Thursday, April 23, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 591

भारत के 42 धरोहर स्थल यूनेस्को की ‘संभावित धरोहरों की सूची’ में

नयी दिल्ली : भारत के 42 धरोहर स्थल काफी लंबे समय से यूनेस्को की ‘धरोहर सूची’ में शामिल किए जाने का इंतजार कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अब सरकार यूनेस्को के मापदंडों सहित इन धरोहरों का तुलनात्मक अध्ययन करायेगी ताकि इन्हें जल्द वैश्विक सूची में शामिल करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। इन धरोहर स्थलों को यूनेस्को की ‘संभावित धरोहरों की सूची’ में तो शामिल किया गया है लेकिन पूर्ण रूप से वैश्विक धरोहर के रूप में मान्यता अभी तक नहीं मिली है।
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, यूनेस्को के भारत में संभावित धरोहरों की सूची में पश्चिम बंगाल का विष्णुपुर मंदिर, केरल के कोच्चि स्थित मात्तानचेरी पैलेस, मध्यप्रदेश के मांडू स्थित ग्रुप ऑफ मॉन्यूमेंट और उत्तर प्रदेश के वाराणसी के सारनाथ स्थित प्रचीन बौद्ध स्थल साल 1998 से यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं हालांकि अब तक पूर्ण रूप से विश्व धरोहर की मान्यता नहीं मिली है। यूनेस्को के विश्व धरोहर की संभावित सूची के बारे में पूछे जाने पर संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा कि यह सही है कि यूनेस्को की संभावित या अस्थायी धरोहरों की सूची में करीब 50 धरोहर हैं। ये यूनेस्को के मानदंडों को पूरा करते हैं। हमने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई से कहा है कि इन मानदंडों के तहत इन स्थलों का तुलनात्मक अध्ययन करें। यूनेस्को के संभावित धरोहरों की सूची में भारतीय धरोहरों में पंजाब के अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब और असम में ब्रह्मपुत्र नदी की मुख्यधारा से लगे माजुली द्वीप साल 2004 से ही शामिल है । वहीं, नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान और लिटिल रन आफ कच्छ का वाइल्ड एस सैंचुरी साल 2006 से संभावित सूची में तथा नेउरा वैली नेशनल पार्क और डेजर्ट नेशनल पार्क साल 2009 से यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल है। सिल्क रोड साइट्स इन इंडिया, शांति निकेतन, चारमिनार, कुतुबशाही मकबरा, गोलकोंडा किला तथा कश्मीर का मुगल गार्डन 2010 से यूनेस्को की संभावित धरोहरों में शामिल है। दिल्ली हेरिटेज सिटी साल 2012 से संभावित विश्व धरोहर में शामिल है। साल 2014 में यूनेस्को की संभावित धरोहरों की सूची में दक्कन सल्तनत के किले और धरोहर, अंडमान द्वीप के सेल्यूलर जेल, ककातिया मंदिर और गेटवे, भारत के बुनाई केंद्र से जुड़ी विख्यात साड़ी, धौलावीरा हड़प्पा शहर, अपतांज सांस्कृति दृश्यस्थली, श्रीरंगम स्थित श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर, चिल्का झील, पद्मनाभपुरम मंदिर, होयसाला से जुड़े पवित्र स्थल, भारत में अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सत्याग्रह स्थल, थेमबांग किलेबंद गांव, नार्कोडाम द्वीप, अहोम राजवंश से जुड़े मोइडाम स्थल, भुवनेश्वर स्थित इकाम्रा क्षेत्र, बुर्जहोम, लोथल, हड़प्पा स्थल, भारत के पर्वतीय रेलवे का विस्तार, चेट्टीनाड ग्रामीण क्षेत्र, दिल्ली का बहाई पूजा स्थल शामिल हैं। साल 2015 में एहोल बादामी स्थल, कोल्ड डेजर्ट, उत्तरापथ से लगी बादशाही सड़क, सड़क ए आजम, ग्रैंड ट्रंक रोड को यूनेस्को के संभावित धरोहरों की सूची में शामिल किया गया था। वहीं केईबुल लामजाव संरक्षित स्थल को साल 2016 में, गारो हिल्स संरक्षित क्षेत्र को साल 2018 में तथा ओरछा के ऐतिहासिक स्थल को संभावित धरोहर स्थल में शामिल किया गया था। गौरतलब है कि भारत के 38 धरोहर स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया जा चुका है।

