Friday, March 27, 2026
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महिला हो या पुरुष, जो अच्छा करेगा, वही आगे बढ़ेगा

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महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और ज्योतिष ऐसा ही क्षेत्र है जहाँ महिलाएँ कम हैं। ऐसे में ज्योतिष को अपना कार्यक्षेत्र बना लेना आसान नहीं है बल्कि जोखिम भरा कदम है मगर जिसके लिए काम जुनून हो, उसके लिए सब आसान है। इस मुश्किल फैसले को श्रद्धा गुप्ता ने आसानी से लिया और सफलता की ओर बढ़ रही हैं। अपराजिता ने वैदिक ज्योतिषविद् श्रद्धा गुप्ता से बातचीत की, पेश हैं प्रमुख अंश –

ज्योतिष मेरे खून में है

ज्योतिष मेरे खून  में है, मेरी आत्मा में बसा है। दरअसल, मेरे नाना – मामा ज्योतिषी हैं। छुट्टियों में जब मैं नानी के घर जाती थी, वहाँ अपने नाना – मामा को दूसरों का भविष्य बताते देखती थी। इससे मेरे मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि किसी व्यक्ति के जीवन का पूरा चित्रण कुण्डली (जन्म पत्रिका) द्वारा बताया जा सकता है। यह बात जानने के बाद ज्योतिष शास्त्र सीखना मेरा सपना बन गया। मैंने अपनी पूरी पढ़ाई कोलकाता से की है। मुझे अमेरिका से स्कॉलरशिप भी मिली है। मैंने जे आई ए (जेमोलॉजिकल इंस्टिट्यूट ऑफ अमेरिका) से स्नातक किया है। पिछले 7 सालों में मैंने इस विद्या का गूढ़ अध्ययन किया है और अब कह सकती हूँ कि मैं निपुण हूँ।

मुझमें एक शक्ति है, जो ईश्वर ने मुझे दी है

मेरा सपना जुनून में बदला जब मेरा स्वास्थ्य नाजुक था। अपने स्वास्थ्य पर प्रकृति का प्रतिकूल प्रभाव देखकर ये जानने की इच्छा हुई कि संसार में हर व्यक्ति पर प्रकृति का प्रभाव अलग – अलग कैसे पड़ता है, कहीं न कहीं इसका सम्बन्ध व्यक्ति के जन्म के समय ब्रम्हाण्ड में फैले ग्रहों से है। जब व्यक्ति जन्म लेता है, उस समय जो ग्रह रहते हैं, उनके प्रभाव से व्यक्ति के पूर्ण जीवन की रचना होती है। इन ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन के हर पहलू पर पड़ता है। स्वास्थ्य भी इसका एक पक्ष है। मुझे अपनी खोज में सफलता मिली और मेरा विश्वास ज्योतिष में प्रगाढ़ हो गया। मैंने ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करना आरम्भ किया और मुझे सफलता मिली। मैं किसी व्यक्ति को देखकर कुछ हद तक उसके बारे में परिकल्पना कर सकती हूँ, मुझमें एक शक्ति है, जो ईश्वर से मुझे मिली है।

अब तक जो भी गणना की, सत्य हुई

मैं इस क्षेत्र में पिछले 7 साल से हूँ। आज तक जो भी गणना की, सत्य हुई। मेरे गुरु योगी आनंद सिंह जी ने मेरे ज्ञान को और भी निखारा। कभी कोई प्रचार या विज्ञापन नहीं किया, लोगों ने ही प्रसार किया। बंगाल ही नहीं, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेशन आदि राज्यों के लोग मुझे अपनी जन्म पत्रिका दिखाते हैं, विदेशों से भी लोग अपनी जन्म पत्रिका भेजकर अपना वर्तमान और भविष्य जानने की इच्छा रखते हैं। मैं उनके प्रश्नों के उत्तर देती हूँ और कठिनाई होने पर वार्तालाप भी करती हूँ। रत्नों की जानकारी अच्छी है। जन्म पत्रिका देखकर रत्नों की आवश्यकता पड़ने पर उचित रत्न बताती हूँ।

