Tuesday, July 14, 2026
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सीआरपीएफ की इस कॉमिक्स से कश्मीर में जवानों का बढ़ेगा हौसला!

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जम्मू एवं कश्मीर में तैनात अर्धसैनिक सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) एक कॉमिक्स बुक लेकर आ रहा है, जिसके केंद्र में साल 2001 में श्रीनगर हवाईअड्डे पर हुआ आतंकवादी हमला है।

गौरतलब है कि सीआरपीएफ की इस 10वीं सचित्र कॉमिक्स बुक में हवाईअड्डे पर हमले के दौरान इस अर्धसैनिक बल के जवानों द्वारा दिखाई गई वीरता का चित्रण किया गया है, जब 16 जनवरी, 2001 को लश्कर-ए-तैयबा के छह आत्मघाती हमलावरों ने हवाईअड्डे पर हमला कर दिया था। इस हमले में दो नागरिकों की जान गई थी, जबकि सीआरपीएफ के तीन जवान शहीद हो गए थे. सुरक्षाकर्मियों ने तीन घंटे तक चली गोलीबारी में छह आतंकवादियों को मार गिराया था।’शौर्य गाथा’ शीर्षक की कॉमिक्स बुक में सीआरपीएफ जवानों के साहस की कहानियां हैं, जो इस श्रृंखला की 12 कॉमिक्स बुक में से एक है। पिछले चार वर्षों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवादी हमले में सीआरपीएफ के 150 जवानों की जान जा चुकी है। दिल्ली में मुद्रित 30-40 पृष्ठों की यह कॉमिक्स बुक इस साल अक्टूबर या नवंबर में आ जाएगी। इसके बाद दो अन्य कॉमिक्स बुक ‘अटैक ऑन रघुनाथ टेम्पल’ और ‘ब्रेवरी ऑफ खूबी राम’ भी आएंगी।

सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट राजीव कुमार ने कहा कि, “हमारे जवानों का साहसिक कारनामा जम्मू एवं कश्मीर में तैनात बलों को प्रेरित करेगा।” उन्होंने कहा, “कॉमिक्स ‘अटैक ऑन श्रीनगर’ दर्शाता है कि सीआरपीएफ के जवानों ने किस प्रकार आतंकवादी हमले को विफल कर दिया। मुझे भरोसा है कि कॉमिक्स, घाटी में तैनात हमारे सैन्यकर्मियों को प्रेरित करेगी.” इन कॉमिक पुस्तकों में अक्टूबर 1959 में जम्मू एवं कश्मीर के लेह में चीनी सेना के खिलाफ सीआरपीएफ जवानों के साहस और दिसंबर 2001 में संसद पर हमले तथा जुलाई 2005 में अयोध्या हमले का भी जिक्र है।

कश्मीर घाटी में सीआरपीएफ के जवान बड़ी संख्या में तैनात हैं, जहां अलगाववादी आंदोलन के कारण 1989 से अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है। देश के सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ के 2,580 जवान आठ जुलाई, 2016 से 27 फरवरी, 2017 के बीच घायल हुए।

गौरतलब है कि कुमार ने बताया कि सीआरपीएफ जवानों के शौर्य पर आधारित कॉमिक्स बुक का विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभालने के बाद दिया था, अब तक नौ कॉमिक्स बुक जारी हो चुकी हैं। हर कॉमिक्स की 20,000 से अधिक प्रतियां नए जवानों और संबद्ध संगठनों के बीच वितरित की जा चुकी हैं। जल्द ही इनकी सार्वजनिक बिक्री शुरू की जाएगी. हिन्दी भाषा में लिखी इन कहानियों में सीआरपीएफ जवानों के जीवन व उनके अभियानों के बारे में बताया गया है। पुस्तक की विषय-वस्तु के लेखन से लेकर इससे संबंधित अन्य सभी कार्यो का प्रबंधन सीआरपीएफ द्वारा ही किया जाता है।

राजीव कुमार ने कहा, “कॉमिक्सों की बिक्री से जो धनराशि एकत्र होगी, उन्हें शहीदों के परिवारों के कल्याण पर खर्च किया जाएगा।”

 

इस शख्स ने किया 53 घंटे में एक हज़ार व्यंजन बनाने का दावा

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नागपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियर्स के हॉल में ख़ास तौर पर एक विशाल रसोई बनाई गई जिसमें कई गैस स्टोव और चिमनियां लगाई गईं। इसके बाद शुरू हुआ लगातार घंटों तक खाना बनाने का सिलसिला।

