Saturday, July 4, 2026
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भवानीपुर कॉलेज को राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन नैक टीम ने दिया ए ग्रेड

कोलकाता । भवानीपुर कॉलेज का राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (एनएएसी) के तीन विशेषज्ञों की एक टीम के रूप में गहन मूल्यांकन किया गया जिनमें डॉ एचपीएस चौहान, डॉ. देबल दासगुप्ता और डॉ. स्नेहल डोंडे थे जिन्होंने संस्थान का दौरा किया। इस सहकर्मी टीम को नैक की ओर से कॉलेज के मानकों और प्रदर्शन का ऑडिट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। गत 4और 5 जनवरी को दो दिवसीय दौरे के दौरान, सहकर्मी टीम ने कॉलेज के भौतिक बुनियादी ढांचे का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। इसमें कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालय और अन्य सुविधाओं का मूल्यांकन शामिल था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे आवश्यक शैक्षिक मानकों को पूरा करते हैं। उनके एजेंडे में कॉलेज से जुड़े विभिन्न हितधारकों के साथ बैठकों की एक श्रृंखला भी शामिल थी। उन्होंने छात्रों के शैक्षिक अनुभव और सीखने के माहौल के साथ संतुष्टि का आकलन करने के लिए उनके साथ बातचीत की। संकाय सदस्यों के साथ बातचीत से शैक्षणिक कठोरता और शिक्षण और अनुसंधान गतिविधियों के लिए प्रदान किए गए समर्थन के बारे में जानकारी मिली।
टीम ने कॉलेज की परिचालन प्रभावशीलता को समझने के लिए गैर-शिक्षण स्टाफ सदस्यों से भी मुलाकात की। माता-पिता से उनके बच्चों के विकास पर संस्थान के प्रभाव पर उनके दृष्टिकोण पर चर्चा करने के लिए परामर्श लिया गया। पूर्व छात्रों ने भवानीपुर कॉलेज में अपनी शिक्षा के दीर्घकालिक मूल्य पर विचार प्रस्तुत किए। अंत में, कॉलेज के प्रशासनिक निकायों के साथ बैठकों के माध्यम से प्रबंधन के दृष्टिकोण, नेतृत्व और शासन की समीक्षा की गई। नैक सहकर्मी टीम का दौरा मान्यता प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भवानीपुर कॉलेज में शैक्षिक मानक और प्रथाएं परिषद द्वारा निर्धारित गुणवत्ता और उत्कृष्टता की अपेक्षाओं के अनुरूप हों। भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज को राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (एनएएसी), यूजीसी, भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित मान्यता ‘ग्रेड ए’ प्राप्त हुआ।
प्रबंधन के सदस्यों, शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टाफ, माता-पिता, पूर्व छात्र और हमारे छात्रों के लिए हार्दिक प्रशंसात्मक है। कालेज के मैनेजमेंट की ओर से अध्यक्ष रजनीकांत दानी,उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, प्रदीप सेठ, राजू भाई,उमेद ठक्कर,शिवानी शाह,नलिनी पारेख, रेणुका भट्ट,प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी,डायरेक्टर डॉ सुमन मुखर्जी,टीआईसी डॉ शुभव्रत गंगोपाध्याय,सभी शिक्षकों,गैरशिक्षक स्टाफ,एनसीसी टीम,एन एस एस टीम, कालेज के कलेक्टिव, विद्यार्थियों आदि का पूर्ण सहयोग रहा। कालेज ने नैक टीम के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त किया। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

 

आईएमटी गाजियाबाद से शैक्षणिक सहयोग हेतु भवानीपुर कॉलेज का समझौता

कोलकाता । आईएमटी गाजियाबाद के निदेशक डॉ. तलवार और भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के रेक्टर प्रो. दिलीप शाह ने छात्रों और संकाय के आदान-प्रदान के प्रावधानों सहित शैक्षणिक सहयोग और साझेदारी के संबंध में समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। सहयोगात्मक प्रयास के तहत भवानीपुर कॉलेज और आईएमटी गाजियाबाद की फैकल्टी और छात्र एक-दूसरे की कक्षाओं का लाभ उठा सकेंगे।रेक्टर प्रो दिलीप शाह के सद्प्रयास से कॉलेज में विद्यार्थियों को उच्चतम शिक्षा देने के लिए सदैव तत्परता से पूर्ण करता है। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने आईएमटी गाजियाबाद के निदेशक डॉ तलवार को बधाई दी।इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने लिया उत्कृष्ट साहित्यिक आनंद

कोलकाता । भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने विक्टोरिया हॉल में आयोजित टाटा कोलकाता लिटरेरी मीट 24 में देश विदेश के विभिन्न प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाधर्मिता को सुनने का अवसर मिला ।यह बहुत ही गौरव की बात रही कि भवानीपुर कॉलेज ने इस साहित्यिक कार्यक्रम में नोलेज पार्टनर के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। 23 जनवरी को कोलकाता लिटरेरी मीट 24 के बारहवें सत्र का उद्घाटन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल माननीय डॉ सी वी आनंद बोस जी ने किया। यह लिटरेरी मीट 23 जनवरी से 27 जनवरी तक चला है जिसमें देश विदेश के कई साहित्यकारों का साक्षात्कार हुआ। प्रथम सत्र में सन – एट – ल्यूमियरे विक्टोरिया हॉल के प्रांगण में साहित्यकार अब्दुल रज्जाक गुरनाह से बातचीत करने के लिए नीलांजना एस राय रहीं। रज्जाक ने अपने वक्तव्य में अपने रचनात्मक कार्यों के विषय में विस्तार से जानकारी दी। वहीं दूसरे सत्र 23 जनवरी, विक्टोरिया मेमोरियल के हॉल सन-एट-लुमियरे में बहुभाषावाद का उपहार विषय पर सुधा मूर्ति ने बताया कि कैसे कन्नड़, अंग्रेजी और अन्य साहित्यिक परंपराओं ने उनके लेखन को आकार दिया है। मालविका बनर्जी से बातचीत के दौरान सुधा जी ने अपनी रचनात्मक यात्रा की रूपरेखा रखी। भवानीपुर कॉलेज की प्रमुख प्रतिनिधि शिवानी मिराज डी शाह ने सुधा मूर्ति जी के साथ कॉलेज मोमेंटो के साथ समूह फोटो खिंचवाई। इस अवसर पर शिक्षिकाओं में प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, डॉ वसुंधरा मिश्र,प्रो चंपा श्रीनिवासन और प्रो समीक्षा खंडूरी की उपस्थिति रही ।प्रसिद्ध कथाकार सुधा मूर्ति जी से बातचीत कर रहीं थीं मालविका बनर्जी। सुधा मूर्ति ने बच्चों और बड़ों से संबंधित व्यवहारिक रूप से जीवन को कैसे देखती हैं, इस विषय पर विस्तार से बताया। भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों ने उनसे प्रश्न भी पूछे। सुधा मूर्ति की कई पुस्तकें भी खरीदी। राज्यपाल माननीय सी वी आनंद बोस ने अपनी पुस्तक चेखव एंड हिज बॉयज़, सायलेंस साउंड्स गुड आदि कई पुस्तकें निःशुल्क रखी, जिसे विद्यार्थियों ने ली । 24 जनवरी को इरफान: तिग्मांशु धूलिया, तिलोत्तमा शोम और शुभ्रा गुप्ता ने इरफान के जादू और उनकी चिरस्थायी विरासत पर चर्चा की। शहाना चटर्जी से बातचीत के दौरान अपने विचार व्यक्त किए।
25 जनवरी को द बॉय इन द स्ट्राइप्ड पजामा: जॉन बॉयने बताते हैं कि बच्चों की यह पीढ़ी उपन्यास से कैसे जुड़ी है। यह बातचीत बिजल वछाराजानी (जेकेएलएम) के साथ रही। जर्नी टू इंडिया मॉडर्न विषय पर संदीप रॉय के साथ बातचीत में रहे तरुण ताहिलियानी। एक और तरह की आज़ादी विषय पर गुरुचरण दास ने माइली अश्वर्या के साथ अपने संस्मरणों पर चर्चा की। इन सभी साहित्य सत्रों के साहित्यकारों के महापर्व में भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के मैनेजमेंट ने नोलेज पार्टनर बनकर साहित्य के क्षेत्र में विद्यार्थियों को साहित्य के प्रति रुचि और लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।इस कार्यक्रम का आयोजन और संयोजन किया उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो समीक्षा खंडूरी, प्रो चंपा श्रीनिवासन, प्रो विनीता शर्मा, डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।विद्यार्थियों में कशिश साह, उज्जवल करमचंदानी,अभिषेक शॉ , प्रियंका बरडिया, श्रेयांस कुमार, अनिकेत दासगुप्ता ,देवांग नागर, अर्पिता बिस्वास, मौलिंदु मिसरा, जुगल कैलोया, समृद्धि नंदी आदि विद्यार्थियों की उपस्थिति रही और साहित्य । जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

लिटिल थेस्पियन का 13वां राष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव ‘जश्न ए अज़हर’ सम्पन्न

