Sunday, July 5, 2026
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गणतंत्र दिवस विशेष : इसरो की झांकी में दिखे चंद्रयान-3, आदित्य एल-1

नयी दिल्ली । गणतंत्र दिवस के अवसर पर निकाली गई झांकियों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की झांकी बेहद आकर्षक रही और इसमें चंद्रयान-3, आदित्य एल-1 को प्रमुखता दी गई। झांकी में इसरो के विभिन्न मिशनों में महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी को भी प्रदर्शित किया गया। इसरो अगले वर्ष भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान को अंजाम देने की योजना बना रहा है।
इस झांकी में ‘लॉन्च व्हीकल मार्क-3’ का एक मॉडल पेश किया गया जिसके जरिए चंद्रयान-3 को श्रीहरिकोटा से चंद्रमा तक भेजा गया था। झांकी में अंतरिक्ष यान के चंद्रमा में उतरने के स्थान को भी दर्शाया गया। इस स्थान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिव शक्ति प्वाइंट नाम दिया है। इसरो की झांकी में सूरज के अध्ययन के लिए निचली कक्षा में भेजे गए आदित्य एल-1 को भी प्रदर्शित किया गया। इसके अलावा इसरो के भविष्य के मिशन गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन आदि को भी झांकी में स्थान दिया गया।

गणतंत्र दिवस विशेष : ‘नारी शक्ति’ का साक्षी बना कर्तव्य पथ

नयी दिल्ली । गणतंत्र दिवस परेड में शुक्रवार को ‘नारी शक्ति’ की विशेष झलक देखने को मिली। इसमें ग्रामीण उद्योग, समुद्री क्षेत्र, रक्षा, विज्ञान से लेकर अंतरिक्ष तक विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया। इस भव्य परेड की थीम ‘विकसित भारत’ और ”भारत-लोकतंत्र की मातृका” थी। इसकी शुरुआत में एक संगीतमय समूह ‘आवाहन’ के साथ हुई। यह एक मनमोहक प्रदर्शन था, जिसमें देश के विभिन्न कोनों से आए भारतीय संगीत वाद्ययंत्रों की एक श्रृंखला शामिल थी। कुल 112 महिला कलाकारों के एक बैंड ने लोक वाद्ययंत्रों से लेकर आदिवासी वाद्ययंत्रों तक को बड़ी कुशलता से बजाया, जो महिलाओं की ताकत और कौशल का प्रतीक है। मणिपुर, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने अपनी झांकियों में विविध क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिकाएं प्रदर्शित कीं।
मणिपुर की झांकी में महिलाओं को नावों पर प्रसिद्ध लोकटक झील से कमल के डंठल इकट्ठा करते हुए और पारंपरिक ‘चरखों’ का उपयोग करके सूत बनाते हुए दिखाया गया। झांकी में एक प्राचीन बाजार ‘इमा कीथेल’ पर भी प्रकाश डाला गया था और इसने महिलाओं के नेतृत्व वाले वाणिज्य की स्थायी विरासत पर जोर दिया था।
मध्य प्रदेश की झांकी ने कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से राज्य की विकास प्रक्रिया में महिलाओं के जुड़ने का जश्न मनाया। आधुनिक सेवा क्षेत्रों, लघु उद्योगों और पारंपरिक क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी पर ध्यान केंद्रित किया गया था। इसमें राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि में योगदान देने वाली महिला कलाकारों के चित्रण के साथ-साथ पहली महिला फाइटर पायलट अवनी चतुर्वेदी को भी दिखाया गया। ओडिशा की झांकी ने हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर प्रकाश डाला, जबकि छत्तीसगढ़ की झांकी ने बस्तर के आदिवासी समुदायों में महिलाओं के प्रभुत्व को प्रदर्शित किया।
राजस्थान की झांकी में महिलाओं के नेतृत्व वाले हस्तशिल्प उद्योगों के विकास को प्रदर्शित किया गया और प्रसिद्ध ‘घूमर’ नृत्य भी प्रदर्शित किया गया। झांकी में दर्शाया गया कि मीरा बाई की मूर्ति भक्ति और शक्ति का प्रतीक है। हरियाणा की झांकी में सरकारी कार्यक्रम ”मेरा परिवार, मेरी पहचान” के माध्यम से महिला सशक्तीकरण पर प्रकाश डाला गया। इसमें डिजिटल इंडिया पहल के माध्यम से सरकारी योजनाओं तक पहुंच को प्रदर्शित किया गया। आंध्र प्रदेश ने अपनी झांकी का विषय स्कूली शिक्षा में बदलाव पर केंद्रित किया। लद्दाख की झांकी में भारतीय महिला आइस हॉकी टीम को प्रदर्शित किया गया, जिसमें लद्दाखी महिलाएं भी शामिल थीं।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की झांकी ने रक्षा और अनुसंधान के मुख्य क्षेत्रों में महिला वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। इसमें एंटी-सैटेलाइट मिसाइल और तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसी उपलब्धियां शामिल थीं। पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने महिला नाविकों की संख्या में वृद्धि और लाइटहाउस और क्रूज पर्यटन में प्रगति पर जोर देते हुए भारत के समुद्री क्षेत्र के विकास का प्रदर्शन किया।
गणतंत्र दिवस परेड में सेना के तीनों अंगों की एक महिला टुकड़ी भी शामिल थी, जो आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में अभियान, सियाचिन ग्लेशियर और रेगिस्तान सहित विभिन्न इलाकों में उनकी असाधारण सेवा को दर्शाती है। सशस्त्र बल चिकित्सा सेवाओं ने परेड में पहली बार एक पूर्ण महिला दल ने मार्च किया। मोटरसाइकिलों पर 265 महिलाओं ने विभिन्न साहसी करतबों के माध्यम से साहस, वीरता और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया। उन्होंने योग सहित भारतीय मूल्यों और संस्कृति की ताकत का भी प्रदर्शन किया और एकता और समावेशिता का संदेश दिया। भारतीय नौसेना की झांकी में ”नारी शक्ति” को भी दर्शाया गया है। इस सैन्य बल द्वारा सभी भूमिकाओं और सभी रैंकों में महिलाओं का स्वागत करने की हाल में घोषणा की गई है। कर्तव्य पथ पर पहली बार, उप-निरीक्षक श्वेता सिंह की कमान में ‘बीएसएफ महिला ब्रास बैंड’ ने परेड में भाग लिया। सीमा सुरक्षा बल की महिला टुकड़ी में 144 ”महिला प्रहरी” शामिल थीं।

