Saturday, April 25, 2026
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दो साल में दोगुनी हुई हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वाली महिलाओं की संख्या

वित्त वर्ष 2018-19 में हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वालों में महिलाओं की संख्या 19% हो गयी है
वित्त वर्ष 2016-17 तक यह आँकड़ा सिर्फ 9% ही था
भारत में महिलाएं भी पहले की तुलना इंश्योरेंस के प्रति अधिक जागरूक हुई हैं। पॉलिसी बाजार की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 में भारत में हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वालों में महिलाओं की संख्या 19% हो गई है। 2016-17 तक यह आंकड़ा सिर्फ 9% ही था। रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं हेल्थ इंश्योरेंस ले रही हैं, उनमें हर 10 में से 6 महिलाएं 5 लाख रुपये से ज्यादा का सम इंश्योर्ड चुनती हैं। भारत के 15 राज्यों की 10 हजार महिलाओं से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गयी है। 2018-19 में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी की प्रस्तावक के रूप में महिलाओं की संख्या 2017-18 की तुलना में 57% बढ़ी है। पांच से 10 रुपये सम इंश्योर्ड वाले हेल्थ प्लान की बिक्री 2018-19 में 80% बढ़ी है। वहीं, 10 लाख रुपए से अधिक सम इंश्योर्ड वाली पॉलिसी की बुकिंग 61% बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पॉलिसी खरीदने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ने का साफ मतलब है कि वे अब वित्तीय फैसला लेने में ज्यादा सक्षम हो रही हैं।
सबसे ज्यादा 25 से 45 वर्ष की उम्र की महिलाएं खरीदती है हेल्थ प्लान
महिला पॉलिसीधारकों की उम्र की बात करें तो सर्वे में यह देखने मिलता है कि हेल्थ प्लान खरीदने वाली महिलाओं की एक बड़ी संख्या (सर्वे में शामिल महिलाओं का दो तिहाई हिस्सा) 25 से 45 वर्ष की उम्र के बीच आती हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि महिलाएं अब अपने करियर के शुरुआती वर्षों में ही बीमारियों के लिए सुरक्षा हासिल करने को प्राथमिकता देने लगी हैं।

मीनाक्षी मंदिर / 3500 साल पुराना है यहां का गर्भगृह, भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है ये मंदिर

तमिलनाडु के मदुरई शहर में मीनाक्षी मंदिर है। यह मंदिर अपनी बनावट की वजह से दुनियाभर में मशहूर है। यहां का गर्भगृह लगभग 3500 साल पुराना माना जाता है। ये मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव सुंदरेश्वर के रूप में देवी पार्वती (मीनाक्षी) से विवाह करने के लिए पृथ्वी पर यहां आए थे। मंदिर उसी जगह स्थित है।
करीब 45 एकड़ में फैला है ये मंदिर
यहां के विशाल प्रांगण में सुंदरेश्वर (शिव मंदिर समूह) तथा बाईं ओर मीनाक्षी देवी का मंदिर है। शिव मंदिर समूह में भगवान शिव की नटराज मुद्रा में आकर्षक प्रतिमा है। यह प्रतिमा एक रजत वेदी पर स्थित है। बाहर अनेक शिल्प आकृतियां हैं, जो केवल एक-एक पत्थर पर निर्मित हैं, साथ ही गणेशजी का मंदिर है। 45 एकड़ में फैले इस मंदिर के सबसे छोटे गुंबद की ऊंचाई 160 फीट है। दो मुख्य मंदिरों सुंदरेश्वर और मीनाक्षी के अलावा भी कई दूसरे मंदिर हैं, जहां भगवान गणेश, मुरूगन, लक्ष्मी, रूक्मणी, सरस्वती देवी की पूजा होती है।
बना है सोने का कमल
मंदिर में एक तालाब भी है ‘पोर्थ मराई कुलम’ जिसका मतलब होता है सोने के कमल वाला तालाब। सोने का 165 फीट लंबा और 120 फीट चौड़ा कमल बिल्कुल तालाब के बीचों-बीच बना हुआ है। भक्तों का मानना है कि इस तालाब में भगवान शिव का निवास है। मंदिर के अंदर खंभों पर भगवान शिव की पौराणिक कथाएं लिखी हुई हैं और आठ खंभों पर देवी लक्ष्मी जी की मूर्ति बनी हुई है। इसके अलावा यहां एक बहुत ही बड़ा और सुंदर हाल है, जिसमें 1000 खंभे लगे हुए हैं। इन खंभों पर शेर और हाथी बने हुए हैं।
170 फीट ऊंचा है गोपुरम
मंदिर में अंदर जाने के लिए 4 मुख्य द्वार (गोपुरम) हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं। मंदिर में कुल 14 गोपुरम हैं। इनमें 170 फीट का 9 मंजिला दक्षिणी गोपुरम सबसे ऊंचा है। इन सभी गोपुरम में विभिन्न देवी-देवताओं एवं गंधर्वों की सुंदर आकृतियां बनी हैं। प्रति शुक्रवार को मीनाक्षीदेवी तथा सुंदरेश्वर भगवान की स्वर्ण प्रतिमाओं को झूले में झुलाते हैं, जिसके दर्शन के लिए हजारों की संख्या में भक्तगण उपस्थित रहते हैं।

