Sunday, October 11, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 591

अनुदान को लेकर करेंगे पक्षपात तो कैसे मिलेगी सबको उच्च शिक्षा?

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

अनुदान का 50 प्रतिशत हिस्सा पाते हैं केन्द्रीय विश्वविद्यालय
पे स्केल 2016 से लागू करने की माँग कर रहे हैं शिक्षक
19 नवम्बर को बंगाल के सभी विश्वविद्यालयों में कर्म विरति यानी कार्य स्थगन रहा। प्रोफेसरों और सहायक प्रोफेसरों के तमाम शिक्षक संगठन एक साथ आये और बंगाल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की एकता दिखायी दी। दरअसल राज्य सरकार ने यूजीसी द्वारा निर्धारित नयी पे स्केल लागू करने घोषणा तो की है मगर यह 2020 से यानी अगले साल से लागू माना जायेगा। शिक्षकों का कहना है कि यह वर्ष 2016 से ही लागू किया जाना था। इस बकाया राशि का 50 प्रतिशत भाग केन्द्र सरकार और बाकी 50 प्रतिशत भाग राज्य सरकार देगी। बंगाल में वेबकूटा, कूटा, जूटा समेत सभी विश्वविद्यालयों के शिक्षक संगठन अपनी बकाया राशि पाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय शिक्षक समिति यानी कूटा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार शिक्षकों के अनुसार अगर यह पे स्केल 2016 से लागू किया जाता है तो प्रोफेसरों के 26,57,700 रुपये, एसोसिएट प्रोफेसरों के 23,37, 900 रुपये और असिस्टेंट प्रोफेसरों के 8,28,300 रुपये बकाया हैं। आन्दोलन नया भले न हो मगर यह फिर से जोर पकड़ रहा है। प्रदर्शनकारी शिक्षकों में शामिल शिक्षकों के अनुसार यह प्रदर्शन नया नहीं है। केन्द्र सरकार कभी 80 प्रतिशत राशि वहन किया करती थी मगर उसने धीरे – धीरे हिस्सेदारी घटा दी और अब यह 50 प्रतिशत तक रह गया है। इसके लिए 1986 में शिक्षकों ने आन्दोलन किया, तब 35 दिन की हड़ताल हुई थी। तत्कालीन सरकार झुकी, फिर 1996 में नये पे कमिशन की माँग पर 25 दिनों की हड़ताल की गयी और वह भी सफल रही। इसके बाद 2006 और अब 2019, शिक्षक अपने आर्थिक अधिकारों के लिए लड़ ही रहे हैं। राजकीय विश्वविद्यालयों में बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो बुनियादी संरचना की कमी एक समस्या हमेशा से रही है। यहाँ विद्यार्थी अधिक हैं, शिक्षक अधिक हैं मगर जो अनुदान राशि मिलती है, वह ऊँट के मुँह में जीरा की कहावट चरितार्थ करती है।
काफी नहीं है शिक्षा बजट और आवंटन ऊँट के मुँह में जीरा
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा लोकसभा में दी गयी जानकारी के मुताबिक 2017-18 के शिक्षा बजट व्यय के विश्लेषण के अनुसार, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर व्यय 4.43% है। कोठारी आयोग (1964-66) ने सिफारिश की है कि जीडीपी का 6% शिक्षा पर व्यय किया जाना चाहिए। 1992 म यथा-संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में निर्धारित किया गया है कि यथासंभव शीघ्रितशीघ्र शिक्षा पर निवेश को धीरे-धीरे राष्ट्रीय आय का 6% तक बढ़ाया जाए। अब जीडीपी के अनुपात में देखा जाए तो वर्ष 2013 -14 में 430878.81 करोड़ (3.84 प्रतिशत, 2014 -15) में 506849.13 करोड़ रुपये (4.07 प्रतिशत), 2015 -16 में 577792.51 करोड़ रुपये (4.20 प्रतिशत), 2016 -17 (आर ई) में 664264.52 करोड़ रुपये (4.32 प्रतिशत), 2017-18 (बीई) में ) 756945.00 करोड़ रुपये (4.43 प्रतिशत) है और यह वृद्धि के बावजूद काफी नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए निर्धारित बजट का जो आवंटन होता है, वह विषमता से भरा है। महज 46 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं और वह इस देश के शिक्षा बजट की 50 प्रतिशत से अधिक राशि पा रहे हैं और जो बचे हैं, उनके हाथ में कुछ नहीं आ रहा..जाहिर है कि संरचना की कमी तो होगी ही जबकि शिक्षकों और विद्यार्थियों के परिश्रम और उनकी प्रतिभा में कोई अन्तर नहीं हैं..फिर यह भेद-भाव क्यों..इसका जवाब किसी के पास नहीं मिल रहा। 993 विश्वविद्यालय, 39931 कॉलेज, 3.73 करोड़ विद्यार्थी हैं। महज 9.61 प्रतिशत विद्याार्थी स्नातकोत्तर कक्षाओं में हैं और 0.79 प्रतिशत विद्यार्थी ही एम.फिल या पीएचडी कर रहे हैं। कॉलेजों में ही 94.33 प्रतिशत विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। 81.89 प्रतिशत शोध छात्र विश्वविद्यालयों में ही हैं।


