Saturday, April 25, 2026
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भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेज में अंतर्महाविद्यालय फैशनिस्टा – 2019

कोलकाता : भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज के जुबली सभागार में कोलकाता के तेरह से अधिक कॉलेज के प्रतिभागियों ने फैशनिस्टा में भाग लिया। 250 विद्यार्थियों ने फैशनिस्टा में दिन भर चलने वाले विविध विषयों पर अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित किया। प्रथम सत्र में नेल आर्ट, ट्राश फैशन, मुखौटे की डिजाइन, मेकअप, केश सज्जा, ज्वेलरी डिजाइन, हेडगेयर डिजाइन, फोन कवर डिजाइन, स्विच (मेकअप, साड़ी और वॉक),
साड़ी पहनना, जूते डिजाइन प्रतिद्वंद्विता और द्वितीय सत्र में फैशन शो और मुखौटा डांस पार्टी का आयोजन किया गया।भवानीपुर कॉलेज में प्रथम बार इस तरह के कार्यक्रम को विद्यार्थियों ने बहुत अधिक पसंद किया। इस कार्यक्रम की थीम डार्क रखी गई थी। जीवन के डार्क पक्षों को दिखा कर प्रदूषण, हिंसा, ड्रग, मदिरा पान और गलत विषयों के प्रति युवाओं को उनके गलत प्रभावों को दर्शाया गया। युवा पीढ़ी को स्वस्थ वातावरण बनाने की ओर कदम बढ़ाने की कोशिश रही।  रीसाइक्लिंग की वस्तुओं के द्वारा विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित किया।
भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज, शिक्षायतन कॉलेज, शिवनाथ शास्त्री कॉलेज, जेडी बिरला कॉलेज, हेरिटेज बीबीए डिपार्टमेंट, आदि विभिन्न कॉलेज के विद्यार्थियों ने बहुत ही सुंदर प्रस्तुतियां दी।
भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेज प्रथम स्थान पर रहा। द्वितीय पर कलकत्ता विश्वविद्यालय और तृतीय स्थान पर शिवनाथ शास्त्री कॉलेज रहा। निर्णायकों में मिक बागुइ, अदनान हसन, रूपा कामदार रहे जिन्होंने फैशन आर्ट और विविध प्रकार की कला आदि का निर्णय किया। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने सभी विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्येश शाह, डॉ वसुंधरा मिश्र की उपस्थिति रही। धर्मेश और रूपशा ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस अवसर पर मिस्टर और मिस फैशनिस्टा और बेस्ट ड्रेस पर भी विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। डॉ वसुंधरा मिश्र ने इसकी जानकारी दी।

“साहित्यिकी” ने आयोजित किया पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद के सभाकक्ष में साहित्यिकी संस्था द्वारा दो कहानी संग्रहों पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। वरिष्ठ कथाकार सिद्धेश की किताब “वेणुगोपाल का झूठा सच” और शर्मिला बोहरा जालान के कहानी संग्रह “राग विराग और अन्य कहानियां” पर केन्द्रित इस परिचर्चा में शहर के साहित्यकार बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। वरिष्ठ आलोचक विमलेश्वर द्विवेदी ने कहा कि सिद्धेश जी कि लंबे समय से सृजनशील हैं। “वेणुगोपाल का झूठा सच” की कहानियां बदलते हुए रिश्तों के साथ साथ मध्यवर्ग के बिखराव और उसके अंतर्विरोधों की भी कहानियां हैं। अरबानाइजेस्न के तहत आनेवालों बदलावों को लेखक ने सूक्ष्मता से पकड़ा और सहजता से दर्शाया है। क्षणवाद के दर्शन को भी कहानियों में उकेरा गया है। “जन्मभूमि” कहानी एक तरह के नये मूल्यबोध और उससे उत्पन्न बेचैनी की कहानी जो आज के दौर का सच है।

गीता दूबे ने कहा कि सिद्धेश जी अकथा दौर के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं और उनकी निरंतर सृजनशीलता हमें आशवस्त करती है। उनकी कहानियो में एक तरह की हताशा, बिखराव, अकेलापन और उससे उत्पन्न अवसाद की छाया दिखाई देती है जो आधुनिक जीवन की विडंबना है। उन्होंने कहानी के प्रचलित फार्म को तोड़ते हुए ‘हड़ताल’ जैसी कहानी के माध्यम से कथा कोलाज की रचना भी की है।

शर्मिला बोहरा जालान की किताब पर अपनी बात रखते हुए शुभ्रा उपाध्याय ने इस कहा कि एक स्त्री का रचनाजगत पुरुष के रचनाजगत से भिन्न होता है। लगभग दो दशकों में फैली हुई ये कहानियां आभिजात्य स्त्री या स्त्री के आभिजात्य को उकेरती हैं। शर्मिला संवेदनशील कथाकार हैं और उनकी कहानियाओं की भाषा बेहद सशक्त और कसी हुई है। उनकी कई कहानियों के केन्द्र में मां है लेकिन पिता को उतनी जगह नहीं मिली है। इनकी स्त्रियाँ प्रेम में होते हुए भी अपने स्वाभिमान के प्रति सजग हैं।