8 साल की बच्ची ने दो वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए, 20 मिनट में 350 टाइल्स तोड़ीं

हैदराबाद : हैदराबाद की 8 साल की पीडीवी सहरुदा ने शनिवार को दो वर्ल्ड रिकॉर्ड्स बनाए। सहरुदा के इस कारनामे को एलीट वर्ल्ड रिकॉर्ड्स एलएलसी यूएसए ने मान्यता दी है। सहरुदा ने 20 मिनट में ही 102 ऑरिगेमी मॉडल बनाए और इतने ही समय में 350 सिरेमिक टाइल्स तोड़ीं। इससे पहले यह रिकॉर्ड नॉर्थ कोरिया की एक महिला खिलाड़ी के नाम था जिसने 20 मिनट में 262 टाइल्स तोड़ी थीं। सहरुदा के मुताबिक, मैं तीन विश्व रिकॉर्ड बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन दो ही बना पाई। मैंने कई राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़े। पिछले एक साल से कराटे सीख रही हूं और अब तक ग्रीन बेल्ट ले चुकी हूं। सिरेमिक टाइल वाले इवेंट के लिए मैं अपनी ट्रेनर के साथ 5 मिलीमीटर मोटी टाइल तोड़ने की प्रैक्टिस कर रही थी।
लड़कियों और महिलाओं को ट्रेंड करना मकसद
सहरुदा की ट्रेनर अश्विनी आनंद ने बताया, मैंने 2017 के डब्ल्यूकेयू वर्ल्ड चैंपियन में सेकंड डिग्री ब्लैक बेल्ट हासिल किया है। मेरा मकसद ज्यादा से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं को ट्रेंड करना है। सहरुदा की अभी शुरुआत है। सहरुदा विश्व चैंपियनशिप और दूसरी प्रतियोगिताओं के लिए तैयारी कर रही है। आशा है, आने वाले समय में सेल्फ डिफेंस हर बच्चे के लिए महत्वपूर्ण हो जाएगा।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी का 91 की उम्र में निधन

भोपाल : मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी का रविवार सुबह निधन हो गया। वे 91 साल के थे। जोशी करीब तीन साल से बीमार थे, उन्होंने भोपाल के निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनका जन्म 14 जुलाई 1929 को देवास जिले की हाटपीपल्या तहसील में हुआ था। वे 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद ही उसके सदस्य बन गए थे। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। कैलाश जोशी के निधन पर प्रदेश में एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है। कैलाश जोशी 1954 से 1960 तक देवास जिले में जनसंघ के मंत्री रहे। 1955 में वह हाटपीपल्‍या नगरपालिका के अध्‍यक्ष बने। 1962 से लगातार 7 विधानसभा चुनाव बागली सीट से जीते। 1980 में भाजपा के गठन के बाद प्रदेश अध्यक्ष बने और 1984 तक इस पद पर रहे।
आपातकाल हटने के बाद मध्य प्रदेश के सीएम बने थे
1977 में देश से इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह पराजित होना पड़ा था। मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने देश की सभी कांग्रेस सरकारों को बर्खास्त करा दिया था। तब मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। कई विपक्षी दलों के विलय के बाद प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता पार्टी ने 320 में 231 सीटें जीतीं। तब कैलाश जोशी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इससे पहले वे 1972 से 1977 तक नेता प्रतिपक्ष रहे थे।