केन्द्रीय और राजकीय विश्वविद्यालयों के अनुदानों में इतना वैषम्य क्यों?
वर्ष 2016 -17 की यूजीसी की रिपोर्ट जब आप पढ़ते हैं तो आपको केन्द्रीय और राजकीय यानी स्टेट एडेड यूनिवर्सिटी के साथ होने वाला यह भेदभाव समझ में आ जाता है। वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल योजनाबद्ध 3996.96 करोड़ रुपये अनुदान का 50.32 प्रतिशत केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को गया जिनकी संख्या महज 46 है। 2.21 प्रतिशत डीम्ड विश्वविद्यालयों को और राजकीय यानी स्टेट ऐडेड विश्वविद्यालयों को महज 13.13 प्रतिशत, स्टेट ऐडेड विश्वविद्यालयों के कॉलेजों को 3.08 प्रतिशत और 1 प्रतिशत केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कॉलेजों को मिला। 6.78 प्रतिशत क्षेत्रीय केन्द्रों को मिला। इसके अतिरिक्त छात्र वृत्ति इत्यादि पर राशि खर्च हुई। अब अगर बात करें 2016-17 में योजना के बगैर यानी नॉन -प्लान ग्रांट की 6457.96 करोड़ रुपये की अनुदान राशि की तो इसका 63.22 प्रतिशत हिस्सा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को मिला, 18.31 प्रतिशत राशि दिल्ली के कॉलेजों और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महज 3.03 प्रतिशत राज्य विश्वविद्यालयों, 1.29 प्रतिशत इंटर यूनिवर्सिटी सेंन्टर, 4.52 प्रतिशत विश्वविद्यालय बनने की दिशा में अग्रसर डीम्ड संस्थानों को मिला। केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कॉलेजों को 1.62 प्रतिशत और राजकीय विश्वविद्यालय के कॉलेजों को 0.04 प्रतिशत राशि ही मिली।


सरकारी सहायता का दावा
46 केन्द्रीय विश्वविद्यालय. केन्द्रीय मुक्त विश्वविद्यालय 1, राज्य विश्वविद्यालय (स्टेट पब्लिक यूनिवर्सिटी) 371, राष्ट्रीय महत्व वाले संस्थान 127, हैं। स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी 14 हैं। लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रयायन परिषद (एनएएसी)  ने अब तक पूरे भारत म 359 विश्वविद्यालयों और 8073 कॉलेजों को  मान्यता दी है। उच्चतरशिक्षा विभाग केन्द्रीय क्षेत्र ब्याज अनुदान योजना का कायार्वयन कर रहा  है। इस योजना के तहत, पैतृक आय की सीमा पये 4.5 लाख प्रतिवर्ष है।
यह योजना वर्ष  2009 से परिचालन में है। यह  योजना  भारत  में  आर्थिक रूप से  कमजोर  सभी  श्रेणियों  के  छात्र  को  व्यावसायिक/तकनीकी पाठ्यक्रम के अययन के लिए लाभान्वित करती है।इस योजना के तहत , अब तक 27,32,169 छात्र  लाभान्वित हुए ह और इस योजना की शुआत ( 2009-10) के बाद से मंत्रालय वारा  लाभान्वित छात्र को 11876.25 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गयी।