‘माधुरी दीक्षित’ झील, जहाँ जा सकते हैं केवल भारतीय

भारत में खूबसूरती की कमी नहीं है। जहां नजर घुमाएंगे वहीं कला और प्रकृति के अद्भुत उदहारण देखने को मिलेंगे। आज हम आपको ऐसी ही जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे देखकर धरती पर स्वर्ग के दर्शन हो जाएंगे। सबसे अनोखी बात तो ये है कि यहां स्थित झील को माधुरी दीक्षित झील भी कहते हैं।
दरअसल, इस झील के पास माधुरी दीक्षित का एक गाना फिल्माया गया था, जिसके बाद लोग सांगेसर झील को माधुरी झील कहने लगे। समुद्र तल से 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित सांगेसर झील भूकंप की वजह से बनी थी। स्थानीय लोगों के अनुसार ये झील अपनी वर्तमान जगह से कुछ दूरी पर स्थित थी। मगर टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने के कारण झील आज अपनी जगह से खिसक गई। जिसकी वजह से देवदार के जंगल का एक बड़ा हिस्सा पानी में समा गया।
आज भी पेड़ों के ऊपरी हिस्से बड़े अजीब तरह से पानी की सतह के ऊपर निकले हुए देखे जा सकते हैं। झील भारत-चीन सीमा के करीब स्थित है और झील देखने के लिए आपको जिला आयुक्त से इजाजत लेनी होगी। तवांग से इस झील तक पहुंचने में दो घंटे लगेंगे और केवल भारतीयों को ही इस झील तक जाने की अनुमति है।

उत्तरी ध्रुव से उड़ान भरने वाली देश की पहली एयरलाइन बनी एयर इंडिया

नयी दिल्ली :  एयर इंडिया ने भी एक खास उपलब्धि अर्जित की। एयर इंडिया उत्तरी ध्रुव से उड़ान भरने वाली देश की पहली एयरलाइन बन गयी है। नयी दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को जाने वाले एयर इंडिया के बोइंग-777 एयरक्राफ्ट ने गत गुरुवार 15 अगस्त को उत्तरी ध्रुव के ऊपर से उड़ान भरी। यह रास्ता सैन फ्रांसिस्को जाने वाले सामान्य रास्ते के मुकाबले छोटा लेकिन चुनौतीपूर्ण है। इस नए रूट से उड़ान के समय में करीब डेढ़ घंटे की कमी आएगी, साथ ही हर उड़ान पर 2000 से 7000 किलो ईंधन की बचत भी होगी। उड़ान का समय अब 14.5 के बजाय 13 घंटे हो जाएगा। एयर इंडिया की दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को की फ्लाइट गुरुवार को 243 यात्रियों के साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, रूस के ऊपर से उड़कर 12.27 बजे उत्तरी ध्रुव से गुजरी। सामान्य रास्ता बांग्लादेश, म्यांमार, चीन और जापान होकर जाता है और प्रशांत महासागर पार करने के बाद अमेरिका में प्रवेश मिलता है। उत्तरी ध्रुव के ऊपर से उड़ान भरने की चुनौती उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने देश की सभी एयरलाइनों के सामने रखी थी। इस बारे में छह अगस्त को सर्कुलर भी जारी किया गया था, लेकिन एयर इंडिया के अलावा किसी निजी एयरलाइन ने इसके लिए हिम्मत नहीं दिखाई।
अमेरिका के लिए तीन रूटों का इस्तेमाल करने वाली दुनिया की पहली एयरलाइन
इस कीर्तिमान के साथ एयर इंडिया अमेरिका के लिए तीनों रूटों का इस्तेमाल करने वाली विश्व की पहली एयरलाइन बन गई। अभी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की एतिहाद एयरलाइन ही अमेरिका जाने के लिए उत्तरी ध्रुव के रास्ते का इस्तेमाल करती है।
यात्रा के समय के साथ कार्बन उत्सर्जन में भी आएगी कमी, ईंधन की भी होगी बचत
इस नए रूट से दूरी और समय के अलावा कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी। इस रास्ते से उड़ान भरने पर कार्बन उत्सर्जन में 6000 से 21000 किलोग्राम तक की कमी आएगी। एयर इंडिया की इस ऐतिहासिक उड़ान में अभिनेता विवेक ओबेरॉय भी सवार थे। उन्होंने उत्तरी ध्रुव पर जमी बर्फ का वीडियो शेयर किया।
बेहद कम तापमान, अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण उड़ान के लिए खड़ी करता है समस्या
अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण होने से दिशा की सही जानकारी देने वाले चुंबकीय कंपास उत्तरी ध्रुव के ऊपर काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में विमान में लगे अत्याधुनिक उपकरण और जीपीएस से उपलब्ध डाटा की मदद से ही पायलट सही रास्ते पर उड़ान भरते रहने का फैसला करते हैं। उत्तरी ध्रुव पर तापमान भी बहुत कम रहता है, ऐसे में ईंधन के जमने का का खतरा भी होता है।

