Sunday, March 29, 2026
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यहां होती है बालू के शिवलिंग की पूजा

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कानपुर. यहां मैक्सर घाट पर एक ऐसे शिवलिंग की पूजा की जाती है, जिसे बनाने में बालू और मिटटी का इस्तेमाल किया जाता है। 3 फीट ऊंचे इस शिवलिंग में 70 फीसदी बालू और 30 फीसदी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। इस शिवलिंग का श्रृंगार भी किया जाता है, जिसमें केवल फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। कहते है इस शिवलिंग की रचना बरसो पहले एक सन्यासी ने किया था। जिसके हर साल सावन में इसको बनाया जाता और सावन के दो दिन बाद इसे विखंडित कर दिया जाता है।

उन्नाव के सन्यासी ने इसे किया था तैयार…

कानपुर मैक्सर घाट प्राचीन घाटो में से एक है। इस घाट पर बर्षो पूर्व उन्नाव जनपद के एक सन्यासी इस घाट पर आये, और यही के होकर रह गए थे। एक स्थानीय निवासी प्रमोद कुमार ने बताया कि उस सन्यासी का नाम भोला बाबा था। वो शिवभक्त के साथ सिद्धपुरुष भी थे।

इसके मुताबिक़ वो भगवान शिव की आराधना करते थे। मगर वो किसी मंदिर में जाकर भगवान भोलेनाथ की पूजन नहीं किया करते थे। वो गंगा स्नान करने के बाद घाट किनारे रेत का शिवलिंग बनाते थे। उस शिवलिंग की वो विधिवत पूजन करते थे, और पूजन अर्चन के बाद उस रेत के शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर देते थे।

इस शिवलिंग की पूजा करवाने वाले वर्तमान के पंडित कल्लू दीक्षित के मुताबिक़ ये आज तक कोई नहीं जान पाया कि आखिर वो ऐसा क्यों करते थे। भोला बाबा ने ही इस शिवलिंग नाम नित्तेश्वर बाबा रखा था, जो अब श्रद्धालुओं के जुबान पर है।

आज तक कोई नहीं जान पाया इस बाबा के बारे में

पंडित कल्लू दीक्षित के मुताबिक़, बाबा ये तो बताते थे कि वो उन्नाव के है मगर किस गांव में कहां उनका घर है ये उन्होंने किसी को नहीं बताया। वो बहुत ही काम बोलते थे। शाम को उनको सुनने के लिए भीड़ लगी होती थी, वो भी भोलेनाथ की आरती करने के बाद लोगो को शिव कथा सुनाते थे।

उनके मृत्यु के बाद हम पण्डितगण और स्थानीय भक्तों ने उनकी मौजूदगी इस घाट पर बनाए रखने के लिए बालू के शिवलिंग को बनाना जारी रखा। इस जगह को घेर कर भक्तगानो ने एक छोटे से मंदिर का निर्माण भी करवा दिया । हर दिन बाबा का शृंगार ताजे फूलो से होता है।

इस शिवलिंग को बनाने और प्रवाहित करने के समय किसी को इसे देखने की इजाजत नहीं है, क्योकि भोला बाबा भी तड़के सुबह इस शिवलिंग का निर्माण करते थे, और देर रात अकेले इस शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर देते थे।

पंडित कल्लू दीक्षित के अनुसार भोला बाबा यहाँ रहकर दिनरात भोले नाथ की ही आराधना करते रहते थे। उनके तन पर केवल एक धोती हुआ करता था, मौसम कोई भी हो।

बाबा कभी भी किसी के दान दिया हुआ नहीं खाते थे। बाबा अख़बार लगाते थे और जो पैसा मिलता था। उसी से ही वो अपना पेट भरते थे, पेट भरने से ज्यादा पैसा मिल जाए तो उसे गरीबो में बंटवा देते थे।

इस पर नहीं टपकता गंगा जल

कैंटोनमेंट इलाके मौजूद इस मंदिर में इस शिवलिंग की दर्शन के लिए शहर के साथ साथ अगल बगल गांव के भी भक्त आते है। एक भक्त रामकलश के मुताबिक़ नितेश्वर बाबा की सुबह सुबह दर्शन करने से पूरा दिन अच्छा जाता है।

इस मंदिर में पानी दूध या तरल प्रदार्थो को ले जाना सख्त मना है। बालू के बने इस शिवलिंग के ऊपर गंगा जल को भी नहीं रखा जाता, भोला बाबा इस शिवलिंग को बनाने में गंगा जल का ही इस्तेमाल करते थे।

 

समोसे बेचने के लिए छोड़ दी गूगल की नौकरी

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आईटी फील्ड में काम करने वाले किसी भी शख्स से पूछ लीजिए, गूगल जैसी कंपनी में काम करना उसका सपना होगा। गूगल में नौकरी करने का मतलब है पूरी जिंदगी शान और आराम से जीना। गूगल के एम्प्लॉई की सैलरी की शायद आप कल्पना न कर सकें, क्योंकि ये कंपनी फ्रैशर्स को भी करोड़ों का पैकेज ऑफर कर देती है। लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने गूगल की अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी वह भी समोसे बेचने के लिए। ऐसे इंसान को भले ही लोग बेवकूफ कह दें, लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ एक साल में ही उनका टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा हो गया तो शायद लोगों को अपनी राय बदलनी पड़ जाये। यहां हम बात कर रहे हैं ‘द बोहरी किचन’ वाले ‘मुनाफ कपाड़िया’ की।

मुनाफ कपाड़िया के फेसबुक प्रोफाइल के बायो में लिखा है कि “मैं वो व्यक्ति हूं जिसने समोसा बेचने के लिए गूगल की नौकरी छोड़ दी।” लेकिन उनके समोसे की भी खासियत है कि वह मुंबई के पांच सितारा होटलों और बॉलिवुड में खासा लोकप्रिय है। मुनाफ ने एमबीए की पढ़ाई की थी और उसके बाद उन्होंने कुछ कंपनियों में नौकरी की और फिर चले गये विदेश। विदेश में ही कुछ कंपनियों में इंटरव्‍यू देने के बाद मुनाफ को गूगल में नौकरी मिल गई। कुछ सालों तक गूगल में नौकरी करने के बाद मुनाफ को लगा कि, वह इससे बेहतर काम कर सकते हैं। बस फिर क्‍या था, दिमाग में बिजनेस का नया आईडिया लेकर वह घर लौटे और उन्‍होंने यहां अपना बिजनेस शुरू कर दिया।