कोलकाता ।  हिंदी रंगमंच के विकास में पश्चिम बंगाल में लिटिल थेस्पियन का नाम सर्वोपरि है जो अत्यंत दृढ़ता के साथ गुणवत्तापूर्ण रंगमंच की मशाल लेकर आगे बढ़ता है। लिटिल थेस्पियन ने इस वर्ष अपना 13वां जश्न-ए-अजहर 19 से 24 जनवरी 2024 तक  ज्ञान मंच में आयोजित किया जो रंग संवाद और नाटकों का उत्सव रहा। यह ज़श्न ख़ास कर हमारे युवा पीढ़ी को समर्पित है जिसमें वह नाटक को समझने से लेकर नाटक करने, लिखने और पढ़ने की प्रक्रिया को समझ में सक्षम रहे। महोत्सव पिछले कुछ वर्षों में कोलकाता के प्रतिष्ठित आयोजनों में से एक बन गया है, जिसमें देश भर के समकालीन रंगमंच का प्रदर्शन किया जाता है। महोत्सव का 13वां संस्करण महिलाओं को समर्पित है । इस महोत्सव को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है और अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा समर्थित है।
यह महोत्सव 19 जनवरी 2024 को रंग संवाद के साथ शुरू हुआ जिसमें डॉ. शुभ्रा उपाध्याय (प्रिंसिपल, खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज), डॉ. मोहम्मद काज़िम (उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), डॉ. अलमास हुसैन (थिएटर निर्देशक) और नेहा मल्लिक (छात्रा, खिदिरपुर कॉलेज) मुश्ताक काक: एक शानदार फनकार विषय पर विचार रखे। सत्र का संचालन डॉ. संजय जायसवाल (हिंदी विभाग, विद्यासागर विश्वविद्यालय, मिदनापुर) ने किया। महोत्सव का उद्घाटन श्री श्रीधर एम देवगिरी (सी.सी.ई. (आर एंड डी) पूर्व, डी.आर.डी.ओ), डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय (कुलपति, बी.एस.ए.ई.यू), डॉ. सत्या उपाध्याय तिवारी (प्रिंसिपल, कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता), डॉ. देवेन्द्र कुमार देवेश (क्षेत्रीय सचिव, साहित्य अकादमी, कोलकाता), ऋषिकेष राय (प्रभारी सचिव एवं नोडल अधिकारी, टी-बोर्ड, कोलकाता), रवि शंकर सिंह (सह संपादक, बर्तमान पत्रिका हिंदी दैनिक, कोलकाता) एवं कौशल किशोर त्रिवेदी (संपादक, प्रभात खबर, कोलकाता) ने किया। ज़हीर अनवर (प्रसिद्ध उर्दू थिएटर निर्देशक और नाटककार, कोलकाता) को तीसरा अज़हर आलम मेमोरियल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बाद लिटिल थेस्पियन का नया प्रोडक्शन ‘भीगी औरतें’ का मंचन हुआ जिसका लेखन  और निर्देशन उमा झुनझुनवाला ने किया। 20 जनवरी 2024 को आयोजित  रंग संवाद में विजय पंडित (थिएटर डायरेक्टर, मुंबई), डॉ. विजया सिंह (रानी बिड़ला कॉलेज, कोलकाता), डॉ. रुकैया शाहीन (एम.एम.एम कॉलेज, दुर्गापुर) और आशुतोष कुमार राउथ (छात्र, कलकत्ता विश्वविद्यालय) “इक्कास्वी सदी के नाटकों में युगीन चेतना” पर अपने विचार रखे। रंग संवाद के इस सत्र का संचालन डॉ. इतु सिंह (हिंदी विभाग, खिद्दरपुर कॉलेज, कोलकाता) द्वारा किया गया। इसके बाद ती भारती जैनानी (वरिष्ठ पत्रकार, प्रभात खबर, कोलकाता) को सम्मानित किया गया । इसके बाद अनुष्ठान, मुम्बई के नाटक जोगिया राग का मंचन किया जाएगा, जिसके निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर‌ हैं।
21 जनवरी 2024 को रंग संवाद का विषय था “हिंदी रंगमंच और महिलाओं की भूमिका: संदर्भ त्रिपुरारी शर्मा” और इसमें डॉ. वसुन्धरा मिश्रा (हिंदी विभाग, भवानीपुर कॉलेज, कोलकाता), डॉ. कृष्णा  कुमार श्रीवास्तव (हिंदी विभाग, आसनसोल गर्ल्स कॉलेज, आसनसोल), सुदीपा बसु (प्रसिद्ध अभिनेत्री, कोलकाता) और मोहम्मद इरफ़ान अली (छात्र, खिद्दरपुर कॉलेज, कोलकाता) ने विचार रखे। रंग संवाद का संचालन डॉ. सूफिया यसमिन (हिंदी विभाग, विद्यासागर कॉलेज फॉर वुमन, कोलकाता) द्वारा किया गया। प्रसिद्ध थिएटर अभिनेता/निर्देशक स्वाति रॉय को सम्मानित किया गया, जिसके बाद यूनिकॉर्न एक्टर्स स्टूडियो, दिल्ली का नाटक रूप अरूप का मंचन हुआ जिसका लेखन और निर्देशन त्रिपुरारी शर्मा का है |
22 जनवरी 2024 को रंग संवाद में जहीर अनवर (नाटककार, कोलकाता), डॉ. विनय कुमार मिश्र (साहित्य समीक्षक, कोलकाता),  प्रेम कपूर (थिएटर समीक्षक, कोलकाता) और निधि सिंह (छात्रा, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने “नाट्य रूपान्तरण की अवश्यकता और चुनौतियाँ” विषय पर अपने विचार रखे। इस रंग संवाद का संचालन अल्पना नायक (हिन्दी विभाग, श्री शिक्षायतन कॉलेज, कोलकाता) द्वारा किया गया। इसके बाद  दिनेश वडेरा (रंगमंच निर्देशक, कोलकाता) का अभिनंदन किया गया और सेतु सांस्कृतिक केंद्र, वाराणसी के सलीम राजा द्वारा निर्देशित नाटक मोह (मन्नू भंडारी की कहानी मजबूरी पर आधारित) का मंचन हुआ।
23 जनवरी 2024 को रंग संवाद ‘जनप्रतिरोध में नुक्कड़ नाटकों की भूमिका’ पर हुआ। इस विषय पर महेश जयसवाल (थिएटर एक्टिविस्ट, कोलकाता), डॉ. नईम अनीस (एच. ओ. डी, उर्दू विभाग, कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता),  अंशुमान भौमिक (थिएटर क्रिटिक, कोलकाता) और प्रीति सिंह (शोधार्थी , तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय) अपने विचार रखे। रंग संवाद का संचालन डॉ. गीता दूबे (हिन्दी विभाग, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता) ने किया। थिएटर एक्टिविस्ट महेश जयसवाल को सम्मानित किया गया और इसके बाद अभिनव रंगमंडल, उज्जैन द्वारा शरद शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक संभ्रांत वैश्य का मंचन किया गया।
24 जनवरी 2024 को, लिटिल थेस्पियन द्वारा आयोजित पहली ड्रामा प्रतियोगिता में से चुनी गई तीन सर्वश्रेष्ठ टीमों ने अपने नाटकों का मंचन किया जिनमें स्वांग ड्रामा क्लब (विद्यासागर कॉलेज फॉर वुमन, कोलकाता) का नाटक लाल इश्क, एस.एम. राशिद थिएटर ग्रुप, कोलकाता  का नाटक बदलते मौसम के दिन और राजेंद्र क्रिएटिव ग्रुप (खिद्दरपुर कॉलेज, कोलकाता) का नाटक अब नहीं सहेंगे शामिल थे।
इसके बाद नौशाद रज़ा (थिएटर अभिनेता/निर्देशक) का अभिनंदन किया गया और इसके बाद उमा झुनझुनवाला द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक परछाइयां (साहिर लुधियानवी की एक लंबी कविता) का मंचन किया गया। महोत्सव का समापन नाटक प्रतियोगिता और शोध आलेख लेखन के विजेताओं को पुरस्कार और प्रमाणपत्र वितरण के साथ हुआ।

