Thursday, July 2, 2026
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ज्ञान का अधूरापन और आधुनिक समाज

डॉ. राखी रॉय हल्दर

आज शिक्षा को डिग्री से नापा जाता है और ज्ञान सूचना तक सीमित होकर रह गया है। ज्ञान की अवधारणा के सूचना तक सिमट कर रह जाने के कारण ही आज शिक्षक का काम कम्प्यूटर से करवा पाने की संभावनाएँ बुलंद हो गई हैं। हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है और शिक्षितों के आँकड़ों में वृद्धि हुई है। शिक्षितों की यह पीढ़ी नौकरी के अलावा आत्मनिर्भर बनने की दूसरी राह आसानी से खोज नहीं पाती। यही पीढ़ी रोजगार विनिमय के दफ्तर में भीड़ जमाती है और बेरोजगारी के कारण सरकार को कोसती है। इस समस्या की जड़ ज्ञान की अवधारणा के स्खलन में छिपा है।
ज्ञान तब तक किसी काम का नहीं जब तक वह दृष्टि में रूपांतरित न हो। ऐसी दृष्टि जो जीवन और समाज की बेहतरी के लिए व्यवहारिक कार्यों को अंजाम देने की ताकत रखती हो। यह दृष्टि उस सीमित दृष्टि से एकदम अलग है जिसका दायरा किसी विषय विशेष के किसी प्रसंग तक सीमित होता है। मसलन इतिहास के किसी युग का प्रसंग या फिर किसी लेखक की काव्यकला का प्रसंग। इस बात में कोई शक नहीं कि किसी विषय के एक छोटे से क्षेत्र को चुनकर किए गए अध्ययन से उस क्षेत्र की गहरी समझ पैदा होती है। लेकिन यह समझ जीवन और समाज को तब समृद्ध कर पाएगी जब इसे किसी वृहद् दृष्टि के आलोक में देखा जाएगा। ऐसी दृष्टि जो इस बात का आकलन कर सके कि अध्ययन किया गया विषय मानव जीवन, समाज और संस्कृति के विकास को किस दिशा में ले जा रहा है? ऐसी दृष्टि की भूमिका कम्पास की तरह होगी। दर्शनशास्त्र में ऐसी दृष्टि तैयार करने की ताकत है।
भारत का प्राचीन दर्शनशास्त्र बिखरी हुई दृष्टियों को एक सूत्र में पिरोकर जीवन और समाजोपयोगी ज्ञान पैदा कर सकता है। दर्शनशास्त्र से ऐसा काम लेने के लिए इसके सार को समझकर विषयों को समग्रता में देखने का नजरिया विकसित करना होगा। ऐसे नजरिए का पंख पाते ही यथार्थ को उस ऊँचाई से देखने की ताकत मिलेगी जहाँ से ज्ञात हो पाएगा कि यह यथार्थ जीवन और समाज के विकास को किस दिशा में ले जा रहा है। आज के युग की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि विश्व की प्रकृति और इसमें प्रचलित कार्यव्यापार को समझने की समग्रता में कोशिश नहीं की जाती बल्कि इतिहास, साहित्य, विज्ञान, गणित जैसे तमाम विषयों की अवधारणा को जेहन में अलग-अलग डिब्बे बनाकर बैठा दिया जाता है। आज सोच में इतना बिखराव आ गया है कि यह दिखाई ही नहीं देता कि डिब्बों में बंटी ज्ञान की गाड़ी बगैर इंजन के जिंदगी के प्लेटफार्म तक कैसे पहुँचेगी?
दरअसल बोध की सुकरता के लिए अध्ययन के विषयों को वर्गों में विभाजित करके देखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है इतिहास, भूगोल, साहित्य, गणित, विज्ञान जैसे तमाम विषयों से हासिल ज्ञान को सूत्र में पिरोकर इससे विश्व के स्वरूप, प्रकृति, कार्यव्यापार और शक्तिकेन्द्रों का आभास पाना। क्योंकि व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और राष्ट्रों में बँटी पृथ्वी ब्रह्मांड का अंग है तथा ब्रह्माण्ड की कई शक्तियाँ विज्ञान द्वारा प्रमाणित हैं और मनुष्य में भी उसी शक्ति का अंश है। प्राचीन दर्शनशास्त्र ब्रह्मांड को समझने की कुंजी है और विज्ञान द्वारा प्रमाणित तथ्यों से ब्रह्मांड के नियम का पृथ्वी और उसके प्राणियों पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा जा सकता है।
दर्शनशास्त्र की तीन शाखाएँ हैं। पहली शाखा किसी विषय का ज्ञान हासिल करने की संभावनाओं, साधनों और पद्धति से संबंधित है। दूसरी शाखा ज्ञान के साधनों के जरिए विश्व को समझने से संबंधित है। और तीसरी शाखा नैतिकता के प्रश्नों से संबंधित है। इसमें दूसरी शाखा आज सबसे ज्यादा चर्चित है। यह शाखा विश्व की प्रकृति, आत्मतत्व की प्रकृति और शाश्वत की प्रकृति को समझने वाले सवालों से जूझती है। आज नौकरीपेशा या फिर बेरोजगार शिक्षितों में प्राप्त डिप्रेशन, पेशे से असंतुष्टि के भाव से यह महसूस किया जा सकता है कि व्यक्ति के शरीर में निवास करने वाले आत्मतत्व की एक खास सत्ता है। इस आत्मतत्व को समझने की कोशिश करना निश्चित रूप से शिक्षा का खास लक्ष्य होना चाहिए। शिक्षा के जरिए आत्मतत्व को उसकी प्रकृति के अनुरूप पुष्ट करना जरूरी है। यह पुष्ट आत्मतत्व व्यक्ति को अपने जीवन और समाज के लिए बेहतर राह खोजने के काबिल बना सकता है। आत्मा की प्रकृति को जाने बगैर बाहरी तत्वों की मदद से व्यक्ति में किसी काम को करने की इच्छा पैदा करने की कोशिश करना उल्टी गंगा बहाना है। आत्मतत्व की प्रकृति के प्रश्न को दरकिनार करके किसी काम में रुचि जगाने के लिए व्यक्ति में धन, ओहदे, नौकरी या किसी वस्तु का लोभ पैदा करना पड़ता है। ऐसा लोभ पैदा करना श्वान को हड्डी दिखाकर दौड़ाने के बराबर है। यह प्रवृत्ति इंसानों को श्वानों जैसा बनाकर छोड़ती है। आज विज्ञापन यही काम मनोविज्ञान के सहारे कर रही है। इस प्रक्रिया की ‘ऐंटीथीसिस’ दर्शनशास्त्र की तिजोरी में बंद पड़ी है। आज नैतिकता के स्खलन और मानसिक शांति के लगातार ह्रास के इस दौर में आत्मतत्व को जानने का सवाल जरूरी हो गया है।
शाश्वत की अवधारणा आत्मतत्व के विकास के सावल को दिशा देने की ताकत रखती है। न्यूटन के समय और स्पेस संबंधी सिद्धांत में शाश्वत किसी मंच के उस बैक ड्रॉप की तरह है जो स्थिर रहता है। वह मंच पर चल रही गतिविधियों को कसने की एक कसौटी की तरह हमेशा विद्यमान है। इसे आदर्श सत्ता या ईश्वर का नाम देना गलत होगा। क्योंकि ईश्वर या आदर्श सत्ता की अवधारणाएँ सामाजिक विकास की प्रक्रिया में विकसित हुई है। और केवल कला वर्ग के चिंतन का अंग है। इस अवधारणा के लचीलेपन ने इसके अपव्यवहार को भी बढ़ावा दिया है। शाश्वत की अवधारणा ब्रह्मांड का आधार है। ब्रह्मांड के नियम के तहत जड़ और चेतन पदार्थ परमाणु से बने हैं। ब्रह्मांड के सारे क्रिया-कलापों की जड़ है ऊर्जा। पाँच तत्वों से बना यह मानव शरीर दरअसल एक इलेक्ट्रो-मैगनेटिक उपकरण है। प्राण दरअसल वह विद्युत है जो इसे संचालित करता है। विद्युत के कारण ही जैसे तार भीतर से गर्म हो जाता है ठीक उसी तरह प्राण के कारण ही शरीर गर्म रहता है। प्राण के निकलते ही शरीर ठंडा होने लगता है। नाड़ियाँ और धमनियाँ तारों की तरह हैं जिनमें रक्त के जरिए विद्युत बहता है। पंच तत्व के शरीर की मानसिक उपज सोच और प्रार्थना में परमाणु के जरिए कंपन पैदा करने की ऊर्जा होती है। इनका फल या प्रभाव इनके द्वारा कंपन पैदा करने वाली ऊर्जा के घनत्व पर निर्भर करता है।