बाकी सबके हिस्से का भोजन मिल रहा है केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को
यह जानना जरूरी है कि क्या दाखिला लेने वाले हर विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति नाजुक है और अगर नहीं तो उसे सब्सिडी या आर्थिक सहायता क्यों दी जाए। क्या इसे आर्थिक आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए? क्या राजकीय विश्वविद्यालयों के शिक्षक परिश्रम नहीं करते, अगर हाँ तो अनुदान राशि को लेकर इतना पक्षपात क्यों? सच तो यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को अन्य विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों की थाली का खाना लगातार परोसा जाता रहा है मगर अब इस प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है, कम से कम भविष्य के लिए…विद्यार्थियों को सब्सिडी से अधिक आंशिक तौर पर काम की जरूरत है और इसके बारे में संस्थानों को गम्भीरता से सोचना होगा..वरना समस्या और पेचीदा होती रहेगी और हम यही नहीं चाहते।

क्या मुफ्त शिक्षा का सटीक मापदण्ड बनाने की जरूरत है
आज भी राजकीय व केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की फीस बेहद कम है, लगभग वही जो 50 के दशक में थी मगर देश को आजाद हुए 75 साल होने जा रहे हैं। इस दौरान महँगाई, वेतन और भत्ते तेजी से बढ़े मगर नहीं बढ़ी तो उच्च शिक्षण संस्थानों की फीस संरचना। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के पास अनुदान का आधा हिस्सा चला जाता है मगर संस्थान को उन्नत करने और समय के साथ चलने के लिए भी खर्च करना पड़ता है। अब कल्पना कीजिए कि महज 13 प्रतिशत से कुछ अधिक हिस्सा पाने वाले राजकीय विश्वविद्यालयों के लिए संस्थान की गुणवत्ता बनाये रखना कितना कठिन है क्योंकि सुविधा तो सबको चाहिए मगर फीस बढ़ी तो हाय तौबा मच जाती है। अब सवाल यह है कि इस परिस्थिति में मुफ्त शिक्षा प्रदान कर पाना क्या किसी भी सरकार के लिए सम्भव है? किसी परिवार में भी भोजन बाँटते समय आधार सदस्यों की संख्या ही होती है और यह भी कि उसे जरूरत कितनी है। अधिकतर राजकीय विश्वविद्यालय संरचना की कमी से जूझ रहे हैं। शहरों की ही नहीं बल्कि जिला स्तर पर जब जाते हैं तो यह अभाव और गहराता जाता है। ऐसे में संस्थान के लिए गुणवत्ता बरकरार रखना बहुत कठिन है। बात यह है कि जेएनयू और विश्वभारती की तरह ही रवीन्द्रभारती, उत्तर बंग विश्वविद्यालय समेत देश भर के राजकीय विश्वविद्यालय हैं तो फिर अनुदान 13.13 प्रतिशत ही क्यों और जब आप अनुदान कम देंगे तो गुणवत्ता कैसे चाह सकते हैं?

इस पर विद्यार्थियों से जो फीस मिलती है, वह आज 70 साल बाद भी 10-20 रुपये से लेकर कुछ हजार रुपये ही है और इस पर फीस बढ़ाने पर आए दिन धरने होते रहते हैं। सस्ती शिक्षा की बात करना और कहना बहुत आसान है मगर धरातल पर जाकर देखने की जरूरत है कि अगर सभी को मुफ्त शिक्षा मिलेगी तो संस्थान चलेंगे कैसे? बिजली, पानी, वेतन, मरम्मत, परीक्षा, विद्यार्थी समेत कई सारी चीजों पर खर्च होता है, संस्थान वह खर्च कहाँ से निकालेगा? आखिर विद्यार्थियों को पंगु और परजीवी बनाकर आप उनके लिए कैसा भविष्य लिख रहे हैं? आपकी यही नीति है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे व्यावहारिक तौर पर काम करने उतरते हैं तो उनको खारिज कर दिया जाता है क्योंकि जो वह सीखते हैं, वह इन क्षेत्रों के लिए कारगर होता ही नहीं, मगर पढ़ते हुए जब वह काम करते हैं तो उनको व्यावहारिक अनुभव होगा ? राजकीय विश्वविद्यालयों की लचर संरचना पर भी हम बात करेंगे और विद्यार्थियों पर भी मगर ये समझना जरूरी है कि जिन देशों में सस्ती व मुफ्त शिक्षा की बात की जा रही है, उनकी आबादी सवा सौ करोड़ नहीं है। सबसे जरूरी है कि अनुदान में जो विषमता है, उसे दूर किया जाए। छात्रवृत्ति की जगह आंशिक कार्य की व्यवस्था हो,शिक्षकों के वेतन और उनकी सुविधाओं में समानता लायी जाए, तभी वह दिल से काम कर सकेंगे और तभी इस समस्या का समाधान निकल सकता है, वरना नहीं।

