Thursday, April 23, 2026
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नागल ने जीता सेट और दिल , फेडरर ने मैच

न्यूयार्क : सुमित नागल ने जज्बा और जुझारूपन दिखाकर ग्रैंडस्लैम में अपने पदार्पण की स्वप्निल शुरुआत करते हुए दिग्गज रोजर फेडरर से पहला सेट जीता लेकिन आखिर में उन्हें यूएस ओपन के पहले दौर के इस मैच में हारकर बाहर होना पड़ा। भारत में बहुचर्चित इस मैच में झज्जर के 22 वर्षीय नागल ने सोमवार की रात को अपनी प्रतिभा की झलक दिखाने के बाद आर्थर ऐस स्टेडियम में खेला गया यह मुकाबला 4-6, 6-1, 6-2, 6-4 से गंवाया। नागल पिछले 20 वर्षों में ग्रैंडस्लैम के पुरूष एकल मुख्य ड्रा में एक सेट जीतने वाले केवल चौथे भारतीय हैं। इसकी विशेषता यह रही कि यह सेट उन्होंने फेडरर के खिलाफ जीता जिनके नाम पर 20 ग्रैंडस्लैम खिताब दर्ज हैं। पिछले दो दशक में नागल से पहले ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में केवल सोमदेव देवबर्मन, युकी भांबरी और साकेत मयनेनी ही एक सेट जीतने में कामयाब रहे थे। क्वालीफाईंग के जरिये यूएस ओपन के मुख्य ड्रा में जगह बनाने वाले नागल को न सिर्फ 58,000 डालर की धनराशि मिलेगी बल्कि उन्हें इस मैच से जो अनुभव मिला वह आगे भी उनके काम आएगा। फेडरर ने कहा, ‘‘यह मेरे लिये मुश्किल सेट था। उसने बहुत अच्छा खेल दिखाया और उसे श्रेय जाता है। मैं कई गेंद को खेलने से चूक गया और मैं गलतियों में कमी करने पर ध्यान दे रहा था। उम्मीद है कि आगे मैं बेहतर प्रदर्शन करूंगा।’’ फेडरर से पूछा गया कि क्या एकबारगी उन्हें लगा कि वह नागल नहीं बल्कि नडाल के खिलाफ खेल रहे हैं क्योंकि दोनों के नाम के हिज्जों में केवल ‘डी’ और ‘जी’ का अंतर है। इस पर स्विस दिग्गज ने कहा, ‘‘नहीं। यह आप लोगों और सोशल मीडिया के लिये है। मैं जंग खा गया था।’’ मैच में फेडरर की शुरुआत अच्छी नहीं रही लेकिन नागल के लिये तो यह शानदार आगाज था। इस भारतीय ने पहला सेट जीतकर दर्शकों को हैरान कर दिया। उन्होंने तीसरे गेम में फेडरर के डबल फाल्ट का फायदा उठाकर ब्रेक प्वाइंट लिया।
फेडरर जब एटीपी रैंकिंग में 190वें नंबर के खिलाड़ी को समझने की कोशिश कर रहे थे तब नागल ने अपने रिटर्न और फोरहैंड से सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। अभी फेडरर और दर्शक कुछ समझ पाते कि नागल ने दूसरी बार उनकी सर्विस तोड़ दी। इसके बाद उन्होंने 0-30 से पिछड़ने के बाद अपनी सर्विस बचायी। नागल ने अपने करारे शॉट से फेडरर को नेट पर आने का मौका नहीं दिया। इस बीच फेडरर अपनी गलतियों पर काबू पाने के लिये संघर्ष कर रहे थे। फेडरर ने पहले सेट में 19 सहज गलतियां की जबकि नागल ने इस बीच केवल नौ ऐसी गलतियां की। इसके बाद उम्मीदें बढ़ गयी लेकिन फेडरर ने खुद को संभाला और फिर नागल को अपना असली खेल दिखाया। उन्होंने पहले से बेहतर सर्विस करनी शुरू की और नेट पर आकर अंक बनाने शुरू कर दिये। दूसरे सेट में जल्द ही वह 5-0 से आगे हो गये और सातवें गेम में उन्होंने यह सेट जीतकर स्कोर 1-1 से बराबर कर दिया। इस बीच नागल ने छह सेट प्वाइंट बचाये और दो बार उनके पास ब्रेक प्वाइंट का मौका भी आया। नागल अब भी चुनौती दे रहे थे लेकिन फेडरर अपने रंग में लौट आये थे। तीसरे और चौथे सेट में भी कहानी वैसे ही आगे बढ़ी। नागल ने कुछ अंक जुटाये लेकिन मुकाबला अब एकतरफा दिखने लगा था। बीस बार के ग्रैंडस्लैम चैंपियन ने मैच के लिये सर्विस की तो नागल ने कुछ अच्छे रिटर्न से 0-40 का स्कोर कर दिया। फेडरर ने पांच ब्रेकप्वाइंट बचाकर आखिर में मैच अपने नाम किया। यह मैच दो घंटे 25 मिनट तक चला। नागल हालांकि दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे। वह कुछ आटोग्राफ देकर और तालियों के बीच आर्थर ऐस स्टेडियम से बाहर गये।

