नयी दिल्ली : बच्चों की अच्छी सेहत के लिए यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र बाल कोष) ने एक विशेष कदम उठाया है, इससे उनके स्वास्थ्य का स्तर बेहतर हो सकता है। दरअसल, यूनिसेफ ने व्यंजनों की एक किताब प्रस्तुत की है जिसका नाम ‘उत्तपम से लेकर अंकुरित दाल के पराठे’ है। यह किताब बताती है कि 20 रुपये से कम कीमत में तैयार हो जाने वाले पौष्टिक भोजन से बच्चों में कम वजन, मोटापा और एनीमिया जैसी समस्याओं से निपटा जा सकेगा।
पुस्तक में दिए गए सभी व्यंजनों की कैलोरी मात्रा के अलावा प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, फाइबर, आयरन, विटामिन सी और कैल्शियम की मात्रा की विस्तृत जानकारी दी गई है। 28 पन्नों की इस किताब में ताजे भोजन और उसे बनाने में कुल खर्च को भी बेहतरीन तरीके से बताया गया है। यह पुस्तक समग्र राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण 2016-18 के निष्कर्षों पर आधारित है, इनके अनुसार पांच साल से कम उम्र के 35 फीसदी बच्चे कमजोर, 17 फीसदी बच्चे मोटापा से ग्रस्त और 33 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन वाले होते जा रहे हैं। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि 40 प्रतिशत किशोरियां और 18 प्रतिशत किशोर एनीमिया के शिकार हैं।
आलू के भरवां पराठे जैसे व्यंजनों की विधियां
इस किताब में बच्चों में कम वजन की समस्या से निपटने के लिए आलू के भरवां पराठे, पनीर काठी रोल और साबूदाना कटलेट जैसे व्यंजनों की विधियां दी गई हैं। वहीं मोटापा दूर करने के लिए अंकुरित दाल के पराठे, पोहा और सब्जियों वाले उपमा के सुझाव दिए गए हैं।
‘स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल हो किताब’
यूनिसेफ की प्रमुख हेनरीटा एच फोर ने कहा कि इस किताब का उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि कौन सा खाद्य पदार्थ कितना पौष्टिक है। साथ ही इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए और यदि क्षेत्रीय भाषाओं में इसका अनुवाद किया जाए तो इसे लोगों तक पहुंचाना आसान हो जाएगा।
उत्तपम खाकर बेहतर होगा नौनिहालों का स्वास्थ्य, यूनिसेफ का खास डायट प्लान
छह महीने तक खराब नहीं होगा रसगुल्ला!
कोलकाता : रसगुल्लों के शौकीनों को अक्सर शिकायत रहती है कि उनकी प्रिय मिठाई जल्दी खराब हो जाती है। अब जादवपुर विश्वविद्यालय का फूड टेक्नोलॉजी विभाग इस समस्या को दूर करेगा। विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की कोशिश है कि ऐसे खाद्य संरक्षक यानी फूड प्रिजर्वेटिव विकसित किए जाएं जिससे रसगुल्ला छह महीने तक खराब न हो। इसके लिए विभाग राज्य सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है।
विभाग के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने बताया कि इस प्रकार के रसगुल्ले को मशीन से बनाया जाएगा। सरकार बताएगी कि ऐसे रसगुल्ले कब तक बाजार में आएंगे। उन्होंने बताया कि विभाग डायबिटिक रसगुल्ला बनाने की तकनीक विकसित करने का प्रयास कर रहा है। जिससे शुगर के मरीज भी इसका लुत्फ उठा सकें। गौरतलब है कि 14 नवंबर, 2017 को रसगुल्ले के लिए पश्चिम बंगाल को जीई टैग मिला था। इसके बाद राज्य सरकार ने 14 नवंबर, 2019 को रसगुल्ला दिवस मनाया था।
ऑटोमैटिक मशीन से बनेगा, शोध के बाद ही बिकेगा