भारत में पुरुष दिवस की शुरुआत करने वाली उमा

समाज और परिवार में पुरुषों को अक्सर बेसब्र, गुस्सैल और हिंसक दिखाया जाता है। फिल्में हों या किताबें, इतिहास में भी उनकी परिभाषा इसी तरह से लिखी गई है। इस सोच को बदलने के लिए वेस्टइंडीज के हिस्ट्री लेक्चरर डॉ. जीरोम तिलक सिंह ने 19 नवंबर 1999 को इंटरनेशनल मेन्स डे की शुरुआत की। भारत में इसकी शुरुआत 2007 में हुई, जिसका श्रेय हैदराबाद की लेखिका उमा चल्ला को जाता है। उमा के मुताबिक, जब हमारी संस्कृति में शिव और शक्ति दोनों बराबर हैं तो पुरुषों के लिए भी सेलिब्रेशन का इन दिन क्यों नहीं होना चाहिए। उमा से जानिए, इस इंटरनेशनल मेन्स डे की कहानी…

पुरुषों के हक में अमेरिका से कैंपेन शुरू किया
एक महिला शादी के बाद नौकरी अपने मनमुताबिक विकल्प के तौर पर चुनती है लेकिन पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता। महिलाओं को हमेशा समस्या से जोड़कर निर्बल दिखाया जाता है, जबकि पुरुष और महिला दोनों की अपनी-अपनी खूबियां हैं। शिव से शक्ति को अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्हें अर्द्धनारीश्वर कहा जाता है। जब दोनों बराबर हैं, तो सेलिब्रेशन पुरुष के लिए भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ मैंने अमेरिका में रहकर कैंपेन शुरू किया। भारत में आकर जमीनी स्तर पर इसकी शुरुआत करना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए मैंने डिजिटल प्लेटफार्म पर आवाज उठाई और इस विषय पर लिखना जारी रखा।

श्श्

2007 में भारत में पहली बार मना मेन्स डे
अभियान की शुरुआत में महिला अधिकारों के लिए पड़ने वाले लोगों के निगेटिव रिएक्शन मिले, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उनका कहना था, यह समाज पुरुष प्रधान है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती। दरअसल, उस दौर में मैंने देखा महिला और उनकी समस्याओं को ज्यादा उठाया जाता था और पुरुषों की गलत तस्वीर पेश की जा रही थी। समस्याएं दोनों ओर हैं लेकिन दिखाया सिर्फ महिलाओं के पक्ष में जा रहा था। महिला दिवस मनाना अच्छा है लेकिन सभी पुरुषों की गलत छवि दिखाना ठीक नहीं है। पुरुषों को महिलाओं पर हावी माना जाता है, यह सब उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा होता है, उसके त्याग का हिस्सा होता है। लिहाजा, मेरा अभियान जारी रहा। अंतत: 2007 में बेहद छोटे स्तर पर भारत में पहली बार इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया गया।

 

मूंछों को प्राथमिकता दी तो अभियान आगे बढ़ा
जब से भगवान को समझना शुरू किया, तबसे देखा कि ज्यादा प्रतिमाओं और तस्वीरों में उन्हें बिना मूंछों के दिखाया गया है। मैंने एक लंबे समय तक स्टडी की। इतिहास पढ़ा, प्राचीन तस्वीरें देखीं, संस्कृत के श्लोक पढ़े, संस्कृत से अनुवादित तेलुगु साहित्य भी पढ़ा। इनसे एक बात साफ हुई कि मूंछें सिर्फ पुरुषों की नहीं भगवान की शख्सियत का अहम हिस्सा रही हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर मंदिरों में स्थापति प्रतिमाओं के चेहरे पर मूंछ हैं। यहां तक राजस्थान के म्यूजियम में रखी प्रतिमा में भगवान राम की मूंछ हैं। सिर्फ भारतीय ही नहीं दूसरे कल्चर की ऐतिहासिक अध्ययनों में मूंछ का जिक्र किया गया है। दाढ़ी और मूंछ को सात्विक इंसान बताया गया है। हम्पी के मंदिरों में भगवान के चेहरे पर मूंछ साफ तौर पर दिखाई गई हैं। भक्त जैसा सोचते हैं, भगवान को वैसा ही देखना चाहते हैं।