पद्म पुरस्कार 2024 : वेंकैया नायडू को पद्म विभूषण तो मिथुन को पद्म भूषण , देखें विजेताओं की पूरी सूची

केंद्र सरकार ने 75 वें गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्व संध्या यानी गुरुवार शाम प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। जिनमें भारत की पहली मादा हाथी महावत पारबती बरुआ को इस साल पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वहीं, पद्म विभूषण से मशहूर अभिनेत्री वैजयंती माला बाली, कोनिदेला चिरंजीवी, एम वेंकैया नायडू, बिंदेश्वर पाठक (मरणोपरांत) और पद्मा सुब्रमण्यम को सम्मानित किया गया है। पद्म भूषण पुरस्कार पाने वालों में सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश एम फातिमा बीवी (मरणोपरांत), अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती और बॉम्बे समाचार के मालिक होर्मूसजी एन क नाम शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उन सभी लोगों को बधाई दी है, जिन्हें पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। कहा कि भारत विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान को महत्व देता है। वे अपने असाधारण कार्यों से लोगों को प्रेरित करते रहें।
आइए जानते हैं किन-किन हस्तियों को मिला सम्मान?
5 पद्म विभूषण से सम्मानित
वैजयंती माला बाली (कला) – तमिलनाडु
कोनिडेला चिरंजीवी (कला) – आंध्र प्रदेश
एम वेंकैया नायडू (सार्वजनिक मामले) – आंध्र प्रदेश
बिंदेश्वर पाठक (सामाजिक कार्य) – बिहार
पद्मा सुब्रह्मण्यम (कला) – तमिलनाडु
पद्म भूषण 2024 से ये सम्मानित
एम फातिमा बीवी (सार्वजनिक मामले) – केरल
होर्मूसजी एन कामा (साहित्य एवं शिक्षा) – महाराष्ट्र
मिथुन चक्रवर्ती (कला) – पश्चिम बंगाल
सीताराम जिंदल (व्यापार और उद्योग) – कर्नाटक
यंग लियू (व्यापार और उद्योग) – ताइवान
अश्विन बालचंद मेहता (मेडिसिन) – महाराष्ट्र
सत्यब्रत मुखर्जी (सार्वजनिक मामले) – पश्चिम बंगाल
राम नाईक (सार्वजनिक मामले) – महाराष्ट्र
तेजस मधुसूदन पटेल (मेडिसिन) – गुजरात
ओलानचेरी राजगोपाल (सार्वजनिक मामले) – केरल
दत्तात्रेय अंबादास मयालू उर्फ ​​राजदत्त (कला) – महाराष्ट्र
तोगदान रिनपोछे (अन्य – अध्यात्मवाद) – लद्दाख
प्यारेलाल शर्मा (कला) – महाराष्ट्र
चन्द्रेश्वर प्रसाद ठाकुर (चिकित्सा)-बिहार
उषा उथुप (कला) – पश्चिम बंगाल
विजयकांत (कला) – तमिलनाडु
कुन्दन व्यास (साहित्य एवं शिक्षा-पत्रकारिता)-महाराष्ट्र
‘पद्म भूषण से सम्मानित’ हुक्मदेव नारायण की नहीं सुनी जा रही बात, पूर्व केंद्रीय मंत्री का छलका दर्द
पद्म श्री 2024 से सम्मानित
गुमनाम नायक पारबती बरुआ – भारत की पहली महिला मादा हाथी महावत
चामी मुर्मू – प्रसिद्ध आदिवासी पर्यावरणविद्
संगथंकिमा – मिजोरम की सामाजिक कार्यकर्ता
जागेश्वर यादव – आदिवासी कल्याण कार्यकर्ता
गुरविंदर सिंह-सिरसा के दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता
सत्यनारायण बेलेरी – कासरगोड के चावल किसान
दुखु माझी – सिंदरी गांव के आदिवासी पर्यावरणविद्
के चेल्लाम्मल – अंडमान के जैविक किसान
हेमचंद मांझी – नारायणपुर के चिकित्सक
यानुंग जमोह लेगो – अरुणाचल प्रदेश के हर्बल चिकित्सा विशेषज्ञ
सोमन्ना – मैसूरु के आदिवासी कल्याण कार्यकर्ता
सरबेश्वर बसुमतारी – चिरांग के आदिवासी किसान
प्रेमा धनराज – प्लास्टिक सर्जन और सामाजिक कार्यकर्ता
उदय विश्वनाथ देशपांडे – अंतरराष्ट्रीय मल्लखंभ कोच
यज़्दी मानेकशा इटालिया – सिकल सेल एनीमिया में विशेषज्ञ माइक्रोबायोलॉजिस्ट
शांति देवी पासवान और शिवन पासवान – पति-पत्नी की जोड़ी गोदना चित्रकार
रतन कहार – भादू लोकगायक
अशोक कुमार विश्वास – विपुल टिकुली चित्रकार
बालकृष्णन सदनम पुथिया वीटिल – प्रतिष्ठित कल्लुवाझी कथकली नर्तक
उमा माहेश्वरी डी – महिला हरिकथा प्रतिपादक
गोपीनाथ स्वैन – कृष्ण लीला गायक
स्मृति रेखा चकमा – त्रिपुरा की चकमा लोनलूम शॉल बुनकर
ओमप्रकाश शर्मा – माच थिएटर कलाकार
नारायणन ईपी – कन्नूर के अनुभवी थेय्यम लोक नर्तक
भागवत पधान – सबदा नृत्य लोक नृत्य विशेषज्ञ
सनातन रुद्र पाल – प्रतिष्ठित मूर्तिकार
बदरप्पन एम – वल्ली ओयिल कुम्मी लोक नृत्य के प्रतिपादक
जॉर्डन लेप्चा – लेप्चा जनजाति के बांस शिल्पकार
माचिहान सासा – उखरुल का लोंगपी कुम्हार
गद्दाम सम्मैया – प्रख्यात चिंदु यक्षगानम थिएटर कलाकार
जानकीलाल – भीलवाड़ा के बहरूपिया कलाकार
दसारी कोंडप्पा – तीसरी पीढ़ी के बुर्रा वीणा वादक
बाबू राम यादव – पीतल मरौरी शिल्पकार
नेपाल चंद्र सूत्रधार – तीसरी पीढ़ी छऊ मुखौटा निर्माता
वैजयंती माला को भारतीय सिनेमा की बेहतरीन अदाकारा और डांसर में से एक माना जाता है। 1955 की फिल्म ‘देवदास’ में चंद्रमुखी के किरदार के लिए उन्होंने खूब प्रशंसा बटोरी। वह बीआर चोपड़ा की ‘नया दौर’ का भी हिस्सा थीं, जिसमें उन्होंने दिवंगत अभिनेता दिलीप कुमार के साथ अभिनय किया था। वहीं, मिथुन ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत मृगया (1976) से की। अपने अभिनय के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। बाद में, उन्होंने ताहादेर कथा (1992) और स्वामी विवेकानंद (1998) में अपनी भूमिकाओं के लिए दो और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते।