मंजुरानी गुप्ता ने “राग विराग और अन्य कहानियां” की हर कहानी पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि  कि शर्मिला जी की कहानियां नारी पीड़ा और अंतर्वेदना को व्यक्त करती हैं। समाज परिवर्तन की जोरदार भले ही नही सुनाई देती पर पीड़ा का मार्मिक चित्रण जरूर मिलता है।

लेखकीय वक्तव्य में शर्मिला ने अपनी रचना प्रक्रिया और रचना यात्रा पर बात रखते हुए कहा कि लेखक को रचने और छपने के साथ साथ छांटना भी आना चाहिए। अपने लिखे हुए के प्रति मोह  से मुक्त होकर और कमजोर रचनाओं के प्रति निर्मम होकर ही लेखक परिपक्व होता है। समय के साथ साथ लेखक का भी विकास होता है और उसकी अनुभूतियाँ प्रौढ़ से प्रौढ़तर होती जाती हैं।

अध्यक्षीय वक्तव्य में रेवा जाजोदिया ने कहा कि यह हमारी परंपरा है कि हम अपने शहर के लोगों की पुस्तकों पर चर्चाओं का आयोजन करते हैं। इन दोनों संग्रहों की  कहानियों को पढ़ते हुए अपने आस पास की घटनाओं से दो चार होने का अनुभव होता है। उन्होंने उपस्थित श्रोताओं और वक्ताओं को धन्यवाद भी दिया। कार्यक्रम का सुंदर और सफल संचालन  सुषमा त्रिपाठी ने किया। 

 

किंग क्वीन मॉडल हन्ट 2019 में प्रतियोगियों ने सीखे मेकअप के तरीके

कोलकाता : लॉन्चर्ज किंग क्वीन 2019 में प्रतियोगियों के लिए मेकअप कार्यशाला आयोजित की गयी। किंग क्वीन की आयोजक निदेशक शगुफ्ता हनाफी के मुताबिक इसका उद्देश्य प्रतियोगियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ आवश्यक जानकारी भी प्रदान करना था। प्रतिय़ोगिता में निर्धारित तीन श्रेणियों को ध्यान में रखते हुए मेकअप आर्टिस्ट विभाष जाना ने प्रतियोगियों को मेकअप के गुर दिये। जाना इस प्रतियोगिता के गुडविल अम्बास्डर भी हैं। इसके पूर्व एंकर डोलन मजुमदार, आहार एवं पोषण विशेषज्ञ मधुमिता नियोगी. जुम्बा विशेषज्ञ स्वपन दे, फोटोग्राफी विशेषज्ञ सुमन और अभिजीत दत्त के अतिरिक्त समग्र ग्रूमिंग एवं कोरिओग्राफी विशेषज्ञ चिरश्री सिंह राय ने विद्यार्थियों को प्रतियोगियों का मार्ग दर्शन कर चुके हैं। प्रतियोगियों को मेकअप टिप्स की लिखित और प्रैक्टिकल जानकारी दी गयी। लिखित रूप में मेकअप का इतिहास, कलर थेरेपी, उत्पादों की जानकारी, चेहरे के आकार, टेलिविजन और फिल्म मेकअप समेत अन्य जानकारियाँ दी गयीं। वहीं व्यावहारिक तौर पर करेक्टिव मेकअप, ब्राइडल मेकअप, पोर्टफोलियो एवं रैम्प मेकअप, ग्लैमर तथा ब्रॉन्ज मेकअप समेत अन्य जानकारी दी गयी।
मेकअप आर्टिस्ट विभाष भी कार्यशाला को देकर काफी उत्साहित दिखे। शुभजिता को उन्होंने बताया कि प्रतियोगियों में सीखने की ललक है। प्राकृतिक मेकअप ही हर जगह अच्छा लगता है इसलिए इस पर ध्यान देना चाहिए।
क्या बोले प्रतिय़ोगी –
पौलमी सरकार (मिस क्वीन प्रतियोगी)- अमेटी यूनिर्वसिटी में मासकॉम की छात्रा हैं पौलमी। अभिनय़ और रैम्प वॉक का शौक है और मॉडलिंग के जरिये अभिनय की दुनिया में कदम रखना है। प्रोफेशनल डांसर पौलमी के मुताबिक प्रतियोगिता के जरिए न सिर्फ उनको नयी जानकारी मिली बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है। पत्रकारिता उनके लिए प्लान बी है मगर उनको पत्रकारिता के साथ मॉडलिंग करनी है।
शाहजेब अहमद (मिस्टर किंग प्रतियोगी) – मौलाना आजाद कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई करने वाले शाहजेब को भी मॉडलिंग पसन्द है और अपने व्यवसाय के साथ इसे जारी रखना चाहते हैं। शाहजेब के मुताबिक उनको घर से पूरा सहयोग मिला है। यह प्रतियोगिता सपनों को पूरा करने का अवसर है।
किरण सिंह (मिसेज क्वीन प्रतियोगी) – कॉलेज के तुरन्त बाद किरण की शादी हो गयी। किशोरावस्था से मॉडलिंग का शौक था जो तब पूरा नहीं हो सका। मॉडलिंग का ऑफर पहले भी था। किरण प्रतियोगिता को लेकर काफी उत्साहित हैं और अभिनय को लेकर आगे बढ़ना चाहती हैं।