 

अच्छे इंसान वाली सकारात्मक सोच को बढ़ावा
उमा के मुताबिक, ऐसा नहीं है पुरुष जो चाह रहे हैं वह उन्हें आसानी से मिल रहा है। समाज में महिला और पुरुष के बीच बैलेंस न होने का कारण है पुरुषों पर अतिरिक्त बोझ। महिला के लिए काम न करना एक पसंद हो सकती है लेकिन पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा समझा जाता है कि हर दिन पुरुषों के नाम है और समाज भी पुरुषवादी है। महिला और पुरुष दोनों के बाद अलग-अलग शक्तियां और जिम्मेदारियां हैं। जब ये दोनों बराबर से साथ आते हैं तो चीजें बेहतर होती है। आने वाली पीढ़ियों को बेहतर माहौल देने के लिए हमें सकारात्मक रहने की जरूरत है।
(साभार – महानगर टाइम्स)

रतलाम जिले के जावरा में कांट्रैक्टर अनीस अनवर के संग्रह में 1898 में है अनूदित गीता

परिवार की तीन पीढ़ियों ने पुस्तक का बखूबी ध्यान रखा है, इसे कुरआन शरीफ के साथ रखते हैं
गीता का संस्कृत से उर्दू में अनुवाद मथुरा के पंडित जानकीनाथ मदन देहलवी ने 1898 में किया था

जावरा/ रतलाम : मध्य प्रदेश के रतजाम जिले के जावरा में एक मुस्लिम परिवार ने 121 साल से उर्दू की श्रीमद् भागवत गीता सहेज रखी है। परिवार की तीन पीढ़ियों ने इसका कुरआन शरीफ की तरह ध्यान रखा है। इस पुस्तक का अनुवाद 1898 में संस्कृत से उर्दू में किया गया था। यह भागवत गीता कांट्रैक्टर अनीस अनवर (57) के संग्रह में है। वह समय मिलने पर इसे पढ़ते हैं और इसका दर्शन उन्हें जीवन की राह दिखाता है।
गीता का संस्कृत से उर्दू में अनुवाद मथुरा के पंडित जानकीनाथ मदन देहलवी ने 1898 में किया था। पंडित रामनारायण भार्गव के मार्फत मथुरा प्रेस से प्रकाशित ग्रंथ में श्रीमद् भागवत गीता के पाठ व महत्वपूर्ण श्लोक का उर्दू व फारसी में तर्जुमा है। 121 साल पहले संस्कृत से उर्दू में इसके अनुवाद का मकसद मुस्लिम वर्ग को गीता से रूबरू कराना था।
गीता की कीमत एक आना थी
अनुवादित गीता का प्रकाशन 15 मार्च 1898 को हुआ था। तब कीमत एक आना यानी 6 पैसे थी। 230 पेज में गीता के 18 अध्यायों का संस्कृत से उर्दू अनुवाद है। अनीस अनवर ने बताया इसे कुरआन शरीफ सहित अन्य धर्म ग्रंथों के साथ रखते हैं।
सुख-दुख का दर्शन बहुत गहरा
अनीस अनवर कहते हैं संस्कृत से उर्दू में प्रकाशित इस पुस्तक में पेज नंबर 41 पर प्रकाशित श्लोक “यं हि नव्यथयंत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। संदु:ख सुखंधीरं सौअमृतत्वायकल्पते।।’’ से अनीस अनवर बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। इस श्लोक का अर्थ है जिस मनुष्य को स्पर्श मात्र से कोई असर नहीं होता और जो सुख व दु:ख में एक समान रहता है वो अमर हो जाता है। अनीस पारिवारिक मित्र किशोर शाकल्य के साथ इसे पढ़ते हैं।

मिजोरम / सैनिक स्कूल में पहली बार 12 लड़कियां, प्रिंसिपल बोले- प्रदर्शन में लड़कों से आगे