मुनाफ का घर जिस इलाके में है वहां ज्यादातर मध्यमवर्गीय फैमिली के लोग रहते हैं। लेकिन जिस लेवल का आइडिया मुनाफ ने सोचा था उस हिसाब से उन्हें यहां ग्राहक मिलना मुश्किल था। इसलिए मुनाफ ने प्रयोग के तौर पर अपने 50 दोस्तों को ईमेल और मैसेज किया और उन्हें खाने पर बुलाया।

मुनाफ अब भारत में ‘द बोहरी किचन’ नाम का रेस्‍टोरेंट चलाते हैं। मुनाफ बताते हैं, कि उनकी मां नफीसा टीवी देखने की काफी शौकीन हैं और टीवी के सामने काफी वक्त बिताया करती थीं। उन्हें फूड शो देखना काफी पसंद था और इसलिए वह खाना भी बहुत अच्छा बनाती थीं। मुनाफ को लगा कि वह अपनी मां से टिप्स लेकर फूड चेन खोलेंगे। उन्होंने रेस्टोरेंट खोलने का प्लान बनाया और अपनी मां के हाथों का बना खाना कई लोगों को खिलाया। सबने उनके खाने की तारीफ की। इससे मुनाफ को बल मिला और वह इस सपने को पूरा करने में लग गए।

मुनाफ के रेस्टोरेंट में सिर्फ समोसे ही नहीं मिलते। हां समोसा उनका ट्रेडमार्क जरूर है। दरअसल मुनाफ जिस दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं उनकी डिशेज काफी शानदार होती हैं। जैसे- मटन समोसा, नरगि‍स कबाब, डब्‍बा गोश्‍त, कढ़ी चावल इत्यादि। मुनाफ इन डिशेज को अपने रेस्टोरेंट में रखते हैं। बोहरी थाल स्वादिष्ट मटन समोसा, नरगीस कबाब, डब्बा गोश्त, करी -चावल आदि के लिए मशहूर है। वह कीमा समोसा और रान भी बनाते हैं, जिसकी डिमांड काफी ज्यादा होती है। अभी उनके रेस्टोरेंट को खुले सिर्फ एक साल हुआ है और उनका टर्नओवर 50 लाख पहुंच गया है। मुनाफ इसे अगले कुछ सालों में 3 से 5 करोड़ तक पहुंचाना चाहते हैं।

मुनाफ की स्‍टोरी और उनका काम इतना फेमस हुआ कि फोर्ब्‍स ने अंडर 30 अचीवर्स की लिस्‍ट में उनका नाम शामिल कर लिया है। मुनाफ अपनी कंपनी के सीईओ हैं, लेकिन यहां इसका मतलब चीफ ईटिंग ऑफिसर होता है। मुनाफ के रेस्टोरेंट में इतनी भीड़ होती है कि यहां खाने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ता है।

मुनाफ अभी मुंबई के वर्ली इलाके से फूड की डिलिवरी करते हैं। लेकिन आने वाले समय में वह इसी नाम से कुछ और रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं। अपनी सफलता का पूरा श्रेय मुनाफ अपनी मां को देते हैं। क्योंकि उनके बगैर यह संभव नहीं हो पाता।

(साभार – योर स्टोरी)

दिल्ली के युवाओं ने 250 रूपये में शुरू किया स्टार्टअप

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कला एक ईश्वरीय वरदान है। ये वो नवाजिश है जो एक कतरा को हीरा बना देती है, एक अदने से तिनके को अमर कर देती है। ‘कला ही जीवन है’ जैसी उक्तियां ऐसे ही नहीं बनी हैं। मानव-अभिव्यक्तियों का सबसे सुंदर माध्यम होती है कला। एक कलाकार अपनी कृतियों के माध्यम से न जाने कितने लोगों को प्रेरित कर सकता है, उनके जीवन में अपनी कूची से रंग भर सकता है। लेकिन सबका जीवन कलामय बना देने वाला यही कलाकार जिंदगी की जद्दोजहद से हार जाता है। जब बात कमाई की होती है तो आमतौर पर उसकी जेबें खाली ही रह जाती हैं।

हम सबने कई जगह पढ़ा है कि कैसे इस दुनिया के महानतम कलाकार पाब्लो पिकासो को एक बार ठंड से बचने के लिए अपनी ही पेंटिंग को जलाना पड़ा, ताकि उसकी गर्मी से उन्हें थोड़ी राहत मिले। आज उनके चले जाने के बाद उनकी एक-एक पेंटिंग करोड़ों में बिकती है। लेकिन सोचिए, अगर उस वक्त लोगों ने उनकी कला की कद्र की होती, तो कितनी ही बहुमूल्य पेंटिंग आग के हवाले होने से बच जातीं। कलाकारों को उनकी कला का सही मूल्य न दे पाना हम सबकी असफलता है।

लेकिन आज के युवा तो हर क्षेत्र में आगे हैं। उन्होंने किसी का मुंह ताकने की बजाय खुद ही कमाई करने का फैसला ले लिया। दिल्ली में भी कला के छात्रों के एक समूह के साथ ऐसा ही कुछ हुआ और मात्र 250 रुपये की लागत से उन्होंने एक स्टार्टअप शुरू किया। उन्होंने हाथ से पेटिंग बनाई हुई टी-शर्ट का कारोबार शुरू किया है। इसी के साथ ही यहां बेल्ट, गुलदान, बैग और तकिए के कवर इत्यादि पर भी पेटिंग बनाकर उन्होंने इसे बाजार में उतारा है। यह समूह ‘वीकलआर्ट डॉट कॉम’ के माध्यम से ऑनलाइन कारोबार भी करता है।

क्या है आइडिया

इस कंपनी को वरूण बकोलिया, मयंक बकोलिया, सैफ, कनिष्क और अजय ने करीब डेढ़ साल पहले शुरू किया था। मयंक बकोलिया के मुताबिक, ‘यह स्टार्टअप वरूण के दिमाग की उपज है। पहले हम चित्रकला प्रदर्शनी में पेटिंग का प्रदर्शन किया करते थे। लेकिन काफी समय तक ऐसा करने के बाद भी पेटिंग सही कीमत पर बिक नहीं पाती थीं। उसके बाद हमने सोचा कि इस हुनर का रोजमर्रा की वस्तुओं पर इस्तेमाल करना चाहिए। हमने 250 रुपये की एक टी-शर्ट ली और उस पर चिलम पीते हुए एक बाबा की पेटिंग बनाई। इस टी-शर्ट की फोटो हमने फेसबुक पर साझा की और हमें काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इस तरह से मात्र 250 रुपये की लागत में हमारा कारोबार चलने लगा।’

