Monday, July 6, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 154

रिलायंस जियो भारत वी 2 ने 999 रुपये में पेश किया फोर जी फोन

नयी दिल्ली । इंडस्ट्रीज लिमिटेड की टेलिकॉम ब्रांच, रिलायंस जियो ने भारत में एक 4G फोन लॉन्च किया है। जियो के इस नए फोन का नाम ‘जियो भारत वी2’ है।
इसकी कीमत महज 999 रुपये रखी गई है। यूजर्स इस फोन में आसानी से 4G स्पीड के साथ इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
जियो ने एक विज्ञप्ति में कहा, हैंडसेट खरीदने वाले लोग “अन्य ऑपरेटरों के फीचर फोन की पेशकश की तुलना में 30 प्रतिशत सस्ता मासिक प्लान और 7 गुना अधिक डेटा” के पात्र होंगे।
इसके साथ ही जियो ने कहा कि अनलिमिटेड वॉयस कॉल और 14 जीबी डेटा के लिए बेसिक रिचार्ज प्लान की कीमत 123 रुपये प्रति माह रखी गई है, जबकि अन्य ऑपरेटरों के वॉयस कॉल और 2 जीबी डेटा के लिए 179 रुपये का प्लान है।
वार्षिक प्लान में 1,234 रुपये का शुल्क लगेगा, और इसमें असीमित वॉयस कॉल और 168 जीबी डेटा (0.5 जीबी प्रति दिन) शामिल होगा। कंपनी ने कहा, वॉयस कॉल और 24 जीबी डेटा के लिए अन्य ऑपरेटरों के 1,799 रुपये के वार्षिक प्लान की तुलना में यह लगभग 25 प्रतिशत सस्ता है।

श्रावण माह विशेष – जानिए कांवड़ यात्रा का अर्थ, इतिहास, पद्धति, महत्व

कांवड़ यात्रा आरम्भ हो चुकी है । कांवड़ यात्रा हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर सावन की चतुर्दशी यानी कि सावन शिवरात्रि तक होती है। कावड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों द्वारा प्रतिवर्ष मनाई जाती है। इस यात्रा को जल यात्रा भी कहा जाता है क्योंकि इस प्रथा में यात्रियों को कांवड़िया कहा जाता है और कांवड़ हिंदू तीर्थ स्थानों से गंगा जल लाने के लिए हरिद्वार जाते हैं और फिर प्रसाद चढ़ाते हैं। हर साल सावन माह में कांवड़ यात्रा की जाती है। दूर-दूर से कांवड़ यात्री देवभूमि आते हैं। गंगा से जल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान देवभूमि उत्तराखंड में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। पूरी देवभूमि केसरिया हो जाती है। कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तजनों को कांवड़िया कहते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि कांवड़ यात्रा का क्या अर्थ है। ये यात्रा हर साल क्यों की जाती है। तो आइये आज कांवड़ यात्रा के बारे में विस्तार से जाने से पहले हम कांवड़ यात्रा के इतिहास और इसके महत्तव के बारे में बताते हैं….