छिंगछिप  :दो साल पहले तक सैनिक स्कूलों में सिर्फ लड़कों को दाखिला मिलता था, लेकिन 2017 में बने मिजोरम के छिंगछिप सैनिक स्कूल में पहली बार लड़कियों के लिए 10% सीटें आरक्षित की गयीं। 2018 में 6 लड़कियों को दाखिला मिला था। 2019 में आंकड़ा दोगुना हो गया। इन 12 बच्चियों में एक सैन्य अधिकारी की बेटी भी है।
सैनिक स्कूल में लड़कियों को दाखिला देना रक्षा मंत्रालय का एक पायलट प्रोजेक्ट था, यह समझने के लिए कि लड़कों के गढ़ में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है। यह प्रयोग कामयाब रहा, जिसे देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले माह ही ऐलान किया था कि 2021-22 से देश के हर सैनिक स्कूल में लड़कियां भी पढ़ सकेंगी।
तीन अलग-अलग राज्यों से हैं लड़कियां
छिंगछिप के सैनिक स्कूल में इस साल (2019-20) जिन छह लड़कियों का दाखिला हुआ, उनमें तीन (साइथांग्कुई, वनलालॉमपुई, रेशल लालहुनबाईसाई) मिजोरम से हैं। दो (मुस्कान और खुशबू) बिहार से हैं और एक (नेहा आरएस) केरल से है। 2018 से यहां पढ़ रही जोनुनपुई कहती है- ‘अब हमारी फुटबॉल टीम पूरी है। अब हम लड़कों की टीम से मुकाबला कर सकती हैं।’
वहीं, 11 साल की मुस्कान और खुशबू कहती हैं- हमें सेना में जाना है। देश की रक्षा करनी है और दुश्मनों को मारना है। लड़कियों को दाखिला देने के पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों के बारे में स्कूल के प्रिंसिपल लेफ्टिनेंट कर्नल यूपीएस राठौर बताते हैं- कैडेट के तौर पर इन लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर रहा है। ट्रेनिंग लड़कों के समान होती है। आगे चलकर ये सभी सेना में जाएंगी। यह स्कूल 212 एकड़ में है। लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल और वार्डन हैं। सीसीटीवी से कैंपस की निगरानी की जाती है।

जस्टिस एसए बोबडे ने 47वें मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ ली

नयी दिल्ली : जस्टिस अरविंद बोबडे ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के 47वें मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ ली। उन्होंने 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की जगह ली। जस्टिस बोबडे का कार्यकाल 17 महीनों का है। वे 23 अप्रैल 2021 में रिटायर होंगे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें शपथ दिलाई। जस्टिस बोबडे का जन्म 24 अप्रैल 1956 में महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था। उन्होंने नागपुर यूनिवर्सिटी से ही कानून की डिग्री ली। वे 2000 में बॉम्बे हाइकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। फिर 2012 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला। अप्रैल 2013 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दी गई। जस्टिस बोबडे पूर्व सीजेआई गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए बनी समिति में शामिल थे।जस्टिस बोबडे के करीबी बताते हैं कि वे बहुत ही खुशमिजाज और मृदुभाषी हैं। उन्हें बाइक राइडिंग और डॉग्स बहुत पसंद हैं। उन्हें खाली समय में किताबें पढ़ना पसंद है। वे घर पर बेहद सादगी से रहते हैं और यही सादगी उनकी हर जगह देखने को मिलती है। पूर्वचीफ जस्टिस गोगोई ने 3 अक्टूबर 2018 को 46वें मुख्य न्यायाधीश पद के रूप में शपथ ली थी। उनका कार्यकाल 13 महीने 15 दिन का रहा। जस्टिस गोगोई ने अपने कार्यकाल में कामाख्या देवी के दर्शन के लिए दो बार गए। उन्होंने अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला दिया। राफेल मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज की। चीफ जस्टिस को आरटीआई के दायरे में शामिल किया।

बेल्जियम / 9 साल का बच्चा अगले महीने इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन पूरा करेगा

