Wednesday, July 15, 2026
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फेडरर पांचवीं बार बने ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन, नडाल को हराया

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स्विट्जरलैंड के रॉजर फेडरर ने मैराथन मुकाबले में स्पेन के रफाएल नडाल को पराजित कर ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस चैंपियनशिप के पुरुष एकल का खिताब पांचवीं बार हासिल किया। फेडरर ने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी नडाल को 6-4, 3-6, 6-1, 3-6, 6-3 से हराया।

फेडरर ने पांच वर्षों बाद ग्रैंड स्लैम खिताब जीता और यह उनका कुल 18वां ग्रैंड स्लैम खिताब है। 35 वर्षीय फेडरर ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले केन रोजवाल के बाद दूसरे सबसे उम्रदराज खिलाड़ी बने। रोजवाल ने 37 वर्ष की उम्र में ग्रैंड स्लैम खिताब जीता था। इस जीत के साथ फेडरर ने ग्रैंड स्लैम ‍फाइनल में नडाल के खिलाफ जीत-हार के रिकॉर्ड को 3-6 कर लिया। यह 35 मैचों में फेडरर की नडाल पर 12वीं जीत है।

17 ग्रैंड स्लैम खिताब विजेता फेडरर और 14 ग्रैंड स्लैम खिताब विजेता नडाल के बीच इस मुकाबले का दुनियाभर को इंतजार था। पहले सेट में अच्छा संघर्ष देखने को मिला। छठे गेम तक दोनों खिलाडि़यों ने अपनी-अपनी सर्विस बरकरार रखी। फेडरर ने सातवें गेम में नडाल की सर्विस भंग की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 34 मिनटों में यह सेट 6-4 से अपने नाम किया।

दूसरे सेट में नडाल ने धमाकेदार शुरुआत की। उन्होंने दूसरे और चौथे गेम में फेडरर की सर्विस भंग कर एक समय 4-0 की बढ़त बनाई थी। फेडरर ने पांचवें गेम में नडाल की सर्विस भंग की लेकिन उनके प्रयास नाकाफी साबित हुए। नडाल ने यह सेट 6-3 से जीतकर मैच में 1-1 की बराबरी कर ली।दूसरा सेट हारने के बाद तीसरे सेट में फेडरर ने जबर्दस्त वापसी की। उन्होंने दूसरे और छठे गेम में नडाल की सर्विस भंग की और 5-1 की बढ़त बनाई। फेडरर ने इसके बाद सातवें गेम में सर्विस बरकरार रखते हुए इस सेट को आसानी से 6-1 से जीतकर मैच में 2-1 की बढ़त बनाई।

नडाल ने घायल शेर की तरह चौथे सेट में वापसी की। उन्होंने इस सेट के चौथे गेम में फेडरर की सर्विस भंगकर 3-1 की बढ़त बनाई और फिर अपने सर्विस गेम जीतते हुए यह सेट 6-3 से अपने नाम की। पांचवें सेट में नडाल ने पहले गेम में फेडरर की सर्विस भंग की। लेकिन फेडरर ने इसके बाद वापसी करते हुए छठे और आठवें गेम में नडाल की सर्विस भंग कर तथा नौवें गेम में अपनी सर्विस बरकरार रखते हुए यह सेट 6-3 से जीता और खिताब अपने नाम किया।

एक नजर इधर भी…

  • 35 बार दोनों अब तक आपस में भिड़ चुके हैं, जिसमें से 23 बार नडाल और 12 बार फेडरर जीते हैं।
  • 22 फाइनल दोनों में अब तक खेले गए हैं, जिसमें से 14 में नडाल और 8 में फेडरर ने बाजी मारी है।
  • 12 बार ग्रैंड स्लैम में अब तक दोनों आमने-सामने हुए हैं, जिसमें से 9 बार नडाल और 3 बार फेडरर जीते हैं
  • नौवीं बार दोनों ग्रैंड स्लैम फाइनल में भिड़े जिनमें से 6 बार नडाल और 3 बार फेडरर जीते हैं।
  • 4 बार अब तक दोनों ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में भिड़ चुके हैं। तीन बार नडाल और पहली बार फेडरर विजयी हुए।
  • 8 साल बाद दोनों ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में टकराए। 2009 में खेले गए खिताबी मुकाबले में नडाल ने करीब साढ़े चार घंटे तक चले पांच सेट के मुकाबले में फेडरर को मात दी थी।
  • 6 साल बाद दोनों किसी ग्रैंड स्लैम के फाइनल में आमने-सामने हुए। इससे पहले 2011 के फ्रेंच ओपन में नडाल ने फेडरर को हराकर खिताब जीता था।
  • 14 महीने बाद यह दोनों किसी फाइनल मुकाबले में एक-दूसरे से भिड़ें। इससे पहले यह दोनों 2015 के स्विस इंडोर ओपन में खेले थे जहां फेडरर ने नडाल को मात दी थी।
  • फेडरर का यह पांचवां ऑस्ट्रेलियन अोपन खिताब है। उन्होंने यह खिताब 2004, 2006, 2007, 2010 और 2017 में जीता।

 

