Tuesday, June 30, 2026
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वीरांगना की नयी कार्यकारिणी घोषित

अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव और सम्मान समारोह 9 नवम्बर को

कोलकाता : अन्तर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन, पश्चिम बंगाल की प्रदेश अध्यक्ष व प्रख्यात गायिका प्रतिभा सिंह ने संगठन की नयी कार्यकारिणी की घोषणा बालीगंज में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में की। प्रदेश कार्यकारिणी की उपाध्यक्ष रीता राजेश सिंह, महासचिव प्रतिमा सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, संयुक्त सचिव ममता सिंह, संगठन सचिव किरण सिंह, सुमन सिंह, अनुकृति सिंह और जनसम्पर्क सचिव पूनम सिंह बनायी गयीं। कोलकाता महानगर इकाई की सरंक्षक गिरिजा दारोगा सिंह, गिरिजा दुर्गादत्त सिंह, अध्यक्ष मीनू सिंह, उपाध्यक्ष विद्या सिंह, महासचिव इंदु सिंह, संयुक्त सचिव सुनीता सिंह, संगठन सचिव संगीता सिंह, जनसम्पर्क सचिव रेखा सिंह बनायी गयीं। सोदपुर इकाई की संरक्षक ज्योति सिंह, अध्य़क्ष सुनीता सिंह, उपाध्यक्ष रीना सिंह और सुलेखा सिंह, महासचिव आशा सिंह, कोषाध्यक्ष रीता सिंह बनायी गयीं। बालीगंज इकाई की अध्यक्ष रीता सिंह, उपाध्यक्ष मीरा देवी सिंह तथा महासचिव दीपामाला सिंह बनायी गयीं। प्रतिभा सिंह ने बताया कि वीरांगना की पश्चिम बंगाल इकाई की ओर से 9 नवम्बर को अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव व सम्मान समारोह का आयोजन हावड़ा के शरत सदन में किया गया है। इसमें विभिन्न देशों तथा देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय वीरांगना संगठन से जुड़ी विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली वीरांगनाएं शामिल होंगी। बैठक में आभा सिंह, जयश्री सिंह, ललिता सिंह, शैला सिंह, मीरा सिंह, गीता सिंह भी विशेष तौर पर उपस्थित थीं।

भारतीय भाषाओं से मिलकर बनी हिन्दी को राजभाषा बनाने की जरूरत – प्रो. जैन

कोलकाता : महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में सावित्रीबाई फुले सभा-कक्ष में ‘हिंदी दिवस समारोह’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। इस अवसर पर ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’ विषय पर बोलते हुए प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी प्रो.वृषभ प्रसाद जैन ने कहा कि भारतीय भाषाओं से मिलकर बनी हिन्दी को राजभाषा बनाने की जरूरत है। यहाँ की तमाम बोलियाँ, क्षेत्रीय भाषाएँ, उपभाषाएँ ही हिन्दी की असली ताक़त हैं। इनकी उपेक्षा ने हिन्दी का नुकसान किया है। आज हिन्दी का जिस तरह से वैश्विक प्रचार-प्रसार देखने को मिल रहा है, वह उत्साहवर्द्धक है। लेकिन भारत में आखिर क्यों सरकारें भाषाई स्कूलों को बंद करके विदेशी भाषा को बढ़ावा देने में लगी हैं ? केंद्र की विजिटिंग फैकल्टी प्रो. चंद्रकला पाण्डेय ने हिन्दी की संसदीय समितियों से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए राजभाषा के व्यावहारिक पक्षों पर उसकी सही जगह दिलाने के लिए संकल्प लेना होगा और ईमानदारी से उसके लिए काम करना होगा। कार्यक्रम का संचालन मीडिया प्राध्यापक डॉ. ललित कुमार ने किया। इस अवसर पर केंद्र के विद्यार्थियों काजल शर्मा, साक्षी कुमारी, पूजा साव, नैना प्रसाद एवं विवेक साव ने अपनी विविध रचनात्मक प्रस्तुतियाँ दीं। कार्यक्रम बात की। हिंदी प्राध्यापक डॉ. विवेक सिंह ने कहा कि हिन्दी एक बड़ी संपर्क भाषा है, इसलिए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को हम जितना मजबूत करेंगे, हिन्दी भाषा की जड़ें उतनी ही मजबूत होंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने हिन्दी की संवैधानिक स्थितियों पर बात करते हुए कहा कि एक गैर-हिंदीभाषी होते हुए भी डॉ बीआर अंबेडकर ने हिन्दी को राजभाषा बनाने की पुरज़ोर वकालत की थी। लेकिन आज हिन्दी वाले ही हिंदी की दुर्दशा करने में सबसे आगे हैं। हमें हिन्दी को में केंद्र कर्मी राकेश श्रीमाल, डॉ आलोक कुमार सिंह, सुखेन शिकारी एवं रीता बैद्य भी उपस्थित थे।