द हेरिटेज स्कूल में 65वीं नेशनल स्कूल गेम्स चैम्पियनशिप 2019

सीआईएससीई चेयरमैन ने किया उद्घाटन
कोलकाता : सीआईएससीई काउंसिल ने हाल ही में स्कूल गेम्स फेडरेशन के साथ संयुक्त रूप से 65वीं नेशनल स्कूल गेम्स चैम्पियनशिप 2019 आयोजित की। चैम्पियनशिप का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सीआईएससीई काउंसिल के चेयरमैन डॉ. जी इमैनुअल ने किया। उन्होंने परिश्रम को सफलता की कुंजी बताया। उन्होंने उद्घाटन सीआईएससीई काउंसिल के चीफ एक्जिक्यूटिव तथा सचिव जी. आराथन की उपस्थिति में किया। इस प्रतियोगिता के ध्वज को फहराकर उन्होंने द हेरिटेज स्कूल की प्रिंसिपल सीमा सप्रू की उपस्थिति में खेलों की शुरुआत की घोषणा की। इस मौके पर हेरिटेज ग्रुप ऑफ इन्टिट्यूशंस के सीईओ पी. के. अग्रवाल, डीपीएस मेगासिटी की प्रिंसिपल इन्द्राणी सान्याल, एसोसिएशेन्स ऑफ हेड्स ऑफ सीआईएससीई स्कूल इन वेस्ट बंगाल के महासचिव नवारुण दे, स्कूल गेम्स फे़डरेशन ऑफ इंडिया के पीआरओ गौरव दीक्षित, सीआईएससीई काउंसिल के उपसचिव (वित्त), फ्यूचर फाउंडेशन स्कूल के प्रिंसिपल रंजन मित्तर, अग्रसेन ब्वायज स्कूल की प्रिंसिपल अबीरा साहू समेत अन्य़ अतिथि उपस्थित थे। 24 नवम्बर तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में 26 राज्यों के विभिन्न स्कूलों के 260 विद्यार्थी हिस्सा ले रहे हैं। पुरस्कार वितरण के साथ प्रतियोगिता का समापन होगा।

नहीं हो सकता मीडिया का व्यवसायीकरण : राज्यपाल

‘यादों के उजाले ‘ का लोकार्पण समारोह सम्पन्न
कोलकाता : राज्यपाल जगदीप धनकड़ ने कहा है कि मीडिया का व्यवसायीकरण नहीं हो सकता। खबर वह नहीं है जो दिखायी देती है बल्कि खबर वह है जिसे लोग छुपाना चाहते हैं। पत्रकार जो दायित्व निभाता है, वह काफी महत्वपूर्ण है। राज्यपाल ताजा टीवी के निदेशक तथा छपते – छपते के प्रधान सम्पादक विश्वम्भर नेवर की आत्मकथा ‘यादों के उजाले ‘ के लोकार्पण समारोह को सम्बोधित करते हुए बोल रहे थे। उन्होंने पुस्तक के लेखक विश्वम्भर नेवर की सराहना करते हुए कहा कि उनकी पत्रकारिता ने मिसाल कायम की है। राज्यपाल ने ‘यादों के उजाले’ का लोकार्पण भी किया। राज्यपाल की पत्नी तथा राज्य की प्रथम महिला सुदेश धनकड़ भी इस अवसर पर उपस्थित थीं। समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास शर्मा ने कहा कि बिना कष्ट या साधना के इच्छित वस्तु नहीं मिल सकती। बड़े लक्ष्य रखने वाला ही संघर्ष से अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है। पुस्तक के लेखक विश्वम्भर नेवर ने अपने संघर्ष के दिन याद किये और कहा कि वे खुद सामाजिक कार्यकर्ता थे और इसके बाद पत्रकारिता में आये। अखबार के माध्यम से भी समाज सेवा की जा सकती है। इस अवसर पर समाजसेवी सीताराम शर्मा, राजनेता शिशिर बाजोरिया, उद्योगपति बी.डी. मूंधड़ा, वरिष्ठ पत्रकार गीतेश शर्मा, अभिनेता अर्जुन चक्रवर्ती समेत कई अन्य अतिथियों विश्वम्भर नेवर के विषय से जुड़ी स्मृतियाँ साझा कीं। कार्यक्रम का संचालन ताजा टीवी के सीईओ विपिन नेवर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन ताजा टीवी के वरिष्ठ पदाधिकारी विक्रम नेवर ने किया।

अनुदान को लेकर करेंगे पक्षपात तो कैसे मिलेगी सबको उच्च शिक्षा?

