्ग किमी का इलाका है जो पृथ्वी की क्रस्ट के नीचे 950 वर्ग किमी तक फैला है। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि IOGL में टेथिस महासागर के स्लैब शामिल हैं। क्या है टेथिस महासागर टेथिस महासागर एक प्राचीन महासागर था जो मेसोजोइक युग के दौरान गोंडवाना और लॉरेशिया महाद्वीपों के बीच मौजूद था। यह लंबे समय से खोया हुआ महासागर है जो लाखों साल पहले गृह की गहराई में डूब गया था। स्टडी के प्रमुख लेखक देबंजन पाल और अत्रेयी घोष ने कहा कि अभी तक पहले जो अध्ययन हुए उसमें सिर्फ इस विसंगति के बारे में बताया गया। लेकिन यह नहीं बताया गया कि इसके पीछे का कारण क्या है? अब शोधकर्ताओं ने इसके कारण के बारे में बताने का प्रयास किया है। तीन करोड़ साल पहले बना था
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस ग्रेविटी होल का जवाब पृथ्वी के क्रस्ट के एक हजार किमी नीचे छिपा है। यहां प्रचीन महासागर के ठंडे घने अवशेष अफ्रीका के नीचे तीन करोड़ साल पहले दब गए थे और गर्म पिघली चट्टानों को ऊपर लाने के कारण बने। हालांकि शोधकर्ताओं का यह दावा कंप्यूटर मॉडल पर बना है, जो शायद पर्याप्त न हो।
नई दिल्ली: जिस बाइक का युवाओं को बेसब्री से इंतजार था वो अब खत्म हो गया है। Harley-Davidson की सबसे किफायती बाइक हार्ली – डेविडसन एक्स440 भारतीय बाजार में आ गई है। दिलचस्प बात ये है कि कंपनी ने इस बाइक को महज 2.29 लाख रुपये में लॉन्च किया है। इस बाइक को कंपनी के ऑफिशियल डीलरशिप के जरिए बुक किया जा सकता है। इसके लिए 25 हजार रुपये बतौर बुकिंग अमाउंट जाम करने होंगे। बता दें कि ये पहली ऐसी हार्ली-डेविडसन बाइक है जो पूरी तरह से भारत में बनी है। हार्ली-डेविडसन और हीरो मोटोकॉर्प की साझेदारी से ये पहला मॉडल तैयार किया गया है। लेकिन हार्ली-डेविडसन (Harley-Davidson) बाइक में ऐसा क्या है कि लोग इसके दीवाने हैं। खबरों के मुताबिक, साल 1901 में विलियम एस हार्ली नाम के 21 साल के युवा ने एक फ्लाईव्हील्स के साथ छोटे से इंजन का प्लान बनाया। इस इंजन को एक पैडल साइकिल फ्रेम में यूज के लिए डिजाइन किया गया था। हार्ली और उनके बचपन के दोस्त आर्थर-डेविडसन के भाई वॉल्टर डेविडसन ने मोटर साइकिल पर अगले दो वर्ष तक मेहनत की। ये काम साल 1903 में पूरा हुआ। उन्होंने जो पॉवर साइकिल बनाई वह बिना पैडल के मिडवॉक की साधारण पहाड़ियों को चढ़ने में सक्षम थी। इसके बाद दोनों ने हाईटेक मशीन पर काम शुरू किया। इस पहली हार्ली-डेविडसन बाइक में बड़ा इंजन था। इसी के साथ मशीन का लूप फ्रेम पैटर्न साल 1903 की मिलवॉकी मार्केल मोटरसाइकिल के जैसा था। आज हार्ली-डेविडसन दुनिया की जानी-मानी बाइक कंपनी है और फ़ोर्ब्स के मुताबिक साल 2018 (मई) में इसका मार्केट कैप सात अरब डॉलर तक पहुंच गया था। भारत में इस कंपनी ने हाल में 17 नए मॉडल पेश किए हैं, जिनके दाम 5 लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये के बीच हैं। इस कंपनी की बाइक सुपरबाइक कही जाती हैं और ज़ाहिर है ज़्यादा दाम की वजह से ये ख़ास और रईस तबके की पहली पसंद हैं।
बेंगलुरु: गत चैंपियन भारत ने फाइनल में कुवैत को हराते हुए नौवीं बार सैफ फुटबॉल चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। दोनों ही टीमें 90 मिनट के बाद एक्स्ट्रा टाइम तक 1-1 के स्कोर पर बराबर थी। ऐसे में मैच का नतीजा पेनल्टी शूटआउट से निकला, जहां भारत ने अपने घरेलू दर्शकों के बीच कतर को 5-4 से हराया। इससे पहले सेमीफाइनल में भी भारत ने लेबनान को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हराया था। भारतीय टीम दूसरी बार कुवैत से खेल रही थी, इससे पहले ग्रुप-ए में दोनों टीमों का मुकाबला 1-1 से ड्रॉ रहा था। गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू ने डाइव लगाकर निर्णायक पेनल्टी बचाई और इस तरह भारत ने 5-4 से सैफ फुटबॉल चैंपियनिप का फाइनल जीत लिया। पेनल्टी शूटआउट के पांच दौर के बाद भी स्कोर 4-4 था, जिसके बाद सडन डैथ पर फैसला हुआ। महेश नोरेम ने स्कोर किया और भारत के गोलकीपर गुरप्रीत संधू ने डाइव लगाकर खालिद हाजिया का शॉट बचाकर टीम को जीत दिलाई।