शेफ़ विष्णु मनोहर ने 12 कैमरों के सामने 53 घंटे में एक हज़ार शाकाहारी व्यंजन बनाकर एक बड़ा रिकॉर्ड बनाने का दावा पेश किया है. उन्होंने हर आठ घंटे में 40 मिनट का एक ब्रेक भी लिया।

मराठी रेडियो और टीवी के जाने-माने नाम विष्णु मनोहर कई चैनलों पर कुकरी शो कर चुके हैं। विष्णु देश का सबसे बड़ा पराठा और कबाब बनाने का दावा कर चुके हैं और इस बार उनकी नज़र गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड पर है।

ताना मारा तो रिकॉर्ड बनाने का फ़ैसला

दरअसल विष्णु ने तीन दिन और दो रातें लगातार कुल 53 घंटे तक किचन में बिताए और एक हज़ार से भी ज़्यादा शाकाहारी व्यंजन बनाए।

विष्णु ने बीबीसी को बताया कि यह नया रिकॉर्ड बनाने का ख़्याल उन्हें तब आया जब कुछ महीने पहले अमरीका में एक सेमिनार के दौरान किसी ने उन्हें लगातार कुकिंग करने वाले अमरीकी शख़्स के वर्ल्ड रिकॉर्ड के बारे मे बताकर तंज़ कसा था, तभी उन्होंने ठान लिया था कि कुकिंग में ऐसा रिकॉर्ड बनाएँगे जिसे तोड़ना मुश्किल होगा। उन्होने फ़ैसला किया कि वो तय समय में सबसे ज़्यादा व्यंजन बनाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाएंगे.

गिनीज़ बुक है लक्ष्य

विष्णु मनोहर के बड़े भाई और मुख्य आयोजकों में से एक प्रवीण मनोहर ने बताया, ”गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स को आवेदन करने के बाद पिछले महीने उनका अनुमति पत्र और रजिस्ट्रेशन नंबर आया। निर्धारित समय पर यह प्रयास करना था. लेकिन विष्णु का आगे का शेड्यूल टाइट होने से नागपुर में भीषण गर्मी के बावजूद हमने इसी महीने इसे आयोजित किया।”

प्रवीण ने बताया, ”अलग-अलग ऐंगल्स को फ़ोकस करते हुए बारह कैमरे लगाए गए जो लगातार रिकॉर्डिंग करते रहे. डिजिटल वीडियोग्राफ़ी के तमाम हार्ड डिस्क गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स के दफ्तर भेजे जाएंगे। जहाँ बारीक जांच के बाद 3 महीने में नया रिकॉर्ड स्वीकृत हो पाएगा। यहाँ हर डिश के बनाने के बाद उसका वज़न किया जाता है जो 80 ग्राम से 130 ग्राम के बीच होना चाहिए। इसकी भी वीडियोग्राफ़ी और फ़ोटोग्राफ़ी होती है पूरा आयोजन टैम्पर प्रूफ़ है, गड़बड़ी की कोई संभावना नहीं है। गिनीज़ के नॉर्म्स के अनुसार टाइम कीपर्स और विटनेसेस हैं. हर रेसिपी को कितना समय लगा, यह टाइम कीपर्स चेक करते रहे।”

घंटों रसोई में रहना एक चुनौती

विष्णु मनोहर के बैक किचन की एक अहम सदस्या माधवी पाटिल का कहना है, ”इस आयोजन के पीछे काफी पूर्व तैयारी की गई है। हम महिलाएँ एक या दो घंटे में किचन से परेशान हो जाती है। ऊपर से अगर मेहमान घर पर आ जाएं तो हमारा हाल पूछिए मत. झंझट लगती है. लेकिन वो पुरुष होकर इतनी शिद्दत से ये सब कर रहे हैं। वो ग्रेट हैं।”

प्रवीण मनोहर ने बताया कि गिनीज़ के नियमों के हर एक घंटे के बाद पांच मिनट का ब्रेक दिया जा सकता है। विष्णु ने 8 घंटे के बाद 40 मिनट का आराम किया. फ़्रेश होना, मसाज लेना और कुछ मिनटों की एक झपकी इसमें शामिल थी।