षट्-ऋतु-वर्णन-खंड

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मलिक मोहम्मद जायसी

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पदमावति सब सखी बोलाई । चीर पटोर हार पहिराई॥
सीस सबन्ह के सेंदुर पूरा और राते सब अंग सेंदुरा॥
चंदन अगर चित्र सब भरीं ।नए चार जानहु अवतारीं॥
जनहु कँवल सँग फूली कूईं । जनहुँ चाँद सँग तरई ऊईं॥
धनि पदमावति, धनि तोर नाहू । जेहि अभरन पहिरा सब काहू॥
बारह अभरन, सोरह सिंगारा । तोहि सौंह नहिं ससि उजियारा॥
ससि सकलंक रहै नहिं पूजा । तू निकलंक, न सरि कोई दूजा॥

काहू बीन गहा कर,काहू नाद मृदंग ।
सबन्ह अनंद मनावा रहसि कूदि एक संग॥1॥

पदमावति कह सुनहु, सहेली । हौं सो कँवल, तुम कुमुदनि-बेली॥
कलस मानि हौं तेहि दिन आई । पूजा चलहु चढावहिं जाई॥
मँझ पदमावतिं कर जो बेवानू । जनु परभात परै लखि भानू॥
आस-पास बाजत चौडोला । दुंदुभि, झाँझ, तूर, डफ ढोला॥
एक संग सब सोंधे-भरी । देव-दुवार उतरि भइ खरी॥
अपने हाथ देव नहलावा । कलस सहस इक घिरित भरावा॥
पोता मँडप अगर औ चंदन । देव भरा अरगज औ बंदन॥

कै प्रनाम आगे भई, विनय कीन्ह बहु भाँति ।
रानी कहा चलहु घर, सखी! होति है राति॥2॥

भइ निसि, धनि जस ससि परगसी । राजै-देखि भूमि फिर बसी॥
भइ कटकई सरद-ससि आवा । फेरि गगन रवि चाहै छावा॥
सुनि चनि भौंह-धनुक फिरि फेरा । काम कटाछन्ह कोरहि हेरा॥
जानहु नाहिं पैज,प्रिय ! खाँचौं । पिता सपथ हौं आजु न बाँचौं॥
काल्हि न होइ, रही महि रामा । आजु करहु रावन संग्रामा॥
सेन सिंगार महूँ है सजा । गज-पति चाल, अँचल-गति धजा॥
नैन समुद औ खडग नासिका । सरवरि जूझ को मो सहुँ टिका ?॥

हौं रानी पदमावति, मैं जीता रस भोग ।
तू सरवरि करु तासौं जो जोगी तोहि जोग॥3॥

हौं अस जोगी जान सब कोऊ । बीर सिंगार जिते मैं दोऊ॥
उहाँ सामुहें रिपु दल माहाँ । इहाँ त काम-कटक तुम्ह पाहाँ॥
उहा त हय चढि कै दल मंडौं । इहाँ त अधर अमिय-रस खंडौं॥
उहाँ त खडग नरिंदहि मारौं । इहाँ त बिरह तुम्हार सँघारौं॥
उहाँ त गज पेलौं होइ केहरि । इहवाँ कामिनी-हिय हरि॥
उहाँ त लूटौं कटक खँधारू । इहाँ त जीतौं तोर सिंगारू॥
उहाँ त कुंभस्थल गज नावौं । इहाँ त कुच-कलसहि कर लावौं॥

परै बीच धरहरिया, प्रेम-राज को टेक ?॥
मानहिं भोग छवौ ऋतु मिलि दूवौ होइ एक॥4॥

प्रथम वसंत नवल ऋतु आई । सुऋतु चैत बैसाख सोहाई॥
चंदन चीर पहिरि धरि अंगा । सेंदुर दीन्ह बिहँसि भरि मंगा॥
कुसुम हार और परिमल बासू । मलयागिरि छिरका कबिलासू॥
सौंर सुपेती फूलन डासी । धनि औ कंत मिले सुखबासी॥
पिउ सँजोग धनि जोबन बारी । भौंर पुहुप संग करहिं धमारी॥
होइ फाग भलि चाँचरि जोरी । बिरह जराइ दीन्ह जस होरी॥
धनि ससि सरिस, तपै पिय सूरू । नखत सिंगार होहिं सब चूरू॥

जिन्ह घर कंता ऋतु भली, आव बसंत जो नित्त ।
सुख भरि आवहिं देवहरै, दुःख न जानै कित्त॥5॥

ऋतु ग्रीषम कै तपनि न तहाँ । जेठ असाढ कंत घर जहाँ॥
पहिरि सुरंग चीर धनि झीना । परिमल मेद रहा तन भीना॥
पदमावति तन सिअर सुबासा । नैहर राज, कंत-घर पासा॥
औ बड जूड तहाँ सोवनारा । अगर पोति, सुख तने ओहारा॥
सेज बिछावनि सौंर सुपेती । भोग बिलास कहिंर सुख सेंती॥
अधर तमोर कपुर भिमसेना । चंदन चरचि लाव तन बेना॥
भा आनंद सिंगल सब कहूँ । भागवंत कहँ सुख ऋतु छहूँ॥