नयी दिल्ली । डोंगरे रेवैया का बचपन काफी मुश्कलों से भरा था। वह पढ़ाई में बेहद तेज थे। लेकिन, घर में आर्थिक तंगी थी। डोंगरे की मां मिड-डे मील का खाना बनाती थीं। दो और भाई-बहनों के साथ उन्होंने अकेले ही डोंगरे को पाला-पोसा। आईआईटी मद्रास में पढ़ने के बाद डोंगरे ने गेट क्लीयर किया था। इसके चलते उन्हें सरकारी कंपनी में नौकरी मिल गई थी। हालांकि, उनके मन में आईएएस बनने की चाहत लगातार बनी हुई थी। वह अपनी मां को इससे कम कुछ भी नहीं देना चाहते थे। रह-रहकर उन्हें अपनी मां का संघर्ष दिखता था। आईआईटी में दाखिले से लेकर आईएएस बनने तक के डोंगरे के सफर में काफी रोड़े आए।
डोंगरे रेवैया तेलंगाना में कुमुराम भीम आसिफाबाद के रहने वाले हैं। एक दिन उनके यहां के जिला कलेक्टर ग्रामीणों की दलीलों को समझने गांव पहुंचे थे। भीड़ के बीच से एक किशोर दो दस्तावेजों के साथ बाहर आया। उस किशोर के एक हाथ में राज्य विश्वविद्यालय का लेटर था। दूसरे में आईआईटी मद्रास का ऑफर लेटर। यह कोई और नहीं डोंगरे रेवैया थे।
अब गेंद कलेक्टरेट के पाले में थी। उसे तय करना था कि वह छात्र का करियर बनाने के लिए आगे बढ़कर मदद करता है कि नहीं। आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्हें सिर्फ 20 हजार रुपये की आर्थिक मदद की जरूरत थी। क्राउडफंडिंग और कलेक्टरेट की मदद से उन्हें कॉलेज में दाखिले के लिए फीस मिल गई। हालांकि, इससे उन्हें आईएएस अधिकारी बनने की प्रेरणा भी मिली।
दरअसल, आईआईटी जेईई में सफलता के बाद भी पैसे की कमी के कारण डोंगरे ने एडमिशन की उम्मीद लगभग खो दी थी। लेकिन, तत्कालीन कलेक्टर डॉ. अशोक कुमार ने उनकी बहुत मदद की। तभी उन्हें इस बात का भी एहसास हुआ कि अगर वह उस पद पर पहुंचे तो गरीब पृष्ठभूमि के लोगों की मदद कर पाएंगे। लगभग एक दशक बाद 29 साल के डोंगरे ने वही मुकाम पा लिया। यूपीएससी सीएसई 2022 की परीक्षा में डोंगरे ने 961 अंक हासिल कर 410वीं रैंक हासिल की।
जब डोंगरे चार साल के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। वह अपने पीछे पत्नी और तीन बच्चों को छोड़ गए थे। गुजारा चलाने के लिए उनकी मां ने 1,500 रुपये के मासिक वेतन पर मिड-डे मील कुक के रूप में काम करना शुरू कर दिया।
डोंगरे का जन्म तेलंगाना के तुंगडा गांव में हुआ। सरकारी स्कूल में वह पढ़े-लिखे। 2017 में आईआईटी मद्रास से केमिकल इंजीनियरिंग में इंटीग्रेटेड कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने 70वीं रैंक के साथ गेट भी क्लीयर किया। इससे उन्हें मुंबई में ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड में नौकरी मिल गई। इन सबके बीच भी आईएएस अधिकारी बनने की उनकी चाहत कम नहीं हुई। 2020 में उन्होंने नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी भी शुरू कर दी। 2021 में उन्होंने अपना पहला अटेम्प्ट दिया था। लेकिन, इसमें वह दो अंकों से चूक गए। अगले अटेम्प्ट पर फोकस करने के लिए डोंगरे ने नौकरी छोड़ दी। इस साल उनकी 410वीं रैंक आई। उनकी मां के लिए इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं थी। यह उनके संघर्ष के सफल होने जैसा था। वह कभी स्कूल नहीं गई थीं। लेकिन, यह जरूर चाहती थीं कि बच्चे पढ़-लिखकर कामयाब हों।
नयी दिल्ली । भारतीय सर्व समाज महासंघ द्वारा सिलाई मशीन वितरण एवं उपहार वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस वितरण समारोह में 250 गरीब महिलाओं को सिलाई मशीन ,10 बालिकाओं को टेबलेट फोन सहित सैकड़ों लोगों को ऑफिस बैग सहित कुल 500 लोगों को उपहार दिए गए । सभा को संबोधित करते हुए केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले भारत सरकार ने संस्था की सराहना की । उन्होंने कहा कि आज जब लोग समाज को तोड़ने का काम कर रहे है ऐसे में इस संस्था के अध्यक्ष रामकुमार वालिया समाज को जोड़ने का कार्य कर रहे है । सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ भाजपा एवं पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम जाजू, दिल्ली विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष डा, योगा नंद शास्त्री एव भारत सरकार के वरिष्ठ अपर सचिव शांत मनु ने संस्था की गतिविधियों एवं अध्यक्ष