Tuesday, March 24, 2026
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साहित्य अकादमी के पास पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है :राव

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नयी दिल्ली : देश में कथित असहिष्णुता को लेकर साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने वालों के पुरस्कार और उनके चेक अकादमी के पास जस के तस ही पड़े हैं क्योंकि उनके पास पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव ने ‘भाषा’ से कहा कि 2015 में जो कुछ हुआ वह अकादमी के 60 साल के इतिहास में पहली बार हुआ था।
उन्होंने कहा कि कई साहित्यकारों ने अपना पुरस्कार वापस किया लेकिन सबके चेक या पुरस्कार हमारे पास नहीं आए। कई लोगों ने सिर्फ मीडिया में ऐलान कर दिया।
उन्होंने कहा ‘‘जिन्होंने अपने चेक और पुरस्कार हमें वापस किए हैं उन्हें भी हमने स्वीकार नहीं किया क्योंकि हमारे पास ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पुरस्कार वापस लिया जाए। उनके चेक हमारे पास पड़े हैं और हमने उन्हें बैंक में नहीं डाला है।
जब उनसे पूछा गया कि किसी साहित्यकार ने अपना पुरस्कार लौटाने के बाद उसे वापस भी लिया है तो राव ने कहा, ‘‘राजस्थानी साहित्यकार नंद भारद्वाज ने अकादमी को पत्र लिखकर अपनी भावनाएं बयान की और पुरस्कार वापस ले लिया।’’ गौरतलब है कि पिछले साल एक संवाददाता सम्मेलन में राव ने कहा था कि 39 साहित्यकारों ने हमें पुरस्कार वापस करने के बारे में लिखित में दिया है, जिनमें से 35 ने पुरस्कार के साथ दी जाने वाली राशि का चेक भी भेजा है।

 

कहीं ये प्यार के नाम पर कुछ और तो नहीं…

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कहते हैं कि प्यार का रिश्ता दिल से होता है। आमतौर पर लड़कियाँ दिल से ही सोचती हैं, जिसे अपना मान लिया, बस मान लिया। इस मान लेने के एहसास में अक्सर वे इतना डूब जाती हैं कि उनको ख्याल ही नहीं आता कि जिसे वह अपना सबकुछ मानकर अपनी जिंदगी लुटा देने के सपने देख रही हैं, वह उनसे वाकई प्यार करता है या उसे उनके शरीर में ज्यादा दिलचस्पी है या यूँ कहें कि वह आपको गुड़िया समझकर इस्तेमाल करने के बाद फेंकने वाला इंसान तो नहीं। हमें पता है कि यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है क्योंकि कई बार प्यार में हम इतने डूब जाते हैं कि सच को जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करते। इश्क का मिजाज और उम्र चीज ही ऐसी है मगर इश्क से बड़ी चीज जिंदगी है और अपना ख्याल रखना और अपने सम्मान की हिफाजत करना आपकी जिम्मेदारी है, खुद के प्रति। सच तो ये है कि जिंदगी में तमाम रिश्ते हों मगर अपने जज्बात की कद्र करना हमारी जिम्मेदारी है इसलिए यह जानना जरूरी है कि जिसे आप जिंदगी समझ रही हैं, वह कहीं आपको खिलौना तो नहीं समझ रहा। अगर ये फैसला नहीं कर पा रहीं तो ये इशारे पढ़िए, शायद फैसला करके अपनी जिंदगी पर अपना हक बरकरार रखना आपके लिए आसान हो जाए –

वो आपको अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं बताता वह आपको कभी अपने परिवार, माता – पिता, दोस्त या फिर किसी भी निजी चीज के बारे में नहीं बताएगा। यहां तक कि आपको उसकी सोशल मीडिया प्रोफाइल देख कर भी कुछ अंदाजा नहीं लग पाएगा।

वो आपको केवल रातों में याद करता है हमें आपको यह बताने की जरुरत नहीं कि 11 बजते ही लड़कों के दिमाग में क्‍या फितूर चलने लगता है। अगर आपका बॉयफ्रेंड रात को आपके रूप पर आने की बात करे तो, मतलब समझ जाइयेगा।

वो दूसरों से अपने रिश्ते को छुपाता है। हो सकता है वह आपसे बोले कि वह अपने प्‍यार को जग जाहिर नहीं करना चाहता, लेकिन क्‍या वह आपको अपने दोस्‍तों या परिवार से भी नहीं मिलवा सकता? उसके मन में जरुर कोई प्‍लान चल रहा है इसलिये आप जब भी उसके घर जाती हैं, तब वह आपको आपका सारा सामान साथ में ले जाने को बोलता है जिससे किसी को आपके बारे में भनक ना लग सके।

उसने आपका सूरत या सीरत नहीं बल्‍कि जिस्म पसंद है उसे हमेशा से आप नहीं बल्‍कि आपकी देह ने सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया है। वह आपके शरीर से उसकी नजर हटती नहीं है और कई बार आप असहज हो जाती हैं।

आप दोनो के लिये परफेक्‍ट डेट की परिभाषा अलग है उसे आपके साथ मूवी, ऑउटिंग और लंच नहीं करना है बल्‍कि वह आपके साथ 4 घंटे अकेले बिताने हैं, जहां पर वह आपके साथ संबन्‍ध बना सके। उसके लिये जज्बात नहीं बल्‍कि जिस्मानी संबंध ज्‍यादा महत्‍व रखता है।

जब आपको उसकी जरुरत पड़ी तब वह नहीं था। जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं जब आप तनाव या बुरा महसूस कर रही होती हैं और उस समय आपको किसी अपने कि खास जरुरत महसूस होती है। लेकिन उस दौरान वह इंसान हमेशा किसी ना किसी काम में बिजी रहता है और आपको उल्‍टा ड्रामेबाज बोलता है।