पद्म पुरस्कार 2024 : पद्मश्री से सम्मानित होंगी मशहूर गायिका ऊषा उत्थुप

ऊषा उत्थुप के संघर्ष की बात करें, इससे पहले कुछ गाने याद कीजिए. ‘दोस्तों से प्यार किया, दुश्मनों से बदला लिया… जो भी किया हमने किया…शान से’, ‘हरि ओम हरि-हरि ओम हरि, ‘रंबा हो हो… संबा हो, कोई यहां आहा नाचे नाचे, कोई वहां आहा नाचे नाचे, एक दो च च च, डार्लिंग आंखों से आंखे चार करने दो।
ये वो चुनिंदा गाने हैं जो कहीं भी बज रहे हों, आप गुनगुनाने लगते हैं. ये सारे गाने प्लेबैक सिंगर ऊषा उत्थुप की बड़ी पहचान हैं। उनकी आवाज अलग है। उनकी अदायगी अलग है. उनका अंदाज अलग है. लेकिन ये पहचान बनाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। हुआ यूं कि ऊषा को गायकी का शौक बचपन से था. एक रोज वो स्कूल टीचर के पास गईं। छोटी सी ऊषा ने संगीत सीखने की इच्छा जताई. टीचर ने जब ऊषा उत्थुप का गाना सुना, तो उन्होंने मना कर दिया। शिक्षक का कहना था कि ऊषा की आवाज गायकी के लिए है ही नहीं. गायकी के लिए आवाज में मुलायमियत होनी चाहिए जबकि ऊषा उत्थुप की आवाज मर्दानी आवाज के काफी करीब थी। शिक्षक के इस बेरूखे अंदाज का सामना कम ही बच्चे कर सकते हैं। आप ही सोच कर देखिए अगर किसी छोटी सी बच्ची को टीचर ऐसे मना कर दे तो ज्यादातर बच्चे मायूस हो जाएंगे। उनकी आंखों में आंसू होंगे लेकिन ऊषा उत्थुप ने इसका ठीक उलट किया. उन्होंने टीचर की बात को ही अनसुना कर दिया, जैसे गाती थीं वैसे ही गाती रहीं।
ऊषा उत्थुप को कहां से लगा संगीत का चस्का – आजादी के कुछ ही महीने बाद की बात है. मुंबई में ऊषा उत्थुप का जन्म हुआ। पिता क्राइम ब्रांच में नौकरी करते थे. ऐसे परिवार में संगीत हो, ऐसा कम ही सोचा जाएगा लेकिन ऊषा की मां को संगीत का बहुत शौक था. वो शौकिया गाती भी थीं। दिलचस्प बात ये है कि पचास के दशक में भी ऐसा नहीं था कि इस परिवार में कुछ चुनिंदा कलाकारों को सुना जाता हो. बल्कि गजब की वेराइटी थी. वेस्टर्न क्लासिकस में बीथोवेन, मोजार्ट सुने जाते थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत में पंडित भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली खान, बेगम अख्तर से लेकर किशोरी अमोनकर की आवाज घर में गूंजती रहती थी यानि संगीत के शौक की ‘रेंज’ भी कमाल की थी। ऊषा उत्थुप में संगीत के संस्कार यहीं से आए।स्कूल में जैसे ही खाली समय मिलता ऊषा उत्थुप की गायकी शुरू हो जाती। पढ़ाई की टेबल तबले में तब्दील हो जाती. क्लास के बाकि बच्चे ‘कोरस’ में शामिल हो जाते।
ये सिलसिला काफी समय तक चला. घर पर ऊषा की बहनों को भी गाने का शौक था। कुल मिलाकर संगीत सुनने का चस्का धीरे-धीरे गायकी सीखने की तरफ बढ़ा लेकिन जब संगीत सीखने की इच्छा जताई तो उन्हें नकार दिया गया लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि ऊषा ने अपने इरादे मजबूत कर लिए. ऊषा 22 साल की थीं, मद्रास में एक कार्यक्रम में उन्होंने गाया। खूब तालियां बजीं. हालांकि वो एक इंग्लिश गाना था। उस दिन मिली तारीफ से ऊषा उत्थुप को एक बड़ा सबक मिला. उन्होंने समझ लिया कि अगर गायकी में पहचान बनानी है तो सबसे पहले ‘ओरिजिनल होना बहुत जरूरी है। इसके बाद वो गायकी के रास्ते पर निकल गयी।
नाइट क्लब में गायकी से शुरू हुआ था सफर – ऊषा उत्थुप ने तो सिंगर बनने का फैसला कर लिया था, लेकिन वो उस दौर में ये प्रयास करने जा रही थीं जब इंडस्ट्री में लता मंगेशकर, आशा भोंसले जैसी गायिका थीं. ऐसे में ऊषा का सफर नाइट क्लब में गायकी के साथ शुरू हुआ। दिल्ली में ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान ऊषा उत्थुप की किस्मत बदली. दिल्ली से पहले मद्रास, कोलकाता जैसे शहरों में भी ऊषा उत्थुप ने नाइट क्लबों में गायकी की थी। ऊषा की वेशभूषा भी अलग ही होती थी- आज भी वो वैसी ही हैं। चटक रंग की साड़ी… बड़ी सी बिंदी. ऊषा जब नाइट क्लब में फिल्मी गाने गाती थीं तो उस दौरान एक और गाना उनका पसंदीदा था-काली तेरी गुथ ते परांदा तेरा लालनी। दिल्ली के उस नाइट क्लब में नवकेतन फिल्म्स की यूनिट के कुछ बड़े लोग मौजूद थे। उस समय ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ फिल्म के लिए काम चल रहा था। ये उस दौर के बहुत बड़े स्टार देव आनंद की फिल्म थी। इस फिल्म का संगीत पंचम दा बना रहे थे। फिल्म की यूनिट के लोगों ने क्लब में गा रही लड़की के बारे में पता किया। सारी जानकारी इकट्ठा करने के बाद उन्होंने ऊषा उत्थुप से संपर्क किया. ऑफर बिल्कुल सीधा था- क्या आप हमारी अगली फिल्म में गाएंगी? ऊषा के सामने कोई ऐसी वजह नहीं थी कि वो मना करतीं. उन्होंने हामी भर दी। उस फिल्म के लिए गाना बना- हरे कृष्णा हरे राम…बाकि इसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। ऊषा उत्थुप के गाने पर आज भी लोग झूमते हैं- नाचते हैं। ऊषा उत्थुप गायकी के साथ साथ एक्टिंग भी कर चुकी हैं लेकिन वो कहती है उन्होंने जो गाया दिल से गाया। अपनी जिंदगी को वो अपने ही गाने से परिभाषित करती हैं- दोस्तों से प्यार किया, दुश्मनों से बदला लिया… जो भी किया हमने किया…शान से।