दारिउँ दाख लेहिं रस, आम सदाफर डार ।
हरियर तन सुअटा कर जो अस चाखनहार॥6॥

रितु पावस बरसै, पिउ पावा । सावन भादौं अधिक सोहावा॥
पदमावति चाहत ऋतु पाई । गगन सोहावन, भूमि सोहाई॥
कोकिल बैन, पाँति बग छूटी । धनि निसरीं जनु बीरबहूटी॥
चमक बीजु, बरसै जल सोना । दादुर मोर सबद सुठि लोना॥
रँग-राती पीतम सँग जागी । गरजे गगन चौंकि गर लागी॥
सीतल बूँद, ऊँच चौपारा । हरियर सब देखाइ संसारा॥
हरियर भूमि, कुसुंभी चोला । औ धनि पिउ सँग रचा हिंडोला॥

पवन झकोरे होइ हरष, लागे सीतल बास ।
धनि जानै यह पवन है, पवन सो अपने आस॥7॥

आइ सरद ऋतु अधिक पियारी । आसनि कातिक ऋतु उजियारी॥
पदमावति भइ पूनिउँ-कला । चौदसि चाँद उई सिंघला॥
सोरह कला सिंगार बनावा । नखत-भरा सूरुज ससि पावा॥
भा निरमल सब धरति अकासू । सेज सँवारि कीन्ह फुल-बासू॥
सेत बिछावन औ उजियारी । हँसि हँसि मिलहिं पुरुष औ नारी॥
सोन-फूल भइ पुहुमी फूली । पिय धनि सौं, धनि पिय सौं भूली॥
चख अंजन देइ खंजन देखावा । होइ सारस जोरी रस पावा॥

एहि ऋतु कंता पास जेहि , सुख तेहि के हिय माँह ।
धनि हँसि लागै पिउ गरै, धनि-गर पिउ कै बाँह॥8॥

ऋतु हेमंत सँग पिएउ पियाला । अगहन पूस सीत सुख-काला॥
धनि औ पिउ महँ सीउ सोहागा । दुहुँन्ह अंग एकै मिलि लागा॥
मन सौ मन, तन सौं तन गहा । हिय सौं हिय, बिचहार न रहा॥
जानहुँ चंदन लागेउ अंगा । चंदन रहै न पावै संगा॥
भोग करहिं सुख राजा रानी । उन्ह लेखे सब सिस्टि जुडानी॥
जूझ दुवौ जोवन सौं लागा । बिच हुँत सीउ जीउ लेइ भागा॥
दुइ घट मिलि ऐकै होइ जाहीं । ऐस मिलहिं, तबहूँ न अघाहीं॥

हंसा केलि करहिं जिमि , खूँदहिं कुरलहिं दोउ ।
सीउ पुकारि कै पार भा, जस चकई क बिछोउ॥9॥

आइ सिसिर ऋतु, तहाँ न सीऊ । जहाँ माघ फागुन घर पीऊ॥
सौंर सुपेती मंदिर राती । दगल चीर पहिरहिं बहु भाँती॥
घर घर सिंघल होइ सुख जोजू । रहान कतहुँ दुःख कर खोजू॥
जहँ धनि पुरुष सीउ नहिं लागा । जानहुँ काग देखि सर भागा॥
जाइ इंद्र सौं कीन्ह पुकारा । हौं पदमावति देस निसारा॥
एहि ऋतु सदा समग महँ सेवा । अब दरसन तें मोर बिछोवा॥
अब हँसि कै ससि सूरहिं भेंटा । रहा जो सीउ बीच सो मेटा॥

भएउ इंद्र कर आयसु, बड सताव यह सोइ ।
कबहुँ काहु के पार भइ कबहुँ काहु के होइ॥10॥

पद्मावत

 

बसन्त पंचमी की मनमोहक ऋतु में भरे मिठास

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बेसन खोया बर्फी

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सामग्री 1 कप बेसन, 1/2 कप मावा खोया, 1/2 कप कंडेन्‍स मिल्‍क, 1/4 कप पावडर शुगर, 1 चम्‍मच कटे काजू, 2 चम्‍मच घी, 1 चम्‍मच इलायची पावडर

विधि : एक कढाई में घी गरम करें, फिर उसमें काजू के कटे टुकडे़ डाल कर गोल्‍डन ब्राउन करें और फिर किनारे किसी प्‍लेट पर निकाल कर रख लें। अब उसी कढाई में बेसन डाल कर हल्‍का भूरा होने तक भून लें। जब बेसन से घी अलग होने लगे और बेसन से अच्‍छी खुशबू आने लगे तब, बेसन को आंच से उबार कर ठंडा होने के लिये रख दें। जब तक बेसन ठंडा हो रहा है, तब तक आप कढाई में खोए को डाल कर 2-3 मिनट तक गरम कर लें, जिससे वह थोड़ा ढीला हो जाए। उसके बाद इसमें कंडेंस मिल्‍क और पावडर शुगर मिक्‍स करें। अब इसमें इलायची पावडर, भुने हुए काजू के टुकडे़ और बेसन तथा खोया मिक्‍स करें। अब कढाई को धीमी आंच पर चढाएं और उसमें बेसन और खोए के मिश्रण को डाल कर लगातार चलाती रहें। जब ये मिश्रण कढाई से चिपकना बंद हो जाए तब इसे निकाल कर एक घी लगी थाली में डाल कर फैला दें। मिश्रण सूखने के बाद इसे चाकू से मन पसंद शेप में काटें। आप चाहें तो बर्फी को 30 मिनट या 1 घंटे के लिये फ्रिज में भी रख सकती हैं।

