Tuesday, July 14, 2026
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ईश निंदा के नाम पर युवक की हत्या, मलाला बोलीं- पाकिस्तानियों ने इस्लाम को बदनाम किया

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नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने कहा है कि पाकिस्तान दुनियाभर में अपनी खराब छवि के लिए खुद ही जिम्मेदार है। पाकिस्तान के एक विश्वविधालय में ईश-निंदा के चलते छात्र की मौत पर विरोध जताते हुए उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी किया है।

मलाला ने कहा कि ‘आज हम इस्लामफोबिया की बात करते हैं साथ ही यह भी कहते हैं कि लोग हमारे देश और धर्म को गलत नाम दे रहे हैं जबकि सच तो यह है कि दुनियाभर में पाकिस्तान और इस्लाम की खराब छवि के लिए कोई और नहीं बल्कि स्वयं पाकिस्तानी जिम्मेदार हैं।’

गौरतलब है कि पाकिस्तान में गुरुवार को मशाल खान नाम के पत्रकारिता के छात्र की ईश-निंदा के आरोप में हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि उसने फेसबुक पर अल्लाह के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट शेयर की थी।

मलाला ने बताया कि मृत छात्र के पिता से बात की और उनका कहना था कि इस भयावह घटना के बाद शांति और सहिष्णुता और प्रबल होनी चाहिए। यूसुफजई ने कहा ‘यह घटना मशाल की मौत के लिए ही नहीं बल्कि इस्लाम के पवित्र संदेश की भी मौत थी। हम पाकिस्तानी अपने धर्म, मूल्यों और शालीनता को भूल चुके हैं।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘पाकिस्तान के प्रत्येक नागरिक का अधिकार है कि वह सुरक्षित और शांति से रहे। अगर हम लोगों का ऐसे ही कत्लेआम करेंगे तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।’ यूसुफजई ने पाकिस्तानी सांसदों और राजनीतिक दलों से भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने और मशाल को न्याय की भी बात कही।

आईआईटी में अब ज्यादा छात्राओं को मिलेगा दाखिला

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वर्ष 2018 से देश के 31 आईआईटी में छात्राओं की तादाद बढ़ जाएगी। आईआईटी में छात्र-छात्राओं का अनुपात सही करने के लिए नए  अकादमिक सत्र में बीटेक प्रोग्राम में लड़कियों को स्पेशल कोटे के तहत दाखिला मिलने लगेगा। ज्वाइंट एडमिशन बोर्ड (जैब) की शनिवार को आयोजित बैठक में लड़कियों को आगे बढ़ाने के मकसद से सुपर न्यूमररी कोटा के तहत बीस फीसदी अतिरिक्त सीटों पर लड़कियों को दाखिला देने का फैसला हुआ है। लड़कियों को बेशक दाखिले में स्पेशल कोटा लागू होने का लाभ मिलेगा, लेकिन उससे लड़कों की सीट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
ज्वाइंट एडमिशन बोर्ड की शनिवार को दिल्ली में आयोजित बैठक में देशभर के सभी आईआईटी प्रबंधन ने लड़कियों के लिए 20 फीसदी अतिरिक्त सीटों पर दाखिले पर सहमति दे दी है। सभी आईआईटी में यह कोटा तीन सालों में बढ़ाना होगा। इसके तहत पहले साल (2018)14 फीसदी अतिरिक्त सीट तो दूसरे साल (2019) में 17 फीसदी और तीसरे साल  (2020) में बीस फीसदी तक सीट बढ़ाई जाएंगी।

हालांकि इस नियम का लाभ उन्हीं छात्राओं को मिलेगा, जिन्होंने पिछले बोर्ड एग्जाम में बीस पर्सेंटाइल के साथ टॉप किया होगा। ज्वाइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी (जोशा) की इस बैठक में आईआईटी और एनआईटी (देश भर में 32 एनआईटी हैं) में संयुक्त काउंसलिंग से दाखिला करवाने पर भी चर्चा हुई। इसके तहत उक्त संस्थानों में दाखिला काउंसलिंग के लिए सात राउंड (पिछले साल तक आईआईटी व एनआईटी में दाखिला काउंसलिंग के छह राउंड आयोजित होते थे।) आयोजित होंगे।