जब विष्णु ब्रेक लेते तब डॉ. पिनाक दंदे की टीम उन पर काम शुरू कर देती।

डॉ. दंदे बताते हैं “एक महीने से विष्णु मनोहर को तनावमुक्त रहने और सांस संबंधी क्रियाएं सिखाई जा रही थीं। कुकिंग मैराथन में ब्रेक के दौरान ब्लड प्रेशर, ब्लड ग्लूकोज़ लेवल्स, ऑक्सीजन लेवल्स को लगातार मॉनिटर किया गया।”

हालांकि विष्णु मनोहर की तरफ़ से सबसे कम समय में सबसे ज़्यादा शाकाहारी व्यंजन बनाने के रिकॉर्ड का दावा पेश कर दिया गया है, लेकिन गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के तमाम पैमानों पर खरा उतरने के बाद ही ये रिकॉर्ड आधिकारिक तौर पर उनके नाम होगा जिसमें तीन महीने तक का वक़्त लग सकता है।

 

मुस्लिम औरतों के हक और खुशियों पर कब्जा जमाते ते वे तीन शब्द

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केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘ट्रिपल तलाक’ और बहु विवाह प्रथा का प्रभाव सामाजिक स्थिति और मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को प्रभावित करता है और उन्हें संविधान द्वारा मिले मूल अधिकारों से दूर रखता हैं। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर अभिवेदन में सरकार ने अपने पिछले रुख को दोहराया है और कहा है कि ये प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं को उनके समुदाय के पुरुषों की तुलना में और अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में असमान एवं कमजोर बना देती हैं। केंद्र ने कहा, मौजूदा याचिका में जिन प्रथाओं को चुनौती दी गई है, उनमें ऐसे कई ऐसी बात कही गई है जो मुस्लिम महिलाओं को संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकारों का लाभ लेने से वंचित करते हैं।गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 30 मार्च को कहा था कि मुस्लिमों में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह की प्रथाएं ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिनके साथ भावनाएं जुड़ी हैं। मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक, ‘निकाह हलाला’ और बहुविवाह को चुनौती देने वाली याचिका पर संविधान पीठ 11 मई से सुनवाई करेगी। यह पहली बार होगा जब गर्मी की छुट्टियों में सुप्रीम कोर्ट के कम से कम 15 जज महत्वपूर्ण संवैधानिक महत्व के तीन मामलों की सुनवाई करेंगे। बहरहाल इस मसले पर पड़ताल में पेश हैं मशहूर पत्रकार आफरीन हुसैन की कलम से निकले विचार –

आफरीन हुसैन

तीन तलाक लफ्ज ही ऐसा है जिसे सुनकर कोई भी काँप सा जाता है क्योंकि इससे शादीशुदा जिन्दगी की डोर टूट जाती है…ये बात आजकल सभी की जुबान पर है…अलग – अलग इस्लामिक स्कूल ऑफ थॉट्स (विचारधाराओं) का कहना है कि एक साथ तीन मर्तबा (बार) लफ्ज तलाक कहने पर भी इसे एक बार कहना ही माना जाता है।

अलग – अलग तीन मौकों पर कई चरण पर कहने पर ही तलाक होता है तो दूसरा स्कूल ऑफ थॉट्स इस पर यकीन रखता है कि एक बार में तीन मर्तबा तलाक कह दिया जाए तो तलाक हो जाता है।

सवाल यह उठता है कि आखिर ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा ही क्यों और शाहबानो केस 1978 में क्यों आया जब शाहबानो ने अपनी खन्देरी तलाक के बाद अपने तलाकशुदा शौहर से देने की माँग की। असल में औरत चाहे, जिस मजहब, कौम की हो, उसे अपने लिए तहाफुज (सुरक्षा) चाहिए चाहिए, चाहे वह माली हो या समाजी।

खवातीन के नुक्ते नजर से तीन तलाक को देखें तो अलग – अलग राय पायी जा रही है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की खातून विंग की सरभ आसमां जोहरा ने सवाल उठाया कि हिन्दुस्तान के 30 जिलों में हुए सर्वे से ये बात जाहिर हुई है कि दीगर मजहिब के मुकाबले मुसलमानों के तलाक के दर सबसे कम हैं। ऐसे में तलाक शब्द का ही दुरुपयोग हो रहा है क्या ?

दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति की बीवी सलमा अंसारी के इस बयान ने खुद कुरान का सन्दर्भ देकर ऐसी बात कही कि विवाद बढ़ गया है। मुम्बई की 21 साल की शगुफ्ता सईद, शादी के चंद घंटों बाद ही उसके शौहर ने एक ही नशिस्त में तीन बार तलाक कह दिया, ने कहा कि जब 20 इस्लामी देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में एक बार में 3 तलाक नहीं माना जाता है तो यहाँ कैसे हो सकता है?

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी इसी बात की वकालत की है कि जब 20 इस्लामी देशों में इस तरह तलाक को नहीं मानते तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में इसकी वकालत क्यों की जा रही है? हर मुस्लिम महिला आन्दोलन की नेत्री नूरजहाँ सोफिया ने स्पीड पोस्ट से भेजे जाने वाले तलाक का जबरदस्त विरोध किया है।

(लेखिका अखबार- ए -मशरीक की एक्जिक्यूटिव सम्पादक हैं)

रंगभेद को लेकर मुखर हुए अभय देओल, सितारों को घेरा

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बॉलीवुड स्टार अभय देओल ने रंगभेद को लेकर किए अपने तीखे पोस्ट में कई बॉलीवुड सितारों पर निशाना साधा है। अभय देओल ने इस फेहरिस्त में बॉलीवुड के किंग खान को भी नहीं छोड़ा।

शाहरुख के बारे में फेसबुक पर लिखने के बाद अभय ने कहा कि किसी भी बड़े कलाकार के बारे में कुछ कहने के लिए बेहद साहस की जरुरत है। दिख रहा है कि अभय के अंदर वो साहस आ गया है।

अपने विचारों को फेसबुक पर पोस्ट करते हुए बॉलीवुड अभिनेता अभय देओल ने  फेयरनेस विज्ञापनों में अभिनय करने वाले शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, विद्या बालन और जॉन अब्राहम को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने केवल उन्हीं विज्ञापनों को चुना जिसमें यह बताया गया है कि काला रंग खूबसूरत नहीं होता है।

उन्होंने ऐसे विज्ञापनों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति आपको यह नहीं बतायेगा कि ये सब विज्ञापन बिल्कुल झूठे और रंगभेद को बढ़ावा देने वाले हैं। उन्होंने कहा कि हमें इस बात को बिल्कुल बढ़ावा नहीं देना चाहिए कि कोई एक रंग किसी दूसरे रंग से बेहतर होता है।

उन्होंने कहा ये हमारा दुर्भाग्य ही है कि शादियों के लिए दिए जाने वाले विज्ञापनों में हमें इसकी ही झलक देखने को मिलती है।

ये भावना हमारे मन में इतनी गहराई तक समाई हुई है कि सफेद बेहतर रंग होता है। अभय देओल ने कहा और तो और हम लोग किसी का रंग बताने के लिए ‘डस्क’ शब्द का इस्तेमाल करते है। उन्होंने कहा इस विज्ञापन में जॉन अब्राहम ने कार्ड शेड पकड़ा हुआ है जिसमें वो बता रहे है कि वो काले से गोरा कैसे हो रहे है।  शुक्रिया अभय, कम से कम आपने सितारों को आईना तो दिखा दिया।

 

पुरुषों में हैं सबसे लोकप्रिय कॉस्मेटिक सर्जरी

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कॉस्मेटिक सर्जरी का चलन महिलाओं में ही नहीं पुरुषों में भी बढ़ रहा है। अमेरिकन सोसाइटी फॉर एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी (एएसएपीएस) के ताज़ा डाटा के अनुसार अमरीका में 2016 तक सर्जरी कराने वालों में 10 में से एक व्यक्ति पुरुष रहा यानी 9.3 फ़ीसदी। स्पेन में सर्जरी कराने वालों में 12.2 फ़ीसदी पुरुष हैं.

तो पुरुषों में कौन सी कॉस्मेटिक सर्जरी ज़्यादा कराई जाती हैं ?