कला और व्यापार का संगम

रोजमर्रा की वस्तुओं पर पेंटिंग करने के लिए वे एक्रिलिक रंगों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह कभी उतरते नहीं और ना ही फीके पड़ते हैं। कपड़ों पर लगाने के बाद इन्हें धोने में भी कोई परेशानी नहीं होती है। मयंक के मुताबिक, ‘उनके यहां सबसे कम कीमत पर 250 रुपये में उत्पाद मिल जाते हैं। इसके अलावा वह लोगों की पसंद के हिसाब से भी उनके लिए उत्पाद बनाते हैं। हमारे वेंचर वीकल आर्ट की तरफ से जल्द ही घड़ी के डायल, पर्स, जींस इत्यादि श्रेणियों में भी अपने रंग-बिरंगे उत्पाद भी मिलने लगेंगे।’

दिल्ली के ये कलाकार अलग-अलग जगहों पर अपने सामान का स्टॉल भी लगाते हैं। रंग महोत्सव, कॉमिक कॉन और ऐसी ही और जगहों पर प्रदर्शनियों में वो अपना स्टॉल लगाकर सामान बेचते हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

ट्विटर पर आईं मलाला यूसफजई, यू एन प्रमुख समेत 4 लाख पार हुए फॉलोअर्स

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19 साल की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई आखिरकार ट्विटर पर आ गई हैं। इस सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म पर उनके आने की सूचना मिलते ही लोगों ने उन्‍हें फॉलो करना शुरू कर दिया। एक दिन के भीतर ही उनके फॉलोअर्स की संख्‍या 4 लाख के पार पहुंच गई।

मलाला ने दसवीं पास करने के बाद ट्विटर ज्वाइन किया। उन्‍हें फॉलो करने वालों में यूएन प्रमुख, कनाडा के पीएम, बिल गेट्स जैसी हस्तियां शामिल हैं।

मलाला का ट्विटर हैंडल @Malala के नाम से है. ट्विटर पर आते ही उनके 4 लाख से ज्‍यादा फॉलोअर्स हो गए हैं।

पहला ट्वीट

मलाला ने अपना पहला ट्वीट करते हुए लिखा, ‘हाय ट्विटर’। दूसरे ट्वीट में उन्‍होंने लिखा, ‘आज मेरे स्‍कूल का आखिरी दिन है और ट्विटर पर पहला दिन।.

 क्‍या कहा मलाला ने

मलाला ने कहा है कि वे ट्विटर पर लड़कियों की पढ़ाई के लिए आवाज बुलंद करती रहेंगी। मलाला को अफसोस है कि लाखों लड़कियां स्‍कूल नहीं जा सकीं। मलाला ने एक ट्वीट में लिखा कि’मैं अपने भविष्य के लिए उत्सुक हूं लेकिन मुझे पता है कि दुनिया लाखों लड़कियां अभी तक स्‍कूल नहीं जा पाई हैं। उन्हें कभी अपनी पढ़ाई पूरी करने का मौका नहीं मिलता।.

ये लोग बने फॉलोअर्स

कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रड्यू, यूएन के जनरल सेक्रेटरी एंटोनिया गुटारेश, बिल गेट्स, उनकी पत्‍नी मेलिंडा गेट्स, कैलिफोर्निया से सीनेटर कमला हैरिस जैसे नाम शामिल हैं।

कौन हैं मलाला

अक्‍टूबर 2012 में तालिबान के आतंकियों ने उस समय मलाला के सिर पर गोली मार दी थी जब वह स्‍कूल जा रही थीं। मलाला पर यह हमला इसलिए किया गया क्‍योंकि वह हमेशा लड़कियों की शिक्षा की वकालत करती आई थीं। ब्रिटेन में मलाला का इलाज हुआ और पूरी तरह से फिट मलाला फिर से लड़कियों के हक में आवाज उठाने लगीं। मलाला ने वर्ष 2013 में एक किताब ‘आय एम मलाला’ भी लिखी थी। गौरतलब है कि मलाला हाईस्कूल की पढ़ाई ब्रिटेन के बर्मिंघम से की है।

 

कर्मचारी से जबरन इस्तीफे का ऑडियो वायरल, टेक महिंद्रा ने मांगी माफी

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टेक महिंद्रा के एक कर्मचारी को बिना वक्त दिए नौकरी से हटाए जाने के तरीके पर महिंद्रा समूह के मालिक आनंद महिंद्रा ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। इस कर्मचारी और एचआर के बीच नौकरी से निकाले जाने को लेकर हुई कथित बातचीत का टेप वायरल हो गया था। इसे लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच आनंद महिंद्रा ने ट्वीट कर पूरे घटनाक्रम पर माफी मागी।

आनंद महिंद्रा ने शुक्रवार को ट्वीट किया, ‘मैं निजी तौर पर माफी मांगता हूं। हमारा मुख्य सिद्धांत किसी भी व्यक्ति का सम्मान बनाए रखना है। हम सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में ऐसा फिर कभी न हो।’

वहीं टेक महिंद्रा के सीईओ ने भी उक्त कमर्चारी को महज एक दिन के अंदर एग्जिट इंटरव्यू के लिए मजबूर करने पर बयान जारी कर खेद जताया है। कंपनी के सीईओ सीपी गुरनानी की तरफ से ट्वीट किए गए कंपनी के एक पत्र में कहा गया है कि’टेक महिंद्रा ने हमेशा सहकर्मियों के सम्मान को अपना कोर वैल्यू माना है। वर्षों से हम इस सिद्धांत पर चलते रहे हैं। हमें कर्मचारी और एचआर के एक प्रतिनिधि के बीच हुई बातचीत के बारे में जानकारी मिली है। जिस तरह से बातचीत हुई, हमें उसका बहुत दुख है। हम इस बारे में पर्याप्त कदम उठाने का प्रयास करेंगे कि भविष्य में ऐसा न हो। ‘

दिए नौकरी से निकाले गए इस कर्मचारी ने एचआर से हुई अपनी बातचीत रिकॉर्ड करके ऑडियो डिस्ट्रिब्यूशन प्लैटफॉर्म साउंडक्लाउंड पर अपलोड कर दिया था। 6 मिनट 45 सेकंड लंबी इस बातचीत में कथित रूप से एचआर उससे कहती है कि कंपनी में लागत घटाने की प्रक्रिया चल रही है और लिस्ट में आपका नाम भी है। अगर आप इस्तीफा दे दते हैं तो हम इसे सामान्य छंटनी मानकर 15 जून को आपका आखिरी वर्किंग-डे मान लेंगे लेकिन, अगर आपने इस्तीफा नहीं दिया तो हम आपको टर्मिनेशन लेटर भेज देंगे।’

 