इस साल यदि कोई छात्र चौथे राउंड की काउंसिलिंग के दौरान सीट छोड़ता या कोर्स छोड़ता है तो उस पर 50 फीसदी तक जुर्माना लगेगा, जो कि उसकी दाखिला फीस से काटा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में आईआईटी और एनआईटी प्रबंधन से पूछा गया कि वे अपने कैंपस में कौन-कौन से कोर्स बंद करवाना चाहते हैं या किसमें सीट कम या ज्यादा करना चाहते हैं।

उक्त प्रबंधन को कहा गया है कि जिन कोर्स में छात्रों को दाखिला लेने में रुचि नहीं है, उन्हें अपनी मर्जी से बंद या सीट कम कर सकते हैं। यह फैसला इसलिए लिया जा रहा है कि क्योंकि पिछले साल उक्त संस्थानों में करीब तीन हजार सीट खाली रह गयी थी, जिसमें कुछ सीट छात्रों द्वारा बाद में छोड़ी गयी थी।

 

बॉस, आप, दफ्तर और यूजर मैनुअल

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हम में से बहुत से लोगों को दफ्तर में तालमेल बिठाने में दिक्कत होती है। नए-नए लोगों से सामना होता है तो हर बार अपनी पसंद-नापसंद को समझाना पड़ता है। दूसरे की पसंद-नापसंद जानने की जरूरत होती है। खास तौर से दफ्तर में अपने सीनियर्स की आदतों को जानना जरूरी होता है। आखिर इस चुनौती से कैसे निपटा जा सकता है?

पश्चिमी देशों में आजकल इस चुनौती से निपटने के लिए यूजर मैनुअल बनाने का चलन बढ़ रहा है। जैसे हम कोई नया फोन या सामान खरीदते हैं, तो उसके साथ यूजर मैनुअल मिलती है, जिसमें उस चीज की खूबियां बताई जाती हैं। ये भी लिखा होता है कि आप उस फोन या किसी और सामान का बेहतर इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

ठीक इसी तरह, आजकल पश्चिमी देशों में बहुत से लोग अपने-अपने यूजर मैनुअल यानी पसंद-नापसंद और आदतों की फेहरिस्त बनाने लगे हैं। जिससे उनके साथ काम करने वाले उन्हें आसानी से समझ सकें। सब लोग साथ मिलकर बेहतर ढंग से काम कर सकें। कामकाजी लोगों के यूजर मैनुअल का ख्याल सबसे पहले अमरीका के बोस्टन की एक कंपनी स्टाइबेल, पीबॉडी ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक लैरी स्टाइबेल को आया था।

बात 2003 की है। लैरी स्टाइबेल एक मीटिंग के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। खाली वक्त में वो अपने नए फोन का यूजर मैनुअल पढ़ने लगे। वहीं से उन्हें अपनी कंपनी के कर्मचारियों का यूजर मैनुअल तैयार करने का ख्याल आया। लैरी ने इसकी शुरुआत खुद के बारे में एक सूची तैयार करने से की।

इसमें उन्होंने अपने काम करने के तरीके, पसंद-नापसंद के बारे में छोटा सा ब्यौरा तैयार किया। इसके बाद लैरी ने अपनी कंपनी के सभी कर्मचारियों को ऐसा करने को कहा। कुछ वक्त के बाद लैरी को लगा कि उनका ये नुस्खा बेहद काम आया है। लोगों को एक दूसरे को समझने और साथ मिलकर काम करने में इस यूजर मैनुअल से काफी सहूलियत होने लगी।

मातहतों को भी अपने सीनियर्स के साथ काम करने में आसानी हुई। कई और कंपनियों और लोगों ने भी यूजर मैनुअल का लैरी का नुस्खा आजमाया। नॉर्वे के रहने वाले इवार क्रोघुर्द ऐसे ही लोगों में से एक हैं।

नॉर्वे की अनिवार्य सैन्य सेवा के दौरान इवार को कई लोगों के साथ काम करने का मौका मिला था। मगर, उन्हें तालमेल में दिक्कत नहीं आई। लेकिन जब उन्होंने साल 2000 में अपनी डेटा कंपनी क्वेस्टबैक की शुरुआत की, तो अपने साथियों के साथ काम करने में ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