मेरे पिता ही मेरी प्रेरणा हैं

मेरी प्रेरणा मेरे पिता हैं। उन्होंने मुझ पर विश्वास किया। मुझे हिम्मत और हौसला दिया। कभी ये नहीं कहा कि मुझसे यह नहीं हो पाएगा। जब टूटती थी तो मुझे प्रेरित करते रहे और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। परिवार का पूरा सहयोग मुझे मिला है।

निडर होकर आगे बढ़ें और अपना मुकाम हासिल करें

21वीं सदी में महिलाएँ और पुरुष बराबर हैं। जो लोग यह  सोचते हैं कि महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग – अलग कार्यक्षेत्र निर्धारित हैं, भूल करते हैं। महिला हो या पुरुष, जो अच्छा करेगा, वही आगे बढ़ेगा। महिलाओं को निडर होकर अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए। महिला होने पर गर्व करें। ईमानदारी और काम के प्रति निष्ठा महिलाओं की सफलता का प्रमुख स्त्रोत है। अपने सपने को मरने न दें, उसके लिए मेहनत करते रहें। निडर होकर आगे बढ़ें और अपना मुकाम हासिल करें।

 

कर सुधार में क्रांति ला रहे हैं, संवेदना में भी लाइए

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सुधार लाना आसान नहीं होता और सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना तो और भी मुश्किल है। 30 जून की आधी रात को गुड एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी ने इस देश में कदम रख दिया। हमारे देश में आजादी भी आधी रात ही आई थी मगर हम अभी भी कैद में हैं। हम कैद हैं लिजलिजी विचारधाराओं में। घटनाओं को एक खास चश्मे से देखने की आदत है हमको। हैरत की बात है कि जिस यूपीए के शासनकाल में जीएसटी की आधारशिला रखी गयी, वह काँग्रेस मध्यरात्रि के विशेष सत्र से गायब रही। जो भाजपा जीएसटी का विरोध करती आ रही थी, आज उसी ने इस ऐतिहासिक कर प्रणाली को लागू करवाया। देश में आर्थिक उदारता की नींव काँग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रखी थी मगर राजनीतिक वफादारी ने इस  उदार अर्थशास्त्री को भी ऐतिहासिक क्षण का गवाह नहीं बनने दिया। पी. वी. नरसिंहा राव को काँग्रेस की परिवारवादी राजनीति ने हाशिए पर डाल दिया।

यह राजनीति की ही नहीं इस देश के इतिहास की भी विडम्बना है जहाँ हिंसा को एक खास धार्मिक चश्मे से देखा जा रहा है और इस भयावह सत्य यह है कि इसमें लेखकों और बुद्धिजीवियों की भागीदारी है जो विरोध भी चुनकर करते हैं। हिंसा और कविता, दोनों हिन्दू और मुसलमान के खेमों में बँट गयी है। हिंसा को किसी भी रूप में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता मगर आज यही हो रहा है। हिन्दू और मुसलमान, दोनों हिंसा का बचाव कर रहे हैं। एक खास वर्ग पर हमारे कवि मेहरबान हैं और उन्होंने कविता में धार्मिक रंग भरने शुरू कर दिए हैं। जाहिर है कि इस तरह की प्रवृति समाज में विभाजन और अंसतोष पैदा करेगी, खाई और गहरी होगी और इन सबके लिए सस्ती लोकप्रियता का शौक रखने वाला साहित्य जिम्मेदार होगा। खून और अपराध का धर्म देखना बंद कीजिए और ये भी जरूरी है कि कोई भी समुदाय हो, अपनी गलतियों को मानना और सुधारना शुरू कर दे। भीड़ का कोई मजहब नहीं होता इसलिए इन मार्मिक हत्याओं को मजहबी रंग देना बंद किया जाना चाहिए। जीएसटी लागू हो गया है मगर इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और सटीक कार्य प्रणाली की जरूरत है और यह सरकार के लिए चुनौती है। अब समान नागरिक संहिता की माँग भी जोर पकड़ सकती है। एक देश, एक कानून की माँग और तेज होगी यानी एक और सुधार और एक नयी क्रांति…इंतजार है। कर सुधार में क्रांति ला रहे हैं, संवेदना में भी लाइए तभी भारत नया बनेगा।