गणतंत्र दिवस विशेष : संविधान ही नहीं, अधिकार भी जानें

भारत आज अपना 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। इस दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। भारत ने आज के दिन समानता, धर्मनिरपेक्षता और स्वशासन के लिए प्रतिबद्ध एक गणतंत्र के रूप में अपनी पहचान अपनाई। हमारे संविधान ने महिलाओं को आजादी से जीने के लिए कई अधिकार दिए हैं, जिनका इस्तेमाल हम एक सम्मान भरी जिंदगी जीने के लिए कर सकते हैं। लेकिन अपने संविधान की ही तरह क्या वाकई महिलाएं अपने अधिकारों को अच्छी तरह जानती हैं। समाज इस बात को स्वीकार करे या ना करे, पर यह सच्चाई है कि महिलाओं पर जिम्मेदारियों का दोहरा बोझ होता है। घर,ऑफिस,बच्चे,परिवार और रसोई की जिम्मेदारियां अकसर एक-दूसरे से घालमेल होती नजर आती हैं। पर, जिम्मेदारियों का इतना बोझ उठाने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अपने सारे वाजिब अधिकार भी मिल जाते हैं। कभी वह घर में तिरस्कार का शिकार हो जाती है, तो कभी ऑफिस में शोषण का। उसे कई बार सिर्फ औरत होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है, तो कई बार अपने अधिकारों की जानकारी का अभाव उसे शोषण का शिकार रहने के लिए मजबूर कर देता है। यह समझना जरूरी है कि हम महिलाओं के ऊपर सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ ही नहीं है बल्कि हमारे पास अपनी हिफाजत के लिए कई अधिकार भी हैं। जैसे मातृत्व अवकाश का अधिकार, घर में रहने का अधिकार, ऑफिस में समान वेतन का अधिकार, अपनी बात रखने का अधिकार आदि। समय की जरूरत है कि हम महिलाएं ना सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें बल्कि उन्हें उठाने के लिए उचित कदम भी उठाएं।
मातृत्व से जुड़े अधिकार- क्या आप जानती हैं कि गर्भवती महिलाओं को संविधान द्वारा कुछ खास अधिकार प्राप्त हैं? संविधान के अनुच्छेद -42 के तहत कामकाजी महिलाओं को तमाम अधिकार हासिल हैं। इसमें महिला यदि किसी सरकारी और गैर सरकारी संस्था, फैक्ट्री में जिसकी स्थापना इम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट, 1948 के तहत हुई हो में काम करती है, तो उसे मातृत्व से जुड़े तमाम लाभ मिलेंगे, जिसमें 12 सप्ताह से लेकर छह माह तक का मातृत्व अवकाश शामिल है। इस अवकाश को वह अपनी आवश्कता के अनुसार ले सकती है। गर्भपात की स्थिति में भी इस एक्ट का लाभ मिलता है। महिला गर्भावस्था या फिर गर्भपात के चलते बीमार हो जाती है, तो मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उसे अतिरिक्त एक महीने की छुट्टी मिल सकती है। महिला को मैटरनिटी लीव के दौरान किसी तरह के आरोप पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। अगर उसे यह सुविधा नियोक्ता द्वारा नहीं दी जाती है, तो वह इसकी शिकायत कर सकती है। यहां तक कि वह कोर्ट भी जा सकती है।
मुफ्त कानूनी सलाह का अधिकार – अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है, तो वह मुफ्त कानूनी मदद ले सकती है। वह अदालत से मुफ्त में सरकारी खर्चे पर वकील की गुहार लगा सकती है, जिसे महिला की आर्थिक स्थिति देखते हुए मुहैया कराया जाता है। पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता कमिटी से संपर्क करती है और महिला की गिरफ्तारी के बारे में उन्हें सूचित किया जाता है। लीगल ऐड कमेटी महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देती है।
स्त्री धन है सिर्फ आपका – स्त्री धन? हैरान होने की जरूरत नहीं है। यह वह धन है, जो महिला को शादी के वक्त उपहार के तौर पर मिलता है। इस पर महिला का पूरा हक होता है। इसके अतिरिक्त वर-वधू दोनों के इस्तेमाल के लिए साझा सामान दिए जाते हैं, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस बाबत वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव गुप्ता कहते हैं कि अगर ससुरालवालों ने महिला का स्त्री धन अपने पास रख लिया है तो महिला इसके खिलाफ आईपीसी की धारा 406 (अमानत में खयानत) की भी शिकायत दर्ज करा सकती है।
आपकी हां, है जरूरी – महिला की सहमति के बिना उसका गर्भपात नहीं कराया जा सकता। जबरन गर्भपात कराए जाने के लिए सख्त कानून मौजूद हैं। अब आप सोच रही होंगी कि गर्भपात करना ही कानूनी नहीं है। पर, कुछ खास परिस्थितियों में गर्भपात कराया जा सकता है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रग्नेंसी एक्ट के तहत अगर गर्भ के कारण महिला की जान को खतरा हो या फिर स्थिति मानसिक और शारीरिक रूप से गंभीर परेशानी पैदा करने वाली हों या फिर गर्भ में पल रहा बच्चा विकलांगता का शिकार हो तो गर्भपात कराया जा सकता है।