दस साल में उनकी कंपनी में तीन सौ से ज्यादा कर्मचारी हो गए थे। मगर इवार को इनमें से कई लोगों के तो नाम ही नहीं मालूम थे। फिर इवार ने यूजर मैनुअल बनाने के नुस्खे पर अमल किया। उन्होंने अपने मातहत काम करने वालों को अपनी आदतों और खामियों के बारे में बताया। मसलन खुद उन्हें नहीं पता था कि कई बार कर्मचारी उनसे तुरंत फैसले की उम्मीद करते थे और इवोर बात को टालते रहते थे।

जब साथियों ने उनके यूजर मैनुअल के जरिए इस आदत को जाना तो उन्हें टोकने लगे। इससे इवार को भी जल्दी फैसले लेने की आदत हुई। इसी तरह एक सीईओ अक्सर मीटिंग में जंग की कहानियां सुनाने लगते थे। कर्मचारियों को यूजर मैनुअल के जरिए उनकी इस आदत का पता चला, तो मीटिंग में लोग उन्हें टोकने लगे और मीटिंग जल्दी खत्म होने लगीं।

एक प्रोफेसर साहब ने अपने यूजर मैनुअल में लिखा कि लोग उनसे अपॉइंटमेंट लेकर मिलें। उनके टहलने के वक्त में अचानक आकर बात न करें क्योंकि वह वक्त वो सोच-विचार में लगाते हैं। इन दिनों पश्चिमी देशों की कई कंपनियों में कर्मचारियों से यूजर मैनुअल लिखवाया जाता है। कई लोग इसे अच्छी बात मानते हैं।

वहीं कई लोगों को ये झूठ का पुलिंदा लगता है। इसके विरोधी कहते हैं कि लोग अक्सर अपनी बुरी आदतें छुपा ले जाते हैं। यूजर मैनुअल की अपनी खामियां हैं। इसकी शुरुआत करने वाले लैरी सलाह देते हैं कि किसी भी कंपनी में यूजर मैनुअल लिखना अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए।

साथ ही वो सलाह देते हैं कि कंपनी के अधिकारियों को इसकी शुरुआत खुद का यूजर मैनुअल बनाकर करनी चाहिए। फिर उनके मातहतों को उनकी मिसाल मानने में आसानी होगी। जानकार कहते हैं कि दूर-दूर रहकर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ये नुस्खा बेहद कारगर होगा क्योंकि वो एक-दूसरे से मिल नहीं पाते। ऐसे में उन लोगों को एक दूसरे की पसंद और आदतों की जानकारी नहीं होती।

यूजर मैनुअल के नुकसान

यूजर मैनुअल इस काम में उनका मददगार साबित होता है। यूजर मैनुअल के नुकसान भी हैं। मसलन आपके बॉस ये कहें कि उन्हें चुनौतियां पसंद हैं लेकिन जब आप उनकी बातों को चुनौती देते हैं, तो वो आपको इसके लिए सजा भी दे सकते हैं। ऐसे में यूजर मैनुअल का कोई फायदा नहीं होगा। अब अगर आप अपने बारे में ज्यादा निजी जानकारियां साझा करते हैं, तो इसके भी नुकसान हो सकते हैं।

जैसे आप ये लिखते हैं कि आपको सुबह उठना पसंद नहीं। तो, हो सकता है कि आपके बॉस ये कहें कि आपको ये आदत बदलनी चाहिए। यानी आपका अपनी आदत उजागर करना भारी भी पड़ सकता है। पर सावधानी के साथ इस्तेमाल करने पर ये नुस्खा दफ्तर में कर्मचारियों के बीच, बॉस और मातहत के बीच तालमेल बेहतर करने में काफी कारगर हो सकता है।

 

इस बेगम जान में है समाज और सत्ता को ललकारने का दम

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बेगम जान राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी की बांग्ला फिल्म राजकाहिनी का हिंदी रीमेक है। यह आजादी के दौर की ऐसी कहानी है जो आपने पहले नहीं सुनी होगी। जानिए  शानदार वजहें जिसके चलते कम से कम एक बार तो बेगम जान देखना बनता ही है।

अगर विद्या बालन के फैन हैं तो ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। काफी समय बाद विद्या अपने दमदार अभिनय की छाप फिल्म पर इस तरह छोड़ती हैं कि फिल्म पूरी तरह विद्यामय हो जाती है। कुल मिलाकर ये फिल्म विद्या बालन के परफॉरमेंस के लिए देखी जा सकती है। लगभग दर्जन भर महत्वपूर्ण किरदारों के बीच विद्या अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठतम ढंग से दर्ज कराती हैं।

