Wednesday, July 15, 2026
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बजट में रेलवे से जुड़ी अहम घोषणाएं

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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चौथा आम बजट पेश करते हुए रेलवे से जुड़ी भी कई अहम घोषणाएं कीं. इस वित्तीय वर्ष से रेल बजट को आम बजट में ही शामिल कर दिया गया है। वित्त मंत्री ने कहा कि वह स्वतंत्र भारत में दोनों बजट एक साथ पेश करते हुए सम्मानित महसूस कर रहे हैं। जेटली ने रेल से जुड़ी ये अहम घोषणाएं कीं-

यात्रियों की सुरक्षा पर सरकार एक लाख करोड़ खर्च करेगी।आईआरसीटीसी के ज़रिए ई-टिकट बुकिंग्स के दौरान अब अलग से सर्विस चार्ज नहीं लगेगा।

रेलवे की तीन बड़ी कंपनियां- आईआरसीटीसी, आईआरएफ़सी और इरकॉन शेयर बाज़ार में उतरेंगी।

500 रेलवे स्टेशनों को शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए सुविधाजनक बनाया जाएगा।

31 लाख करोड़ रेलवे के विकास पर खर्च किया जाएगा।

रेलवे का मुख्य फोकस- यात्री सुरक्षा, सफ़ाई और विकास है।

2019 तक भारतीय रेलवे के सभी कोच बायो-टॉइलेट से लैस हो जाएंगे।

मानवरहित क्रॉसिंग को 2020 तक ख़त्म कर दिया जाएगा।

यात्रा के दौरान कोच से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए कोच मित्रों की नियुक्ति होगी।

एक नई मेट्रो रेल नीति की घोषणा होगी जिससे नई नौकरी पैदा करने में मदद मिलेगी।

 

कोलकाता में पारसी समुदाय की आबादी कम हुई

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कोलकाता : एक जमाने में कोलकाता की काफी फलता-फूलता रहा समुदाय पारसी की संख्या अब घट रही है और अब यह केवल 500 रह गयी है। इस समुदाय को अपनी आबादी में और गिरावट का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि सुनहरे भविष्य की आस में युवा शहर छोड़ रहे हैं।

समुदाय के वरिष्ठ ट्रस्टी और सदस्य बहादुर पोस्तवाला ने बताया, ‘‘1930 के दशक में जब हमारी संख्या बढ़ रही थी उसके मुकाबले इसमें काफी गिरावट आयी है। 1960 और 70 के दशकों के दौरान हमारे लोगों ने कोलकाता छोड़ना शुरू कर दिया और अब केवल 500 लोगों की संख्या रह गयी जो जिसमें से युवाओं की संख्या 50 प्रतिशत से कम है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘शहर में नौकरी का वर्तमान परिदृश्य आशान्वित करने वाला नहीं है। काफी युवा कनाडा, आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड और भारत के कई अन्य शहरों में जाकर बस गये। यह 1960 के दशक में शुरू हुआ था और इसमें लगातार बढ़ोतरी ही हुयी। हालांकि, हम लोग लगातार संपर्क में रहते हैं।’’ उन्होंने बताया कि शहर से युवाओं की यादें जुड़ी हुयी हैं और वे त्यौहारों के दौरान यहां आते रहते हैं।
पोस्तवाला ने बताया, ‘‘यह आपसी सौहार्द से ओत-पोत समुदाय है। हम एक साल में करीब 50 बार मिलते हैं। साथ ही इस मुश्किल घड़ी में हमारा समुदाय एक जीवंत है लेकिन दुखद बात यह है कि हमारी संख्या में गिरावट आ रही है।’’ मुंबई के मुकाबले कम जाने जाने वाले इस शहर में 18 वीं शताब्दी के अंत में सूरत से पारसी समुदायों का आगमन हुआ था। पूर्वी भारत और ब्रिटिश भारत की राजधानी के दौरान शहर में ब्रिटिश शासनकाल में इनकी संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गयी थी।

 

भारत ने बच्चा लौटाया, पाकिस्तान बोला-शुक्रिया

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भारत की मदद से एक मां को उसका बच्चा मिल गया है. पांच साल का इफ़्तिखार अहमद 11 महीने पहले अपनी अम्मी से बिछड़ गया था।