 

 

 

केसर सन्देश

Kesari-Sandesh

 

सामग्री :  1 लीटर फुल क्रीम दूध, 1 चचमम्मच नींबू का रस, 4 चम्मच पाउडर चीनी, 2 चम्मच मिल्क पाउडर, 1 चम्मच इलायची पाउडर, चुटकी भर केसर, ड्राय फ्रूट- गार्निशिंग के लिये

विधि- सबसे पहले दूध और नींबू निचोड़ कर हल्‍की आंच पर उसे उबाल लें। फिर मलमल का कपड़ा ले कर उसमें फटा हुआ दूध डालें और कपड़े से सारा पानी निकाले। कपडे़ को अपनी किचन की सिंक के नल से टांग दें जिससे सारा पानी निकल जाए और छेना रह जाए। छेने को निकाल कर साफ प्‍लेट पर रखें, फिर उसमें चीनी पाउडर, दूध पाउडर और इलायची पाउडर मिलाइये। अब छेने को पैन में डाल कर थोड़ी देर पकाइये , जिससे उसका सारा पानी सूख जाए। फिर इसे कुछ देर के लिये ठंडा होने के लिये रख दीजिये।

अपनी हथेली में थोड़ा सा छेना लें और उसे मैश करें। फिर उसे गोल कर के हल्‍का सा पेडे़ के आकार का बना लें। इसी विधि से सारे संदेश बना डालें। संदेश को केसर और दूध मिले घोल से ब्रश कर दीजिये।  इसके बाद इस पर सूखे कटे मेवे छिड़क दीजिये।

 

 

पुरुषों में उन्नत तथा उदार मानसिकता की जरूरत है

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साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. गीता दूबे अपनी कविताओं और आलोचना की तेजस्विता के लिए जानी जाती हैं। उनके साहित्य में स्त्री विमर्श और उससे जुड़े सवाल खुलकर सामने आते हैं। स्कॉटिश चर्च कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर होने के साथ साहित्यिकी की सचिव और प्रलेस की सँयुक्त सचिव भी हैं। अपराजिता ने डॉ. गीता दूबे से खास मुलाकात की –

पढ़ना आन्तरिक व बाहरी संघर्षों से जूझने की ताकत देता था

मुझे प्रोत्साहन नहीं मिला। मेरे परिवार में लड़कियाँ पत्र लिख लें, इतनी शिक्षा पर्याप्त मान ली जाती थी। कहा जाता था – का करिहें पढ़लिख के, कलेक्टर बनिहें का। पढ़ना मेरे लिए आन्तरिक संघर्ष के साथ बाहरी संघर्षों से जूझने की ताकत देता था। नौवीं कक्षा पास की तो नानी के पास भेज दिया गया। तब लड़कियाँ प्राइवेट से परीक्षा देती थीं या यूँ कहें कि परीक्षा भर ही देती थीं। अँग्रेजी मजबूत नहीं थी और साइंस लेने का मन था मगर 12वीं के बाद पता चला कि लड़कियाँ साइंस नहीं ले सकती थीं। श्री शिक्षायतन कॉलेज से मैंने स्नातक किया। मैंने 11 -12वीं कक्षा में अँग्रेजी नहीं पढ़ी थी और कॉलेज में सारे विषय ही अँग्रेजी में पढ़ने थे। ऑनर्स में मैंने टॉप किया मगर को एड होने के कारण एम. ए. करने में कठिनाई हुई क्योंकि कहा गया कि प्राइवेट से कर लो। लड़की विश्वविद्यालय़ जाएगी। मैंने ट्यूशन पढ़ाया और पहली नौकरी बालीगंज शिक्षा सदन में की। बाद में मैंने अँग्रेजी की पढ़ाई की।

हिन्दीभाषी विद्यार्थियों के साथ भेदभाव होता है

हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए भाषा बड़ी समस्या है। अँग्रेजी पर उनकी पकड़ कमजोर होती है। घर में अँग्रेजी नहीं बोली जाती। माध्यमिक शिक्षा परिषद में हिन्दी का एक भी विशेषज्ञ नहीं है। विद्यार्थी प्रश्न समझेंगे तो उत्तर कैसे देंगे? पीएससी की परीक्षा के लिए बांग्ला जानना जरूरी है। हिन्दीभाषी विद्यार्थियों के साथ भेदभाव होता है और उनको पिछड़ा हुआ मान लिया जाता है।

शिक्षक समुदाय में संघर्ष की आँच उतनी तेज नहीं है

हम शिक्षक कहीं न कहीं स्वकेन्द्रित हैं। कक्षाएं लेना भर ही अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। हिन्दी और अपने विद्यार्थियों के लिए उनको खड़ा होना चाहिए। शिक्षक समुदाय में संघर्ष की आँच उतनी तेज नहीं है। सुविधाएं पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