फिल्म अपने कथानक की ताजगी के साथ बेहद कसी हुई स्क्रिप्ट में दिखती है।

बेगम जान 1947 में देश विभाजन के कई मार्मिक पल हमारे सामने लाती है। इन्हीं में एक भारत-पाकिस्तान को बांटने वाली रेडक्लिफ रेखा के खींचे जाने का मामला है।

बेगम जान के वे दृश्य और संवाद चौंकाते हैं जो नग्न सचाइयों को छुपाने वाले परदों को तार-तार कर देते हैं। इनमें स्त्री पुरुष संबंध, धर्म-जाति की ऊंच-नीच, लोगों को हिंदू-मुसलमान बता कर फैलाई जाने वाली नफरत जैसे विषय शामिल हैं।

गौहर खान और पल्लवी शारदा के हिस्से भी कुछ अच्छे दृश्य हैं। आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर और विवेक मुश्रान अपनी भूमिकाओं को साधे रहते हैं। चंकी पांडे अपने लुक से चौंकाते हैं।

श्रीजीत मुखर्जी ने राजकहिनी की मूलकथा, उसके फिल्मांकन और संवादों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की। परंतु एक बड़ा बदलाव किया। राजकाहिनी दुनिया के प्रत्येक रिफ्यूजी को समर्पित फिल्म थी।

उसका दायरा वैश्विक था। जबकि हिंदी में कहानी को 2016 की दिल्ली में रेप की कोशिश की एक घटना से शुरू किया गया है।

महेश भट्ट की स्त्री-पुरुष और हिंदू-मुस्लिम फिलॉसफी की छाप बेगम जान पर खूब है। इस तरह श्रीजीत पर हिंदी संस्करण में निर्माता का हस्तक्षेप दिखता है। इसके बावजूद हिंदी के दर्शकों के लिए बेगम जान एक अलग अनुभव साबित हो सकती है।

हालांकि पाकिस्तान की दुखती रग पर हाथ रखने वाली ये फिल्म वहां रिलीज नहीं हो रही है लेकिन नई पीढ़ी को ये फिल्म बहुत कुछ बताती है।

 

 

लंदन फैशन वीक में चला कोलकाता की निशा का जादू

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जिस ब्रिटिश हूकूमत ने इस देश पर राज किया हो, वहाँ जाकर अपने हुनर से अँग्रेजों का दिल जीत लेना आसान नहीं है मगर कोलकाता की निशा सिंह ने यह कर दिखाया। लंदन फैशन वीक में अपने कलेक्शन से सबका दिल जीत लेने वाली निशा आईएनआईएफडी की छात्रा है।

ब्रिटेन की प्रतिष्ठित पत्रिका वोग में उनका कलेक्शन फीचर किया गया। निशा कोलकाता की पहली डिजाइनर है जिसने लंदन फैशन वीक के फैशन स्काउट में अपनी प्रतिभा दिखायी। निशा को इस कलेक्शन की प्रेरणा ब्रिटेन में स्थित ऐसे सँग्रहालय से मिली जहाँ भारतीय कला और फैशन का खजाना है मगर उसे सामने नहीं आने दिया गया।

निशा का कलेक्शन भारतीय टेक्सटाइल की परम्परा को दिखाता है जिसमें ग्रामीण कला की झलक है। कलेक्शन में कपड़ा, डेनिम, लेदर, सिल्क, ब्रोकेड, मेटालिक, और काँथा का इस्तेमाल खूबसूरती से किया गया है। लंदन में मिली सराहना से निशा का उत्साह चरम पर है और वे अपने काम को और बेहतर बनाने में जुट गयी हैं।

