Thursday, October 1, 2026
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साहित्यकार ममता कालिया को 2017 का व्यास सम्मान

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हिंदी की जानी-मानी साहित्यकार ममता कालिया को वर्ष 2017 का प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ देने की आज घोषणा की गई। ममता कालिया को उनके उपन्यास दुक्खम-सुक्खम के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और साहित्यकार विश्वनाथ तिवारी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने यह निर्णय लिया है।

ममता कालिया को सत्ताइसवें व्यास सम्मान से नवाजा जाएगा। दुक्खम सुक्खम 2009 में प्रकाशित हुआ था। ममता कालिया ख्यात साहित्यकार हैं। दुक्खम सुक्खम के अलावा ‘बेघर’, ‘नरक-दर-नरक’, ‘सपनों की होम डिलिवरी’, ‘कल्चर वल्चर’, ‘जांच अभी जारी है’, ‘निर्मोही’, ‘बोलने वाली औरत’, ‘भविष्य का स्त्री विमर्श’ समेत कई  पुस्तकें हैं। उनकी कहानियां भी काफी चर्चित रही हैं।

उनकी कहानियों में मध्यवर्ग का अलग ही चित्रण मिलता है। अपने पात्रों का सजीव चित्रण करने वाली ममता कालिया की भाषा सहज और सरल होती है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी समकालीन लेखिकाओं से अलग मुकाम बनाया है।

यह सम्मान दस वर्ष की अवधि में हिन्दी में प्रकाशित किसी रचना को दिया जाता है। 1991 में शुरू किया गया यह पुरस्कार की गई थी। पहला व्यास सम्मान डॉ राम विलास शर्मा को दिया गया था। इस साल दो नवंबर 1940 को वृन्दावन में जन्मी ममता कालिया को यह पुरस्कार दिया जाएगा। हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी ममता कालिया लिखती रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रजी में एम.ए. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने मुंबई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया। बाद के कई वर्ष वह इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज में प्राचार्य रहीं और यहीं से सेवानिवृत्त हुईं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा यशपाल कथा सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान एवं राम मनोहर लोहिया सम्मान से सम्मानित किया गया है। इसके अतिरिक्त उन्हें वनमाली सम्मान एवं वाग्देवी सम्मान से भी नवाजा गया है।

 

पत्थरबाजी करने वाली लड़की कश्मीर की फुटबॉल टीम की कप्तान

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जम्मू-कश्मीर की अफ्शा आशिक की कहानी हमारी पीढ़ी को प्रेरित करने की कूव्वत रखती है। सिर्फ 21 साल की उम्र में प्रदेश की फुटबॉल टीम का नेतृत्व करने वाली अफ्शा ने कश्मीर के बारे में लोगों की धारणा को बदलने में अहम भूमिका निभाई है। वह एक ऐसे समाज से आती हैं जहां महिलाओं को घर से बाहर यूं निकलना अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन अफ्शां ने इस रूढ़िवादी सोच को दरकिनार रखते हुए अपनी ख्वाहिशों को तरजीह दी और आज वो अपने सपने पूरे करने की राह पर निकल पड़ी है। लेकिन यह सब बदला इसी साल 24 अप्रैल को। इसी साल 24 अप्रैल को अफ्शा अपने कोच और साथी फुटबॉलरों के साथ हाथ में पत्थर लेकर सड़क पर उतर आई थीं। उन्होंने बताया, ‘जम्मू और कश्मीर पुलिस ने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया था। उन्होंने हमारी टीम की एक फुटबॉलर को थप्पड़ मार दिया था। जिसके विरोध में हमारे साथियों ने विरोध करने को कहा और हम सड़क पर उतरे थे।’ हालांकि अफ्शां खुद ही पत्थरबाजी का विरोध करती रही हैं। वे हमेशा से इसके खिलाफ रही हैं, लेकिन एक वाकए के बाद उन्हें हाथ में पत्थर लेकर सड़क पर उतरना पड़ा। वे कहती हैं, ‘सच कहूं तो मुझे हिंसक विरोध प्रदर्शनों से नफरत है। इससे हमारे युवाओं का ही नुकसान होता है। अगर युवा पीढ़ी का विकास नहीं होगा तो हम आगे नहीं बढ़ सकते।’ अफ्शां की फुटबॉलरों वाली जिंदगी आज से 4 साल पहले शुरू हुई थी तब वे 17 साल की थीं। अब वे प्रदेश के लिए खेलती हैं। पिछले साल वह राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला फुटबॉलर थीं। उनके कोच ने बताया कि अफ्शां बहुत बेहतरीन गोलकीपर है, लेकिन कम लड़कियां होने की वजह से उसे पुरुषों की टीम में प्रैक्टिस करना पड़ता है।