दरअसल, भारत प्रशासित कश्मीर में रहने वाले इफ्तिख़ार के पिता गुलज़ार अहमद तांतरे इफ्तिख़ार को पाकिस्तान से अपने साथ ले आए थे। भारत ने इफ्तिखार को भारत-पाक सीमा पर पाकिस्तानी अधिकारियों को सौंप दिया गया है। पाकिस्तान ने बच्चे को लौटाने के लिए भारत का आभार जताया है।

इफ्तिख़ार की मां रोहिना कयानी ने इसे ‘चमत्कार’ बताया है. उन्होंने कहा, “मैं तो अपने बच्चे से मिलने की उम्मीद ही खो चुकी थी।” वे कहती हैं, “मैं पाकिस्तान सरकार की शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी मदद की। “कयानी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में रहती हैं. जबकि उनके पति गुलज़ार अहमद तांतरे अब भारत प्रशासित कश्मीर में रह रहे हैं।

KID PAKISTAN

मार्च 2016 में तांतरे को भारत की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. तब इफ्तिखार पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद छिड़ गया। दरअसल गुलज़ार अहमद तांतरे गांदरबल के एक गांव में जन्मे और पले-बढ़े. गांदरबल भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य का एक ज़िला है।

तांतरे कथित तौर पर 1990 में हथियार प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर गए. उस समय भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ ज़ोरों पर था। भारत प्रशासित कश्मीर लौटने पर तांतरे अपने साथ बेटे को ले आए. वहां पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। रोहिना कयानी ने पति पर बच्चे को अगवा करने और भारत भाग जाने का आरोप लगाया. लेकिन तांतरे और उनका परिवार बच्चे के अपहरण से इनकार करता है।

 

जिस देश में बजता है महिलाओं का डंका

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हिलेरी क्लिंटन भले ही राष्रपति पद का चुनाव हार गईं हों और दुनिया में टॉप सरकारी नौकरियों में भले ही महिलाओं का प्रतिशत कम हो मगर टर्क्स एंड केकॉस नामक ब्रिटेन के इस उपनिवेश में हाल ही में हुए चुनावों में पहली बार एक महिला प्रीमियर चुनी गईं।

शार्लिन कार्टराइट-रॉबिंसन ने ये चुनाव जीता है और इस छोटे से देश में उनकी तरह कई और महिलाएं बड़े ओहदों पर मौजूद हैं। देश के डिप्टी गवर्नर, अटॉर्नी जनरल, चीफ़ जस्टिस, चीफ़ मजिस्ट्रेट, प्रमुख सरकारी वकील और सात में से पांच प्रमुख सचिव पदों पर महिलाएं हैं।

महिलाओं के इस बेहतरीन प्रदर्शन के चलते अब देश में युवा पुरुषों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है जिससे वे महिलाओं की सफलता की बराबरी कर सकें। आम तौर पर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करने वाला टर्क्स एंड केकॉस देश का ‘जेंडर अफ़ेयर्स डिपार्टमेंट’ इन दिनों हाई स्कूल के युवाओं को ‘ज़्यादा एकाग्रता से समाज में शीर्ष पदों के लिए मेहनत करने का’ प्रोत्साहन दे रहा है।

देश की डिप्टी गवर्नर आन्या विलियम्स ने बताया कि इसमें अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाए जाने से लेकर ‘लीडरों वाले समर कैंप’ आयोजित करना शामिल है। सवाल ये है इस देश में महिलाओं ने ये मुकाम कैसे हासिल किया?

ऐतिहासिक चुनाव जीतने वाली देश की प्रीमियर कार्टराइट-रॉबिंसन के अनुसार “इस नौकरी के लिए मैं बेस्ट मैन थी। “पारदर्शिता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को अपने चुनावी मैनिफेस्टो में रखने वाली कार्टराइट-रॉबिंसन ने 52 दूसरे प्रत्याशियों को हराया है.