सुमित नागल: पिता के संघर्ष और जी-तोड़ मेहनत की आंच में पका टेनिस खिलाड़ी

साल का आखिरी टेनिस ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन सोमवार से शुरू हो चुका है। टेनिस के इस प्रतिष्ठित इवेंट से अपना ग्रैंडस्लैम डेब्यू करने वाले सुमित नागल ने अपने पहले ही मैच में दुनिया के महानतम खिलाड़ी रोजर फेडरर को पहले सेट में हराकर सभी को चौंका दिया। पहला सेट गंवाने के बाद फेडरर जरूर मैच (4-6, 6-1, 6-2, 6-4) जीतने में कामयाब रहे, लेकिन दिल तो नागल जीत चुके थे। एकाएक पूरी दुनिया में चर्चित हो चुके नागल की कहानी बेहद दिलचस्प है।
बचपन में पिता का हाथ पकड़कर पहुँचे कोर्ट
बचपन में जिस रोजर फेडरर के स्टाइल को कॉपी करते थे, उन्हीं को पहले सेट में हराना वाकई किसी सुखद अनुभूति से कम नहीं। 22 वर्षीय सुमित हरियाणा के झज्जर जिले के छोटे से गांव जैतपुर से हैं। सेना की शिक्षा कोर से हवलदार के रूप में सेवानिवृत्त पिता सुरेश नागल को छोड़कर परिवार में किसी को भी खेलों में जरा सी भी दिलचस्पी नहीं। बस फिर क्या था फौजी पिता ने बेटे को टेनिस खिलाड़ी बनाने की ठानी और परिवार समेत दिल्ली के नांगलोई में आकर रहने लगे। 16 अगस्त 1997 को जन्में सुमित की उम्र उस वक्त आठ वर्ष रही होगी।
महेश भूपति ने दिया आकार
अपोलो टायर टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में सुमित चुन लिए गए। दो साल तक उन्होंने स्पॉन्सर किया। इसके बाद सुमित का वक्त तब पलटा जब उनकी जिंदगी में दिग्गज टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति की एंट्री हुई। भूपित की एकेडमी में उन्होंने ट्रेनिंग ली। सुमित, महेश भूपति को अपना मेंटोर मानते हैं। सुमित कहते हैं- ‘भूपति मेरे मेंटोर हैं और हमेशा रहेंगे। मैं करीब 10 साल का था, तब उनकी एकेडमी में पहली बार गया था। उन्होंने मेरे खेल को निखारा। उन्होंने ही मुझे स्पॉन्सर भी किया था।’
1998 के बाद दोहराया इतिहास
सुमित नागल 2015 में जूनियर ग्रैंडस्लैम खिताब जीतने वाली छठे भारतीय बने थे, उन्होंने वियतना के नाम हाओंग लि के साथ मिलकर विम्बलडन में लड़कों के वर्ग का युगल खिताब जीता था। जब अंतिम क्वॉलिफाइंग दौर में ब्राजील के जोआओ मेनेजेस के खिलाफ एक सेट गंवाने के बाद वापसी करते हुए दो घंटे 27 मिनट में 5-7 6-4 6-3 से जीत हासिल की तब वह प्रजनेश के बाद यूएस ओपन मुख्य ड्रॉ 2019 में खेलने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी बन गए, 1998 के बाद पहली बार ग्रैंडस्लैम में भारत के दो खिलाड़ियों ने भाग लिया, इससे पहले महेश भूपति और लिएंडर पेस विम्बलडन में खेले थे।

