ग्वालियर : जिले में 1000 बेटों के अनुपात में 849 बेटियां हैं। यह लिंगानुपात प्रदेश के औसत लिंगानुपात 918 से कम है। इन गंभीर हालातों के बीच सिटी सेंटर में कारोबार करने वाले उजाला गुप्ता का एक प्रयास सुकून देने वाला है। उन्होंने कंपनियां बनाने की सामान्य अवधारणा एंड संस और एंड ब्रदर्स से बाहर निकलकर अपनी फर्म का नाम फादर डॉटर्स एंड कम्पनी रखा है। हर महीने लगभग 25 से 30 लाख रुपये का कारोबार करने वाले गुप्ता इसी नाम से डिपार्टमेंटल स्टोर्स की चेन शुरू करने की योजना रखते हैं। इनके कर्मचारियों में भी महिलाओं की संख्या ज्यादा है। कारोबारी उजाला गुप्ता ने फर्म फादर डॉटर्स एंड कम्पनी फर्म 3 साल पहले शुरू की थी। इससे पहले इनके पिता की कंपनी एमडी एंड संस थी। उजाला, 4 भाई हैं। इस आधार पर ही फर्म का नाम रखा गया था। इसके बाद सभी भाइयों ने अपना-अपना कारोबार बढ़ाना शुरू किया तो उन्होंने कैलाश विहार सिटी सेंटर में दो मंजिला डिपार्टमेंटल स्टोर शुरू किया। गुप्ता कहते हैं कि उनकी 3 बेटियां हैं। खुशी कक्षा 11वीं, परिज्ञा 9वीं और ऊर्जा गुप्ता कक्षा 2 में पढ़ती है। बड़ी बेटी अब काम में भी हाथ बंटाने लगी हैं। श्री गुप्ता ने खुद कक्षा 11 तक ही पढ़ाई की है, लेकिन वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाएंगे। कारोबार भी बेटियों को ही संभालना है। कलेक्टर अनुराग चौधरी ने भी इस दुकान को अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। इसमें कलेक्टर ने लिखा है ग्वालियर बदल रहा है, हमेशा एंड ब्रदर्स और एंड संस ही देखा था। अब फादर डॉटर्स एंड कंपनी।
बप्पा की दुर्दशा न हो, इसलिए नहर-तालाब से मूर्तियां निकालकर करते हैं पुनर्विसर्जन
सूरत : गणपति बप्पा का अपमान न हो, इसलिए शहर के 150 युवाओं का ग्रुप नहर, तालाब से मूर्तियां निकालकर उन्हें समुद्र में विसर्जित करता है। ये युवा दो दिन में 2500 मूर्तियां निकालकर उनका ससम्मान समुद्र में विसर्जन कर चुके हैं। इस प्रक्रिया में जो खर्च होता है वह ये युवा अपनी जेब से करते हैं। यह ग्रुप पिछले दो साल से यह काम कर रहा है। उनका उद्देश्य लोगों में धर्म के प्रति जागरूकता लाने का है। इनका मानना है कि लोग गणपति बप्पा की मूर्ति का विसर्जन करते समय धर्म और आस्था का खयाल रखें। शनिवार को युवाओं ने डिंडोली और खरवासा में अलग-अलग जगहों से गणेश प्रतिमाओं को जमा किया और उन्हें ट्रक से ले जाकर समुद्र में विसर्जित किया। नहरों-तालाबों व अन्य जगहों से गणेश प्रतिमाओं को जमाकर समुद्र विसर्जित करने का काम 2 वर्ष पहले शुरू किया था। ग्रुप के मुताबिक अब तक 5 हजार से ज्यादा मूर्तियों का विसर्जन समुद्र कर चुके हैं। इन युवाओं का कहना है कि हमें अपनी बात किसी को समझाने के लिए करके दिखाना ही सबसे अच्छा माध्यम है, इसलिए हमारा यह काम जारी रहेगा।
नौकरी माँगने पहुंचे 12 दिव्यांग, डीएम ने कलेक्ट्रेट परिसर में ही खुलवा दिया ‘कैफे एबल’