उन्होंने बीबीसी से ये भी बताया कि उन्हें महिला के बजाय एक ऐसी इंसान के तौर पर देखा गया जो काम पूरे करने में सक्षम हैं और यही जीत की वजह रही। कुछ ऐसा ही मानना टर्क्स एंड केकॉस की पहली एटॉर्नी जनरल रोह्न्डली ब्रैथवेट-नॉवेल्स का भी है।

उन्होंने बताया, “मेरे साथ कभी भी किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ. हमारे देश के नागरिक समाज में बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जिनकी अपनी पहचान है, चाहे वो कॉरपोरेट जगत हो या राजनीति. कभी-कभार जब वरिष्ठ पदों पर पुरुष रहते हैं तो उनका ध्यान बंट सकता है लेकिन कुछ समय बाद ये सब ख़त्म हो जाता है।”

उनके मुताबिक़ इससे ज़्यादा मुश्किल ये रहता है कि वरिष्ठ पदों पर आसीन महिलाओं को अपने परिवार या उनके अपने संदर्भ में सात वर्ष के एक बेटे की परवरिश पर भी बराबर ध्यान देने की ज़रुरत होती है। एटॉर्नी जनरल रोह्न्डली ब्रैथवेट-नॉवेल्स के मुताबिक़, “क्योंकि महिलाएं बहुमुखी होती हैं इसलिए वे इसे पूरा कर लेतीं हैं.”

देश की डिप्टी गवर्नर विलियम्स भी इस बात से सहमत हैं। उन्होंने कहा, “35,000 लोगों की जनसंख्या वाले इस देश में महिलाएं हमेशा से शिक्षा, मेडिसिन, राजनीति और सरकारी क्षेत्र में अग्रसर रही है.”

“महिलाएं यहाँ पर इतने बड़े पदों पर हैं ये एक बड़ी बात है. लेकिन एक जवान बेटे की माँ होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है कि उसे आगे आने वाले मौकों और बड़े ओहदों के लिए मेहनत करने का भरपूर प्रोत्साहन देती रहूँ।.

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

लड़कों को ‘मर्द’ से पहले ‘मनुष्य’ बनाइए

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  • सुषमा त्रिपाठी

बेटियाँ तो दूसरे घर में जाने के लिए बनी होती हैं। अब भी भारतीय समाज में लड़कियाँ प्राथमिकता नहीं बल्कि विकल्प ही हैं। अगर बेटा नहीं कमा पाता तो बेटी कमाएगी। कॅरियर और अपनी पहचान अभी भी स्त्रियों की प्राथमिकता नहीं है। दंगल में पहलवान बेटियों की कहाननी दिखायी गयी मगर फर्ज कीजिए कि महावीर फोगट के अगर बेटे होते तो क्या वे अपनी बेटियों को पहलवान बनाने पर ध्यान देते? सुल्तान में बेबी को बेस पसन्द करने वाले सलमान के लिए अनुष्का अपनी मर्जी से अपना गोल्ड जीतने का सपना छोड़ देती हैं और उसे आप त्याग कहते हैं। क्या किसी नायक के दिमाग में इस तरह की बात आ सकती है, अधिकतर परिवारों में लड़कियों का कॅरियर उनकी नहीं बल्कि उनके परिवार, पति और ससुराल की मर्जी से तय होता है।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो क्या आपने कभी सुना है कि पति ने अपनी पत्नी ने घर पर बैठकर बच्चों को सम्भालना स्वीकार किया या फिर ससुराल ने उसे प्रोत्साहित किया। हालाँकि हालात सुधरे हैं मगर सोच बदलने में वक्त लगेगा। रात को जब कोई महिला बस में काम से वापस लौटकर भीड़ से भरी बस में अकेली होती है तो आप कई निगाहों को उसकी ओर घूरते हुए पाते हैं। हमारे समाज और शहर को अब भी आदत नहीं हुई है कि वे रात में सड़कों पर या बसों में किसी स्त्री की मौजूदगी को सहजता से स्वीकारें। आपने उसकी आदत ही नहीं पड़ने दी।