लिव इन के भी हैं अधिकार – अब लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। पर यहां सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर लिव इन है क्या? सिर्फ उसी रिश्ते को लिन-इन रिलेशनशिप माना जा सकता है, जिसमें स्त्री और पुरुष विवाह किए बिना पति-पत्नी की तरह रहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि दोनों बालिग और शादी योग्य हों। यदि दोनों में से कोई एक भी पहले से शादीशुदा है, तो उसे लिव-इन रिलेशनशिप नहीं कहा जाएगा। इस रिश्ते में रहने वाली महिलाओं को भी घरेर्लू ंहसा कानून के तहत सुरक्षा हासिल है। अगर उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित किया जाता है, तो वह अपने साथी के खिलाफ इस एक्ट के तहत शिकायत कर सकती है। ऐसे में संबंध में रहते हुए उसे राइट-टू-शेल्टर भी मिलता है। यानी जब तक यह रिश्ता कायम है, तब तक उसे घर से निकाला नहीं जा सकता। लिव-इन में रहने वाली महिला गुजारा भत्ता पाने की भी अधिकारी है।
एफआईआर दर्ज होगी कहीं भी – डीवी एक्ट की धारा-12 इसके तहत महिला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत कर सकती है। शिकायत की सुनवाई के दौरान अदालत सुरक्षा अधिकारी से रिपोर्ट मांगता है। महिला जहां रहती है या जहां उसके साथ घरेर्लू ंहसा हुई है या फिर जहां प्रतिवादी रहते हैं, वहां शिकायत की जा सकती है। सुरक्षा अधिकारी घटना की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करता है और उस रिपोर्ट को देखने के बाद अदालत अपना आदेश पारित करती है। इस दौरान अदालत महिला को उसी घर में रहने देने , खर्चा देने या फिर उसकी सुरक्षा का आदेश दे सकती है। अगर अदालत महिला के पक्ष में आदेश पारित करती है और प्रतिवादी उस आदेश का पालन नहीं करता है तो डीवी एक्ट-31 के तहत प्रतिवादी पर केस बनता है।
पिता की नौकरी पर भी है अधिकार – नौकरी पर रहते हुए पिता की मौत होने पर बेटियों को भी मुआवजे के तौर पर नौकरी पाने का अधिकार है। फिर चाहे बेटी शादीशुदा हो या कुंवारी। 2015 से लागू हुए नियम के तहत नौकरी में रहते हुई पिता की मौत पर शादीशुदा बेटी भी मुआवजे में पिता की नौकरी पाने का अधिकारी रखती है।
समान वेतन का अधिकार – समानता का अधिकार महिलाओं के कार्यक्षेत्र में सामान वेतन पर भी लागू होती है, जिसमें एक जैसा काम करने वाले महिला-पुरुष को एक सा वेतन मिलेगा । कंपनी में जितनी भी सुविधा पुरुष कर्मचारी को मिलती है, उतनी ही सुविधा महिला कर्मचारी को भी मिलेगी। कुछ खास जगहों को छोड़कर शाम सात बजे के बाद और सुबह छह बजे के पहले महिला कर्मचारी को काम पर नहीं लगाया जा सकता है। छुट्टी के दिन महिला कर्मचारी को काम पर नहीं बुलाया जा सकता है। अगर उन्हें बुलाना है तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है। अगर कोई कंपनी इस कानून को मानने से इंकार करती है तो उसके मालिक को सजा का प्रावधान है। समस्या होने पर श्रम आयुक्त से शिकायत की जा सकती है।
घरेलू हिंसा का शिकार महिला को घर में रहने का पूरा अधिकार है। धारा 17-18 के तहत कानून प्रक्रिया के अतिरिक्त उसका निष्कासन नहीं किया जा सकता।
घरेलू हिंसा की शिकायत व्यक्ति के घरेलू संबंध में रहने वाली महिला के द्वारा अथवा उसके प्रतिनिधि द्वारा दर्ज कराई जा सकती है। पत्नी, बहनें ,माताएं, बेटियां भी शिकायत दर्ज करवा सकती हैं।
आईपीसी की धारा 354डी के अंतर्गत किसी महिला का पीछा करने, बार-बार मना करने के बाद भी संपर्क करने, इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेश जैसे ई-मेल, इंटरनेट आदि के जरिए मॉनिटर करने वाले शख्स पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के तहत स्टॉकिंग करने पर जेल हो सकती है।
किसी महिला को सूरज डूबने के बाद और उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। किसी खास मामले में एक प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही यह संभव है।
प्रत्येक पुलिस स्टेशन में एक महिला पुलिस अधिकारी (हेड कांस्टेबल से नीचे नहीं होना चाहिए) पूरे समय होना अनिवार्य है।
महिला कॉन्स्टेबल की अनुपस्थिति में, पुरुष पुलिस अधिकारी द्वारा महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
महिला की तलाशी सिर्फ महिला पुलिस कर्मी ही ले सकती है।
बिना वॉरेंट गिरफ्तार महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी है और उसे जमानत संबंधी अधिकार के बारे में भी बताना जरूरी है।
पुलिस केवल महिला के निवास पर ही उसकी जांच कर सकती है।
एक बलात्कार पीड़िता अपनी पसंद के स्थान पर ही अपना बयान रिकॉर्ड कर सकती है और पीड़िता की चिकित्सा प्रक्रिया केवल सरकारी अस्पताल में ही हो सकती है।