भारत जैन महामंडल लेडिज विंग द्वारा सुरंगों राजस्थान का आयोजन

कोलकाता । भारतीय भाषा परिषद् में भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता शाखा ने सुरंगों राजस्थान कार्यक्रम आयोजन 27 जनवरी भारतीय भाषा परिषद में किया गया। राजस्थानी भाषा के ज्यादा से ज्यादा बोलने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि के तौर पर लोकगायक राजस्थान जयपुर के संजय मुकुन्दगढ़ को बुलाया गया जिन्होंने राजस्थान के प्रमुख लोकगीतों चांद चढयो गिगनार, पल्लो लटको,ओर रंग दे, बाई सारा बीरा आदि बहुत सारे गीतों से सभी महिला सदस्याओं को आनंदित कर दिया। सभी ने संजय मुकुंदगढ के ढप के साथ नृत्य में भी भाग लिया। विशेष अतिथि के तौर पर श्री विश्वंभर जी नेवर जी प्रधान सम्पादक छपते छपते अखबार और निदेशक ताजा टीवी एवम् डॉ वसुंधरा मिश्र हिंदी भवानीपुर कालेज रहीं । सभी ने राजस्थानी भाषा को अपनाने पर जोर दिया। श्रीमती अंजू सेठिया ने इस बात पर जोर दिया कि हमें पहली शुरुआत राजस्थानी भाषा को अपने घर से करनी चाहिए। संजय मुकुन्दगढ़ प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय लोक गीत गायक है। संजय जी ने बहुत सुंदर लोकगीत प्रस्तुत किये, सभी मंत्रमुग्ध हो गए। – प्रत्येक देश एवं समाज में लोक – भावों की अभिव्यंजना के लिए अलग – अलग अवसर पर कई प्रकार के गीत प्रचलित रहते हैं। लोक में गीत गाने वाला व्यक्ति अपने भावों की अभिव्यक्ति कर आनन्द का अनुभव करता है, पर साथ ही उसके द्वारा गाए गए अच्छे गीतों से श्रोता भी भाव – विभोर हो जाता है। इस तरह आत्मिक सुख का ही नहीं, अपितु सामाजिक जीवन में उल्लास एवं सुखानुभूति का भी प्रसार करते हैं।इस अवसर पर भवानीपुर जास्मिन ने गजल सुनाई। पूर्व अध्यक्ष सरोज भंसाली और रूबी गोलछा ने मेहमानों का स्वागत उत्तरीय ओढ़ाकर किया। साथ ही राजस्थानी चाय नाश्ते का भी प्रबंध किया गया। यह कार्यक्रम अध्यक्ष चंदा गोलछा,सुमन मालु और नाश्ता कनक चोपड़ा के सहयोग से किया गया। भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता शाखा के लगभग 75 प्रोग्राम आयोजित किए जा चुके है। पूरी तरह भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता शाखा की बहनों के सहयोग से हर प्रोग्राम किया जाता है।   कोलकाता की प्रसिद्ध  अध्यापिका रेखा शॉ, सरोज भंसाली, कल्पना बाफना, अंजू बैद, 50 की उपस्थित रही। विश्वंभर नेवर ने विषय पर अपनी बातें रखीं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन दिया ।यह जानकारी भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता शाखा की संस्थापिका सलाहकार अंजू सेठिया ने दी।

एचआईटीके में में मनाया गया गणतंत्र दिवस

कोलकाता । हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, कोलकाता ने 26 जनवरी 2024 को परिसर में 75वां गणतंत्र दिवस गर्व, जोश और उत्साह के साथ मनाया।  इस दिन मुख्य अतिथि के रूप में फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड की रणनीति और संचालन प्रमुख ऋचा सिंह देबगुप्ता की उपस्थित रहीं। कार्यक्रम के दौरान स्पेन के शीटगो के सीईओ यानिक वान डेर वार्ट भी आमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
समारोह की शुरुआत द हेरिटेज स्कूल परिसर में मुख्य अतिथि द्वारा विक्रम स्वरूप (अध्यक्ष, स्कूल प्रबंधन समिति, द हेरिटेज स्कूल),  सीमा सप्रू (प्रिंसिपल, द हेरिटेज स्कूल), की उपस्थिति में ध्वजारोहण  के साथ हुई। प्रदीप अग्रवाल, सीईओ, हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, विवेक दिनोदिया, कार्यकारी निदेशक, हाई-टेक सिस्टम्स प्राइवेट। लिमिटेड और स्कूल के अन्य शिक्षक और कर्मचारी सदस्य भी इस दौरान उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के गायन के बाद, छात्रों द्वारा भारत के 75 वर्षों के इतिहास पर आधारित सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया, जिसमें भारत द्वारा हासिल किए गए प्रत्येक मील के पत्थर को खूबसूरती से दर्शाया गया।
हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और हेरिटेज लॉ कॉलेज के इंजीनियरिंग छात्रों ने विभिन्न देशभक्ति गीतों पर सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुतियां भी दीं। शीटगो, स्पेन के सीईओ यानिक ने कहा, “मैं इस प्रतिष्ठित क्षण में यहां आकर वास्तव में सम्मानित महसूस कर रहा हूं, जो भारत में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण दिनों में से एक है फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड संचालन प्रमुख ऋचा सिंह देबगुप्ता ने कहा, “आइए हम एक भारतीय की सच्ची भावना को बनाए रखने के लिए इस दिन को गर्व और जोश के साथ मनाएं।”
भारतीय संस्कृति और विरासत पर एक सत्र से छात्र उत्साहित हुए और उन्होंने अयोध्या राम मंदिर के लाइव कवरेज का अनुभव किया। स्वामी वेदनिष्ठानंद महाराज, आध्यात्मिक प्रमुख, रामकृष्ण मिशन वेदांत केंद्र, जिनेवा, स्विट्जरलैंड ने आज हेरिटेज परिसर के स्वामी विवेकानंद सभागार में ‘भारतीय संस्कृति और विरासत’ पर छात्रों को संबोधित किया। कार्यक्रम का आयोजन इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल ऑफ हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कोलकाता द्वारा किया गया था। इसमें द हेरिटेज कॉलेज और हेरिटेज लॉ कॉलेज के छात्रों और संकाय सदस्यों ने भी भाग लिया।
उद्घाटन भाषण के दौरान, स्वामीजी ने स्वामी विवेकानन्द की विचारधाराओं के बारे में बात की जो भारतीय संस्कृति और विरासत का सार है। विद्वान सत्र में हमारे भारत के माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन सत्र की लाइव स्क्रीनिंग देखी गई।
सत्र में अपने संबोधन के दौरान स्वामीजी ने कहा कि शिक्षा वह है जो भारत के भविष्य को आकार दे सकती है। उन्होंने छात्रों से स्वामी विवेकानन्द की विचारधाराओं का अनुसरण करने का आग्रह किया, जहां वे अपनी सभी समस्याओं का समाधान बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से पा सकते हैं। स्वामी जी ने कहा कि त्याग और सेवा दो चीजें भारतीय संस्कृति का सार हैं। सत्र का समापन द हेरिटेज लॉ कॉलेज, कोलकाता के छात्रों द्वारा आयोजित रामायण और सांस्कृतिक नृत्य पर कुछ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ।

 

अवधपुरी….एक अनुभव

वरुण उपाध्याय, कोलकाता
घटना २०१८ मार्च की है, जब जीवन में मुझे पहली बार अवधपुरी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मेरे दादाजी बताते थे कि हमारे पूर्वज भी उसी क्षेत्र के थे। वस्तुतः इसी कारण उस पवित्र भूमि के दर्शन की उत्कट अभिलाषा अधिक प्रबल हो चुकी थी। रेलगाड़ी जब फ़ैज़ाबाद स्टेशन पहुँची तो लगा जैसे किसी विचित्र स्थान पर आगमन हो गया है। एक ऐसा स्थान, जो वर्तमान समय से क़रीब २० वर्ष पीछे चल रहा है। मुझे आशा थी कि अन्य धामों की तरह ही यहाँ भी नैमिष जैसा तेज व्याप्त होगा। अयोध्या नगरी भी जागृत और प्रभुमय होगी परन्तु ऐसा प्रतीत हुआ मानो सारे देवी-देवता इस जगह से रुष्ट थे। यह एक ‘श्री’ विहीन क्षेत्र होकर रह गया था।
बाबा तुलसीदास कहते थे,“राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे।”बस इसी बात का ध्यान रखते हुए हमने भी सर्वप्रथम श्री हनुमानगढ़ी के दर्शन किए तत्पश्चात उनसे आज्ञा पाकर प्रभु श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर बढ़े। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच, जगह-जगह पर जाँच के बाद वह मंगल बेला आई जब अपने आराध्य श्रीराम लला के दर्शन होने वाले थे। मन की व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी। दूर से ही फटा पुराना टांट दिखलाई दे रहा था और उसी के भीतर वर्षों से जगत के पालनहार विराजे थे। स्थानीय लोगों से यह भी ज्ञात हुआ कि ऐसी स्थिति 1990 के दशक से बनी हुई है। प्रभु को साल में मात्र दो वस्त्र ही अर्पित किए जाते हैं, भोग की भी उचित व्यवस्था नहीं है, तंबू फट जाए तो बदलने हेतु अदालत से अनुमति लेनी पड़ती है।
यह सब सुनकर और साक्षात अपने इष्ट को ऐसी अवस्था में देखकर मेरी आत्मा कांप उठी, हृदय तड़प उठा। दर्शन के समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो मैं स्वयं कैदी हूँ और मुझसे कोई अपना मात्र 2 क्षण के लिये मिलने आया है। मैंने अपने जीवन में इससे पूर्व स्वयं को इतना बेबस कभी नहीं पाया था, अश्रुधार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। ईश्वर चाहें तो सबकुछ कर सकते हैं परन्तु संभवतः एक मर्यादा का पालन हमारे प्रभु भी कर रहे थे। इसीलिए तो भक्त उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ भी कहते हैं।
साथ चलते एक तीर्थयात्री ने कहा कि, “जब मेरे बाल काले हुआ करते थे तब से आज तक यही सुनता आ रहा हूँ कि मंदिर बन जाएगा लेकिन अगर मंदिर बन जायेगा तो राजनीति करने वाले कहां जाएंगे भला? कोई मूर्ख नहीं है जो अपनी दुकानदारी बन्द करेगा।” मैंने उनसे कोई डेडलाइन वाली बात तो नहीं की पर इतना अवश्य बोल दिया कि, “श्रीमान आपके बाल भले ही सफेद हो गए हों, मेरे काले बाल रहते ही मंदिर बन जायेगा, इतना तो तय है। यह नया भारत है अब हर काम जल्दी होने लगा है।”उन सज्जन की आँखों में बेसब्री और असंतुष्टि का भाव था लेकिन उन्होंने मेरी इस बात का खण्डन भी नहीं किया।
 आज परिणाम सबके सामने है। 500 साल पुराने विवाद का हल हो चुका है और हमारे भगवान अब एक भव्य मंदिर में विराज चुके हैं। अब अपनी अयोध्या नगरी ग़ुलामी के चिन्हों से मुक्त होकर एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित हो रही है। सत्य सनातन की इस जीत में ब्रह्माण्ड का कल्याण छुपा है। भारत रामराज्य की पहली सीढ़ी चढ़ चुका है और अपने आध्यात्मिक बल से शीघ्र ही विश्वगुरु भी कहलाएगा। वर्तमान व्यवस्था को देख कर बस यही दोहा याद आता है,“कवन सो काज कठिन जग माही। जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।”