(एएसएपीएस) के मुताबिक, अमरीका में ये सर्जरियाँ सबसे लोकप्रिय रहीं

  • लिपोसक्शन ( 24 फ़ीसदी पुरुष)
  • स्तनों की सर्जरी-बीमारी के इलाज के लिए (17 % पुरुष)
  • आईलिड सर्जरी- 15 % पुरुष
  • नाक की सर्जरी- 14 % पुरुष
  • फ़ेस लिफ़्ट- 7 % पुरुष
  • कान की सर्जरी- 5 % पुरुष

स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में भी यही सर्जरी पुरुषों में लोकप्रिय है हालांकि क्रम अलग-अलग है।

डॉक्टर आइनहोआ प्लेसर ‘स्पेनिश सोसाइटी फ़ॉर प्लास्टिक, रिकन्सट्रक्टिव एंड ऐस्थेटिक सर्जरी’ के प्रवक्ता हैं।

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर आइनहोआ प्लेसर ने बताया कि पुरुषों में सर्जरी का चलन आने वाले सालों में और बढ़ेगा।

स्तनों के साइज़ को कम करने वाली सर्जरी पुरुषों में सबसे ज़्यादा कराई जाने वाली सर्जरियों में से है।

ये सर्जरी तब की जाती है जब पुरुषों में एक या दोनों मैमरी ग्लैंड्स बहुत बड़े हो जाते हैं।

ये मोटापे, स्टीरॉयड लेने, कैंसर के इलाज या हॉरमोन के असंतुलन की वजह से हो सकता है।

1997 के बाद से इस तरह के ऑपरेशनों में 181 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। सात फ़ीसदी सर्जरी 2016 में 19 साल से कम युवाओं में हुई।

डॉक्टर प्लेसर के मुताबिक ये बीमारी बच्चों में भी हो सकती है और माँ-बाप की अनुमति के बाद सर्जरी की जाती है।

वैसे सबसे लोकप्रिय सर्जरी लिपोसक्शन है- फिर वो चाहे पुरुष हों या महिलाएँ. लिपोसक्शन मोटापे को कम करने के लिए की जाती है।

कुमार विश्वास को भी गुस्सा आता है

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आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और कवि कुमार विश्वास ने शुक्रवार को एक नया वीडियो रिलीज किया। अपने ऑफिशियल यू ट्यूब चैनल पर जारी किए गए इस वीडियो में कुमार विश्वास ने पिछले दिनों की कुछ घटनाओं पर क्षोभ व्यक्त किया है और कई सवाल खड़े किए हैं। लगभग तेरह मिनट के इस वीडियो में कुमार विश्वास कभी गुस्से में तो कभी भावुक नजर आ रहे हैं। वीडियो में जहाँ एक तरफ़ पिछले दिनों कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों पर हुए हमले को ले कर सवाल खड़े किए गए हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सेना के जवानों द्वारा पिछले दिनों उठाए गए सवालों का भी जवाब मांगा है। आप भी देखिए –

 

 

 

देश के 4 बड़े हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश महिलाएं

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महिला सशक्तिकरण की इससे बड़ी बात बात क्या होगी, जिस सेवा में कभी पुरुषों का बोलबाला होता था, आज उसके शीर्ष पदों पर महिलाएं काबिज हैं। पहली बार देश के चार बड़े हाई कोर्ट बॉम्बे, मद्रास, दिल्ली और कलकत्ता हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश महिलाएं हैं।

जस्टिस इंदिरा बनर्जी के मद्रास हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद भारत को इस बात पर गर्व करने का संयोग मिला है।

आपको बता दें कि मद्रास हाई कोर्ट में 53 पुरुष जज हैं जबकि 6 महिला जज हैं। अगर बॉम्बे हाई कोर्ट की बात करें तो वहा 61 पुरुष जज हैं जबकि 11 महिला जज हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में 35 पुरुष जज हैं जबकि महिला जजों की संख्या 9 है। इसके अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट में 4 महिला जज हैं जबकि पुरुष जजों की संख्या 35 है। सुप्रीम कोर्ट में 28 जजों में केवल एक महिला जज जस्टिस आर. भानुमति हैं।

आपको बता दें कि मद्रास हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद पर जस्टिस इंदिरा बनर्जी की नियुक्ति की गई है। बॉम्बे हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मंजुला चेल्लुर हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी रोहिणी अप्रैल 2014 से इस पद पर बनी हुई हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायधीश जस्टिस निशिता निर्मल इस पद पर 1 दिसबर 2016 से हैं।

अगर देशभर के न्यायालयों की बात करें तो देशभर में 24 हाई कोर्ट हैं । इनमें करीब 632 जज हैं जिनमें से महिला जजों की संख्या 68 है।