पंकज आडवाणी ने 22वीं बार जीती विश्व बिलियर्ड्स चैम्पियनशिप

नयी दिल्ली :   भारत के शीर्ष क्यू खिलाड़ी पंकज आडवाणी स्थानीय खिलाड़ी थवे ओ को हराकर आईबीएसएफ विश्व बिलियर्ड्स चैम्पियनशिप का खिताब अपने नाम कर लिया। आडवाणी ने थवे ओ को 6-2 150(145)-4, 151(89)-66, 150(127)-50(50), 7-150(63,62), 151(50)-69(50), 150(150)-0, 133(64)-150(105), 150(74)-75(63) से हराकर खिताब पर कब्जा जमाया। इसके साथ ही वह रिकॉर्ड 22वीं बार विश्व चैंपियन बने। पिछले छह सालों में यह आडवाणी का यह पांचवां खिताब है। इससे पहले इंग्लैंड आडवाणी के माइक रसेल को 5.2 से हराकर आईबीएसएफ विश्व बिलियडर्स चैम्पियनशिप के फाइनल में पहुंचे थे। बता दें कि पिछले साल भी फाइनल इन्हीं दोनों के बीच हुआ था जिसमें आडवाणी विजयी रहे थे। थवे ओ ने भारत के सौरव कोठारी को 5.3 से हराया।

कपिल देव होंगे हरियाणा की पहली स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के पहले कुलपति

चंडीगढ़ : करीब ढाई महीने की कशमकश के बाद आखिरकार हरियाणा सरकार ने पहला विश्वकप दिलाने वाले पूर्व क्रिकेटर पद्म विभूषण कपिल देव रामलाल निखंज को ही हरियाणा स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का कुलपति बना दिया है। यह चर्चा काफी समय से चल रही थी और कपिल देव की ओर से भी इस जिम्मेदारी को निभाने की सहमति आ चुकी थी।
अब इस संदर्भ में मौजूदा नियमों में संशोधन के बाद कपिल देव की नियुक्ति को सरकार ने हरी झंडी दे दी है। अभी तक स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का कुलपति प्रदेश के राज्यपाल ही होते थे। मगर सरकार ने विधानसभा के मानसून सत्र में 6 अगस्त को संशोधन विधेयक पास कर खेल जगत की एक महान हस्ती को अपनी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त किया है। प्रदेश के राज्यपाल इस यूनिवर्सिटी के संरक्षक की भूमिका में रहेंगे। सरकार के हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय विधेयक 2019 को पारित होने के बाद राज्यपाल ने भी इस पर स्वीकृति दे दी थी।
उधर, खेल मंत्री अनिल विज ने भी इस बाबत ट्वीट कर यह जानकारी दी है कि अब कपिल देव सोनीपत के राई स्थित हरियाणा स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के पहले चांसलर होंगे। उनके ट्वीट पर री-ट्वीट करते हुए लोगों ने सरकार के इस फैसले की सराहना की है। लोगों ने कहा है कि खेल जगत में यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा और यह एक अच्छी परंपरा की शुरूआत है कि खेल विश्वविद्यालयों की कमान सफल खिलाड़ियों के हाथों में दी जा रही है। निसंदेह कपिल देव को ये जिम्मेदारी सौंपने के बाद हरियाणा खेल के क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा, जबकि खिलाड़ियों के मनोबल में भी वृद्धि होगी। कपिल देव क्रिकेट जगत के एक सफल ऑल राउंडर रहें है। क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ पूर्व खिलाड़ियों में उनकी गिनती होती है। सन 1983 में भारत ने उनकी कप्तानी में ही पहला वर्ल्डकप जीता था। वर्ष 2002 में कपिल देव को ‘सदी के भारतीय क्रिकेटर’ के रूप में चुना गया था। दस माह वे भारतीय क्रिकेट टीम के प्रशिक्षक भी रहे।