राज्य के पशुधन विकास मंत्री स्वपन देबनाथ ने बताया कि तकनीक हस्तांतरण होने के बाद ऑटोमैटिक मशीनों से रसगुल्ला बनाने का प्लांट शुरू होगा। इसे विश्वविद्यालय के मानकों के अनुसार बनाया जाएगा और मदर डेयरी ब्रांड के तहत बेचा जाएगा। पहले चरण में जो रसगुल्ला बनेगा उसे बाजार में नहीं उतारा जाएगा बल्कि विशेषज्ञ शोध करेंगे। स्वाद एवं गुणवत्ता परखने के बाद रसगुल्ला ग्राहकों को पेश किया जाएगा।
2000 किलोमीटर तक मार करने वाली अग्नि-2 का पहली बार रात में सफल परीक्षण
बालासोर : भारत ने 2,000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली अग्नि-2 बैलिस्टिक मिसाइल का ओडिशा के बालासोर से सफल रात्रि-परीक्षण किया है। रक्षा सूत्रों ने कहा कि सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण समन्वित परीक्षण रेंज (आईटीआर) से किया गया। अग्नि-2 मिसाइल का परीक्षण पिछले साल ही कर लिया गया था लेकिन रात के समय इसका परीक्षण पहली बार हुआ है। इसकी मारक क्षमता को दो हजार से बढ़ाकर तीन हजार किमी तक किया जा सकता है। अग्नि-2 मिसाइल न्यूक्लियर हथियार ले जा सकने में सक्षम है। भारत ने इससे पहले छह फरवरी को स्वदेश निर्मित अग्नि-1 बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया था। भारतीय सेना के सामरिक बल कमांड ने बालासोर स्थित अब्दुल कलाम द्वीप से इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) के लॉन्च पैड-4 से 700 किलोमीटर दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइल का परीक्षण किया था। बीस मीटर लंबी अग्नि 2 बैलिस्टिक मिसाइल का वजन 17 टन है और यह अपने साथ एक हजार किलो का आयुध 2000 किलोमीटर की दूरी तक ले जा सकती है। अग्नि-2 मिसाइल को पहले ही सेना में शामिल किया जा चुका है
अग्नि-2 की विशेषताएं
20 मीटर लंबी अग्नि 2 बैलिस्टिक मिसाइल का वजन 17 टन है।
अग्नि-2 एक हजार किलो का आयुध 2000 किमी की दूरी तक ले जा सकती है।
सटीक निशाने पर पहुंचने के लिए हाईएक्युरेसी नेविगेशन सिस्टम।
मारक क्षमता को दो हजार से बढ़ाकर तीन हजार किमी तक किया जा सकता है।
गलत तरीके से पैसा काटना बैंक को पड़ा भारी, ग्राहक को देने होंगे 40.85 लाख
बंगलुरू : बिना किसी ठोस वजह के अपने एक ग्राह के खाते से पैसा काटना लक्ष्मी विलास बैंक को काफी भारी पड़ा। इस गलती के लिए बैंक को अब 40.85 लाख रुपये और मुआवजा ग्राहक को देना होगा। यह निर्देश राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने दिया।
आयोग ने बैंक को कर्नाटक निवासी गोपाल के खाते से 11 अप्रैल 2015 को काटी गई धनराशि पर भुगतान किए जाने के दिन तक का ब्याज और 25,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। आयोग के पीठासीन सदस्य दीपा शर्मा और सदस्य सी विश्वनाथ ने कहा कि प्रतिवादी (लक्ष्मी विलास बैंक) ने बिना किसी वैध कारण के अपीलकर्ता के खाते से 40,85,254 रुपये की राशि काट ली थी। शिकायतकर्ता को 40,85,254 रुपये का नुकसान हुआ है। शिकायतकर्ता को बैंक से इस राशि का दावा करने का अधिकार है।
मनाली में बनेगा देश का पहला आईस स्केटिंग हॉकी स्टेडियम
कुल्लू : कुल्लू जिले के विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मनाली के अलेउ में देश का पहला आईस स्केटिंग हॉकी स्टेडियम बनने जा रहा है। स्टेडियम और रिंक का निर्माण अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं खेल संस्थान परिसर में होगा। प्रदेश में विंटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए धर्मशाला में हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट के दौरान नीदरलैंड के साथ इसके लिए एमओयू साइन हुआ है।