इस लिहाज से देखें तो ‘आज कल भलाई का जमाना नहीं रहा’ यह कहने वाले हालात, सच्चाई और भलाई की प्रतिष्ठा चाहने वालों के सोच और इरादों के ढीलेपन के कारण ही पैदा हुए हैं। जड़ पदार्थों में ऊर्जा की स्थिति अलग रूप में होती है। किर्लियन फोटोग्राफी या जी.डी.वी कैमरा के जरिए जड़ या चेतन पदार्थ की ऊर्जा के इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक क्षेत्र की तस्वीरें ली जा सकती हैं। तस्वीर में यह क्षेत्र प्रकाश के रूप में दिखाई देता है जिसे साधारणत: औरा के नाम से जाना जाता है। किसी व्यक्ति के औरा (इलेक्ट्रो-मैगनेटिक क्षेत्र) का शक्तिशाली या कमजोर होना उस व्यक्ति की सोच, भावनाओं और विचारों की प्रकृति पर निर्भर करता है।
मनुष्य में स्थित आत्मतत्व में वह ऊर्जा है जो कंपन का आधार बनकर ब्रह्मांड की गति और लय से तादात्म्य स्थापित करके हालात को प्रभावित कर सकती है। तभी मनुष्य ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। ब्रह्मांड की इस अद्भुत कृति में छिपी कस्तूरी को अपनी खुशबू फैलाने के काबिल बनाने की ताकत सिर्फ शिक्षा में है। शिक्षा के जरिए ही ब्रह्मांड के रहस्य को नई पीढ़ी को समझाया जा सकता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज की शिक्षा ब्रह्मांड का ज्ञान पैदा करने के सावल से विच्छिन्न है। शिक्षा क्षेत्र में तो आज सिर्फ डिग्री अच्छे अंक पाने के उद्देश्य का बोलबाला है।
न्यूटन के शाश्वत की अवधारणा को आधुनिक विज्ञान के पिता आइन्सटाइन के सापेक्षता के सिद्धांत ने पीछे धकेलकर शाश्वत की अवधारणा को ही दृष्टि से ओझल कर दिया। अब ब्रह्मांड के कार्यव्यापारों को आधार देने वाली समय और स्पेस की अवधारणाएं भौतिक दृष्टि की मोहताज हो गई। समय, स्पेस और ऊर्जा की जो परिभाषाएँ विद्यालय से ही विज्ञान के जरिए विद्यार्थियों के जेहन में बैठाई जाती हैं वह इसी दृष्टि से प्रभावित है। समय और स्पेस को देखने का यह नजरिया इतिहास और साहित्य को देखने की दृष्टि को भी नियंत्रित करता है। इस दृष्टि से हालात को देखना दरअसल जमीनी स्तर से हालात को देखना है। इस स्तर से हालात की बारीकियाँ और कारण कार्य संबंध भले ही नजर आए पर इसके साथ ही हालात की विकरालता और व्यापकता का ऐहसास भी हमें घेर लेता है। हम समस्या की जड़ों को खोजते हुए पाताल तक पहुँच जाते हैं लेकिन जड़ों को पहचानने के बावजूद इन्हें उखाड़ने का उपाय नहीं दिखता। सामंती मूल्य, बाजारवादी मूल्यों की प्रकृति कुछ ऐसी ही है। जमीनी स्तर से विश्व और समाज को देखने वाले साहित्यकार चाहे सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, किसी भी दृष्टि से काम ले आज के युग में उन्हें उपभोक्तावाद बाजारवाद की विकरालता ही नजर आएगी। इन्हें काटने का रास्ता इस स्तर पर मिलना संभव नहीं क्योंकि इसी स्तर पर शिक्षा, धर्म, संस्कृति, विज्ञान यहाँ तक कि दर्शन तक अपना प्रभाव फैलाकर बाजारवादी शक्तियों ने आत्मा की ऊर्जा को दबा कर रखा है।
प्राचीन दर्शनशास्त्र में ब्रह्मांड के नियमों के तर्ज पर विश्व को देखने का नजरिया देने की ताकत है। अन्य शब्दों में कहें तो यह दृष्टि को जमीनी स्तर से ऊपर उठाने की ताकत रखती है। इस स्तर से सत्य का एक दूसरा पहलू नजर आता है। यही स्तर भारत के तमाम मनीषियों की वैचारिक ऊर्जा का शक्ति केन्द्र रहा है। सांख्य दर्शन, वैदिक ऋचाओं की तिजोरी में बंद ज्ञान इसी स्तर पर विकसित हुआ है। इस स्तर से देखें तो विश्व ऊर्जा के खेल का जगत है। मृत्यु भी ऊर्जा के रूपांतरण की ही घटना है। पंचतत्व के शरीर में कैद ऊर्जा को ज्ञान के जरिए सतेज रखकर एक सार्थक जीवन जीया जा सकता है। प्राचीन काल से लेकर अब तक इतिहास, भूगोल, साहित्य, गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र जैसे तमाम विषय और आज कॉलेज विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले नए-नए विषय इंसान को उसमें स्थित ऊर्जा का प्रयोग जीवन और समाज को समृद्ध बनाने के लिए करने का ज्ञान किस तरह दे सकते हैं इसे कार्यशालाओं के जरिए निर्धारित करना वर्तमान दौर की बहुत बड़ी मांग है।
विश्व ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने की पहल विद्यालय के पाठ्यक्रम में दृश्यमान प्रकृति के निरीक्षण के विषय को शामिल करके किया जा सकता है। प्राचीन दर्शनशास्त्र प्रकृति की गोद में पला है। इसमें विश्व ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने का आधार प्रकृति निरीक्षण ही है। मनुष्य प्रकृति का ही अंग है और प्रकृति के अवयवों से खुद को जोड़कर देखते हुए उनकी और अपनी प्रकृति एवं क्षमताओं में साम्य और वैषम्य को महसूस करना मनुष्य की शिक्षा का अंग होना चाहिए। ऐसी शिक्षा से विद्यार्थियों के मन और मस्तिष्क का विकास प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए हो पाएगा। दृश्यमान प्रकृति को निरखते हुए ही मानव दृष्टि अपनी अन्त: प्रकृति के साथ विश्व ब्रह्मांड के संपर्क को समझने की ओर अग्रसर हो सकती है। इस प्रक्रिया से गुजरते हुए विकसित अंतर्दृष्टि आज विद्यालय, कॉलेज, विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले विषयों को एक खास स्तर से देखते हुए उनके जरिए जीवन और समाज को समृद्ध करने की राहें खोजने में सक्षम हो सकती है।