फिल्मी गानों में ‘गंदी’ नहीं, ऐसे होगी ‘अच्छी बात’ गाना रिराइट से

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कानून की नजर में ऐसा करना ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट’ है पर आगे की लाइनें जरा धुन में गुनगुनाते हुए पढ़ेंगे तो समझ जाएंगे कि ये बॉलीवुड का एक मशहूर गाना है! ‘खाली पीली खाली पीली रोकने का नहीं, तेरा पीछा करूं तो टोकने का नहीं है तुझपे राइट मेरा, तू है डिलाइट मेरा तेरा रस्ता जो रोकूं चौंकने का नहीं तेरे डॉगी को मुझपे भौंकने का नहीं, तेरा पीछा करूं तो टोकने का नहीं…’ खुद ही सोचिए कोई बिना बात रोके, पीछा करे, ये जताए कि उसका आप पर अधिकार है, और आपको उसे रोकने या मना करने का हक भी नहीं है!

ये छेड़छाड़ और बदतमीजी नहीं तो क्या है? बस यही जताने के लिए और बॉलीवुड के ऐसे गानों में औरतों को बराबरी का दर्जा देने के लिए एक मुहिम चली – #GaanaRewrite – यानी गानों को उन्हीं धुनों पर दोबारा लिखने की कोशिश। इसी कोशिश में ऊपरवाला गाना दोबारा लिखा गया। आगे पढ़ें, फिर उसी गुनगुनाने के अंदाज में।

‘खाली पीली खाली पीली रोकने का नहीं, मेरा पीछा करेगा सोचने का नहीं, तुझे रिजेक्ट करना, है ये राइट मेरा, तेरा एफआइआर करूं तो चौंकने का नहीं बन डॉगी, पीछे पीछे भौंकने का नहीं, मेरा पीछा करेगा सोचने का नहीं…’ ऐसे क्यों नहीं लिखते? है ना मजेदार? आंख-कान-दिमाग सब खोलता है।

दरअसल बॉलीवुड के ऐसे गाने लचकदार धुनों और मजेदार ताल पर बैठाए जाते हैं कि शायद कई लोगों का ध्यान उनके शब्दों से हटकर उनपर थिरकने में ही लग जाता है। पर लय-ताल के धोखे में हम आप कैसी-कैसी बातों को गाते-दोहराते हैं। एक और उदाहरण देखिए। गुनगुनाते हुए पढ़िए और याद कीजिए कि कितनी शादी-पार्टियों में इसे सुना है।
‘बीड़ी पीके नुक्कड़ पे वेट तेरा किया रे, खाली पीली अट्ठारह कप चाय भी तो पिया रे, ए बी सी डी पढ़ ली बहुत, ठंडी आहें भर ली बहुत, अच्छी बातें कर ली बहुत, अब करूंगा तेरे साथ, गंदी बात, गंदी बात…’ ये तो सीधे-सीधे यौन हिंसा की धमकी है।

मानो कहा जा रहा हो कि अगर कोई लड़की दिलचस्पी ना ले तो उसके साथ गंदी बात यानी यौन संबंध बनाना चाहिए। पर अगर उस लड़की के दिलचस्पी ना लेने यानी मना करने के बावजूद, संबंध बनाने की बात हो तो फिर वो बलात्कार ही कहलाएगा।…तो नपुंसकता की असली वजह कुछ और है!

किराए पर घर लेकर वेश्यालय बना दिया तो औरतों के अधिकारों के लिए काम कर रही संस्था ‘अक्षरा’ की मुहिम – #GaanaRewrite – के तहत इसे भी दोबारा लिखा गया। जरा पढ़िए तो। अच्छा है। शब्द अलग हैं, पर धुन वही। आप फिर थिरक उठेंगे।

ऐसे क्यों नहीं लिखते

‘बीड़ी पीके नुक्कड़ पे वेट क्यों किया रे, खाली पीली अठारह कप चाय भी क्यों पिया रे, ए बी सी डी पढ़ो ना पढ़ो, अच्छी बातें करो ना करो खबरदार जो करी कोई, गंदी बात, गंदी बात…’