सर ब्रैडमैनः वो पारी जिसके रन लिखते-लिखते स्कोरर थक गया पर डॉन नहीं

25 अगस्त 2019 अगस्त को हेडिंग्ले का लीड्स मैदान एक शानदार मैच का गवाह बना। पहली पारी में मात्र 67 रन पर ऑलआउट होने वाली इंग्लैंड की टीम ने दूसरी पारी में 359 रन के मुश्किल लग रहे स्कोर को हासिल कर इतिहास के पन्नों में इस मैच को दर्ज करा दिया और इसके सूत्रधार रहे इंग्लिश टीम के ऑलराउंडर बेन स्टोक्स। स्टोक्स ने अद्भुत शतकीय पारी खेलकर हारे हुए मैच को इंग्लैंड की झोली में डाल दिया।
लीड्स के मैदान के लिए ये सब देखना कोई नया नहीं था, उसने तो एक ऐसी पारी देखी है, जो आज भी एक रिकॉर्ड है और लोग जब उस पारी के बारे में सुनते हैं, तो उनके मुंह खुले ही रह जाते हैं। ये पारी आज से करीब 89 साल पहले इसी लीड्स के मैदान पर खेली गई थी, जिस मैदान पर स्टोक्स ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को नाको चने चबवा दिए। विश्व क्रिकेट में एक बल्लेबाज हुआ, दाएं हाथ का। कहा जाता है कि जब वह पिच पर बल्लेबाजी कर रहा होता था, तो गेंद सीमा रेखा के बाहर इस तरह पहुंचती, मानो न्यूटन का ग्रेविटेशनल लॉ गेंद को खींच रहा हो।
तेज गेंदबाजों के खिलाफ उसकी कलाई ऐसे घूमती मानों कलाई पर मक्खन लगा कर उतरा हो और गेंद खूद-ब-खूद बाउंड्री का रास्ता ढूंढ लेती। उस खिलाड़ी ने जितना भी क्रिकेट खेला आने वाली पीढ़ी के क्रिकेटरों के लिए बेंचमार्क सेट कर गया। वह खिलाड़ी जिसका नाम क्रिकेट के शब्दकोश का हिस्सा बन गया है और उस खिलाड़ी का नाम है सर डॉन ब्रैडमैन। 27 अगस्त 1908 को उनका जन्म ऑस्ट्रेलिया के कूटामुंडरा में हुआ था। उनके जन्मदिन पर उनकी एक पारी की कहानी, जो आज भी एक रिकॉर्ड है, इस फटाफट क्रिकेट को दौर में भी कोई भी बल्लेबाज उस रिकॉर्ड तक नहीं पहुंच पाया है। तो जरा अपने दिमाग को ब्रैडमैन की ब्लैक एंड व्हाईट तस्वीरों के इर्द गिर्द घुमाइए और इस ऐतिहासिक पारी की कहानी सुनिए…
11 जुलाई, 1930 एशेज सीरीज का तीसरा मैच, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान विलियम मॉल्डन वुडफुल ने टॉस जीता और सपाट दिख रही पिच पर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया, लेकिन उनका फैसला मैच की 11वी गेंद पर गलत साबित होने की ओर बढ़ा गया, जब सलामी बल्लेबाज ऑर्ची जैक्शन पवेलियन लौट गए।
इसके बाद एक 21 साल का एक युवा बल्लेबाज लीड्स की पहली सुबह 11 गेंदों के बाद बल्लेबाजी करने के लिए ड्रेसिंग रूम से निकला और दिन का खेल खत्म होने के बाद वह नाबाद 309 रन पीटकर लौटा। ये बल्लेबाज कोई और नहीं बल्कि सर डॉन ब्रैडमैन थे। उनके तिहरे शतक के बाद पूरा क्रिकेट जगत सकते में था, एक दिन में तीन सौ रन…कहा जाता है कि लीड्स में तीसरे टेस्ट से पहले ब्रैडमैन ने कोई भी प्रैक्टिस नहीं की थी। लंदन में दूसरा टेस्ट जीतने के बाद वह साथी खिलाड़ियों के साथ उस साल के विंबलडन के फाइनल मैच का लुत्फ उठाया था और उसके बाद भी वह कुछ दिन क्रिकेट से दूर ही रहे।
लंदन टेस्ट में ब्रैडमैन ने 254 रन की पारी खेली थी, लेकिन लीड्स टेस्ट से पहले उन्होंने बैट को हाथ तक नहीं लगाया। शायद क्रिकेट से ब्रेक ने उन्हें बेहतर तैयारी का मौका दिया और जब वह लीड्स के मैदान पर उतरे, तो पूरी दुनिया उनकी खतरनाक बैटिंग को देखकर हैरान रह गई। ब्रैडमैन की उस प्रलय वाली पारी के तीन दशक बाद साल 1965 में इंग्लैंड के तेज गेंदबाज रहे हेरोल्ड लारवुड ने अपनी आत्मकथा में दावा किया कि उन्होंने ब्रैडमैन को बिना खाता खोले ही विकेट की पीछे कैच करा दिया था। विकेट के पीछे और आसपास खड़े सभी खिलाड़ियों ने अपील की थी पर अंपायर ने इसपर ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने लिखा कि, मेरे मन में कोई संदेह नहीं था कि वह स्पष्ट रूप से आउट थे। विकेट के आस-पास सभी ने अपील की, यहां तक कि जैक होब्स ने भी, जो सबसे निष्पक्ष व्यक्ति थे, जिनसे मैं क्रिकेट के मैदान पर मिला था। बाद में मैच की रिकॉर्डिंग्स को देखा गया तो मालूम हुआ की लारवूड से गलती हुई थी। उन्होंने ब्रैडमैन को खाता खोलने से पहले गेंदबाजी नहीं की थी और पूरी पारी के दौरान जैक हॉब्स ने या तो कवर में या फिर एक्सट्रा कवर बाउंड्री पर फील्डिंग की थी, विकेट के पीछे कभी नहीं। यह हुआ या नहीं, इसका ब्रैडमैन पर बहुत कम प्रभाव पड़ा। लंच तक वह नाबाद 105 रन बनाकर अपने प्रसिद्ध साथी विक्टर ट्रम्पर और चार्ली मैकार्टनी के साथ मिलकर टेस्ट मैच के पहले दिन ही लंच से पहले शतक बनाने वाले बल्लेबाज बन गए।
फिल्डर के गुस्से पर भारी ब्रैडमैन की मुस्कान
डॉन के बल्ले से पहला गलत स्ट्रोक 141 पर निकला, जब उन्होंने गेंद को मिड-ऑन की ओर खेला, लेकिन गेंद सुरक्षित रूप से जमीन पर गिर गई। चाय तक उन्होंने दोहरा शतक जड़ दिया था। छह बजे से ठीक पहले 273 पर इंग्लैंड के खिलाड़ियों को खुद को आउट करने का एक वास्तविक मौका दिया। विकेटकीपर जॉर्ज डकवर्थ ने जॉर्ज गीरी की गेंद पर एक मुश्किल कैच पकड़ा, लेकिन गेंद जमीन को छू गई, डॉन मुस्कुराए, और डकवर्थ गुस्से में उन्हें देखते रह गए। दिन के अंत तक, ब्रैडमैन 309 रन पर नाबाद थे और एंग्लो-ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट में पहला तिहरा शतक जमाने के बाद, रेगी फोस्टर के 287 के रिकॉर्ड को तोड़ा। स्क्वायर कट, लेग में हूक और हिट ऑन ड्राइव जैसे शानदार शॉट खेला था ब्रैडमैन ने अपनी पारी में।
द टाइम्स के अनुसार, उन स्ट्रोक्स का जिक्र करने के लिए, जिनसे उन्होंने अपने अधिकांश रन बनाए, इसके लिए आपको पूरी एशेज की श्रृंखला से गुजरना पड़ेगा। उन्होंने अपनी पहले दिन की पारी में 42 चौके लगाए थे। किसी भी समय उन्होंने जोखिम लेने के लिए कुछ भी नहीं किया, और वह दिन में सिर्फ तीन बार गेंद को हवा में खेले थे। यह वास्तव में उस दौर से लेकर अबतक की शानदार पारियों मे एक है। कहा जाता है कि जब दिन में तीन सौ रन बनाकर एकदम ताजे मिजाज के साथ ब्रैडमैन मैदान से लौटे, लेकिन मैदान में खड़े अंपायर, मौजूद दर्शक सबके सब बेहद ही थके थे। अगर किसी व्यक्ति की सबसे ज्यादा हालत खराब थी, वह था स्कोरर, जो स्कोर बोर्ड को चला रहा था। अगले दिन ब्रैडमैन 334 के स्कोर पर आउट हो गए। डॉन ब्रैडमैन ने अपने करियर में 52 टेस्ट खेले और उनकी 80 पारियों में 29 शतक और 13 अर्धशतक की मदद से कुल 6996 रन बनाए। ये आँकड़े आज भी उनके सर्वश्रेष्ठ होने की कहानी बयां करते हैं, लेकिन यह महान खिलाड़ी अपने आखिरी मैच में शून्य पर पवेलियन लौट गया। तारीख थी 14 अगस्त 1948 यानि जब हिन्दुस्तान अपनी आजादी की पहली सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था, तब क्रिकेट के एक कोहिनूर ने उसे अलविदा कह दिया। जिसके नाम से क्रिकेट को सम्मान मिला, जिसने सैकड़ों खिलाड़ियों को क्रिकेट के लिए प्रेरित किया।