रामायण के पन्नों में रहकर भी दबा रह गया श्रीराम की बड़ी बहन शांता का त्याग

क्या आपको पता है भगवान राम की एक बहन भी थीं, जिनका नाम शांता थाI शायद ही हममें से किसी को शांता के बारे में कुछ पता हो, क्योंकि हमने जो रामायण देखा व पढ़ा है उसमें शांता का जिक्र है ही नहींI इसलिए आज हम आपको भगवान श्री राम की बहन शांता के बारे में बताएँगे कि आखिर कौन थीं शांता? उनका जन्म कैसे हुआ और क्या है उनकी कहानीI
कौन थीं प्रभु श्री राम की बहन शांता – महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थीं, कौशल्या, कैकयी और सुमित्राI दशरथ और कौशल्या अयोध्या के राजा-रानी थेI सभी जानते हैं कि राजा दशरथ के चार पुत्र थेI लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि इन चार पुत्रों के अलावा उनकी एक पुत्री भी थी, जिनका नाम शांता थाI शांता माता कौशल्या और दशरथ की पुत्री थींI शांता बहुत ही सुंदर एक होनहार कन्या थीं, वो हर क्षेत्र में निपुण थींI शांता को वेद, कला, शिल्प, युद्ध कला, विज्ञान, साहित्य एवं पाक कला सभी का अनूठा ज्ञान प्राप्त थाI अपने युद्ध कौशल से वह सदैव अपने पिता राजा दशरथ को गौरवान्वित कर देती थींI
रामायण में क्यों नहीं है देवी शांता का जिक्र? – रामायण में शांता का जिक्र इसलिए नहीं मिलता, क्योंकि वे बचपन में ही राजा दशरथ का महल छोड़कर अंगदेश चली गई थींI शांता के बारे में इतिहास में बहुत ही कम उल्लेख मिलता हैI उनके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैंI
पहली कथा– पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दशरथ की पहली पत्नी महारानी कौशल्या की बहन रानी वर्षिणी और उनके पति अंगदेश के राजा रोमपद को कोई संतान नहीं थीI एक बार वर्षिणी ने कौशल्या और राजा दशरथ से कहा कि काश उनके पास भी शांता जैसी एक सुशील और गुणवती पुत्री होतीI राजा दशरथ से उनकी पीड़ा देखी नहीं गई और उन्होंने अपनी पुत्री शांता को उन्हें गोद देने का वचन दे दियाI रघुकुल की रित प्राण जाई पर वचन न जाई के अनुसार राजा दशरथ एवं माता कौशल्या को अपनी पुत्री को अंगदेश के राजा रोमपद एवं रानी वर्षिणी को गोद देना पड़ाI शांता को पुत्री के रूप में पाकर रोमपद और वर्षिणी बहुत प्रसन्न हो गए और उन्होंने राजा दशरथ का आभार व्यक्त कियाI इस प्रकार शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईंI

दूसरी कथा – बात उस समय की है जब राजा दशरथ और कौशल्या का विवाह भी नहीं हुआ थाI ऐसा कहा जाता है कि रावण को पहले से ही पता चल चुका था कि अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगीI इसलिए रावण ने कौशल्या को पहले ही मारने की योजना बनाईI उसने कौशल्या को एक संदूक में बंद किया और नदी में बहा दियाI वही से राजा दशरथ शिकार के लिए जा रहे थेI उन्होंने कौशल्या को बचाया और उस समय नारद जी ने उनका गन्धर्व विवाह कराया थाI उनके विवाह के बाद उनके यहां एक कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम शांता थाI वो जन्म से दिव्यांगना थी राजा दशरथ ने उसका कई बार उपचार कराया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआI तब कई ऋषि मुनियों से सलाह की गई, तो उन्हें पता चला कि रानी कौशल्या और राजा दशरथ का गोत्र एक ही है इसीलिए उन्हें इन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हैI उन्हें यह भी सलाह दी गई कि अगर इस कन्या के माता पिता को बदल दिया जाए, तो यह कन्या ठीक हो जाएगीI यही कारण था कि राजा दशरथ ने शांता को रोमपद और वर्षिणी को गोद दे दिया थाI
तीसरी कथा- कई अन्य कथाओं के अनुसार राजा दशरथ ने शांता को इसलिए त्यागा क्योंकि वह पुत्री थी और कुल आगे नहीं बढ़ा सकती थी, ना ही राज्य को संभाल सकती थीI इसलिए राजा दशरथ ने शांता को रोमपद और वर्षिणी को गोद दे दिया थाI शांता को गोद दे देने के बाद दशरथ की कोई भी संतान नहीं थी, जिसके कारण वे परेशान रहने लगे थे और इसी कारण संतान के लिए राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करवाया, जिसके बाद उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति हुईI
किससे और कैसे हुआ था शांता का विवाह? – राजा रोमपद को अपनी पुत्री से बहुत लगाव थाI वे अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थेI एक बार एक ब्राह्मण उनके द्वार पर आयाI किन्तु वे शांता से बातचीत में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने ब्राह्मण की तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया और ब्राह्मण को खाली हाथ ही लौटना पड़ाI इसके कारण ब्राह्मण को काफी गुस्सा आया। वह ब्राह्मण इंद्र देव का भक्त था, इसलिए भक्त के अनादर से देवों के देव इंद्र देव क्रोधित हो उठें और उन्होंने वरुण देव को आदेश दिया कि अंगदेश में वर्षा न होI इंद्र देव की आज्ञा के अनुसार वरुण देव ने ठीक वैसा ही कियाI कई वर्षों तक वर्षा न होने के कारण अगंदेश में सूखा पड़ गया था और चारों तरफ़ हाहाकार मच गयाI राजा रोमपद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, उनसे अपनी प्रजा की तकलीफ देखी नहीं गई और इस समस्या का समाधान पाने के लिए राजा रोमपद ऋषि ऋंग के पास गएI ऋषि ऋंग ने उन्हें वर्षा के लिए एक यज्ञ का आयोजन करने को कहाI
ऋषि के निर्देशानुसार रोमपद ने पूरे विधि-विधान के साथ यज्ञ कियाI यज्ञ के संपन्न होते ही अंगदेश में वर्षा होने लगीI प्रजा इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्‍न का माहौल बन गया, सभी ख़ुशी से झूम उठे थेI तभी वर्षिणी और रोमपद ने ऋषि ऋंग से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे करने का फैसला कियाI पुराणों के अनुसार ऋषि ऋंग विभंडक ऋषि के पुत्र थेI एक दिन जब विभंडक ऋषि नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गयाI उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ थाI
राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति में कैसे सहायक बनी बेटी शांता – जब कई सालों तक राजा दशरथ को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो वे परेशान रखने लगेI राजा दशरथ और उनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगाI उनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ ने सलाह दिया कि ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया जाएI इस यज्ञ से पुत्र की प्राप्ति होगीI दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलायाI इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलायाI ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश फैल जाता थाI राजा दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दियाI ऋषि ऋंग अपनी एक घोर तपस्या को पूरा करके उन्हीं दिनों अपने आश्रम लौटे थेI पहले तो ऋषी ऋंग ने इस यज्ञ के लिए मना कर दिया था लेकिन पत्नी शांता के कहने पर वो तैयार हो गएI कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता हैI लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी, ”मैं अकेला नहीं आ सकताI मैं यज्ञ कराने के लिए सहमत हूं, लेकिन मेरी पत्नी शांता भी मेरे साथ आएगीI वह भी ऋत्विक के रूप में कार्य करेगीI” राजा दशरथ के मंत्री सुमंत इस शर्त को मानने के लिए सहमत हो गएI ऋषी ऋंग और शांता अयोध्या पहूंचेI शांता ने जहां भी पैर रखा, वहां से सूखा गायब हो गयाI दशरथ और कौशल्या सोच में पड़ गए कि आखिर यह कौन है? तब शांता ने स्वयं अपनी पहचान प्रकट कीI उन्होंने कहा, ”मैं आपकी पुत्री शांता हूं।” दशरथ और कौशल्या को यह जानकर बहुत खुशी हुई कि वह उनकी पुत्री शांता हैI ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बनाI सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता हैI
कैसे मिले भगवान श्री राम और शांता? – काफी लंबे समय तक भगवान श्री राम और उनके तीनों भाइयों को उनकी बहन शांता के बारे में कोई जानकारी नहीं थीI वे नहीं जानते थे कि उनकी एक बड़ी बहन भी हैI कई साल बीतने के बाद भी माता कौशल्या अपनी पुत्री शांता के वियोग को भूल नहीं पाई थीI उन्हें हमेशा शांता की याद आती रहती थी, जिसके कारण कई बार रानी कौशल्या और राजा दशरथ के बीच मतभेद हो जाता थाI अपनी माता के दुख को महसूस कर भगवान राम ने माता कौशल्या से प्रश्न किया कि ऐसी क्या चीज़ है जिसके बारे में वे हमेशा सोचती रहती हैं, किस बात के कारण वे हमेशा हमेशा उदास रहती है? तब माता कौशल्या ने भगवान राम को अपने मन की पीड़ा के बारे में बतायाI प्रभु राम को उनकी बड़ी बहन शांता के बारे में बताया और जिसके बाद भगवान राम अपने तीनों भाइयों के साथ अपनी बड़ी बहन शांता से मिलने गएI जब भगवान राम अपनी बहन शांता से मिलते, तब शांता अपने त्याग का फल उनसे मांगती हैI तब भगवान राम हमेशा उनके साथ रहने का वचन देते हैं और इस तरीके से जीवन भर वे एक दूसरे की परछाई बनकर रहते हैंI
भारत में यहां होती है देवी शांता की पूजा – हिमाचल के कुल्लू में ऋंग ऋषि के मंदिर में भगवान राम की बड़ी बहन शांता की पूजा अर्चना की जातीI यह मंदिर कुल्लू से 50 कि.मी दूर बना हुआ हैI यहां देवी शांता की प्रतिमा भी स्थापित हैI इस मंदिर में देवी शांता और उनके पति ऋंग ऋषि की साथ में पूजा होती हैI दोनों की पूजा के लिए कई जगहों से भक्त दर्शन के लिए आते हैंI शांता देवी के इस मंदिर में जो भी भक्त देवी शांता और ऋंग ऋषि की सच्चे मन से पूजा करता है उसे भगवान राम का आशीर्वाद प्राप्त होता हैI देवी शांता के मंदिर में दशहरा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती हैI इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हरैया तालुका में श्रृंगी नारी के मंदिर में आज भी देवी शांता की पूजा होती हैI यहां आज भी लोग प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पूजा करने आते हैंI ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैंI
श्रंगेरी के पास ही इसी नाम से एक पर्वत भी है। श्रंगेरी में श्रंगी ऋषि और शांता के मंदिर हैं। श्रंगेरी शहर का नाम श्रंगी ऋषि के नाम पर ही है। यहीं उनका जन्म हुआ था। दक्षिण भारत में, खासतौर पर कर्नाटक, केरल के कुछ इलाकों में भगवान राम की बहन की मान्यता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य जगहों पर ऐसी लोक कथा प्रचलित हैं।
(साभार – गृहलक्ष्मी)