कांवड़ यात्रा का यह है अर्थ
कंधे पर गंगाजल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर जलाभिषेक करने की परंपरा कांवड़ यात्रा कहलाती है।वहीं आनंद रामायण में भी यह उल्‍लेख किया गया है कि भगवान राम ने भी कांवड़िया बनकर बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था।कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ यात्री वही गंगाजल लेकर शिवालय तक जाते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।
कांवड़ यात्रा आरंभ होने की दो कथा
कहा जाता है कि भगवान परशुराम पहले कांवड़ियां थे। उन्होनें महादेव को प्रसन्न करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जल ले जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से हर साल कांवड़ यात्रा की शुरुआत की गई। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत श्रवण कुमार ने त्रेता युग में की थी। श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान की इच्छा व्यक्त की। ऐसे में श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कंधे पर कांवड़ में बिठा कर पैदल यात्रा की और उन्हें गंगा स्नान करवाया। लौटते समय अपने साथ गंगा जल लेकर आए जिसे उन्होंने भगवान शिव का अभिषेक किया। माना जाता है कि इसके साथ ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।
शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का कारण
पौराणिक काल में जब समुद्र मंथन किया गया था तो समुद्र मंथन से निकले विष को पान कर भगवान शिव ने दुनिया की रक्षा की थी। वहीं इस विष को पीने के काऱण उनका गला नीला पड़ गया था। कहते हैं इसी विष के प्रकोप को कम करने और उसके प्रभाव को ठंडा करने के लिए शिवलिंग पर जलाभिषेक किया जाता है। इस जलाभिषेक से प्रसन्न होकर भगवाना भक्‍तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
इस तैयारी के साथ आते हैं कांवड़ यात्री
कांवड़ बनाने में बांस, फेविकोल, कपड़े, डमरू, फूल-माला, घुंघरू, मंदिर, लोहे का बारिक तार और मजबूत धागे का इस्तेमाल करते हैं। कांवड़ तैयार होने के बाद उसे फूल- माला, घंटी और घुंघरू से सजाया जाता है। इसके बाद गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है। धूप-दीप जलाकर बम भोले के जयकारों ओर भजनों के साथ कांवड़ यात्री जल भरने आते हैं और भगवान शिव को जला जढ़ाकर प्रसन्‍न होते हैं।
कांवड़ यात्रा के लिए नियम
कांवड़ यात्रा में आने के लिए यात्रियों को कुछ नियमों का पालन करना होता है। जिसके लिए उन्हें बिना नहाए कांवड़ को नहीं छूना होता। तेल, साबुन, कंघी का प्रयोग वो यात्रा में नहीं करते। सभी कांवड़ यात्री एक-दूसरे को भोला या भोली कहकर बुलाते हैं। ध्‍यान रखना होता है कि कांवड़ जमीन से न छूए।
कई तरह से की जाती है कांवड़ यात्रा
सामान्य कांवड़में यात्री कहीं भी आराम कर सकता है। लेकिन इस दौरान उन्हें ध्यान रखना होता है कि आराम करने के दौरान उनमकी कांवड़ जमीन से नहीं छूनी चाहिए। इस दौरान कांवड़ स्टैंड पर रखी जाती है। वहीँ, दूसरी ओर डाक कांवड़ में यात्री शुरुआत से शिव के जलाभिषेक तक बगैर रुके लगातार चलते रहते हैं। वहीं इस दौरान शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं वर्जित होती हैं। इसके अलावा खड़ी कांवड़ में भक्त खड़ी कांवड़ लेकर चलते हैं। उनकी मदद के लिए कोई-न-कोई सहयोगी उनके साथ चलता रहता है। इसके विपरीत दांडी कांवड़ में भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। यह बेहद मुश्किल यात्रा होती है, जिसमें कई दिन और कभी-कभी एक माह का समय तक लग जाता है।
कांवड का इतिहास
भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। मान्यता है कि वे सबसे पहले कांवड़ लेकर बागपत जिले के पास “पुरा महादेव”, गए थे। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लेकर भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। उस समय श्रावण मास चल रहा था। तब से इस परंपरा को निभाते हुए भक्त श्रावण मास में कांवड़ यात्रा निकालने लगे।
कई प्रकार की होती है कांवड़ यात्रा
शुरुआत में कांवड़ यात्रा पैदल ही निकाली जाती थी। लेकिन समय के साथ इसके तमाम प्रकार और नियम कायदे सामने आ गए। जानिए उनके बारे में….
सामान्य कांवड़
सामान्य कांवर यात्रा के दौरान शिव भक्त जहां चाहे विश्राम करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. इसके लिए सामाजिक संगठन के लोग कांवड़ियों के लिए पंडाल लगाते हैं, उनके लिए भोजन का प्रबंध करते हैं. विश्राम करने के बाद वह पुनः यात्रा शुरू करते हैं.