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

अनुदान का 50 प्रतिशत हिस्सा पाते हैं केन्द्रीय विश्वविद्यालय
पे स्केल 2016 से लागू करने की माँग कर रहे हैं शिक्षक
19 नवम्बर को बंगाल के सभी विश्वविद्यालयों में कर्म विरति यानी कार्य स्थगन रहा। प्रोफेसरों और सहायक प्रोफेसरों के तमाम शिक्षक संगठन एक साथ आये और बंगाल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की एकता दिखायी दी। दरअसल राज्य सरकार ने यूजीसी द्वारा निर्धारित नयी पे स्केल लागू करने घोषणा तो की है मगर यह 2020 से यानी अगले साल से लागू माना जायेगा। शिक्षकों का कहना है कि यह वर्ष 2016 से ही लागू किया जाना था। इस बकाया राशि का 50 प्रतिशत भाग केन्द्र सरकार और बाकी 50 प्रतिशत भाग राज्य सरकार देगी। बंगाल में वेबकूटा, कूटा, जूटा समेत सभी विश्वविद्यालयों के शिक्षक संगठन अपनी बकाया राशि पाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय शिक्षक समिति यानी कूटा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार शिक्षकों के अनुसार अगर यह पे स्केल 2016 से लागू किया जाता है तो प्रोफेसरों के 26,57,700 रुपये, एसोसिएट प्रोफेसरों के 23,37, 900 रुपये और असिस्टेंट प्रोफेसरों के 8,28,300 रुपये बकाया हैं। आन्दोलन नया भले न हो मगर यह फिर से जोर पकड़ रहा है। प्रदर्शनकारी शिक्षकों में शामिल शिक्षकों के अनुसार यह प्रदर्शन नया नहीं है। केन्द्र सरकार कभी 80 प्रतिशत राशि वहन किया करती थी मगर उसने धीरे – धीरे हिस्सेदारी घटा दी और अब यह 50 प्रतिशत तक रह गया है। इसके लिए 1986 में शिक्षकों ने आन्दोलन किया, तब 35 दिन की हड़ताल हुई थी। तत्कालीन सरकार झुकी, फिर 1996 में नये पे कमिशन की माँग पर 25 दिनों की हड़ताल की गयी और वह भी सफल रही। इसके बाद 2006 और अब 2019, शिक्षक अपने आर्थिक अधिकारों के लिए लड़ ही रहे हैं। राजकीय विश्वविद्यालयों में बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो बुनियादी संरचना की कमी एक समस्या हमेशा से रही है। यहाँ विद्यार्थी अधिक हैं, शिक्षक अधिक हैं मगर जो अनुदान राशि मिलती है, वह ऊँट के मुँह में जीरा की कहावट चरितार्थ करती है।
काफी नहीं है शिक्षा बजट और आवंटन ऊँट के मुँह में जीरा
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा लोकसभा में दी गयी जानकारी के मुताबिक 2017-18 के शिक्षा बजट व्यय के विश्लेषण के अनुसार, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर व्यय 4.43% है। कोठारी आयोग (1964-66) ने सिफारिश की है कि जीडीपी का 6% शिक्षा पर व्यय किया जाना चाहिए। 1992 म यथा-संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में निर्धारित किया गया है कि यथासंभव शीघ्रितशीघ्र शिक्षा पर निवेश को धीरे-धीरे राष्ट्रीय आय का 6% तक बढ़ाया जाए। अब जीडीपी के अनुपात में देखा जाए तो वर्ष 2013 -14 में 430878.81 करोड़ (3.84 प्रतिशत, 2014 -15) में 506849.13 करोड़ रुपये (4.07 प्रतिशत), 2015 -16 में 577792.51 करोड़ रुपये (4.20 प्रतिशत), 2016 -17 (आर ई) में 664264.52 करोड़ रुपये (4.32 प्रतिशत), 2017-18 (बीई) में ) 756945.00 करोड़ रुपये (4.43 प्रतिशत) है और यह वृद्धि के बावजूद काफी नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए निर्धारित बजट का जो आवंटन होता है, वह विषमता से भरा है। महज 46 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं और वह इस देश के शिक्षा बजट की 50 प्रतिशत से अधिक राशि पा रहे हैं और जो बचे हैं, उनके हाथ में कुछ नहीं आ रहा..जाहिर है कि संरचना की कमी तो होगी ही जबकि शिक्षकों और विद्यार्थियों के परिश्रम और उनकी प्रतिभा में कोई अन्तर नहीं हैं..फिर यह भेद-भाव क्यों..इसका जवाब किसी के पास नहीं मिल रहा। 993 विश्वविद्यालय, 39931 कॉलेज, 3.73 करोड़ विद्यार्थी हैं। महज 9.61 प्रतिशत विद्याार्थी स्नातकोत्तर कक्षाओं में हैं और 0.79 प्रतिशत विद्यार्थी ही एम.फिल या पीएचडी कर रहे हैं। कॉलेजों में ही 94.33 प्रतिशत विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। 81.89 प्रतिशत शोध छात्र विश्वविद्यालयों में ही हैं।