और, जीवित हो उठी बकुलाही नदी…

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बकुलाही नदी भारत की वेद वर्णित प्राचीन नदियों में से एक है। हिन्दुओं के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ ‘वाल्मीकि रामायण’ में भी इस नदी का उल्लेख हुआ है। बकुलाही नदी का प्राचीन नाम ‘बालकुनी’ था, किन्तु बाद में परिवर्तित होकर ‘बकुलाही’ हो गया। बकुलाही शब्द लोक भाषा अवधी से उद्धृत है। जनश्रुति के अनुसार बगुले की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण भी इसे बकुलाही कहा जाता है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद की बकुलाही नदी की 18 किलो मीटर लम्बी लुप्तप्राय हो चुकी प्राचीन धारा आज कल-कल करती अविरल प्रवाहित हो रही है। करीब दो दर्जन से अधिक गांवों के लाखों लोगों की वर्षों की अतृप्त प्यास बुझा रही है। आस-पास के गांवों के भूगर्भ जलस्तर में भी सुधार हुआ है। बकुलाही नदी को जनपद के लोग अपनी खुद की नदी कहते हैं। खुद की नदी? क्या नदी भी कहीं खुद की हो सकती है। यह तो प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सबका हक है। लेकिन प्रतापगढ़ में प्रवाहित होने वाली बकुलाही नदी यहां के लोगों की अपनी नदी है।

गौरतलब है, कि तीन दशक पूर्व बकुलाही नदी की प्राकृतिक धारा से छेड़छाड़ की गई थी। यह छेड़छाड़ नैसर्गिक कम राजनीतिक अधिक थी। 18 किलो मीटर लम्बी बकुलाही नदी की मूलधारा का अपहरण कर लिया गया था। 18 किलो मीटर की जलधारा के तट पर बसे 25 गांवों से उनकी नदी जो उनके जीने का आसरा थी, छीन ली गई थी। तभी से लगातार पूरे तोरई, पूरे वैष्णव, जदवापुर, सरायदेवराय डीहकटरा, छतौना, मनेहू, हिन्दूपुर, बाबूपुर, सरायमेदीराय, बरईपुर, मिसिरपुर, सिउरा, हैसी, बुकनापुर, पनई का पूरा, शोभीपुर, जमुआ, वैरीसाल का पुरवा, रामनगर, भटपुरवा, ढेमा और गौरा आदि तकरीबन दो दर्जन गांवों की खुशियां भी विलुप्त हो गई। गांवों की हरियाली और खुशहाली भी रूठ गई। जल स्तर धीरे-धीरे पातालमुखी हो गया। खेत-बाड़ी भी प्रभावित हुई। वन क्षेत्र उजाड़ होने लगे। प्रवासी पक्षियों ने भी पलट कर देखना बन्द कर दिया। इसी के साथ 25 गांवों की लगभग एक लाख आबादी के बीच अपनी नदी बकुलाही को पुन: पाने की बेचैनी भी बढ़ती गई।

वर्ष 2003 में जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने इन गांवों का दौरा किया और कहा कि बकुलाही की पुरानी धारा को वापस लाये बिना इस जल संकट से छुटकारा नहीं मिल सकता। यह बात उस समय अनेक समाज सेवियों ने सुनी, परन्तु एक युवा के मन पर इसका सर्वाधिक असर हुआ। उसने संकल्प लिया कि 25 गांवों के प्यासे लोगों को उनकी नदी लौटाने का। वह युवा था समाज शेखर, जो आज बकुलाही समाज का नेतृत्व कर रहा है।

समाज शेखर ने समाज के समक्ष बकुलाही का मुद्दा उठाया और वर्ष 2011 में भयहरण धाम पर बकुलाही पंचायत का आयोजन किया। पंचायत में हजार से अधिक लोग शामिल हुए। बकुलाही नदी के उद्धार को लेकर गम्भीर विमर्श हुआ। तय किया गया कि किसी भी सूरत में अपनी नदी को जीवनदान देंगे। समाज शेखर के साथ पंचायत में आये सभी गांववासियों ने बकुलाही के लिए भगीरथ संकल्प लिया और अगले ही दिन से साधना प्रारम्भ हो गई, जो शीघ्र ही लोक-साधना में तब्दील हो गई। कदम से कदम जुड़ते गए। बाहों से बाहें मिलीं। जनसैलाब उमड़ पड़ा।

इसी बीच प्रतापगढ़ के तत्कालीन जिलाधिकारी हृदेश कुमार बकुलाही समाज से रू-ब-रू हुए। बकुलाही नदी का भ्रमण किया और बकुलाही समाज के मंच पर आकर उन्होंने प्यासे समाज को उनका पानी और उनकी नदी लौटने की प्रतिज्ञा ली। बकुलाही की नाप-जोख हुई। ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में एक बड़ा ‘दोमुहां’ डैम बनाने की बात चली। परन्तु इंजीनियरों के समक्ष 25 वर्षों के अतिक्रमण से बकुलाही नदी की कम हुई गहराई एवं उसकी चौड़ाई बाधा के रूप में खड़ी थी। इसी समय जिलाधिकारी का स्थानान्तरण हो गया और नये जिलाधिकारी विद्याभूषण ने कार्यभार संभाला। विद्याभूषण ने जल सत्याग्रह समाज यात्रा की अगुवाई कर रहे समाज शेखर को वार्ता हेतु आमंत्रित किया तथा बकुलाही का क्षेत्र भ्रमण की इच्छा जताई। भ्रमण के दौरान जिलाधिकारी ने सभी सरकारी अमलों को बुला कर नदी खुदाई करने का काम शुरू कराया। इस कार्य के लिए उन्होंने मनरेगा मजदूरों को लगाया। समाज के सामूहिक प्रयास से श्रमदान एवं जेसीबी मशीनें लगा दी गईं।

इस तरह प्रशासन का सहयोग मिलने से बकुलाही समाज का उत्साह दोगुना हो गया। साधना जारी रही। नदी पर कच्चा बांध बनाया गया और नदी की धारा को उसके प्राकृतिक मार्ग पर ले जाने के लिए घुमाया गया। 18 किलोमीटर लम्बा मार्ग 18 किलो मीटर लम्बे नदी के पुराने मार्ग में हुए अवरोधों को हटाते चले गए और 25 वर्षों बाद अपने पुत्रों पर अपनी ममता लुटाने बकुलाही मैया उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। 18 किलो मीटर बकुलाही में हुआ जल संचरण देश का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण बन गया।