थूथुकुडी : तमिलनाडु के थूथुकुडी जिला परिसर में खुले ‘कैफे एबल’ से 12 दिव्यांगों को रोजगार मिला है। दरअसल, पिछले दिनों 12 दिव्यांग कलेक्टर संदीप नंदूरी के पास नौकरी माँगने पहुंचे थे। दिव्यांगों से बातचीत के दौरान डीएम उनसे प्रभावित हुए और उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर में ही कैफे खुलवाने का प्रस्ताव दिया और वे मान गए। सभी दिव्यांग आराम से काम कर सकें, इसलिए उन्हें 45 दिन की होटल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग भी दिलवाई गई। अब यहां 12 दिव्यांग काम कर रहे हैं। इनमें से 11 लोकोमोटर दिव्यांग हैं।

उनके पैर चलने-फिरने की हालत में नहीं हैं जबकि एक सदस्य को सुनाई नहीं देता। अब डीएम संदीप नंदूरी अक्सर यहीं अपनी मीटिंग करते हैं। साथ ही खाना भी खाते हैं। डीएम संदीप नंदूरी बताते हैं- ‘मुझे अक्सर दिव्यांगों से नौकरियों के लिए याचिकाएं मिलती थीं, लेकिन सभी को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। इसलिए हमने एक कैफे खोलने के विचार के साथ उन्हें अपना उद्यम चलाने में सक्षम बनाने का फैसला किया। कैफे की एक दिन की कमाई 10 हजार रु. है। कैफे की कमाई बैंक में जमा होती है। यहीं से दिव्यांगों को वेतन दिया जाता है।
पेरू में बच्चों के लिए बनाया लकड़ी का लैपटॉप
15 साल चलेगा, ढांचा भी बदला जा सकेगा
पेरू की वावालैपटॉप टेक्नोलॉजी कम्पनी ने नई और सस्ती तकनीक से बना लकड़ी का लैपटॉप लॉन्च किया है। यह काफी सस्ता है और आसानी से इसकी मरम्मत की जा सकेगी। इसे वावालैपटॉप नाम दिया गया है। कम्पनी का दावा है कि इसे 15 से 20 साल तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। वावालौपटॉप पेरू के दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों और बच्चों के लिए तैयार किया गया है।यह वजन में भी काफी हल्का है।
2015 में इसका सिर्फ प्रोटोटाइप पेश किया गया था लेकिन 2019 में 2.0 वर्जन के साथ इसे लकड़ी के साथ बनाया गया। मुफ्त लाइनेक्स ऑपरेटिंग सिस्टम से संचालित होने वाले इस वावालैपटॉप को हाल ही में बाजार में उतारा गया।
यह पेरू के उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो शहरों से दूर रहते हैं इसलिए इसकी कीमत काफी कम रखी गई है। इसकी कीमत 17 हजार रुपए रखी गई है। हालांकि, भारत में इसे बेचा जाएगा या नहीं, इस बात की जानकारी कंपनी ने नहीं दी। कम्प्यूटर और मार्केटिंग एक्सपर्ट्स ने मिलकर एसबीसी (एकल बोर्ड कम्प्यूटर) बनाया और इसे लकड़ी के केस में फिट किया है। इसकी मरम्मत भी आसानी से की जा सकेगी और अगर कोई इसकी बॉडी में कोई बदलाव करना चाहे तो वो भी आसानी से संभव है।
कम्प्यूटर इंजीनियर और वावालैपटॉप टेक्नोलॉजी के मैनेजर जेवियर क्रास्को के मुताबिक, ‘‘हमें ये महसूस हुआ कि लोगों को कुछ नया देने की बजाए उन्हें पुराना लौटाया जाए। इसलिए एकल बोर्ड कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर पहला लैपटॉप बनाया।’’
क्रास्को ने बताया कि ‘हमने खासतौर पर बच्चों को ध्यान में रखकर इसे डिजाइन किया है। तीसरी और चौथी क्लास के बच्चे हर वक्त अपने साथ रख सकते हैं और जब ये बच्चे बड़ी क्लास में जाएं तो इसे 3.0 और 4.0 वर्जन के साथ अपग्रेड कर सकते हैं। लकड़ी से बने होने कारण यह प्रकृति और मानव इंद्रियों को काफी कम नुकसान पहुंचाएगा। क्रास्को फिलहाल इसे पेरू से बाहर लॉन्च करने पर विचार नहीं कर रहे हैं। इसे सौर और रेग्युलर (बिजली) दोनों ही तरीकों से चार्ज किया जा सकेगा। इसकी बॉडी को जब चाहे बदला जा सकेगा यानी आप जब एक डिजाइन से बोर हो जाएं तो बड़ी आसानी से इसकी बॉडी बदल सकते हैं और ये लगातार 15 सालों तक साथ दे सकता है।