 

अफ्शां के सपने काफी बड़े हैं। वह भारत की नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलना चाहती हैं और देश नाम रोशन करना चाहती हैं। जम्मू और कश्मीर के हालात पर वह कहती हैं कि राज्य में शांति की सख्त जरूरत है। वे कहती हैं कि यहां की बहुसंख्यक आबादी अमनपसंद है, लेकिन कुछ लोगों की वजह से यहां अशांति व्याप्त है और सुकून चाहने वाले लोगों की कोई सुनता नहीं है। वे कहती हैं कि यहां के विरोध प्रदर्शनों में युवाओं की मौत पर उन्हें रोना आता है। अफ्शां का एक छोटा भाई भी है। वह कहती हैं कि उसे कहीं भी बाहर भेजने से पहले वे दस बार सोचती हैं। अफ्शां ने अपनी 23 सदस्यीय फुटबॉल टीम के साथ देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। उन्होंने कहा, ‘गृहमंत्री से मिलने का हमारा एक ही मकसद था कि जम्मू और कश्मीर का स्पोर्ट्स आगे जाए। वहां की सरकारी कई सारे पहल कर रही है, लेकिन केंद्र सरकार के सपोर्ट के बगैर हम आगे नहीं बढ़ सकते।  आधे घंटे तक चली बैठक में गृहमंत्री से कहा कि अगर जम्मू-कश्मीर में उचित खेल आधारभूत ढांचा तैयार किया जाता है तो युवा आतंकवाद और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों से इतर अपने कौशल को निखारने के लिए प्रेरित होंगे और राज्य का नाम चमकाएंगे। उन्होंने कहा, ‘मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। मैं विजेता बनना चाहती हूं और राज्य व देश को गौरवान्वित करने के लिए कुछ करना चाहती हूं।’ अफ्शां अभी मुंबई के एक क्लब के लिए खेल रही है।

अवैध संबंध बनाने पर महिला भी होगी अभियुक्त ! 157 साल पुराने कानून पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय व्यभिचार पर औपनिवेशिक काल के एक कानून की संवैधानिक वैधता पर विचार करने के लिए शुक्रवार (8 दिसंबर) को तैयार हो गया। इस कानून में व्यभिचार के लिए सिर्फ पुरूषों को ही सजा देने का प्रावधान है जबकि जिस महिला के साथ सहमति से यौनाचार किया गया हो वह भी इसमें बराबर की हिस्सेदार होती है, लेकिन उसे दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यदि पति अपनी पत्नी और एक दूसरे व्यक्ति के बीच संसर्ग की सहमति देता है तो यह व्यभिचार के अपराध को अमान्य कर देता है और महिला को महज एक वस्तु बना देता है जो लैंगिक न्याय और समता के अधिकार के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार जो कोई भी ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथून करेगा जो बलात्कार के अपराध की कोटि में नहीं आता है वह व्यभिचार के अपराध का दोषी है। इस अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता में पांच साल की कैद और जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। हालांकि इस तरह के मामलों में पत्नी इस अपराध के उकसाने के लिए दण्डनीय नहीं होगी।

 

कोरियाई कंपनी मथुरा में 100 एकड़ में बनाएगी वर्चुअल कृष्णा थीम पार्क, 4-डी में दिखेंगी कृष्‍ण लीलाएं