बकुलाही समाज की अनवरत साधना का सुखद परिणाम भी अब दिखने लगा है। नदी की प्राचीन धारा सजल होकर वेग के साथ प्रवाहित हो रही है। पूरे नदी क्षेत्र में उत्सव-सा माहौल है। खेतों में हरियाली नजर आने लगी है। पिछले दो साल से प्रवासी पक्षी फिर से मेहमान बन कर आने लगे। आसपास के गांवों के जलस्तर में भी सुधार हो रहा है। समाज शेखर बकुलाही के पुनरुद्धार का श्रेय बकुलाही समाज को देते हैं। बतौर, समाज शेखर “प्रकृति के समस्त अवयव नदी, पहाड़, वन आदि अपने होते हैं। इनकी रक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी अपनी ही होती है। बकुलाही हम सबकी अपनी नदी है। हम सब बकुलाही के हैं। बकुलाही सबका पोषण करती है।” बकुलाही के अविरल स्वरूप को पुन: साकार करने के बाद नदियों और तालाबों को लेकर समाज शेखर की बेचैनी बढऩे लगी और वे विलुप्त हो चुके तालाबों के पुनरुद्धार में रम गए। दर्जनभर से अधिक तालाबों की जन सहयोग से खुदाई करवाई। फिलवक्त, समाज शेखर इलाहाबाद के यमुनापार क्षेत्र में विलुप्त हो चुकी प्राचीन ज्वाला नदी के पुनरुद्धार में लगे हैं।

बकुलाही नदी का परिचय

बकुलाही नदी भारत की वेद वर्णित प्राचीन नदियों में से एक है। हिन्दुओं के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ ‘वाल्मीकि रामायण’ में भी इस नदी का उल्लेख हुआ है। इस नदी का प्राचीन नाम ‘बालकुनी’ था, किन्तु बाद में परिवर्तित होकर ‘बकुलाही’ हो गया। बकुलाही शब्द लोक भाषा अवधी से उद्धृत है। जनश्रुति के अनुसार बगुले की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण भी इसे बकुलाही कहा जाता है।

उद्गम स्थल

बकुलाही नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद में स्थित ‘भरतपुर झील’ से हुआ है। यहां से प्रवाहित होकर यह नदी ‘बेंती झील’, ‘मांझी झील’ और ‘कालाकांकर झील’ से जल ग्रहण करते हुए बड़ी नदी का स्वरूप ग्रहण करती है। जनपद मुख्यालय के दक्षिण में स्थित मान्धाता ब्लॉक को सींचती हुई यह नदी आगे जाकर जनपद के ही खजुरनी गांव के पास गोमती नदी की सहायक नदी सई में मिल जाती है।

पौराणिक उल्लेख

बकुलाही नदी का संक्षिप्त वर्णन वेद-पुराण समेत कई धर्मग्रन्थों में है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का उल्लेख किया गया है। वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का वर्णन इस प्रकार है, जब भगवान राम के वन से वापस आने की प्रतीक्षा में व्याकुल भरत के पास हनुमान राम का संदेश लेकर पहुंचते हैं, तो हनुमानजी से भरतजी पूछते हैं कि मार्ग में उन्होंने क्या-क्या देखा। इस पर हनुमानजी का उत्तर होता है –

सो अपश्यत राम तीर्थम् च नदी बालकुनी तथा बरूठी,

गोमती चैव भीमशालम् वनम् तथा।

इसी तरह इस नदी का वर्णन श्री भयहरणनाथ चालीसा के पंक्ति क्रमांक 27 में इन शब्दों में है –

बालकुनी इक सरिता पावन।

उत्तरमुखी पुनीत सुहावन॥

बकुलाही तट पर स्थित धार्मिक स्थल

बकुलाही नदी के तट पर अनेक पौराणिक स्थल हैं। इसके तट पर महाभारत कालीन भयहरणनाथ धाम स्थित है। भयहरणनाथ धाम से कुछ दूरी पर प्राचीन सूर्य मन्दिर स्थित है। विश्वनाथगंज के पास कुशफरा गांव में प्रख्यात शनि पीठ भी इसी नदी के तट पर स्थित है। इसके अलावा भी इस पावन नदी के तट पर अनेक धार्मिक स्थल हैं।

 (साभार – योर स्टोरी)

बेटी के लिए माँ ने बनाया वाटरप्रूफ फीडिंग सूट

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हर मां अपने बच्चे के लिए अलग तरह से सोचती है और उसके पालन-पोषण का तरीका भी दूसरों से अलग होता है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली एक मां ने अपने बच्चे के लिए कुछ ऐसा बनाया, जिसकी डिमांड पूरी दुनिया से आने लगी है।

ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली 37 साल की ग्रुबेज रेने ने अपनी 6 महीने की बेटी एवेरी के लिए एक खास फीडिंग सूट बनाया, जिसे पहनने के बाद बच्चे की बॉडी पूरी तरह कवर होती है और उसके कपड़ों के ऊपर खाने-पीने की चीजें नहीं गिरतीं और बार-बार बच्चों के कपड़े भी नहीं बदलने पड़ते।

रेने एक कामकाजी महिला हैं। रेने ने बताया कि मैटरनिटी लीव खत्म होने के बाद मेरे पास इतना वक्त नहीं होता था कि मैं उसे खिलाऊं भी और उसके बाद बार-बार कपड़े भी बदलूं। मैं चाहती थी कि वो जरा भी देर गीली न रहे पर नैपकिन और छोटे कपड़े बिल्कुल भी बचाव नहीं कर पाते थे इसलिए मैं इन सब से तंग आ गई थी, कई बार कपड़ों पर लगे खाने के दाग निकल नहीं पाते थे। बारिश में तो समस्या और बढ़ जाती थी।

रेने ने यह सूट बनाने से पहले गूगल पर भी सर्च किया, पर उन्हें कुछ मिला नहीं इसलिए रेने खुद ही ऐसी ड्रेस बनाने की तैयारी कर ली जो उनकी बेटी की जरूरतों को पूरा करने वाला था। रेने का आइडिया काम कर गया और ये सूट दूसरों को पसंद आने लगा। धीरे-धीरे रेने के पास इसके लिए ऑर्डर आने लगे, जिसके बाद रेने ने अपना एक स्टार्टअप शुरू कर दिया। रेने के इस सूट की कीमत 4900 रुपये है। रेने 6 महीने के बच्चे से लेकर 2 साल तक के बच्चों के लिए यह सूट बनाती हैं।

 

पति का साथ और सास की दुआएँ, राजस्थान की बालिका वधु बनेगी डॉक्टर

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जब वह महज आठ साल की थी, तभी उसकी शादी कर दी गई। उसने दसवीं भी नहीं पास किया था और उसे ससुराल भेज दिया गया। लेकिन लड़की की मेहनत और लगन देखिए कि 21 साल पूरा करने से पहले ही अब वह राजस्थान के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर बनने की पढ़ाई करेगी। जयपुर के करेरी गांव की रहने वाली रूपा यादव की कहानी दिलचस्प और प्रेरणादायक है।