खड़ी कांवड़ यात्रा
खड़ी कांवड़ यात्रा सबसे कठिन होती है। इसमें भक्त कंधे पर कांवड़ लेकर पैदल यात्रा करते हुए गंगाजल लेने जाते हैं। इस कांवड़ के नियम काफी कठिन होते हैं। इस कांवड़ को न तो जमीन पर रखा जाता है और न ही कहीं टांगा जाता है। यदि कांवड़िये को भोजन करना है या आराम करना है तो वो कांवड़ को या तो स्टैंड में रखेगा या फिर किसी अन्य कांवडिये को पकड़ा देगा। लेकिन न तो जमीन पर रखेगा और न ही किसी पेड़ की टहनी पर टांगेगा।
झांकी वाली कांवड़
कुछ कांवड़िये झांकी लगाकर कांवड़ यात्रा करते हैं। ये किसी ट्रक, जीप या खुली गाड़़ी में शिव मूर्ति या प्रतिमा रखकर भजन चलाते हुए कांवड़ लेकर जाते हैं। इस दौरान भगवान शिव की प्रतिमा का श्रंगार किया जाता है और लोग भजन पर झूमते हुए यात्रा करते हैं। इस तरह की कांवड़ यात्रा को झांकी वाली कांवड़ कहा जाता है।
डाक कांवड़
डाक कांवड़ वैसे तो झांकी वाली कांवड़ जैसी ही होती है। इसमें भी किसी गाड़ी में भोलेनाथ की प्रतिमा को सजाकर रखा जाता है और भक्त शिव भजनों पर झूमते हुए जाते हैं। लेकिन जब मंदिर से दूरी 36 घंटे या 24 घंटे की रह जाती है तो ये कांवड़िए कांवड़ में जल लेकर दौड़ते हैं। ऐसे में दौड़ते हुए जाना काफी मुश्किल होता है। इस तरह की कांवड़ यात्रा को करने से पहले संकल्प करना होता है।
दांडी कांवड़
दांडी कांवड़ यात्रा के दरमियान शिव भक्त नदी तट से शिव धाम तक की यात्रा दांडी के सहारे पूरी करते हैं. यह सबसे कठिन यात्रा होती है, क्योंकि दांडी यात्रा में कभी-कभी महीनों लग जाते हैं.
कांवड़ यात्रियों के लिए नियम
बिना स्नान किये कांवड़ को स्पर्श नहीं करते.
यात्रा के दरम्यान तेल, साबुन, कंघी का प्रयोग नहीं किया जाता.
यात्रा में शामिल सभी कांवड़ यात्री एक-दूसरे को भोला, भोली अथवा भोले के नाम से पुकारते हैं.
कांवड़ को भूमि से स्पर्श नहीं करना चाहिए.
डाक कांवड़ यात्रा में शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं भी वर्जित होती हैं.
श्रवण कुमार थे पहले कांवड़ यात्री
मालूम हो कि सबसे पहले त्रेता युग में श्रवण कुमार ने ‘कांवड़ यात्रा’ शुरू की थी और तब से ही ‘कांवड़ यात्रा’ चली आ रही है। तो वहीं द्वापर युग में इसका जिक्र है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान ही युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम ने हरिद्वार से गंगाजल लाकर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए ये यात्रा प्रारंभ की थी।
काफी प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ
आपको बता दें कि इस साल ये यात्रा 4 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त तक चलने वाली है। माना जाता है कि कांवड़ के जरिए गंगा जल शिव भगवान को अर्पित करने से भोलेनाथ काफी प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को सारे कष्टों से मुक्त कर देते हैं। कांवड़ यात्रा का जिक्र ‘वाल्मिकी रामायण’ में भी मिलता है।
कांवड़ यात्रा का महत्व
कांवड़ यात्रा एक पवित्र और कठिन यात्रा है जो पूरे भारत के भक्त विशेष रूप से उत्तर भारत में विभिन्न पवित्र स्थानों से गंगा जल लाने के लिए करते हैं, जो गौमुख, गंगोत्री, ऋषिकेश और हरिद्वार हैं। वे पवित्र गंगा में एक पवित्र डुबकी लगाते हैं और वे कांवड़ को अपने कंधों पर ले जाते हैं। कंवर बांस से बना एक छोटा सा खंभा होता है जिसके विपरीत छोर पर घड़े बंधे होते हैं। भक्त उन घड़े को गंगाजल से भर देते हैं और फिर पैदल चलकर अपनी कांवर यात्रा शुरू करते हैं और कुछ भक्त नंगे पांव भी देखे जाते हैं। हालांकि कुछ भक्त इस यात्रा को पूरा करने के लिए साइकिल, स्कूटर, मोटर साइकिल, जीप या मिनी ट्रक का भी उपयोग करते हैं। कांवड़ यात्रा में एक बहुत ही ध्यान देने वाली बात है कि इस यात्रा के दौरान ज्यादातर भक्त भगवा रंग की पोशाक पहनते हैं। पूजा के इस रूप का अभ्यास करके, कांवरिया आध्यात्मिक विराम लेते हैं और अपनी यात्रा के दौरान शिव मंत्र और भजनों का जाप करते हैं। कई एनजीओ और समूह कांवड़ियों को पानी, भोजन, मिठाई, फल, चाय, कॉफी प्रदान करने वाले शिविरों का आयोजन करते हैं और भक्तों के आराम करने की उचित व्यवस्था करते हैं। साथ ही भक्तों के लिए भी चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करते हैं।