अनुवाद को आसान बना रहे हैं ये ऐप

एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना हो या एक देश से दूसरे देश जाना हो, स्थानीय भाषाओं का अपना महत्व है। आप नीचे दिए गये ऐप की  मदद से भाषा की समस्या का समाधान कर सकते हैं –

Translate: text & voice translator
इस ऐप की मदद से आप आप हिन्दी सहित 100 अलग-अलग भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। इसके अलावा फोन में मौजूद किसी दूसरे एप के टेक्स्ट का भी अनुवाद किया जा सकेगा। यदि आप किसी देश की यात्रा पर हैं तो यह एप काफी मददगार है। इसमें आप बोलकर भी अनुवाद कर सकते हैं या फिर आपका दोस्त अंग्रेजी में बोल रहा है तो आप एप का वॉयस रिकॉग्निशन को ऑन करके हिन्दी में उसकी बातों को समझ सकते हैं।
Hindi English Translator
इस एप की मदद से आप अंग्रेजी से हिंदी और हिन्दी से अंग्रेजी आसानी से सीख सकते हैं। इसके अलावा इस ऐप में कई भाषाओं से अनुवाद का भी ऑप्शन है। इसे आप गूगल प्ले-स्टोर से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। यह एप भी उनलोगों के लिए भी किसी तोहफे से कम नहीं है जो अक्सर अलग-अलग जगहों और देशों की यात्रा करते हैं। यह एप हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करने में सक्षम है।
All Language Translator Free
इस एप के नाम से ही जाहिर होता है कि इसकी मदद से आप किसी भी भाषा का हिन्दी में अनुवाद कर सकते हैं। इसमें करीब 180 भाषाओं का सपोर्ट है। यह एप आपके मैसेज और लंबे लेख को भी हिन्दी में अनुवाद कर सकता है।
English Hindi Dictionary
यह एप डिक्शनरी के साथ-साथ अनुवादक का भी काम करता है। इस एप में ऑफलाइन फीचर भी है। इसमें हिन्दी-अंग्रेजी सीखने के लिए इसमें गेम भी दिए गए हैं। इस एप को आप गूगल प्ले-स्टोर से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। इस एप में उच्चारण करने का तरीका भी बताया गया है।

इंटरनेट पर लोकप्रिय हो रही हिन्दी, हर साल जुड़ रहे 94 फीसदी उपभोक्ता

43.63% लोग देश में हिन्दी भाषा बोलते हैं
मंत्री और अधिकारी ही नहीं करते हैं हिन्दी भाषा का प्रयोग

नयी दिल्ली : सर्वे एजेंसी स्टैटिस्टा ने साल 2018 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का दबदबा है। अंग्रेजी भाषा में 10 मिलियन वेबसाइट्स हैं और 53 प्रतिशत लोग पूरी दुनिया में इंटरनेट पर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट पर पूरी दुनिया में चाइनीज की उपस्थिति सिर्फ 16 फीसदी है जबकि चाइनीज बोलने वालों की संख्या 1.3 बिलियन है लेकिन स्टैटिस्टा का दावा अब गलत साबित होते दिख रहा है। एक बात तो आप भी जानते हैं कि दुनिया की कोई भी भाषा मातृभाषा की जगह नहीं ले सकती है और यही हालत हिन्दी के साथ भी है। यदि आप भी हिन्दी भाषी हैं तो आपको बता दें कि आपकी हिन्दी इंटरनेट पर काफी तेजी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर हिन्दी की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या हर साल 94 फीसदी बढ़ रही है। गूगल-केपीएमजी रिसर्च, सेंसस इंडिया और आईआरएस की सर्वे रिपोर्ट को मानें तो साल 2021 में हिन्दी में इंटरनेट उपयोग करने वाले अंग्रेजी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से अधिक हो जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे। गूगल के अनुसार हिन्दी में सामग्री पढ़ने वाले हर वर्ष 94% बढ़ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में 17% है। अमेजन इंडिया ने हाल ही में अपना एप हिन्दी में लॉन्च किया है। ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिन्दी में उपलब्ध हैं। स्नैपडील भी हिन्दी में आ चुका है। 2021 तक 8.1 करोड़ लोग डिजिटल पेमेंट के लिए हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे। जबकि 2016 में यह संख्या 2.2 करोड़ थी। सरकारी कामकाज के लिए 2016 तक 2.4 करोड़ लोग हिन्दी का इस्तेमाल करते थे जो 2021 में 9.4 करोड़ हो जाएंगे। 2016 में डिजिटल माध्यम में हिन्दी समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी। जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ होने का अनुमान है।