(साभार – अमर उजाला)

युद्धस्थल भूचरमोरी पर 2300 महिलाओं ने तलवार रास गरबा कर बनाया विश्व रिकॉर्ड

जामनगर :  गुजरात में भूचरमोरी स्थित युद्ध मैदान में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 2300 राजपूत बेटियों और महिलाओं ने तलवार रास गरबा कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। 428 साल पहले शहीद हुए योद्धाओं को श्रद्धांजलि देने के लिए 16 जिलों की बेटियां और महिलाएं एकत्रित हुईं। उनकी उम्र 13 से 52 साल के बीच थी। यह कार्यक्रम अखिल गुजरात राजपूत युवा संघ ने किया था। संघ के प्रमुख अधिकारी महिपत सिंह जडेजा ने कहा- “वैसे तो हर साल राजपूतों के शौर्य और बलिदान की याद में कई कार्यक्रम होते हैं, लेकिन इसने कीर्तिमान बना दिया। एक बड़े मैदान में महिलाएं एक साथ नृत्य कर रही थीं।
योद्धाओं की याद में तलवार रास गरबा
दस्तावेजों के अनुसार, यहां करीब 428 साल पहले मुगलों से जंग हुई थी। बादशाह मुजफ्फर को जामनगर के राजपूत राजा ने अपनी शरण में लिया था। बादशाह मुजफ्फर मुगलों से बचते फिर रहे थे।