श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा समारोह….500 वर्ष की तपस्या के बाद सत्य हुआ ऐतिहासिक क्षण

शुभजिता फीचर डेस्क
भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उनके जन्मस्थान पर करीब 5 शताब्दियों के बाद ऐसा पल आने वाला है, जिसका साक्षी पूरा देश बनेगा। रामलला अपने गर्भगृह में विराजमान होने वाले हैं। इसकी तैयारियां शुरू करा दी गई हैं। मंदिर बनकर तैयार हो रहा है। माना जा रहा है कि दिसंबर तक पहले चरण का निर्माण कार्य पूरा करा लिया जाएगा। इसके बाद मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जाना शुरू कर दिया जाएगा। श्रीराम जन्‍मभूमि मंदिर के गर्भगृह में रामलला की प्राण प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम को देश के 5 लाख मंदिरों तक आयोजित किए जाने की योजना है। पूरे देश को 12 दिनों तक राममय करने की तैयारी चल रही है। इसके अलावा प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह के दौरान अयेाध्‍या में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में भी करीब 5 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। उनके ठहरने और भोजन की व्‍यवस्‍था भी मंदिर ट्रस्‍ट की ओर से तैयारी चल रही है। इस ऐतिहासिक क्षण को स्मृतियों में देखने का क्षण हैं, इस नजर इतिबास के पन्नों में तैयारियों के साथ उन नांव की ईंट को स्मरण करते हुए यह आलेख प्रस्तुत है –
आजादी के कुछ समय बाद ही बाबरी मस्जिद में रातों-रात राललला की मूर्तियां रख दी गई थीं. यही नहीं, उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आदेश की अनदेखी करते हुए मूर्तियों को विवादित स्‍थल से हटवाने से भी इनकार कर दिया था। हम बात कर रहे हैं तब के फैजाबाद जिले के डीएम केके नायर की। विवादित स्थल पर रखी गईं रामलला की मूर्तियों को हटवाने के लिए तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें दो बार आदेश दिया। केके नायर ने दोनों बार उनके आदेश का पालन करने में असमर्थता जता दी। इससे उनकी छवि हिंदूवादी अधिकारी के तौर पर बन गई। बाद में इसका उन्‍हें बड़ा फायदा मिला। उन्‍होंने और उनकी पत्‍नी ने बाद में लोकसभा चुनाव लड़ा ही नहीं, जीता भी. यही नहीं, उनकी छवि का फायदा उनके ड्राइवर तक को मिला। उनके ड्राइवर ने उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ताल ठोकी और जीतकर विधायक बना।
अलेप्‍पी के नायर थे 1930 बैच के आइसीएस अफसर – दरअसल, 22 और 23 दिसंबर 1949 की आधी रात बाबरी मस्जिद में कथित तौर पर गुपचुप तरीके से रामलला की मूर्तियां रख दी गयीं।. इसके बाद अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में भगवान प्रकट हुए हैं। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मौके पर तैनात कॉन्स्टेबल माता प्रसाद ने घटना की सूचना थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। माता प्रसाद ने बताया कि 50 से 60 लोग परिसर का ताला तोड़कर अंदर घुस गए। इसके बाद उन्‍होंने वहां श्रीराम की मूर्ति स्थापित कर दी, साथ ही पीले और गेरुए रंग से श्रीराम लिख दिया। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है कि केरल के अलेप्पी के रहने वाले केके नायर 1930 बैच के आईसीएस अधिकारी थे। उनके फैजाबाद के डीएम रहते बाबरी ढांचे में मूर्तियां रखी गयीं। 23 दिसंबर 1949 की सुबह अयोध्‍या में अचानक शोर होने लगा कि बाबरी मस्जिद में रामलला प्रकट हुए हैं।
क्‍या कहकर नायर ने टाल दिया पं. नेहरू का आदेश – हेमंत शर्मा किताब में लिखते हैं कि बाबरी मामले से जुड़े आधुनिक भारत में नायर ऐसे व्‍यक्ति हैं, जिनके कार्यकाल में इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ आया।  इससे देश के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर बड़ा असर पड़ा। केके नायर 1 जून 1949 को फैजाबाद के कलेक्टर बने थे। 23 दिसंबर 1949 को जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में रखी हुईं तो नेहरू ने यूपी के तत्‍कालीन सीएम गोविंद बल्लभ पंत से तत्‍काल मूर्तियां हटवाने को कहा। उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटवाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई.।
नायर बने सांसद, तो उनका ड्राइवर बना विधायक – किताब के मुताबिक, तत्‍कालीन पीएम नेहरू ने मूर्तियां हटाने को दोबारा कहा तो नायर ने सरकार को लिखा कि मूर्तियां हटाने से पहले मुझे हटाया जाए। देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई। डीएम नायर ने 1952 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली, फिर देश की चौथी लोकसभा के लिए उन्‍होंने उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए। उनकी पत्‍नी शकुंतला नायर भी जनसंघ के टिकट पर कैसरगंज से तीन बार लोकसभा पहुंचीं। बाद में उनका ड्राइवर भी उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बना। विवादित स्थल से मूर्तियां नहीं हटाने का मुसलमानों ने विरोध किया। दोनों पक्षों ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया. फिर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया। पं. नेहरू के आदेश को अनदेखा करने वाले केके नायर की पत्‍नी शकुंतला नायर तीन बार कैसरगंज से लोकसभा चुनाव जीतीं।
कहां से लाई गई थी भगवान राम की मूर्ति – 23 दिसंबर 1949 की सुबह 7 बजे अयोध्या थाने के तत्कालीन एसएचओ रामदेव दुबे रूटीन जांच के दौरान मौके पर पहुंचे, तो वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। रामभक्तों की भीड़ दोपहर तक बढ़कर 5000 लोगों तक पहुंच गई। अयोध्या के आसपास के गांवों से श्रद्धालुओं की भीड़ बालरूप में प्रकट हुए भगवान राम के दर्शन के लिए टूट पड़ी. हर कोई ‘भय प्रकट कृपाला’ गाता हुआ विवादित स्‍थल की ओर बढ़ा चला जा रहा था। भीड़ को देखकर पुलिस और प्रशासन के हाथपांव फूलने लगे. उस सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्ति प्रकट हुई थी, जो कई दशकों से राम चबूतरे पर विराजमान थी. इनके लिए वहीं की सीता रसोई या कौशल्या रसोई में भोग बनता था।
2100 किलो का घंटा, 108 फीट लंबी अगरबत्ती… राम मंदिर के लिए देश-विदेश से आये उपहार
इस मौके को खास बनाने के लिए देश-विदेश से अयोध्या के लिए उपहार भेजे गये। इसमें 108 फुट लंबी अगरबत्ती, 2100 किलोग्राम की घंटा, 1100 किलोग्राम वजनी एक विशाल दीपक, सोने के खड़ाऊं, 10 फुट ऊंचा ताला और चाबी और आठ देशों का समय एक साथ बताने वाली एक घड़ी विशेष आकर्षण हैं। इन अनोखे उपहारों को बनाने वाले कलाकारों को उम्मीद है कि उनके उपहारों का भव्य मंदिर में उपयोग किया जाएगा। नेपाल के जनकपुर से हजारों उपहारों से लदे 30 वाहन अयोध्या पहुंचे। सीता की जन्मभूमि नेपाल के जनकपुर से भगवान राम के लिए 3,000 से अधिक उपहार अयोध्या पहुंचे हैं। इनमें चांदी के जूते, आभूषण और कपड़ों सहित कई अन्य उपहार शामिल हैं. नेपाल के जनकपुर धाम रामजानकी मंदिर से लगभग 30 वाहनों के काफिले में रखकर इन उपहारों को अयोध्या लाया जा रहा है।
 श्रीलंका के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी अशोक वाटिका से एक विशेष उपहार के साथ अयोध्या का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने महाकाव्य रामायण में वर्णित अशोक वाटिका से लाई गई एक चट्टान भेंट की। बताते चलें कि अशोक वाटिका वहीं जगह है, जहां रावण ने माता सीता का अपहरण करने के बाद उन्हें रखा था।
वडोदरा के विहा भरवाड की बनाई ये अगरबत्ती करीब डेढ़ महीने तक चलेगी। गुजरात के वडोदरा में छह महीने में तैयार की गई 108 फुट लंबी अगरबत्ती 18 जनवरी को अयोध्या पहुंच चुकी है। भरवाड और 25 अन्य भक्त 1 जनवरी को विशाल अगरबत्ती के साथ वडोदरा से रवाना हुए हैं। इसका वजन 3,610 किलोग्राम है और यह लगभग 3.5 फीट चौड़ी है। अगरबत्ती तैयार करने वाली वडोदरा के रहने वाले विहा भरवाड ने बताया, ”यह अगरबत्ती पर्यावरण के अनुकूल है। यह करीब डेढ़ महीने तक चलेगी और इसकी सुगंध कई किलोमीटर तक फैलेगी।” उन्होंने कहा कि 376 किलोग्राम गुग्गुल (गोंद राल), 376 किलोग्राम नारियल के गोले, 190 किलोग्राम घी, 1,470 किलोग्राम गाय का गोबर, 420 किलोग्राम जड़ी-बूटियों को मिलाकर अगरबत्ती को तैयार किया गया है। इसकी ऊंचाई दिल्ली में प्रतिष्ठित कुतुब मीनार की लगभग आधी है।
गुजरात ने दरियापुर से आया विशाल नगाड़ा – सोने की परत चढ़ा यह 56 इंच का विशाल नगाड़ा राम मंदिर में स्थापित किया गया।  मंदिर के प्रांगण में सोने की परत चढ़ा यह 56 इंच का नगाड़ा स्थापित किया इस 44 फुट लंबे पीतल के ध्वज स्तंभ और अन्य छोटे छह ध्वज स्तंभ हैं। वडोदरा के रहने वाले किसान अरविंदभाई मंगलभाई पटेल ने 1,100 किलोग्राम वजन का एक विशाल दीपक तैयार किया है। पटेल ने कहा, “दीपक 9.25 फीट ऊंचा और 8 फीट चौड़ा है. इसकी क्षमता 851 किलोग्राम घी की है। दीपक ‘पंचधातु’ यानी सोना, चांदी, तांबा, जस्ता और लोहा से मिलकर बना है।
सूरत से आयी माता सीता की विशेष साड़ी और हार – माता सीता के लिए भव्य राम मंदिर और श्रीराम की तस्वीर वाली यह विशेष साड़ी सूरत से आई है। इसमें भगवान राम और अयोध्या मंदिर की तस्वीरों वाली साड़ी भगवान राम की पत्नी सीता के लिए है, जिन्हें आदरपूर्वक मां जानकी के नाम से जाना जाता है और इसका पहला टुकड़ा रविवार को सूरत के एक मंदिर में चढ़ाया गया। सूरत के ही एक हीरा व्यापारी ने 5,000 अमेरिकी डायमंड और 2 किलो चांदी का उपयोग करके राम मंदिर की थीम पर एक हार बनाया है. चालीस कारीगरों ने 35 दिनों में डिजाइन पूरा किया और हार को राम मंदिर ट्रस्ट को उपहार में दिया गया है।
यूपी से आया 400 किलो का ताला और घंटा – दुनिया का सबसे बड़ा ताला 10 फीट ऊंचा है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के ताला बनाने वाले सत्य प्रकाश शर्मा ने 10 फीट ऊंचा, 4.6 फीट चौड़ा और 9.5 इंच मोटाई वाला 400 किलोग्राम वजन का ताला और चाबी तैयार की है। उन्होंने बताया कि ”यह दुनिया का सबसे बड़ा ताला और चाबी है। मैंने इसे ट्रस्ट को उपहार में दिया है, ताकि इसे मंदिर में प्रतीकात्मक ताले के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।” उत्तर प्रदेश में एटा के जलेसर में अष्टधातु से बना 2,100 किलोग्राम वजन का घंटा तैयार किया गया है। घंटा तैयार करने में शामिल एक कारीगर ने कहा कि “घंटा तैयार करने में दो साल लग गए। सभी अनुष्ठानों को करने और धूमधाम के साथ घंटी को अयोध्या भेजा जा रहा है।”
8 देशों का समय एक साथ बताती है लखनऊ की यह खास घड़ी – लखनऊ स्थित एक सब्जी विक्रेता ने विशेष रूप से एक ऐसी घड़ी डिजाइन की है, जो एक ही समय में आठ देशों का समय बताती है। 52 साल के अनिल कुमार साहू ने कहा कि उन्होंने 75 सेंटीमीटर व्यास वाली घड़ी मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को उपहार में दी है। साहू ने कहा कि उन्होंने पहली बार 2018 में घड़ी बनाई थी और इसे भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा ‘डिजाइन के पंजीकरण का प्रमाण पत्र’ दिया गया था। यह घड़ी भारत, टोक्यो (जापान), मॉस्को (रूस), दुबई (यूएई), बीजिंग (चीन), सिंगापुर, मैक्सिको सिटी (मेक्सिको), वाशिंगटन डीसी और न्यूयॉर्क (यूएस) का समय एक साथ बताती है।
नागपुर, मथुरा, तिरुपति से भोग के लिए मिठाई और लड्डू आएंगे – नागपुर में रहने वाले शेफ विष्णु मनोहर ने घोषणा की है कि वह अभिषेक समारोह में शामिल होने वाले भक्तों के लिए 7,000 किलोग्राम पारंपरिक मिठाई “राम हलवा” तैयार करेंगे। वहीं, मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ‘यज्ञ’ के लिए 200 किलोग्राम लड्डू अयोध्या भेजने की तैयारी कर रहा है। तिरूपति में श्री वेंकटेश्वर मंदिर के आधिकारिक संरक्षक, तिरुमला तिरूपति देवस्थानम (टीटीडी) ने भी घोषणा की है कि वह इस बड़े दिन पर भक्तों को वितरण के लिए एक लाख लड्डू भेजेगा।
हैदराबाद से राम भक्त लाया सोने की परत चढ़े जूते – भगवान राम के प्रति अटूट श्रद्धा और अपने ‘कार सेवक’ पिता के सपने को पूरा करने की इच्छा के साथ हैदराबाद के 64 वर्षीय चल्ला श्रीनिवास शास्त्री अयोध्या पहुंचे। वह भगवान राम को भेंट करने के लिए अपने साथ सोने की परत चढ़े जूते ला रहे हैं। वह लगभग 8,000 किमी की दूरी तय करके पैदल ही अयोध्या पहुंचे हैं।
तारीखों की डायरी में रामजन्म भूमि विवाद और समाधान
राम मंदिर का भव्य भूमिपूजन आज अय़ोध्या में होने जा रहा है। अयोध्या नगरी पूरी तरह से रोशनी से जगमगा रही है। वहीं शहर में चारों तरफ सिर्फ भूमिपूजन और पीएम मोदी की होर्डिंग्स लगी है। होर्डिंग्स में बस एक ही संदेश लिखा है कि पीएम मोदी भूमिपूजन करेंगे। लेकिन इस भूमिपूजन तक पहुंचने में ढेरों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आपको हम बताने जा रहे हैं कि आखिर 1528 के विवाद से लेकर समाधान तक कैसा रहा सफर।