नं. 2, देशबन्धु नगर
पो. – सोदपुर,
कोलकाता – 700110
दूरभाष – 9231622659

अजर-अमर हैं धरती धोंरां री और पाथल और पीथल रचनाएँ


डॉ. वसुंधरा मिश्र

रंगीलो राजस्थान की संस्कृति शूरता, वीरता और श्रृंगार की धरती रही है। एक ओर बनास नदी और अरावली की पर्वत श्रृंखला तो दूसरी ओर भयावह चंबल का क्षेत्र और धोरों के टीले। भौगोलिक दृष्टि से कठिन चुनौतियों से भरा राजस्थान योद्धाओं की धरती रही है।आज से एक लाख वर्ष पूर्व मनुष्य मुख्यतः बनास नदी के किनारे आया था। वहीं से राजस्थान की कहानी की शुरुआत होती है, वर्षों से कई परिवर्तन होते रहे। राजस्थान, राणा प्रताप,मेवाड़, हल्दी घाटी, आरावली और राजपुताना आदि का पर्याय हैं। वस्तुतः राजस्थान एक रियासत है,जहाँ भील और मिनस आदि जनजातियों का प्रभुत्व रहा है। गाडिया लोहार छोटे राजस्थानी राजपूत जनजाति है। मेहर के महाराणा प्रताप की सेना में गाडिया लोहार लोहार थे। धीरे-धीरे समय के साथ वे बंजारों की तरह रहने लगे। सातवीं सदी में पुराने गणराज्य अपने को स्वतंत्र राजा के रूप में स्थापित करने लगे। मोर्यों के समय में चित्तौड़ गुबिलाओं के द्वारा मेवाड़ और गुर्जरों के अधीन पश्चिमी राजस्थान का गुर्जरात्र प्रमुख राज्य था। लगातार होने वाले विदेशी आक्रमणों के कारण यहां एक मिलीजुली संस्कृति का विकास हो रहा था।उधर सन् 647 में राजा हर्ष की मृत्यु के बाद केंद्र में मजबूती नहीं रही।अकबर जैसे मुगल सम्राट ने महाराणा को हराने के लिए सभी प्रयास किए जो इतिहास विदित है। महाराणा प्रताप राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत की शान रहे जिन्होंने अपनी वीरता और शूरता से अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए अपने प्राणों को न्योछावर किया। आज 19 देशी राजाओं की रियासतों के राजाओं का सम्मिलन है राजस्थान। लेखक जेम्स टॉड के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के कुंभलगढ़ में हुआ था। इतिहास कार विजयनाहर ने राजपूतों के इतिहास के विषय में विस्तार से चर्चा की है। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 500 भीलों को साथ में लेकर राणा प्रताप ने आमेर सरदार राजा मानसिंह के 80,000 की सेना के साथ शत्रु का सामना किया। (विकिपीडिया) शत्रु सेना से घिर चुके प्रताप को मानसिंह ने अपने प्राण देकर बचाया। उस दौरान उनके प्रिय घोड़े चेतक की भी मृत्यु हो जाती है। फिर भी उन्होंने अकबर के सामने घुटने नहीं टेके। अकबर ने उनको हराने के लिए सभी प्रयास किए। यह युद्ध एक दिन का था परंतु उस दिन 17,000 लोग मारे गए। प्रताप की हालत दिनोंदिन चिंता जनक होती चली गई। भामशाह ने उस समय 25,000 आदिवासियों को इतना धन दिया जिससे बारह वर्षों तक उनका गुजारा हो सकता था।
मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने अपना पूरा जीवन बलिदान कर दिया जो एक मिसाल है।
प्रताप राजस्थानी साहित्य और संस्कृति के चहेते चरित्र हैं जो पूरे भारत के गौरव हैं।
साहित्यकार और महाकवि कन्हैयालाल सेठिया जी की ये पंक्तियाँ महाराणा प्रताप के मातृभूमि प्रेम की तरह ही अजर-अमर हैं – – – –
“धरती धोंरां री
आ तो सुरगा नै सरमावे
इ पर देव रमण न आवे – –
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो, – – धरती धोंरां री।