आरती में ताली बजाने से बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

आमतौर पर भगवान की स्तुति करने वक्त ताली बजाने का प्रचलन है। श्रीमद्भागवत के अनुसार कीर्तन में ताली की प्रथा भक्त प्रह्लाद ने शुरू की थी क्योंकि, जब वे भगवान का भजन करते थे तो जोर-जोर से नाम संकीर्तन भी करते थे तथा साथ-साथ ताली भी बजाते थे। इसके बाद अन्य लोग भी उनकी तरह करने लगे। सामान्यत: हम किसी भी मंदिर में आरती के समय सभी को ताली बजाते देखते हैं और हम भी ताली बजाना शुरू कर देते हैं। ऐसा करने से हमारे शरीर को कई लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे शरीर के 29 एक्यूप्रेशर पॉइंटस हमारे हाथों में होते है। प्रेशर पॉइंट को दबाने से संबंधित अंग तक रक्त और ऑक्सीजन का संचार अच्छे से होने लगता है। एक्यूप्रेशर के अनुसार इन सभी दबाव बिंदु को सही तरीके से दबाने का सबसे सहज तरीका है ताली। हथेली पर दबाव तभी अच्छा बनता है जब ताली बजाते हुए हाथ लाल हो जाए, शरीर से पसीना आने लगे। इससे आंतरिक अंगों में ऊर्जा भर जाती है और सभी अंग सही ढंग से कार्य करने लग जाते है।
तीन तरह से बजायी जाती है ताली
1. ताली में बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की चारों अंगुलियों को एक साथ तेज दबाव के साथ इस प्रकार मारा जाता है कि दबाव पूरा हो और आवाज अच्छी आए। इस प्रकार की ताली से बाएं हथेली के फेफड़े, लीवर, पित्ताशय, गुर्दे, छोटी आंत व बड़ी आंत तथा दाएं हाथ की अंगुली के साइनस के दबाव बिंदु दबते हैं और इससे इन अंगों तक खून का प्रवाह तीव्र होने लगता है। इस प्रकार की ताली कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में राहत मिलती है। इस प्रकार की ताली तब तक बजानी चाहिए जब तक हथेली लाल न हो जाए।

2. थप्पी ताली- ताली में दोनों हाथों के अंगूठों से लेकर कनिष्ठिका तक सभी अंगुलियां अपने समानांतर दूसरे हाथ की अंगुलियों पर पड़ती हो एवं हथेली-हथेली पर पड़ती हो। इस प्रकार की ताली कान, आंख, कंधे, मस्तिष्क, मेरूदंड के सभी बिंदुओं पर दबाव डालती है। इस ताली का सर्वाधिक फायदा सोल्जर, डिप्रेशन, अनिद्रा, स्लिप डिस्क, स्पोगोलाइसिस, आंखों की कमजोरी जैसी समस्याओं में होता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सकों की राय में इस ताली को भी तब तक बजाया जाना चाहिए जब तक कि हथेली लाल न हो जाए। इस प्रकार की ताली की आवाज बहुत तेज व दूर तक जाती है।

3. ग्रिप ताली – इस प्रकार की ताली में हथेली को हथेली पर क्रॉस की आकृति में मारा जाता है। इससे किसी विशेष रोग में लाभ तो नहीं मिलता है, लेकिन यह ताली उत्तेजना बढ़ाने का कार्य करती है। इससे अन्य अंगों के दबाव बिंदु सक्रिय होने लगते हैं। यह ताली सम्पूर्ण शरीर को सक्रिय करने में मदद करती है। यदि इस तरह ज्यादा समय तक ताली बजाई जाए तो शरीर में पसीना आने लगता है जिससे कि शरीर के विषैले तत्व पसीने से बाहर आ जाते हैं। इस तरह त्वचा स्वस्थ रहती है। इस तरह ताली बजाने से न सिर्फ रोगों से रक्षा होती है, बल्कि कई रोगों का इलाज भी हो जाता है।

बेहतर होता है रक्त संचार
1. ताली बजाने से खून में बुरे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है, जिससे हार्ट अटैक जैसी समस्या की आशंका कम हो जाती है। ताली बजाने से शरीर में रक्त का संचार अच्छे से होता है जिससे फेफड़ों में अस्थमा संबंधित रोग का खतरा भी टलता है।

2. तेज ताली बजाने से आंख, कान, दिमाग, रीढ़ की हड्डी, कंधे आदि सभी बिंदुओं पर प्रभाव पड़ता है जिससे तनाव, अनिद्रा, आंखों की कमजोरी, पुराना सिर दर्द, जुकाम, बालों का झड़ना जैसी समस्या से राहत मिलती है।

3. ताली से मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिससे पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार अच्छे से होता है। इतना ही नहीं नियमित ताली की आदत से खून में सफेद कणों को ताकत मिलती है जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