केन्द्रीय और राजकीय विश्वविद्यालयों के अनुदानों में इतना वैषम्य क्यों?
वर्ष 2016 -17 की यूजीसी की रिपोर्ट जब आप पढ़ते हैं तो आपको केन्द्रीय और राजकीय यानी स्टेट एडेड यूनिवर्सिटी के साथ होने वाला यह भेदभाव समझ में आ जाता है। वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल योजनाबद्ध 3996.96 करोड़ रुपये अनुदान का 50.32 प्रतिशत केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को गया जिनकी संख्या महज 46 है। 2.21 प्रतिशत डीम्ड विश्वविद्यालयों को और राजकीय यानी स्टेट ऐडेड विश्वविद्यालयों को महज 13.13 प्रतिशत, स्टेट ऐडेड विश्वविद्यालयों के कॉलेजों को 3.08 प्रतिशत और 1 प्रतिशत केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कॉलेजों को मिला। 6.78 प्रतिशत क्षेत्रीय केन्द्रों को मिला। इसके अतिरिक्त छात्र वृत्ति इत्यादि पर राशि खर्च हुई। अब अगर बात करें 2016-17 में योजना के बगैर यानी नॉन -प्लान ग्रांट की 6457.96 करोड़ रुपये की अनुदान राशि की तो इसका 63.22 प्रतिशत हिस्सा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को मिला, 18.31 प्रतिशत राशि दिल्ली के कॉलेजों और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महज 3.03 प्रतिशत राज्य विश्वविद्यालयों, 1.29 प्रतिशत इंटर यूनिवर्सिटी सेंन्टर, 4.52 प्रतिशत विश्वविद्यालय बनने की दिशा में अग्रसर डीम्ड संस्थानों को मिला। केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कॉलेजों को 1.62 प्रतिशत और राजकीय विश्वविद्यालय के कॉलेजों को 0.04 प्रतिशत राशि ही मिली।


सरकारी सहायता का दावा
46 केन्द्रीय विश्वविद्यालय. केन्द्रीय मुक्त विश्वविद्यालय 1, राज्य विश्वविद्यालय (स्टेट पब्लिक यूनिवर्सिटी) 371, राष्ट्रीय महत्व वाले संस्थान 127, हैं। स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी 14 हैं। लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रयायन परिषद (एनएएसी)  ने अब तक पूरे भारत म 359 विश्वविद्यालयों और 8073 कॉलेजों को  मान्यता दी है। उच्चतरशिक्षा विभाग केन्द्रीय क्षेत्र ब्याज अनुदान योजना का कायार्वयन कर रहा  है। इस योजना के तहत, पैतृक आय की सीमा पये 4.5 लाख प्रतिवर्ष है।
यह योजना वर्ष  2009 से परिचालन में है। यह  योजना  भारत  में  आर्थिक रूप से  कमजोर  सभी  श्रेणियों  के  छात्र  को  व्यावसायिक/तकनीकी पाठ्यक्रम के अययन के लिए लाभान्वित करती है।इस योजना के तहत , अब तक 27,32,169 छात्र  लाभान्वित हुए ह और इस योजना की शुआत ( 2009-10) के बाद से मंत्रालय वारा  लाभान्वित छात्र को 11876.25 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गयी।


बाकी सबके हिस्से का भोजन मिल रहा है केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को
यह जानना जरूरी है कि क्या दाखिला लेने वाले हर विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति नाजुक है और अगर नहीं तो उसे सब्सिडी या आर्थिक सहायता क्यों दी जाए। क्या इसे आर्थिक आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए? क्या राजकीय विश्वविद्यालयों के शिक्षक परिश्रम नहीं करते, अगर हाँ तो अनुदान राशि को लेकर इतना पक्षपात क्यों? सच तो यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को अन्य विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों की थाली का खाना लगातार परोसा जाता रहा है मगर अब इस प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है, कम से कम भविष्य के लिए…विद्यार्थियों को सब्सिडी से अधिक आंशिक तौर पर काम की जरूरत है और इसके बारे में संस्थानों को गम्भीरता से सोचना होगा..वरना समस्या और पेचीदा होती रहेगी और हम यही नहीं चाहते।