बीमा क्षेत्र की कम्पनी का सर्वेक्षण – बेहतर बीमा सलाहकार होती हैं महिलाएं

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बिरला सन लाइफ इन्श्योरेंस के एक हालिया सर्वेक्षण से सिद्ध हुआ है कि महिला सलाहकार पुरुष सलाहकारों से ज्यादा उत्पादक होती हैं। अनुसन्धान से पता चला है कि डायरेक्ट सेल्स फ़ोर्स सलाहकारों का एक चौथाई हिस्सा महिलाओं का है। दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्रों में एक तिहाई सलाहकार महिलायें हैं। उनकी उपलब्धियों को लेकर नोट किया गया हैकि शीर्ष 100 में से 50% और शीर्ष 200 सलाहकारों में 40% महिलायें हैं। पश्चिम बंगाल में बीएसएलआई के कुल सलाहकारों में से 25% महिलायें हैं, राज्य में अर्जित प्रीमियम में जिनका योगदान 33% है। कोलकाता के लिये, अभी 30% सलाहकार महिलायें हैं, वे पूरे शहर मे होने वाले अर्जित प्रीमियम में करीब 37% का योगदान करती हैं। यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर है और उनमें सफल सलाहकार होने की खासी संभावनाएं हैं।

आदित्य बिरला फाइनेंशियल सर्विसेज ग्रुप की जीवन बीमा शाखा बिरला सन लाइफ इन्श्योरेंस ने भारत में महिलाओं को शिक्षित करने, उनका सशक्तिकरण करने और उन्हें रोज़गार मुहैया कराने का एक अनोखा देशव्यापी अभियान ‘स्वाभिमान’ शुरू किया है। अभियान के दूसरे अध्याय की शुरुआत कोलकाता में की गयी जिसमें समाज के विभिन्न तबकों की महिलाओं नेहिस्सा लिया। ‘स्वाभिमान’ ने महिलाओं को लाइफ इन्शुरन्स एडवाइजर/प्रोटेक्शन काउंसेलर के करियर अवसर के बारे में बताया, जिसका उद्देश्य कोलकाता में महिला सलाहकारों की मज़बूत टीम बनाना था।

बीमा पॉलिसियाँ बेचने का अर्थ है बीमा कराने वाले परिवार को सुरक्षा और देखरेख का तोहफा देना। सुरक्षा और देखरेख हर महिला के व्यक्तित्व के अन्तर्निहित तत्त्व हैं। इसलिए एक जीवन बीमा सलाहकार का करियर सही मायने में महिला को अपने प्राकृतिक स्वभाव को पेश करने का मौका देता है। बिरला सन लाइफ इन्श्योरेंस उन सभी महिलाओं को जिनके पास सफल सलाहकार बनने का समय है, अवसरों का नया संसार दे रहा है। एक महिला के लिए सलाहकार/रक्षा सलाहकार बनने का अर्थ है वित्तीय स्वतंत्रता के नए द्वार खुलना, काफी कुछ नया सीखने को मिलना और साथ ही नयी पहचान मिलना। एक सलाहकार के रूप में एक महिला न सिर्फ अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर पाएगी बल्कि अपने मित्रों, परिवार और सहयोगियों को वित्तीय योजना सलाह देकर उनकी जिंदगियों को  भी बदल सकेंगी।

लांच के अवसर पर बिरला सन लाइफ इन्शुरन्स के मुख्य बीमांकिक अधिकारी अनिल सिंह ने कहा, “बिरला सन लाइफ इन्शुरन्स में हमारा विश्वास अपने ग्राहकों की काउन्सलिंग और सुरक्षा में है। इसी दर्शन को आगे बढाते हुए हमने स्वाभिमान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को प्रोटेक्शन काउंसेलर के रूप में करियर शुरू करने का अवसर देना है। हमारी कोशिश भारतीय महिलाओं को अधिक आत्म-निर्भर बनाना और अपने परिवारों की आय में योगदान करने में मदद करना है। इस अभियान के जरिये हमारा उद्देश्य महिलाओं की प्रतिभा का उपयोग कर अपनी सेल्स फ़ोर्स को मज़बूत करना और उत्पादकता बढ़ाना है।” सलाहकार के रूप में चुने जाने के बाद महिलाओं को विस्तृत उत्पाद प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वह ज़रुरत आधारित बिक्री कर सकें और ग्राहक को सही विकल्प सुझा सकें। इससे उन्हें जहाँ मित्रों और परिवारों को वित्तीय योजना मुहैया कराने का मौका मिलेगा, उन महिलाओं को एक लचीला और लम्बे समय तक चलने वाला करियर भी मिलेगा। एक उद्यमी के रूप में उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार कार्य घंटे तय करने के मौके के साथ अपने परिवार की आय बढाने का अवसर देगा और अपना घर चलाने के लिए पर्याप्त समय भी उनके पास रहेगा।

 