हाल ही में राजभाषा विभाग के सचिव ने कहा है कि मंत्रियों और विभागों की ओर से मिलने वाले पत्रों में सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही हिन्दी में होते हैं। हालांकि अधिकांश मंत्री दावा करते हैं कि वे 50 से 60 प्रतिशत पत्र-व्यवहार हिन्दी में करते हैं। बता दें कि 2001 में देश में हिन्दी 13बोलने वालों की संख्या 43.63 फीसदी यानी करीब 42 करोड़ थी, वहीं 2011 में यह संख्या 52 करोड़ हो गयी।

वैज्ञानिक उत्पन्न कर रहे  डेंगू-प्रतिरोधी मच्छर, हुआ 9 देशों में परीक्षण 

डेढ़ लाख संक्रमित मच्छरों को छोड़ा
दक्षिण-पूर्व एशिया में डेंगू से 1800 लोग मारे गए- डब्ल्यूएचओ

हनोई : वैज्ञानिकों का एक समूह मच्छर जनित बीमारियों में से एक डेंगू से निपटने इस साल दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार और कंबोडिया में डेंगू के काके लिए डेंगू-प्रतिरोधी मच्छर पैदा करने के लिए शोध कर रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इस बीमारी से अब निपटा जा सकेगा। इसके लिए 9 देशों में परीक्षण भी किया गया है, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं। मच्छर जैसी बीमारियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक वर्ल्ड मॉस्क्विटो प्रोग्राम (डब्ल्यूएमपी) के तहत काम कर रहे हैं। नर और मादा एडीज (डेंगू फैलाने वाले) मच्छरों को जंगल में छोड़े जाने से पहले रोग प्रतिरोधी बैक्टीरिया वोल्बाचिया से संक्रमित किया जाता है। कुछ ही हफ्तों में बेबी मच्छर वोल्बाचिया बैक्टीरिया के साथ जन्म लेते हैं, जो रोग प्रतिरोधक के रूप में काम करता है। इससे न केवल डेंगू, बल्कि जाइका, चिकनगुनिया और पीले बुखार जैसी बीमारियों से बचा जा सकेगा।
पहली बार उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में इसका परीक्षण किया गया। वियतनाम में डब्ल्यूएमपी के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर, गुएन बिन्ह गुयेन ने बताया कि वोल्बाचिया बैक्टीरिया वाले मच्छरों को छोड़ने के बाद डेंगू के मामलों में कमी देखी गई। गुएन की टीम ने दक्षिणी वियतनाम के डेंगू पीड़ित जिले विन्ह लुओंग में करीब डेढ़ लाख वोल्बाचिया-संक्रमित मच्छरों को छोड़ा। विन्ह लुओंग में डेंगू के मामले में 86% की कमी आई। इस खोज को लेकर एक महिला ने कहा कि यह मेरे लिए राहत की खबर है। 2016 में मेरे दो बच्चों को डेंगू हुआ था। अब मैं 70 से 80% तक सुरक्षित महसूस करती हूं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया से डेंगू के करीब 6 लाख 70 हजार मामले सामने आए। इसमें 1800 लोग मारे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल स्थिति बेहद खराब थी। डेंगू का एक मुख्य कारण गर्म तापमान है। दुनियाभर में जुलाई काफी गर्म रहा। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर राचेल लोवे के मुताबिक, गर्म मौसम डेंगू के लिए उपयुक्त होता है। वैज्ञानिकों ने 1920 में वोल्बाचिया बैक्टीरिया को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ड्रेनेज सिस्टम में रहने वाले मच्छरों से खोजा था। सिंगापुर और मलेशिया में अभी केवल नर मच्छरों पर वोल्बाचिया बैक्टीरिया का प्रयोग किया जा रहा है।