अमेरिका में भारतवंशी दम्पति ने मेडिकल कॉलेज को दिए 1775 करोड़ रुपये
फ्लोरिडा : भारतवंशी चिकित्सक दम्पति किरन सी पटेल व पल्लवी पटेल ने बड़ा दान दिया है। पटेल दम्पति ने के फ्लोरिडा प्रांत में तैयार मेडिकल कॉलेज को 25 करोड़ डॉलर यानी 1775 करोड़ रुपये का दान दिया है। किसी भारतवंशी द्वारा अमेरिका में दिया गया यह अब तक का सबसे बड़ा दान है। नोवा साउथ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी (एनएसयू) के तंपा बे स्थित नए मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन डॉक्टर दम्पति के हाथों हुआ। जांबिया में जन्मे व भारत में पढ़ाई करने वाले डॉक्टर किरन पटेल ह्रदय रोग विशेषज्ञ हैं। जबकि पत्नी डॉक्टर पल्लवी पटेल बाल रोग विशेषज्ञ हैं। नया मेडिकल कॉलेज तीन लाख वर्ग फीट के क्षेत्र में बनाया गया है, जो एनएसयू के चार अन्य कॉलेजों का सेटेलाइट केंद्र भी रहेगा। इनमें दम्पति के नाम पर बने डॉक्टर पल्लवी पटेल कॉलेज ऑफ हेल्थकेयर साइंसेज और डॉक्टर किरन सी पटेल कॉलेज ऑफ ओस्टियोपैथिक मेडिसिन शामिल हैं। उद्घाटन के होना निराला है। लोगों की जिंदगी में परिवर्तन लाने को सक्षम होना मेरे लिए एक सम्मान की बात है।’ नए कॉलेज में ओस्टियोपैथिक मेडिसिन की पढ़ाई शुरू हो चुकी है।
मुस्लिम भाईयों ने ‘अंकल’ का हिंदू रीति-रिवाज से किया दाह संस्कार
अमरेली : गुजरात से मानवता की मिसाल वाला अनोखा उदाहरण देखने को मिला है। राज्य के अमरेली जिले के सवरकुंडला शहर में तीन मुस्लिम भाईयों ने अपने पापा के ब्राह्मण दोस्त की मौत पर उनका पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ दाह संस्कार किया। जैसा कि वह चाहते थे।
इन मुस्लिम भाईयों के अंकल का नाम भानुशंकर पांड्या था और उनका कोई परिवार नहीं था। वह कई सालों से मुस्लिम परिवार के साथ रह रहे थे। उनका दाह संस्कार करने वाले मुस्लिम भाईयों का नाम अबु, नजीर और जुबैर कुरैशी हैं। उनका परिवार काफी रूढ़िवादी है और वह दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। वह दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं और आज तक कभी रमजान का उपवास नहीं छोड़ा है। पांड्या की मौत के बाद उनका दाह संस्कार करने के लिए शनिवार को उन्हें धोती पहनने और जनेऊ धारण करने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जुबैर ने कहा, ‘जब भानुश्कर अकंल मृत शय्या पर थे तो हमने उनके लिए हिंदू परिवार से गंगा जल मांगा। हमने अपने पड़ोसियों को बताया कि हम ब्राह्मण परिवार के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं। हमें बताया गया कि अर्थी उठाने के लिए जनेऊ धारण करना जरूरी होता है। हम इसके लिए राजी हो गए।’