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दक्षिण कोरियाई कंपनी ने बृज क्षेत्र में वर्चुअल कृष्णा थीम पार्क बनाने की इच्छा जताई है। कंपनी के प्रतिनिधियों ने शनिवार को मुख्य सचिव व अन्य अधिकारियों के साथ बैठक में निवेश के लिए आवेदन पत्र और विकास का प्रारूप सौंप दिया। कंपनी ने ग्रामीण क्षेत्रों में हाइटेक एग्रो फार्मिंग और यमुना के विकास पर भी निवेश की पेशकश की है।

वेस्ट टेक्नोलॉजी लिमिटेड, सियोल और इसकी जॉइंट वेंचर कंपनी इंडो-कैनेडियन फार्म्स एंड रिसोर्ट, पुणे मथुरा समेत बृज के चौरासी कोस क्षेत्र में बड़ा निवेश करने के लिए कई माह से प्रयास कर रही है।

मथुरा की सांसद हेमा मालिनी के साथ बैठक के बाद शनिवार को राज्य सरकार को इसका औपचारिक प्रस्ताव दिया गया। कंपनी के प्रतिनिधियों की मुख्य सचिव राजीव कुमार व प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्थी समेत कई अधिकारियों के साथ बैठक हुई।

जॉइंट वेंचर कंपनी के एमएडी विनय तिवारी ने बताया कि कोरियाई कंपनी के चेयरमैन केके किम पहले चरण में मथुरा-वृंदावन में सौ एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में वर्चुअल कृष्णा थीम पार्क बनाना चाहते हैं। इसमें भगवान कृष्ण की लीलाओं को 4-डी तकनीक से हूबहू देखा जा सकेगा। कंपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवाएं देती है। उसके पास नई तकनीक और आर्थिक संसाधन हैं। कंपनी ने भारत में चरणबद्ध तरीके से दस वर्षों में 90000 करोड़ रुपये लगाने का प्रस्ताव बनाया है।

इसमें से 10 हजार करोड़ रुपये प्रदेश में ब्रज व आयोध्या में निवेश करने का प्रस्ताव है। कंपनी चाहती है कि पहले चरण में उप्र में जो निवेश हो उसका रिटर्न 30 से 35 वर्ष के अंदर हो जाए। बैठक में आगरा में विदेशी निवेश की भी चर्चा हुई। सियोल की कंपनी के प्रबंधन व तकनीशियन की टीम प्रजेंटेशन व स्थल चयन के लिए जल्द भारत आएगी।

 

फसल उगाकर अन्नपूर्णा बन रही हैं ये नेत्रहीन महिलाएँ

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हमें कई बार शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ्य लोग बेरोजगारी का रोना रोते दिख जाते हैं। जिनके बारे में देखकर हमें दुख होता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कितनी बदहाल है कि एक इंसान को इस काबिल नहीं बना सकती कि उसे ढंग की नौकरी या जीवनयापन का कोई साधन ही मिल जाए। फिर जब हम किसी विकलांग को शारीरिक अक्षमता से जूझते हुए काम करते देखते हैं तो हमें न केवल खुशी होती है बल्कि उन पर गर्व भी होता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि दृष्टिहीनता जैसी अपंगता से मार खाया इंसान अपना जीवन यापन करते वक्त कितनी चुनौतियों से जूझता होगा।

कहने को तो दृष्टिहीनों के लिए तकनीक है जिसके सहारे वे अपनी पढ़ाई कर सकते हैं, लेकिन हमारे देश की हालत इतनी बेहतर तो है नहीं कि दूर दराज इलाकों में रहने वाले दृष्टिहीनों को पर्याप्त शिक्षा मुहैया करवा पाए। शायद यही वजह है कि अभी भी दृष्टिहीनों को छोटे काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर की ग्रामीण महिलाओं की कहानी सुनकर आप गौरान्वित हो उठेंगे। दरअसल ये महिलाएं बचपन से ही दृष्टिहीन हैं, लेकिन ये अपना सारा काम करने के साथ ही खेती भी कर लेती हैं। ये खेतों में सब्जियां और फसलें उगाकर अपने जीवन का आर्थिक ढांचा दुरुस्त कर रही हैं।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक सिहोरा ब्लॉक के गांव जॉली की तारा बाई। 50 की उम्र पार कर चुकीं तारा बाई बचपन से दृष्टिहीन हैं। छह महीने की उम्र में आंखों की रोशनी चली गई। दृष्टिहीनता के कारण शादी नहीं हुई। जैसे जैसे समय बीता, खुद को परिवार पर बोझ मानने लगीं। मजबूर थीं। क्या करतीं। लेकिन, कुछ करना जरूर चाह रही थीं। खेती के अलावा कुछ और कर भी नहीं सकती थीं। खेती करना मुश्किल था। बागवानी का विचार आया। इसके लिए घर के बगल ही पर्याप्त जमीन भी मुहैया थी। खुद ही सब्जियां उगाने की ठानी, लेकिन दृष्टिहीनता आड़े आई।