मिताली राज ने महिला क्रिकेट में बनाया नया विश्व कीर्तिमान

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भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विमेंस वर्ल्ड कप में मेजबान इंग्लैंड के खिलाफ अपने अभियान की शानदार शुरुआत की है। पहले बल्लेबाजी करते हुए भारतीय महिला टीम ने स्मृति मंधाना (90), पूनम राउत (86) और कप्तान मिताली राज (71) की बेहतरीन अर्धशतकीय पारियों की बदौलत मेजबान इंग्लैंड ये अपना पहला मैच जीत लिया।

लगातार 7 पारियों में 50+स्कोर बनाने का रिकॉर्ड 
इंग्लैंड के खिलाफ मिताली राज ने 71 रनों की पारी खेल कर नया विश्व कीर्तिमान अपने नाम कर लिया है। बेहतरीन फॉर्म में चल रही मिताली, विमेंस वनडे क्रिकेट के इतिहास में लगातार सात अर्द्धशतक लगाने वाली पहली महिला बल्लेबाज बन गई हैं। मेजबान इंग्लैंड के खिलाफ 45वें ओवर की पांचवीं गेंद पर चौका लगाकार मिताली ने ये वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किया है

 ऐसा करने वाली दुनिया की पहली महिला क्रिकेटर 
मिताली राज ने अपनी लगातार 7 वनडे पारियों में 70*, 64, 73*, 51*, 54, 62* और 71 रनों की पारी खेलकर विमेंस क्रिकेट में 7 बार 50+ स्कोर बनाने का रिकॉर्ड बनाया है। मिताली से पहले तीन बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया की लिंडसे रीलर, इंग्लैंड की शार्ले एडवर्ड और ऑस्ट्रेलिया की एलिस पेरी ने वनडे क्रिकेट की लगातार छह पारियों में अर्द्धशतक लगाया था।

श्रीलंका से लेकर इंग्लैंड तक, नहीं रुकीं मिताली 
मिताली ने इस रिकॉर्ड की शुरुआत श्रीलंका के खिलाफ की थी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दूसरा अर्द्धशतक लगाया। मिताली ने बांग्लादेश के खिलाफ लगातार तीसरी पारी में अर्द्धशतक लगाया और फिर साउथ अफ्रीका के खिलाफ लगातार तीन अर्द्धशतक पूरा कर रिकॉर्ड की बराबरी की लेकिन अब इंग्लैंड के खिलाफ अपनी 71 रनों की पारी के साथ उन्होंने नया वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है।

स्मृति ईरानी ने विश्व के सबसे बड़े कुशन का अनावरण किया

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नयी दिल्ली : केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने आज यहां आयोजित एक प्रदर्शनी में विश्व के सबसे बड़े कुशन का अनावरण किया।  हीमटेक्सिल इंडिया फेयर के उद्घाटन के अवसर पर स्मृति ने कहा कि इस साल भारत में घरेलू कपड़ा कारोबार ने देश के समग्र वैश्विक नौवहन में 12 प्रतिशत का योगदान दिया है।
उन्होंने कहा कि मेसी फैंकफर्ट इंडिया द्वारा आयोजित इस पहल में इस साल प्रदर्शकों की संख्या में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। यह इजाफा भारतीय कारोबारों के नए उद्यमों के साथ आ सकने की क्षमता और देश के उपभोक्ताओं एवं खरीददारों की पसंद को दर्शाता है।

भारत 30 जून को गांधीनगर में अब तक का सबसे बड़ा वस्त्र मेला आयोजिए करने के लिए तैयार है।
हीमटेक्सिल इंडिया और एंबीएंटे इंडिया 2017 फेयर में भारत, बांग्लादेश, चीन, कोरिया, थाईलैंड और नेपाल की कुल 180 कंपनियां भागीदारी कर रही हैं।