पीपीपी मोड़ के तहत इस योजना पर करीब 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे। स्टेडियम में 12 माह बर्फ रहेगी, जिसमें हॉकी के साथ आईस स्केटिंग का पर्यटक आनंद ले सकेंगे। इससे जहां विंटर खेलों को बढ़ावा मिलेगा, वहीं पर्यटन को भी पंख लगेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं खेल संस्थान के निदेशक कर्नल नीरज राणा ने बताया कि यह एमओयू देश के विंटर स्पोर्ट्स के लिए वरदान साबित होगा, क्योंकि दोनों विंटर गेम्स ओलंपिक में खेली जाने वाली प्रतियोगिताएं हैं। होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष अनूप राम ठाकुर, पर्यटन कारोबारी रूपेश गौतम, संजय कुमार, मोहर सिंह ठाकुर ने बताया कि स्टेडियम पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा।
जनवरी में मनाली आएगी नीदरलैंड की टीम
प्रस्तावित हॉकी आईस स्केटिंग स्टेडियम और रिंक निर्माण के निरीक्षण के लिए नीदरलैंड की टीम जनवरी, 2020 के आखिरी हफ्ते मनाली पहुंचेगी। टीम इस दौरान जगह देखने के बाद ही स्टेडियम निर्माण का मास्टर प्लान तैयार करेगी
अब्दुल जब्बार स्मृति शेषः भोपाल के लाखों गैस पीड़ितों का फ़रिश्ता चला गया
राजेश बादल
अब्दुल जब्बार अब नहीं हैं। दिल इस हकीक़त को मानने के लिए तैयार नहीं है। पैंतीस बरस से लाखों गैस पीड़ितों के लिए संसद से लेकर सड़क तक और सरकार से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक अथक लड़ाई लड़ने वाले जब्बार इन दिनों अपने शरीर पर अनेक आक्रमणकारियों से लड़ाई लड़ रहे थे। सारी जवानी पीड़ित मानवता की खिदमत में होम करने वाले अब्दुल जब्बार गैस त्रासदी के सताए लोगों के लिए एक फ़रिश्ते से कम नहीं थे।
यूनियनकार्बाइड के इस घिनौने जुर्म के बाद पीड़ितों के लिए अनगिनत हितैषी और स्वयंसेवी संगठन सामने आए और अपनी दुकानें चमका कर चले गए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीतकर चले गए। एक अब्दुल जब्बार था, जो मोर्चे पर डटा रहा। न हारा,न टूटा,न बिखरा। हत्यारी गैस ने उनके माता-पिता और भाई को छीन लिया था। उनके पचास फ़ीसदी फेफड़े खराब हो गए थे, लेकिन दिल के तूफ़ान कभी चेहरे पर नहीं आए। शायद ही कोई होगा जिसने मिलने पर उनके चेहरे पर मुस्कराहट न देखी हो। ज़िंदगी में अनेक झंझावात आए। कभी-कभी जब्बार भाई के चेहरे पर एक फ़ीकी उदासी दिखी, लेकिन अगले दिन से फिर वही जब्बार। लोगों की सेवा के लिए तैयार ।
पैंतीस बरस पहले मेरी मुलाक़ात जब्बार भाई से हुई थी। गैस त्रासदी के फौरन बाद। वह सत्ताईस साल के एक नौजवान सामजिक कार्यकर्ता और एक पत्रकार की मुलाक़ात थी। इसके बाद वे कब जब्बार भाई हो गए- याद नहीं। मुझसे साल डेढ़ साल बड़े थे, लेकिन बराबर जैसा ही मान दिया। कभी परेशान होते तो दिल के जख्म भी दिखाते और बाद में ख़ुद ही मरहम लगा लेते। यह सोचकर कि इनका कोई इलाज नहीं। दिल्ली प्रवास के कारण मुलाकातें कम हुईं ,लेकिन जब भी मिलते, उसी खूलूस के साथ। कभी संघर्ष में नया मोड़ आता या कोई नई सूचना आती तो उनका फ़ोन आता” राजेश भाई! कैमरा लेकर आ जाओ। मैं समझ जाता कि कोई बड़ी बात है। यूनियन कार्बाइड की उस हत्यारी मिथाइल आइसोसाईनेट गैस के असर से भोपाल के हज़ारों परिवारों की अनेक पीढ़ियां अब तक ज़हर का दंश झेल रही हैं। यह जब्बार का ही जज़्बा था कि भोपाल मेमोरियल अस्पताल की स्थापना कराई और लाखों पीड़ितों के लिए अत्याधुनिक चिकित्सा मुहैया कराई। गैस पीड़ित महिलाओं को रोज़गार दिलाने के लिए सिलाई सेंटर खोले और उनके घरों में चूल्हा जलवाया। बरसों तक ज़हरीली गैस के शिकार मरीज़ों के लिए मुआवजे की लड़ाई लड़ी।