दिव्यांग वैज्ञानिक ने स्मार्ट छड़ी बनाई, बोलकर बताती है रास्ता

एक बार चार्ज होने पर 5 घंटे तक काम करती है 

तुर्की के दिव्यांग वैज्ञानिक कुर्सत सेलन ने आंखों की रोशनी खो चुके लोगों के लिए स्मार्ट छड़ी डिजाइन की है। मॉडर्न तकनीक से लैस यह छड़ी दिव्यांगों को बोलकर रास्ता बताती है। इसे वीवॉक नाम दिया गया है। यह छड़ी रास्ते में आने वाली दुकानों और इमारतों के बारे में भी जानकारी देती है। इसमें कई एडवांस्ड सेंसर लगे हैं, जो रास्ते में किसी भी तरह की बाधा आने पर यूजर को अलर्ट करते हैं। सेलन यंग गुरू अकादमी के को-फाउंडर है। स्मार्ट तकनीक से लैस वीवॉक दिव्यांगों को आसपास के चीजों के बारे में बोलकर बताती है। यह बिल्ट-इन स्पीकर, स्मार्टफोन इंटिग्रेशन सिस्टम के अलावा कई तरह के सेंसर से लैस है, जो बाधा होने पर यूजर को अलर्ट करते हैं। वीवॉक डिवाइस में एक इलेक्ट्रॉनिक हैंडल लगा है। यह अल्ट्रासॉनिक सेंसर की मदद से पैर से सीने तक आने वाली किसी भी तरह की बाधा को पहचान लेता है और हैंडल में वाइब्रेशन कर यूजर को अलर्ट करता है। यूजर इसे स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं। यह गूगल मैप और वॉयस असिस्टेंट फीचर को सपोर्ट करती है। इसमें लगे बिल्ट-इन स्पीकर यूजर को रास्ते में आने वाले दुकानों और इमारतों के बारे में बोलकर बतातें हैं, जिसे वह देख नहीं सकते।

वीवॉक ओपन प्लेटफार्म तकनीक पर आधारित है, यानी इसे किसी भी थर्ड पार्टी ऐप के जरिए स्मार्टफोन से कनेक्ट किया जा सकता है। इसकी नेवीगेशन क्षमता को और बेहतर बनाने के लिए इसे राइडिंग ऐप और ट्रांपोर्टेशन सर्विस से जोड़ने पर भी विचार किया जा रहा है। यह एंड्रॉयड और आईओएस दोनों तरह के डिवाइस के साथ काम करेगा है। इसमें यूएसबी इन्पुट है, जिसकी मदद से इसे चार्ज किया जा सकता है। फुल चार्ज होने पर इसे 5 घंटे तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी कीमत लगभग 35 हजार रुपए है।

संगीत के माध्यम से यहाँ 108 साल से सिखायी जा रही है हिन्दी

मसूरी : गाना गाकर हिंदी सिखाने वाला यह देश का सबसे पुराना और अनोखा भाषा स्कूल है।  करीब 108 साल पुराना। यहाँ हर साल 200 विदेशी हिन्दी सीखने आते हैं. वैसे तो इस स्कूल में हिन्दी के अलावा पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और गढ़वाली भाषा भी सिखाई जाती है लेकिन 80-90% हिंदी सीखने वाले ही होते हैं। फिलहाल यहाँ 17 शिक्षक हैं. ये स्कूल एक अलग ही संसार है, जहाँ विदेशी हिंदी, उर्दू, संस्कृत सीखने आते हैं और तीन सप्ताह से तीन महीने तक यहाँ गुजारते हैं.

किसने बनवाया
शुरुआत में यह स्कूल अंग्रेजों ने मिशनरीज के लिए बनवाया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी कई साल तक सिर्फ मिशनरीज को ही दाखिला दिया जाता था। अब इस स्कूल का संचालन एक बोर्ड करता है. यहां आने वालों में शोधकर्ता, दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी, राजदूत और फिल्मी सितारे होते हैं। दाखिला लेने वालों की उम्र 18 से लेकर 90 साल तक है. सबसे ज्यादा हिंदी सीखने वाले अमेरिका से होते हैं.