शादी के बाद इसलिए मोटे हो जाते हैं पुरुष

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आपने कई पुरुषों को देखा होगा कि शादी के कुछ दिनों बाद वो मोटे नजर आते हैं। एक नई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि शादी के बाद सच में पुरुष मोटे हो जाते हैं।

सोशल साइंस एंड मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि सिंगल रहने वाले लोग शादी करने वालों की तुलना में अधिक फिट रहते हैं। इंग्लैंड में यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के जोआना सीरडा ने कहा, ‘व्यक्तियों के लिए यह समझना जरूरी है कि वजन बढ़ने के लिए कौन-से सामाजिक कारक हैं, खासकर आम लोगों में जैसा कि शादी या अभिभावक, ताकि वे अपने स्वास्थ्य और कल्याण के बारे में उचित निर्णय ले सकें। अध्ययन से पता चलता है कि ऐसे विवाहित पुरुष जो, बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के बढ़ने से बचना चाहते हैं, उन्हें अपने व्यवहार और खाने की आदतों का ध्यान रखना चाहिए।

सीरडा ने कहा, ‘मोटापे के बारे में बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं को देखते हुए वजन में होने वाले उतार-चढ़ाव के वैज्ञानिक कारकों के बारे में जानना महत्वपूर्ण है।’ शोधकर्ताओं ने 1999 से 2013 के कपल्स को इस शोध में शामिल किया। उन्होंने पाया कि शादीशुदा लोगों का बीएमआई गैर-विवाहित लोगों से अधिक था, जो कि पैमाने पर लगभग 1.4 किलोग्राम है। अगर उनकी पत्नी गर्भवती हो जाती है, तो उनके बीएमआई पर कोई फर्क नहीं पड़ता है लेकिन बच्चा होने से पहले उनका वजन तेजी से बढ़ता है।

अध्ययन इस सिद्धांत का समर्थन करता है कि विवाह के बाद लोग खानेपीने की चीजों से अधिक जुड़ जाते हैं। सबसे बड़ी बात उन्हें नियमित रूप से भोजन मिलने लगता है।

कबाड़ से शहर को सजा रही हैं बनारस की शिखा शाह

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बनारस में स्क्रैपशाला जैसे अनोखे स्टार्टअप से शहर की तस्वीर बदलने वाली 27 वर्षीय शिखा शाह का कहना है, कि ‘मोदी के स्टार्टअप इंडिया के विज़न ने भारत के शहर से लेकर गांव में रहने वालें लोगों की सोच को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।’

शिखा को प्रकृति से बहुत प्यार है। उन्होंने दिल्ली में एन्वायरमेंटल साइंस से ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी शुरू कर दी थी। नौकरी के दौरान तमाम स्थानों पर कई प्रोजेक्ट्स पर काम के समय उन्होंने एन्वायरमेंट के प्रति लोगों की संवेदनहीनता को देखा। तभी से उन्होंने ठान लिया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे व्यापार भी हो सके और ज़रूरतमंदों को नौकरी भी मिल सके, साथ ही अपने स्टार्टअप के माध्यम से समाज को स्वच्छता का संदेश भी दिया जा सके।

सबसे पहले शिखा ने अपने घर के कबाड़ से इस मिशन की शुरूआत की, फिर उसके बाद नगर निगम में आने वाले कबाड़ को लेना शुरू कर दिया और कबाड़ के सामान को कांट-छांटकर खूबसूरत चीजें तैयार करने लगीं।

शिखा ने अच्छी-खासी सैलरी की नौकरी को छोड़कर अपना स्टार्टअप स्क्रैपशाला शुरू किया है। शिखा बताती हैं, कि उन्होंने सबसे पहले अपने घर के कबाड़ से इस मिशन को शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने नगर निगम में आने वाले कबाड़ को लेना शुरू किया और कबाड़ के सामान को कांट-छांटकर खूबसूरत चीजें तैयार करने लगीं। इतने सुंदर क्राफ्ट्स, जिन्हें देख कर किसी को भरोसा ही नहीं होता है, कि कबाड़ से भी इतने खूबसूरत और उपयोगी सामान बनाये जा सकते हैं। शिखा का व्यापार अब बढ़ने लगा है। वो अब अपनी वर्कशाप के लिए बड़ी जगह तलाश रही हैं।