राम अबकी आएं तो शांता और सीता के साथ आएं…स्वप्न वहीं खड़ा है

इस वर्ष जनवरी की जनवरी और विशेष रूप से 22 जनवरी का दिन इतिहास में अपनी जगह बना चुका है। यह वर्ष ही लोकसभा चुनावों का वर्ष है मतलब 2024 में आम चुनाव हैं और श्रीराम के नाम की लहर इस बार चुनाव में बहुत मायने रखने वाली है। अयोध्या के राम मंदिर निर्माण की यात्रा बहुत कठिन रही है, बहुत बलिदान हुए हैं, दमन झेला है असंख्य लोगों ने इसलिए यह दिन सनातन धर्म के लिए बहुत विशेष है । देश भर में और विश्व में तैयारियां चल रही हैं। अयोध्या अब पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित हो रही है और माना जा रहा है कि मथुरा और काशी इसके बाद कतार में हैं। बात यह है कि भक्ति तो है, अपनी जगह है मगर कहीं न कहीं आज की भक्ति में भक्ति की वह तन्मयता और एकात्मकता नहीं दिख रही। वह समय और था जब सूर और तुलसी जैसे लोग थे। आम जनता में भक्ति है और राजनीति इस संवेदना को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है। उत्सव के इस तामझाम और भव्यता  के बीच श्रीराम के जयकारे के बीच मन उस शांता को खोजता है जो श्रीराम की बड़ी बहन थीं और उनके पति श्रृंगी ऋषि की तपस्या के बाद पुत्र कामेष्टि यज्ञ के कारण अयोध्या को उसके चारों राजकुमार मिले थे मगर आज वह शांता कहीं नहीं हैं…अयोध्या ने उनको निर्वासित कर रखा है। ऐसा लगता है जैसे अयोध्या और निर्वासन का कोई गहरा सम्बन्ध है। अयोध्या के राजमहल ने गोद देने के बहाने पहले राजकुमारी शांता को निर्वासित किया। इसके बाद कैकयी ने श्रीराम को वन भेजा तो उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी गये। 14 साल के वनवास के बाद श्रीराम तो अयोध्या में रहे मगर अयोध्यावासियों के कारण सीता को निर्वासित किया गया। काल के हाथों और समय चक्र ने राम लला को ही उनकी अयोध्या से निर्वासित कर दिया । अब जब 500 वर्षों के पश्चात, अनेकों भक्तों के बलिदानों के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौट रहे हैं तो मन यही कह रहा है कि श्रीराम इस बार अकेले नहीं, शांता और सीता को साथ लेकर लौटिए और फिर कभी उनको निर्वासित न होने दीजिए। भारतीय परिवारों में बहनों की स्थिति शांता जैसी ही है..यह परिवार का चक्र जब तक बहनों को सम्मान देना, उनके अधिकार देना नहीं सीखता…तब सतयुग क्या आ सकेगा? इस देश में जब सिया और राम हों तो शांता को भी मान देना सीखने की जरूरत है। अकेला व्यक्ति पहले चलता अकेला ही है मगर उसकी प्रेरणा कुछ ऐसी होती है कि वह खुद परिवार बना लेता है, लोग साथ आ जाते हैं। अयोध्या में समानता की कल्पना अभी यूटोपिया ही है मगर स्वप्न अभी भी वहीं खड़ा है श्रीराम जब आएं तो शाता और सीता भी साथ आएं।
आप सभी को मकर संक्रांति, नेताजी जयंती, गणतंत्र दिवस के साथ इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह के  ऐतिहासिक क्षण की शुभकामनाएं।