(साभार – समाचारनामा)

कोविड-19 के बाद बच्‍चों में बढ़े टाइप-वन डायबिटीज के मामले

एक अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों और किशोरों में टाइप 1 डायबिटीज के मामलों में वृद्धि हुई है । रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्‍चों पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं । जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित यह अध्ययन 19 वर्ष से कम उम्र के 1,02,984 युवाओं सहित 42 रिपोर्ट के आधार पर किया गया ।
टाइप 2 डायबिटीज के मामलों में वृद्धि
अध्ययन के परिणामों से यह पता चला कि टाइप 1 डायबिटीज दर पहले वर्ष से 1.14 गुना अधिक है । कोविड महामारी की शुरुआत के बाद दूसरे वर्ष में यह 1.27 गुना अधिक है । बच्चों और किशोरों में टाइप 2 डायबिटीज के मामलों में भी वृद्धि हुई है । अध्ययन में डायबिटीज केटोएसिडोसिस (डीकेए) की उच्च दर भी पाई गई. यह दर महामारी से पहले की तुलना में 1.26 गुना अधिक है. टाइप 1 डायबिटीज सबसे आम और गंभीर है, जो जीवन के लिए खतरा हो सकता है । यह तब विकसित होता है जब शरीर में रक्त शर्करा को ऊर्जा के रूप में उपयोग करने के लिए कोशिकाओं में पर्याप्त इंसुलिन नहीं होता है ।
किशोरों में पाए गए डायबिटीज के लक्षण
कनाडा में टोरंटो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम ने कहा कि डायबिटीज से पीड़ित बच्चों और किशोरों की बढ़ती संख्या के लिए संसाधनों में वृद्धि की आवश्यकता है । हमने महामारी के दौरान बच्चों और किशोरों में डायबिटीज के लक्षण पाए हैं । टीम ने कहा, यह चिंताजनक है. यह लंबे समय तक मरीज को प्रभावित करता है । इससे मृत्यु का खतरा भी बना रहता है ।
वहीं, शोधकर्ताओं ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि मामलों में वृद्धि किस कारण से हुई है, कुछ सिद्धांत हैं जिनमें यह कहा गया है कि कोविड संक्रमण के बाद बच्‍चों में मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है । बच्‍चों की जीवनशैली में बदलाव और तनाव भी इसका कारण हो सकता है ।

बाल झड़ने से बचाने में सहायक हैं डीआईवाई हेयर सीरम

मौसम का बदलाव, देखभाल की कमी और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली की आदतें बालों को जड़ से कमजोर बना देती हैं। बालों के तेजी से झड़ने से तनाव बढ़ता है और धीरे-धीरे वे गुच्छों में झड़ने लगते हैं। कंपनियां बालों की देखभाल करने वाले उत्पादों की तुलना में सर्वोत्तम परिणाम का दावा करती हैं, लेकिन उनमें मौजूद रसायनों के कारण नुकसान होने का डर रहता है। वैसे, घरेलू नुस्खों से बालों की बेहतर देखभाल की जा सकती है।आयुर्वेद में ऐसी कई चीजें बताई गई हैं जिन्हें घर पर ही तैयार किया जा सकता है। आइए आपको बताते हैं कैसे बनाया जा सकता है होममेड हेयर सीरम. साथ ही इसे इस्तेमाल करने का तरीका क्या है –
एलोवेरा जेल और नारियल तेल सीरम
एलोवेरा और नारियल का तेल त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद होता है। इनमें विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो बालों को नुकसान से बचाते हैं और बालों के विकास को बढ़ाते हैं।
घर पर हेयर सीरम कैसे बनाएं
आधा कप एलोवेरा जेल लें और इसमें मिला लें। इसे एक कटोरे में निकालें और एक चम्मच नारियल तेल, विटामिन ई तेल और आर्गन ऑयल मिलाएं। खुशबू के लिए आप इसमें एसेंशियल ऑयल मिला सकते हैं। अच्छी तरह मिलाने के बाद इस सीरम को किसी कसकर बंद डिब्बे में रख दें।
ऐसे करें उपयोग
जब भी आप हफ्ते में शैम्पू का इस्तेमाल करने का प्लान करें तो उससे पहले इस हेयर सीरम को अपने बालों पर लगा लें। ध्यान रखें कि इसे स्कैल्प पर जरूर लगाएं, लेकिन लिमिट में। वैसे, इसे बालों में लगाने से वे चमकदार भी हो सकते हैं।
डीआईवाई हेयर सीरम के फायदे
एलोवेरा और नारियल तेल का हेयर सीरम बालों को गर्मी से बचाता है। अगर आप हेयर स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल करते हैं तो इस हेयर सीरम को अपने बालों पर जरूर लगाएं।एलोवेरा और नारियल तेल से बने इस उत्पाद से बालों का तेजी से गिरना कम किया जा सकता है।यदि आपके बाल अभी भी घुंघराले हैं, तो इस हेयर सीरम से उन्हें ठीक करने की दिनचर्या का पालन करें।