राजस्थान के सुजानगढ़ चुरू में 11 सितंबर 1919 में जन्मे महाकवि सेठिया कलम के सिपाही थे जिन्होंने राजस्थान में सामंतवाद को समाप्त करने के लिए जबर्दस्त मुहिम चलाई और पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे कराची में थे। 1943 में सेठिया जी महान नेताओं जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के संपर्क में भी रहे। राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार से सम्मानित महाकवि कन्हैयालाल सेठिया की कलम की ताकत किसी देशप्रेमी रण बांकुरे से कम नहीं थी। वे अपनी कविता “जागो जीवन के अभिमानी” में लिखते हैं – – –
“लील रहा मधु – ऋतु को पतझर
मरण आ रहा आज चरण धर
कुचल रहा कलि – कुसुम,
कर रहा अपनी ही मनमानी
जागो जीवन के अभिमानी ”
भारत के सुदूर पश्चिम में राजस्थान उनका जन्म स्थान रहा और पूर्व में बंगाल उनकी कर्म स्थली रही। दोनों से ही सांस्कृतिक जुड़ाव रहा। स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कन्हैयालाल सेठिया अपनी भाषा प्रेम के कारण विशेष याद किए जाते हैं।
आधुनिक नवजागरण के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने “निज भाषा उन्नति अहे सब भाषा को मूल” माना वहीं कन्हैयालाल सेठिया ने “मायण भाषा”( मातृभाषा) राजस्थानी और
साहित्य हिंदी भाषा को समृद्ध किया। कविवर सेठिया जी को प्रवासी राजस्थानियों से दुखी रहते थे कि वे अपनी मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। मैं बूंदी राजस्थान की हूँ लेकिन बनारस शिक्षा स्थली और कोलकाता कर्मस्थली और घर है। मेरी भाषा हाड़ौती और शेखावाटी है परंतु बोलने की आदत कम होने के कारण महाकवि सेठिया जी ने मुझे सदैव अपनी भाषा में बात करने के लिए उत्साहित किया। आज लोग अपनी भाषा की अहमियत को समझ रहे हैं।भाषा भारतीय संस्कृति का प्राण है। सेठिया जी कोलकाता में रहते हुए भी अंत तक अपनी भाषा के गौरव के लिए लड़ते रहे। कलम के धनी सेठिया जी की राजस्थानी रचनाओं में रमणिया रा सोरठा, गलगचिया, मींझर, कूं- कूं, लीलटांस, धर कूचा धर मजलां, मायड़ रो हेलो, सब्द, सतवाणी, अंधरी काल, दीठ, क-क्को कोड री, लीकल कोलिया, हेमा णी इत्यादि लोकप्रिय रचनाएँ हैं। हिंदी रचनाओं में वनफूल, अग्नि वीणा, मेरा युग, दीप किरण, प्रतिबिंब, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां, चौड़े रास्ते, प्रणाम, मर्म, अनाम निर्ग्रंथ, स्वागत, देह विदेह, आकाश गंगा, वामन विराट, श्रेयस, निष्पत्ति, त्रयी आदि हैं।
प्रसिद्ध रचना पाथर ‘र पीथल की ये पंक्तियाँ सेठिया जी के राजस्थानी व्यक्तित्व को उजागर करती हैं, उन्हें अपनी मातृभूमि का कर्ज चुकाने के लिए “सीस” भी कटवाना पड़े तो वह भी कम है, वे कहते हैं —
मैं भूख मरूं हूँ प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूँ घोर उजाड़ा में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै
हूँ रजपूतण रो जायो हूँ
राजपूती करज चुकाऊंला
ओ सीस पडै़ पण पाघ नहीं
दिल्ली रो मान झुकाऊंला
हल्दीघाटी राजपुताने की वह पावन बलिदान भूमि है जिसके शौर्य एवं तेज की भव्य गाथा से इतिहास के पन्ने रंगे हैं। राजपूत वीरों का तेज और महाराणा का लोकोत्तर पराक्रम इतिहास में प्रसिद्ध है। संवत् 1633 विक्रम संवत में मेवाड़ के हल्दीघाटी का कण-कण लाल हो गया था। अपार शत्रु सेना के सामने थोड़े से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा। और उनके प्रिय घोड़े चेतक को भी मृत्यु का मुंह देखना पड़ा।
महाकवि कन्हैयालाल सेठिया ने महाराणा के स्वतंत्रता संघर्ष को उपमाएं दी हैं जो इतिहास को भी चुनौती देती हैं। प्रताप ने अपनी मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए भौगोलिक स्थितियों की दुरूह कठिनाइयों को झेला, कभी भी अकबर के सामने नहीं झुके। कवियों ने प्रताप की इसी वीरता और शूरता के गीत गाए।प्रताप ने 22 हजार राजपूतों में विश्वास रखा और हल्दीघाटी को भी अमरता प्रदान की।हल्दीघाटी वही स्थान है जहां युद्ध हुआ। कई ऐतिहासिक मत हैं जिनकी चर्चा यहां करना नहीं है। विभिन्न कवियों ने अपनी – अपनी कल्पना और सामाजिक अनुभवों, संवेदनाओं को अपनी लेखनी में आबद्ध किया जो एक तरह से कवि का राजस्थान के प्रति शूरता, वीरता, आन- बान – शान और देश भक्ति का प्रतीक है। वीर रस काव्य के सुविख्यात कवि श्यामनारायण पांडेय( सन् 1907-1991)गायक भी थे। “हल्दीघाटी” जैसी प्रसिद्ध रचना आज भी सबको रोमांचित कर देती है। अरावली पर्वत मालाओं में खमनोर एवं बलीचा गांव के बीच हल्दीघाटी एक पहाड़ी दर्रा है जहाँ