माहौल बदला है, लोग सुनते हैं मगर स्वीकार नहीं कर पाते

आज की लेखिकाएं उर्वर हैं और चुनौतियाँ दे रही है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्त्रियों को उपेक्षित किया जाता रहा है। वर्जनाएं टूट रही हैं मगर हमारी जड़ मानसिकता उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वे साहित्यकार के रूप में खुद को अच्छी तरह स्थापित कर रही हैं मगर उनके लिए राह अभी भी कठिन है। माहौल बदला है, लोग सुनते हैं मगर स्वीकार नहीं कर पाते।

समाज में स्वीकार करने की मानसिकता विकसित नहीं हो सकी है

स्त्री विमर्श की आवश्यकता है मगर कई बार वह खोखले नारों और कोरी बयानबाजी तक सीमित रहकर फैशनपरस्ती का शिकार हो जाता है। अभी भी स्त्रियों का बड़ा तबका अधिकारों से वंचित है। दबंग महिलाओं को लोग अभी भी पसन्द नहीं करते। समाज में स्वीकार करने की मानसिकता विकसित नहीं हो सकी है।

मुक्त होने का मतलब बिखराव नहीं है

आज पुरुष विमर्श की जरूरत है। पुरुषों में उन्नत तथा उदार मानसिकता की जरूरत है। उनको स्त्रियों की स्वतन्त्रता को सहजता से स्वीकार करना सीखना होगा। स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता के बीच महीन सीमारेखा है। मुक्त होने का मतलब बिखराव नहीं है।

संघर्ष की आँच कभी मन्द न पड़ने दें

मैं कहना चाहूँगी कि संघर्ष की आँच कभी मन्द न पड़ने दें। स्त्री विमर्श परिवार और समाज का विरोधी नहीं है बल्कि उसे साथ लेकर चलने का आँकाक्षी है।

जिन्दगी प्रेम ही नहीं है, सम्मान के साथ खुद को सहेजना और दुनिया को सुन्दर बनाना है

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वसन्त पंचमी के आगमन के साथ ही सर्दियों ने इस बार के लिए अलविदा कहना शुरू कर दिया है। फरवरी की शुरुआत माँ सरस्वती की आराधना के साथ हो रही है। माँ सरस्वती ज्ञान की देवी हैं मगर वहाँ ज्ञान का मतलब किताबें ही नहीं हैं, डिग्रियाँ भी नहीं हैं बल्कि प्रकृति और सृष्टि से प्रेम है, कला और संस्कृति के माध्यम से संसार को सुन्दर बनाने का सपना है। वहाँ मानवीय मूल्य बसते हैं। आज ये सब जितने ही दूर जा रहे हैं, इनकी आवश्यकता और भी बढ़ती जा रही है। कट्टरता, धर्म और जाति के नाम पर होने वाले संघर्षों के बीच यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि हम अपने समय की चुनौतियों को समझें।

दुःख की बात यह है कि ऐसा हो नहीं रहा है। हर कोई वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा है। अजीब सा वैषम्य है जहाँ हम समानता की दुहाई दे रहे हैं और अलगाववाद की खाई गहरी और गहरी हो रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज सोशल मीडिया का दुरुपयोग इसकी बड़ी वजह है। हमारे जीवन में सहजता का स्थान आडम्बर ने ले लिया है और यही आडम्बर शत्रु है, शत्रु है हमारे सम्बन्धों का। आडम्बर ही वह कारण है जिसके कारण प्रेम जताने के लिए अब गुलाब के दो फूल कम पड़ रहे हैं। बड़ी तेजी से बाजार हमारी जरूरतें तय कर रहा है और हम भागते जा रहे हैं। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति को तहस – नहस करने पर तुली है। गंगा – जमुना तहजीब वाले देश में लोग एक दूसरे को देखने को तैयार नहीं है।

हम विज्ञापनों की आँखों से अपने सपने पूरे करना चाहते हैं, ऐसी होड़ की, अपनी सीमा से बढ़कर सब कुछ पा लेने का सपना है मगर अंत में हाथ खाली ही रह जाता है। नतीजा यह कि अकेलेपन से परेशान कई लोग जिन्दगी से हार मान लेते हैं। कुछ दिनों बाद वेलेंटाइन्स डे मनाया जाएगा, गिफ्ट और ऑफर की बरसात होगी, सभी पर प्यार का खुमार होगा मगर इन सबके बीच आप खुद को पीछे छोड़ चुके हैं। आपको .याद ही नहीं होगा कि पिछली बार की सुबह कब देखी, खुद से बतियाए कब,, तो इस बार किसी और के पीछे मत भागिए, एक बार खुद से बात कीजिए, किसी और को शायद नहीं होगी मगर आपको आपकी जरूरत जरूर है। जिन्दगी प्रेम ही नहीं है, अपना सम्मान भी है, इस बार वेलेन्टाइन्स डे पर ही नहीं हमेशा थोड़ा वक्त खुद के साथ गुजारिए। आप सभी सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। माँ वरदान दें कि हम जड़ता से दूर हों और हमारा विवेक हमारा साथ हमेशा दे।