1528 : अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण, जिसे हिंदू भगवान राम का जन्मस्थान मानते थे। मस्जिद बनवाने का आरोप बाबर पर लगा। कहा जाता है कि बाबर की शह पर ही उसके सेनापति मीर बाकी ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई थी।
1853 : मुगलों और नवाबों के शासन के चलते 1528 से 1853 तक इस मामले में हिंदू बहुत मुखर नहीं हो पाए, पर मुगलों और नवाबों का शासन कमजोर पड़ने तथा अंग्रेजी हुकूमत के प्रभावी होने के साथ ही हिंदुओं ने यह मामला उठाया और कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना ली गई। इसको लेकर हिंदुओं और मुसलमानों में झगड़ा हो गया।
1859 : अंग्रेजी हुकूमत ने तारों की एक बाड़ खड़ी कर विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों तथा हिंदुओं को अलग-अलग पूजा और नमाज की इजाजत दे दी।
न्यायालय पहुंचा मामला – 19 जनवरी 1885 ढांचे के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने के लिए निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास ने 1885 में पहली बार सब जज फैजाबाद के न्यायालय में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा किया। सब जज ने निर्णय दिया कि वहां हिंदुओं को पूजा-अर्चना का अधिकार है। पर, वे जिलाधिकारी के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं दे सकते।
22 दिसंबर 1949 ढांचे के भीतर गुंबद के नीचे मूर्तियों का प्रकटीकरण। प्रधानमंत्री थे जवाहर लाल नेहरू, मुख्यमंत्री थे गोविंद वल्लक्ष पंत और जिलाधिकारी थे केके नैय्यर ।
16 जनवरी 1950 गोपाल सिंह विशारद ने  फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर कर ढांचे के मुख्य (बीच वाले) गुंबद के नीचे स्थित भगवान की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की मांग की।
 5 दिसंबर 1950  ऐसी ही याचना करते हुए महंत रामचंद्र परमहंस ने सिविल जज के यहां मुकदमा दाखिल किया। मुकदमे में दूसरे पक्ष को संबंधित स्थल पर पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोकने की मांग की गई थी।
3 मार्च 1951 – गोपाल सिंह विशारद मामले में न्यायालय ने दूसरे पक्ष (मुस्लिम) को पूजा-अर्चना में बाधा न डालने की हिदायत दी। ऐसा ही आदेश परमहंस की तरफ से दायर मुकदमे में भी दिया गया।
17 दिसंबर 1959 – रामानंद संप्रदाय की तरफ से निर्मोही अखाड़े के छह व्यक्तियों ने मुकदमा  दायर कर इस स्थान पर अपना दावा ठोका। साथ ही मांग की कि रिसीवर प्रियदत्त राम को हटाकर उन्हें पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए। यह उनका अधिकार है।
18 दिसंबर 1961 – उत्तर प्रदेश के केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मुकदमा दायर किया। प्रार्थना की कि यह जगह मुसलमानों की है। ढांचे को हिंदुओं से लेकर मुसलमानों को दे दिया जाए। ढांचे के अंदर से मूर्तियां हटा दी जाएं। ये मामले न्यायालय में चलते रहे।
कारसेवा आंदोलन
 24 मई 1990 – हरिद्वार में विराट हिंदू सम्मेलन हुआ। संतों ने देवोत्थान एकादशी (30 अक्तूबर 1990) को मंदिर निर्माण के लिए  कारसेवा की घोषणा की।
1 सितंबर 1990 – अयोध्या में अरणी मंथन कार्यक्रम हआ और उससे अग्नि प्रज्ज्वलित की गई। विहिप ने इसे ‘राम ज्योति’ नाम दिया। इस ज्योति को गांव-गांव पहुंचाने के अभियान के सहारे विहिप ने लोगों को कारसेवा में हिस्सेदारी के लिए तैयार किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवा पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। कहा, ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।’
25 सितंबर 1990 – भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने कारसेवा में हिस्सेदारी की घोषणा के साथ गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा शुरू की। पर, उन्हें बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने गिरफ्तार कर लिया। भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
30 अक्तूबर 1990 – अयोध्या में कारसेवक जन्मभूमि स्थल की ओर बढ़े। सुरक्षा बलों से भिड़ंत। अशोक सिंहल सहित कई कारसेवक घायल। कुछ कारसेवकों ने गुंबद पर पहुंचकर भगवा झंडा लगाया।
2 नवंबर 1990 – कारसेवकों के जन्मभूमि मंदिर कूच की घोषणा हुई। पुलिस ने गोली चलाई। कोठारी बंधुओं सहित कई कारसेवकों की मृत्यु। विरोध में जेल भरो आंदोलन।
4 अप्रैल 1991 – दिल्ली में मंदिर निर्माण को लेकर विराट हिंदू रैली। उसी दिन मुलायम सिंह यादव सरकार ने इस्तीफा दे दिया। चुनाव हुए और कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।
अक्तूबर 1991 – कल्याण सिंह सरकार ने ढांचे और उसके आसपास की 2.77 एकड़ जमीन अपने अधिकार में ले ली। श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने  श्री राम कथाकुंज के लिए भूमि की मांग की। कल्याण सिंह सरकार ने 42 एकड़ जमीन  श्रीराम  कथाकुंज के लिए न्यास को पट्टे पर दी।  इसके बाद न्यास ने वहां भूमि का समतलीकरण किया।
आंदोलन का फैसला
8 अप्रैल 1984 : वर्ष 1982 में विश्व हिंदू परिषद ने राम, कृष्ण और शिव के स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण को साजिश करार दिया और इनकी मुक्ति के लिए अभियान चलाने का फैसला किया। फिर 8 अप्रैल 1984 को दिल्ली में संत-महात्माओं, हिंदू नेताओं ने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्थल की मुक्ति और ताला खुलवाने को आंदोलन का फैसला किया।
1 फरवरी 1986 : फैजाबाद के जिला न्यायाधीश केएम पाण्डेय ने स्थानीय अधिवक्ता उमेश पाण्डेय की अर्जी पर इस स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया। मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया। इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में अपील खारिज हुई।
और हो गया शिलान्यास – जनवरी 1989 में प्रयाग में कुंभ मेले के अवसर पर मंदिर निर्माण के लिए गांव-गांव शिला पूजन कराने का फैसला हुआ। साथ ही  9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। काफी विवाद और खींचतान के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शिलान्यास की इजाजत दे दी। बिहार निवासी अनुसूचित जाति के कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया।
6 दिसंबर 1992 अयोध्या पहुंचे हजारों कारसेवकों ने ढांचा गिरा दिया। इसकी जगह इसी दिन शाम को अस्थायी मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। केंद्र की तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने कल्याण सिंह सहित अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों को भी बरखास्त कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित देश में कई जगह सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें अनेक लोगों की मौत हो गई।
6 दिसंबर 1992 : अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि थाना में ढांचा ध्वंस मामले में हजारों लोगों पर मुकदमा।
8 दिसंबर 1992 : अयोध्या मेें कर्फ्यू लगा था। वकील हरिशंकर जैन ने उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में गुहार लगाई कि भगवान भूखे हैं। राम भोग की अनुमति दी जाए।
16 दिसंबर 1992 : ढांचे ढहाने के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान के लिए लिब्राहन आयोग गठित किया। इसे 16 मार्च 1993 को रिपोर्ट सौंपनी थी।
महत्वपूर्ण तारीखें
1 जनवरी 1993: न्यायाधीश हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी।
7 जनवरी 1993 : केंद्र सरकार ने ढांचे वाले स्थान और कल्याण सिंह सरकार द्वारा न्यास को दी गई भूमि सहित यहां पर कुल 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया।
अप्रैल 2002: उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विवादित स्थल का मालिकाना हक तय करने के लिए सुनवाई शुरू की।
5 मार्च 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को संबंधित स्थल पर खुदाई का निर्देश दिया।
22 अगस्त  2003 : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी। इसमें संबंधित स्थल पर जमीन के नीचे एक विशाल हिंदू धार्मिक ढांचा (मंदिर) के होने  की बात कही गई।
5 जुलाई 2005: अयोध्या में विवादित स्थल पर छह आतंकियों के आत्मघाती आतंकी दस्ते का हमला। इसमें सभी मारे गए। तीन नागरिकों की भी मौत।
30 जून 2009: लिब्राहन आयोग ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को रिपोर्ट सौंपी। आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया।
30 सितंबर 2010 इस स्थल को तीनों पक्षों श्रीराम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर बंाटने का आदेश दिया। न्यायाधीशों ने बीच वाले गुंबद के नीचे जहां मूर्तियां थीं, उसे जन्मस्थान माना।
21 मार्च 2017 : सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता से मामले सुलझाने की पेशकश की। यह भी कहा कि दोनों पक्ष राजी हों तो वह भी इसके लिए तैयार है।
6 अगस्त 2019 : सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन सुनवाई शुरू की।
16 अक्तूबर 2019: सुनवाई पूरी। फैसला सुरक्षित। 40 दिन चली सुनवाई।
9 नवंबर 2019: सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित स्थल को श्रीराम जन्मभूमि माना और 2.77 एकड़  भूमि रामलला के स्वामित्व की मानी । निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया। निर्देश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट निर्मोही अखाड़े के एक  प्रतिनिधि को शामिल करे। उत्तर प्रदेश की सरकार मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक रूप से मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि किसी उपयुक्त स्थान पर उपलब्ध कराए ।
5 फरवरी 2020 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की।
 5 अगस्त 2020 : श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन।
आभामंडल में दशावतार, जानें रामलला की मूर्ति की विशेषताएं
रामलला की मूर्ति की बेहद खास तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर में उनके पूरे स्वरूप को देखा जा सकता है। तस्वीर में रामलला माथे पर तिलक लगाए बेहद सौम्य मुद्रा में दिख रहे हैं। हालांकि, रामलला की यह तस्वीर गर्भ गृह में लाने से पहले की है। अभी भगवान की आंखों में पट्टी बंधी हुई है। आइये जानते हैं रामलला की मूर्ति की सभी विशेषताएं…
मूर्ति करीब 200 किलोग्राम वजनी तो ऊंचाई 4.24 फीट
मूर्ति की विशेषताएं देखें तो इसमें कई तरह की खूबियां हैं। मूर्ति श्याम शिला से बनाई गई है जिसकी आयु हजारों साल होती है। मूर्ति को जल से कोई नुकसान नहीं होगा। चंदन, रोली आदि लगाने से भी मूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मूर्ति का वजन करीब 200 किलोग्राम है। इसकी कुल ऊंचाई 4.24 फीट, जबकि चौड़ाई तीन फीट है। कमल दल पर खड़ी मुद्रा में मूर्ति, हाथ में तीर और धनुष है। कृष्ण शैली में मूर्ति बनाई गई है।
मूर्ति के ऊपर स्वास्तिक, ॐ, चक्र, गदा, सूर्य भगवान विराजमान हैं। रामलला के चारों ओर आभामंडल है। श्रीराम की भुजाएं घुटनों तक लंबी हैं। मस्तक सुंदर, आंखें बड़ी और ललाट भव्य है। भगवान राम का दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। मूर्ति में भगवान विष्णु के 10 अवतार दिखाई दे रहे हैं। मूर्ति नीचे एक ओर भगवान राम के अनन्य भक्त हनुमान जी तो दूसरी ओर गरुड़ जी को उकेरा गया है। मूर्ति में पांच साल के बच्चे की बाल सुलभ कोमलता झलक रही है। मूर्ति को मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बनाया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के अधिकारियों का कहना था कि जिस मूर्ति का चयन हुआ उसमें बालत्व, देवत्व और एक राजकुमार तीनों की छवि दिखाई दे रही है।अयोध्या के श्रीराम मंदिर में तीन मूर्तियों को स्थापित किया जाएगा, जिसमें से एक मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा। इनके बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि गर्भ गृह में किस रूप में राम लला विराजमान होंगे। मूर्तिकारों ने तीनों मूर्तियों को इतना सुंदर बनाया कि चयन करना कठिन हो रहा था कौन सी सुंदर है और कौन सी उतनी नहीं है। अंततः बाल रूप वाली मूर्ति को राम मंदिर के गर्भ गृह में विराजने का फैसला लिया गया।
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पद्म पुरस्कार : 88 वर्ष में भी ज्ञान की विरासत को सहेज कर रख रहे हैं डॉ यशवंत सिंह कठोच