सैयद अकबरुद्दीन जिन्होंने यूएन में कर दी पाक की बोलती बंद

नयी दिल्ली : संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और चीन के भारत के खिलाफ सभी मंसूबे नाकाम हो गए। सैयद अकबरुद्दीन ने अपने तर्कों से ही पाकिस्तान और चीन की बोलती बंद कर दी। अकबरुद्दीन साल 1985 में भारतीय विदेश सेवा से जुड़े थे। वह पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ भी माने जाते हैं। सैयद अकबरुद्दीन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में स्थित भारतीय उच्चायोग में काउंसलर के पद रह चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र में शुक्रवार को पाकिस्तान और चीन ने भारत के जम्मू-कश्मीर पर लिए गए फैसले का विरोध करते हुए ये बैठक बुलाई थी। लेकिन भारत ने इनकी नापाक साजिशों को अपने तर्कों और सबूतों से हरा दिया। भारत की बातें इतनी शानदार थीं कि रूस तक ने भारत का ही समर्थन किया। हालांकि बंद कमरे में संयुक्त राष्ट्र की बैठक होने से पहले ही कई देशों ने भारत और पाकिस्तान से द्विपक्षीय बातचीत करने को कहा था। बैठक के खत्म होने के बाद जब भारत ने अपनी बात रखी तो हर कोई उससे सहमत था। इसकी कमान संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजनयिक सैयद अकबरुद्दीन ने संभाली। उन्होंने तर्कों से ही पाकिस्तान और चीन की बोलती बंद कर दी। भारत के तर्कों का असर ये रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के भारतीय प्रयासों की प्रशंसा की। यहां तक कि चीन और पाकिस्तान की कोशिश फेल होने के बाद भी उनका कोई औपचारिक बयान नहीं आया। भारत की इस वैश्विक सफलता का सारा श्रेय विदेश मंत्रालय को जाता है, जिसका नेतृत्व सैयद अकबरुद्दीन ने किया है।
1985 में भारतीय विदेश सेवा से जुड़े
अकबरुद्दीन साल 1985 में भारतीय विदेश सेवा से जुड़े थे। वह पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ भी माने जाते हैं। अकबरुद्दीन ने विदेश मंत्रालय में अब तक कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। अगर उनके परिवार की बात करें तो उनके पिता एस बदरुद्दीन हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष थे। बदरुद्दीन कतर में भारत के राजदूत भी बनाए गए थे। अकबरुद्दीन की मां डॉक्टर जेबा अंग्रजी की प्रोफेसर थीं। अकबरुद्दीन ने भारतीय विदेश नीति को आगे बढ़ाने का काम किया है। वह साल 2015 में हुए भारत और अफ्रीका फोरम समिट के चीफ कोऑर्डिनेटर यानी मुख्य संयोजक भी रह चुके हैं। ये समिट ऐसे समय में हुआ था जब अफ्रीका में चीन का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन फिर भी ये काफी सफल रहा था। वह साल 2012 से 2015 तक भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता भी रह चुके हैं और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं।
कई देशों में विभिन्न पदों पर रहे
सैयद अकबरुद्दीन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में स्थित भारतीय उच्चायोग में काउंसलर के पद रह चुके हैं। इसके साथ ही वह सऊदी अरब और मिस्र में भी काम कर चुके हैं। वह साल 1995 से 1998 तक संयुक्त राष्ट्र में फर्स्ट सेक्रेटरी भी थे। क्रिकेट के फैन अकबुरुद्दीन ने राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंध में एमए किया है।