’83’ में बोमन ईरानी की एंट्री, बनेंगे कमेंटेटर फारुख इंजीनियर

मुम्बई : भारतीय क्रिकेट टीम की पहली विश्व कप जीत पर बन रही फिल्म ’83’ की टीम में बोमन ईरानी की एंट्री हो गई है। रणवीर सिंह ने कबीर खान और बोमन के साथ अपनी एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर की है। जिसमें तीनों लॉर्ड्स ग्राउंड में नजर आ रहे हैं। बोमन फिल्म में पूर्व क्रिकेटर फारुख इंजीनियर का रोल निभाएंगे। विश्व कप के दौरान मिले थे बोमन : बोमन ने फारुख के किरदार को लेकर मुंबई मिरर को दिए साक्षात्कार में बताया कि रोल की तैयारी के लिए वे इंग्लैंड में हुए क्रिकेट विश्वकप 2019 के दौरान मैनचेस्टर में फारुख से मिले थे और उनके साथ उनके घर में कुछ दिन बिताए थे। इतना ही नहीं दोनों ने भारत-पाकिस्तान का मैच भी साथ ही देखा था।
फारुख इंजीनियर ने भारत के लिए 46 टेस्ट खेले। फारुख ने पहला मैच 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ कानपुर में खेला था और आखिरी टेस्ट वेस्टइंडीज के खिलाफ 1975 में मुंबई में खेला था। उन्होंने भारत के लिए 5 वनडे भी खेले हैं। 81 साल के फारुख ने टेस्ट में 2611 और वनडे में 114 रन बनाए।
फारुख के बारे में ये किस्सा मशहूर है कि 1983 वर्ल्ड कप के फाइनल मैच के दौरान बीबीसी के कमेंट्री बॉक्स में इंग्लैंड के ब्रायन जॉन्सटन ने उन पर तंज कसा था। ब्रायन ने कहा था- अगर भारत विश्वकप जीतता है तो क्या पीएम इंदिरा गांधी भारत में एक दिन का सार्वजनिक अवकाश घोषित करेंगी? इंजीनियर ने भी मजाक में जवाब दिया था कि- इसमें कोई शक नहीं और कुछ ही मिनटों में इंदिरा गाँधी के कार्यालय से एक सन्देश कमेंटेटर टीम को भेजा गया। इंदिरा गांधी की ने ब्रायन और फारुख की बातचीत सुनी थी और वास्तव में टीम इंडिया की जीत के बाद उन्होंने छुट्टी की घोषणा कर दी थी।

देश की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य का निधन

मुम्बई : देश और उत्तराखंड की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य का सोमवार देर रात मुंबई में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार थीं और यहां के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज जारी था। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि कंचन का मुंबई के अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद सोमवार रात को निधन हो गया।
2004 में बनीं थीं पुलिस महानिदेशक
1973 बैच की महिला आईपीएस ऑफिसर कंचन ने साल 2004 में उत्तराखंड की पुलिस महानिदेशक बन कर इतिहास रच दिया था। वे देश की पहली महिला थीं जो इस पद तक पहुंची थीं। 31 अक्टूबर 2007 को वे पुलिस महानिदेशक के पद से ही रिटायर हुई थीं। बताया जा रहा है कि तभी से वे मुंबई में रह रही थीं।
लोकसभा चुनाव भी लड़ा था
कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने राजनीति की तरफ भी रुख किया था और सेवानिवृत्त होने के बाद 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था। आम आदमी पार्टी के टिकट से उन्होंने उत्तराखंड के हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था लेकिन वे इस दौरान हार गई थीं।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने टीबी रोग से पीड़ित एक बच्ची को लिया गोद

लखनऊ : राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने रविवार को राजभवन में आयोजित एक कार्यक्रम में टीबी रोग से ग्रसित एक बच्ची मोहसिना (काल्पनिक नाम) को गोद लिया तथा इसी के साथ ही टीबी रोग से ग्रसित 21 अन्य बच्चों को राजभवन के सभी अधिकारियों ने सहयोग की दृष्टि से गोद लिया।
गोद लेने वाले अधिकारियों का यह दायित्व होगा कि वे बच्चों को सरकारी दवा सुचारू रूप से मिलती रहे तथा बच्चा नियमित रूप से दवा का प्रयोग करें और पौष्टिक आहार का सेवन करे। इसका ध्यान रखेंगे। राज्यपाल ने यह भी सलाह दी कि बच्चों की शिक्षा में कोई व्यवधान हो तो उसका भी निस्तारण किया जाये। उन्होंने कहा कि गोद लेना कोई उपकार नहीं है। जागृत समाज का फर्ज है कि समाज स्वस्थ हो।