जालान पुस्तकालय में निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता सम्पन्न

कोलकाता। सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वावधान में अंतर्विद्यालयी निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में महानगर के प्रतिष्ठित 14 विद्यालयों के 27 छात्र-छात्राओं ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान, लखनऊ की प्रधान संपादिका डॉक्टर अमिता दुबे ने कहा कि इस तरह के साहित्यिक कार्यक्रम बच्चों में अपनी भाषा के प्रति लगाव पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा में लेखन करते हुए भाषा की शुद्धता का ध्यान देना चाहिए।
मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध चिंतक एवं यूको बैंक के राजभाषा अधिकारी अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी ने कहा कि ऐसे साहित्यिक कार्यक्रमों से बच्चों के मानसिक विकास के साथ–साथ व्यक्तित्व के विकास में भी सहायता मिलती है। निबंध विचारों को क्रमबद्ध रूप से अभिव्यक्त करने का सुंदर माध्यम है। इस अवसर पर डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि आज डिजिटल युग में डिजिटल बंधन से बाहर निकलकर निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता में भाग लेना अतिसराहनीय है। निबंध लिखना स्वयं के विचारों को मर्यादित ढंग से अभिव्यक्त करना है। इस प्रतियोगिता में क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार महेश्वरी बालिका विद्यालय की श्रेया उपाध्याय, टांटिया हाई स्कूल के नवीन चावला और मारवाड़ी बालिका विद्यालय की वसुंधरा शाह को मिला। तीन सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। प्रतियोगिता के निर्णायक डॉ. बृजेश कुमार सिंह, प्रो. मंटू दास, अमरनाथ सिंह, डॉ. काजू कुमारी साव एवं डॉ कमल कुमार थे। कार्यक्रम का शुभारंभ विवेक तिवारी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं रामाष्टक से हुआ।
स्वागत भाषण देते हुए संस्था की मंत्री दुर्गा व्यास ने कहा कि हिंदी भाषा के विकास और सही समझ के लिए ऐसे कार्यक्रम का आयोजन सराहनीय है। उन्होंने सभागार में उपस्थित सभी सुधिजनों का हार्दिक स्वागत और अभिनंदन किया।
द्वय सत्रीय कार्यक्रम का कुशल संचालन प्राध्यापिका दीक्षा गुप्ता एवं दिव्या प्रसाद ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी ने किया।
इस अवसर पर महावीर बजाज, अरुण प्रकाश मल्लावत, ओमप्रकाश मिश्र, डॉ. ऋषिकेश राय, विधुशेखर शास्त्री, डॉ आर. एस. मिश्रा, चंद्रिका प्रसाद पाण्डेय ‘अनुरागी’, अविनाश गुप्ता, रमाकांत सिन्हा के साथ–साथ विद्यालय के अध्यापक, अध्यापिकाएं और छात्र–छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में परमजीत पंडित, राहुल उपाध्याय, पलक सिंह, राहुल दास एवं राकेश पाण्डेय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यूनिवर्ल्ड सिटी में बनाई गई राम मंदिर की भव्य रंगोली

कोलकाता : सोमवार को अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा को लेकर पूरा देश राममय हो गया है। महानगर कोलकाता भी इससे परे नहीं है। राम मंदिर और भगवान श्रीराम में आस्था रखने वाला हर एक व्यक्ति अपनी-अपनी भावना के अनुसार अपनी भक्ति को प्रकट कर रहा है। कोलकाता शहर में भी राम मंदिर को लेकर लोगों में जबर्दस्त उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है। इसी उत्साह की झलक राजारहाट स्थित यूनीवर्ल्ड सिटी में देखने को मिली। यहाँ नीता मिश्रा, शाएला मिश्रा, नम्रता महराना और शगुन सिंह ने मिलकर राम मंदिर की एक भव्य रंगोली बनाई है। रंगोली की खूबसूरती ऐसी है कि एक बार जिसकी नज़र इस पर पड़ रही है, उसकी नज़र हटने को तैयार नहीं है।