शुभारंभ का दिन है वसंत पंचमी

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वसंत पंचमी पर मां सरस्वती की उत्पत्ति हुई थी और इसी कारण इस दिन लोग ज्ञान की प्राप्ति के लिए उनकी शरण जाते हैं। यह दिन हर तरह की नई शुरुआत के लिए शुभ माना गया है।

समूची सृष्टि ऋतु वसंत की राह तकती है। वसंत के आगमन के माघ माह के पांचवे दिन वसंत पंचमी मनाई जाती है। कहते हैं ब्रह्मा जी ने सृष्टि की उत्पत्ति तो कर दी थी लेकिन चारों तरफ मौन छाया रहता था।

जीवन था लेकिन उसका संगीत नहीं था। तब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की अनुमति प्राप्त करके अपने कंमडल के जल से सरस्वती की उत्पत्ति की। उनसे ही इस सृष्टि को स्वर मिले। जीवन को संगीत मिला। यही वजह है कि वसंत पंचमी को मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं।

मां सरस्वती परम चेतना हैं। वे हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती हैं। पुराणों में आए वर्णन के अनुसार श्रीकृष्ण ने मां सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया था कि वसंत पंचमी के दिन उनकी आराधना की जाएगी।

वसंत को ऋतुओं का राजा माना गया है क्योंकि इस दिन पांचों तत्व अपने सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। इस समय आकाश स्वच्छ रहता है, हवा सुहावनी बहती है, अग्नि रुचिकर लगती है, जल आत्मा को तृप्ति देता लगता है और धरती फसल से लहलहाती है।

वसंत के आगमन के साथ ही हम सर्दियों के कष्टों को पीछे छोड़कर सुहावने दिनों में प्रवेश करते हैं। यह सर्दी और गर्मी का संधिकाल वसंत बहुत ही सुहावना होता है। इसी समय प्रकृति का सौंदर्य भी उत्कर्ष पर होता है।

वसंत पंचमी को सभी तरह के कार्यों के आरंभ के लिए शुभ मुहूर्त माना गया है। इसका कारण यह है कि यह माघ मास में आती है। माघ माह आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व का महीना है। इस समय तीर्थों के जल में स्नान का विशेष महत्व है। दूसरा इस समय सूर्य देव उत्तरायण होते हैं। वसंत पंचमी ऐसे शुभ समय आती है और उससे कई संयोग जुड़ते हैं इसलिए उस दिन को शुभ मुहूर्त माना जाता है।

प्रकृति का काममय होना

वसंत के आगमन के साथ ही रति-काम महोत्सव आरंभ हो जाता है। इस समय पेड़-पौधे अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से सुसज्जित होते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध और भौंरों की गूंज से भरा होता है। मधुमक्खियां पराग इकट्ठा करती हैं और इसलिए इसे मधुमास भी कहा जाता है।

पूरी प्रकृति काममय हो जाती है। इस मौसम पर ग्रहों में सर्वाधिक विद्वान ‘शुक्र” का प्रभाव रहता है। शुक्र काम और सौंदर्य के कारक हैं, इसलिए रति-काम महोत्सव की यह अविध कामोद्दीपक है। अधिकतर महिलाएं इन्हीं दिनों गर्भधारण करती हैं।

जन्मकुंडली का पंचम भाव विद्या का नैसर्गिक भाव है। इसी भाव की ग्रह -स्थितियों पर व्यक्ति का अध्ययन निर्भर करता है। यह भाव दूषित या पापाक्रांत हो तो व्यक्ति की शिक्षा अधूरी रह जाती है। इस भाव से प्रभावित लोगों को वसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा-अर्चना करना चाहिए। नए संकल्प के साथ प्रयास करने में जुट जाना चाहिए। वसंत पंचमी का यह पर्व नई शुरुआत का पर्व भी कहा गया है।

पीले परिधान का महत्व

पीला रंग हिंदुओं में शुभ रंग माना जाता है। यह परिपक्वता का प्रतीक है। यह उल्लास और आनंद की अनुभूति को बढ़ाता है और इसलिए यह वसंत के साथ गूंथ दिया गया है। इस दिन न केवल पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं बल्कि खाद्य पदार्थों में भी पीले रंग का उपयोग किया जाता है। चूंकि इस समय प्रकृति में भी चारों ओर पीले पुष्प खिले रहते हैं तो ऐसा लगता है मानो खेतों ने पीली चुनर ओढ़ ली हो।

बसंत पंचमी से जुड़े शुभ कर्म

– इस दिन बच्चों का विधारंभ संस्कार होता है। उन्हें पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है।

– पितृ तर्पण किया जाता है।

– कामदेव का पूजन किया जाता है।

– विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।

– वसंत पंचमी के दिन ही भगवान राम शबरी के आश्रम पहुंचे थे।

– वसंत पंचमी महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला” का जन्मदिवस भी है।