द्वारा किये जा रहे प्रयासों को सराहा । संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवम पूर्व राज्य मंत्री उत्तराखंड राम कुमार वालिया ने कहा कि महिलाओं को अपने काम से आत्म निर्भर बनाने हेतु ही आज सिलाई मशीन वितरण का कार्य किया गया है । उन्होंने कहा कि भारतीय सर्व समाज महासंघ, के अब लगभग 3 लाख पचास हजार सदस्य हैं। हमें यह तथ्य साझा करते हुए भी खुशी हो रही है कि भारतीय सर्व समाज महासंघ (बीएसएसएम इंडिया) की उपस्थिति पूरे भारत में है। हमारे द्वारा अलग अलग समय पर स्वास्थ्य देखभाल और स्वच्छता, शिक्षा, जागरूकता कार्यक्रम, टूल-किट का वितरण, स्वीइंग मशीन, संगठित स्वच्छता अभियान (स्वच्छता-अभियान), टैबलेट का वितरण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में “बीएसएसएम-इंडिया” द्वारा 10 लाख से अधिक लोगों की मदद की गई है। लड़कियों के लिए लैपटॉप, सार्वजनिक शौचालय का निर्माण, महिला सशक्तिकरण, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, ग्रामीण विकास और जबकि संसाधन, ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों में सुधार का कार्य और उनमें आवश्यक वस्तुओं को वितरित करने का कार्य कर चुके है I इस अवसर पर अन्य वक्ताओं में दिल्ली के पूर्व विधायक सुरेंद्र कमांडो ,वरिष्ठ समाज सेवी मनोज तोमर , बी.के. सिंह चौधरी बीरेंद्र सिंह ,भारतीय सर्व समाज महासंघ के राष्ट्रीय कोर्डिनेटर तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी जितेंद्र गौड़ धोबी ,पश्चिम उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजकुमार रावल , महा मंत्री नरेश रावल पंजाब के कोर्डिनेटर सरदार देवेंद्र सिंह समेत कई अन्य गण्यमान्य अतिथि उपस्थित थे। यह जानकारी संस्था की मीडिया संयोजक (पश्चिम बंगाल) चंद्रप्रभा भाटिया ने दी ।
नयी दिल्ली । साहित्य अकादमी ने इस वर्ष के लिए अपने बाल साहित्य पुरस्कार के 22 प्राप्तकर्ताओं और युवा पुरस्कार के 20 विजेताओं की सूची की घोषणा की है। नेशनल एकेडमी ऑफ लेटर्स ने एक बयान में कहा कि यह सूची साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक की अध्यक्षता में हुई कार्यकारी बोर्ड की बैठक में घोषित की गई। बयान में कहा गया है कि बाल साहित्य पुरस्कार के चयनित पुरस्कार विजेताओं में प्रसिद्ध बच्चों की लेखिका सुधा मूर्ति भी शामिल हैं, जिन्हें ‘ग्रैंडपेरेंट्स बैग ऑफ स्टोरीज’ नामक उनके कहानियों के संग्रह के लिए सम्मानित किया जाएगा।
इसी पुरस्कार की हिंदी भाषा श्रेणी में सूर्यनाथ सिंह को उनके लघु कथा संग्रह ‘कोटुक ऐप’ के लिए चुना गया है।
अनिरुद्ध कनिसेटी को ‘लॉर्ड्स ऑफ द डेक्कन: सदर्न इंडिया फ्रॉम चालुक्यज टू चोलस’ के लिए युवा पुरस्कार दिया जाएगा, जबकि अतुल कुमार राय को उनके उपन्यास ‘चांदपुर की चंदा’ के लिए हिंदी भाषा श्रेणी में यही पुरस्कार मिलेगा।
साहित्य अकादमी ने कहा कि वह मणिपुरी, मैथिली और संस्कृत के लिए युवा पुरस्कार और मणिपुरी के लिए बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की घोषणा बाद में करेगी।
इसने उड़िया के लिए किसी युवा पुरस्कार विजेता और कश्मीरी के लिए बाल साहित्य पुरस्कार की घोषणा नहीं की।
बाल साहित्य पुरस्कार के अन्य विजेता हैं रोथिन्द्रनाथ गोस्वामी (असमिया), श्यामलकांति दास (बंगाली), प्रतिमा नंदी नारज़ारी (बोडो), बलवान सिंह जमोरिया (डोगरी), रक्षाबहन प्रह्लादराव दवे (गुजराती), विजयश्री हलदी (कन्नड़), तुकाराम राम शेट (कोंकणी), अक्षय आनंद ‘सनी’ (मैथिली), प्रिया एएस (मलयालम), एकनाथ अवहद (मराठी)।
मधुसूदन बिष्ट (नेपाली), जुगल किशोर सारंगी (उड़िया), गुरुमीत कार्यालवी (पंजाबी), किरण बादल (राजस्थानी), राधावल्लभ त्रिपाठी (संस्कृत), मानसिंग माझी (संथाली), ढोलन राही (सिंधी), उदयशंकर (तमिल), डीके चादुवुला बाबू (तेलुगु), और मतीन अचलपुरी बाल साहित्य पुरस्कार के शेष दस विजेता हैं।