यूनियन कार्बाइड के मुज़रिमों को अपराधी क़रार देने के लिए सर्वोच्च अदालत तक उनका संघर्ष बेमिसाल है। दुनिया भर के नियम क़ायदे-क़ानून उन्हें ज़बानी याद थे। मैंने करीब सत्रह-अठारह साल तक गैस त्रासदी पर लिखा। सारे घटनाक्रम कवर किए और टेलीविज़न के लिए रपटें बनाईं। जब भी कोई संशय होता,जब्बार भाई उनका निवारण करते। हम जब्बार पर भरोसा कर सकते थे,सरकार पर नहीं। जो आंकड़े उनके पास होते, वे किसी विभाग के पास नहीं होते। एक तरह से वे एन्साइक्लोपीडिया थे। पाँच बरस पहले राज्यसभा टीवी के लिए एक वृत्तचित्र बना रहा था तो उन्होंने तीस साल की फिल्म आंखों के सामने चला दी थी। दशकों से हर शनिवार भोपाल के यादगारे शाहजहानी पार्क में गैस पीड़ित इकट्ठे होते रहे हैं और हर सप्ताह के सुख दुःख बांटते रहे हैं। अब जब्बार भाई नहीं हैं तो पीड़ित एक तरह से अनाथ हो गए हैं। अपनी आंखों के सामने ऐसे लोगों को पद्म सम्मान मिलते देख रहा हूं कि ताज्जुब होता है। दुनिया की सबसे भीषण और भयावह त्रासदी का शिकार लोगों के लिए सारे विश्व भर में इकलौता संघर्ष न किसी राज्य सरकार को दिखाई दिया न केंद्र सरकार को।
जब्बार भाई ! आप हमारे दिल में हमेशा बसे रहेंगे।
(साभार – अमर उजाला)
महिलाओं को नजरअंदाज करने से वित्तीय क्षेत्र को हो रहा भारी नुकसान
नयी दिल्ली : वित्तीय क्षेत्र में महिलाओं को काफी कम जगह मिली है जिससे इस क्षेत्र को भारी नुकसान हो रहा है। अक्सर महिलाओं की जरूरतों के हिसाब से वित्तीय प्रोडक्ट पेश नहीं किया जाता है। उनकी जरूरतों को अनसुना करना वित्तीय सेक्टर के लिए घाटा साबित हुआ है। वित्तीय क्षेत्र को इससे एक साल में 700 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है।
ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर जेंडर न्यूट्रल नजर आने वाले प्रोडक्ट पुरुषों की जरूरत को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मैनेजमेंट कन्सल्टेंसी फर्म ऑलिवर वेमन (Oliver Wyman) ने इस संदर्भ में कहा है कि आमतौर पर महिलाओं की बातों को सुना नहीं जाता है या फिर उन्हें पहले से ही तय प्रोडक्ट बेचे जाते हैं। वहीं रिपोर्ट रिसर्चर जेसिका क्लेंपर (Jessica Clempner) ने भी कहा है कि वित्तीय सेक्टर में महिलाओं को ज्यादा जगह नहीं मिलती है। सबसे बड़ा समूह होने के बावजूद इसके पास फाइनेंस प्रोडक्ट की पहुंच सबसे कम है। जेसिका क्लेंपर का कहना है कि महिलाओं को सही प्रोडक्ट नहीं देने के चलते वित्तीय सेक्टर को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं, कई बार ऐसा भी होता है कि जो प्रोडक्ट जेंडर न्यूट्रल नजर होते हैं, वे भी पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। लेकिन ऐसे प्रोडक्ट महिलाओं की वित्तीय जीवन की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ होते हैं।
50 करोड़ डॉलर कमा सकते हैं बीमाकर्ता