 

श्रावण मास विशेष – इन देशों में मौजूद हैं भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिर

देवों के देव ‘महादेव’ यानी भगवान शिव की साधना या पूजा हमें हर दुख और भय से मुक्ति दिलाती है । हिंदू धर्म में महादेव की साधना करने से सुख एवं समृद्धि पाई जा सकती है. आज से सावन का महीना शुरू हो गया है । ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को ये माह अति प्रिय है और इसमें पूजा-साधना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है । भगवान शिव की उपासना के अलावा उनके मंदिरों में दर्शन करने से भी जीवन में सुख और समृद्धि आती है । क्या आप जानते हैं कि भारत ही नहीं देश के बाहर भी कई ऐसे शिव मंदिर हैं जो दर्शनीय हैं –
गुप्तेश्वर मंदिर ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में भगवान शिव को समर्पित है मुक्ति गुप्तेश्वर मंदिर । इस मंदिर का संबंध 13वें ज्योतिर्लिंग से है । सावन के दौरान यहां खासी रौनक देखने को मिलती है ।
नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर
कहते हैं कि इस मंदिर का संबंध पांडवों से हैं और ये भगवान शिव को समर्पित है । नेपाल की राजधानी काठमांडू में मौजूद इस मंदिर में शिव की प्रसिद्ध प्रतिमा है जिसे बड़ी रोचक धार्मिक कथा जुड़ी हुई है । मंदिर में दर्शन के लिए हजारों की संख्या में देसी और विदेशी यात्री या श्रद्धालु आते हैं । पशुपतिनाथ न सिर्फ शिव के दर्शन बल्कि अपनी खूबसूरती के लिए भी चर्चित है ।
श्रीलंका में है मुन्नेस्वरम मंदिर
पौराणिक कथाओं के मुताबिक इस मंदिर का संबंध भगवान राम और रावण से माना जाता है । कहा जाता है कि भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करके यहीं पर भगवान शिव की पूजा की थी । इसी कारण ये मंदिर रामायण काल से जुड़ा हुआ है । इस मंदिर में दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं ।
इंडोनेशिया में प्रमबनन मंदिर
इंडोनेशिया में हिंदू धर्म के लोग ज्यादा संख्या में मौजूद हैं और यहां कई मंदिर भी हैं । इनमें से एक इंडोनेशिया के जावा में प्रमबनन मंदिर है । यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट के रूप में पहचाने जाने वाले इस मंदिर का परिसर काफी बड़ा है । रोचक बात है कि इसमें करीब 240 मंदिर मौजूद हैं ।
पाकिस्तान में कटासराज शिव मंदिर
कहा जाता है कि पाकिस्तान के इस शिव मंदिर का इतिहास 900 साल पुराना है । इस मंदिर का इतिहास भगवान शिव और माता सति के अलावा पांडवों से भी जुड़ा हुआ है । कहते हैं कि मां सती ने खुद को अग्नि को समर्पित किया था उस दौरान भगवान शिव के कुछ आंसू यहां गिरे थे । तभी यहां अमृत कुण्ड सरोवर बन गया था । शिवरात्रि और सावन के दौरान इस मंदिर में अलग ही रौनक रहती है ।