तीसरा मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद सम्मान डॉ.अभिज्ञात को

कोलकाता ।  मनीषा त्रिपाठी फाउंडेशन फिल्म तथा वेब पत्रिका अनहद कोलकाता की ओर से दिया जाने वाला तीसरा मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद कोलकाता सम्मान-2023 हिन्दी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-कथाकार डॉ.अभिज्ञात को प्रदान किया जाएगा। अनहद कोलकाता के प्रबंध निदेशक उमेश त्रिपाठी ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष कला की किसी भी विधा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक कला साधक को दिया जाता है। इसके पूर्व यह सम्मान हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि एवं एक्टिविस्ट केशव तिवारी और महिलाओं के सवालों को अपनी कविता में पुरजोर तरीके से उठाने वाली रूपम मिश्र को दिया जा चुका है। सम्मान स्वरूप ग्यारह हजार रुपये की मानदेय राशि सहित प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। अभिज्ञात हिन्दी में उस परम्परा के लेखक हैं, जिनकी जड़ें आज भी गाँव में हैं। अभिज्ञात ने अपने लेखन के माध्यम से समाज के वंचितों और शोषितों के प्रश्नों को उठाया है और पिछले तीस सालों से लगातार साहित्य की दुनिया में सार्थक-सक्रिय रहे हैं। इस बार के निर्णायक हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि केशव तिवारी एवं अनहद कोलकाता के संस्थापक विमलेश त्रिपाठी थे। केशव तिवारी ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि यह सम्मान एक ऐसे साहित्यकार को दिया जा रहा है, जो अपने रचना और जीवन के बीच की खाई को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य की ओर प्रवृत हैं एवं उन्होंने अपने साहित्य में समय के ज्वलंत मुद्दे उठाए हैं। यह सम्मान डॉ. अभिज्ञात कोलकाता में ही आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा, जिसमें कोलकाता एवं भारत के अन्य हिस्से से आए साहित्यकार शामिल होंगे।

22 युवा लेखकों को मिला साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार 2023

कोलकाता ।  साहित्य अकादेमी द्वारा रवींद्र सदन सभागार, कोलकाता में आयोजित एक भव्य समारोह में अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक द्वारा 22 भाषाओं के युवा लेखकों को 2023 के लिए प्रतिष्ठित युवा पुरस्कार प्रदान किए गए। पुरस्कार के रूप में 50,000 रुपए की राशि और उत्कीर्ण ताम्र फलक दिया गया। इस क्रम में प्रशस्ति पाठ अकादेमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव द्वारा किया गया तथा पुरस्कार-अर्पण के पहले अकादेमी की उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा ने पुष्पगुच्छ भेंट करके पुरस्कृत लेखकों का अभिनंदन किया। पुरस्कृत लेखकों में शामिल हैं-जिंटू गीतार्थ (असमिया), हामिरुद्दीन मिद्या (बाङ्ला), माइनावस्रि दैमारि (बोडो), धीरज कुमार रैना (डोगरी), अनिरुद्ध कनिसेट्टी (अंग्रेजी), अतुल कुमार राय (हिंदी), मंजुनाथ चल्लुरु (कन्नड), निगहत नसरीन (कश्मीरी), तन्वी श्रीधर कामत बांबोलकार (कोंकणी), संस्कृति मिश्र (मैथिली), गणेश पुत्तूर (मलयाळम्), थिङनम परशुराम (मणिपुरी), विशाखा विश्वनाथ (मराठी), नयन कला देवी (नेपाली), दिलेश्वर राणा (ओड़िआ), संदीप शर्मा (पंजाबी), देवीलाल महिया (राजस्थानी), मधुसूदन मिश्र (संस्कृत), बापी टुडु (संताली), मोनिका पंजवाणी (सिंधी), राम थंगम (तमिळ), तक्केडसिला जॉनी (तेलुगु) और तौसीफ खान (उर्दू)। इनमें से धीरज कुमार रैना पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उपस्थित नहीं हो सके। समारोह के आरंभ में अकादेमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव ने राष्ट्रीय युवा दिवस के पावन अवसर पर स्वामी विवेकानंद के विचारों
को रेखांकित करते हुए समाज के सम्यक विकास के लिए युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है। इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री माधव कौशिक ने कहा कि साहित्य अकादेमी का यह मंच संपूर्ण भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है तथा हमारे युवा लेखक भारतीय भाषाओं के साहित्य का भविष्य हैं। समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात बाङ्ला कवि डॉ. सुबोध सरकार ने कहा कि अक्सर युवा लेखक अपने लेखन की सफलता को लेकर सशंकित रहते हैं, लेकिन उनका क्रांतिकारी लेखन उनकी नवीन संभावनाओं को संकेतित करता है। अपने समाहार वक्तव्य में अकादेमी की उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि अकादेमी के इस मंच का साक्षी रहते हुए वे यह अनुभव करती हैं कि साहित्य का भविष्य और भविष्य का साहित्य बिलकुल भी खतरे में नहीं है। सोशल मीडिया के वर्तमान समय में लेखकों को बिना किसी हस्तक्षेप के अपने को अभिव्यक्त करने का विस्तृत मंच प्राप्त हुआ है। समारोह में बड़ी संख्या में स्थानीय साहित्यकार और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।