युवा पुरस्कार के 18 अन्य प्राप्तकर्ता हैं जिंटू गीतार्थ (असमिया), हमीरुद्दीन मिद्या (बंगाली), मैनाओश्री दैमारी (बोडो), सागर शाह (गुजराती), मंजुनायक चल्लूर (कन्नड़), निघाट नसरीन (कश्मीरी), तन्वी कामत बम्बोलकर (कोंकणी) ), गणेश पुथु (मलयालम), विशाखा विश्वनाथ (मराठी), नैना अधिकारी (नेपाली), संदीप (पंजाबी), देवीलाल महिया (राजस्थानी), बापी टुडू (संथाली), मोनिका जे पंजवानी (सिंधी), राम थंगम (तमिल), जॉनी तक्केदासिला (तेलुगु), धीरज बिस्मिल (डोगरी) और तौसीफ बरेलवी जो इसे उर्दू के लिए प्राप्त करेंगे। दोनों पुरस्कारों के विजेताओं को बाद में आयोजित एक समारोह में एक उत्कीर्ण तांबे की पट्टिका और प्रत्येक को 50,000 रुपये का चेक मिलेगा।
सनातन परंपरा की उपासना-पद्धति में संकर्षण यानी बलराम और वासुदेव कृष्ण के साथ एक देवी की संयुक्त उपासना का विवरण हमारे विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। इस देवी को पुराकाल में देवी एकानंशा के नाम से जाना जाता था। इन विभिन्न ग्रंथों में इन देवी के विवरण में भिन्नता तो है, किन्तु जिस बात पर सभी ग्रंथ सहमत हैं। वह है कि इनका जन्म गोकुल में नन्द बाबा के घर माता यशोदा के गर्भ से हुआ था। उधर माता देवकी के गर्भ से जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो वसुदेव ने बालक को कंस के कोप से बचाने के लिए नन्द गांव पहुंचा दिया। और बालक कृष्ण के बदले माता यशोदा की इसी पुत्री को ले जाकर कृष्ण की जगह कारागार में लाकर रख दिया था। जहां राजा कंस ने उसे वसुदेव की आठवीं संतान के भ्रम में मारने का प्रयत्न किया, किन्तु इस क्रम में यह बालिका उसके हाथ से छिटककर आकाश में अन्तर्धान हो गयीं। इसके बाद विवरण मिलता है कि यह देवी अष्टभुजी दुर्गा के रूप में विन्ध्याचल में प्रकट हुईं और विन्ध्यवासिनी के रूप में प्रसिद्द हुईं । प्रतिमा शास्त्र की पुस्तकों से विवरण मिलता है कि देवी एकानंशा कुषाणकाल से ही लोकप्रिय रहीं। आगे चलकर देवी एकानंशा की पूजा की यह परम्परा नामभेद के बावजूद आज भी प्रचलित है। एक मान्यता तो यह है कि भगवान जगन्नाथ की तीन मूर्तियों की बीच वाली प्रतिमा यही एकानंशा हैं जो आज देवी सुभद्रा के नाम से पहचानी जाती हैं। महाभारत, जैन ग्रंथ अंगविज्जा, वायुपुराण, ब्राह्मपुराण, विष्णुपुराण, विे्णुधर्मोत्तर पुराण, बअहत्संहिता, कौमुदी महोत्सव, अग्निपुराण, कूर्म पुराण, देवी भागवत, जैन हरिवंश पुराण, कथा सरित्सागर, ब्राह्मवैवर्तपुराण एवं स्कन्दपुराण जैसे ग्रंथों में इस देवी एकानंशा का उल्लेख मिलता है।
अब कंस के हाथों इस बालिका के बच जाने तक की कथा तो लगभग सभी ग्रंथों मे मिलती है। किन्तु उसके बाद की कथा में मत भिन्नता है। वैसे बहुप्रचलित कथा तो यही है कि वह बालिका देवी दुर्गा के रूप में आकाश में विलीन हो गयीं। किन्तु कुछ ग्रंथों के अनुसार यह कन्या यादव राजकुमारी के रूप में चिरकाल तक जीवित रहीं। वहीं वायु पुराण के अनुसार इनका विवाह ऋषि दुर्वासा से हुआ था। अलबत्ता हरिवंश में इन दोनों मतों का उल्लेख मिलता है। किन्तु जहां इस बात पर सभी ग्रंथ एकमत हैं कि श्रीकृष्ण विष्णु के तथा बलराम या संकर्षण शेषनाग के अवतार थे। वहीं देवी एकानंशा अलग अलग ग्रंथों में निद्रा, आर्या, कोटवती, योगनिद्रा, अविद्या या वैष्णवीमाया, भद्रकाली, उमा के देह से उत्पन्न, कमला, निशा या विभावरी, नारायणी माया या महामाया एवं पार्वती का अवतार मानती हैं। इनमें से हरिवंश, विष्णु तथा ब्राह्मपुराण जहां एकानंशा को निद्रा, आर्या या कोटवती जैसी लोकदेवी का अवतार मानती हैं। वहीं वैष्णव व भागवत संप्रदाय इन्हें वैष्णवी महामाया या लक्ष्मी का अवतार मानता है। बात शैवमत की करें तो यहां यह देवी भद्रकाली, उमा और पार्वती का अवतार मानी गयीं हैं। इस देवी के प्रतिमा स्वरूप की बात करें तो हरिवंश के अनुसार, हाथों में त्रिशूल, खड्ग, मद्यपान तथा कमल धारण करने वाली यह देवी चतुर्भुज हैं। इसी विन्ध्याचल वासिनी देवी ने कालांतर में शुम्भ और निशुम्भ का वध किया। तथा अपने इसी रूप में वह विन्ध्य पर्वत की अधिवासिनी के तौर पर पूजित हुईं । जहाँ इन्हें जंगलों एवं समुद्र में डाकुओं से रक्षा करने वाली लोकदेवी की मान्यता वनवासी समाज ने दिया। इनके रूप की बात करें तो यह भी माना गया है कि इनका वर्ण श्रीकृष्ण सा है किन्तु मुखारविन्द बलराम जैसा है। उनका ध्वज मोरपंखों का होगा तथा बलराम एवं श्रीकृष्ण के साथ-साथ वे देवराज इन्द्र की भी बहन कहलाएंगी। वैसे हरिवंश उनके एक ऐसे भी रूप का वर्णन करता है, जो पूर्णतया मानव रूप है। जिन्हें गोपकुमारी के तौर पर वृष्णिसंघ द्वारा पूजा गया। यादवों ने उन्हें यह विशेष सम्मान इसलिए भी दिया कि इन्होंने अपने जान की बाजी लगाकर श्रीकृष्ण को कंस के कोप से बचाया था।