वो आपकी बात काट कर सीधे सेक्‍स की बातें करने लगता है जब भी आप कोई गंभीर बातें करने लगती हैं या अपना हाल-चाल सुनाने लगती है तब आपका बॉयफ्रेंड आपकी बातें ना सुन कर आपसे सेक्‍स की बातें करना शुरु कर देता है।

एसबीआई और पीएनबी ने घटाई ब्याज दर, होमलोन और ऑटो लोन

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को बैंकों से गरीबों तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोन को प्राथमिकता देने को कहा था। इसके बाद देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने रविवार को अपनी ब्याज दर में कटौती की है। एसबीआई ने ब्याज दरों में 0.9 प्रतिशत कटौती की घोषणा की। नई दरें आज से प्रभावी होंगी। पीएनबी ने ब्याज दरों में 0.7 फीसदी की कटौती की है।

एसबीआई ने एक साल की अवधि की कोष की सीमान्त लागत आधारित ब्याज दर (एमसीएलआर) को 8.90 से घटाकर 8 प्रतिशत कर दिया है। प्रधानमंत्री ने शनिवार को बैंकों से गरीबों तथा मध्यम वर्ग पर विशेष ध्यान देने को कहा था। उन्होंने कहा था, बैंकों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए मैं उनसे कहूंगा कि वे अपनी परंपरागत प्राथमिकताओं से आगे बढ़ते हुए गरीबों, निम्न मध्यम वर्ग तथा मध्यम वर्ग पर ध्यान दें।

उन्होंने कहा, भारत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती को गरीब कल्याण वर्ष के रूप में मना रहा है। बैंकों को इस अवसर को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। उन्होंने जनहित में तत्काल उचित फैसले करने चाहिए। इसी तरह एक दिन के कर्ज के लिए ब्याज दर को 8.65 से घटाकर 7.75 प्रतिशत किया है। तीन साल की अवधि के लोन के लिए इसे 9.05 प्रतिशत से घटाकर 8.15 प्रतिशत किया गया है। बैंक ने एक महीने, तीन महीने, छह महीने तथा दो साल के कर्ज पर भी ब्याज दर में इसी अनुपात में कटौती की है। इस तरह जनवरी, 2015 से बैंक अपनी बेंचमार्क रिण दर में दो प्रतिशत की कटौती कर चुका है।

पिछले सप्ताह एसबीआई के सहायक बैंक स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर ने ब्याज दरों में 0.3 प्रतिशत की कटौती की थी। वहीं आईडीबीआई बैंक ने इसमें 0.6 प्रतिशत की कटौती की थी।

 

 

पूर्वोत्तर के लिए होगी एक समर्पित मौसम सेवा

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नयी दिल्ली : नये साल में सरकार पूर्वोत्तर भारत के लिए खासतौर पर एक मौसम सेवा पर काम शुरू कर देगी। इस नयी सेवा से क्षेत्र में मौसम सेवा से संबंधित बुनियादी संरचना में महत्वपूर्ण सुधार आएगा।

परियोजना के तहत भारतीय मौसम विभाग :आईएमडी: क्षेत्र के लिए 14 डोपलर रडार खरीदेगा और 270 वेधाशाला एवं आठ माइक्रोवेव रेडियोमीटर स्थापित करेगा। इस समय त्रिपुरा के अगरतला और असम के मोहनबाड़ी में एक-एक रडार लगे हैं।
पूर्वोत्तर के 19 हेलीपोर्ट में भी खासतौर पर क्षेत्र के लिए काम करने वाली वेधाशालाएं स्थापित की जाएंगी। इस समय क्षेत्र में ऐसी कोई सुविधा नहीं है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने कहा कि क्षेत्र की विविधता और जरूरत को देखते हुए पूर्वोत्तर के लिए एक अलग मौसम सेवा की जरूरत है। राजीवन ने कहा कि मौसम विभाग अगले साल उपकरणों की खरीद कर परियोजना की शुरूआत कर देगा।

 

माओवादी जीवन को पीछे छोड़ नया जीवन जी रही है गीता

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गीता माओवादी दस्ते के लिए काम कर चुकी हैं, लेकिन अब उन्होंने नई शुरुआत की है। यह कहानी है छत्तीसगढ़ के बस्तर के सुदूर जंगल के इलाक़ों में रहने वाली आदिवासी युवती मड़कम मुक्के यानी ‘गीता’ की है। गीता, सुकमा ज़िले के कोंटा प्रखंड के एक गांव के रहने वाली हैं जहां ना सड़क है, ना बिजली और ना ही दूसरी और कोई बुनियादी सुविधा। माओवादी रहीं गीता का कहना है कि इसी वजह से वो माओवादी छापामारों के ‘बाल संघम’ के साथ बचपन में ही जुड़ गई थीं। जब वो बड़ी हुईं तो वो माओवादियों के सांस्कृतिक दस्ते में शामिल हुईं और जंगलों में घूम घूम कर ‘क्रांतिकारी गीत’ सुनाने का काम करने लगीं। दो महीने पहले गीता ने चिंतलनार के पास पोलमपल्ली पुलिस कैम्प में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया था. अब उन्हें सुकमा ज़िला पुलिस बल में नौकरी मिल गयी है।