महिलाओं के लिए ये हैं कर बचाने वाली योजनाएं

नयी दिल्ली । भारत में कर छूट के लिए कई योजनाएं है जिनका लाभ आप आसानी से उठा सकते हैं। इन टैक्स बचत योजनाओं में महिलाओं के लिए विशेष स्कीम होती है जिसके बारे में कई बार महिलाओं को जानकारी नहीं होती।
महिलाओं के लिए इन योजनाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करना और उनका लाभ उठाना महत्वपूर्ण है। प्रभावी कर योजना उन्हें अपनी आय का प्रबंधन करने, पैसे बचाने और अपने वित्तीय लक्ष्य हासिल करने में मदद कर सकती है। आज हम आपको इन्हीं योजनाओं के बारे में सारी जानकारी अपने इस लेख के जरिए देने जा रहे हैं ऐसे में नीचे दिए गए हमारे सुझावों पर गौर करें…
– महिलाएं अपनी आय पर 50,000 रुपये तक की मानक कटौती का दावा कर सकती हैं।
– आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत, महिलाएं सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ), राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी), और कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जैसी कर-बचत योजनाओं में 1.5 लाख रुपये तक बचा सकती हैं।
– धर्मार्थ संस्थानों को किया गया दान धारा 80G के तहत कटौती के लिए पात्र है।
– धारा 80डी के तहत स्वयं, पति/पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के लिए भुगतान किए गए प्रीमियम पर कर बचत का लाभ उठाया जा सकता है।
1. सुकन्या समृद्धि योजना: अगर आपकी बेटी 10 साल या उससे कम उम्र की है, तो आप उसके नाम पर इस योजना में तब तक निवेश कर सकते हैं जब तक वह 21 साल की नहीं हो जाती। यह धारा 80सी के तहत उच्च रिटर्न और कर छूट प्रदान करती है।
2. गृह ऋण पर टैक्स छूट: गौरतलब है कि अगर किसी महिला के नाम पर होम लोन लिया गया है तो टैक्स छूट का दावा किया जा सकता है। धारा 24 के तहत सालाना 2 लाख रुपये तक के ब्याज भुगतान पर कटौती का दावा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 80EEA के तहत, पहली बार घर खरीदने वाले होम लोन के ब्याज पर 1.5 लाख रुपये तक की अतिरिक्त कटौती का दावा कर सकते हैं।
3. इक्विटी-लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस): इक्विटी-लिंक्ड सेविंग स्कीम के तहत महिलाओं को म्यूचुअल फंड में निवेश करने पर लाभ मिलेगा। ऐसा धारा 80 सी तहत संभव है।
4. सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ): महिलाओं के लिए पीपीएफ एक बेहतरीन योजना है। बता दें कि पीपीएफ एक दीर्घकालिक निवेश योजना है जो धारा 80सी के तहत कर छूट के साथ 1.5 लाख रुपये तक के वार्षिक निवेश की अनुमति देती है।
5. राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस): एनपीएस धारा 80सीसीडी(1बी) के तहत 50,000 रुपये तक की अतिरिक्त कटौती प्रदान करता है। ऐसे में महिलाएं इसका लाभ उठा सकती हैं।
(साभार – लोकमत न्यूज)

दादा ने जीती ट्रॉफी, अब 73 साल बाद पोते पद्भनाभ ने दोहराया इतिहास

नयी दिल्ली । जयपुर के महाराजा मान सिंह द्वितीय ने 1950 में जिस पोलो चैंपियनशिप को जीत देश का नाम ऊंचा किया था उसे 73 साल बाद उनके पोते पद्मनाभ सिंह ने फिर से दोहराया है। मान सिंह के पोते पद्मनाभ ने फ्रांस की सैंट मेस्मे टीम से खेलते हुए 129 डिग्री प्रतियोगिता में मौजूदा चैंपियन कजाक को हराकर खिताबी जीत हासिल की। पद्मनाभ सिंह की टीम ने कजाक के खिलाफ 11 गोल दागकर मैच को अपने नाम किया जबकि उनके विरोधी ने सिर्फ 9 गोल किए।फाइनल मुकाबले में पद्मनाभ का प्रदर्शन काफी दमदार रहा। उन्होंने अपनी टीम के लिए कुल तीन गोल किए। पद्मनाभ पिछले चार साल से सैंट मेस्मे के साथ जुड़े हुए हैं। इस जीत के बाद पद्मभान सिंह ने कहा कि, ‘चैंपियनशिप को जीतना हमारे लिए गर्व की बात है। ऐसा इसलिए भी कि मैं महान पोलो खिलाड़ी महाराजा सवाई मान सिंह की विरासत को जी रहा हूं।’पोलो चैंपियनशिप में ऐतिहासिक जीत के बाद पद्मनाभ सिंह ने कहा कि इस प्रतियोगिता के लिए मैंने जयपुर और अर्जेंटीना में तैयारी की थी। जयपुर में दुनिया के सबसे शानदार पोलो ग्राउंड में से एक हैं। मेरी इस जीत के बाद मुझे उम्मीद है कि जयपुर में युवाओं को इससे हौसला मिलेगा। हालांकि पिछले साल हमें इसी टीम के कजाक के खिलाफ हार मिली थी लेकिन उसे भुलाते हुए इस बार हमने जीत हासिल की है।