गुप्तकालीन ग्रंथ कौमुदीमहोत्सव में इस देवी विन्ध्यवासिनी के लिए यदुवंशियों की कुलदेवी एकानंगा शब्द का प्रयोग हुआ है। इस नाटक में ही यह विवरण भी मिलता है कि इस देवी का एक मन्दिर पम्पासर में भी था जिसे ‘चण्डिकायतन’ के नाम से जाना जाता था। एक अन्य गुप्तकालीन ग्रंथ ‘बृहत्संहिता’ में इस देवी के जिन तीन रूपों का वर्णन मिलता है। उनमें से एक द्विभुज रूप है, दूसरा चतुर्भुज तो तीसरा अष्टभुज हैं। अपने द्विभुज स्वरूप में उनका बायां हाथ कटिविन्यस्त है और दूसरे हाथ में कमल है। चतुर्भुज रूप में उनके हाथों में कमल, पुस्तक, वर और अक्षमाला विद्यमान हैं। तो अष्टभुजा स्वरूप में देवी के पास कमण्डलु, चाप, कमल, पुस्तक, वर, बाण, दर्पण और अक्षमाला सुशोभित है। इन विवरणों से स्पष्ट है कि यहां देवी का पहला रूप जहां लक्ष्मी वाली परंपरा से इन्हें जोड़ती है वहीं अष्टभुजी स्वरूप देवी दुर्गा का द्योतक हैं। कुषाणकालीन एकानंशा की मूर्तियों में यह देवी द्विभुज हैं जिनके दाहिनी ओर मूसलधारी बलराम तो बायीं तरफ चतुर्भुज वासुदेव यानी श्रीकृष्ण विराजित हैं।
बिहार से मिली उत्तरकुषाणकालीन प्रतिमा इस मायने में अलग हैं कि इसमें तीनों प्रतिमाएं एक ही पत्थर पर उकेरी न होकर अलग-अलग बनी हैं। साथ ही ये प्रतिमाएं आकार में अब तक प्राप्त अन्य प्रतिमाओं से आकार में बड़ी हैं। माना जाता है कि सम्भवत: ये प्रतिमाएं स्वतंत्र रूप से पूजित रही होंगी। इस तरह से यह स्पष्ट है कि बलराम और श्रीकृष्ण के मध्य शोभित यह प्रतिमाएं ‘वृष्णिसंघ- सम्पूजिता’, ‘गोपकन्या’ तथा ‘बलदेव भगिनी’ वाली अवधारणा की परिचायक हैं। हरिवंश में तो एक स्थान पर बलराम और श्रीकृष्ण के बीच खड़ी एकानंशा को हाथ में सोने के कमल को धारण करने वाली पद्मालया लक्ष्मी के समान कहा गया है। इस तरह हम पाते हैं कि देवी सुभद्रा से लेकर लक्ष्मी और देवी दुर्गा तक के अनेक स्वरूपों में इन देवी एकानंशा का वर्णन हमारे धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं। साथ ही प्रतिमा शास्त्र और पुरातात्विक साक्ष्यों में भी उनके इन विभिन्न रूप दृष्टिगत हैं। अलबत्ता आज भले ही यह देवी अल्पज्ञात कही जा सकती हों किन्तु इतिहास के कुछ विशेष कालखंड में इन देवी का विशेष महत्व भी स्पष्ट परिलक्षित हैं।
देवी योगमाया का उल्लेख महाभारत में आता है…कहीं पर उनको विन्ध्यवासिनी देवी का अवतार बताया जाता है, कहीं पर भगवान विष्णु की पराशक्ति…हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचे बगैर इस विषय को लेकर अलग – अलग तथ्य आपके सामने रख रहे हैं…कहा जाता है कि कंस के हाथ से छूटकर कृष्ण की रक्षा करने वाली देवी योगमाया थीं और विन्ध्यवासिनी देवी का अवतार थीं, बाद में इन्होंने कृष्ण की सहायता के लिए सुभद्रा के रूप में रोहिणी के गर्भ से जन्म लिया …आइए जानते हैं..इस विषय पर अलग – अलग तथ्य़ –
हमने अक्सर ये कथा सुनी है कि भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर मे निद्रा में मग्न रहते हैं। तो फिर प्रश्न यही उठता है कि जगत के पालनहार जब निद्रा में ही रहते हैं तो फिर इस जगत का पालन कैसे करते हैं। कौन है वह शक्ति जिसके माध्यम से विष्णु शयन करते हुए भी इस सृष्टि का पालन करते हैं। मार्कण्डेय पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में इस शंका का निवारण किया गया है।
कथा यह है कि जब विष्णु के कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो महादैत्य प्रकट होते हैं और ब्रम्हा को मारने के लिए आगे बढ़ते हैं तो ब्रह्मा किन्ही योगमाया शक्ति का आह्वान करते हैं।ब्रह्मा उन योगमाया शक्ति का आह्वान करते हुए कहते है कि हे योगमाया आपने विष्णु को निद्रा में सुला रखा है । आपने ही उन्हें इस प्रकार विमोहित कर रखा है कि वो संसार को लय में जानकर संसार के पालन से विमुख हो गए हैं। ब्रह्मा उन योगमाया देवी की स्तुति करते हुए उन्हें अर्धमात्रा स्थिता, जगत का आधार और संसार का पालन करने वाली माया शक्ति के रुप में संबोधित करते हैं।