“मेरा नाम मड़कम मुक्के यानी गीता है। मैं आदिवासी हूँ। मैं सुकमा ज़िले के कोंटा प्रखंड के एक दूर दराज़ के गाँव की रहने वाली हूँ। मेरा गाँव घने जंगलों के बीचोबीच है, जहाँ मैं पली और बड़ी हुई. बचपन में मैं माओवादियों के संगठन ‘बाल संघम’ से जुड़ गयी थी।नकाफी सालों तक मैं इसके साथ जुड़ी रही। मगर मुझे उनका सांस्कृतिक दस्ता बहुत आकर्षित करता था। सबके साथ मिलकर मुझे क्रांतिकारी गीत गाने का बहुत शौक़ था। चूंकि मैंने बाहर की दुनिया कभी नहीं देखी थी, इसलिए यह सांस्कृतिक दस्ता मुझे बहुत रोमांचित करता था।

एक दिन मैंने खुद ही जाकर माओवादी नेताओं से बात की और उनके सांस्कृतिक दस्ते में जुड़ने की इच्छा जताई। फिर मैंने गाना और नाचना सीखा। जल्द ही मैं इस दस्ते का हिस्सा बन गयी और जंगल के गावों में जाकर लोगों के बीच संगठन का पैग़ाम पहुंचाने लगी। मुझे इसमें काफी मज़ा आता था। लोगों के बीच क्रांतिकारी गीत गाना और नाचना मुझे बहुत अच्छा लगता था. जंगल में मनोरंजन का कोई साधन नहीं है क्योंकि ना यहां बिजली है, ना सड़क और ना ही फोन।

इसलिए जंगल के गावों में यह सांस्कृतिक दस्ता ही एकमात्र मनोरंजन का साधन रहा। इस बीच मैंने हथियार चलाना भी सीख लिया। मगर मैं ज़्यादातर सांस्कृतिक दस्ते के साथ ही जुड़ी रही। मगर बाहर की दुनिया मैंने कभी देखी नहीं थी। मुझे लगा कि मुझे वो सब कुछ भी देखना चाहिए जो मैंने और मेरे गांव के लोगों ने कभी नहीं देखा।

चूँकि माओवादियों के साथ जुड़ी रही इसलिए पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ हमेशा आँख मिचौली खेलती रहनी पड़ती थी। एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े तक भागते रहना पड़ता था. हमेशा सुरक्षा बलों से मुठभेड़ का डर बना रहता था। बड़ी खराब ज़िंदगी थी. सुबह कहीं होती थी। शाम कहीं. हमेशा ख़ौफ़ का साया मंडराया रहता था। एक दिन मैंने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया. ताड़मेटला जाते हुए आपने पोल्लमपल्ली में सुरक्षा बलों का कैंप देखा होगा। मैं वहां चली गयी और आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण करने की वजह से स्थानीय प्रशासन ने मुझे पुनर्वास का आश्वासन दिया. उन्होंने मुझे ज़िला पुलिस बल में तैनात कर दिया. मैं पुलिस बल की गुप्तचर शाखा के लिए काम करती हूँ।

रहने के लिए मुझे एक सरकारी घर भी दिया गया है. जंगल के बाहर आकर अब मुझे अच्छा लग रहा है. लोगों से मिल रही हूँ। यह मेरी दूसरी ज़िंदगी है. अभी तो बस इसकी शुरुआत हुई है. पता नहीं कहाँ तक जाएगी।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

हजारों बच्चो को तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति से निकाल नया जीवन दे रहा है यह दम्पति

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1988 की बात है; 17 साल के अजीत सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी बी. ए की पढाई कर रहे थे, जब उन्हें उनके गाँव आजमगढ़, उत्तर प्रदेश से अपने चचेरे भाई की शादी में आने का न्योता मिला। अजीत जो उस वक़्त एक किशोर थे इस न्योते से बेहद रोमांचित हो उठे। ये पहली बार था कि वे ऐसे किसी जलसे में जा रहे थे। लेकिन उन्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं था कि ये जलसा उनकी ज़िन्दगी को एक नया मोड़ देने वाला था।

उत्तर प्रदेश में शादियों में वेश्याघरो की लड़कियों को लाकर नचवाने का रिवाज़ है। पर अजीत के सामने ये सब पहली बार हो रहा था। लड़कियां, यहाँ तक की किशोरियां नाच रही थी और लोग उन्हें ललचाई हुई नजरो से देख रहे थे। कोई उनके आस-पास आकर हवा में गोलियां चलाता, कोई उन पर पैसे उछालता तो कोई उन्हें जहाँ मर्ज़ी छु कर निकल जाता। मनोरंजन का इतना भद्दा ढंग अजीत की बिलकुल समझ नहीं आ रहा था।

“मुझे बचपन से सिखाया गया था कि औरत देवी का रूप होती है। पर यहाँ तो उन्हें इंसान भी नहीं समझा जा रहा था। इन औरतो के साथ तो यहाँ के मर्द किसी बेजान चीज़ की तरह पेश आ रहे थे,” अजीत आज भी उन बातों को याद कर परेशान होकर बताते है।

अजीत रात भर उन औरतो का वहीँ इंतज़ार करते रहे। सुबह 6 बजे जब नाच-गाना ख़त्म हो गया और वे निकलने लगीं तो अजीत ने एक औरत को रोक कर पूछा कि, “क्या मैं तुम्हारे बच्चो को गोद ले सकता हूँ?”