1 दिसम्बर से एनएचएआई के 520 टोल प्लाजा पर फास्टैग अनिवार्य 

कम होगा 20 प्रतिशत प्रदूषण
सालभर में 75 हजार करोड़ रु. का ईंधन भी बचेगा
फास्टैग से रोज 70 लाख वाहन चालकों के 3.50 लाख घंटे बचेंगे
नयी दिल्ली : 1 दिसंबर से नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के 520 टोल पर फास्टैग शुरू हो जाएगा। इससे यहां से गुजरने वाले करीब 70 लाख वाहन चालकों के रोजाना करीब 3.50 लाख घंटे बचेंगे। इसके अलावा हर साल करीब 75 हजार करोड़ रुपए का ईंधन भी बचेगा और प्रदूषण में 20% की कमी आएगी। देशभर में एनएचएआई के 537 टोल हैं, इनमें से 17 चालू नहीं हो पाए हैं। इस तरह से 520 में एक लेन एकदम बाएं को छोड़कर सभी पर फास्टैग शुरू होने जा रहा है। इसी लेन से बगैर फास्टैग वाले वाहन यानी कैश देने वाले जाएंगे। चूंकि केवल एक ही लेन कैश की होगी, इसलिए लंबी कतार लगना तय है। टोल पर प्रति वाहन औसतन समय 4 मिनट लगता है। इस तरह 4.66 लाख घंटे रोजाना टोल पर बर्बाद हो रहे हैं। फास्टैग के बाद यह समय एक चौथाई यानी करीब 1 मिनट रह जाएगा। 70 लाख वाहनों का तीन-तीन मिनट का समय बचेगा। आॅल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एसके मित्तल ने बताया कि टोल पर लगने वाले जाम से हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपए का ईंधन बर्बाद होता है। फास्टैग से एक चौथाई समय लगने से बर्बादी भी घटकर 25 हजार करोड़ रुपए की रह जाएगी। इस तरह करीब 75 हजार करोड़ रुपए की बचत होगी। 30 नवंबर तक एनएचएआई द्वारा फास्टैग फ्री में उपलब्ध कराए जा रहे हैं और डेढ़ सौ रुपए का रिचार्ज किया जा रहा है। इसके अलावा फास्टैग से भुगतान करने पर 2.5% कैशबैक मिलेगा।
टोल से सालभर में 30 हजार करोड़ रु. वसूलेंगे
देश में नेशनल हाईवे की लंबाई 1.40 लाख किमी है।
अभी 24, 996 किमी हाईवे मेंं लिया जा रहा है टोल टैक्स।
अब तक 66,19055 फास्टैग जारी किए जा चुके हैं।
चार पहिया और बस-ट्रक के लिए अलग-अलग फास्टैग हैं।
बगैर फास्टैग वाली गाड़ी अगर फास्टैग की लाइन में आती है तो दोगुना टोल लिया जाएगा।
एक साल में 24.396 हजार करोड़ टैक्स वसूला जा रहा है। टारगेट 30 हजार करोड़ रु. का है।
इन राज्यों के टोल प्लाजा में भी शुरू हो जाएगा फास्टैग
सड़क परिवहन मंत्रालय का कई राज्यों के साथ समझौता हुआ है। इसके तहत यहां के कुछ टोल पर 1 दिसंबर से फास्टैग शुरू किया जा रहा है। इनमें मप्र, उप्र, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र शामिल है। राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, तमिलनाडु और पंजाब में भी जल्द शुरू होगा।

चूहों के बनाए बिलों से नहर टूटी, किसानों ने 45 मिनट में बांधकर बचाया गाँव

3 मुरब्बा कृषि भूमि जलमग्न, बांडा कॉलोनी के दो घरों में घुसा पानी, समय रहते कटाव बांधा