पाकिस्तान की बोलती की बंद
भारत की कूटनीति बंद कमरे के बाहर भी हावी रही। सैयद अकबरुद्दीन ने अपनी हाजिरजवाबी, तथ्यों और कूटनीतिक जवाबों से पाकिस्तानी पत्रकारों की बोलती बंद कर दी। कश्मीर पर चर्चा के बाद प्रेस कांफ्रेंस चल रही थी जिसमें पाकिस्तान के कई पत्रकार बार-बार अकबरुद्दीन से कश्मीर और मानवाधिकारों को लेकर सवाल पूछ रहे थे। पाकिस्तानी पत्रकारों ने सवालों के जरिए भारतीय राजनयिक को घेरने की नाकाम कोशिश की। अकबरुद्दीन ने एक-एक करके उनके सभी सवालों के जवाब देकर उन्हें चुप करवा दिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के एक खंड को छोड़कर बाकी सभी खंडों को हटाने का फैसला पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है। कश्मीर पर लिए गए फैसले से बाहरी लोगों को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, “जेहाद के नाम पर पाकिस्तान हिंसा फैला रहा है। सभी मसले बातचीत से सुलझाए जाएंगे। हिंसा किसी भी मसले का हल नहीं है।” अकबरुद्दीन ने कहा, “इस मसले पर बातचीत से पहले पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाना बंद करना होगा।” उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर पर फैसला विकास के लिए किया गया है। हम धीरे-धीरे वहां से पाबंदी हटा रहे हैं। अकबरुद्दीन ने कहा कि हम अपनी नीति पर हमेशा की तरह कायम हैं। आतंकमुक्त माहौल में शांति से मसले को द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाया जाएगा। पाकिस्तान के एक पत्रकार को उन्होंने बिना जवाब दिए बस हाथ मिलाकर चुप करा दिया। एक पत्रकार ने सवाल पूछते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 आपके लिए आंतरिक मुद्दा हो सकता है। जिसे टोकते हुए अकबरुद्दीन ने कहा कि बहुत शुक्रिया यह स्वीकार करने के लिए।
चीन को दिया संदेश
अकबरुद्दीन ने चीनी और पाकिस्तानी मीडिया को संबोधित करने के बाद कहा, “सुरक्षा परिषद की बैठक समाप्त होने के बाद हमने पहली बार देखा कि दो देश (चीन और पाकिस्तान) अपने देश की राय को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की राय बताने की कोशिश कर रहे थे।” ऐसा पहली बार नहीं है जब उन्होंने भारत को सफलता दिलाई हो। इससे पहले वह पुलवामा हमले के बाद भी अमेरिकी टेलिवीजन चैनल के एंकर को लाजवाब जवाब दे चुके हैं। हाल ही में नौ जुलाई को यूएनएससी में बहस के दौरान उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना ही उसे धो दिया था। इस दौरान अकबरुद्दीन ने दाऊद इब्राहिम, लश्कर-ए-तैयबा की मदद करने के लिए पाकिस्तान को लताड़ लगाई थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि अकबरुद्दीन ऐसे शख्स हैं, जो पर्दे के पीछे काम करते हैं। उनकी इसी विशेषता के कारण उन्हें संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधि बनाया गया है।

एक अन्धेरी गुफा की कहानी

सुचेतना डे वे वेसर वेग़ल स्टेट यूनिवर्सिटी की शोध छात्रा हैं। कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। रंगमंच, अभिनय, संगीत और लेखन में रुचि है। वह जिन्दगी को ऊर्जा की तरह देखती हैं और मानती हैं कि आप जैसा सोचते हैं, आपकी जिन्दगी भी वैसी ही होगी। सुचेतना शायरी के नाम से लिखती हैं। वह अब आपसे करेंगी ‘बेखौैफ बातें’ जो जिन्दगी जीने का देगी सलीका –