‘आर्मी फॉर अवाम’ के सहारे सेना जीतेगी कश्मीरियों का दिल

चंडीगढ़ : पिछले दिनों अनुच्छेद 370 में संशोधन के बाद से अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का जवाब सेना ‘आर्मी फॉर अवाम’ अभियान के जरिए देगी। इस अभियान से सेना अपनी एक अलग छाप लोगों के बीच छोड़ने में जुट गई है। सेना विभिन्न सामाजिक कार्यों के बूते आवाम को यह बताने में जुटी है कि जवान सिर्फ सरहदों की रक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों के कल्याण और विपरीत परिस्थितियों में उनकी हर संभव मदद के लिए हमेशा तत्पर हैं। सरहदों की रक्षा के साथ-साथ सेना के जवान कैसे देशभर में लोगों की सेवा में जुटे हैं, इसका प्रचार अब सोशल मीडिया पर और ज्यादा किया जाएगा। ताकि सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार के जरिए सेना की छवि खराब करने वाले तत्वों को मुहंतोड़ जवाब दिया जा सके। देश के विभिन्न राज्यों में बाढ़ के हालात है। ऐसे हालातों में सेना और वायुसेना के जवान बाढ़ में फंसे लोगों के लिए देवदूत बनकर पहुँचे और उन्हे वहाँ से निकालकर उनकी जान बचाई। इस दौरान सेना ने कई दुर्गम इलाकों में पहुंचकर लोगों को मदद पहुँचाई।सेना की एक विशेष विंग द्वारा तेजी से सैन्य जवानों के इस तरह के विभिन्न रेस्कयू ऑपरेशनों को सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है, ताकि जवानों के जनसेवा के प्रति जज्बे का प्रचार किया जा सके। इस दौरान घाटी में सेना का खास फोकस रहेगा। अनुच्छेद 370 में संशोधन के बाद से घाटी में सेना को लेकर खूब दुष्प्रचार किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर सेना से जुड़ी कई भ्रामक प्रकार की जानकारियों को तेजी से वायरल किया जा रहा है, ताकि इंडियन आर्मी की छवि को खराब किया जा सके। लेकिन सेना अब इसका जवाब अपने किए गए कामों के प्रचार से देगी।
देश के विभिन्न राज्यों में सेना द्वारा चलाए गए रेस्कयू ऑपरेशन की फोटो व विवरण वायरल किया जा रहा है। बारामूला में भारतीय सेना द्वारा कश्मीरी युवाओं के लिए आयोजित की गई ‘नारवाव क्रिकेट लीग’ का प्रचार। कुपवाड़ा के एक गांव में सेना ने एक युवाओं के लिए एक मिलन कार्यक्रम रखा, जिसमें उन्हें बताया गया कि कैसे उन्हे एंटी नेशनल एक्टिविटी से बचना है।
बारामूला के डांगीवाचा में बुजुर्ग-यूथ सम्मेलन करवाया गया, सेना ने इस जरिए लोगों को साकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
गाँव चंडीगाम की कश्मीरी बेटियों के लिए सेना ने मार्शल आर्ट्स शिविर आयोजित किया। कुपवाड़ा में सेना ने कश्मीरी युवाओं के लिए ‘लोलाब किंगडम फुटबाल चैंपियनशिप’ व ‘हबीबुल्लाह मैमोरियल फुटबाल कप’ का आयोजन किया।
घाटी के गाँव मारकूल में जमाती समर्थकों की एक बैठक आयोजित की, जिसमें उन्हे अपने इलाकों में हालात सामन्य रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। अखनूर के चकभगवान क्षेत्र में सेना की ओर से जरूरतमंद लोगों को सहायक सामग्री बांटी गई। इस तरह काफी ऐसे सामाजिक कार्य हैं, जिसका प्रचार सेना द्वारा खूब किया जा रहा है।

पिता चलाते हैं होटल, माँ ने शुरू कराई तीरंदाजी और तीन साल में बन गयी विश्व चैंपियन

नयी दिल्ली : कोमालिका के लिए अंडर-18 विश्व चैंपियन बनना किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। कुछ माह पहले ही 17 साल की इस तीरंदाज ने दीपिका कुमारी जैसी तीरंदाज के साथ ओलंपिक क्वालिफाइंग सीनियर विश्व चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में जगह बना ली, लेकिन इतने बड़े मंच पर यह तीरंदाज दबाव में बिखर गयी।
नतीजन पुरुष ओलंपिक क्वालिफाई कर गए और महिला टीम रह गई, लेकिन थोड़े ही समय में कोमालिका ने पहली बार सब जूनियर विश्व चैंपियनशिप के लिए टीम में जगह बनाई और यहां वह दीपिका के बाद विश्व चैंपियन बनने वाली देश की दूसरी तीरंदाज बन गयीं। कोमालिका ने मेड्रिड से खुलासा किया उन्हें फिट रहने के लिए माँ ने 2012 में तीरंदाजी शुरू कराई। तब उन्हें जमेशदपुर में पास की ही अकादमी में लकड़ी का धनुष पकड़ा दिया गया। कुछ समय बाद उन्हें इस खेल में मजा आने लगा और उन्होंने नेशनल खेलने की ठानी। 2016 तक वह इंडियन राउंड (लकड़ी के धनुष से) में ही खेलती रहीं। इसी दौरान दीपिका के कोच धर्मेंद्र तिवारी की उन पर नजर पड़ी। धर्मेंद्र बताते हैं कि उनके कहने पर ही 2016 में कोमालिका को टाटा अकादमी के लिए ट्रायल दिलाया गया। यहां वह चयनित हो गयीं। तब से वह उन्हीं के पास हैं। अकादमी ने उन्हें महंगा रीकर्व धनुष दे रखा है। इसी से उन्होंने यह पदक जीता है। धर्मेंद्र मानते हैं कि कोमालिका के लिए यह पदक बहुत बड़ा है। अब उसके दिमाग से सीनियर विश्व चैंपियनशिप की विफलता को बोझ हट गया होगा। 12वीं की छात्रा कोमालिका पढ़ाई में भी होशियार हैं। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा 85 प्रतिशत अंकों से पास की हैं। उनके पिता घनश्याम बारू एक छोटा से होटल चलाते हैं जबकि मां आंगनवाड़ी में सेविका हैं। घनश्याम और धर्मेंद्र के मुताबिक कोमालिका हमेशा मुस्कराती है। जिस काम को भी हाथ लगाती है उसे पीछे नहीं छोड़ती है। स्कूल में वह एथलेटिक्स में भी अच्छी थी। अध्यापक ने उसे एथलेटिक्स में आने को कहा, लेकिन मां ने उसे तीरंदाजी में ही बने रहने को कहा।