एक 17 साल के लड़के से ये सवाल सुनकर औरत को हंसी आ गयी। उसने बिना कोई जवाब दिए बाहर का रुख किया। पर अजीत यहाँ रुकने वाला नहीं था। उसने वेश्यालय तक उस औरत का पीछा किया और दो साल तक लगातार उसे समझाने जाता रहा। आखिर दो साल बाद वो औरत मान गयी और उसने अपने तीनो बच्चो को अजीत के साथ भेज दिया।

“मेरे लिए वो सबसे ज्यादा मुश्किल समय था। हमारे गुरुजन और बड़े हमेशा हमें गांधीजी और मदर टेरेसा की तरह बनने की सीख देते है लेकिन जब हम वास्तव में ऐसा कुछ करते है तो उन्हें इस बात से अचानक आपत्ति हो जाती है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। घरवालो से लेकर समाज तक हर किसीने मेरा विरोध ही किया,” – अजीत

पर इन बाधाओं के बावजूद अजीत का इन तीनो बच्चो को पालने का निश्चय बिलकुल अटल था। पर इस पर भी एक गाज तब गिरी जब 1992 में अपने मालिको के दबाव में आकर इन बच्चो की माँ उन्हें वापस अपने साथ ले गयी।

इस घटना के बाद अजीत पूरी तरह टूट चुके थे। पर जिस तरह एक गहरी काली रात के बाद एक नया सबेरा आता है उसी तरह अजीत की इस हार के बात उनकी जीत निश्चित थी। करीब एक साल तक इसी विषय पर सोचते रहने के बाद अजीत ने इन औरतो के लिए कुछ करने की ठानी और वो भी दुगने जोश के साथ। और इस तरह साल 1993 में शुरुआत हुई उनके स्वयं सेवी संस्था ‘गुडिया’ की।

अजीत ऐसे किसी संस्था या व्यक्ति को नहीं जानते थे जो वेश्याओं को इस दलदल से निकालने में उनका साथ दे सकता था। और इसीलिए वे अकेले ही इस रास्ते पर निकल पड़े। वे रोज़ अपने स्कूटर पर कुछ बोरे और कुछ मिठाईयां लेकर निकलते और वेश्यालय के पास जाकर बैठ जाते। शुरू में वेश्याघरो की लड़कियां उन्हें भी अपना ग्राहक समझकर इशारे करती, उन्हें अपने पास बुलाती, पर जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि अजीत वहां कुछ और ही करने के इरादे से आते है।

अजीत अपना स्कूटर गली के कोने में खड़ा कर देते, वहीँ बोरियों को बिछा देते और वेश्याओं के बच्चो को मिठाईयां देकर वहां बिठा देते और उन्हें पढ़ाते।

“हर कोई मुझसे कहता कि, ‘तुम ये नहीं कर सकते। एक अकेला आदमी पूरी दुनियां नहीं बदल सकता।’ और मैं उनसे जवाब में कहता कि मैं जानता हूँ मैं दुनियां नहीं बदल सकता पर उतना ज़रूर करूँगा जितना मैं कर सकता हूँ,” अजीत बताते है।

अजीत का ये मानना था कि शिक्षा से सब कुछ बदल सकता है। पर धीरे धीरे उन्हें मालूम हुआ कि सिर्फ शिक्षा से यहाँ बदलाव लाना नामुमकिन है। पुलिस, दलाल, अधिकारी, नेता सब मिले हुए थे। सब के सब इन लड़कियों को वेश्यावृत्ति से निकालने की बजाय उन्हें उस गंदगी में पड़े रहने को मजबूर कर रहे थे। इन सबसे लड़ना मुश्किल था पर अजीत ने इस मुश्किल से लड़ने की ठानी।

मुद्दा ये था कि ये लड़कियां पढ़ लिख भी जाती तो इस जगह से बाहर आती कैसे? बाहर आकर करती क्या? और जब बाहर कमाई का कोई ज़रिया नहीं मिलता तो वापस वहीँ पहुँच जाती। अजीत ने इन लड़कियों के लिए सबसे पहले रोज़गार मुहैया करने का निश्चय किया। हालाँकि उन्होंने कभी भी ऐसी किसी भी औरत पर प्रश्न नहीं उठाये जो ये काम अपनी मर्ज़ी से करती थी और न ही उन पर इस काम को छोड़ने का दबाव डाला। उनका मकसद सिर्फ उन लड़कियों को यहाँ से निकालना था जिनसे ज़बरदस्ती ये काम कराया जा रहा था।

1996 में अजीत को CRY से फ़ेलोशिप मिली। इन पैसो से उन्होंने गुडिया में कुछ और लोगो को नौकरी पर रखा और अब वे पुलिस और व्यवस्था के खिलाफ लड़ने लगे। पुलिस की रेड में सिर्फ वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को ही पकड़ा जाता था। उनके मालिको और दलालों पर तो आंच भी नहीं आती थी। पर दरअसल ये महिलायें तो केवल इन दलालों के हाथो की कठपुतलियां थी। जब पुलिस इन्हें पकडती तो जमानत की रकम के लिए इन्हें घूम फिरकर इन्ही दलालो और वेश्याघर के मालिको की मदद मांगनी पड़ती और ये फिर उसी चक्रव्यूह में फंस जाती।

अजीत ने इन भ्रष्ट पुलिस अफसरों और दलालों की शिकायत मानवाधिकार विभाग से करनी शुरू की। इसी बीच अजीत की मुलाक़ात सांत्वना मंजू से हुई। मंजू अनाथ थी और बनारस के एक अनाथालय में पली बढ़ी थी। वर्ष 2000 में मंजू दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा चुकी थी। जाने से पहले अपनी छुट्टियों में यूँही एक दिन वे गुडिया में आई और फिर वही की होकर रह गयी।

“मेरा हमेशा से एक सपना था कि जब मैं खुद कमाने लगूंगी तो दो बच्चो को गोद लुंगी और उन्हें माँ बनकर पालूंगी। पर जब मैं गुडिया में आई तो वहां ऐसे कई बच्चे थे, जो यहाँ खुश थे। मैंने सोचा क्यूँ न सिर्फ दो बच्चो की बजाय मैं इन सबकी माँ बन जाऊं,” मंजू मुस्कुराते हुए कहती है।

इसके बाद अजीत और मंजू का साथ अटूट हो गया और दोनों ने 2004 में शादी कर ली। आज उनकी 7 वर्षीय बेटी बारिश बृष्टि भी उनकी मुहिम में उनका पूरा साथ देती है।