समाज एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ अन्धेरा ज़्यादा और रोशनी कम है। सब जैसे हताश ,अकेले और सन्नाटे में जी रहे हैं। मुस्कुराहट मानो खो सी गयी है। न तो कोई किसी को वक्त दे रहा है और न ही किसी से बात करता है। सब जीती -जागती कठपुतलियों में बदल रहे हैं, जैसे हिम्मत हार चुके हैं। कई बार ज़िन्दगी बेज़ुबा हो जाती और हम बेगुनाह होकर उस गुनाह को ढोते है जिन्दगी भर।
इसी सोच को तो बदलना है । आज सबसे ज़्यादा युवा इसके बीच जी रहे हैं। उनमें जुनून है पर सही दिशा नहीं मिल पा रही है । गति, विधि, आहुति यह तीन आज त्रिकोण बन चुके हैं। न ये षटकोण पूजा है न कोई लकीर। ये एक सोच है सही मार्ग की तरफ। गति तभी सम्भव है जब इन्सान का मन शुद्ध हो। मन की शुद्दि सम्भव है सिर्फ अच्छी परवरिश और अच्छी परिवेश से। यहाँ जो माता- पिता, परम गुरु ,दोस्तों का बहुत बरा योगदान हैं। दूसरा है विधि, हर युवा आज मुकाम तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। वह सफल नही हो पा रहा। हताश हो रहा है । वे अपने आप को कमरे मे बंद कर रहे हैं । सबसे सम्बन्ध तोड़ रहे हैं, खुद को नशे की ओर धकेल रहे हैं और जब खुद को सम्भाल नहीं पा रहे हैं तो आत्महत्या कर रहे हैं। युवाओं की अपनी परेशानियाँ हैं और वजहें भी। वह दूसरों के लिए त्याग नहीं करना चाहता, अपने स्वार्थीपन की आहुति नहीं देना चाहता। वह खुद में गुम है। कभी प्रेमी या प्रेमिका के जाने का गम, कभी नौकरी न मिलने की चिन्ता और इन सबके बीच वह खुद को धकेलता है नशे की तरफ। सावधान होने की जरूरत है क्योंकि युवाओं में जज्बा और जाँबाजी, दोनों हैं जिससे आप एक नयी रोशनी की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। भरोसा रखिए अपनी चेतना पर। उमंग को दीजिये उड़ान। आपको जीनी है एक बेखौफ ज़िन्दगी। हाथ बढ़ाए और बस पार करते है एक साथ ये मुश्किल और वह भी होगी आसान –

‘ख़िलाफों को लिफाफों मे बंद रख/खयालों मे उमंग भर/ खयालातों को बदल /तू आगे बढ़ ।’

रंगमंच और छोटे परदे की कश्मकश में जूझता “निर्देशक”