रूपा का सफर आसान नहीं था। उन्हें और उनके परिवार को पिछड़ी मानसिकता के लोगों के सुनने पड़े थे ताने। गांव के लोग रूपा के ससुराल वालों को कहते थे इसे पढ़ने के बजाय घर में रखो और रसोई का काम करवाओ। पढ़ाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा, लेकिन रूपा के पति को था उनकी मेहनत और लगन पर पूरा भरोसा।

रूपा ने हर हाल में कोटा में कोचिंग करने का फैसला कर लिया। एक कोचिंग संस्थान को जब रूपा की कहानी पता चली तो उन्होंने उनकी 75 प्रतिशत फीस माफ कर दी। लेकिन रूपा का सफर इतना आसान तो था नहीं। उन्हें और उनके परिवार को पिछड़ी मानसिकता के लोगों के ताने सुनने पड़ते थे। गांव के लोग रूपा के ससुराल वालों को कहते थे कि इसे पढ़ने के बजाय घर में रखो और रसोई का काम करवाओ। रूपा को पढ़ने के लिए 6 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। रूपा की सास अनपढ़ हैं, लेकिन किसी की परवाह न करते हुए उन्होंने अपनी बहु को पढ़ने के लिए भेजा।

भारत में बाल विवाह पर कानूनी प्रतिबंध है, लेकिन राजस्थान समेत देश के कई अन्य राज्यों में आज भी बच्चों की शादी काफी कम उम्र में कर दी जाती है। रूपा जब तीसरी कक्षा में पढ़ रही थीं तभी उनकी शादी सातवीं में पढ़ने वाले शंकर लाल से कर दी गई। इतना ही नहीं उसी समारोह में उनकी बड़ी बहन की शादी शंकर के बड़े भाई से कर दी गई। जिस उम्र में रूपा को शादी का मतलब भी नहीं पता था, उस उम्र में वह शादी के बंधन में बंध गईं। जब वह दसवीं कक्षा में पहुंची तो उनका गौना हुआ। यानी वे अपने माता-पिता का घर छोड़कर अपनी ससुराल आ गईं। अच्छी बात यह रही, कि उनके पति और ससुराल वालों ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्होंने दसवीं की परीक्षा दी।

जब रिजल्ट आया तो सबके चेहरे पर खुशी झलक रही थी, क्योंकि रूपा ने दसवीं के एग्जाम में 84 प्रतिशत नंबर हासिल किए थे। शंकर के गांव में कोई स्कूल नहीं था इसलिए रूपा को पढ़ने के लिए 6 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। रूपा की सास अनपढ़ हैं, लेकिन किसी की परवाह न करते हुए उन्होंने अपनी बहु को पढ़ने के लिए भेजा।

12वीं पास करने के बाद रूपा ने बीएससी में दाखिला ले लिया और मेडिकल का एंट्रेंस एग्जाम देने की तैयारी करने लगीं। लेकिन पहले प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिली और उन्हें 23,000 रैंक से संतोष करना पड़ा। वह बताती हैं कि किसी ने उन्हें कोटा जाकर कोचिंग करने की सलाह दी, लेकिन वह इस दुविधा में थीं कि उनके ससुराल वाले कोटा भेजने को राजी होंगे या नहीं। उन्होंने जब यह बात अपने पति और भाई को बताई तो वे रूपा के सपने को पूरा करने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने लगे।

रूपा ने घर पर रहकर तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन 2016 में भी उन्हें सफलता नहीं मिली। रूपा ने हर हाल में कोटा में कोचिंग करने का फैसला कर लिया। एक कोचिंग संस्थान को जब रूपा की कहानी पता चली तो उन्होंने उनकी 75 प्रतिशत फीस माफ कर दी। लेकिन रूपा का सफर इतना आसान तो था नहीं। उन्हें और उनके परिवार को पिछड़ी मानसिकता के लोगों के ताने सुनने पड़ते थे। गांव के लोग रूपा के ससुराल वालों को कहते थे कि इसे पढ़ने के बजाय घर में रखो और रसोई का काम करवाओ। पढ़ाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा। मगर रूपा के पति को उन पर काफी भरोसा था। कोचिंग में काफी कम फीस लगने की वजह से शंकर ने अपने घरवालों को समझा लिया।

कोचिंग करने पर उनके परिवार की आर्थिक हालात खराब हो रहे थे, क्योंकि पढ़ाई और रहने में काफी पैसे खर्च हो रहे थे। उनके ससुराल वालों ने कोचिंग का खर्चा उठाने के लिए पैसे उधार लिए और एक भैंस पाल ली ताकि उससे दूध बेचकर कुछ कमाई हो सके। लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और 15 दिन में ही वह भैंस मर गई। परिवार वालों को काफी बड़ा घाटा हुआ लेकिन रूपा इतनी खुशकिस्मत हैं कि उन्हें किसी ने इस बात की सूचना नहीं दी। क्योंकि इससे उनकी पढ़ाई पर असर पड़ सकता था।

रूपा ने कोचिंग की मदद से जमकर मेहनत की और 2017 के नीट एग्जाम में 720 में से 603 नंबर लाकर ऑल इंडिया लेवल पर 2,283वीं रैंक हासिल कर ली। वह काउंसिलिंग में शामिल होने जा रही हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि कोई न कोई सरकारी कॉलेज जरूर मिल जाएगा। वह एसएमएस मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहती हैं।

रूपा के पति ने आर्ट्स में ग्रैजुएशन किया है और वह गांव में ही रहकर खेती का काम करते हैं। अपनी पत्नी की इस सफलता पर वे काफी खुश हैं। कोटा में एलन कोचिंग इंस्टीटीट्यूट के डायरेक्टर नवीन माहेश्वरी बताते हैं, कि रूपा ने काफी मेहनत की थी। वह काफी मेधावी छात्रा रही हैं। रूपा बताती हैं कि उनके चाचा भीमाराम यादव की मौत हार्ट अटैक से हो गई थी। क्योंकि उन्हें इलाज सही से नहीं मिल पाया था, इसलिए उन्होंने डॉक्टर बनने का फैसला किया।

 

ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के लिए लॉन्च हुआ सेनेटरी पैड बैंक

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महाराष्ट्र में वर्सोवा की एमएलए डॉ. भारती लावेकर ने एक नई पहल करते हुए अपनी एनजीओ टी फाउंडेशन के जरिये आदिवासी इलाके की औरतों एवं जरूरतमंद लड़कियों के लिए सेनेटरी पैड बैंक लॉन्च किया है। इस अभियान के तहत ना सिर्फ महिलाओं को पैड दिया गया बल्कि एक नए सैनेटरी पैड को भी लॉन्च किया गया। डॉ भारती के इस नए फाउंडेशन के जरिए गांव के कोने-कोने तक सैनेटरी पैड को पहुंचाया जाएगा।