ऐसे क्यों नहीं लिखते? बॉलीवुड बदले या ना बदले, ऐसे लिखे या ना लिखे, आप लिख डालिए। ऐसे गानों की कमी नहीं, बस वक्त कीमती है। तो वक्त निकालिए और हमारे फेसबुक पन्ने पर लिख भेजिए।
क्योंकि क्या है न कि साल 2013 में जब औरतों के खिलाफ हिंसा से जुड़े कानून कड़े किए गए, तो उसके बाद अक्सर सुनने को मिल जाता है कि, “अब तो औरतों के मजे हैं, क्योंकि अपराधों की परिभाषा बढ़ाकर सजा बेहद कड़ी कर दी गई है”।

पर औरतों के मजे यानी जिंदगी बेहतर हो कैसे जब कानून एक बात कहे और हम, बेध्यानी में सही, शायद अनजाने में ही, एकदम उलट? तो कोशिश कर कह दीजिए अच्छी बात। आप भी सोचिए…..ऐसा क्यों नहीं लिखते हैं

कंगना रनौत बनीं झांसी की रानी, फर्स्ट लुक आया सामने

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इतिहास को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने के इस दौर में कई फिल्म कलाकार ऐसी कई फिल्में बना रहें हैं जिससे लोग फिल्मों के माध्यम के इतिहास को जाने। इन ऐतिहासिक फिल्में में किरदारों के लुक को पर काफी ध्यान दिया जाता है कि वो उस लुक में फिट बैठ पा रहें हैं या नहीं। ऐसी ही एक ऐतिहासिक फिल्म आने वाली है जोकि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक पर आधारित है।

फिल्म ‘मनिकर्निका’ में झांसी की रानी के लीड रोल में बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत नजर आने वाली हैं और इस फिल्म का पहला लुक सामने आ गया है।

आपको बता दें कंगना रनौत का ये लुक देखने लायक है। कंगना को दर्शकों ने हर रोल में पसंद किया है लेकिन ऐसे लुक में वो पहली बार सामने आई है।

इस लुक में वो अपने किरदार के अनुसार बिल्कुल सटीक लग रहीं हैं। फिल्म में कंगना के फर्स्ट लुक को देखकर तो आसानी से कहा जा सकता है वो इस फिल्म में एक बार फिर धमाल मचाने वाली हैं।

आपको बता दें कंगना फिल्म में लिए काफी पसीना बहाती नजर रही हैं। अपने झांसी की रानी के रोल को पर्फेक्ट बनाने को लिए कंगना तलवारबाजी और घुड़सवारी भी सीख रहीं हैं।

बताया जा रहा है ये फिल्म जल्द ही रिलीज होगी हालांकि अभी तक कोई तारीख तय नहीं की गई है। फिल्म ‘मनिकर्निका’ को कृष डायरेक्ट कर रहें हैं। जानकारी के लिए बता दें कृष अक्षय कुमार के साथ फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ बना चुके है।

बताया जा रहा है इस फिल्म को पहले केतन मेहता बनाने वाले थे लेकिन कंगना और उनके बीच बहुत सी बातों को लेकर तनातनी रहती थी इसलिए उन्हें इस फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

वहीं इस फिल्म की कहानी एस एस राजामौली के पिता केवी विजयेन्द्र प्रसाद ने लिखी है, इसके साथ ही फिल्म बाहुबली की कहानी भी इन्होने ही लिखी है।

एशिया के अंडर 30 सेलेब्रिटीज में आलिया भट्ट शामिल

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फोर्ब्स ने एशिया के 30 साल से कम उम्र के सेलेब्रिटीज की लिस्ट घोषित की है जिसमें आलिया भट्ट का नाम भी शामिल है। आलिया सिर्फ 24 साल की है और आज दुनिया भर में उनका नाम जाना जाता है। आलिया को फिल्मों में पहला ब्रेक तब ही मिल गया था जब वे महज 18 साल की थी।

‘स्टूडेंट ऑफ द इयर’ से डेब्यू करने वाली आलिया करीब दस से ज्यादा फिल्में कर चुकी हैं और हर फिल्म में उनकी एक्टिंग देखने लायक होती है। आलिया बॉलीवुड में सबसे कम उम्र की एक्ट्रेस हैं और भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में उनके कई फैंस हैं। आलिया कई अवॉर्ड भी अपने नाम कर चुकी हैं।

हाल ही में आलिया को ‘उड़ता पंजाब’ के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया था। आलिया आखिरी बार फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ में नजर आई थीं। जिसमें उनके साथ वरुण धवन थे।