सच में इन ग्रामीण दृष्टिहीन महिलाओं की दाद देनी पड़ेगी, जो सब्जियां उगा कर आर्थिक निर्भरता हासिल कर रही हैं। बीज, पौधों, पत्तियों, फल-फूलों को छू कर पहचानने की कला इन्होंने बड़े जतन से विकसित कर ली है। यह सब संभव हुआ एक एनजीओ के कार्यकर्ता की बदौलत जो गांव में पहुंचे। वे दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे थे। तारा बाई ने उनसे अपने मन की बात बताई। एनजीओ ने इसके लिए जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क किया। बात बन गई। कृषि विश्वविद्यालय तारा बाई को बागवानी-सब्जी उत्पादन की विशेष ट्रेनिंग देने को तैयार हो गया। तारा की ट्रेनिंग शुरू हो गई।

तारा बताती हैं, पहले हम कहीं भी पौधे लगा देते थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद हमें पता चला कि क्यारी उत्तर-दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए। इससे पौधों पर धूप सीधी नहीं पड़ती। इसके साथ ही सब्जी के अच्छे बीज भी हमें दिए गए। जॉली के साथ ही बुधुआ गांव में भी दिव्यांग महिलाएं सब्जियां उगा रही हैं। 65 वर्षीय रज्जो बाई भी नेत्रहीन हैं और अपनी जमीन पर सब्जियां उगा रही हैं। बुधुआ की दृष्टिहीन अनामिका आंगन में सब्जी के साथ ही गेंदे के फूल की भी खेती कर रही हैं। इन महिलाओं की कहानी सुनकर आप भी शायद अब सोचना बंद कर दें कि दृष्टिहीन अपनी जिंदगी कैसे चलाते हैं। देखा जाए तो ये महिलाएं हमारे जीवन के लिए प्रेरणास्रोत होनी चाहिए।

(साभार दैनिक जागरण तथा योर स्टोरी)

पहली नजर में प्यार होने के पीछे है ये सच

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पहली मोहब्बत हर किसी के लिए खास होती है। प्यार चाहे सफल हो या न हो, हर किसी के दिल में उसकी याद हमेशा जिंदा रहती है। प्यार-मोहब्बत को लेकर एक सवाल जो हर किसी के मन में उठता है वो ये है कि क्या पहली नजर में प्यार के पीछे सच्चाई है? मतलब यह कि क्या पहली नजर में प्यार हो सकता है? इस विषय को लेकर एक रिसर्च किया गया है, जिसके परिणाम बड़े दिलचस्प हैं। आइए जानते हैं कि इस रिसर्च के निष्कर्ष में क्या सामने आया है।

नीदरलैंड की एक यूनिवर्सिटी द्वारा कराए गए एक रिसर्च में यह पाया गया है कि पहली नजर में प्यार होने की संभावनाएं 46 प्रतिशत तक हो सकती हैं। सर्वे के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ-साथ पहली नजर में प्यार होने की संभावनाएं भी बढ़ती जाती हैं। सर्वे में 18-25 साल के बीच लोगों में लव ऐट फर्स्ट साइट के सबसे ज्यादा मामले देखे गए। रिसर्च में 18-25 साल के तकरीबन 396 लोगों को शामिल किया गया था जिनमें तकरीबन 60 प्रतिशत महिलाएं थीं। शोध में शामिल प्रतिभागियों को आकर्षक लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं जिनमें से ज्यादातर लोगों ने पहली नजर में अपने परफेक्ट मैच  चुन लिया।