सभी जानते हैं कि महिलाओं की आधी जनसंख्या पीरियड्स के दौरान सैनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं करती हैं। आमतौर पर ऐसी कई महिलाएं हैं जो मासिक धर्म को लेकर जागरुक नहीं है। कई महिलाएं ऐसी हैं जो सेनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं करती हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई तरह की बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है। कई ब्लड बैंक बने, मिल्क बैंक बने, लेकिन किसी का भी ध्यान महिलाओं की इस समस्या पर नहीं गया। महाराष्ट्र में वर्सोवा की एमएलए डॉ. भारती लावेकर ने एक नई पहल करते हुए अपनी एनजीओ टी फाउंडेशनके जरिये आदिवासी इलाके की औरतों एवं जरूरतमंद लड़कियों के लिए सेनेटरी पैड बैंक लॉन्च किया है। यह अपनी ही तरह का पहला सेनेटरी बैंक है, जिसके जरिये समाज में मेन्स्ट्रूअल हेल्थ और हाइजीन की अवेयरनेस को बढ़ाया जाएगा।

भारतीय महिलाओं की मासिक धर्म से जुड़े निराशाजनक आंकड़े सामने आए हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के मुताबिक 57.6% महिलाओं ने मासिक धर्म के वक्त सेनेटरी पैड का उपयोग किया। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाएं मासिक धर्म के दौरान कपड़े या कपड़े से बने पैड का इस्तेमाल करती हैं। इनमें से कुछ प्रतिशत महिलाएं ऐसी भी हैं जो मासिक धर्म के दौरान बिना किसी पैड के भी रहती हैं।

क्या है योजना

आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन्स नि:शुल्क और बिना किसी निश्चित पहचान जाँच के दिया जाएगा। इसके लिए गैर आदिवासी इलाकों की महिलाओं को अपना रजिस्ट्रेशन ऑरेंज कार्ड दिखा कर कराना होगा, उसके बाद उन्हें महीने के 10 सेनेटरी नैपकिन्सदिए जाएंगे। महिलाएं अपना रजिस्ट्रेशन फेसबुक, वेबसाइट, फोन कॉल या ऑफिस में आ कर भी करा सकती हैं। इस कैंपेन के अंतर्गत स्कूल, कॉलेज और पब्लिक शौचालय में सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन और डिस्पोजल मशीन भी लगाई जाएंगी। सेनेटरी पैड बैंक की भव्य लॉंचिंग फिल्म अभिनेत्री जीनत अमान एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस की पत्नी अमृता फड़नवीस के द्वारा की गयी। महाराष्ट्र में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी ने महिलाओं को जागरुक करने और उनकी सेहत को ध्यान में रखकर उनके लिए सैनेटरी पैड बैंक बना डाला।

क्या है इस अभियान का उद्देश्य

इस अभियान के तहत ना सिर्फ महिलाओं को पैड दिया गया, बल्कि एक नए सैनेटरी पैड को भी लॉन्च किया गया। डॉ भारती के इस नए फाउंडेशन के जरिए गांव के कोने-कोने तक सैनेटरी पैड को पहुंचाया जाएगा। डॉ भारती का कहना है कि ‘जब तक महिलाएं जागरुक नहीं होंगी अपनी सेहत का ख्याल नहीं रखेंगी तो आने वाली जनरेशन को जागरुक करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। फिलहाल सरकार 10 महीनों के लिए मुफ्त सैनिटरी पैड फ्री में मुहैया करवा रही है लेकिन इसमें साल भर की दो महीने की छुट्टी शामिल नहीं है लेकिन ग्रामीण स्कूल हमारे साथ जुड़ते हैं तो हम उन्हें दो महीने तक यह पैड फ्री प्रदान करेंगे जो सरका की योजना में शामिल नहीं है। टी फाउंडेशन के माध्यम से डोनर्स और जरूरतमंदों के बीच गैप को कम करने के उद्देश्य से डिजिटल सैनीटरी पैड बैंक की शुरुआत की गई है। इसके लिए बीते एक साल से तैयारी की जा रही थी। डोनर्स या तो पैसे या फिर सैनिटरी पैड दान कर सकते हैं। 10 पैड के एक पैकेट की कीमत सात रुपए रुपये है। हम लोगों की जरूरत अनुरूप उन तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।’

एक आंकड़े के अनुसार आज भी 50 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां मासिक धर्म के कारण स्कूल नहीं जाती हैं। महिलाओं को आज भी इस मुद्दे पर बात करने में झिझक होती है जबकि आधे से ज्यादा को तो ये लगता है कि मासिक धर्म कोई अपराध है। बस गांव की लड़कियों की इस सोच को बदलने का ये अच्छा मौका है।

इस पैड बैंक को उम्मीद है, कि यह उनकी मांग के मुताबिक हर महिला और लड़की के लिए उपलब्ध होगा है। इस डिजिटल ऑनलाईन बैंक का कहना है कि वह हर तरह की लड़कियों और महिलाओं को उनकी इच्छा के अनुसार सैनिटरी पैड उपल्ब्ध करवाएगा। महिलाए को ज्यादा जानकारी नहीं होती जिसके चलते वे मासिक धर्म के दौरान खराब चीजों का उपयोग करती हैं, जो सर्वाइकल कैंसर का एक प्रमुख कारण है। इसलिए महिलाओं और लड़कियों को उनकी आवश्यक्ता के अनुसार सैनिटरी पैड उपलब्ध करवाने के लिए इस तरह की पहल की जरुरत है।

(साभार – योर स्टोरी)

 उसने बना डाले 40 से ज्यादा एजुकेशनल एप्स

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देश में ऐसे लाखों करोड़ों बच्चे हैं, जिनके पास किताबें खरीदने को पैसे नहीं, ऐसे अनगिनत बच्चे हैं, जो चाहते तो पढ़ना-लिखना हैं, लेकिन मजबूर हैं न कर पाने को, उन्हीं मजबूर बच्चों में से निकले हैं रावपुरा जयपुर के शंकर यादव। शंकर यादव की सबसे अच्छी बात है, कि उन्होंने अपनी मजबूरियों का रोना न रोते हुए उसे ही अपनी ताकत बना लिया…