वेश्याघरो में नजदीकी से काम करने वाले अजीत और मंजू को एक बात तो समझ में आ गयी थी कि सिर्फ किसी एक मसले के सुलझाने से ये पूरा चक्रव्यूह नहीं तोड़ा जा सकता। अब उन्होंने सिर्फ इन लड़कियों को पढ़ाने या दलालों और अफसरों की शिकायत करने तक ही अपने आपको सीमित नहीं रखा। ये दोनों अब अपनी टीम के साथ लड़कियों की खोज बीन और जासूसी करने लगे और फिर उन्हें वहाँ से निकालकर लाने लगे।

2005 में अजीत को एक दिन ये खबर मिली कि बनारस के शिवदासपुर रेड लाइट इलाके में करीब 80-90 लड़कियों को मानव तस्करी कर लाया जा रहा है। अजीत और मंजू ने 5000 लोगो को इकठ्ठा किया और पुलिस को अपने साथ लेकर वहां पहुँच गए। इस घटना में 49 लड़कियों को सुरक्षित बचा लिया गया। करीब 40 दलालों को सलाखों के पीछे भी भेजा गया और 9 वेश्यालयों पर ताले लगा दिए गए। इस पुरे घटनाक्रम का टी.वी चैनलो पर सीधा प्रसारण किया गया।

ये अजीत और मंजू के लिए एक बड़ी जीत थी पर इसके बाद उन्हें जान से मार देने की धमकियाँ मिलने लगी, उन पर झूठे आरोप लगाये गए और कई फर्जी केस भी दर्ज किये गए।

“हमे आये दिन धमकियाँ मिलती रहती है। कुछ तो हमारी बेटी को लेकर भी होती है। माँ होने के नाते मुझे डर तो लगता है पर फिर एक लड़की का चेहरा मेरे सामने आ जाता है। इस लड़की को मैंने एक वेश्यालय में जासूसी करने के दौरान देखा था। वो सिर्फ सात या आठ साल की होगी। दलालों ने उसे ग्राहकों के सामने लाकर खड़ा कर दिया था। उसके होठ लाल लिपस्टिक से चमचमा रहे थे। पर उसकी आँखे बिलकुल खाली थी, बिलकुल बेजान जैसे वो जिन्दा ही न हो। हम उसे 2009 में वहां से बाहर निकाल लाये पर उसकी वो पत्थर हो चुकी आँखे मैं कभी नहीं भूल सकती।” – मंजू

गुड़िया ने मानव तस्करी के खिलाफ एक विश्वस्तरीय मुहिम की शुरुआत भी की है जिसका नाम है फ्रीडम नाउ । इस मुहीम के तहत स्कूल तथा दुसरे शिक्षा संस्थानों में मानव तस्करी से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रम जैसे कि संगीत, पेंटिंग, साइकिल स्पर्धा वगैराह आयोजित किये जाते है।

इस संस्था ने अब तक 1405 लोगो को बंधुआ मजदूरी और वेश्यावृत्ति से बचाया है। इसी संस्था द्वारा भारत का ऐसा पहला पारंपरिक संगीत और नृत्य दल बनाया गया है जिसमे वेश्यावृत्ति से बचायी गयी महिलाएँ अपनी कला का प्रदर्शन करती है। इस दल ने भारत के कई नामी गिरामी मंचो पर अपनी कला प्रस्तुत की है जिससे लोगो में जागरूकता फैली है तथा इन महिलाओं को जीवन यापन के लिए एक रोज़गार का जरिया भी मिला है।

गुडिया ने अब तक 1000 से भी ज्यादा बच्चो की शिक्षा में मदद की है। फिलहाल वे 350 बच्चो की शिक्षा की ज़िम्मेदारी उठा रहे है जिनमे से 180 बच्चे व्यवाहरिक स्कुलो में जाते है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

 

 

नए साल की पिकनिक पर हो जाए लाजवाब व्यंजन

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कॉर्न सींख कबाब

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सामग्री – १ कप उबले , छिले और मसले हुए आलू, १/४ कप कसा हुआ स्वीट कॉर्न, २ टेबल-स्पून बारीक कटा हुआ हरी प्याज़ का सफेद भाग, १ टेबल-स्पून बारीक कटी हुई हरी मिर्च, १ टेबल-स्पून कोर्नफ्लॉर, स्पून नमक स्वादअनुसार, १/२ टी-स्पून गरम मसाला, २ टी-स्पून घी

चुपड़ने के लिए  – 2 टी-स्पून पिघला हुआ मक्ख़न, 2 टी-स्पूनलाल मिर्च पाउड के साथ मिला हुआ

विधि – घी छोड़कर सभी सामग्री को एक बाउल में अच्छी तरह मिला लें। एक तरफ रख दें। पैन में घी गरम करें और तैयार मिश्रण डालकर २-३ मिनट तक पका लें। मिश्रण को ठंडा करने रख दें। मिश्रण को ४ बराबर भाग में बाँट लें और सीख (धातू के बने सीख) का प्रयोग कर, मिश्रण के प्रत्येक भाग को उसमें फसांकर अपनी उंगलियों से १०० मिमी (४”) लंबे कबाब बना लें। हर एक कबाब पर थोड़ा मक्ख़न का मिश्रण लगायें और इन्हें कोयला या इलेक्ट्रिक बार्बेक्यू में उनके सभी तरफ सुनहरा होने तक पका लें (लगभग ३-४ मिनट के लिए)। गरमा गरम परोसें।

 

 