 

हर साल बेची जाती हैं नेपाली लड़कियां, आंकड़ा 12 हजार पार

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नेपाल के शहर की चकाचौंध भरी ये गलियां किसी न किसी डांस बार पर जाकर खत्म होती हैं। यहां सूरज ढलते ही महफिल सजती है और सज-धजकर नाच रही लड़कियों के बीच फिल्मी धुनों पर लोग थिरकने लगते हैं। रात परवान चढ़ने लगती है और इस बीच एक अन्य समूह इन डांस बारों पर पहुंचता है। ये लोग खरीदार हैं जो बार में मौजूद लड़कियों की बोली लगाते हैं। सौदा तय हो जाता है और ये महफिल सुबह तक ऐसे ही चलती रहती है। इसके बाद ये लड़कियां बड़े-बड़े शहरों में मौजूद डांस बार में ले जाई जाती हैं।

नेपाल के लिए लड़कियों की तस्करी कोई नई समस्या नहीं है। 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद लड़कियों की तस्करी में अचानक देखी जा रही बढ़ोतरी ने नेपाल सरकार और नेपाल पुलिस की चिंता बढ़ा दी है।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता मनोज नेऊपाने ने कहा, समस्या कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल नवंबर महीने तक नेपाल पुलिस ने 2,700 से भी ज्यादा नेपाली लड़कियों को तस्करों और दलालों के चंगुल से छुड़वाया है। मनोज ऊपाने कहते हैं, “मानव तस्करी का ये जाल बहुत बड़ा है और इसके तार यहाँ से लेकर भारत और विदेशों तक फैले हुए हैं। मानव तस्करी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नेपाल पुलिस में हमने एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया है, हमें सफलता मिल रही है, मगर उतनी नहीं।

एक अमरीकी संस्थान के शोध के अनुसार हर साल 12,000 नेपाली लड़कियां तस्करी का शिकार हो रही हैं। भारत और नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा पर तस्करी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ऐसा मानना है नेपाल-भारत की सीमा की चौकसी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियों का।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से लगे सोनौली बॉर्डर पर तैनात उप समादेष्टा दिलीप कुमार झा कहते हैं, “उन लड़कियों को रोकना मुश्किल है जो वयस्क हैं और अपनी मर्जी से सरहद पार कर रही होती हैं। कई लड़कियां अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ होती हैं।

दिलीप झा बताते हैं, “हमें पता है कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हो सकती हैं। मगर जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास दस्तावेज सही होते हैं और वो वयस्क होती हैं। कभी जब शक पुख्ता होता है तो हम ऐसी लड़कियों को नेपाल पुलिस के अधिकारियों या वहां के सामजिक संगठनों के सुपुर्द कर देते हैं। मगर ये समस्या काफी बड़ी है। नेपाल के अधिकारियों और भारत के सीमा प्रहरियों का कहना है कि मानव तस्करी का सबसे बड़ा कारण है गरीबी, नेपाल के दूर-दराज के इलाकों में रोजगार के संसाधन नहीं होने की वजह से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। सुनीता दानुवर कम उम्र में ही तस्करी का शिकार हो गई थीं।

उन्हें मुंबई ले जाया गया जहां उनका बलात्कार हुआ, फिर उन्हें जबरन जिस्मफरोशी के काम में धकेला गया। मगर एक दिन उस जगह पुलिस का छापा पड़ा जहां सुनीता को रखा गया था। पुलिस ने उन्हें वहां से निकाला और वापस नेपाल भेज दिया। ये सिलसिला सिर्फ भारत के महानगरों तक सीमित नहीं है। सुनीता कहती हैं कि नेपाली लड़कियों को तस्करी के बाद उन्हें चीन, श्रीलंका और अरब देशों में बेचा जाता है जहां उन्हें जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया जाता है।