स्कूल में रिकॉर्डिंग की खास व्यवस्था
हिंदी सिखाने के लिए स्कूल में रिकॉर्डिंग की खास व्यवस्था है। छात्र इसी रिकॉर्डिंग से सीखते हैं. दरअसल हम भाषा जितनी ज्यादा सुनते हैं, उतनी ही जल्दी सीखते भी हैं। आम स्कूल पहले लिखना-पढ़ना सिखाते हैं, लेकिन यहां पहले बोलना, फिर व्याकरण और फिर लिखना सिखाया जाता है. यही नहीं, शिक्षकों ऐसे तरीके ईजाद करने की कोशिश करते हैं, जिससे सीखना उबाऊ न हो। हर दिन 4 घंटे पढ़ाई होती है. हर घंटे की फीस 385 से 653 रुपये तक है।

50 हजार का बिल देख पंचायत खुद ही बिजली बनाने लगी, अब इसे बेचकर 19 लाख कमा रही

ओड़नथुरई : कोयम्बटूर से 40 किमी दूर ओड़नथुरई पंचायत के आत्मनिर्भर बनने की कहानी अनोखी है। यहां के 11 गाँवों में हरेक घर पक्का है। छत पर सोलर पैनल लगे हैं। कन्क्रीट से बनी सड़कें हैं। हर 100 मीटर पर पीने के पानी की व्यवस्था है और हर घर में शौचालय भी है। ओड़नथुरई ग्राम पंचायत न सिर्फ अपनी जरूरत की बिजली खुद बनाती है, बल्कि उसे तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (टीएनईबी) को बेचती भी है। इससे सालाना 19 लाख रुपए की कमाई होती है। ऐसा करने वाली यह देश की एकमात्र पंचायत है। सभी घरों में बिजली मुफ्त है। इन्हीं खूबियों के कारण विश्व बैंक के विशेषज्ञ, देशभर के सरकारी अफसर और 43 देशों के छात्र गांव देखने आ चुके हैं। बदलाव की यह कहानी 23 साल पहले शुरू हुई थी। तब छोटी-छोटी झोपड़ियों वाले गांव गरीबी और असुविधाओं में फंसे थे।
आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता
1996 में ग्राम प्रमुख रहे आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता बने। वे बताते हैं- ‘उस वक्त हर महीने पंचायत का बिजली बिल 2000 रुपए आता था। अगले एक साल में पंचायत में कुएं बनवाए, स्ट्रीट लाइट लगवाई, तो यह बिल 50 हजार रुपए पहुंच गया, जिसने चिंता बढ़ा दी। इस बीच, पता चला कि बायोगैस प्लांट से बिजली बन सकती है। तब बड़ौदा जाकर इसकी ट्रेनिंग ली। 2003 में पहला गैस प्लांट लगवाया। नतीजतन बिजली बिल आधा रह गया। फिर दो गांवों में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइट्स लगवाईं।’ 2006 में षणमुगम को पवनचक्की लगाने का विचार आया, लेकिन पंचायत के पास सिर्फ 40 लाख रुपए का रिजर्व फंड था, जबकि पवनचक्की टरबाइन 1.55 करोड़ रुपए की थी। षणमुगम ने पंचायत के नाम पर बैंक से लोन लेकर ओड़नथुरई से 110 किमी दूर 350 किलोवॉट की पवनचक्की लगवाई। इसकी मदद से पूरा गांव बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन पंचायत के शेष 10 गांवों केे लोग अब भी राज्य बिजली बोर्ड पर निर्भर थे। तब षणमुगम ने एकीकृत सौर और पवन ऊर्जा प्रणाली अपनाई। हर घर की छत पर सोलर पैनल लगाए गए। घरों में दिन में बिजली सोलर पैनल से मिलती है और रात में पवनचक्की से। बैंक से लिया लोन पंचायत ने 7 साल में चुका दिया। अब सालाना 7 लाख यूनिट बिजली बन रही है। जरूरत 4.5 लाख यूनिट में पूरी हो जाती है। बची 2.5 लाख यूनिट टीएनईबी को 3 रुपए प्रति यूनिट पर बेच दी जाती है। बिजली में आत्मनिर्भर होने पर गांव की तरक्की के और रास्ते भी खुल गए हैं।
बिजली बनाने से अंधेरा दूर, जीवन भी रोशन
आज पंचायत बिजली बिक्री से लगभग 19 लाख रु. सालाना कमाती है। यह राशि 11 गांवों के विकास में खर्च होती है। राज्य सरकार की सोलर पावर्ड ग्रीन हाउस स्कीम के तहत 950 घर बनाए गए हैं। ढाई-ढाई लाख रुपए की लागत से ये घर 300 वर्ग फीट क्षेत्र में बने हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)