क्या मुफ्त शिक्षा का सटीक मापदण्ड बनाने की जरूरत है
आज भी राजकीय व केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की फीस बेहद कम है, लगभग वही जो 50 के दशक में थी मगर देश को आजाद हुए 75 साल होने जा रहे हैं। इस दौरान महँगाई, वेतन और भत्ते तेजी से बढ़े मगर नहीं बढ़ी तो उच्च शिक्षण संस्थानों की फीस संरचना। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के पास अनुदान का आधा हिस्सा चला जाता है मगर संस्थान को उन्नत करने और समय के साथ चलने के लिए भी खर्च करना पड़ता है। अब कल्पना कीजिए कि महज 13 प्रतिशत से कुछ अधिक हिस्सा पाने वाले राजकीय विश्वविद्यालयों के लिए संस्थान की गुणवत्ता बनाये रखना कितना कठिन है क्योंकि सुविधा तो सबको चाहिए मगर फीस बढ़ी तो हाय तौबा मच जाती है। अब सवाल यह है कि इस परिस्थिति में मुफ्त शिक्षा प्रदान कर पाना क्या किसी भी सरकार के लिए सम्भव है? किसी परिवार में भी भोजन बाँटते समय आधार सदस्यों की संख्या ही होती है और यह भी कि उसे जरूरत कितनी है। अधिकतर राजकीय विश्वविद्यालय संरचना की कमी से जूझ रहे हैं। शहरों की ही नहीं बल्कि जिला स्तर पर जब जाते हैं तो यह अभाव और गहराता जाता है। ऐसे में संस्थान के लिए गुणवत्ता बरकरार रखना बहुत कठिन है। बात यह है कि जेएनयू और विश्वभारती की तरह ही रवीन्द्रभारती, उत्तर बंग विश्वविद्यालय समेत देश भर के राजकीय विश्वविद्यालय हैं तो फिर अनुदान 13.13 प्रतिशत ही क्यों और जब आप अनुदान कम देंगे तो गुणवत्ता कैसे चाह सकते हैं?

इस पर विद्यार्थियों से जो फीस मिलती है, वह आज 70 साल बाद भी 10-20 रुपये से लेकर कुछ हजार रुपये ही है और इस पर फीस बढ़ाने पर आए दिन धरने होते रहते हैं। सस्ती शिक्षा की बात करना और कहना बहुत आसान है मगर धरातल पर जाकर देखने की जरूरत है कि अगर सभी को मुफ्त शिक्षा मिलेगी तो संस्थान चलेंगे कैसे? बिजली, पानी, वेतन, मरम्मत, परीक्षा, विद्यार्थी समेत कई सारी चीजों पर खर्च होता है, संस्थान वह खर्च कहाँ से निकालेगा? आखिर विद्यार्थियों को पंगु और परजीवी बनाकर आप उनके लिए कैसा भविष्य लिख रहे हैं? आपकी यही नीति है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे व्यावहारिक तौर पर काम करने उतरते हैं तो उनको खारिज कर दिया जाता है क्योंकि जो वह सीखते हैं, वह इन क्षेत्रों के लिए कारगर होता ही नहीं, मगर पढ़ते हुए जब वह काम करते हैं तो उनको व्यावहारिक अनुभव होगा ? राजकीय विश्वविद्यालयों की लचर संरचना पर भी हम बात करेंगे और विद्यार्थियों पर भी मगर ये समझना जरूरी है कि जिन देशों में सस्ती व मुफ्त शिक्षा की बात की जा रही है, उनकी आबादी सवा सौ करोड़ नहीं है। सबसे जरूरी है कि अनुदान में जो विषमता है, उसे दूर किया जाए। छात्रवृत्ति की जगह आंशिक कार्य की व्यवस्था हो,शिक्षकों के वेतन और उनकी सुविधाओं में समानता लायी जाए, तभी वह दिल से काम कर सकेंगे और तभी इस समस्या का समाधान निकल सकता है, वरना नहीं।

भारत में पुरुष दिवस की शुरुआत करने वाली उमा

समाज और परिवार में पुरुषों को अक्सर बेसब्र, गुस्सैल और हिंसक दिखाया जाता है। फिल्में हों या किताबें, इतिहास में भी उनकी परिभाषा इसी तरह से लिखी गई है। इस सोच को बदलने के लिए वेस्टइंडीज के हिस्ट्री लेक्चरर डॉ. जीरोम तिलक सिंह ने 19 नवंबर 1999 को इंटरनेशनल मेन्स डे की शुरुआत की। भारत में इसकी शुरुआत 2007 में हुई, जिसका श्रेय हैदराबाद की लेखिका उमा चल्ला को जाता है। उमा के मुताबिक, जब हमारी संस्कृति में शिव और शक्ति दोनों बराबर हैं तो पुरुषों के लिए भी सेलिब्रेशन का इन दिन क्यों नहीं होना चाहिए। उमा से जानिए, इस इंटरनेशनल मेन्स डे की कहानी…