नसीर के बेटे अरमान ने चिता को अग्नि दी। नसीर ने कहा, ‘हम 12वें दिन अरमान का सिंर मुंडवाएंगे क्योंकि हिंदू इस रिवाज को मानते हैं।’ इन भाईयों के पिता का नाम भिखू कुरैशी था। उनकी और पांड्या का मुलाकात 40 साल पहले तब हुई थी जब वह मजदूर थे। कुरैशी की तीन साल पहले मौत हो गई। जिससे पांड्या टूट गए थे। अबु ने कहा, ‘पांड्या अकंल का परिवार नहीं था। इसलिए जब कई साल पहले उनका पैर टूटा तो हमारे पिता ने उन्हें हमारे साथ रहने को कहा। वह हमारे परिवार का हिस्सा बन गए। नसीर ने कहा, ‘हमारे बच्चे उन्हें दादा कहकर बुलाते थे और हमारी पत्नियां उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती थीं। अंकल पूरे दिल से ईद का त्योहार मनाते थे। वह बच्चों के लिए कभी तोहफे लाना नहीं भूलते थे।’ जब तक भानुशंकर जिंदा रहे कुरैशी के परिवार ने उनके लिए हमेशा शाकाहारी खाना बनाया। अमरेली जिले के ब्रह्म समाज के उपाध्यक्ष पराग त्रिवेदी ने कहा, ‘हिंदू रीति-रिवाजों से भानुशंकर का अंतिम संस्कार करने से अबु, नसीर और जुबेर ने सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल कायम की है।’
विज्ञान और अंतर्ज्ञान

प्राचीन काल में अध्यात्म, प्रकृति, विज्ञान की अवधारणाओं में भेद नहीं था। मनुष्य को सृष्टि के अंग के रूप में देखा जाता था। आत्मा, प्राण, प्रकृति और मनुष्य के संबंध के स्वरूप जैसे गंभीर विषयों पर उस युग में मनन चिंतन हुआ। अंतर्ज्ञान को खास महत्व दिया गया। अंतर्ज्ञान से पैदा होने वाली चेतना के ठीक विपरीत थी विवेक प्रधान चेतना। विवेक प्रधान ज्ञान किसी घटना, प्रक्रिया या वस्तु पर निर्भर होती है। इसलिए बौद्ध उसे निर्भरशील ज्ञान का दर्जा देते हैं और अंतर्ज्ञान को पूर्ण ज्ञान का दर्जा। उपनिषद में इस पूर्ण ज्ञान की व्याख्या कुछ इस प्रकार मिलती है: “वह जो शब्दहीन, स्पर्शहीन, निराकार, अंतहीन, स्वादहीन, शाश्वत गंधहीन है। जिसका कोई आदि या अंत नहीं, जो महान से भी उच्च है, उसे जानने से मृत्यु के मुँह से बचा जा सकता है। ऐसे अनुभव से प्राप्त ज्ञान पूर्ण है।” (कठोपनिषद 3.15)
पृथकीकरण, विभाजन, तुलना, तौलना, वर्गीकरण करना बुद्धि और तर्क पर आधारित चेतना के प्रमुख लक्षण हैं। यह चेतना सत्य को अलग-लग कटघरों में बाँटकर विश्व की प्रकृति को समझने की कोशिश करती है। विज्ञान इसी चेतना की उपज है। दुनिया में असंख्य आकार की वस्तुएँ, संरचनाएँ और प्रक्रियाएँ मौजूद हैं। इन सबके लिए अलग-अलग वर्ग निर्धारित करना असंभव है। ऐसे में बुद्धि इनमें से जो अधिक प्रासंगिक और स्पष्ट है उन्हें चुनकर क्रम में रखने, अवधारणाएँ रचने और उनके लिए चिन्ह निर्धारित करने का काम करती है। इस प्रकार विवेक प्रधान ज्ञान प्रकृति के खास लक्षणों या प्रक्रियाओँ के चुनाव पर ही आधारित होता है। इसलिए इस ज्ञान से पैदा होने वाले हर शब्द की अपनी सीमाएँ हैं पदार्थ विज्ञानी वर्नर हाईजेनवर्ग पदार्थ विज्ञान के शब्दों के संबंध में कहते हैं, ‘शब्द और अवधारणाएँ जितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं उनका प्रयोग क्षेत्र उतना ही सीमित होता है।”
दरअसल अंतर्ज्ञान से पैदा होने वाली आत्मचेतना प्रकृति की हकीकत को सीधे अंतर्दृष्टि के जरिए महसूस करती है। जबकि पदार्थ विज्ञान प्रयोग के जरिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं का निरीक्षण करके प्रकृति की हकीकत को समझता है। देखने की सीमाएँ यहाँ ज्ञान की सीमाएँ बन जाती हैं। इस तरह विज्ञान सत्य को संपूर्ण रूप से नहीं बल्कि उसके अंश को ही पकड़ पाता है। मसलन, न्यूटन के क्लासिकल मैकानिक्स को ही देखा जा सकता है। इस मॉडल में