अपने दादा जी के समय के खेल के बारे में बात करते हुए पद्मनाभ सिंह ने कहा कि, ‘महाराजा मानसिंह के समय का खेल और आज के समय में पोलो बहुत बदल गया है। पहले के घोड़े के कद काफी बड़े होते थे। आज के घोड़ों का कद छोटा हो गया है। इसके अलावा अब इस खेल में तकनीकों इस्तेमाल होने लगा है। चोट से बचाव के लिए कई तरह के गियर आ चुके हैं जो कि पहले नहीं था। हमारे दादा जीतने उस वक्त इस खेल के लिए ऑस्ट्रेलिया से घोड़े लेकर आए थे।स खेल के जोखिम के बारे में बताते हुए पद्मनाभ सिंह ने कहा, पोलो फार्मूला वन की तरह एक जोखिम भरा खेल है। घोड़े पर बैठकर 40 किलोमीटर की रफ्तार से पोलो खेलना आसान काम नहीं है। इसमें चोटिल होने की संभावना बहुत रहती है।

डायमंड लीग में नीरज चोपड़ा ने जीता सोना, 87.66 मीटर दूर भाला फेंक रचा इतिहास

लुसाने डायमंड लीग में भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ने 87.66 मीटर की दूरी हासिल स्वर्ण पदक अपने नाम किया। नीरज ने यह स्वर्ण पदक अपने पांचवें प्रयास में जीता। इस प्रतियोगिता में नीरज की शुरुआत कुछ खास नहीं रही थी। उनका पहला थ्रो फाउल हो गया था लेकिन इसके बाद नीरज ने दमदार वापसी कर जर्मनी के जूलियन वीबर और चेक गणराज्य के याकूब वादलेज्चे को पीछे को छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया।

नीरज चोपड़ा का यह 8वां अन्तर्राष्ट्रीय स्वर्ण है। इससे पहले एशियन गेम्स, साउथ एशियन गेम्स और ओलिपिंक जैसी प्रतियोगिताओं में स्वर्ण जीत चुके हैं। वहीं इस साल नीरज चोपड़ा के खाते में यह दूसरा स्वर्ण पदक आया है। इससे पहले नीरज ने दोहा डायमंड लीग में भी स्वर्ण जीता था।

लुसाने डायमंड लीग में नीरज चोपड़ा ने अपनी शुरुआत फाउल से की। हालांकि दूसरा और तीसरा प्रयास उनका दमदार रहा। दूसरे प्रयास में उन्होंने 83.52 मीटर का उन्होंने थ्रो किया जबकि उनका तीसरा थ्रो 85.04 मीटर का रहा लेकिन इन तीन प्रयासों के स्कोर पर आधार जर्मनी के जूलियन वीबर ने 86.20 की दूरी हासिल कर बढ़त बना रखी थी।

इस बीच नीरज का चौथा प्रयास भी फाउल हो गया। इस कारण वह दबाव में आ गए लेकिन पांचवां प्रयास उनका गोल्डन आर्म साबित हुआ और 87.66 मीटर लंबा थ्रो कर दिया। इस थ्रो के साथ ही वह सबसे आगे हो गए। वहीं उनका अंतिम थ्रो 84.15 मीटर का रहा।नीरज चोपड़ा को जर्मनी के जूलियन वीबर के कड़ी टक्कर मिली। वीबर ने अपने आखिरी प्रयास में 87.03 मीटर का थ्रो फेंका। हालांकि ये दूरी गोल्ड मेडल तक तय नहीं कर पाई और सिल्वर मेडल से उन्हें संतोष करना पड़ा। वहीं चेक गणराज्य के याकूब वादलेज्चे ब्रॉन्ज मेडल के साथ तीसरे स्थान पर रहे।नीरज चोपड़ा ने इसी साल मई में दोहा डायमंड लीग में 88.67 मीटर लंबा थ्रो किया था। इस प्रतियोगिता के बाद उन्हे हैम्स्ट्रिंग हो गई थी। इसके कारण उन्हें कुछ प्रतियोगिताओं से अपना नाम वापस लेना पड़ा। हालांकि इस दौरान नीरज ने अपनी फिटनेस पर पूरा काम किया और स्विट्जरलैंड के लुसाने डायमंड लीग में स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया ।