मगर तस्करी की पीड़ितों की विडंबना है कि वापसी के बाद उन्हें ना उनका परिवार अपनाता है और ना ही समाज, काठमांडू में बने एक पुनर्वास केंद्र में रहने वाली एक पीड़ित नेपाली लड़की का कहना है, मुझे अच्छी नौकरी का झांसा देकर दिल्ली ले जाया गया मगर जब मैं वहां पहुंची तो खुद को एक छोटे से गंदे से कमरे में पाया। वहां पर और भी नेपाली लड़कियां थीं। मैं बेबस थी और मुझे जिस्मफरोशी के काम में जबरदस्ती झोंक दिया गया। कई महीनों के बाद मैं किसी तरह वहां से निकलकर भाग सकी।

नाम नहीं बताने की शर्त पर बात करने को तैयार हुई तस्करी की शिकार एक अन्य नेपाली युवती ने कहा कि वो शादी के झांसे में आ गई और होश संभाला तो खुद को जिस्मफरोशी की मंडी में पाया। वो कहती हैं, मैं जिस लड़के से प्यार करती थी उसने मुझे मुंबई में बेहतर जिन्दगी का भरोसा दिलाया। मैं उसके साथ दिल्ली चली गई, मगर वो मुझे उम्रदराज आदमी के पास छोड़कर भाग गया। उस व्यक्ति ने मेरा बलात्कार किया। फिर मैं जिस्मफरोशी की मंडी में फंस गई।

सुनीता दानुवर कैमरे के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाने में हिचकिचाती नहीं हैं, बल्कि अब उन्होंने एक सामजिक संगठन बनाकर पीड़ित लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम करना शुरू किया है। वो कहती हैं कि ये काम भी इतना आसान नहीं है। वो बताती हैं, शुरू में हमने पीड़ितों को प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि वो बाहर जाकर नौकरी कर सकें और अपनी आजीविका चला सकें। ऐसा हुआ भी लेकिन जब लोगों को पता चला कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हुई थीं तो वो फायदा उठाने की कोशिश करने लगे।
अब हम यहीं पर इनके लिए रोजगार के मौके बढ़ाने की कोशिश पर काम कर रहे हैं। मगर नेपाल में संसाधनों की कमी है, इसलिए इन पीड़ितों को और भी ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है।
हालांकि, कुछ एक सामाजिक संगठन इन पीड़ितों को सामान्य ज़िन्दगी में वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, मगर जिस्मफरोशी की मंडियों में बेची गईं इन नेपाली लड़कियों की आत्मा पर लगे घाव उन्हें हमेशा तकलीफ देते रहेंगे।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

राम लला के कपड़े सिलते हैं 3 मुस्लिम, 24 घंटे रोशनी और सुरक्षा का रखते हैं ध्यान

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शायद ही कोई इस बात से वाकिफ हो कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से राम लल्ला के कपड़े सिलने से लेकर रोशनी और सुरक्षा की जिम्मेदारी तीन मुस्लिम निभा रहे हैं।

राम जन्मभूमि से जुड़े विवाद के बारे में सब जानते हैं, लेकिन शायद ही कोई इस बात से वाकिफ हो कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से राम लला का वस्त्र तैयार करने से लेकर रोशनी और सुरक्षा की जिम्मेदारी तीन मुस्लिम निभा रहे हैं। जब कभी आंधी या तेज बारिश की वजह से कंटीले तार टूट जाते हैं तो लोक निर्माण विभाग अब्दुल वाहिद को याद करता है। वहीं, जब राम लला के लिए कपड़े की जरूरत पड़ती है तो सादिक अली उनके लिए कुर्ता, सदरी, पगड़ी और पायजामे तैयार करते हैं। इन दोनों के साथी महबूब आयोध्या के अधिकतर मंदिरों में चौबीसों घंटे बिजली की वयवस्था की जिम्मेदारी निभाते हैं।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुल, सादिक और महबूब वर्षों से राम लला मंदिर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अब्दुल वाहिद को मंदिर की सुरक्षा चाक-चौबंद रखने में सहयोग करने के लिए प्रतिदिन 250 रुपये मिलते हैं। वह बताते हैं कि यह काम करके उन्हें बहुत खुशी मिलती है। सादिक का कहना है कि वह राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुरोहित के लिए भी कपड़े तैयार करते हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज्यदा संतुष्टि राम लला के लिए वस्त्र तैयार करने में मिलती है। वह बताते हैं कि ईश्वर सबके लिए एक है। बकौल सादिक, उन्होंने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के सभी पक्षकारों के लिए कपड़े तैयार किए हैं। इनमें हनुमानगढ़ी मंदिर के प्रमुख रामचंद्र दास परमहंस भी शामिल रहे हैं। सादिक बताते हैं कि वह और उनका बेटा पिछले 50 वर्षों से कपड़े सिलने का काम कर रहे हैं। सत्तावन वर्ष पुरानी ‘बाबू टेलर्स’ हनुमानगढ़ी मंदिर की जमीन पर ही है, जिसके लिए किराये के तौर पर प्रति माह 70 रुपये का भुगतान करना होता है।