वायु की प्रतिरोध शक्ति ‘फ्रिक्सन’ के प्रभाव की उपेक्षा की गई है। बावजूद इसके यह मॉडल लंबे समय तक प्रकृति की प्रक्रिया को जानने के सबसे बेहतरीन सिद्धांत के रूप में विज्ञान के जगत पर छाया रहा। विद्युत और चुम्बकीय प्रक्रिया के लिए इस मॉडल में कोई जगह नहीं थी क्योंकि तब ये प्रक्रियाएँ आविष्कृत नहीं हुई थीं। इनके आविष्कार ने यह साबित किया कि न्यूटन का सिद्धांत अधूरा है। जिस वस्तु में भारी संख्या में परमाणु हैं और जिनकी गति आलोक गति से कम है उन पर यह सिद्धांत चल सकता है पर जिनकी गति आलोक गति से ज्यादा है वहाँ क्वांटम सिद्धांत से ही काम लेना पड़ेगा। अफसोस की बात यह है कि विद्यालय स्तर से लेकर महाविद्यालय स्तर तक क्वांटम सिद्धांत को पाठ्यक्रम में आवश्यक जगह नहीं मिल पाई है। इसके अभाव में प्रकृति के संबंध में विद्यार्थियों का ज्ञान भी अधूरा होगा।
गणित भी अवधारणाओं और चिह्नों की व्यवस्था के जरिए सत्य का मानचित्र तैयार करने की कोशिश करता है। दरअसल गणितज्ञ सत्य से संबंधित सूचनाओं को चिह्नों का रूप देकर फॉर्मूलों में अटाता है। और फिर इन्हें बोधगम्य बनाने के लिए पन्नों पर पन्ना लिखता है। गौर से देखें तो फॉर्मूलों में सत्य को चिह्नों का रूप देकर उन्हें भाववाचक बनाया जाता है। इसे बुद्धिजीवी तो समझ लेता है लेकिन सत्य को बाँधकर, काटकर फॉर्मूलों के कैप्सूल में भरने की वजह से वह यथार्थ जगत और जन साधारण से कट जाता है। दरअसल गणित की भाषा हमें उस मुकाम तक ले गई है जहाँ सत्य को अभिव्यक्त करने वाले चिह्नों को समझना दुरूह हो गया है। यही कारण है कि उन्हें व्याख्यायित करने के लिए आज शब्दों की जरूरत पड़ रही है। अलग-अलग ढंग से इनकी व्याख्याएँ हो रही हैं और ये व्याख्याएँ संकेतों को अवधारणाओं की व्याख्या के जरिए डीकोड करके सत्य का एहसास दिलाने वाली दृष्टि पैदा करने की कोशिश में लगी हैं। इस दृष्टि में फ़ॉर्मूलों जैसी सटीकता नहीं होती। गणित की ऐसी व्याख्या दर्शनशास्त्र के मॉडलों के समान ही सत्य की छवि आंकती है। यही वह बिन्दु है जहाँ विज्ञान और दर्शन के मॉडल एक ही जमीन पर खड़े दिखाई देते हैं।
पिछले हजार वर्षों में बौद्धिक ज्ञान के विस्तार और मानवता के स्खलन ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि अंतर्ज्ञान के बगैर मानवता का पाठ पढ़ाना मुश्किल है। अंतर्ज्ञान हासिल करना दरअसल चेतना की असमान्य अवस्था में बुद्धि से परे जाकर सत्य का अनुभव हासिल करना है। बुद्धि के संदेह, तर्क जैसे हथियार लड़ने भिड़ने की जमीन तैयार करते हैं। लेकिन अंतर्ज्ञान के अभाव में लड़ने भिड़ने के हथियारों के जरिए ही बचना संभव है, यह भी अकाट्य सत्य है। बौद्धिक चेतना को ही आधुनिक युग में उत्कृष्ट चेतना का दर्जा दिया जाता है। अगर यही चेतना उत्कृष्ट होती तो बुद्धिजीवियों में अलग-अलग किस्म के मानसिक विकार न मिलते। दरअसल चेतना के कई प्रकार हैं। इस संदर्भ में विलियम जेम्स अपनी पुस्तक ‘द वेराइटीज ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियेन्सेस में कहते हैं –
“हमारी तथाकथित साधारण जगत चेतना, बुद्धि सम्पन्न चेतना केवल एक तरह की चेतना है। जबकि उससे अलग परदे के पीछे चेतना के अलग-अलग शक्तिशाली रूप मौजूद हैं।” अंतर्ज्ञान शक्तिशाली चेतना की ही उपज है।