जीतेन्द्र सिंह

हाल ही में प्रोसिनियम आर्ट सेंटर में यूनिवर्सल लिटिल थियेटर ने निर्देशक एम. एस.राशिद खान के निर्देशन में ‘निर्देशक’ नाम की नाट्य प्रस्तुति का प्रर्दशन किया गया। यह नाटक मुलतः गुजराती नाटक का अनुवाद है जिसे प्रीतम जानी ने लिखा था। आज से करीब चालीस साल पहले ,उस दौर में जब टेलीविजन का आगमन हुआ था, उस समय यह नाटक बहुत ही चर्चित हुआ था। यह वह समय था जब हर शहर से रंगमंच के अभिनेताओं का पलायन टीवी और फिल्मों की ओर शुरु हो गया था। नाटकों के प्रदर्शन पर असर पड़ने लगा था। उस समय के रंगमंच के कलाकारों के सामने प्रश्न उठाते हुए आज के रंगमंच के हालत पर गम्भीर मुद्दा उठाने की पुरजोर कोशिश करता है । नाटक की कहानी में एक उम्रदराज़ नाट्य निर्देशक रहता है जो नाटक के प्रति बहुत ही समर्पित है । यहाँ तक कि अपने परिवार तक को वह समय नहीं दे पाता। बेटे की कॉलेज फीस के रुपये भी नाटक के मंचन लगा देता है लेकिन इस बदले हुए समय में अब सिर्फ नास्टेल्जिया में जीने वाला जिदंगी से हार चुका कुफित व्यक्ति बनकर अभिनेताओं की खोज में बैठा हुआ है कि कोई आये और उसके साथ नाटक करे। एक नये अभिनेता को देख वह चहक उठता है । उस अभिनेता से अपना नाटक तैयार करवाता है । वही अभिनेता आज के दिन फिल्मों का चर्चित अभिनेता बन जाता है । बहुत दिनों बाद वह निर्देशक से मिलने एक दिन आता है और उसके साथ बातचीत के जरिए कभी फ्लैश-बैक कभी वर्तमान में इस नाटक का कथ्य प्रकट होता है लेकिन इस प्रस्तुति का यह द्वंद किसी तरह से उभर नहीं पाता बल्कि जनाब और सर के सम्बोधन में उलझ जाता है । दोनों अभिनेता डरे -डरे संवादों की अदायगी करते रहते है ,मानों ऐसा लगता है कि संवादों के रद्दोबदल से उसकी लय टूटती नजर आती है। दोनों अपने -अपने संवाद एवं मुवमेंट खोजने में लगे रहते है। प्रस्तुति को देखते हुए लगता है कि जैसे निर्देशक का नाट्य कथ्य और अपने कलाकारों पर कोई नियंत्रण ही नहीं रहा जबकि मो.एस.एम.राशिद कोलकाता के जाने माने अभिनेता और निर्देशकों में शुमार होते है । इस नाटक की विषय वस्तु में बड़ी नाटकीयता थी और अच्छे कलाकार भी थे। इस नाटक में मुख्य भूमिका प्रताप जायसवाल ने निर्देशक रुप में और अभिनेता के रूप में प्रतीक पटवारी ने निभायी है। निर्देशक के बेटे के एक छोटे से चरित्र में उबैर अहमद आते हैं और अपनी अदायगी से दर्शकों को मुग्ध कर चले जाते हैं। आजकल कोलकाता की हिन्दी नाट्य संस्थाओं में कुछेक नाट्य संस्थाओं को छोड़कर ज्यादातर संस्थाओं की प्रस्तुतियों को देखते हुए लगता है कि उनके निर्देशक ,अभिनेता, संगीत, प्रकाश -व्यवस्था, परिधान और रुप- सज्जा के महत्व को नहीं समझ पा रहे या उसे महत्त्व नहीं देना चाहते हैं । उन्हें यह बात समझनी होगी कि यह सभी किसी भी प्रस्तुति के लिए एक महत्वपूर्ण अंग होते हैं।

(समीक्षक वरिष्ठ नाट्यकर्मी हैं)
Mo.No.9830881661
[email protected]

पटना में नीलांबर कोलकाता ने छोड़ी छाप

पटना : प्रतिरोध का सिनेमा ने कविता गोष्ठी और फिल्म प्रदर्शन पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में जिन कवियों ने कविता पाठ किया वे थे-बालमुकुंद,उत्कर्ष,रघुनाथ मुखिया (पटना से),अनिला राखेचा,शैलेश गुप्ता,रौनक अफरोज,आशा पांडेय,यतीश कुमार (नीलांबर कोलकाता से)। इस कार्यक्रम में कोलकाता से आमंत्रित टीम नीलांबर ने मुक्तिबोध की कविता ‘भूल गलती’,और नरेश सक्सेना की कविता ‘गिरना’ पर वीडियो मोंताज प्रस्तुत किया जिसकी आवृत्ति क्रमशः ममता पांडेय एवं स्मिता गोयल ने की थी। नीलांबर ने तीन साहित्यिक फिल्मों -गोष्ठी (विनोद कुमार शुक्ल),अनथाही गहराइयाँ (मन्नू भंडारी),ज़मीन अपनी तो थी (चंदन पांडेय) का प्रदर्शन किया।इन फिल्मों का निर्देशन ऋतेश पांडेय ने किया है। फिल्मों की प्रस्तुति के बाद निर्देशक के साथ दर्शकों की बातचीत भी हुई। कार्यक्रम में पटना के दर्शकों के अतिरिक्त कई गण्यमान्य व्यक्तियों ने शिरकत की जिनमें अविनाश दास (निर्देशक -अनारकली ऑफ आरा), संतोष दीक्षित, प्रभात सरसीज , संजय कुमार कुंदन , अँचित ,प्रत्युष मिश्र, नरेंद्र कुमार , सदफ इक़बाल, प्रशांत विप्लवी ,श्रीधर करुणानिधि ,सुशील कुमार भारद्वाज,संतोष संहार ,प्रीति प्रभा ,अरुण शीतांश,नताशा उपस्थित थे।फिल्मों पर बातचीत के क्रम में अविनाश दास ने कहा कि नीलांबर का यह प्रयास मुम्बई के पूंजीवादी दबाव को आईना दिखाने की तरह है। अध्यक्ष (नीलांबर कोलकाता) यतीश कुमार ने नीलांबर के बारे में एवं कुमुद कुंदन (प्रतिरोध का सिनेमा ) ने अपनी संस्था और इस कार्यक्रम के उद्देश्य के बारे में बताया। कार्यक्रम का संचालन राजेश कमल और ममता पांडेय ने किया।धन्यवाद ज्ञापन संतोष झा ने किया।