पुरुषों के हक में अमेरिका से कैंपेन शुरू किया
एक महिला शादी के बाद नौकरी अपने मनमुताबिक विकल्प के तौर पर चुनती है लेकिन पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता। महिलाओं को हमेशा समस्या से जोड़कर निर्बल दिखाया जाता है, जबकि पुरुष और महिला दोनों की अपनी-अपनी खूबियां हैं। शिव से शक्ति को अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्हें अर्द्धनारीश्वर कहा जाता है। जब दोनों बराबर हैं, तो सेलिब्रेशन पुरुष के लिए भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ मैंने अमेरिका में रहकर कैंपेन शुरू किया। भारत में आकर जमीनी स्तर पर इसकी शुरुआत करना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए मैंने डिजिटल प्लेटफार्म पर आवाज उठाई और इस विषय पर लिखना जारी रखा।

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2007 में भारत में पहली बार मना मेन्स डे
अभियान की शुरुआत में महिला अधिकारों के लिए पड़ने वाले लोगों के निगेटिव रिएक्शन मिले, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उनका कहना था, यह समाज पुरुष प्रधान है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती। दरअसल, उस दौर में मैंने देखा महिला और उनकी समस्याओं को ज्यादा उठाया जाता था और पुरुषों की गलत तस्वीर पेश की जा रही थी। समस्याएं दोनों ओर हैं लेकिन दिखाया सिर्फ महिलाओं के पक्ष में जा रहा था। महिला दिवस मनाना अच्छा है लेकिन सभी पुरुषों की गलत छवि दिखाना ठीक नहीं है। पुरुषों को महिलाओं पर हावी माना जाता है, यह सब उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा होता है, उसके त्याग का हिस्सा होता है। लिहाजा, मेरा अभियान जारी रहा। अंतत: 2007 में बेहद छोटे स्तर पर भारत में पहली बार इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया गया।

 

मूंछों को प्राथमिकता दी तो अभियान आगे बढ़ा
जब से भगवान को समझना शुरू किया, तबसे देखा कि ज्यादा प्रतिमाओं और तस्वीरों में उन्हें बिना मूंछों के दिखाया गया है। मैंने एक लंबे समय तक स्टडी की। इतिहास पढ़ा, प्राचीन तस्वीरें देखीं, संस्कृत के श्लोक पढ़े, संस्कृत से अनुवादित तेलुगु साहित्य भी पढ़ा। इनसे एक बात साफ हुई कि मूंछें सिर्फ पुरुषों की नहीं भगवान की शख्सियत का अहम हिस्सा रही हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर मंदिरों में स्थापति प्रतिमाओं के चेहरे पर मूंछ हैं। यहां तक राजस्थान के म्यूजियम में रखी प्रतिमा में भगवान राम की मूंछ हैं। सिर्फ भारतीय ही नहीं दूसरे कल्चर की ऐतिहासिक अध्ययनों में मूंछ का जिक्र किया गया है। दाढ़ी और मूंछ को सात्विक इंसान बताया गया है। हम्पी के मंदिरों में भगवान के चेहरे पर मूंछ साफ तौर पर दिखाई गई हैं। भक्त जैसा सोचते हैं, भगवान को वैसा ही देखना चाहते हैं।

 

अच्छे इंसान वाली सकारात्मक सोच को बढ़ावा
उमा के मुताबिक, ऐसा नहीं है पुरुष जो चाह रहे हैं वह उन्हें आसानी से मिल रहा है। समाज में महिला और पुरुष के बीच बैलेंस न होने का कारण है पुरुषों पर अतिरिक्त बोझ। महिला के लिए काम न करना एक पसंद हो सकती है लेकिन पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा समझा जाता है कि हर दिन पुरुषों के नाम है और समाज भी पुरुषवादी है। महिला और पुरुष दोनों के बाद अलग-अलग शक्तियां और जिम्मेदारियां हैं। जब ये दोनों बराबर से साथ आते हैं तो चीजें बेहतर होती है। आने वाली पीढ़ियों को बेहतर माहौल देने के लिए हमें सकारात्मक रहने की जरूरत है।
(साभार – महानगर टाइम्स)

रतलाम जिले के जावरा में कांट्रैक्टर अनीस अनवर के संग्रह में 1898 में है अनूदित गीता

परिवार की तीन पीढ़ियों ने पुस्तक का बखूबी ध्यान रखा है, इसे कुरआन शरीफ के साथ रखते हैं
गीता का संस्कृत से उर्दू में अनुवाद मथुरा के पंडित जानकीनाथ मदन देहलवी ने 1898 में किया था