ब्रह्मा कहते हैं कि हे योगमाया तुम्हारी माया के प्रभाव से ही इस संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार का कार्य होता है। आपने ही इस चराचर जगत के हरेक प्राणी को विमोहित कर रखा है । आपके ही प्रभाव से सभी दुखो, सुखों का अनुभव करते हैं। हे देवी आप विष्णु के हदय में वास करती हैं । कृपा करके आप विष्णु को उनकी निद्रा से मुक्त करिए और मधु कैटभ के वध का माध्यम बनिए। ब्रह्मा की स्तुति से पश्चात योगमाया विष्णु के नेत्रों, नासिका और हृदय से निकलती हैं।
योगमाया जिस स्वरुप में निकलती हैं उसका श्री दुर्गा सप्तशती में अद्भुत वर्णन है। वो महाकाली का वो स्वरुप हैं जिनकी दश भुजाएं और दश पैर हैं। वस्तुत: महाकाली ही महामाया के रुप में विष्णु को विमोहित करती हैं और विष्णु को निद्रा में सुला कर खुद संसार का पालन कार्य करती हैं। योगमाया शक्ति का वर्णन द्वापर युग में भी उस वक्त आता है जब वो कृष्ण की बहन के रुप में अवतरित होती हैं और जब कंस उनका वध करने का प्रयास करता है तो वो उसके हाथो से निकल कर उसे शाप देती हैं कि उसे मारने वाला पैदा हो चुका है। इसके बाद योगमाया के शरीर जिसे कंस ने कारागार की दिवारों पर फेंका था उसका धड़ विंध्याचल में जा गिरता है और सिर वर्तमान दिल्ली के महरौली स्थित योगमाया मंदिर में जा गिरता है। इन दोनों ही स्थानों पर योगमाया के सिद्ध मंदिर हैं ।
द्वापर में द्रौपदी को भी माध्यम बना कर महाकाली प्रगट होती हैं और कौरवो के वध का माध्यम बनती हैं। योगमाया महाकाली का वो स्वरुप हैं जिससे इस सृष्टि का पालन कार्य होता है। ये विष्णु की परा और अपरा दोनों ही शक्ति मानी गई हैं। विष्णु इनकी शक्ति के बिना उसी तरह से निष्क्रिय हो जाते हैं जैसे शिव महाकाली की शक्ति के बिना शव हो जाते हैं। योगमाया शक्ति महाकाली की वो शक्ति हैं जो हमारी इच्छाओं को नियंत्रित करती हैं। हम जिस भी प्रकार के मोह में बंधे होते हैं वो योगमाया शक्ति की वजह से ही होते हैं।
भगवान की अचिन्त्य शक्ति का नाम ‘योगमाया’ या ‘महामाया’ है । ‘अचिन्त्य’ का अर्थ होता है अचिंतनीय (unthinkable) । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं ।
जब भी हम भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को पढ़ते हैं तो अक्सर योगमाया का नाम आता है । प्रश्न यह है कि ये योगमाया या महामाया कौन हैं ?
भगवान की ऐश्वर्य-शक्ति है योगमाया
योगमाया भगवान की अत्यन्त प्रभावशाली वैष्णवी ऐश्वर्य-शक्ति है जिसके वश में सम्पूर्ण जगत रहता है । उसी योगमाया को अपने वश में करके भगवान लीला के लिए दिव्य गुणों के साथ मनुष्य जन्म धारण करते हैं और साधारण मनुष्य से ही प्रतीत होते हैं । इसी मायाशक्ति का नाम योगमाया है ।
भगवान जब मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं तब जैसे बहुरूपिया किसी दूसरे स्वांग में लोगों के सामने आता है, उस समय अपना असली रूप छिपा लेता है; वैसे ही भगवान अपनी योगमाया को चारों ओर फैलाकर स्वयं उसमें छिपे रहते हैं । साधारण मनुष्यों की दृष्टि उस माया के परदे से पार नहीं जा सकती; इसलिए अधिकांश लोग उन्हें अपने जैसा ही साधारण मनुष्य मानते हैं ।
गीता (७।२५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘मैं सबके सामने प्रकाशित क्यों नहीं होता, लोग मुझे पहचानते क्यों नहीं ? क्योंकि मैं योगमाया से अपने को ढका रखता हूँ ।’ भगवान की लीला का आयोजन योगमाया ही करती है । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं । यह योगमाया शक्ति वही है, जिसे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में स्वयं अवतरित होने से पूर्व ही अपनी लीला के सम्पादन के लिए भूतल पर भेज दिया था । गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया–
‘गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम् ।’
अर्थात्—हे देवि ! आप ग्वालों और गौओं से सुशोभित व्रज में जाओ और मेरा कार्य-संपादन करो (श्रीमद्भागवत १०।२।७) ।
तब योगमाया ने पूछा—‘भगवन् ! यह व्रज कहां है और वहां क्या करना है ?’