डॉ कठोच इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में लंबे समय से योगदान दे रहे हैं। डॉ कठोच पौड़ी जनपद के एकेश्वर विकासखंड स्थित मांसों गांव के मूल निवासी हैं। उन्होंने 1974 में आगरा विवि से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति तथा पुरातत्व विषय में विवि में प्रथम स्थान प्राप्त किया। वर्ष 1978 में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के गढ़वाल हिमालय के पुरातत्व पर शोध ग्रंथ प्रस्तुत किया और विवि ने उन्हें डीफिल की उपाधि से नवाजा। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने 33 साल सेवाएं दीं। वर्ष 1995 में वह प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए।
डॉ कठोच भारतीय संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्व के क्षेत्र में निरंतर शोध कर रहे हैं। वह वर्ष 1973 में स्थापित उत्तराखंड शोध संस्थान के संस्थापक सदस्य हैं। उनकी मध्य हिमालय का पुरातत्व, उत्तराखंड की सैन्य परंपरा, संस्कृति के पद.चिन्ह, मध्य हिमालय की कला, एक वास्तु शास्त्रीय अध्ययन, सिंह.भारती सहित 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
डॉक्टर कठोच द्वारा लिखी उत्तराखंड इतिहास की पुस्तक पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में खासा मददगार रहती है। डॉक्टर कठोच मूलतः पौड़ी जिले से ही हैं। उनका जन्म 27 दिसंबर 1935 को मासों, विकास खंड एकेश्वर, चौंदकोट पौड़ी गढ़वाल में हुआ।
उनका स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान और इतिहास में आगरा विश्वविद्यालय से हुआ। वे डी० फिल० भी हैं। वे एक शिक्षक से होते हुए प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत हुए। मध्य हिमालय के 3 खंड, मध्य हिमालय का पुरातत्व, संस्कृति के पद चिन्ह, उत्तराखंड का नवीन इतिहास उनकी प्रमुख कृतियां हैं।
भारत वर्ष का ऐतिहासिक स्थल कोश उनका अखिल भारतीय ग्रंथ है। डॉक्टर कठोच ने जौनसार, महासू मंदिर, कण्वाश्रम, अल्मोड़ा, बागेश्वर, कटारमल्ल, बैजनाथ आदि जगहों का भ्रमण कर उनका पुरातात्विक अध्ययन किया। अपने शैक्षणिक प्रयासों के अलावा, डॉ कठोच ने उत्तराखंड में महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