शहीदों की स्मृतियों में छतरियां बनी हुई हैं। दर्रे में हल्दी रंग की मिट्टी होने के कारण हल्दीघाटी नाम पड़ा।
सेठिया जी ने राणा की पीड़ा को उनके पुत्र के हाथों से बिलाव का घास की रोटी छीन कर ले जाने से किया जो इतिहास नहीं कवि का सृजन है। “अरे घास री रोटी” की कल्पना मात्र साहित्यिक कल्पना है। पातल ‘र पीथल में वे लिखते हैं – – –
“अरे घास री रोटी ही जद
बन बिलावडो़ ले भाग्यो
नान्हो सो अमरयो चीख पड्यो
राणा रो सोयो दुख जाग्यो – – – –
जद याद करूं हल्दीघाटी
नैणां में रगत उतर आवै
सुख दुख रो साथी चेतकडो़
सूती सी हूक जगा ज्यावै।
राजकुमार अमर सिंह के हाथ से बनविलाव द्वारा घास की रोटी छीनने का ये सच। महाराणा के स्वतंत्रता संघर्ष की कई उपमाएं दी गईं हैं जो इतनी मार्मिक हैं कि उनके प्रमाण इतिहास में ढूंढने का विषय बन गए हैं। 17 वर्षीय प्रताप का पुत्र अमर सिंह राजपूती है जो शेर और हाथियों का मुकाबला करने में सक्षम है तो भला एक बनविलाव ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं कर सकता। यह मात्र साहित्यिक कल्पना है। राजस्थान के पुत्र तो रण बांकुरे होते तभी तो कवि कहते हैं – – – –
माई एहडा़ पूत जण
जेहडा़ राण प्रताप
अकबर सूतो ओधकै
जाण सिराणे लोप।
महाराणा तो अपने देश के लिए चिंतित हैं – – फूलां री कंवली सेजां पर,
बै आज रूलै भूखा तिसिया,
हिंद वाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क,
राणा री भीम बजर छाती
मातृभूमि पर मर-मिटने वाले अलग ही मिट्टी के बने होते हैं वे स्वयं मिट सकते हैं लेकिन देश की आन पर आंच नहीं आने देते- – –
राणा री पाघ सदा ऊंची
राणा री आण अटूटी है
राणा दर – दर भटक सकते हैं, ठोकर खा सकते हैं, प्यासे मर सकते हैं, भूख से बिलबिला सकते हैं लेकिन उस समय भी केवल मातृभूमि के प्रति मस्तिष्क में प्रेम ही रहता है – – – – –
हूं भूख मरूं प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ा में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै
सेठिया की दृष्टि भी सदैव अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कारों के प्रति जागरूक रहे। अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं भी पूरे भारत देश के लिए प्रेरणादायक हैं जहाँ कभी जीवन पुष्पित और पल्लवित हुआ था । मेवाड़ का गौरवशाली इतिहास रहा है। अग्नि वीणा में कवि कहते हैं – – – –
देख आज मेवाड़ मही को
आडा़वल की चोटी नीली
उसकी बीती बात याद कर
आज हमारी आंखें गीली।
जिसके पत्थर – पत्थर में भी
जय नादों की ध्वनि टकराई,
जहाँ कभी पनपा था जीवन
वहाँ मरण की छाया छाई
सत्य और असत्य को इंगित करते हुए कवि कहते हैं —
फूल विहंसता, शूल मौन है
एक डाल के दोनो साथी
दोनों को ही हवा झुलाती
फूल झरेगा, शूल रहेगा, सत्य कौन है?, भूल कौन है? साहित्य जगत में कवि पृथ्वी राज राठौड़ ही पीथल हैं और पातल का प्रयोग पार्थ या कृष्ण के रूप में हुआ है। कर्नल टॉड ने ग्रंथ राजस्थान का पुरातत्व इतिहास, अकबरनामे में इनका जिक्र आता है। पीथल अकबर के दरबार के प्रसिद्ध कवि और योद्धा दोनों थे लेकिन प्रताप के प्रशंसक भी थे। अकबर किसी भी तरह से प्रताप को हराना चाहते थे।शत्रु पक्ष के होते हुए भी पीथल पत्र में प्रताप को उनके स्वाभिमान और वीरता की याद दिलाते हैं।
पद्मश्री से सम्मानित श्री कन्हैयालाल सेठिया जी की 100 वीं जयंती पर उनकी रचनाओं ही उनकी आत्मा है। धरती धोंरां री और पाथल और पीथल रचनाएँ अमर हैं, कालजयी हैं। जब तक भारतवर्ष है तब तक शब्दों में जडे़ उनके मोती शस्य श्यामला धरती को ऊर्जावान बनाते रहेंगे। राजस्थान के रवीन्द्र नाथ टैगोर कहे जाने वाले सेठिया जी के दार्शनिक भावों और संवेदनशीलता को वसुंधरा मिश्र का शत – शत नमन।