भगवान ने कहा—‘देवि ! व्रज-भूमि मेरी अपनी निज भूमि है । मैं अजन्मा होते हुए भी व्रज में जन्म लेता हूँ । नित्य तृप्त होते हुए भी व्रजांगनाओं की छछिया भर छाछ पीने के लिए उनके इशारों पर नाचता हूँ । व्रजवासियों की रूखी-सूखी, ‘अरे’, ‘ओरे’ की बोली (भाषा) मुझे वेद की स्तुति से भी अधिक प्रिय है । मैं परमेश्वर, सर्वेश्वर हूँ; परन्तु वात्सल्यमयी मां यशोदा मुझे प्रेम की डोरी से लपेट कर बांध देती हैं । उसी व्रज के व्रजराज श्रीनन्दबाबा के घर में उनकी धर्मपत्नी यशोदा के गर्भ से तुम्हें कन्या के रूप में प्रकट होना हैं और मैं अपने समस्त ज्ञान, बल, आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा ।’
भगवान की आज्ञा पाते ही भगवती योगमाया जब व्रजमण्डल में पधारीं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया कि—
‘सभी लोग तुम्हें देवी मानकर तुम्हारे नाम और स्थान पर मन्दिर बनाएंगे । व्रज में दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा, अम्बिका आदि नामों से तुम विख्यात होओगी । तुम लोगों को मुंहमांगे वरदान देने में समर्थ होओगी । तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर भक्त घनघोर शब्द करने वाले घण्टों, लम्बी-लम्बी लाल-पीली-केसरिया ध्वजाओं से एवं गन्ध, अक्षत, फल, फूल, धूप-दीप, मिष्ठान्न, श्रीफल नारियल, भेंट आदि विभिन्न सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे क्योंकि आप ही सर्वकाम वरप्रदायिनी हैं ।’ (श्रीमद्भागवत १०।२।१०-१२) इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के सृजन और विस्तार के लिए योगमाया को रंगमंच तैयार कराने का आदेश दिया ।
भगवान श्रीकृष्ण की बहन हैं योगमाया
कंस का कारागार, भाद्रप्रद कृष्ण अष्टमी की अर्धनिशा में जब श्रीकृष्णचन्द्र का प्राकट्य हुआ, तब वह चतुर्भुज रूप माता देवकी की प्रार्थना करने पर देखते-ही-देखते शिशु बन गया, बंदीगृह की बेड़ियां ताले स्वत: खुल गए । वसुदेवजी अपने उस हृदयघन को गोकुल में जाकर नन्दभवन में रख आए और यशोदाजी को जन्मी योगमाया को ले आए । जब कंस उस कन्या का वध करने के लिए शिला पर पटक रहा था, तब वे योगमाया कंस के हाथ से छूट कर गगन में अष्टभुजा हो गईं । उनके हाथ में धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा—ये आठ आयुध थे ।
उस समय योगमाया ने कंस से कहा—‘तेरे पूर्वजन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए किसी स्थान पर पैदा हो चुका है ।‘
इस प्रकार कह कर वे वहां से अन्तर्ध्यान हो गईं ।
वे ही परमात्मा श्रीकृष्ण की पराशक्ति योगमाया पवित्र भारतभूमि के चारों ओर अनेक नाम व रूपों से निवास कर रहीं हैं । जैसे—
—उत्तर में जम्मू-कश्मीर में वैष्णवी (वैष्णोदेवी)
—पूर्व में असम में कामाख्यादेवी
—दक्षिण में तमिलनाडु में कन्यका (कन्याकुमारी)
—पश्चिम में गुजरात में अम्बिका (अम्बामाता) ।
ये प्रसिद्ध सिद्ध पीठ आज भी भारतवर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान हैं ।
श्रीमद्भागवत के दशम् स्कन्ध में ‘श्रीरासपंचाध्यायी’ के आरम्भ में ही भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया शक्ति की उपासना की है–
भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमल्लिका: ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चके योगमायामुपाश्रित: ।
वैसे तो भगवान सर्वसमर्थ हैं, परन्तु जब श्रीकृष्ण ने शरद् पूर्णिमा की धवल रात्रि में व्रजगोपियों के संग रास लीला की, तब वे रासेश्वरी श्रीराधारानी रूप योगमाया के पास गए; क्योंकि बिना योगमाया के रास नही हो सकता था । रस के समूह को ‘रास’ कहते हैं । ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं; किन्तु रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है । योगमाया ने इस रात्रि को छ: माह के बराबर कर दिया था; इसीलिए यह रासलीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी । जीव और ईश्वर का मिलन ही रास लीला है ।
विद्वानों ने योगमाया के अनेक अर्थ किए हैं । जैसे—
भगवान से बिछड़े हुए संसारी जीवों का भगवान के साथ योग कराने, मिलाने के लिए भगवान के हृदय में जो कृपा है, वह योगमाया है ।
योगमाया है मुरली नाद ।
योगमाया श्रीराधारानी हैं ।
व्रज में योगमाया ‘मां कात्यायनी’ के नाम से जानी जाती हैं । व्रज में श्रीधाम वृन्दावन में श्रीराधा बाग स्थित केशवाश्रम में विराजमान मां कात्यायनी श्रीकृष्ण की कृपाशक्ति का ही नाम है । मनुष्य को यदि सौभाग्य, शोभा, सम्पत्ति की कामना हो तो उसे महामाया मां कात्यायनी का दर्शन, सेवा, पूजन, प्रणाम और भजन करना चाहिए । योगमाया मां कात्यायनी ने सभी के मनोरथ पूर्ण किए हैं ।