राजस्थान जयपुर गांव रावपुरा के शंकर यादव ने दूसरों के लिए देखा किताबों का सपना और समाधान नज़र आया डिजिटल ऐप्स में। आज की तारीख में शंकर बना चुके हैं 40 से ज्यादा एजुकेशनल ऐप। उनके ऐप कर रहे हैं, दूसरों के पढ़ने में मदद।  शंकर यादव के सारे ऐप्स गूगल प्ले स्टोर पर फ्री में उपलब्ध हैं, जिन्हें कोई भी वहां से डाउनलोड कर सकता है। शंकर द्वारा बनाये गये ये ऐप्स ऑफलाइन काम करते हैं और टाइम-टू-टाइम अपने हिसाब से ऑटोमेटिक अपडेट हो जाते हैं।

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां लाखों-करोड़ों बच्चे चाह कर भी पढ़-लिख नहीं पाते। उन्हीं बच्चों में से एक हैं राजस्थान, जयपुर जिला स्थित रावपुरा गांव के रहने वाले शंकर यादव। एक समय ऐसे था, कि शंकर यादव के पास भी अपने सिलेबस के अलावा अन्य किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे। वे किसी तरह से अपनी पढ़ाई को जारी रखे हुए थे। उन्हीं दिनों शंकर यादव ने एक सपना देखा, कि वह कुछ ऐसा करेंगे, जिससे उनके जैसे बच्चों को किताबें खरीदने की जरूरत ही न रहे। इस समस्या का समाधान शंकर को डिजिटल ऐप में नजर आया और बगैर किसी प्रोफेशनल डिग्री के 21 साल के शंकर ने बना डाला एजुकेशनल ऐप। आज की तारीख में शंकर 40 से ज्यादा ऐप्स बना चुके हैं।

अपने गांव को डिजिटल बनाने की पहल में शंकर ने एसआर डेवलपर्स के नाम से अपनी खुद कंपनी भी शुरू की है। लगभग आठ महीने पहले ही इन ऐप्स को गूगल प्ले स्टोर पर डाला गया था। खास बात है कि अब तक इन ऐप्स को 20 लाख से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। गूगल प्ले स्टोर पर शंकररावपुरा डॉट कॉम (shankarraopura.com) सर्च करने पर ये सारे ऐप्स डाउनलोड के लिए उपलब्ध हो जाते हैं।

वर्ष 2009 में शंकर जब 8वीं कक्षा के छात्र थे, तब गांव के सरकारी स्कूल के शिक्षक शिवचरण मीणा ने उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने हेतु प्रश्नों के उत्तर ऑनलाइन खोजने की सलाह दी। तब उन्हें एहसास हुआ कि ऑनलाइन भी पढ़ाई की जा सकती है। शंकर के मुताबिक, यह पहला मौका था, जब उन्हें लगा कि किताबों को भी डिजिटल स्वरूप में एक्सेस किया जा सकता है। इसके बाद उनकी रुचि कंप्यूटर में बढ़ने लगी। कंप्यूटर में बेटे की बढ़ती रुचि को देख शंकर के पिता कल्लूराम यादव ने कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद कंप्यूटर खरीदा। इसके बाद शंकर पढ़ाई के साथ-साथ कंप्यूटर पर भी समय बिताने लगेष। इस दौरान उन्होंने गूगल पर ऐप बनाने की तकनीक को भी सर्च करके सीखने की शुरुआत की।

शंकर ने रावपुरा स्थित सरकारी स्कूल से वर्ष 2011 में 10वीं बोर्ड की परीक्षा पास की। फिर गांव के ही एक प्राइवेट प्लस-टू स्कूल से गणित विषय से 12वीं पास की। ऐप को लेकर शंकर की दिलचस्पी इस तरह बढ़ी कि वे प्रोग्रामिंग सीखने की ऑनलाइन क्लासेज के बारे में सर्च करने लगे और उन्होंने एंड्रॉयड डेवलपमेंट की ट्रेनिंग बेंगलुरु से ऑनलाइन लेनी शुरू कर दी।

एंड्रॉयड डेवलपमेंट का कोर्स करने के बाद शंकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किये गये डिजिटल इंडिया मुहिम से खासा प्रेरित हुए और इसी मुहिम से प्रेरणा लेते हुए वे बदलाव की राह पर आगे चल निकले। एक के बाद एक एजुकेशनल ऐप बनाये। एजुकेशनल ऐप के अलावा शंकर ने धर्म, स्वास्थ्य, खेल आदि से संबंधित ऐप्स भी बनाये हैं। एप्स के कंटेंट जेनरेशन में उनके कई शिक्षकों और दोस्तों ने मदद की। अभी शंकर समेत चार अन्य लोगों की एक टीम है, जो ऐप्स को अपडेट रखने में उनका सहयोग करते हैं। गांव में इंटरनेट व नेटवर्क की अनुपलब्धता को देखते हुए उन्होंने इस तरह के ऐप्स बनायें हैं, जो अॉफलाइन भी इस्तेमाल में लाये जा सकते हैं।

शंकर अपने गांव के पहले ऐप डेवलपर हैं। उन्होंने अपने गांव की हर छोटी-बड़ी जानकारी से लैस डिजिटल रावपुरा नाम से एक एप तैयार किया है, जिसमें गांव की सभी जानकारियों को उसमें डाला गया है। शंकर की इस पहल के लिए आईएएस अधिकारी व जिला कलेक्टर  (दक्षिण सिक्किम)  राजकुमार यादव तथा  के राजस्थान भाजपा सह संयोजक खेल प्रकोष्ठ के  राजकुमार देवायुष सिंह  ने उन्हें सम्मानित भी किया है। शंकर के पिता कल्लूराम यादव एक किसान हैं और उनकी माता ज्याना देवी गृहिणी हैं। शंकर बताते हैं कि इन ऐप्स से थोड़ी कमाई भी होने लगी है, लेकिन उन्हें मिल रही तारीफ से उनके माता-पिता ज्यादा खुश हैं।

शंकर ने अपने सभी एजुकेशनल ऐप्स 10वीं और 12वीं के बच्चों व प्रतियोगी परीक्षा को ध्यान में रख कर बनाया हैं। विज्ञान, गणित, भूगोल व सोशल साइंस के अलावा भारतीय संविधान, राजस्थान की संस्कृति,जनरल नॉलेज से जुड़े एप्स भी बनाये हैं। इनके भौतिक विज्ञान समेत दर्जनों ऐप्स को 50 हजार से ज्यादा लोग इंस्टॉल कर चुके हैं। शंकर के मुताबिक, हर दिन उनके एप्स को लगभग 1.5 करोड़ व्यूज मिलते हैं। शंकर कहते हैं कि एड से नॉर्मल इनकम हो जाती है, जिससे अपडेट करने का खर्च निकल जाता है। शंकर का मानना है कि एेप्स एक ऐसा जरिया है, जिससे देश का बच्चा-बच्चा आसानी से शिक्षित हो सकता है।