अक्षुण्ण रहेगी हिन्दी की अस्मिता

डॉ. एस आनन्द 40 वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं । साहित्य और व्यंग्य में महारत रखते हैं। सन्मार्ग में 20 वर्षों तक ‘लस्टम – पस्टम’ में तीखे व्यंग्यों के लिए लोकप्रिय। इसके बाद प्रभात वार्ता में ‘बात कहूँ मैं खरी’ और अब सलाम दुनिया में ‘ताँक -झाँक खूब पसन्द किया जाता रहा।’ डॉ. आनन्द भोजपुरी लेखन के लिए भी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर कविताएं खूब पसन्द की जाती हैं

भाषा भावों की संवाहिका और अभिव्यक्ति का श्रेष्ठतम माध्यम है। इसी के द्वारा हम अपने विचारों को सम्प्रेषित कर पाते हैं। बिना भाषा के विचारों का प्रकटीकरण करना सम्भव नहीं है। भाषा ही तो सब कुछ है इसलिए इतिहास के सजीव पृष्ठों पर भाषा के माध्यम से सत्य का उत्स है। आज यही कारण है कि विश्व की पराजित भाषाएँ अपनी – अपनी देशी अस्मिता बनाये रखने के लिए संघर्ष करती दिखायी दे रही हैं। इस संघर्ष की छटपटाहट को दुनिया के अनेक छोटे – छोटे देशों में देखा जा सकता है। अपने देश के स्वाधीनता संग्राम और आन्दोलन का आधार हिन्दी भाषा थी। इसी के माध्यम से ही इतने महान संग्राम को जीतना सम्भव हो सका। स्वतन्त्र भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ, हिन्दी लाओ’ के आन्दोलन का सूत्रपात किया था। उनके सशक्त प्रयासों के बाद भी दुर्भाग्यवश भारत को उस औपनिवेशिक शक्तिशाली मानसिकता से मुक्त करना सम्भव नहीं हो सका जिसमें अंग्रेजी को जानना ही विद्वता की निशानी माना जाता है।
दुर्भाग्यवश वर्तमान स्थिति इतनी सम्वेदनशील है कि भाषा के प्रश्न को गैर राजनीतिक ढंग से सोचना ही सम्भव नहीं प्रतीत होता है। हिन्दी हमारी संस्कृति में रची -बसी है, रगों में घुली – मिली हुई है। यह एक विशाल समाज की भाषा है। बहुसंख्यक नागरिकों से सम्पर्क के लिए हिन्दी अनिवार्य है इसलिए अपने देश में एक स्विस बहुराष्ट्रीय कम्पनी हिन्दी सिखाने का व्यवसाय कर रही है। इसके अतिरिक्त अमेरिका सहित यूरोप के कई देश हिन्दी भाषा सीखने का प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि टेलीविजन पर विदेशी चैनल भी हिन्दी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। आखिरकार उन्हें अपने उत्पाद के तकनीकी महत्व, जरूरी सूचनाएँ, उत्पादों का विज्ञापन हिन्दीभाषी लोगों के बीच में ही करना है। यह हिन्दी भाषा के महत्व को रेखांकित करता है।
हिन्दी कई राज्यों की भाषा है, जैसे – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली आदि। इनका प्रशासनिक कार्य हिन्दी के माध्यम से ही चलता है। इस सत्य के बावजूद लोगों का अंग्रेजी के प्रति आकर्षण कम नजर नहीं आता है। इसे अंग्रेजी के प्रति विवशता कहें या आकर्षण – आज यह भाषा हिन्दी से अधिक सशक्त बन गयी है। लोगों को लगता है कि उनका बच्चा अंग्रेजी नहीं जानता है तो फिर वह कितना भी प्रतिभावान क्यों न हो, सफल नहीं हो सकता इसलिए शिक्षा के निजी क्षेत्रों में अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाना एक बेहद लाभकारी व्यवसाय बन चुका है जिसमें अब बड़े – बड़े उद्योगपति भाग ले रहे हैं इसलिए अंग्रेजी के प्रति यह प्रेम, हिन्दी की उपेक्षा को स्पष्ट दर्शाता है। भारतीय समाज को देखकर शंका होती है कि क्या हम सचमुच हिन्दी के समर्थक हैं या हम ऐसा होने का महज ढोंग करते हैं। हमें अपनी क्यारी के प्राकृतिक फूल अच्छे क्यों नहीं लगते हैं? हम प्लास्टिक या कागजी फूलों की कृत्रिमता को क्यों अपने गले का हार बना रहे हैं?
यह सर्वविदित सत्य है कि इतिहास के हर कालखण्ड में भाषा, सत्ता की मुखापेक्षी रही है। कभी हमारे देश की प्रमुख भाषा संस्कृत रही है परन्तु जैसे ही वह कालखण्ड समाप्त हुआ और सत्ता मुगलों के हाथों में आयी तो फारसी का वर्चस्व बढ़ गया। लार्ड मैकाले जैसे चतुर, चाालाक कूटनीतिज्ञ ने बड़ी ही चतुराई से षडयंत्र करके अंग्रेजी को सभ्य एवं सम्मानित लोगों की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। वह यह सिद्ध करने में सफल हो गया कि अंग्रेजी आंग्ल सभ्यता की निशानी है और हमारी गुलाम मानसिकता इस षड्यंत्र का पर्दाफाश भी नहीं कर पायी और यही कारण है कि हम आज भी भाषा की गुलामी की चादर ओढ़े हुए हैं। जब एक राष्ट्र का एक झंडा होता है, एक राष्ट्रीय प्रहरी होता है, एक राष्ट्रपति होता है तो एक भाषा क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वन नेशन, वन इलेक्शन की झण्डाबरदारी करते हैं तो वे यह क्यों भूल जाते हैं कि एक राष्ट्र की एक राष्ट्रभाषा भी होनी चाहिए?
अंग्रेजी भाषा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुप्रचारित भाषा है और विश्व भर में भ्रमण, व्यापार, शिक्षा, संचार आदि के क्षेत्र में इसका लाभ मिलता है। अंग्रेजी भाषा इस साम्राज्यवादी बाजार की भाषा है जिसका सारा काम अंग्रेजी माध्यम से होता है। साम्राज्यवादी अपने उपनिवेशों में अपनी भाषा और संस्कृति को थोपने का प्रयास करते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि आधुनिक युग में किसी भी राष्ट्र को शक्ति या सैन्यबल के द्वारा गुलाम नहीं बनाया जा सकता परन्तु भाषा एवं संस्कृति की मानसिक दासता सदियों तक चल सकती है जैसे कि हमारे देश में अंग्रेजी के प्रति चल रह है। अंग्रेजी का प्रभाव तो अंग्रेजों के समय भी इतना नहीं था जितना कि स्वतन्त्र भारत में दिखायी दे रहा है।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है और इस भाषा के प्रति हमारे मन में लगाव होना चाहिए। अपनी भाषा तो भावनात्मक रूप से हमारे मन में बसनी चाहिए। षड्यंत्र के द्वारा हो सकता है कि थोड़ा – बहुत व्यतिक्रम आ जाए परन्तु यह स्थिति देर तक नहीं ठहरने वाली है और न चलने वाली है इसलिए निकट भविष्य में हिन्दी भाषा की अस्मिता को नष्ट कर जिस अंग्रेजी भाषा को वरीयता दी गयी है, उसे टूटना ही है। पुनः हिन्दी की प्रतिष्ठा होगी, समय जितना भी लग जाये क्योंकि राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है –
‘किन्तु विमाता बन विदेश की
कोई माता आयेगी
तो वह यहाँ पूतना की गति
आप अन्त में पायेगी।।’

शिक्षक दिवस पर सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन के अनमोल विचार

आज शिक्षक दिवस है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम पर हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पिता नहीं चाहते थे कि वो पढ़ाई करें, वो उन्हें मंदिर का पुजारी बनाना चाहते थे। लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और भारत के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए।

उनका कहना था कि यदि शिक्षा सही प्रकार से दी जाए तो समाज से अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। आइए जानते हैं राधाकृष्णन के अनमोल विचार –

– शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें।

– भगवान की पूजा नहीं होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं।

– अगर हम दुनिया के इतिहास को देखे, तो पाएंगे कि सभ्यता का निर्माण उन महान ऋषियों और वैज्ञानिकों के हाथों से हुआ है,जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं,जो देश और काल की गहराइयों में प्रवेश करते हैं,उनके रहस्यों का पता लगाते हैं और इस तरह से प्राप्त ज्ञान का उपयोग विश्व श्रेय या लोक-कल्याण के लिए करते हैं।

– कोई भी आजादी तब तक सच्ची नहीं होती,जब तक उसे विचार की आजादी प्राप्त न हो। किसी भी धार्मिक विश्वास या राजनीतिक सिद्धांत को सत्य की खोज में बाधा नहीं देनी चाहिए।

– शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत:विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए।

ज्ञान हमें शक्ति देता है, प्रेम हमें परिपूर्णता देता है।

– शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके।

– पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।

– किताबें पढ़ने से हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है।

– दुनिया के सारे संगठन अप्रभावी हो जाएंगे यदि यह सत्य कि ज्ञान अज्ञान से शक्तिशाली होता है उन्हें प्रेरित नहीं करता।

-शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके।

-सचमुच ऐसा कोई बुद्धिमान नहीं है जो स्वयं को दुनिया के कामकाज से अलग रख कर इसके संकट के प्रति असंवेदनशील रह सके।

-उम्र या युवावस्था का समय से लेना-देना नहीं है। आप अपने आप को कितना नौजवान या बूढा महसूस करते हैं यही मायने रखता है।

पीवी सिंधु होंगी ‘सुसाइड प्रिवेंशन मिशन’ की ब्रांड एंबेसडर

अहमदाबाद : विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी और यूथ आइकॉन पुसरला वेंकट सिंधु अब गुजरात सुसाइड प्रिवेंशन की ब्रांड एंबेसडर होंगी। उन्होंने ब्रांड एंबेसडर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। आगामी 10 सितम्बर को वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन दिवस पर जीवीके 108 और गुजरात सरकार के संयुक्त उपक्रम में सुसाइड प्रिवेंशन प्रोग्राम के तहत 104 हेल्पलाइन नम्बर शुरू होगा

सोशल मीडिया पर युवाओं से जुड़ेगा आरबीआई

मुम्बई : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) जल्द ही फेसबुक और ट्विटर के जरिए देश की जनता से जुड़ेगा। आरबीआई द्वारा जारी हुई वित्त वर्ष 2019 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक अब तक लोगों से जुड़ने के लिए ऑडियो-विजुअल और टेक्स्ट मैसेज माध्यम का इस्तेमाल करता था। 2019 में आरबीआई की तरफ से करीब 241 करोड़ मैसेज लोगों को भेजे गए। लेकिन युवाओं से जुड़ने के लिए अब आरबीआई सोशल मीडिया माध्यमों का भी इस्तेमाल करेगा। आरबीआई 360 डिग्री मास मीडिया अवेयरनेस प्रोग्राम के तहत अपनी पहुँच बढ़ाना चाहती है। इसके तहत बैंक फेसबुक और ट्विटर से अपनी नीतियों और योजनाओं को लोगों तक पहुँचाएगा। इसका मकसद टू-वे कम्युनिकेशन (दोतरफा संचार) को बढ़ावा देना और युवाओं के साथ जुड़ना है, जिससे लोगों को बैंक की पारदर्शिता, सामयिकता और विश्वसनीयता के बारे में जानकारी मिले। इसके अलावा आरबीआई का संचार विभाग देशभर के अपने क्षेत्रीय केंद्रों में मीडिया वर्कशॉप का भी आयोजन करेगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पत्रकार उससे जुड़ पाएं। दरअसल, आरबीआई के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास बैंक की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों से बैंक को जोड़ने के पक्षधर रहे हैं। जबकि इससे पहले गवर्नर रहे उर्जित पटेल की कई बार संचार में खुलापन न रखने के लिए आलोचना भी हो चुकी थी।
बाजार में जल्द आएंगे वार्निश की कोटिंग वाले 100 रुपये के नोट
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अब 100 रुपये के नोट की उम्र बढ़ाने के लिए इस पर वार्निश की कोटिंग करेगा। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में इसका भी जिक्र है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में सभी 100 रुपये के नोटों को वार्निश कोटिंग वाले नोटों से बदल दिया जाएगा। इसके अलावा आरबीआई दृष्टिबाधित लोगों के लिए करंसी नोटों को और ज्यादा आसान पहचान वाला बनाना चाहता है। इन सब बदलावों और बैंक नोट की क्वालिटी को परखने के लिए आरबीआई ने मुम्बई में क्वालिटी एश्योरेंस लैबोरेट्री भी स्थापित की है। यह लैब करंसी नोटों के बदलाव और मानदंड बनाने का काम करेगी।

नौ नेत्रहीनों ने किन्नरों और छात्रों की मदद से बनाया सबसे बड़ा जूट बैग

मुख्य बातें – 

बैग सरदार वल्लभाई पटेल इंटरनेशनल स्कूल ऑफ टेक्सटाइल्स एंड मैनेजमेंट में सिला गया
65 फीट ऊंचा और 33 फीट चौड़ा यह बैग गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया

कोयम्बटूर : तमिलनाडु के 9 नेत्रहीन दिव्यांगों ने 18 छात्रों और किन्नर समुदाय की मदद से दुनिया का सबसे बड़ा जूट बैग बनाया है। इसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिली है। इसका मकसद पर्यावरण की सुरक्षा और प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल के खिलाफ लोगों को जागरूक करना है। जूट बैग 65 फीट ऊँचा और 33 फीट चौड़ा है। बिना हैंडल वाले इस बैग पर सिलाई करने में ही 5 घंटे लगे। इस काम को अंजाम कोयंबटूर के सरदार वल्लभाई पटेल इंटरनेशनल स्कूल ऑफ टेक्सटाइल्स एंड मैनेजमेंट में दिया गया।
छात्रों ने की नेत्रहीनों की मदद
बैग पर सिलाई करने में ट्रांसजेंडर और तमिलनाडु टेक्निकल इंस्टीट्यूट के छात्रों ने नेत्रहीनों की मदद की। बैग को वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिलने पर 34 साल के संतोष चंद्रन ने कहा, “यह कभी न भूलने वाला पल था। सबसे बड़े जूट बैग बनाने वालों में उनका भी शामिल हुआ। यह देखकर माता-पिता काफी खुश हुए हैं। युवा फाउंडेशन की अध्यक्ष शशिकला ने मीडिया को बताया, ‘‘नेत्रहीनों ने जूट बैग को सिलकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स बनाया। इसमें हैंडल नहीं लगाया गया। इसका मकसद हानिकारक प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल रोकना है। लोगों को जागरूक करना है कि वे प्लास्टिक बैग की जगह जूट बैग का इस्तेमाल कर सकते हैं।’दिव्यांगों की इस उपलब्धि पर शशिकला कहती है, ‘‘अलग-अलग लोगों की अपनी-अपनी क्षमता होती है। दिव्यांगों को विश्वास और प्रोत्साहन देना हमारी जिम्मेदारी है।’’