gender-equality

राह चलते जब नौजवानों के उद्दंड भाव को देखते हुए फोन पर किसी के साथ उग्र भाषा में गालियों के साथ बात करते देखती हूँ तो लगता है कि लड़कों को असमय मर्द बनाकर उसके साथ कितना बड़ा अन्याय किया जा रहा है। घर में उसे उग्र होने की इजाजत है। देर से घर लौटने पर उससे सवाल नहीं पूछे जाते और न ही उसकी पढ़ाई छुड़वाने की धमकी दी जाती है। वह बिगड़ैल सांड है, शेर है इसलिए वह कुछ भी कर सकता है, उसे मनुष्य बनाया ही नहीं गया तो उससे मनुष्यता की उम्मीद कैसे की जा सकती है। अभी उदयन दास और आँकाक्षा शर्मा की खबर हर चैनल पर चल रही है जिसने प्रेमिका को मारकर उसे गाड़कर उस पर चबूतरा बना दिया और माता – पिता की हत्या भी कर दी, बगैर लगाम के जब उबड़ – खाबड़ तरीके से आप बच्चों की परवरिश करेंगे तो उसकी परिणिति एक अपराधी ही होगा। आज निर्भया कांड को 5 साल होने जा रहे हैं। जरा याद कीजिए, कि इस केस के अभियुक्त ने इंडियाज डॉटर में किस तरह की ढीठ हरकत की थी और उसके अधिवक्ता ने क्या कहा था…जब देश की न्यायिक व्यवस्था में ऐसे लोग भरे पड़े हों तो आप मानसिकता बदलने की उम्मीद कैसे करेंगे। हर रोज देश के लगभग हर राज्‍य से महिलाओं के साथ होने वाले अपराध की ख़बर सुनी और पढ़ी जा सकती है। जुर्म की नई-नई शक्‍ल हमारे सामने आने लगी है मगर वैसी बेचैनी की बात तो छोड़ दें, समाज में थोड़ी सुगबुगाहट भी नहीं दिखाई देती है. जो कुछ दिखता है, वह ज्‍यादातर ख़बरों में ही नज़र आता है।

Mural art dealing with gender equality themes done by students of the Sir J.J. Insititute for Applied Arts, Bandra, Mumbai, India.

क्या स्त्री के साथ अपराध इसलिए होता है क्योंकि वह स्त्री है? दरअसल, यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। लड़कियों के साथ अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि बच्चों की परवरिश में संतुलन रखा ही नहीं गया। लड़का हो या लड़की, उनकी परवरिश उनके लड़का या लड़की होने के कारण की जाती रहेगी, विषमता बनी रहेगी। स्त्री होने का मतलब महज देह रहेगा तो हिंसा होती रहेगी  क्योंकि पतियों के लिए भी पत्नी एक सम्पत्ति ही है जिस पर वे अधिकार जता सकते हैं, नियन्त्रण रख सकते हैं। इसकी शुरुआत ही घर से होती है जहाँ वे अपने पिता को माँ से झगड़ते हुए देखते हैं, बहन को घर में सिमटकर रहते हुए देखते हैं और यह अन्याय भी कई बार महिलाएं ही करती हैं। माँ अपने बेटे को बहू को नियन्त्रण में रखने की सलाह जब तक देती रहेगी….यह जारी रहेगा। स्त्री जब तक स्त्री को खुद सम्मान नहीं देती और एक समान व्यवहार नहीं करती, आप मानसिकता बदलने की उम्मीद नहीं कर सकते।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) अपराधों का पुलिसिया रिकॉर्ड इकट्ठा करता है। इस रिकॉर्ड के मुताबिक़, 2015 में तीन लाख 30 हज़ार 187 लड़कियों/महिलाओं को महज ‘स्‍त्री’ होने के नाते कई जुर्म का शिकार होना पड़ा। इस जुर्म में हर तरह की यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, एसिड अटैक, घर के अंदर हिंसा, अपहरण, अनजाना और अनचाहा स्‍पर्श, भद्दे कमेंट, गालियां, जोर-जबरदस्‍ती, बलात्‍कार, बलात्‍कार की कोशिश, दहेज के लिए हत्‍या, पति या ससुराल वालों के अत्‍याचार जैसी सब चीजें हैं। यौन हिंसा और अपहरण से लेकर रैगिंग जैसे अपराध लड़कों के साथ भी होते हैं मगर हम महिला अपराधों पर  इतनी बात करते हैं कि इसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। कोई लड़का अगर ऐसी घटनाओं का शिकार हो तो यह उसके लिए शर्मिन्दगी होती है। नतीजा कुण्ठा बढ़ती है और दबा सकने वाली मनोेवृति के कारण हिंसा भी।

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यह साफ है कि सभी लड़कियों के साथ दामिनी जैसी हिंसा नहीं होती है लेकिन वे दामिनी जैसी दिमाग़ी हालत से हर रोज गुजरती हैं। पुलिस के पास दर्ज संख्‍या सिर्फ महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के बारे में संकेत भर ही देती है।