 

बिहार की 13 साल की लड़की, जिसे अंग्रेजी न आई और एशियन बिजनेस विमन ऑफ द इयर

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एक लड़की, जिसे अंग्रेजी नहीं आती थी आज वह ब्रिटेन की सबसे मशहूर शिक्षाविदों में शामिल हैं। बिहार के एक छोटे से शहर सीतामढ़ी की आशा खेमका को अपने जीवन के 25 वर्षों तक अंग्रेजी का ज्ञान तक नहीं था, लेकिन आज उन्होंने आज हजारों अंग्रेज छात्रों की जिंदगियों को बदल दिया। वर्तमान में आशा खेमका ब्रिटेन के प्रख्यात कॉलेज वेस्ट नाटिंघमशायर कॉलेज की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रिंसिपल हैं। उन्हें ‘एशियन बिजनेस विमन ऑफ द इयर’ के सम्मान से नवाजा गया है।

आशा खेमका ने यह बात साबित की है कि अगर मन में चाह है तो कोई भी बाधा मनुष्य को रोक नहीं सकती है। वह कहती हैं, ‘शिक्षा को लेकर अपने जुनून को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती और यह जुनून हर दिन बढ़ता जा रहा है। मैं इस शानदार क्षेत्र का हिस्सा बन कर बहुत गौरवान्वित महसूस करती हूं।’उनका जन्म बिहार के सीतामढ़ी जिले में एक व्यवसायी परिवार में 21 अक्तूबर 1951 को हुआ था।
आपको जान कर हैरानी होगी कि उन्हें महज 13 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। एक दिन अचानकवालों ने आशा से कहा कि वह साड़ी पहन कर तैयार हो जाएं। उसे शादी के लिए लड़के वाले देखने आ रहे हैं। आशा खूब रोई, लेकिन घर वालों की इच्छा के सामने उनकी एक न चली और 15 साल की उम्र में उनकी सगाई होगी। उनके होने वाले पति शंकर लाल खेमका तब मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। शादी के करीब 50 वर्ष बाद भी उनका यह प्रेम जस का तस है। डॉ. शंकर लाल खेमका आज ब्रिटेन के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं।

1978 में आशा खेमका अपने पति और तीन बच्चों- बेटी शालिनी वथा दो बेटों शील और स्नेह के साथ इंग्लैंड आ गई। जब वह इंग्लैंड आईं तो अंग्रेजी का ज्ञान नहीं था। उनकी शिक्षा भी कुछ खास नहीं थी। यहां आकर वह कई सालों तक अपने घर के कामकाज में ही मशगूल रहीं। साथ ही अपने जैसी महिलाओं के साथ अंग्रेजी में बात करके अंग्रेजी को बेहतर बनाती रहीं।

जब बच्चे कुछ बड़े हो गए तो उन्होंने अपनी अधूरी पढ़ाई फिर शुरू की। फिर कार्डिफ यूनिवर्सिटी से बिजनेस डिग्री हासिल की और उसके बाद अध्यापन के क्षेत्र में कदम रखा। 2006 में वह वेस्ट नॉटिंघम कॉलेज की प्रिंसीपल बनीं। यह कॉलेज इंग्लैंड के सबसे बड़े कॉलेजों में से एक है।