वाद्य यंत्रों का पूजन

जिस तरह विजयादशमी पर सैनिक अपने शस्त्रों का पूजन करते हैं और दीपावली पर व्यापारी अपने बहीखातों को पूजते हैं उसी तरह वसंत पंचमी पर कलाकार अपने वाद्य यंत्रों का पूजन करते हैं। कवि, गायक, लेखक, नाटककार या नृत्यकार सभी इस दिन अपने यंत्रों और सामग्री का पूजन करते हैं।

 

महिला को सशक्त बनाने की राह दिखा गया विमेन इकोनॉमिक फोरम

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महानगर में हाल ही में ऑल लेडीज लीग की पहल पर एक अनूठा कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें महिलाओं ने बात रखी। कार्यक्रम में सारी दुनिया से महिला नेत्रियों और विमेन अचीवर्स का शामिल होना एक अनूठा अवसर था। कार्यक्रम में 400 से अधिक महिलाओं तथा 120 वक्ताओं ने अपनी बात रखी। जे डब्ल्यू मैरियट की जनरल मैनेजर रंजू एलेक्स ने पूरा सहयोग दिया।

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उद्घाटन समारोह की थीम शक्ति अनलीश्ड : अवेक्निंग द पावर विदिन थी। ऑल लेडीज लीग की संस्थापक तथा ग्लोबल चेयरपर्सन डॉ. हरबीन अरोड़ा ने कहा कि लोग अब महिला सशक्तीकरण का महत्व समझ रहे हैं। इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए डिजिटल ब्रांड्ज की संस्थापक व निदेशक रितुस्मिता विश्वास भी सक्रिय रहीं।

कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं पर आधारित आलोचनात्मक पुस्तक का लोकार्पण

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कोलकाता के “भारतीय संस्कृति संसद” के सभागार में युवा आलोचक मृत्युंजय पांडेय की 90 के बाद के प्रमुख कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं पर छपी आलोचनात्मक पुस्तक “कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव” का विमोचन मॉरिशस के प्रसिद्ध लेखक ‘राज हीरामन’ जी द्वारा किया गया| कार्यक्रम दो भागों में विभाजित की गई थी जहां पहले सत्र में मॉरिशस के प्रसिद्ध के लेखक राज हीरामन द्वारा “मॉरिशस में हिन्दी की दशा और दिशा” विषय पर व्याख्यान दिया गया| हीरामन जी ने मॉरिशस में हिन्दी की महत्ता एंव मजबूती को बताया साथ ही यह भी बताया कि मॉरिशस में हिन्दी सत्ता की ,राजनीति, समाज ,अर्थिक एंव धार्मिक जगत की भाषा है| हिन्दी नहीं भोजपूरी वहां कि भाषा थी फिर भी उन्होनें हिन्दी को ही महत्ता दी| गोरे अर्थात् अंग्रेज वहां अब शक्तिहीन हो गए हैं|हिन्दी भारत में तस्तरी पर परोसी गई है परन्तु मॉरिशस में यह संघर्ष करके प्राप्त हुई है| मॉरिशस के प्रधानमंत्री,नेता,सांसद तथा शासन के लगभग सभी लोग हिन्दी बोलने वाले ही हैं| हिन्दी न आने के कारण अंग्रेज विपक्ष में बैठे हैं |  दूसरे सत्र में युवा आलोचक मृत्युंजय पांडेय की पुस्तक “कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव” को लोकार्पण किया गया|इस पुस्तक की फ्लैप प्रोफेसर ‘अरूण होता’ द्वारा लिखा गया है|पुस्तक के लोकार्पण में प्रोफेसर अरूण होता, आलोचक आशुतोष सिंह, विट्ठलदास मुधड़ा आदि मंच पर उपस्थित थें| प्रोफेसर अरूण होता जी लेखक मृत्युंजय पांडेय को बधाई देते हुए अपने भाषण में पुस्तक की सराहना करते गुए कहते हैं कि ’90 के बाद के महत्वपूर्ण युवा कवि पर केन्द्रीय पुस्तक लिखी है| मैनेजर पांडेय हो या अन्य आलोचक सभी ने अपने विचार रखें हैं| प्रायः सभी आलोचक कवि की कविताओं की कुछ संवेदनाओं को सामने रखकर इतिश्री मान लेते हैं|इस पुस्तक में आलोचक की रचना प्रतिभा का निदर्शन मिलता है|”From the text to the critic” जो वर्तमान आलोचना से लुप्त हो रहा है लेखक ने पूर्णतः अभिव्यक्त की है| इसकी यह खूबीभूमंडलीकरण, भोजपूरी , पर्यावरण, स्त्री के सभी आयाम से गुजर कर संगृहित किया है|

 