 विद्यासागर विश्वविद्यालय में राहुल सांकृत्यायन जयंती

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विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से राहुल सांकृत्यायन के 125वीं जयंती के अवसर पर राहुल सांकृत्यायन का सृजन:एक मूल्यांकन विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन विभागीय कक्ष में किया गया। सुजाता सिंह ने उद्घाटन गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन का साहित्य बहुआयामी और भारतीयता का साहित्य है, राहुल जीवन भर सामंती व्यवस्था से टकराते रहे। संजय जायसवाल ने कहा कि राहुल धर्म के विकृत रूप का विरोध करते हैं। उनका मानना है कि हमें सामाजिक समस्याओं का सामना करना होगा तभी अपेक्षित बदलाव संभव है। इस अवसर पर विभाग की छात्रा बरखा देवी ने अपना विचार रखा तथा उपस्थित विद्यार्थियों ने संवाद सत्र में हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन संजय जायसवाल और धन्यवाद ज्ञापन विशाल गुप्ता ने दिया।

सम्मानित किए गए भारतीय भाषा परिषद के नवनियुक्त निदेशक डॉ. शम्भुनाथ

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हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व-प्रोफेसर और अध्यक्ष डॉ. शंभुनाथ ने भारतीय भाषा परिषद के निदेशक का पद भार ग्रहण कर लिया। इस अवसर पर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से उनको सम्मानित किया गया।  भारतीय भाषा परिषद के सहयोग से आयोजित मिशन के वार्षिक मिलनोत्सव में संगीतकार ओमप्रकाश मिश्र ने कबीर से शुरू कर निराला, प्रसाद, कैफी आजमी, त्रिलोचन, जावेद अख्तर आदि के गीतों एवं गजलों का गायन करके समां बांध दिया। इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक प्रो.शंभुनाथ ने ‘आज का समय – मानवता का संरक्षण’ विषय पर बोलते हुए कहा ‘अम्बेडकर के नेतृत्व में निर्मित संविधान दुनिया की मानवता का श्रेष्ठतम निचोड़ है, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए। यह बात उन्होनें अम्बेडकर जयंती के अवसर पर कही। दो सौ साल पहले बंगाल से ही नये जागरण की शुरुआत हुई थी। नई चुनौतियों के दौर में पुनः राष्ट्रीय जागरण और हिंदी के संदर्भ में बंगाल को एक नई भूमिका का निर्वाह करना है। इस अवसर पर प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि हम लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल सत्य के चेतना वाहक के रूप में करेंगे जबकि हमलोग आज झूठ के मालवाहक बनाए जा रहे हैं। इस अवसर पर श्रव्य-दृश्य माध्यम से सी.डी. बनाने की योजना सामने रखी। संस्था के महासचिव ने स्वागत भाषण एवं कालीप्रसाद जायसवाल ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। डॉ. शंभुनाथ के पहले प्रभाकर माचवे, पांडुरंग राव, प्रभाकर श्रोत्रिय, रवींद्र कालिया आदि इस पद पर रह चुके हैं। डॉ. शंभुनाथ ने हाल में परिषद में 10 खंडों में प्रकाश्य 5000 से अधिक पृष्ठों के हिंदी साहित्य ज्ञानकोश का संपादन संपन्न किया है।  भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी संस्थान में निदेशक के रूप में तीन साल के अपने कार्यकाल में डॉ. शंभुनाथ ने अफगानिस्तान जाकर जलालाबाद और काबुल विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खोलने, नगालैंड में सभी स्कूलों में द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी की पढ़ाई शुरू कराने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य किए थे। शंभुनाथ के ही प्रयास से ही हिंदी की 55 लघु पत्रिकाओं को वार्षिक सरकारी अनुदान दिया जाना शुरू हुआ था। भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने उन्हें अपनी शुभकामनाएं देते हुए आशा व्यक्त की कि डॉ. शंभुनाथ अपने कार्य काल में परिषद को नई ऊंचाइयों की ओर ले जाएंगें।

 

आजादी के इतिहास की मार्मिक घटना का साक्षी जलिया वालां बाग़

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आज से करीब 98 वर्ष पूर्व अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास स्थित जलियांवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने निहत्थे, शांत बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को गोलियां चला के मार डाला था.भारत की आजादी के इतिहास में सबसे मार्मिक घटना है, जो बैसाखी के दिन घटित हुई, हांलांकि इस कांड को करने वाला जर्नल डायर  हंटर कमीशन की रिपोर्ट में  दोषी पाया गया और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया।

1- बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में रोलेट एक्ट, अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों व दो नेताओं सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में एक सभा रखी थी।

2- लोग रोलेट एक्ट का विरोध न कर पाए इसलिए अंग्रेजो ने शहर में कर्फ्यू लगा दिया था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे।

3– करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे थे। ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी परिस्थिति लग रही थी।

4– जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों के साथे बाग को घेर कर लिया और बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं।

5– बताया जाता है कि 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया।

6– जिस वक्त जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर गोलियां चल रही थीं, उस दौरान वहां खड़े उधमसिंह ने देशवासियों के रक्त से रंगी धरती देखी तो जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की थी।

7- अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर को गोली चला के मार डाला।

8- जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यु ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया।

9- हंटर कमीशन की रिपोर्ट में डायर को दोषी पाया गया और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया।

10- एक ओर जहां ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर का निंदा प्रस्ताव पारित किया तो दूसरी ओर हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया।

(साभार – पल पल इंडिया)

सूट या फॉर्मल कपड़े सिलवा रहे हैं तो ध्यान रखें

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यह सही है कि लड़कियाँ अपने कपड़ों को लेकर जितनी सजग हैं, लड़के नहीं होते मगर अब वे इन बातों पर ध्यान दे रहे हैं। हमारी फिल्मों का इस दिशा में बड़ा योगदान है। मुमकिन है कि आप भी अपने पसंदीदा नायक की छवि को ध्यान में रखकर कपड़े सिलवाते हैं और वह आपकी अपनी पसन्द है मगर हमारा सुझाव यह है कि आपको कपड़े खरीदते या सिलवाते वक्त अपनी छवि को ध्यान में रखना चाहिए। खासकर किसी शादी या पार्टी में सूट सिलवा रहे हैं तो ध्यान और ज्यादा दीजिए क्योंकि ये महँगे होते हैं और आप इसे किसी खास मौके पर ही पहनने जा रहे हैं। इसके अलावा सूट या फॉर्मल कपड़े सिलवाना बहुत महँगा भी होता है इसलिए कुछ बातों का ध्यान तो रखना ही चाहिए

1.कोट (जैकेट) में अहम है लेपल. ध्यान रहे आपकी टाई और लेपल की चैड़ाई बराबर हो।

2.आमतौर पर जैकेट में थिन लेपल, मॉर्डन और फैशनेबल माने जाते हैं और चौड़े लेपल ओल्ड फैशन।

3.सूट में पॉकेट स्क्वायर आपके सूट को पूरा करने के साथ-साथ उसको खूबसूरती और ग्रेस भी देता है। ध्यान रहे, पॉकेट स्क्वेयर आपकी टाई और सूट के कपड़े के टेक्सचर से मिलता जुलता न हो।

4. जब भी आप रेडीमेड सूट खरीदें तो सबसे ज्यादा जरूरी है शोल्डर की फिटिंग। सूट का कंधा बराबर फिटिंग का होना चाहिए

5. आपके कोट के लेपल और शर्ट के कॉलर का गेप साफ-साफ जाहिर करता है कि आपके सूट की फिटिंग खराब है। शर्ट के कॉलर और लैपल का अंतर सटीक होना चाहिए।

6.ब्लैक और चारकोल ब्लेक, ग्रे-कलर सूट फैशन में है।

7.सूट के साथ आपका बेल्ट बहुत चौड़ा न होकर फेयर और पतला होना चाहिए और आपके शूज आपके सूट के कलर कॉम्बिनेशन में हों।

8.कोट के बैक में डबल स्ल्टि पैटर्न मॉर्डन फैशन को जाहिर करता है।

9.कैजुअल, फॉर्मल हो या ट्रेंडी लुक हो उस सिंगल या डबल बटन के साथ पीक-लेपल जैकेट अप-टू-डेट फैशन है।

10.एक्सपेरिमेंटल लोगों के लिए फैशन के कई रूल्स लागू नहीं होते, लेकिन फाॅर्मल कार्पोरेट फैशन में सारी दुनिया में नियम होते हैं।

 

(साभार – फैशन 101)