व्रज गोपियों ने मां कात्यायनी से अपना अभीष्ट वर मांगा—
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवी पतिं मे कुरु ते नम: ।। (श्रीमद्भागवत, १०-२२-४)
अर्थात्—हे कात्यायनि ! हे महामाये ! हे महायोगिनि ! हे अधीश्वरि ! हे देवि ! नन्दगोपकुमार श्रीकृष्णचन्द्र को हमारा पति बना दीजिए । हम श्रद्धापूर्वक आपको प्रणाम करती हैं ।
महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी ने अपनी ‘सुबोधिनी’ टीका में लिखा है—‘मां कात्यायनी ! आप बड़े भाग वाली हैं, तभी तो भगवान ने आपको व्रज में यशोदाजी के गर्भ में प्रकट होने की आज्ञा दी है । आपको भगवान ने अपनी बहिन बना लिया और वह भी बड़ी बहिन; इसलिए आप महाभागा हैं । आप ही सुयोग बनाने वाली हैं । देवकी के सप्तम गर्भ का आकर्षण करके रोहिणीजी के गर्भ से संकर्षण रूप से प्रकट करने वाली योगिनी आप ही हैं । आप भगवान की अंतरंगा शक्ति है, भगवान पर अधिकार करके आप ही रखती हैं, क्योंकि आप अधीश्वरी हैं । अत: नंदगोपकुमार श्रीकृष्ण को हमारा पति बना दीजिए । कृष्णरूप फल प्रदान करने वाली देवी, हम आपको प्रणाम करती हैं ।’
दु:ख संतप्त मनुष्य का श्रीकृष्ण से अटूट सम्बन्ध कराने में जिनकी कृपा-शक्ति परम आवश्यक है, उन्हीं मां कात्यायनी का आश्रय लेकर मनुष्य परमात्मा श्रीकृष्ण की अविचल भक्ति प्राप्त कर सकता है और जन्म-जन्मान्तरों के कर्म-बंधनों को काटकर भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकता है ।
अब सुभद्रा के बारे में जानते हैं
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श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा का उल्लेख हमें श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत में मिलता है। सुभद्रा श्रीकृष्ण और बलराम की बहन थी। पुरी, उड़ीसा में ‘जगन्नाथ की यात्रा’ में बलराम तथा सुभद्रा दोनों की मूर्तियां भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ ही रहती हैं। जानते हैं उनके संबंध में खास बातें।
1. सुभद्रा वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी की पुत्री थीं, जबकि वसुदेव की की दूसरी पत्नी देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण थे। इस तरह श्रीकृष्ण और सुभद्रा के पिता एक ही थे परंतु माताएं अलग अलग थी। बलराम की माता भी रोहिणी थी।
2. सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। , जबकि बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह कौरव कुल में हो। बलराम के हठ के चलते ही तो कृष्ण ने सुभद्रा का अर्जुन के हाथों हरण करवा दिया था। बाद में द्वारका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ।
3. सुभद्रा से विवाह के बाद अजुन एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। 12 वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इंदप्रस्थ लौट आए।
4. सुभद्रा की तीन बहनें थी। पहली एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं), दूसरी योगमाया (देवकी के गर्भ से सती ने महामाया के रूप में इनके घर जन्म लिया, जो कंस के पटकने पर हाथ से छूट गई थी। कहते हैं, विन्ध्याचल में इसी देवी का निवास है। यह भी कृष्ण की बहन थीं। इसके अलावा चूंकि श्रीकृष्ण द्रौपदी को भी अपनी बहन मानते थे तो वह भी उनकी बहन हुई।
5. सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु था जिसकी महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह फंसने के कारण दुर्योधन, कर्ण सहित कुल सात आठ लोगों ने मिलकर निर्मम हत्या कर दी थी। अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा थी जिसके गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ और परीक्षित का पुत्र जनमेजय था।
(साभार – रिलिजन वर्ल्ड डॉट इन, वेबदुनिया. आराधिका डॉट कॉम )
कोलकाता । दक्षिण कोलकाता के हाजरा पार्क दुर्गोत्सव ने जतिन दास पार्क (हाजरा क्रॉसिंग) ने ढाक वादन के साथ उल्टा रथ के दिन खूंटी पूजा के साथ दुर्गोत्सव की तैयारी आरम्भ कर दी । हाजरा पार्क दुर्गोत्सव शहर में अपने नए यूनिक थीम और मंडप की सजावट की शैली के लिए शहर की आकर्षक पूजाओं में अपना अहम स्थान रखता है। यह पूजा कमेटी विशेष रूप से अपने पंडालों की अनूठी शैली के साथ पूरे वर्ष किए जाने वाले सामाजिक कार्यों के लिए विशेष रूप से जानी जाती है।
इस अवसर पर राज्य के कृषि मंत्री शोभन देव चट्टोपाध्याय और हाजरा पार्क दुर्गोत्सव समिति के संयुक्त सचिव सायन देब चटर्जी समेत कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद थीं।