एक अहम कारण है- हम मर्दों की स्‍त्री के बारे में सोच। यह सोच क्‍या है? यह सोच है- मर्द, स्‍त्री से श्रेष्‍ठ होता है। बेटा-बेटी बराबर नहीं होते हैं. पुत्र की शक्‍ल में मर्द ही घर का चिराग है। वंश वही आगे बढ़ाएगा. वह ताकतवर होता है। वही घर-परिवार समाज चलाने वाला होता है। सब चीजों पर उसका ही काबू होता है। मर्द काम कर पैसा लाता है, इसलिए स्‍त्री को उसकी सेवा करनी चाहिए। मर्द को हर स्‍त्री को अपने काबू में रखना चाहिए। स्त्रियों को ज्‍यादा छूट नहीं देनी चाहिए। फिल्मों में आपने डॉयलॉग सुने होंगे – माँ तू बूढ़ी हो गयी है, बहू ला दूँगा मगर वह बेटा कभी यह नहीं कहता है कि माँ मैं यह खुद कर लूँगा। स्त्री का स्थान स्त्री ही लेगी, यह तय कर दिया गया है। लाडला में औरत जात को लेकर बहुत सी नसीहतें दी गयी हैं।

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स्त्रियों को इस दुनिया में मर्दों की सेवा के लिए बनाया गया है. स्‍त्री, मर्द की मनोरंजन का सामान है। स्‍त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता है. जो लड़कियां बाहर दिखती हैं, उनके साथ कुछ भी किया जा सकता है। जो लड़कियां, लड़कों के साथ हंसती-बोलती-घूमती हैं, वे अच्‍छे चरित्र की नहीं होती हैं. वगैरह… वगैरह… ऐसी ढेर सारी चीजें यहां गिनाई जा सकती हैं.

यह लड़कों और लड़कियों के प्रति समाज का नजरिया है। यह नजरिया कोई मां के पेट में नहीं बनता है। इस नजरिए को धर्म-परम्‍परा, रीति-रिवाजों से सींचा जाता है। आंख खोलने के बाद होशमंद होते लड़कों को हमारा समाज ‘मर्द’ बनाता है और इनमें माँएं भी शामिल हैं। पग-पग पर उसे मर्द होने का अहसास दिलाता है। उसे मर्द के सांचे में ढालने का दौर शुरू होता है। उसे दुनिया को देखने का इंसानी नजरिया नहीं सिखाया जाता है। उसे ख़ास तरह की ‘मर्दानगी’ वाली आंख दी जाती है। वह उसी की रोशनी से मर्द बन दुनिया देखता है। घर और आस पास भी उसे जो पुरुष दिखते हैं, वे ‘ख़ास तरह के मर्द’ ही नज़र आते हैं।

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इस मर्दानगी में स्‍त्री के साथ किसी तरह की बराबरी की कोई जगह नहीं होती है इसीलिए उनके प्रति किसी तरह का दोस्‍ताना और इज़्ज़त वाला सुलूक भी नहीं होता है। जहां बराबरी, दोस्‍ताना, प्रेम, सम्‍मान की जगह ‘मर्द’ होने का गर्व, ख़ुद के श्रेष्‍ठ होने का अहसास, ताकत पर यक़ीन, सब कुछ काबू में कर लेने का भरोसा हो… वहां हिंसा ही होगी।

चाहे वह हिंसा किसी पर फब्‍ती कसने, किसी का पीछा करने, ताक झांक करने, दुपट्टा खींचने, सीटी बजाने, गंदा गाना गाने के रूप में ही क्‍यों न हो। यह निर्भया जैसी हिंसा की पहली सीढ़ी है।

सभ्‍य समाज में कुछ चीजें नाकाबिले बर्दाश्‍त होनी चाहिए। इनमें ग़ैर-बराबरी सबसे अहम है. ग़ैर-बराबरी का रिश्‍ता हिंसा से है।ग़ैर-बराबरी सामाजिक न्‍याय के उसूल के भी ख़िलाफ़ है। इसमें हमारी ओर से समाज में बनाई गई स्‍त्री-पुरुष ग़ैर-बराबरी भी है। इस ग़ैर-बराबरी में पुरुष का दर्जा ऊपर है। वह विचारों से शक्तिशाली बनाया और बताया जाता है।