थ्रेडेड पनीर रोल्स

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सामग्री – डेढ़ कप दरदरा पनीर, १/२ कप उबले , छिले और मसले आलू, १ टी-स्पून लाल मिर्च पाउडर, २ कली कसा हुआ लहसुन , १ टी-स्पून कॉर्नफ्लार, १ टेबल-स्पून टमॅटो कैचप, नमक , स्वाद अनुसार. १/२ कप उबले चपटे नूडल्स (सुलभ सुझाव की सहायता लीजिए), तेल , तलने के लिए

परोसने के लिए – स्मोक्ड बारबेक्यू सॉस

विधि एक बाउल में पनीर, आलू, लाल मिर्च पाउडर, लहसुन, टमॅटो कैचप, कॉर्नफ्लार और नमक डालकर अच्छी तरह से मिलाइए। मिश्रण को १६ बराबर भागो में बाँटिए। प्रत्येक भाग को ३७ mm (१½”) लंबे सिलंडर का आकार देकर ऊपर नूडल्स लपेट दीजिए। कड़ाही में तेल गरम कीजिए और थोड़े-थोड़े रोल्स भूरा होने तक फ्राई कर लीजिए। एक तेल सोखनेवाले कागज़ पर निकाल लीजिए और स्मोक्ड बारबेक्यू सॉस के साथ गरमा गरम परोसिए।

सुझाव  -१/३ कप कच्चे चपटे नूडल्स ½ कप उबले चपटे नूडल्स के बराबर होते है। नूडल्स जब तक पक जाते है तो वे ऊपर आ जाते है और उनका रंग भी बदल जाता है। यदि आपको चपटे नूडल्स नही मिलते तो साधारण नूडल्स का प्रयोग भी कर सकती हैं।

 

80 साल के मेडिसिन बाबा है गरीबो के मसीहा!

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भारत! एक ऐसा देश जहाँ एक तरफ दुनिया के सबसे अमीर लोग रहते है और दूसरी तरफ हर साल हज़ारो लोग भुखमरी के कारण मर जाते है। इसी देश की एक और विडम्बना ये है कि कई लोग दवाई के अभाव में पीड़ा सहते रहते है और कई उन्ही दवाईयो को बिना इस्तेमाल किये ही फेंक देते है।

किंतु हमारे इसी देश की राजधानी दिल्ली में एक शख्स ऐसे है जिन्होंने इस समस्या का एक बहुउपयोगी हल ढूंढ निकाला है। 80 साल की उम्र में ये शख्स रोज़ 5 से 7 किलोमीटर चलकर घर-घर जाकर दवाइयाँ इकटठा करते है। ओंकारनाथ शर्मा उर्फ़ मेडिसिन बाबा एक पूर्व सेवानिवृत्त ब्लड बैंक तकनीशियन है। ओंकारनाथ चाहते तो किसी भी बुज़ुर्ग सेवानिवृत्त व्यक्ति की तरह आराम से अपनी बाकी की ज़िन्दगी गुज़ार सकते थे। पर सन् 2008 में हुए लक्ष्मी नगर में निर्माणाधीन दिल्ली मेट्रो पुल के गिरने के हादसे ने उनकी दुनिया ही बदल दी।

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कई लोग घायल होकर भाग रहे थे। आस-पास के अस्पतालों में भीड़ लगी हुई थी। पर दवाईयां और अपेक्षित चिकित्सीय सहुलते न होने के कारण उन्हें इन अस्पतालों से बिना इलाज किये ही वापस लौटना पड़ा। यह सब देखके ओंकारनाथ का दिल दहल गया। वे सोच में पड गए कि यह कैसी विडम्बना है कि एक तरफ तो ज़रूरतमंद लोग दवाईयो के आभाव में मर रहे है और दूसरी तरफ अमीर और उच्च मध्यम वर्गीय लोग उन्ही दवाईयो को कूड़ेदान में फेंक रहे है।

ओंकारनाथ उन लोगो में से नहीं थे जो मुश्किलो को देख कर आँखे मूंद लेते है। उन्होंने इस मुश्किल का एक हल ढूंढ निकाला और अकेले ही एक मिशन पर निकल पड़े। यह मिशन था गरीबो के लिए एक मेडिसिन बैंक अर्थात दवाईयो का बैंक बनाने का।

इसी मिशन को लिए अगली सुबह ओंकारनाथ दिल्ली की गलियो में घर-घर जाकर दवाईयां एकत्रित करने निकल पड़े। और जल्द ही लोग उन्हें मेडिसिन बाबा के नाम से जानने लगे।

“बची दवाई दान में, ना की कूड़ेदान में। मेडिसिन बाबा का एक ही सपना, गरीबो का मेडिसिन बैंक हो अपना” कहते हुए मेडिसिन बाबा हर घर से बची हुई दवाईया मांगते है। इन दवाईयो का वे उचित रिकॉर्ड भी रखते है।

रोज़ पांच से सात किलोमीटर चलकर ओंकारनाथ जितनी भी दवाईया लाते है उन्हें गरीबो में मुफ़्त में बाँट देते है। कुछ दवाईयां डॉक्टर की बनायीं पर्ची के अनुसार होती है और कुछ रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली। इन सभी दवाइयो को ओंकारनाथ के दिल्ली के मंगलापुरी में स्थित एक छोटे से कमरे में रखा जाता है। पिछले सात सालो में ओंकारनाथ के कुछ ऐसे परिचित भी बन चुके है जो दवाईयां देने के लिए उन्हें स्वयं बुलाते है।