स्क्रैपशाला के माध्यम से ज़रूरतमंदों को मिल रहा है रोजगार

शिखा की योजना है कि कबाड़ से बनी चीजों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए शहर में तमाम स्थानों पर अपना आउटलेट खोलेंगी। शिखा ये हुनर दूसरों को सैलरी देकर सिखाती हैं। शिखा अपने सपने और समाज को संदेश देने के इरादे में काफी हद तक सफल भी हो चुकी हैं। वे दो साल पहले बिना किसी की मदद के ही नगर निगम के बेकार पड़े कबाड़ को बीस हजार में खरीदकर काशी को सवांरने के साथ ही स्वच्छता का संदेश देने की राह पर अकेले ही निकल पड़ी थीं। आज शिखा के पीछे कारवां सा बनता जा रहा है और उन्होंने अपनी प्रतिभा, लगन और मेहनत से आधा दर्जन से ज्यादा बेरोजगार हुनरमंदों को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है।

शहर में बना स्क्रैपशाला आज उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो अपने घर के कबाड़ को या तो बेच दिया करते हैं या फिर सड़क पर फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि इस कबाड़ से भी लाखों का व्यवसाय किया जा सकता हैं।

शिखा अब ये हुनर और भी कारीगरों को सिखा रही हैं और बाकायदा 15 से 20 हजार रुपये की सैलरी भी दे रही हैं। साथ में काम करने वाले कारीगर भी काफी खुश हैं। उनका कहना है कि यहाँ रोज काम मिल जाता है। ऐसे में परिवार का खर्च चलाना अब आसान हो गया हैं।शहर में बना स्क्रैपशाला आज उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो अपने घर के कबाड़ को या तो बेच दिया करते हैं या फिर सड़क पर फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि इस कबाड़ से भी लाखों का व्यवसाय किया जा सकता हैं।

आज के समय में शिखा जैसे युवाओं की जरूरत है, जो अपने भविष्य को चमकाने के साथ-साथ समाज को बेहतर बनाने के रास्ते भी तलाश रही हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

मेट्रो में पहली बार ट्रांसजेंडरों को नौकरी

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कोच्चि मेट्रो में 23 ट्रांसजेंडरों को नियुक्ति मिली है। मेट्रो में ट्रांसजेंडर्स को उनकी योग्यता के मुताबिक हाउस कीपिंग, टिकट काउंटर जैसे अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। देश में संभवत: पहली बार सरकार के तहत काम करने वाली एक कंपनी इतनी बड़ी संख्या में थर्ड जेंडर के लोगों को नौकरी मिली है। इसके अलावा कोच्चि मेट्रो में 1000 महिलाओं की भी नियुक्ति हुई है। मेट्रो का संचालन मोटे तौर पर महिलाओं के ही हाथ में होगा।

केरल मेट्रो रेल लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एलियास जॉर्ज ने बताया, ‘ट्रांसजेंडर लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए ये प्रयास किया जा रहा है। हमें उम्मीद है कि हमारी पहली कोशिश सफल होगी। हम ये भी मान रहे हैं कि इससे बाकी कंपनियों को भी प्रेरणा मिलेगी और ऐसे लोगों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा।’

इन ट्रांसजेंडर्स को यूं ही नौकरी पर नहीं रखा गया है। इन्हें बकायदा लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद ही नौकरी दी गई है। मेट्रो के अधिकारियों के मुताबिक अभी ये ट्रेनिंग से गुजर रहे हैं। अगर इनकी परफॉर्मेंस अच्छी रही, तो बाकी के ट्रांसजेंडर को नौकरी का मौका मिलेगा।