अनूपगढ़ : क्षेत्र में गुरुवार शाम को इंदिरा गांधी नहर परियोजना की सूरतगढ़ शाखा की एलएसएम वितरिका में करीब 15 फुट कटाव आने से 3 मुरब्बा कृषि भूमि जलमग्न हो गई और बांडा कॉलोनी के 2 घरों में पानी घुसने से नुकसान हो गया। खास बात यह है कि कटाव की सूचना मिलते ही किसानों ने एकजुटता दिखाई और कटाव 45 मिनट में बांध दिया अगर कटाव समय पर नहीं बांध जाता तो पूरा गांव में नहर का पानी आ जाता। किसानों की इस सूझबूझ और तत्परता से 1 एलएसएम (बांडा कॉलोनी) गांव डूबने से बच गया। बांडा गांव में जा रहा था नहरी पानी, सूचना मिलते ही सारे किसान मौके पर पहुंचे
गाँव से ही 3 जेसीबी मँगवाई, मिट्‌टी और सीमेंट के कट्‌टे से कटाव भरा…नहीं से हो जाता बड़ा नुकसान
शाम 7:12 बजे सूचना आई कि नहर में करीब एलएसएम वितरिका में करीब 15 फुट का कटाव आ गया। सूचना मिलते ही बांडा कॉलोनी के किसान व ग्रामीण मिट्‌टी के खाली कट्‌टे लेकर मौके पर पहुंचे और खेत से मिट्‌टी खोद-खोद कर नहर में आए कटाव को बांधने की कोशिश की। कटाव इतना था कि नहरी पानी गाँव की ओर बढ़ रहा था। फिर हमने इसकी सूचना सिंचाई विभाग और प्रशासन को दी। एसडीएम पवन कुमार, सहायक अभियंता सांवरमल मीणा, कनिष्ठ अभियंता भेराराम गोदारा मौके पर पहुंचे। उन्होंने मिट्‌टी पाटने के लिए तुरंत 3 जेसीबी मौके पर मंगवाई। जेसीबी आने से काफी राहत मिली। फिर हम सब एकजुट होकर कटाव भरने लगे। करीब 45 मिनट में कटाव भर दिया। अगर समय रहते कटाव नहीं भरा जाता तो पूरे गाँव में पानी भर जाता। इससे ग्रामीणों व किसानों का काफी नुकसान हो जाता। आज ग्रामीणों के एकजुटता व प्रशासन की समझदारी के कारण बड़ा हादसा बचा।
नहर में कटाव की सूचना मिलते ही हम तुरंत घटनास्थल पर पहुँच गए। वहाँ पर किसान पहले से ही मिट्‌टी के कट्‌टे भर कटाव को बांधने की कोशिश में जुटे हुए थे। भारत माला प्रोजेक्ट के तहत गांव में काम चल रहा था। जिस पर मिट्‌टी खोदने के लिए मैंने 3 जेसीबी मौके पर बुलाई और मिट्‌टी खोदने का काम शुरू करवाया। ग्रामीणों के सहयोग से करीब 45 मिनट में कटाव को बांधा गया। देर रात तक हमारी टीम मौके पर मौजूद रही। रात को दुबारा कटाव न आए इसके लिए जेसीबी मशीनों को मौके पर छोड़ा गया है।

रंगकर्मी व अभिनेत्री शौकत कैफी का निधन

बेटी हैं अभिनेत्री शबाना आजमी

मुम्बई : अभिनेत्री शबाना आजमी की मां शौकत कैफी (90) का  निधन हो गया। परिवारजन ने बताया कि शौकत काफी समय से बीमार थीं और उन्होंने अपनी बेटी शबाना की बाहों में आखिरी सांस ली। मशहूर शायर कैफी आजमी की पत्नी को लोग प्यार से शौकत आपा कहकर बुलाते थे। शौकत ने मुज्जफर अली की फिल्म ‘उमराव जान’, एमएस साथ्यु की ‘गरम हवा’ और सागर साथाडी की फिल्म ‘बाजार’ में यादगार भूमिकाएं निभाईं। शौकत आखिरी बार फिल्म ‘साथिया’ (2002) में नजर आईं थीं, जिसमें उन्होंने बुआ का रोल निभाया था। शौकत ने कैफी के साथ मिलकर इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा), प्रोग्रसिव एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की कल्चरल विंग के लिए लम्बे अरसे तक काम किया।

‘कैफी और मैं’ शौकत और कैफी की प्रेमकथा से

शौकत और कैफी की प्रेमकथा और उनके संस्मरणों की किताब ‘कैफी और मैं’ बहुत मशहूर है। बेटी शबाना ने अपने पति जावेद अख्तर के साथ मिलकर इसका थिएटरों में प्रभावी मंचन किया है। इसमें शबाना ने शौकत की जिंदगी और जावेद अख्तर ने कैफी के किरदार को अपने लफ्जों में पिरोया है।