ब्रसेल्स :  बेल्जियम में 9 साल का बच्चा स्नातक की डिग्री हासिल करने वाला है। लॉरेंट सिमंस आइंडहोवन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (टीयूई) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रहा है। यूनिवर्सिटी के स्टाफ का कहना है कि वह असाधारण है। लॉरेंट दिसंबर में अपनी डिग्री पूरी कर लेगा। लॉरेंट के पिता ने सीएनएन को बताया कि उसकी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी करने की योजना है। वह मेडिकल की डिग्री भी लेना चाहता है। लॉरेंट की मां लिडा और पिता एलेक्जेंडर सिमोंस ने कहा- उसके शिक्षकों ने लॉरेंट में कुछ खास देखा। हालांकि, माता-पिता ने यह भी कहा कि हम नहीं जानते कि लॉरेंट इतनी जल्दी सीखने में सक्षम क्यों है? इस पर उसकी मां ने मजाक में कहा कि ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि मैं प्रेगनेंसी के दौरान बहुत मछली खाती थी।
पढ़ने में तेज है लॉरेंट
अन्य छात्रों की तुलना में लॉरेंट अपना पाठ्यक्रम तेजी से समझता है। टीयूई के शिक्षा निदेशक जोएर्ड हल्शॉफ ने कहा कि विशेष छात्रों के लिए हम एक बेहतर कार्यक्रम की व्यवस्था करते हैं। उसी तरह से हम उन छात्रों की भी मदद करते हैं, जो मुख्य खेलों में भाग लेते हैं। लॉरेंट असाधारण है। युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कहा लॉरेंट यहां के छात्रों में सबसे बेहतर है। वह न केवल बुद्धिमान है, बल्कि बेहद शालीन भी है। लॉरेंट ने सीएनएन को बताया कि उसका पसंदीदा विषय इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग है। वह चिकित्सा के फील्ड में भी अध्ययन करने वाला है। 9 साल के बच्चों की तुलना में बिलकुल अलग है। लॉरेंट कृत्रिम अंगों का विकास करना चाहता है। हालांकि, उसे अभी स्नातक की डिग्री पूरी करनी होगी। ग्रेजुएशन के बाद उसकी जापान में छुट्टी मनाने की योजना है।

अमेरिका से अपने साथ 10 बक्से भरकर किताबें लाए थे गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह

पटना :आइंस्टीन के सिद्धांतों को चैलेंज करने वाले और नासा के कंप्यूटर्स को टक्कर देने वाले जाने-माने गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का शौक सिर्फ किताबें ही थीं। जब वह अमेरिका से लौटकर भारत आए तो अपने साथ 10 बक्से भरकर किताबे लाए थे। बंगलौर में जब उनका उपचार चल रहा था तब उनकी भाभी प्रभावती ने कहा था “हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है। अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है। यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया। वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में बताया जाता है कि किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त थी। वह हाथ में पेंसिल लेकर यूं ही पूरे घर में चक्कर काटते रहते थे। कभी अखबार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते रहते थे। मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिताते रहे।
पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र वह गलत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे। कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई, जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए थे। पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी, लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा।
उनके भाई अयोध्या सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि “भइया (वशिष्ठ जी) बताते थे कि कई प्रोफेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिए हैं। यह बात उनको बहुत परेशान करती थी।” आर्मी से सेवानिवृत्त वशिष्ठ के भाई अयोध्या सिंह इंटरव्यू में यह भी बताया था कि “उस वक्त तत्कालीन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मेरा बेंगलुरु तबादला किया गया जहां भइया का इलाज हुआ, लेकिन फिर मेरा तबादला कर दिया गया और इलाज नहीं हो सका।” डॉ. वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर नाउम्मीद हो चुका था। घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां अब उनको डराती हैं। उन्हें डर इस बात का है कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा।

आर्सनल 90% कचरे को रिसाइकल करता है, प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं करता यूनाइटेड 