आशा खेमका ‘एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेज इन इंडिया’ की चेयरपर्सन भी हैं। उनका एक चैरिटेबल ट्रस्ट भी है ‘द इंस्पायर एंड अचीव फाउंडेशन’। इस ट्रस्ट का उद्देश्य है 16 से 24 साल के उन युवाओं को अपना भविष्य संवारने में मदद करना, जो शिक्षा, रोजगार से वंचित हैं और उनके पास किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं है।
शिक्षा के क्षेत्र में उनके बेहतरीन योगदान के लिए कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा चुका है। 2013 में उन्हें ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित किया जा चुका है। इस सम्मान को महिलाओं के लिए ‘नाइटहुड’ उपाधि के समान माना जाता है। महिलाओं के लिए यह सर्वोच्च ब्रिटिश सम्मान है। आशा इस सम्मान को पाने केवल दूसरी महिला हैं। यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय महिला धार की महारानी लक्ष्मी देवी थीं।

 

नवाबों के शहर लखनऊ को मिली पहली महिला मेयर

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहली महिला मेयर बनने का मौका आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संयुक्ता भाटिया को मिला।

देश की पहली महिला राज्यपाल और पहली महिला मुख्यमंत्री देने का गौरव उत्तर प्रदेश को हासिल है और अब नवाबों के शहर लखनऊ को एक सदी में पहली बार आज महिला मेयर मिली है।
भाजपा की संयुक्ता भाटिया ने आज हुई मतगणना में समाजवादी पार्टी की मीरा वर्धन को एक लाख 31 हजार 356 वोटों से हराकर राजधानी के मेयर पद पर अपना कब्जा जमाया। भाटिया को तीन लाख 77 हजार 166 मत मिलें जबकि मीरा को दो लाख 45 हजार 810 वोट मिले।
पिछले 100 साल में लखनऊ की मेयर कोई महिला नहीं बनी थी लेकिन आज यह रिकार्ड टूट गया और संयुक्ता भाटिया पहली महिला मेयर बन गयी। इस बार लखनऊ मेयर की सीट महिला के लिए आरक्षित थी।
भाटिया का परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ा रहा है। इनके पति सतीश भाटिया लखनऊ कैंट से बीजेपी विधायक रह चुके हैं।
गौरतलब है कि सरोजिनी नायडू ‘यूनाइटेड प्राविंस’ (अब उत्तर प्रदेश) की पहली राज्यपाल थीं। वह 15 अगस्त 1947 से दो मार्च 1949 तक राज्यपाल रही।
इसी तरह सुचेता कृपलानी के रूप में उत्तर प्रदेश से देश को पहली महिला मुख्यमंत्री भी मिली थी। वह दो अक्तूबर 1963 से 13 मार्च 1967 के बीच मुख्यमंत्री पद पर रही थी। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन में बढ-चढकर हिस्सा लेने वाली सुचेता कृपलानी महात्मा गांधी के साथ आजादी की लडाई में भागीदार बनी थी। लोकसभा के लिए तीन बार महिलाएं जीतकर पहुंची हैं। लखनऊ से शीला कौल 1971, 1980 और 1984 में चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची थीं।

उत्तर प्रदेश म्यूनिसिपैलिटी कानून 1916 में अस्तित्व में आया था। बैरिस्टर सैयद नबीउल्लाह पहले भारतीय थे, ​जो स्थानीय निकाय के मुखिया बने।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 1948 में स्थानीय निकाय का चुनावी स्वरूप बदला और प्रशासक की अवधारणा शुरू की। इस पद पर भैरव दत्त सनवाल नियुक्त हुए।
संविधान में संशोधन के जरिए 31 मई 1994 से लखनऊ के स्थानीय निकाय को नगर निगम का दर्जा प्रदान किया गया। वर्ष 1959 के म्यूनिसिपैलिटी एक्ट में मेयर के निर्वाचन के प्रावधान किये गये।