शौकत आपा के किस्से बेटी शबाना की जुबानी:- 50 रुपए और टूटी चप्पल: मां और पिता को याद करते हुए शबाना आजमी ने बीत साल एक कार्यक्रम में 40 रुपए का बड़ा दिलचस्प किस्सा सुनाया था। शबाना ने बताया था कि उनके अब्बा के पास जो भी कमाई होती थी, वे उसे कम्युनिस्ट पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए दे देते थे और अपने पास खर्च के लिए सिर्फ 40 रुपए रखते थे। हमारे स्कूल की फीस ही 30 रुपए लग जाती थी। पैसों की तंगी रहती थी। मम्मी ने घर चलाने के लिए ऑल इंडिया रेडियो में काम किया और फिर पृथ्वी थिएटर से भी जुड़ीं। एक बार की बात है मम्मी को कहीं टूर पर जाना था और उनकी चप्पल टूट गई। उन्होंने गुस्से में अब्बा से कहा कि हमेशा कहते हो कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, अब मैं क्या करूं? अब्बा ने चप्पल ली। उसे आस्तीन में छिपाकर ले गए और जब वापस लौटे, तो हाथ में मरम्मत की हुई चप्पल के साथ 50 रुपए भी थे। अम्मी खुश हो गईं और चली गईं। बाद में पता चला कि अब्बा ने अम्मी के एक कार्यक्रम के आयोजकों से उनका ही मेहनताना एडवांस में लाकर उनके हाथ में दे दिया था।

मम्मी चाय की प्याली और अब्बा की नज्म: 2018 में भाेपाल में ‘कैफी और मैं’ प्ले के 200वें शो का ऐतिहासिक मंचन हुआ। इस मौके पर शबाना ने शौकत के किरदार को आवाज देते हुए उनकी लव स्टोरी को इस तरह याद किया – हर रोज सुबह होती है चिड़िया चहचहाती हैं, कभी बादल गरजता है, कभी बारिश की फुहार बरामदे में अंदर आ जाती है। रोज की तरह हमारा मुलाजिम विनोद मेज पर चाय की ट्रे लाकर रख देता है, लेकिन सामने की कुर्सी खाली है, उस पर मेरे कैफी नहीं, जो मेरे हाथ की बनी हुई चाय की प्याली के इंतजार में अपनी कमजोरी के बावजूद कुर्सी पर आकर बैठ जाते थे। अपने कांपते हाथ से चाय की प्याली लेकर मुझे ऐसे देखते कि जैसे चाय नहीं अमृत पी रहे हों। तमाम दिन में यही लम्हें मेरे सबसे खूबसूरत और पुरसुकून लम्हे होते थे।

बेटियों के पिता लंबी उम्र जीते हैं, हर बेटी के पैदा होने पर 74 हफ्ते उम्र बढ़ जाती है

पोलैंड की जेगीलोनियन यूनिवर्सिटी के शोध में किया गया दावा, बेटा होने पर पुरुषों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़त
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में 4310 लोंगों का डेटा लिया, इसमें 2147 माताएं और 2163 पिता थे

वारसा : माता-पिता की जिंदगी खुशियों से भर देने के साथ बेटियां पिता की जिंदगी के कुछ और साल भी बढ़ा देती हैं। पोलैंड की जेगीलोनियन यूनिवर्सिटी के अध्ययन में दावा किया है कि बेटियों के पिता उन लोगों के मुकाबले लंबी उम्र जीते हैं, जिनके यहां बेटियां नहीं होती। अध्ययन में पता चला कि बेटा होने का तो पुरुष की सेहत या उम्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन बेटी होने पर पिता की उम्र 74 हफ्ते बढ़ जाती है। पिता के यहां जितनी ज्यादा लड़कियां होती हैं, वे उतनी लंबी उम्र जीते हैं। यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने बच्चों का पिता की सेहत और उम्र पर असर जानने के लिए 4310 लोंगों का डेटा लिया। इसमें 2147 माताएं और 2163 पिता थे। शोधकर्ताओं का दावा है, यह अपनी तरह का पहला ऐसा शोध हैं। इससे पहले बच्चों के पैदा होने पर मां की सेहत और उम्र को लेकर अध्ययन हुए हैं।
बेटा-बेटी का माँ की सेहत पर नकारात्मक असर
यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता के मुताबिक, बेटियों की बजाय बेटों को प्राथमिकता देने वाले पिता अपनी जिंदगी के कुछ साल खुद ही कम कर लेते हैं। बेटी का पैदा होना पिता के लिए तो अच्छी खबर है, लेकिन मां के लिए नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे पहले हुए अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन बायोलॉजी के एक अध्ययन में कहा गया था कि बेटे और बेटी दोनों का मां की सेहत पर नकारात्मक असर पड़ता है जिससे उनकी उम्र कम होती है।
पहले हुए शोध में ऐसे भी दावे
इससे पहले हुए एक अन्य अध्ययन में अविवाहित महिलाओं के शादीशुदा के मुकाबले ज्यादा खुश रहने की बात सामने आई थी। हालांकि एक और शोध में यह बात भी सामने आई थी कि बच्चे होने के बाद मां और बाप दोनों की उम्र बढ़ जाती है। इस अध्ययन में 14 साल तक का डेटा लिया गया था और पता चला था कि बच्चों के साथ रहने वाले कपल्स बिना बच्चों वाले कपल्स के मुकाबले ज्यादा खुश और लंबी उम्र जीते हैं।