संवादधर्मिता की पहल है ‘जान-पहचान’

कोलकाता :  कलकत्ता के सुप्रसिद्ध कॉलेज खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज के हिंदी विभाग में हाल ही में ‘जान -पहचान’ नामक एक संवाद श्रृंखला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य यह है कि विद्यार्थियों में परस्पर संवाद और परिचय का माहौल बने। वे एक दूसरे को महज प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं बल्कि साथी के रूप में जाने और पहचाने। इस कार्यक्रम में विभाग के तीनों वर्षों के छात्रों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में बच्चों के लिए एक गेम बनाया गया। एक चिट के जरिए दो विद्यार्थियों की जोड़ी बनाकर उन्हें दस मिनट आपस में एक दूसरे से बात करने का अवसर दिया गया। उन्हें एक दूसरे के बारे में 5 बातें जाननी थी और फिर उन बातों को निर्णायकों के सामने रखना था। जिन विद्यार्थियों ने प्रभावी तरीके से इसे प्रस्तुत किया ,उनको पुरस्कृत किया गया। इस संवाद -श्रृंखला में प्रथम स्थान पर खुशबू खातून और खुशबू कुमारी साव,द्वितीय स्थान पर पूजा साव और सुमन साव, तृतीय स्थान पर बिंदी चौधरी और लक्ष्मी पाठक को मिला। विशेष पुरस्कार रोहित गुप्ता व सीमा प्रजापति, नंदनी साव व सौरभ केशरी और पिंकी व अभिनव को मिला। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट है कि हम विद्यार्थियों के बीच सकारात्मक सोच और परस्पर सहभागिता का संस्कार विकसित करना चाहते हैं। इस आयोजन में विभाग की शिक्षिका डॉ रूद्राक्षा पांडेय और प्रो.मधु सिंह एवं प्रो. राहुल गौड़ ने विशेष सहयोग दिया।

 हिन्दी की गरिमा का सांस्कृतिक उद्घोष है हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश

कोलकाता  : कोई भी ज्ञानकोश ऐसे ज्ञान का द्वार खोलता है जो पाठकों में जिज्ञासा, खुलापन और रचनात्मकता पैदा करे।  हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश भारत में निर्मित कोशों की परंपरा में 7 खंडों का एक अद्वितीय ग्रंथ है। भारतीय भाषा परिषद में इसके प्रकाशन के अवसर पर आयोजित गोष्ठी में देश के विभिन्न कोनों से आए विद्वानों ने इसका स्वागत किया और बताया कि हिन्दी में पचास साल के बाद एक ऐसा कोश आया है जिसमें हिंदी साहित्य से संबंधित सभी विषयों के अलावा मीडिया, पर्यावरण, समाज विज्ञान, इतिहास, मानवाधिकार, धर्म और संस्कृति जैसे विषयों से संबंधित 2,660 प्रविष्टियाँ हैं। यह ज्ञानकोश कोलकाता में बना है जो एक गौरव का विषय है।
बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ.अवधेश प्रधान ने कहा कि नए समय की चुनौतियों के संदर्भ में इस कोश का निर्माण हुआ है। यह  हिन्दी शिक्षा जगत के एक बड़े अभाव को पूरा करेगा। यह कोश बहुत सरल भाषा में तैयार हुआ है। यह  हिन्दी की महान परंपरा की ही एक विकसित कड़ी है। सम्पादक मंडल के सदस्य डॉ.अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि इस ज्ञानकोश की तरह ही एक मानक  हिन्दी व्याकरण की आवश्यकता है। इग्नू से जुड़े प्रो.जवरीमल्ल पारख ने कहा कि आज साहित्य के अध्ययन के लिए ज्ञान के व्यापक क्षेत्रों का अध्ययन भी जरूरी है। यह ज्ञानकोश इसी कमी को पूरा करता है। यह देश के 275 लेखकों के सहयोग से बना है। यह महज सूचनाओं का भंडार नहीं है बल्कि ज्ञान का भंडार है।
ज्ञानकोश के प्रधान सम्पादक डॉ.शंभुनाथ ने कहा, ‘यह महज कुछ व्यक्तियों का निर्माण नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति और हिन्दीभाषी समाज की रचनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति है। यह ज्ञानकोश परम्परा और नवोन्मेष का संगम है। मुझे खुशी है कि देश भर में इसका व्यापक स्वागत हो रहा है। फिर भी मैं यही कहूँगा कि हमने एक विकसनशील ज्ञानकोश की नींव डाली है जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ इमारत ऊंची करती जाएंगी।’
ज्ञानकोश समारोह की अध्यक्षता संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पूर्व कुलपति डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी ने की। उन्होंने कहा कि यह ज्ञानकोश  हिन्दी की एक ऐसी उपलब्धि है जो दशकों तक हिन्दी पाठकों को आलोकित करेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय बहुलता में अखंडता की एक दीर्घ परंपरा है जो इस ज्ञानकोश में भी प्रतिबिंबित होती है। यह देश की संस्कृति को बचाने की ही एक कोशिश है। आज सोशल मीडिया पर जिस तरह भ्रामक सूचनाओं को प्रचार हो रहा है, यह ज्ञानकोश उस साम्राज्य से टक्कर लेता है।
भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि हम इस ज्ञानकोश का प्रकाशन करके गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह हम सब की एक सामूहिक उपलब्धि है।
इस ज्ञान समारोह में शोध सहायक के रूप में काम करने वाले शोधार्थियों – दिनेश कुमार शर्मा, श्रद्धांजलि सिंह, पूजा गुप्ता, पीयूषकांत और उपेंद्र शाह का अभिनंदन किया गया। समारोह में बड़े पैमाने पर लेखक, शिक्षक और विद्यार्थीगण उपस्थित थे। सभा का संचालन परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने किया।