इन दवाईयो की एक पूरी फेहरिस्त तैयार की जाती है तथा इनके विषय में सभी जानकारियो को दर्ज किया जाता है। कोई भी ज़रूरतमंद इन दवाईयो को शाम 4 से 6 बजे तक ओंकारनाथ के कमरे से मुफ़्त में ले जा सकता है। इतना ही नहीं बल्कि मेडिसिन बाबा की ये दवाईयां बड़े-बड़े अस्पतालों जैसे कि AIIMS, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दीन दयाल उपाधयाय अस्पताल, लेडी इरविन मेडिकल कॉलेज और कई आश्रमो में भी दान की जाती है। ओंकारनाथ के मुताबिक़ वे एक महीने में कम से कम 4 से 6 लाख तक की दवाईयां बांटते है।

गरीबो को मुफ़्त में दवाईयां मुहैया कराना ही मेडिसिन बाबा का एकमात्र उद्देश्य नहीं है बल्कि वे चाहते है कि लोगो में इस बात की जागरूकता फैले और वे महंगी दवाईयो को फेंकने से पहले दस बार सोचे।

“मेरी लोगो से यही अपील है कि जीवनदायिनी बहुमूल्य दवाईयो को न फेके। बल्कि जहाँ भी आपकी श्रद्धा हो इन्हें उन आश्रम या अस्पतालो में दान करे।”

यदि इनसे पूछा जाए कि यह सब करके उन्हें क्या मिलता है तो उनका जवाब होता है, “मेरी दवाईयो से ठीक होकर जो लोग घर जाते है उन लोगो की मुस्कान ही मेरी पूंजी है।”

ओंकारनाथ के परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, एक बेटी तथा एक पोती भी है। दिल्ली जैसे शहर में सिर्फ ओंकारनाथ की पेंशन से बड़ी मुश्किल से गुज़ारा हो पाता है। पर फिर भी 80 साल के ये समाजसेवी न रुकते है न थकते है।

यदि लोगो के दिए पैसे से कुछ बच जाता है तो वे इन पैसो से अन्य चिकित्सीय उपकरण जैसे कि ऑक्सीजन टैंक, अस्पताल के बेड इत्यादि खरीदकर दान करते है। मेडिसिन बाबा ऐसे कई गरीब मरीज़ों के लिए वरदान है जो डॉक्टर की बतायी महंगी दवाईयां नहीं खरीद सकते।

फिलहाल वे कैंसर तथा गुर्दे की बीमारियो से ग्रस्त कुछ मरीज़ों की मदत करने में जुटे हुए है। मेडिसिन बाबा की पहचान उनकी नारंगी रंग की कमीज है, जिसपर उनका फ़ोन नंबर तथा उनका मिशन बड़े बड़े अक्षरो में लिखा हुआ है। इसी नारंगी कमीज को पहने, दिल्ली की गलियो में घूमते मेडिसिन बाबा कई लोगो की उम्मीद बन चुके है। हम आशा करते है कि गरीबो के लिए मेडिसिन बैंक बनाने का मेडिसिन बाबा का ये सपना जल्द ही पूरा हो।

(सााभार – द बेटर इंडिया)

विशेष जरूरतमंद बच्चों को दया नहीं स्नेह और स्वीकृति चाहिए

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अगर व्यक्ति में कुछ करने की चाहत हो और वह समाज को कुछ देना चाहता है तो उसके लिए रास्ते तमाम मुश्किलों के बावजूद खुल जाते हैं। सृजन और देने की यह छटपटाहट ही रचने का कारण बनती है। जब आप अनुभूति की संस्थापक गोपा मुखर्जी से बात करती हैं तो आपको ऐसी ही छटपटाहट महसूस होगी। कभी टीवी पत्रकार रह चुकीं गोपा अब भी पत्रकार हैं मगर अब वे अपनी इच्छा से वृत्त चित्र बनाती हैं। इसके साथ ही वे स्लो लर्नर बच्चों, डिस्लेक्सिया और विशेष रूप से प्रतिभावान बच्चों के लिए काम कर रही अपनी संस्था अनुभूति के माध्यम से जीने की राह दे रही हैं। अपराजिता से गोपा मुखर्जी की मुलाकात के अह्म हिस्से हम आपके लिए पेश कर रहे हैं –

प्र. पत्रकारिता का सफर कैसा रहा और सक्रिय पत्रकारिता से दूरी क्यों बना ली?

उ. मैं बतौर पत्रकार काफी सक्रिय रही हूँ। टीवी पत्रकार के रूप में कई मुद्दों पर काम कर चुकी हूँ मगर टीवी पर आपके मुद्दे को वह विस्तार बहुत कम मिलता है या यूँ कहूँ कि सृजनात्मक होकर काम करना किसी भी समाचार चैनल में करना मुश्किल है। मैं जिन मुद्दों को और बातों को जिस तरह से रखना चाहती थी, उसे मैं स्वतंत्र रहकर काम करके ही आगे बढ़ा सकती थी। किसी स्थापित चैनल में काम छोड़ने का फैसला आसान नहीं होता मगर मैंने किया और अब स्वतंत्र रूप से वृत्त चित्र बनाती हूँ। मैं अब भी सक्रिय हूँ।

anubhuti

प्र. आप अनुभूति संस्था के माध्यम से विशेष जरूरतमंद बच्चों को लेकर काम कर रही हैं। आप क्या महसूस करती हैं?

उ. हमारी समस्या यह है कि हम यह नहीं समझ सके हैं कि विशेष जरूरतमंद बच्चों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए। आज से 10 साल पहले विशेष जरूरतमंद बच्चों को लेकर किसी स्पष्ट परिभाषा नहीं थी, ऐसे बच्चों को मंदबुद्धि या पागल कहा जाता था मगर अब गहन शोध हो रहे हैं। समस्या के साथ उसके कारणों पर विचार किया जा रहा है। यह जरूरी है मगर उससे भी जरूरी है कि बच्चों को व्यक्तिगत रूप से प्यार और सहानुभूति दी जाए। अनुभूति जब मैंने आरम्भ की तो उसके पहले मैंने तैयारी की। प्लेथेरेपिस्ट से यह काम सीखा और तीन विशेष स्पेशिलाइज्ड कोर्स किए।

प्र. अभिभावकों की भूमिका के बारे में क्या कहेंगी?