“एक विद्यार्थी एक पेड़” जागरूकता अभियान : भवानीपुर कॉलेज की महत्वपूर्ण पहल 

कोलकाता : भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेज के विद्यार्थियों को पेड़ लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया जो कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह की परिकल्पना रही ।” एक विद्यार्थी एक पेड़ “परियोजना में ग्यारह हजार फलदायी पेड़ों को लगवाने के लिए सुंदर बन बाली द्वीप 2 के स्थान को चुना गया। यहाँ प्रकृति के साथ- साथ मनुष्य जीवन भी कष्ट दायक है।जल क्षरण और प्रदूषण रोकने के लिए भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों ने फलदायी पेड़ों को वहाँ जा कर लगाया। सस्टेनेबल ग्रीन प्लेनटेशन, एनजीओ और सुंदरवन ग्रीन स्पेनडर के सहयोग से भवानीपुर कॉलेज की पहल पर ग्यारह हजार फलदायी पेड़ों को लगाने का कारण कॉमर्शियल यानी व्यावसायिक स्तर पर लाभ पहुँचाना है। पौधों के संरक्षण और जैव विविधता के संदर्भ में वृक्षारोपण सुंदरवन के स्थानीय लोगों में चेतना फैलाना है। वृक्षारोपण से जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को भी रोकने में महत्वपूर्ण कदम है। चार फीट ऊँचे होने पर पेड़ों में फल लग जाएंगे और आने वाले चार साल में सुंदरवन के निवासी और परिवार लाभान्वित होंगे । वहाँ की पारंपरिक खेती के साथ साथ स्थानीय निवासियों की आय में वृद्धि होगी।
भवानीपुर कॉलेज की टीम ने गत ग्यारह अगस्त को इस बड़े कार्यक्रम को आयोजित किया। इसमें नब्बे शिक्षक- शिक्षिकाओं , विद्यार्थियों के साथ रोटरी कलकत्ता विक्टोरिया और रोटरेक्ट क्लब विक्टोरिया का सहयोग रहा। स्नातकऔर स्नातकोत्तर के विद्यार्थी, एन एस एस के सत्तर से अधिक छात्र – छात्रा,स्थानीय हाईस्कूल के पाँच सौ विद्यार्थी और स्थानीय किसानों ने पेड़ लगाने के लिए सहयोग दिया। अनिल मिस्त्री और प्रदीप शुक्ला ने कार्यक्रम का संयोजन किया । सभा को संबोधित करते हुए टीचर इन चार्ज डॉ. सुचंद्रा चक्रवर्ती ने पेड़ और पर्यावरण संरक्षण के अटूट संबंध के विषय में जानकारी दी। कॉलेज के विद्यार्थियों ने स्थानीय स्तर पर स्कूल के विद्यार्थियों और वहाँ के निवासियों से बातचीत की जिससे शहरी विद्यार्थी अनभिज्ञ रहते हैं। फलदायी पेड़ लगाने से एक ओर मिश्रित वृक्षारोपण से वनीकरण होगा और दूसरी ओर ग्लोबल वार्मिंग का प्रतिरोध होगा जो पर्यावरण मित्रता का प्रतीक है।
बड़े पैमाने पर इस प्रकार पेड़ लगाने के महनीय कार्य में प्रत्येक विद्यार्थी ने एक पेड़ में अपना नाम लिख कर पौधा लगाया और पानी से सींचा। सोहिला, नंदिनी, डॉ दिव्येष शाह, प्रो. आत्रैय आदि शिक्षकों ने विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया। भविष्य में सुंदरवन का पर्यावरण संरक्षित रहे और भारत की वनसंपदा सुरक्षित रहे हमें जमीनी स्तर पर पहुंच कर बच्चों को और लोगों को जागरूक कराने के लिए भवानीपुर कॉलेज ने कदम उठाकर एक अच्छी पहल की । डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश राष्ट्रपति को समर्पित