जावरा/ रतलाम : मध्य प्रदेश के रतजाम जिले के जावरा में एक मुस्लिम परिवार ने 121 साल से उर्दू की श्रीमद् भागवत गीता सहेज रखी है। परिवार की तीन पीढ़ियों ने इसका कुरआन शरीफ की तरह ध्यान रखा है। इस पुस्तक का अनुवाद 1898 में संस्कृत से उर्दू में किया गया था। यह भागवत गीता कांट्रैक्टर अनीस अनवर (57) के संग्रह में है। वह समय मिलने पर इसे पढ़ते हैं और इसका दर्शन उन्हें जीवन की राह दिखाता है।
गीता का संस्कृत से उर्दू में अनुवाद मथुरा के पंडित जानकीनाथ मदन देहलवी ने 1898 में किया था। पंडित रामनारायण भार्गव के मार्फत मथुरा प्रेस से प्रकाशित ग्रंथ में श्रीमद् भागवत गीता के पाठ व महत्वपूर्ण श्लोक का उर्दू व फारसी में तर्जुमा है। 121 साल पहले संस्कृत से उर्दू में इसके अनुवाद का मकसद मुस्लिम वर्ग को गीता से रूबरू कराना था।
गीता की कीमत एक आना थी
अनुवादित गीता का प्रकाशन 15 मार्च 1898 को हुआ था। तब कीमत एक आना यानी 6 पैसे थी। 230 पेज में गीता के 18 अध्यायों का संस्कृत से उर्दू अनुवाद है। अनीस अनवर ने बताया इसे कुरआन शरीफ सहित अन्य धर्म ग्रंथों के साथ रखते हैं।
सुख-दुख का दर्शन बहुत गहरा
अनीस अनवर कहते हैं संस्कृत से उर्दू में प्रकाशित इस पुस्तक में पेज नंबर 41 पर प्रकाशित श्लोक “यं हि नव्यथयंत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। संदु:ख सुखंधीरं सौअमृतत्वायकल्पते।।’’ से अनीस अनवर बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। इस श्लोक का अर्थ है जिस मनुष्य को स्पर्श मात्र से कोई असर नहीं होता और जो सुख व दु:ख में एक समान रहता है वो अमर हो जाता है। अनीस पारिवारिक मित्र किशोर शाकल्य के साथ इसे पढ़ते हैं।

मिजोरम / सैनिक स्कूल में पहली बार 12 लड़कियां, प्रिंसिपल बोले- प्रदर्शन में लड़कों से आगे

छिंगछिप  :दो साल पहले तक सैनिक स्कूलों में सिर्फ लड़कों को दाखिला मिलता था, लेकिन 2017 में बने मिजोरम के छिंगछिप सैनिक स्कूल में पहली बार लड़कियों के लिए 10% सीटें आरक्षित की गयीं। 2018 में 6 लड़कियों को दाखिला मिला था। 2019 में आंकड़ा दोगुना हो गया। इन 12 बच्चियों में एक सैन्य अधिकारी की बेटी भी है।
सैनिक स्कूल में लड़कियों को दाखिला देना रक्षा मंत्रालय का एक पायलट प्रोजेक्ट था, यह समझने के लिए कि लड़कों के गढ़ में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है। यह प्रयोग कामयाब रहा, जिसे देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले माह ही ऐलान किया था कि 2021-22 से देश के हर सैनिक स्कूल में लड़कियां भी पढ़ सकेंगी।
तीन अलग-अलग राज्यों से हैं लड़कियां
छिंगछिप के सैनिक स्कूल में इस साल (2019-20) जिन छह लड़कियों का दाखिला हुआ, उनमें तीन (साइथांग्कुई, वनलालॉमपुई, रेशल लालहुनबाईसाई) मिजोरम से हैं। दो (मुस्कान और खुशबू) बिहार से हैं और एक (नेहा आरएस) केरल से है। 2018 से यहां पढ़ रही जोनुनपुई कहती है- ‘अब हमारी फुटबॉल टीम पूरी है। अब हम लड़कों की टीम से मुकाबला कर सकती हैं।’
वहीं, 11 साल की मुस्कान और खुशबू कहती हैं- हमें सेना में जाना है। देश की रक्षा करनी है और दुश्मनों को मारना है। लड़कियों को दाखिला देने के पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों के बारे में स्कूल के प्रिंसिपल लेफ्टिनेंट कर्नल यूपीएस राठौर बताते हैं- कैडेट के तौर पर इन लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर रहा है। ट्रेनिंग लड़कों के समान होती है। आगे चलकर ये सभी सेना में जाएंगी। यह स्कूल 212 एकड़ में है। लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल और वार्डन हैं। सीसीटीवी से कैंपस की निगरानी की जाती है।