उसे ही हर चीज को काबू में रखने वाला बनाया जाता है इसलिए वह न सिर्फ़ अपनी बल्कि दूसरों की ज़िंदगी को काबू में रखता है। काबू में रखना चाहता है। उसके लिए वह हर तरीके अपनाता है। इसमें बड़ा हिस्‍सा हिंसक तरीके का होता है। यह हिंसा सिर्फ़ देह पर होने वाले लाल-नीले निशान नहीं हैं. वे अनेक रूपों में बिना निशान बनाए अपनी शक्ति की करामात दिखाते हैं।

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इसलिए महिलाओं या लड़कियों के सा‍थ होने वाली हिंसा में बड़ी तादाद ऐसी हिंसा की है जिसके निशान सिर्फ़ उनके दिल और दिमाग में असर करते हैं। इसलिए हम आमतौर पर इस हिंसा को अपने आसपास होते देखते हैं और सहज व सामान्‍य मानकर नज़अंदाज़ करते रहते हैं। ऐसी ही हिंसा, कभी निर्भया के रूप में हमारे सामने खड़ी हो जाती है। तब हमें अपने ही समाज का बदतरीन चेहरा दिखाई देता है। फिर हम महिलाओं के सम्‍मान की दुहाई देते हैं मगर अपने व्यवहार की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। एक बात तो तय है कि असंतुलन का उत्तर एक और असंतुलन नहीं हो सकता।

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सवाल है कि हम इस हिंसा के माहौल को ही ख़त्‍म करना चाहते हैं या सिर्फ किसी लड़की के निर्भया जैसी हिंसा का शिकार होने के बाद कुछ दिनों के लिए आवाज़ बुलंद करना चाहते हैं? अगर हम वाकई में हिंसा के हर रूप को खत्‍म करना चाहते हैं तो मर्दों को इस काम में सक्रिय भागीदार और साझीदार बनना होगा। बदलने की जरूरत लड़कों/मर्दों को है मगर उससे भी जरूरी है कि स्त्री इस मामले में आगे बढ़े। लड़के, मर्द बनाए जाते हैं। चूंकि वे मर्द बनाए जाते हैं, इसलिए बदले भी जा सकते हैं। बदलने की कोशिश घर से शुरू हो तो बेहतर है। उनके लालन-पालन पर अलग से गौर करने की जरूरत है। मर्द वाला सांचा तोड़ना होगा। लड़कों को इंसान के सांचे में ढालने की जरूरत है और उसे बताने की जरूरत है कि घर सिर्फ लड़कियों की ही नहीं लड़कों की जिम्मेदारी भी है। घर उसका भी अपना है और वह बाहरी नहीं है इसलिए घर में उसकी भागीदारी भी उतनी महत्वपूर्ण है। तब ही शायद लड़कियाँ लड़कों के लिए अजूबा न बनें और जब समान मानसिकता होगी तो अपराध खुद ही कम होंगे।

(इनपुट – बीबीसी हिन्दी)

शहीद हंगपन दादा पर बनी फिल्म को तीन दिन में मिले आठ लाख हिट्स

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इस वर्ष के अशोक चक्र पुरस्कार विजेता हंगपन दादा पर बनी डॉक्यूमेंट्री को खूब पसंद किया जा रहा है। इंटरनेट पर जारी किए जाने के महज तीन दिन के भीतर आठ लाख लोगों ने इस फिल्म को देखा है। यह डॉक्यूमेंट्री उस बहादुर सैनिक को समर्पित है, जिसने सर्वोच्च बलिदान से पहले जम्मू-कश्मीर में अपने दम पर तीन घुसपैठियों को मार गिराया।

करीब 12 मिनट की फिल्म ‘वॉरियर्स ऑफ इंडिया’ में दर्शक 27 वर्षीय सोमेश साहा से अरुणाचल प्रदेश के सैनिक की शहादत को सहजता से जोड़ पा रहे हैं, क्योंकि दादा की तरह उनके पिता भी असम रेजीमेंट से जुड़े हुए थे।

युवा फिल्म निर्माता ने कहा, ‘मेरे पिता असम रेजीमेंट में कर्नल थे और वह एक सैनिक की मौत से तनाव में थे। एक आम भारतीय इस चीज को नहीं समझ सकता है, लेकिन एक सैन्य अधिकारी का बेटा होने के नाते सैनिकों की कहानियों से मुझे हमेशा प्रेरणा मिली है। वे मेरे अब तक के जीवन का हिस्सा रहे  हैं।’