ऑफिस से ब्रेक लेने के लिए तबीयत खराब होने का बहाना सबसे लोकप्रिय

हर 5 में से 2 कर्मचारी ऐसा करते हैं
ब्रिटेन में किए गए सर्वे में कर्मचारियों ने छोटे-छोटे झूठ बोलकर छुट्‌टी लेने की बात स्वीकारी
जूनियर कर्मचारी सीनियर्स की तुलना में अधिक झूठ बोलते हैं और महिलाओं का ज्यादा साथ देते हैं
सर्वे में 3655 से पूछताछ की गयी; इनमें से 66% सहयोगी कर्मचारियों को पता था कि छुट्‌टी लेने वाला बीमार नहीं है

नयी दिल्ली : ब्रिटेन में कर्मचारी अपने बॉस से बीमारी के छोटे-छोटे झूठ बोलकर छुट्‌टी लेते हैं। हर पांच में से दो कर्मचारी ऐसा करते हैं। यह खुलासा बीबीसी के सर्वे में हुआ है। सर्वे में जब कर्मचारियों की नैतिकता और मूल्यों पर सवाल उठाया गया, तो उन्होंने बीमारी के बारे में झूठ बोलने, चोरी करने और अन्य लोगों के काम का श्रेय लेने की बात स्वीकार की। ब्रिटेन के ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, एक कर्मचारी साल में लगभग चार दिन की सिक लीव लेता है। साल 2018 में ऑफिस न आने के लिए कर्मचारियों ने सबसे आम कारण सामान्य सर्दी, मस्कुलोस्केलेटल समस्याएं (जैसे पीठ दर्द) और दिमागी थकावट जैसी बीमारियां बताई थीं। जूनियर कर्मचारी सीनियर्स की तुलना में अधिक झूठ बोलते हैं। हालांकि, वे सहयोगियों का साथ देने के लिए भी ज्यादा तैयार होते हैं। रिपोर्ट में यह बात भी उजागर हुई कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में दूसरे के काम की प्रशंसा खुद ले लेने की प्रवृत्ति दोगुनी पाई जाती है। सर्वे में शामिल एक तिहाई सदस्यों ने यह भी बताया कि उन्होंने ऑफिस से स्टेपलर और नोटबुक जैसी छोटी-छोटी चीजें भी चुराईं। 16 साल से अधिक उम्र के 3655 वयस्कों से पूछताछ के आधार पर सर्वे रिपोर्ट तैयार की गई है। सर्वे में पाया गया कि 66% कर्मचारी बॉस को उनके सहकर्मी के बीमार न होने के बाद भी गैरहाजिर रहने की जानकारी को छुपाते हैं।