मानवता की मिसाल हैं 10 हजार बच्चों की डिलीवरी कराने वाली नर्स

चेन्नै: भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में नर्स और दाइयों का अहम योगदान हैं। लेकिन भारी और सीमित संसाधनों के चलते इन्हें काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हम आपको एक ऐसी नर्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने 33 साल के लंबे करियर में 10,000 से ज्यादा सफल डिलीवरी कराई हैं। हाल ही में तमिलनाडु की रहने वाली रिटायर्ड नर्स ने न्यूज वेबसाइट बीबीसी से बातचीत में अपने अनुभव को साझा किया। नर्स खतीजा बीबी को अपने इस योगदान के लिए सरकार के जरिए सम्मानित भी किया जा चुका है।न्यूज वेबसाइट बीबीसी को दिए इंटरव्यू में 60 वर्षीय खतीजा बीबी कहती हैं, ‘मुझे गर्व है कि मेरे जरिए कराई गई 10,000 शिशुओं की डिलीवरी में एक भी बच्चा मेरे देखते-देखते नहीं मरा’। खतीजा इसे अपने करियर का मुख्य आकर्षण मानती हैं। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मा. सुब्रमण्यन ने बीबीसी को बताया कि खतीजा को हाल ही में एक सरकारी पुरस्कार मिला है, क्योंकि उनकी सेवा के वर्षों के दौरान कोई मृत्यु दर्ज नहीं की गई थी।तीन दशकों के दौरान उन्होंने दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में काम किया, भारत उच्च मातृ मृत्यु दर वाले देश से वैश्विक औसत के करीब एक देश में बदल गया है। वह कहती हैं कि उन्होंने लड़कियों के जन्म और कम बच्चे पैदा करने के प्रति लोगों के नजरिए में सकारात्मक बदलाव भी देखा है।साल 1990 में जब खतीजा ने काम करना शुरू किया तो वह खुद गर्भवती थीं। उस दौर को याद करते हुए खतीजा कहती हैं, ‘मैं सात महीने की गर्भवती थी… फिर भी मैं अन्य महिलाओं की मदद कर रही थी। दो महीने के छोटे मातृत्व अवकाश के बाद मैं काम पर लौट आई। मैं जानती हूं कि जब महिलाएं प्रसव पीड़ा से गुजरती हैं तो वे कितनी चिंतित रहती हैं, इसलिए उन्हें सहज और आश्वस्त बनाना मेरी पहली प्राथमिकता है।’

3 साल के लिए ड्रीम-11 बना टीम इंडिया का प्रमुख प्रायोजक

 358 करोड़ में हुई बीसीसीआई के साथ तीन साल की डील!

मुंबई: फैंटेसी स्पोर्ट्स कंपनी ड्रीम-11 अब टीम इंडिया की मुख्य स्पॉन्सर होगी। भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी पर अब बायजूस की जगह ड्रीम-11 छपा दिखेगा। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो तीन साल की यह डील 358 करोड़ रुपये में हुई है। पिछले वित्तीय चक्र के खत्म होने-11 के बाद बायूजस ने हटने का फैसला किया था, जिसके बाद बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट बोर्ड) ने अपने नए प्रायोजक के लिए सीलबंद बोलियां आमंत्रित की थीं, जिसमें ‘ड्रीम 11’ भी शामिल था। बीसीसीआई ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस बात की जानकारी सार्वजनिक की। भारतीय टीम की जर्सी पर ड्रीम-11 का लोगो वेस्टइंडीज दौरे से लग जाएगा। इस दौरे की शुरुआत 12 जुलाई से हो रही है। जहां भारत को दो टेस्ट, तीन वनडे और पांच टी-20 इंटरनेशनल मुकाबले खेलने हैं।