गणतंत्र दिवस विशेष : 26 जनवरी 1950 को ऐसे बना भारत एक गणतांत्रिक देश  

26 जनवरी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी कहानी 1950 से शुरु होती है। भारत 26 जनवरी 1950 को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। इस दिन हमें अपना संविधान मिला। ये संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। आज़ादी के बाद भारत के लिए दूसरा ये ख़ास पल था. इस दिन पूरी दुनिया में हमें एक नई पहचान मिली। संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी की तारीख को चुनना एक खास वजह हुआ। बता दें कि देश में पहली बार स्‍वतंत्रता दिवस 26 जनवरी 1930 को मनाया गया था।
इसकी कहानी की शुरुआत 31 दिसंबर, 1929 को हुई थी. इस दिन कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पास हुआ, जिसमें पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई. कांग्रेस के अधिवेशन में यह मांग हुई कि अगर अगर ब्रिटिश सरकार ने 26 जनवरी 1930 तक भारत को डोमीनियन स्टेट का दर्जा नहीं दिया तो देश को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर दिया जाएगा. 26 जनवरी, 1930 को देश में पहला स्वतंत्रता दिवस भी मनाया गया था। हालांकि, आजादी हमें 15 अगस्त 1947 को मिली, मगर 26 जनवरी हमारे दिल में हमेशा के लिए जुड़ गया।
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र – विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ था। इसमें कुल 22 समितियां थी।प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख समिति थी, जिसका काम संपूर्ण संविधान का निर्माण करना था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर थे. करीब 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की मेहनत के बाद दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान तैयार किया गया।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सौंप दिया लेकिन सबसे हैरानी वाली बात ये है कि इसे लागू करने के लिए दो महीने की देरी की गई। आखिर किस वजह से संविधान को लागू करने में इतने दिन लगे? इसका तर्क दिया जाता है कि 26 जनवरी के ‘पूर्ण स्वराज’ के ऐलान के महत्व को कायम रखने के लिए संविधान को दो महीने बाद लागू किया गया। इस तरह 26 नवंबर 1949 की जगह 26 जनवरी 1950 को पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया. 1950 से लेकर आजतक गणतंत्र दिवस देश में बहुत ही शान से मनाया जाता है।
गणतंत्र दिवस समारोह, जिसे नई दिल्ली में एक भव्य सैन्य परेड के साथ चिह्नित किया गया। 1950 में राष्ट्रीय राजधानी में पुराना किला के सामने इरविन एम्फीथिएटर में गणतंत्र दिवस की शुरुआत हुई, जो अब एक परंपरा बन चुकी है। भारत के गणतंत्र की उत्पत्ति का पता वर्ष 1920 में लगाया जा सकता है, जब पहले आम चुनाव उद्घाटन द्विसदनीय केंद्रीय विधायिका – दो सदनों वाली विधायिका – और प्रांतीय परिषदों के सदस्यों को चुनने के लिए आयोजित किए गए थे। 9 फरवरी, 1921 को ड्यूक ऑफ कनॉट की उपस्थिति में एक समारोह में दिल्ली में संसद का उद्घाटन किया गया था। देश को कम ही पता था कि यह एक महान परिवर्तन का अग्रदूत था जो दशकों बाद सामने आएगा।
संविधान का मूल – नवनिर्मित भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है, “हम, भारत के लोग भारत को एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व प्रदान करने का गंभीरता से संकल्प लेते हैं।”
गणतंत्र दिवस समारोह, जिसे नई दिल्ली में एक भव्य सैन्य परेड के साथ चिह्नित किया गया, ने सैन्य परेड की औपनिवेशिक परंपरा को अपनाया और उसका पुनराविष्कार किया। 1950 में राष्ट्रीय राजधानी में पुराना किला के सामने इरविन एम्फीथिएटर में आयोजित उद्घाटन गणतंत्र दिवस परेड ने एक ऐसी परंपरा के लिए मंच तैयार किया जो वर्षों में विकसित होगी।
26 जनवरी का महत्व न केवल संविधान को अपनाने में है, बल्कि भारत द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य से अपने अंतिम संबंधों को तोड़ने में भी है। गणतंत्र दिवस के रूप में चुना गया यह दिन स्वतंत्रता के लिए वर्षों के संघर्ष की परिणति और एक स्वशासित राष्ट्र बनने के सपने के साकार होने का गवाह बना।26 जनवरी 1950 से लेकर अब तक गणतंत्र के 75 साल हो गए हैं। इतने सालों में भारत एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में उभरा है।