कम्पनी नहीं, लोग बॉस को अलविदा कहते हैं
एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक हेले लुईस ने बताया कि अक्सर कर्मचारी ऐसा अपने बॉस को यह जताने के लिए बीमारी का बहाना बनाते हैं कि उन्हें एक ब्रेक की आवश्यकता है। यदि उनके बॉस से संबंध खराब है, तब कर्मचारी कम ही सच बताते हैं। लुईस कहती है कि लोग किसी कम्पनी को नहीं छोड़ते हैं बल्कि वे अपने बॉस को अलविदा कहते हैं। कर्मचारी अपने बॉस के व्यवहार से भी प्रभावित हो सकते हैं।
नाराजगी से बचने के लिए बहाना
हेले लुईस के मुताबिक, कर्मचारी किसी मॉडल की तरह अपने बॉस को फॉलो करते हैं। यदि बॉस ब्रेक नहीं ले रहा है और वह लंच टाइम में भी अपने टेबल पर ही भोजन कर रहा है तो यह जताने की कोशिश है कि बाकी कर्मचारी भी बॉस को फॉलो करें। इससे कर्मचारी बॉस के हिसाब से काम करने लगते हैं। लेकिन जब उसे ब्रेक लेने की इच्छा होती है तो उसे बॉस की नाराजगी से बचने के लिए बहाना बनाना पड़ता है।
55 से अधिक उम्र वाले कर्मचारी कम साथ देते हैं
ऑफिस में पुरुष बॉस यदि महिला कर्मचारी को गलत तरीके से छू रहा है तो 34 से कम उम्र वाले कर्मचारी बुजुर्ग कर्मचारी की तुलना में दोगुना विरोध करते हैं। यदि सीनियर व्यक्ति युवा सहकर्मी पर यौन टिप्पणी कर दे तो 70 प्रतिशत युवा महिला के साथ खड़े हो जाएंगे। जबकि 55 की उम्र पार करने वाले कर्मचारियों में आधे से भी कम महिला सम्मान के लिए साथ दे पाते हैं।