विज्ञापन उद्योग में जिंगल विशेषज्ञ माने जाने वाले सोमेश ने कहा, ‘मुझे प्रतिक्रिया के बारे में ज्यादा नहीं पता था, लेकिन मैं हवलदार दादा की वीरता को इतिहास में दर्ज करना चाहता था और इन दिनों इतिहास इंटरनेट है। मैंने अपने दो मित्रों से बात की और परिणाम आश्चर्यजनक रहा। एक सैनिक ने कहा कि ‘फिल्म ने मुझे रुलाया और उसी वक्त मुझे मुस्कुराने के लिए भी मजबूर किया।’

 

मिस फ्रांस आयरिश मित्तेनायरे बनीं मिस यूनिवर्स

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मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता के आखिरी चरण में पहुंचने वालीं तीनों सुंदरियों में केवल एक ही इसे अपने घर ले जा सकती थीं और इस बार यह सम्मान मिस फ्रांस के नाम रहा।

मिस यूनिवर्स बनी पारसी मूल की आयरिश मित्तेनायरे पेश से डेंटल सर्जन हैं।

24 वर्षीय इस डॉक्टर का इरादा मिस यूनिवर्स के प्लेटफॉर्म का दांतों और मुंह की स्वच्छता के प्रचार-प्रसार में करने का है.।

मिस हेती रेक्वेल पेलिसियर प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर आईं जबकि मिस कोलंबिया 23 वर्षीय एंड्रिया टोवर तीसरे नंबर पर रहीं।

मिस यूनिवर्स की रेस में भारतीय मूल की रोश्मिता हरिमूर्ति भी थीं, लेकिन वह आखिरी चरण में पहुंचने से चूक गईं।

इसे महज इत्तेफाक ही कहा जा सकता कि 23 साल पहले फिलिपींस के मनीला में ही भारत की सुष्मिता सेन ने 1994 में ये खिताब अपने नाम किया था और इसी बरस रोश्मिता हरिमूर्ति पैदा हुई थीं।

सुष्मिता इस बार मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में जज की भूमिका में थीं और बेंगलुरु गर्ल हरिमूर्ति इसमें एक उम्मीदवार थीं।

 

मनवीर गुर्जर बने बिग बॉस 10 के विजेता

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मनवीर गुर्जर कलर्स टीवी के लोकप्रिय रिएलिटी शो बिग बॉस के विजेता बन गए हैं। इस शो के 10वें सीजन में उन्होंने बानी जे को हराकर यह ताज हासिल किया। पूर्व प्रतिभागी राहुल देव और अन्य ने इसकी पुष्टि की है।

मनवीर से पहले बानी को इस सीजन के विजेता होने का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन अंतिम समय पर नोएडा के रहने वाले मनवीर को अपने फैन्स की भारी वोटिंग का फायदा मिला और उन्हें इस बार के बिग बॉस का ताज हासिल हो गया। राहुल देव ने ट्वीट कर इसकी जानकारी सार्वजनिक की।

 

यूपी में दिखेगी नारी शक्ति, साथ रैली करेंगी डिंपल-प्रियंका

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महिलाओं और युवा वोटरों को सपा-कांग्रेस गठबंधन के पाले में खड़ा करने के लिए अब प्रियंका वाड्रा और डिंपल यादव को भी प्रचार के मोर्चे पर आगे करने का खाका तैयार किया गया है।

प्रियंका व डिंपल की दो साझा रैलियों पर तकरीबन सहमति भी बन गई है। एक रैली इलाहाबाद या वाराणसी तथा दूसरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित है। इसके अलावा गठबंधन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए प्रियंका व डिंपल का रोड शो कराने पर भी मंथन चल रहा है।

चुनावी गठबंधन के बाद सपा और कांग्रेस प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए हर दांवपेंच आजमाने की तैयारी में हैं। राहुल और अखिलेश की सियासी जुगलबंदी को धार देने के लिए कांग्रेस की ओर से प्रियंका व सपा की ओर से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी व सांसद डिंपल यादव को भी प्रचार अभियान में उतारने की रणनीति तैयार की गई है।

कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि प्रियंका अमेठी और रायबरेली के बाहर बहुत ज्यादा सक्रिय रहने की इच्छुक नहीं हैं, लेकिन डिंपल के साथ कुछ जगहों पर मंच साझा कर सकती हैं।