भारतीय भाषा परिषद में अब हिन्दी माध्यम से भी होगी पत्रकारिता की पढ़ाई

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भारतीय भाषा परिषद अपने साहित्यिक व सांस्कृतिक अवदानों के लिए प्रख्यात है। परिषद में अब माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल का एम. ए. पाठ्यक्रम हिन्दी माध्यम से आरम्भ हो रहा है। दो वर्ष का यह पाठ्यक्रम 4 सेमेस्टर में वि्भाजित है। भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष कुसुम खेमानी ने बताया कि परिषद का प्रयास हैै कि विद्यार्थियों को महानगर से प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्रों में व्यावहारिक अनुभव के लिए प्रशिक्षण मिले। इस पाठ्यक्रम के लिए किसी भी संकाय के स्नातक की डिग्री प्राप्त विद्यार्थी आवेदन कर सकेंगे। ऑनर्स होना जरूरी नहीं है। पाठ्यक्रम संचालित करने के लिए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के वर्तमान व पूर्व प्रोफेसरों द्वारा शिक्षण की व्यवस्था होगी। परिषद ने हिन्दी सीखने, लेखन कौशल और मीडिया से सम्बन्धित 3 माह के बुनियादी प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की है। परिषद इस पाठ्यक्रम के लिए अध्ययन केन्द्र होगी और इसमें पत्रकारिता सम्बन्धी रोजगार के लिए प्लेसमेंट सेल भी होगा जो परामर्श का कार्य करेगा। इस अवसर पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में डॉ. शम्भुनाथ समेत अन्य अतिथि भी उपस्थित थे।

“भारत रंग महोत्सव” में होगा लिटिल थेस्पियन के ‘गैंडा’ नाटक का मंचन

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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली द्वारा आयोजित “भारत रंग महोत्सव” एशियाई महाद्वीप में होने वाला सबसे बड़ा रंग महोत्सव है l ये नाट्य महोत्सव अन्तराष्ट्रीय स्तर का है l ये महोत्सव १ फ़रवरी से २१ फ़रवरी तक चलेगा।

जिसमे 80 नाटक भारत के तथा 14 विदेशी नाटक आमन्त्रित किये गए हैं l इस वर्ष कलकत्ता शहर से हिंदी नाटक के लिए लिटिल थेस्पियन नाट्यसंस्था  अपने बहुचर्चित नाटक ‘गैंडा’ के साथ आमंत्रित किया गया है।  ‘गैंडा’ का मंचन 6 फ़रवरी को ‘श्रीराम सेंटर’,दिल्ली और 8 फ़रवरी को भारंगम के सेटेलाईट शो के अंतर्गत अगरतला के नज़रुल प्रेक्षाग्रह में किया जायेगा। बंगाल के प्रसिद्ध व बहुचर्चित निर्देशक एस० एम० अज़हर आलम द्वारा निर्देशित नाटक ‘गैंडा’ यूजेन आइनेस्को के ‘राइनोसोरस’ का हिन्दुस्तानी अनुरूपण है जिसका अनुवाद भी अजहर ने ही किया है।

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गैंडा नाटक समाज में अमानवीय सर्वाधिकारी प्रवृत्तियों के प्रसार के बारे में नाटककार की चिंता को दर्शाता है। यह नाटक एक आदमी के संघर्ष को दिखता है जो अपनी पहचान व प्रमाणिकता को एक ऐसी दुनिया में कायम रखने की कोशिश करता है जहां दुसरे लोग पाशविक बल और हिंसा की सुन्दरता के आगे घुटने टेक चुके हैं. यह एक शहर में फैली काल्पनिक महामारी- गैंडाई लहर- को दर्शाता है जिसने लोगों को भयभीत कर रखा है और उन्हें गैंडे में बदल रहा है। इसमें लोगों की आतंरिक क्रूरता को दर्शाया है जो उन्हें एक उद्दंड और कल्पनातीत गैंडे में बदल देती है।

 

नाटक के निर्देशक एस० एम० अज़हर आलम एक सुविख्यात रंगकर्मी है जो पिछले तीन दशकों से रंगमंच से जुड़े हुए हैं। कोलकाता में हिंदी व उर्दू रंगमंच की स्तिथि को उभारने में इनका बहुत बड़ा योगदान है। वे मौलाना आज़ाद कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर हैं और देश की पहली उर्दू पत्रिका, जो पूरी तरह थिएटर से सम्बंधित है, के सम्पादक है जिसे लिटिल थेस्पियन प्रकाशित करती है। अज़हर आलम ने 50 से ज़्यादा नाटकों में अभिनय किया है, 40 नाटकों में निर्देशन दिया है तथा 6 नाटक उर्दू में लिखे व रूपांतरित किए हैं। नाटकों में स्टेज मूवमेंट व डिज़ाइन इनकी ख़ास पहचान है. पश्चिम बंग नाट्य अकादमी की ओर से 2001 में उन्हें ‘नमक की गुड़िया’ के लिए सर्वश्रेष्ठ नाटककार का पुरस्कार मिला और 2007 में ‘सवालिया निशान’ नाटक के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इस नाटक का संगीत नाटक अकेडमी द्वारा पुरस्कृत मुरारी राय चौधरी जी ने दिया है तथा प्रकाश योजना जॉय सेन ने। इस नाटक के सम्बन्ध में पद्मश्री राम गोपाल बजाज साहब ने टिपण्णी की थी कि पिछले दशक में उपमहाद्वीप में खेले गये सभी नाटकों में से अगर 10 बड़े नाटकों को चुना जाए तो ‘गैंडा’ उनमें से एक ज़रूर होगा. “गैंडा” नाटक की अब तक 40 से अधिक प्रस्तुतियां हों चुकी है।