एक दूसरे को सशक्त बनातीं कोलकाता की यह माँ – बेटी की जोड़ी

कोलकाता : सशक्त होने का मतलब है कि आप दूसरों को भी सशक्त बनायें और अपने लक्ष्य के प्रति हर परिस्थिति में अडिग रहें। महुआ बनर्जी ऐसी ही महिला हैं जिन्होंने तमाम विरोधों को सहते हुए न सिर्फ अपने सपने पूरे किये बल्कि अपनी बेटी मेघतिथि में भरोसा रखा और उसे आत्मनिर्भर बनाया। मेघतिथि बनर्जी एक पत्रकार होने के साथ ही एक संगीतकार भी हैं। कई मीडिया माध्यमों में काम कर चुकी हैं और व्होल 9 यार्ड से जुड़ी हैं। मेघतिथि के लिए उनकी माँ ही सब कुछ हैं और अपनी माँ महुआ बनर्जी की प्रेरक कहानी उन्होंने शुभजिता से साझा की। दरअसल, ये दोनों महिलाएँ ही सशक्तीकरण का अनुपम उदाहरण हैं तो सुनिए माँ की कहानी, बेटी की जुबानी –
मैं आपको कोई ऐसी असाधारण कहानी नहीं बताने जा रही हूँ बल्कि यह तो एक हमारे लिए एक आम सफर है जिसमें कोई जीतता है तो कोई अब भी जीत के इन्तजार में है। हमारा सफर 19 साल पहले शुरू हुआ था। तब मैं पाँचवीं कक्षा की छात्रा थी और मेरी माँ महुआ बनर्जी बस एक आम गृहिणी थी मगर चीजें बदलीं जब उन्होंने शिक्षिका बनने के सपने को पूरा करने की सोची। मेरे पिता ने मेरी माँ के सपने को पूरा करने में कभी माँ का साथ नहीं दिया 2000 तक शिक्षिका बनने का मेरी माँ का सपना सिर्फ घर में ही कुछ प्राइवेट ट्यूशनों और 2-3 बच्चों को पढ़ाने तक सीमित था मगर जब मैं इस काबिल हुई कि मैं अपना ख्याल खुद रख सकूँ, माँ ने अपनी यात्रा आरम्भ की। अगर किसी ने इस दौर में माँ का साथ दिया तो वे मेरे ग्रैंडपैरेन्ट्स थे। माँ ने अपनी पहली नौकरी चपलामयी गर्ल्स हाई स्कूल में प्राथमिक विभाग में शिक्षिका के तौर पर शुरू की और उनकी पहली तनख्वाह तब महज 250 रुपये थी मगर यह सपना भी सरकार के आदेश से ढह गया जिसके मुताबिक पैरा शिक्षकों के भरोसे कोई विद्यालय नहीं चल सकता। माँ को सरकार द्वारा नियुक्त शिक्षकों के लिए जगह बनाने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने काम की तलाश शुरू कर दी और आईपर नामक गैर सरकारी संगठन से बतौर फंड रेजर जुड़ गयीं मगर जल्दी ही वह उद्भाष नामक एक अन्य गैर सरकारी संगठन के लिए बच्चों को पढ़ाने लगीं। 5 साल तक अपनी तमाम घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाते हुए उन्होंने एक साथ दो नौकरियाँ जारी रखी और बस यहीं से हुई बदलाव की शुरुआत। आईपर के बाद 2015 तक उन्होंने दो अन्य गैर सरकारी संगठनों के लिए काम किया और इसमें से एक था होप फाउंडेशन। मैंने उनको पंचानन ग्राम के लोगों के साथ खुशनुमा पल बिताते हुए देखा है जहाँ वह महिलाओं के स्कूल और प्रशिक्षण केन्द्र का प्रभार सम्भालती थीं। कॉलेज के दिनों में मैंने माँ को कोलकाता के खिदिरपुर के हेस्टिंग्स पुल के बच्चों को पढ़ाते और मानव तस्करी, यौन उत्पीड़न के खिलाफ, शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ते देखा है। बच्चे ही नहीं बल्कि बच्चों के परि वार भी माँ से बहुत स्नेह रखते थे। उनको शादियों में बुलाया जाता और वे जाती भी थीं। मुझे याद है वह दिन जब माँ के एक सहकर्मी ने फोन करके मुझे बताया कि वह बच्चों को पढ़ाते हुए बीमार पड़ गयीं और मैं उनको वापस लाने के लिए दौड़ी मगर जब पहुँची तो आस -पास का वातावरण देखकर अजीब सा महसूस करने लगी मगर जब मैं वहाँ पहुँची तो मैंने देखा कि वो लोग, जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं थी, जगह नहीं थी, वे घर से दवा लाये थे, अपने हिस्से का भोजन मेरी माँ को खिला रहे थे जो कम से कम उनके लिए थी। इससे मेरा हृदय पिघल गया क्योंकि मुझे पता था कि मेरी माँ अपने प्यार से संसार को ठीक कर सकती हैं। वर्ष 2015 में पता चला कि मेरे पिता को कैंसर है और माँ ने उनके पास रहने के लिए अपने काम से विराम लिया। मेरे पिता, जो मेरी माँ के बाहर जाकर काम करने के सख्त खिलाफ थे, उनकी आँखों में भी अब माँ के लिए सम्मान था। 2016 में मेरे पिता का निधन हो गया।
जब माध्यमिक में अच्छे नतीजे नहीं होने पर सबने मुझे नाकारा मान लिया तो माँ ने मुझमें विश्वास रखा। एकमात्र वही थीं जिन्होंने तमाम अड़चनों के बावजूद संगीत कक्षाओं में मेरा दाखिला करवाया। उन्होंने अपनी कमाई से मेरे लिए पहला हारमोनियम खरीदा और आज अगर 1 प्रतिशत लोग भी मुझे कलाकार के रूप में पहचानते हैं तो इसका श्रेय माँ को ही जाता है। उन्होंने मुझे बगैर किसी हिचक के एक स्वतन्त्र स्त्री बनना सिखाया।
अब मैं अपने बारे में बताऊँ तो मैं अपने विद्यालय में एक औसत छात्रा थी जो गणित और अंग्रेजी में बेहद कम अंक लाती थी। संगीत के लिए मुझे तारीफ मिलती थी तो पढ़ाई में कमजोर होने के कारण रिश्तेदार मुझे ताने दिया करते थे लेकिन माँ ने हमेशा मुझमें भरोसा रखा। वह मेरी जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए समर्पित रहीं। चूँकि मैं बारहवीं तक बांग्ला माध्यम से पढ़ाई की थी इसलिए बारहवीं के बाद उन्होंने रामकृष्ण मिशन में अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर सीखने के लिए दाखिला करवाया, साथ ही किसी खास विषय पर जोर देने की जगह मुझे पत्रकारिता पढ़ने दिया।
माँ मेरे लिए हमेशा चट्टान की तरह खड़ी रहतती हैं। चाहे मानसिक झंझावात हो, किशोरावस्था की परेशानी या पेशेवराना समस्याएँ. वह मेरी एकमात्र रक्षक, मार्गदर्शक और मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं। मुझे कभी उनसे झूठ नहीं बोलना पड़ा। वह किसी को स्पेस देने का महत्व जानती हैं और उन्होंने मुझे कभी त्याग करना नहीं सिखाया। वह अपनी शर्तों को जीती रही हैं और मेरे लिए वह सशक्त महिला होने का सबसे बड़ा उदाहरण हैं, मैं उनके बगैर कुछ भी नहीं।