यूरोप के फुटबॉल क्लब पर्यावरण बचाने के लिए अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कोई रिन्यूएबल एनर्जी पर काम कर रहा है तो किसी ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग और सोलर सिस्टम तो अधिकतर क्लबों ने लगवाया है। बीबीसी और यूएन की क्लाइमेट चेंज पर काम करने वाली कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लिश प्रीमियर लीग (ईपीएल) के सभी 20 क्लब फैंस को पर्यावरण के प्रति जागरुक कर रहे हैं। वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं और फैंस से भी ऐसा करने को कहते हैं। 20 में से 15 क्लब स्टेडियम में वीगन फूड उपलब्ध कराते हैं। 16 क्लबों के पास पानी का सही तरीके से कैसे इस्तेमाल हो, इसे लेकर प्लानिंग है। रिपोर्ट के बाद इन क्लबों को रेटिंग भी मिली है, कि कौन सा क्लब कितना ग्रीन है। आर्सनल 90% वेस्ट को रिसाइकल करता है जबकि मैनचेस्टर यूनाइटेड और सिटी सिंगल यूज प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं करता। टॉटेनहैम ने ग्रीन रूफ लगवाई है।
फुटबॉल क्लबों को 8 मानक के आधार पर रेटिंग दी गई है
बीबीसी और क्लाइमेट चेंज पर काम करने वाली यूएन की कमेटी ने क्लबों को रेटिंग देने के लिए एनर्जी उपयोग करने वाला पहला क्लब मानक निर्धारित किए गए थे। जैसे- क्लब क्लीन एनर्जी इस्तेमाल करता है या नहीं। उसके पास वाटर मैनेजमेंट सिस्टम है या नहीं वगैरह। अगले साल यूएन की स्पोर्ट पॉजिटिव समिट होनी है। पहली बार होने वाली इस समिट में इन सभी क्लबों के काम की भी चर्चा होगी।
टॉप-4 ग्रीन क्लब: आर्सनल ग्रीन एनर्जी उपयोग करने वाला पहला क्लब
आर्सनल: आर्सनल रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग करने वाला पहला क्लब बना था। वह 2017 से इसका उपयोग कर रहा है। उसने एलईडी फ्लड लाइट और ऑटोमेटिक लाइट लगाई हैं। क्लब अपने फैंस द्वारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल करने की वकालत करता है। प्लास्टिक को छोड़कर पेपर और लकड़ी का उपयोग करता है। स्टेडियम के वॉशरूम और मैदान में वाटर रिसाइकल सिस्टम लगा है।
मैनचेस्टर सिटी: फुटबॉल एकेडमी में वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाया है, जो कई कीड़ों, तितलियों और पक्षियों का घर है। रियूजेबल कप की स्कीम है, जो हर मैच के 29 हजार कप रिसाइकल करती है। साइकल पार्किंग और इलेक्ट्रिक चार्जिंग पॉइंट हैं। वाटर रिसाइकल सिस्टम के कारण क्लब 83% रिसाइकल पानी इस्तेमाल करता है।
मैनचेस्टर यूनाइटेड: ग्रीन एनर्जी खरीदकर इस्तेमाल करता है। सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करता। वेस्ट फूड को कंपोस्ट में बदलता है। बारिश का पानी और गंदे पानी को रिसाइकल कर स्टेडियम में प्रयोग करता है। मैन्यू में वीगन फूड का विकल्प है। क्लब का वार्षिक कार्बन उत्सर्जन दो हजार टन तक कम हो गया है। इतना कार्बन उत्सर्जन 400 घर एक साल तक करते हैं।
टॉटेनहैम: ट्रेनिंग सेंटर की छत पर पौधे लगाए हैं। रेन वाटर का इस्तेमाल करता है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के प्रयोग को प्रमोट करता है। उसके खिलाड़ी कार पूलिंग कर स्टेडियम आते हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सपोर्ट करने के लिए फैंस को बस और ट्रेन के पास दिए हुए हैं। कम पानी इस्तेमाल करने वाले वॉशरूम और वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है।

फेसबुक ने लॉन्च की ई-वॉलेट सुविधा

 मैसेंजर, वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम से कर सकेंगे भुगतान
डिजिटल पेमेंट के बढ़ते दायरे को देखते हुए फेसबुक ने भी अपना ई-वॉलेट ‘फेसबुक पे’ लॉन्च किया है। शुरुआत में ये पेमेंट सर्विस सिर्फ फेसबुक और मैसेंजर पर उपलब्ध कराई गई है। बाद में इसे वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम पर भी उपलब्ध कराया जाएगा। फंडरेजिंग, इन-गेम खरीदारी, कार्यक्रमों की टिकटों, मैसेंजर पर लोगों से लोगों को भुगतान (पर्सन टू पर्सन पेमेंट) और फेसबुक मार्केट प्लेस पर पेजेज और व्यापारों पर खरीदारी करने के लिए फेसबुक पे को शुरू किया गया है। फिलहाल यह सुविधा US में शुरू की गई है। फेसबुक ने अपने ब्लॉग में कहा कि इससे पेमेंट करने के लिए यूज़र्स को सिक्योरिटी ऑप्शंस दिए जाएंगे, जिसमें PIN और बायोमेट्रिक जैसी सुविधा मिलेगी। इस पेमेंट सिस्टम से शॉपिंग, इवेंट की टिकट बुकिंग, डोनेशन या फिर किसी को पैसे ट्रांसफर किए जा सकेंगे। जानकारी के अनुसार फेसबुक पे किसी भी ट्रांजेक्शन के लिए सिंगल सिस्टम उपलब्ध कराएगा, जिसका मतलब ये हुआ कि इससे यूजर्स का डेटा जैसे क्रेडिट कार्ड नंबर जैसी डिटेल सेफ रहेंगी।