10 हजार शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं अयूब अहमद

मैसूर : लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं अय्यूब अहमद। अब तक 10 हजार शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। वह बताते हैं, “जब मैंने पहली बार एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार कराया, तो अचानक मेरे आसपास सबकुछ बदल गया। लोग मुझसे कतराने लगे। उन्होंने मुझसे बात करना छोड़ दिया। मैं अक्सर रात में अकेले होने पर रोता था। पर इस काम को लेकर मेरा मन और मजबूत हो गया था। यह काम करते हुए एक वक्त ऐसा आया, जब लोग मुझे देखते ही मुँह मोड़ लेते थे। लेकिन मैंने इसे जारी रखा। मैं कर्नाटक के मैसूर का रहने वाला हूं। मैंने सिर्फ दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की है और छोटे-मोटे काम करके अपना और परिवार का पेट पालता हूं। मैंने अपनी कमाई को तीन भागों में बांट दिया है, अपने परिवार के लिए, मृत शरीर के अंतिम संस्कार के लिए और फुटपाथ पर रहने वाले लोगों की मदद के लिए। यह तब शुरू हुआ, जब मैं नई कार खरीदने के लिए बस से गुंदलुपेट जा रहा था। रास्ते में मैंने देखा कि एक जगह भीड़ जमा है। बस की खिड़की से देखा, तो मालूम हुआ कि एक शव वहां पड़ा हुआ है। कुछ समय बाद जब मैं अपनी कार से वापस लौटा, तो देखा कि शव अब भी वहीं पड़ा हुआ है। किसी ने भी, पुलिस में जानकारी देने की जहमत नहीं उठाई। मैंने उस शव को अपनी बांहों में उठाया और उसे कार में डालकर शवदाह गृह ले जाकर उसका अंतिम संस्कार कराया। तब तक मुझे इसके परिणाम की भनक नहीं थी। घर वापस आने के बाद मैंने जब यह घटना बताई, तो हर कोई गुस्से में था। मुझे बहुत बुरा लगा, मुझे इस कारण मैसूर छोड़ना पड़ा। मैं कुछ समय के लिए बंगलूरू चला आया। और फिर एक दिन जब मैं सिलिकॉन सिटी में लालबाग घूमने गया तो रास्ते में एक शव दिखा। मैं पिछला अनुभव भूल नहीं पाया था, इसलिए दुविधा में फंस गया। आखिरकार एक रिक्शे पर ले जाकर पुलिस की मौजूदगी में उसका भी अंतिम संस्कार कराया। पर मैंने सोंच लिया था कि किसी भी तरह से ऐसे लोगों की मदद करूंगा। मैं दोबारा मैसूर लौट आया। यहां आकर ने माता-पिता से कहा कि मैं यह काम जारी रखना चाहता हूं। उन्होंने कहा, यदि तुम्हें कोई शव दिखाई पड़े, तो उसका चेहरा नहीं देखना चाहिए, कि तुम उसे जानते हो या नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति के परिजनों की खोज करनी चाहिए। मेरे माता-पिता चाहते थे कि मेरा नाम अच्छी चीजों के लिए जाना जाए। मेरी मां कहती थीं कि अच्छे कामों को दुनिया देखती और सराहना करती है। अफसोस कि जब मेरा वक्त आया, तब मेरी मां नहीं है। पर उन्हीं के प्रोत्साहन से यह यात्रा अनवरत जारी है। शादी के बाद जब पत्नी को मेरे इस काम के बारे में पता चला, तो उसने सवाल उठाने की जगह मेरा सहयोग किया। वह मुझे कभी नहीं रोकती। यहां तक कि अगर मुझे सुबह तीन बजे कॉल आती है, तो वह मुझे जैकेट पहनकर बाहर जाने के लिए कहती है। यह काम करते हुए मुझे तकरीबन बीस साल हो चुके हैं। पुलिस विभाग की सहायता से मैंने तकरीबन 10 हजार लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराया है। अब लोग इस काम के लिए आर्थिक मदद करते हैं। इस काम के साथ मैं बेघर लोगों के लिए भोजन और कपड़ों के साथ ही अनाथ बच्चों स्कूल भेजने की व्यवस्था भी करता हूं। मैं अपनी कार को ही, बतौर एम्बुलेंस उपयोग करता हूं। कभी-कभी लोगों को अपने काम को पहचानने और प्यार करने के लिए अपनी मृत्यु तक इंतजार करना पड़ता है। मैं अपने जीवन काल में लोगों का बेशुमार प्यार पाने को अपना सौभाग्य मानता हूँ।
(साभार- अमर उजाला)