कोलकाता/नयी दिल्ली :  गत 16 अगस्त को राष्ट्रपति भवन में भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित हिन्दी की उपलब्धि ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद को अर्पित किया गया। प्रधान संपादक डॉ.शंभुनाथ और परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने उन्हें यह प्रदान किया। भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने ज्ञानकोश देखकर प्रसन्नता व्यक्त की। इस अवसर पर समाजसेवी विवेक गुप्ता, परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार, वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्‍वरी और अदिति माहेश्‍वरी उपस्थित थे। इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष कुसुम खेमानी ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के द्वारा ज्ञानकोश सहर्ष स्वीकार करना हमारे लिए एक ऐतिहासिक घटना है। डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि हमने देश के हिन्दी संसार और भारतीय भाषा परिषद की ओर से यह ज्ञानकोश आज भारतीय राष्ट्र को अर्पित किया है ताकि भावी पीढ़ी इसकी नींव पर ज्ञान की अधिक बड़ी इमारत बना सके। गौरतलब है कि भारतीय भाषा परिषद में लगभग पाँच वर्षों की मेहनत और देशभर के लगभग 300 लेखकों के सहयोग से यह ज्ञानकोश निर्मित और प्रकाशित हुआ है जिसका देशभर में स्वागत हो रहा है। 4560 पृष्ठों के इस कोश में हिन्दी साहित्य से संबंधित इतिहास, साहित्य सिद्धांत आदि के अलावा समाज विज्ञान, धर्म, भारतीय संस्कृति, मानवाधिकार, पौराणिक चरित्र, पर्यावरण, पश्‍चिमी सिद्धांतकार, अनुवाद सिद्धांत, नवजागरण, वैश्‍वीकरण, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श आदि कुल 32 विषय हैं। इसमें हिन्दी क्षेत्र की 48 लोक भाषाओं और कला-संस्कृति पर सामग्री भी है। इस ज्ञानकोश के निर्माण में संपादक मंडल के सदस्य राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह, अवधेश प्रसाद सिंह और राजकिशोर जैसे ख्याति प्राप्त विद्वानों शामिल हैं। इस ग्रंथ का मुद्रण हिंदी दैनिक सन्मार्ग के सहयोग से हुआ है।

क्योंकि हर दिन आजादी के नाम होना चाहिए

कोलकाता :  आजादी की खुशी एक अलग तरीके से भी मनायी जा सकती है। हाल ही में द सिटिजन टाइम्स न्यूज पोर्टल ने बेस्ट फ्रेंड्स सोसायटी इस दिन को कुछ ऐसा ही अलग अन्दाज दिया। इस मौके पर दुर्वार महिला समन्वय समिति के सहयोग ये 50 लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन व दाल के पैकेट वितरित किये गये। द सिटिजन टाइम्स की सीईओ पायल तथा सम्पादक शगुफ्ता हनाफी के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में कवियित्री सुचेतना डे तथा अपराजिता की संस्थापक व सम्पादक सुषमा कनुप्रिया भी उपस्थित थीं। अतिथियों ने इनको राखी भी बाँधी। टीसीटी की सम्पादक शगुफ्ता हनाफी ने बताया कि रेडलाइट इलाकों को उन्नत करने के लिए शिक्षा ही काफी नहीं है बल्कि स्किल यानी कौशल का होना भी जरूरी है। योजना इस इलाके के युवाओं को पत्रकार के रूप में चयन करने की है और यह प्रशिक्षण शीघ्र ही आरम्भ होगा।