अतंर्ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भी खास भूमिका निभाता है। विज्ञान में शोध के क्षेत्र में बुद्धि के प्रयोग का प्रश्न तब तक नहीं आता जब तक वैज्ञानिक का अंतर्ज्ञान इसे इस क्षेत्र में बुद्धि के प्रयोग की अतंर्दृष्टि नहीं देता। यही सृजनात्मकता की जमीन है। इस अंतर्दृष्टि की यह खासियत है कि यह एकाएक जगती है। कलम कागज लेकर बुद्धि पर दबाव डालने वाले हालात में यह पैदा नहीं होती। बल्कि ध्यान केन्द्रित बौद्धिक गतिविधि के बाद आराम के पलों में यह अतंर्ज्ञान स्वत: स्फुरित होता है। जैसे बादलों को चीरकर सूरज निकलता है। ठीक उसी तरह जिस तरह न्यूटन को गिरते हुए सेव को देखकर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर सोचने की दृष्टि मिली थी। इसे पाने का आनंद दुगना होता है। पदार्थ विज्ञान की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उपर्युक्त अंतर्ज्ञान से प्रेरित दृष्टि का यहाँ तब तक कोई महत्व नहीं जब तक उसे गणित की भाषा में प्रमाणित करके शब्दों में उसका विश्लेषण न किया जा सके। अत: विवेक जब तक अनुभूत सत्य के होने का प्रमाण नहीं जुटा पाता तब तक विज्ञान उस सत्य को अपने इलाके में प्रवेश करने नहीं देती। इस न्याय से देखें तो बुद्धि को अंतर्ज्ञान की अनुगामिनी मानना चाहिए। लेकिन आधुनिक समाज में बौद्धिक चेतना और विज्ञान का ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया गया है कि अंतर्ज्ञान का मुद्दा पीछे चला गया। मनुष्य अपनी आत्मशक्ति से ही पहचाना जाता है। आत्म तत्व से अभिन्न रूप से जुड़े अंतर्ज्ञान के न जग पाने के कारण ही आज का मनुष्य मानसिक स्तर की विकृतियों का शिकार होकर कष्ट भोग रहा है। इस लिहाज से देखें तो अंतर्ज्ञान के विकास की शिक्षा इस युग की बहुत बड़ी माँग है।
नं. 2, देशबन्धु नगर
पो. – सोदपुर,
कोलकाता – 700110
दूरभाष – 9231622659
स्त्री सशक्तिकरण के लिए एकमात्र शिक्षा ही विकल्प : स्पर्शिता गर्ग
कोलकाता : भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेज की विमेन्स सेल और पॉलिटिकल साइंस की इंटरनल कम्प्लेंट कमेटी के तत्वावधान में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय “पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री सशक्तीकरण” के विभिन्न पहलुओं पर आधारित रहा। भवानीपुर कॉलेज की टीआईसी डॉ. सुचंद्रा चक्रवर्ती ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्धाटन किया ।विशिष्ट अतिथियों में स्पर्शिता गर्ग (प्रथम श्रेणी ज्यूडिशियल सर्विसेज मजिस्ट्रेट, असम, सोंतिपुर, तेजपुर, असम) एवं सुष्मिता बसु (सलाहकार, फैमिली, काउंसिलिंग स्टडीज़,EMLHIRST, इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिटी स्टडीज़, शांतिनिकेतन) ने भी उद्घाटन सत्र में भाग लिया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए मजिस्ट्रेट श्रीमती स्पर्शिता गर्ग ने “स्त्री सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका” विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभवों, रोजमर्रा जीवन में स्त्रियों की स्थितियां, कानूनी और कोर्ट से संबंधित पक्षों और समस्याओं के विषय पर विस्तार