. ऐसे बच्चे अधिकतर माँओं के पास रहते हैं। अभिभावकों का  धैर्य बहुत जल्दी खत्म हो जाता है और समस्या यही है क्योंकि जब तक एक चिकित्सक बच्चे की समस्या तक पहुँचते हैं, अभिभावक दूसरे चिकित्सक के पास चले जाते हैं। इससे बच्चे के उपचार में बाधा आती है और वह जल्दी ठीक नहीं हो पाते। सही उपचार के लिए निरंतरता जरूरी है।

प्र. सामाजिक कार्य को लेकर क्या विचार हैं?

. एक समय था जब लोग अगर दूसरों के लिए कुछ करते थे तो किसी को पता नहीं चलने देते थे मगर आज ऐसा नहीं है क्योंकि अगर किसी के लिए लोग कुछ करते हैं तो सारी दुनिया को बताते हैं। बगैर मीडिया और सेलिब्रिटी के आज सामाजिक कार्यों की कल्पना नहीं की जा सकती। मेरा  मानना है कि आज हम इन बच्चों के लिए अगर कुछ कर रहे हैं तो वह हमारा दायित्व है। अब इन बच्चों के लिए स्कूल और होम शेल्टर खोलना चाहती हूँ क्योंकि अक्सर मैंने देखा है कि बच्चों को सम्भालने के चक्कर में माता – पिता की निजी जिंदगी प्रभावित होती है और इस खीझ का असर बच्चों की परवरिश पर पड़ता है। माता – पिता की जिंदगी आसान होगी तो बच्चों की परवरिश और अच्छे तरीके से हो सकेगी।

प्र. आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

. विशेष जरूरतमंद बच्चों को दया नहीं स्नेह और स्वीकृति चाहिए। वह चाहते हैं कि उनको दूसरे बच्चों की तरह ही स्वीकार किया जाए और यही बात समझनी होगी। अच्छे लोगों को सामने आना होगा।

 

 

नव वर्ष में खुले हमारी सोच और व्यवस्था में सुधार का रास्ता

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साल का पहला दिन। बीता वक्त गुजर चुका है, वह नहीं अब उसकी यादें लौटकर आएंगी। 2016 एक ऐसा साल था जिसने हमें खुद के भीतर झाँकने पर मजबूर कर दिया। युद्ध, तनाव, निधन, ये तो हर साल होता है मगर आम आदमी की जिंदगी ने साल के अंतिम दो माह में करवट ली। एक ऐसा अभियान चला कि जिसने आसानी से गुजर रही जिंदगी में हलचल ला दी। मानसिक और सामाजिक तौर पर अभी हमें और संवेदनशील होने की जरूरत है, ये इस घटना से पता चला। पता चला कि सोशल मीडिया

हमारी जिंदगी पर किस कदर अपनी पकड़ मजबूत बना रहा है और वहीं जाकर सारी क्रांति ठहर जा रही है। हम मानते हैं कि तकनीक की अपनी जगह है, वह जीवन में महत्वपूर्ण है मगर हमें यह भी याद रखना होगा कि तकनीक ही जिंदगी नहीं है।  कम्प्यूटर, स्मार्टफोन के आगे एक दुनिया है और वह ऐसी दुनिया है जिसमें जज्बात हैं।

आज भले ही नववर्ष की शुभकामनाएं आपके स्मार्टफोन पर जीवंत रूप में आ रही हैं मगर सच तो यह है कि अपनेपन की जो खुशबू एक बधाईकार्ड या छोटे से खत में है, वह ई – मेल में नहीं आ सकती। हम पीछे मुड़कर देख नहीं सकते मगर जो अच्छी चीजें हैं, उनको सहेज तो सकते हैं। हमारे समय में जो अच्छा था और है, नयी पीढ़ी तक उसे पहुँचा सकते हैं, यही हमारा दायित्व है।

जिस समय नोटबंदी से परेशान कतार में खड़े वृद्ध की तस्वीर आप सोशल मीडिया पर शेयर करने की सोच रहे हों या फिर मरते हुए लोगों की तस्वीर साझा करने के बारे में सोच रहे हों, एक बार अपनी जगह उस वृद्ध को दीजिए या फिर किसी बीमार की तस्वीर खींचने की जगह उसे अस्पताल पहुँचा दीजिए, परिवर्तन यहीं से शुरू होगा।

नोटबंदी एक लम्बी प्रक्रिया है मगर हमें क्या महसूस नहीं हुआ कि हम अपने शौक को जरूरत समझ बैठे थे और उसे पाने की ललक में अपने घर का बजट बिगाड़ रहे थे। यूँ कहें कि एक स्मार्टफोन हमारे संबंधों पर भारी पड़ता जा रहा था, सुविधाओं को हमने जरूरत का नाम दे दिया था, यह हमारे सामाजिक व आर्थिक व्यवहार के लिए बड़ा झटका है।

अपने देश की बैंकिंग प्रणाली पर नाज हुआ करता था हमें मगर इस व्यवस्था में इतना भ्रष्टाचार है, यह नोटबंदी न होती तो हम नहीं जान पाते। बहरहाल लम्बा समय बीत चुका है और उम्मीद तो यही है कि व्यवस्था में सुधार का रास्ता खुले। जनतंत्र में जन की भागीदारी बढ़े। लोकतंत्र तो तभी मजबूत होगा जब हम भी विकास की प्रक्रिया में साथ बढ़ेंगे। आप सभी को अपराजिता की ओर नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।