इसके लिए ऑलिवर ने एक अनुमान भी लगाया है, जिसके अनुसार अगर बीमाकर्ता पुरुषों के रेट के बराबर ही महिलाओं को भी जीवन पॉलिसी बेचे तो ने नए प्रीमियम में 50 करोड़ डॉलर कमा सकते हैं। इसके अतिरिक्त ऑलिवर के अनुसार, महिलाएं शेयर और बॉन्ड के बजाय अपने असेट नकद में रखना पसंद करती हैं, जिससे वेल्थ मैनेजर्स को फीस के रूप में 25 अरब डॉलर का नुकसान होता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर आरटीआई कानून के दायरे में आएगा : सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर भी सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मुख्य न्यायाधीश (सीजीआई) का दफ्तर सार्वजनिक कार्यालय है, इसलिए यह आरटीआई के दायरे में आएगा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2010 के निर्णय को सही ठहराते हुए इसके खिलाफ हाई कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और शीर्ष अदालत के केंद्रीय सार्वजनिक सूचना अधिकारी की अपील खारिज कर दी। संविधान पीठ ने आगाह किया कि सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है और पारदर्शिता के मुद्दे पर विचार करते समय न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ध्यान में रखना चाहिए। यह निर्णय सुनाने वाली संविधान पीठ के बाकी सदस्यों में न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूति संजीव खन्ना शामिल थे। संविधान पीठ ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए की गई सिफारिश में सिर्फ न्यायाधीशों के नामों की जानकारी दी जा सकती है लेकिन इसके कारणों की नहीं। प्रधान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने एक फैसला लिखा जबकि न्यायमूर्ति एन वी रमण और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ ने अलग निर्णय लिखे। न्यायालय ने कहा कि निजता का अधिकार एक महत्वपूर्ण पहलू है और प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय से जानकारी देने के बारे में निर्णय लेते समय इसमें और पारदर्शिता के बीच संतुलन कायम करना होगा। न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता को साथ-साथ चलना है। न्यायमूर्ति रमण ने न्यायमूर्ति खन्ना से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि निजता के अधिकार और पारदर्शिता के अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बीच संतुलन के फार्मूले को उल्लंघन से संरक्षण प्रदान करना चाहिए।
क्या कहा था दिल्ली हाईकोर्ट ने?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सीजेआई का दफ्तर एक सार्वजनिक प्राधिकरण है और इसे सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। पीठ ने इस साल अप्रैल में इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। सीजेआई रंजन गोगोई ने पहले यह कहा था कि पारदर्शिता के नाम पर एक संस्था को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। नवंबर 2007 में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने आरटीआई याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से जजों की संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी थी जो उन्हें देने से इनकार कर दिया गया। अग्रवाल इसके बाद सीआईसी के पास पहुंचे और सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट से इस आधार पर सूचना देने को कहा कि सीजेआई का दफ्तर भी कानून के अंतर्गत आता है। इसके बाद जनवरी 2009 में सीआईसी के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई हालांकि वहां भी सीजेआई के आदेश को कायम रखा गया।
रौला खलफ होंगी फाइनेंशियल टाइम्स की पहली महिला संपादक
फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) के 131 साल के इतिहास में पहली बार रौला खलफ इसको संपादित करने वाली पहली महिला बन जाएंगी। फाइनेंशियल टाइम्स के वर्तमान संपादक लियोनेल बार्बर जनवरी में अपना पद छोड़ देंगें। खलफ ने सल्मोन पिंक न्यूजपपेर में दो दशकों से अधिक समय के दौरान उप संपादक, विदेशी संपादक और मध्य पूर्व संपादक के रूप में कार्य किया है। हाल के वर्षों में उन्होंने ‘एफटी’ पर महिला पाठकों और पत्रकारों की संख्या बढ़ाने पर जोर देने की माँग की है।
उन्होंने कहा कि ‘दुनिया के सबसे बड़े समाचार संगठन ‘एफटी’ में संपादक के पद पर नियुक्त होना मेरे लिए एक महान सम्मान की बात है। मैं लियोनेल बार्बर की असाधारण उपलब्धियों को आगे बढ़ानेे के लिए उत्सुक हूं और वर्षों से उनकी सलाह के लिए आभारी हूं।’ लेबनान की खलफ, गार्जियन की कैथरीन विनर के साथ, ब्रिटेन में प्रमुख समाचार पत्रों को संपादित करने वाली कुछ महिलाओं में से एक हैं। साल 1995 में एफटी में शामिल होने से पहले, उन्होंने न्यूयॉर्क में फोर्ब्स पत्रिका में काम किया था।
भारतीय भाषा परिषद में युवाओं के लिए साहित्य संवाद
कोलकाता : साहित्य मानवीय संवेदना और मूल्यों का संरक्षण करता है । इससे विच्छिन्न होकर महानगर के लोग अपनी राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते। खासकर हिन्दी भाषियों को साहित्य से प्रेम बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि इसके बिना मातृभाषा की रक्षा नहीं की जा सकती। भारतीय भाषा परिषद और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आयोजित साहित्य संवाद के वक्ताओं ने यह विचार व्यक्त किए। साहित्य संवाद की शुरुआत संगीतज्ञ रश्मि पांडे के काव्य संगीत से हुई । इसके बाद प्रियंकर पालीवाल, सेराज खान बातिश, रामकेश सिंह, मधु सिंह, राहुल गौड, सूर्य देव राय ने स्वरचित कविता पाठ किया। विश्वभारती की शोध छात्रा प्रोफेसर गुलनाज बेगम ने स्त्री जीवन के अधिकारों के संबंध में चित्रा मुदगल के उपन्यासों का हवाला देकर कहा कि, स्त्रियों की दशा समाज में अभी भी खराब है और उन्हें बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। खिदिरपुर कॉलेज की शिक्षिका प्रोफेसर इतु सिंह ने कहा कि आजादी के पहले के भारत को समझना हो तो प्रेमचंद का साहित्य पढ़ना होगा और आजादी के बाद के भारत की जानकारी हरिशंकर परसाई के व्यंग्य साहित्य से होती है ।आज समाज में व्यंग्य की भूमिका बढ़ गई है ।भारतीय भाषा परिषद की मंत्री विमला पोद्दार ने कहा कि साहित्य के विकास के लिए युवाओं को आगे आना होगा। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त महासचिव संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य संवाद युवा पीढ़ी के रचनाकारों तथा वरिष्ठ लेखकों के बीच संवाद का मंच है । भारतीय भाषा परिषद भाषाओं के बीच सेतु निर्माण के साथ नई पीढ़ी में साहित्यिक रुचि पैदा करना चाहता है।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए सांस्कृतिक पुर्ननिर्माण मिशन के अध्यक्ष और भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉक्टर शंभुनाथ ने कहा कि साहित्य जीवन जीने की एक कला है जो मनुष्य को रूढ़ियों और भेदभाव से मुक्त करती है और उच्च मानवीय भावनाओं की ओर ले जाती है । संस्था के महासचिव राजेश मिश्र ने कहा कि साहित्य संवाद का यह मंच नई पीढ़ी के रचनाकारों को सृजनात्मक संस्कार प्रदान करता है । धन्यवाद ज्ञापन करते हुए रामनिवास द्विवेदी ने कहा कि युवाओं की पीढ़ी ही साहित्य को समाज में बचाएगी और हिन्दी से प्रेम का विस्तार करेगी।