चर्चा की। निष्कर्ष में बताया कि महिलाओं का सशक्तीकरण बिना शिक्षा के असंख्य है। शिक्षित स्त्रियों को अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए कानूनी जानकारी की भी बहुत आवश्यक है। शिक्षा ही वह मूल मंत्र है जो स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए एकमात्र विकल्प है। सेमिनार के द्वितीय सत्र में अध्यक्षता की श्रीमती सुष्मिता बसु ने। फैमिली काउंसिलिंग सेंटर से जुड़ी बासु ने स्त्रियों के रोजमर्रा संघर्ष को रेखांकित करते हुए उनकी समस्याओं और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। विषय “महिलाओं के विकास की राह में आई बाधाएँ” के विभिन्न पहलुओं पर आधारित जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा, समस्याओं के बारे में जानकारी दी और कहा कि सरकार द्वारा दी गई कानूनी सहायता और उसे प्राप्त करने के तरीकों को भी जानना आवश्यक है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के विकास के लिये अभी भी बहुत सी बाधाएं हैं जो उनकी स्वतंत्रता में बाधक हैं। बिना अच्छी सोच और विचारों के स्त्री को समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो सकेगा। स्वागत भाषण में डॉ. सुचंद्रा चक्रवर्ती ने माया एंगलू की उक्ति से वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में पितृसत्तात्मक समाज में आज भी स्त्रियां अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। समय के अनुसार समाज की सोच में बदलाव आ रहा है, स्त्रियां अभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। अधिक संख्या में विद्यार्थियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और इस सेमिनार में 160 से अधिक रजिस्ट्रेशन कराये गये। स्त्री विमर्श में शिक्षक – शिक्षिकाओं की भागीदारी रही। गार्गी गुंइया सेमिनार संयोजन में सक्रिय सहयोगी रहीं। डॉ देवजानी गांगुली ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस कार्यक्रम की जानकारी डॉ. वसुंधरा मिश्र ने दी।
भारतीय भाषाओं के सहयोग से ही आगे बढ़ सकती है हिन्दी’
कोलकाता : राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता में हाल ही में हिन्दी पखवाड़ा आयोजित किया गया। इसके समापन समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पश्चिम बंगाल पुलिस के महानिदेशक मृत्युन्जय कुमार सिंह उपस्थित थे। समारोह में विचार रखते हुए उन्होंने हिन्दी और भारतीय भाषाओं, विशेषकर बांग्ला के साथ हिन्दी के सम्बन्धों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि एक भाषा को जानने का मतलब यह नहीं है कि दूसरी भाषा को नकारा जाये। हिन्दी की दुर्गति का कारण तत्सम शब्दों की अत्याधिक बहुलता है जिससे भाषा कठिन हो जाती है। सारी भाषाओं के सहयोग से हिन्दी आगे बढ़ सकती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय पुस्तकालय के विशेष कार्य अधिकारी डॉ. के. के. कोच्चुकोशी ने की। स्वागत भाषण हिन्दी कक्ष प्रभारी सुनील कुमार ने दिया। संचालन राष्ट्रीय पुस्तकालय के वरिष्ठ अधिकारी विनोद कुमार यादव ने किया। इस अवसर पर हिन्दी पखवाड़ा के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को सम्मानित भी किया गया।