दरअसल, प्रियंका यूपी विधानसभा चुनाव में पहली बार अमेठी और रायबरेली के बाहर अपना सियासी दांव आजमाएंगी।

प्रियंका को पूरी तरह यूपी में ही केंद्रित रखने के लिए पार्टी ने उन्हें अन्य चुनावी राज्यों में स्टार प्रचारक बनाने से परहेज किया है।

पार्टी के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इसकी पटकथा तैयार कर ली है। माहौल बनाने के लिए पूर्वांचल और पश्चिम में दोनों महिला नेताओं की एक-एक साझा रैली कराने के साथ कुछ जगहों पर रोड शो के लिए भी बातचीत चल रही है।

पक्ष में माहौल बनाने के लिए सपा-कांग्रेस साझा प्रचार अभियान चलाने के अलावा परंपरागत वोटरों को साधने के लिए अलग-अलग मुहिम भी चलाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर चाहते हैं कि बिहार की तर्ज पर धुआंधार साझा रैलियां और रोड शो के बजाय यूपी में चार प्रमुख क्षेत्रों में एक-एक साझा रैली और रोड शो का आयोजन किया जाए।

इसके बाद दोनों दल अपने परंपरागत मतदाताओं को साधने के लिए अलग-अलग मुहिम चलाएं। इसी रणनीति के तहत राहुल-अखिलेश युवा मतदाताओं पर तो प्रियंका-डिंपल महिला मतदाताओं को साधने की मुहिम में जुटेंगी।

दोनों ही दलों के रणनीतिकारों ने साझा रैलियों से पहले और बाद की स्थिति की जानकारी हासिल करने की भी व्यवस्था की है। इनके बाद लोगों का मूड भांपते हुए भावी रणनीति तय करने पर भी सहमति बनी है।

 

शहीद जवानो के परिवार की मदद करने के लिए अक्षय कुमार ने खोज निकाला एक बेहतरीन उपाय!

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बॉलीवुड के जाने माने अभिनेता अक्षय कुमार कई बार अपनी बेबाक देशभक्ति के लिए सुर्ख़ियों में आते रहे है। हाल ही में उन्होंने ट्विटर पर एक विडिओ जारी किया है जिससे एक बार फिर ये साबित हो जाता है कि एक बेहतरीन अभिनेता होने के साथ साथ वे एक बेहतरीन इंसान भी है।

मंगलवार को जारी किये इस  वीडियो में अक्षय ने जवानों और उनके परिवार की मदद करने के लिए आम जनता को जोड़े जाने का एक सुझाव दिया है।

इसमें उन्होंने कहा कि वो जवानों के लिए एक एप बनाना चाहते हैं, ताकि भारतीय सेना के जवानों की हर संभव मदद कर सके। इस एप के जरिए वो लोग भी जवानों की मदद कर सकते हैं, जो चाहते हुए भी उन तक नहीं पहुंच पाते।

अक्षय कुमार ने कहा, “हमारी सरकार जवानों की मदद कर रही है, लेकिन हम में से भी बहुत लोग उनकी मदद करना चाहते हैं लेकिन, उन तक पहुंच नहीं पाते हैं।

अक्षय ने कहा कि हर आम आदमी किसी भी अफसर और अथॉरिटी की मदद के बिना सीधे फंड ट्रांसफर कर सकता है। लोग अपनी योग्यता के मुताबिक 100 रुपये भी दे सकते हैं और एक लाख भी। इसकी पूरी डिटेल वेबसाइट पर उपलब्ध होगी।

अक्षय ने आगे कहा, अगर आप लोग साथ देंगे और भारत सरकार इजाजत देगी तो मैं खुद वेबसाइट बनवा दूंगा। अगर ये वेबसाइट बन गई तो 26 जनवरी को जवानों को हमारी तरफ से यह बड़ा सेल्यूट होगा।

अक्षय के मुताबिक़ किसी भी अकाउंट में जब 15 लाख रूपये तक जमा हो जायेंगे तब उस अकाउंट की जानकारी हटा दी जाएगी क्यूंकि ये राशि उस परिवार के लिए पर्याप्त होगी।

इस विडिओ को अब तक करीब 35000 लोग पसंद कर चुके है और लोग अक्षय के इस प्रस्ताव की जमकर सराहना कर रहे है।