केरल में करीब 30,000 ट्रांसजेंडर्स रहते है। साल 2015 में केरल ने ट्रांसजेंडर्स के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए ट्रांसजेंडर पॉलिसी की शुरूआत हुई थी। ट्रांसजेंडर पॉलिसी बनाने वाला केरल, भारत का पहला राज्य है। केरल सरकार ने इस पॉलिसी के अंतर्गत ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को रोजगार और उनकी सुरक्षा का वादा किया था। इसके अलावा 2016 में सरकार ने 60 साल से अधिक उम्र वाले ट्रांसजेंडर्स के लिए पेंशन स्कीम भी लागू की है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 89 प्रतिशत ट्रांसजेंडर्स के साथ काम के दौरान छेड़छाड़ या गलत व्यवहार होता है। वहीं 28 फीसदी ट्रांसजेंडर्स का मानना है, कि उनके दोस्त ही ऐसा काम करते हैं।

नौकरी पाने वाली एक ट्रांसजेंडर चित्रा ने कहा, कि ‘हम काम करने के लिए बहुत उत्साहित हैं। हम उम्मीद करते हैं कि बाकी कंपनियों में भी हमारे लिए दरवाजे खुलेंगे।’

 

 

दीया बनीं वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की ब्रांड एंबेसडर

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दीया मिर्जा की शख्सियत जितनी सुंदर है उतना ही सुंदर दिल भी है। दीया ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़ी रही हैं लेकिन  लगातार सामाजिक सरोकारों से जुड़़ी रहती हैं, उन पर बातें करती रहती हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए दीया की आवाज हमेशा मुखर रही है। उनका टीवी शो ‘सोल ऑफ गंगा’ काफी संवेदनशील और प्यारे संदेशों से भरा रहता था। अब दीया मिर्जा को वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया गया है। विश्व पर्यावरण दिवस यानि 5 जून को उन्हें ये गौरवपूर्ण जानकारी दी गई है। भारत में प्रकृति संरक्षण की प्रबल प्रवक्ता के रूप में कार्य कर रहीं दीया ने अपनी प्रसिद्धि के जरिए व्यापक और मुख्यधारा से जुड़े लोगों के सामने संरक्षण के मुद्दों को लाने का काम किया है। वह कई निर्णायक पर्यावरण और मानवतावादी अभियानों का चेहरा रही हैं। उन्हें पिछले साल स्वच्छ भारत मिशन के ‘स्वच्छ साथी’ कार्यक्रम का एंबेसडर भी बनाया गया था। डब्ल्यूटीआई के मुताबिक, दीया ने कई सालों से डब्ल्यूटीआई के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों का समर्थन किया है। वह संगठन के क्लब नेचर इनिशियेटिव की संस्थापक सदस्य हैं। इस खास मौके पर दीया ने कहा कि ‘मुझे इस टीम का हिस्सा बनने पर गर्व है, जो भारत की प्राकृतिक विरासत की सुरक्षा कर रही है। मैं डब्ल्यूटीआई के वन्यजीवों और इनके पर्यावास के संरक्षण मिशन और अलग-अलग वन्यजीवों के कल्याण के लिए समुदायों और सरकारों के साथ साझेदारी में काम करने की प्रशंसा करती हूं। एक ब्रांड एंबेसडर के रूप में मैं डब्ल्यूटीआई के अगले महत्वपूर्ण राष्ट्रव्यापी अभियान के संदेश को लॉन्च करने और आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हूं, जहां हम गज यात्रा के माध्यम से भारत के शक्तिशाली हाथियों के लिए जश्न मनाएंगे।’

एक भक्त के लिए रूक जाता है भगवान जगन्नाथ का रथ

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प्रभु जगन्नाथ को भक्तों का भगवान कहा जाता है। जब-जब भक्तों ने भक्ति से पुकारा भगवान उस के साथ खड़े हुए नजर आए। यह कहा जाता है जब तक प्रभु जगन्नाथ का डोरी नहीं लगता तब तक प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते है। कई ऐसी कहानियाँ है जब प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों की विश्वास पर खड़े उतरे हैं।

कभी प्रभु अपने भक्त के लिए साक्षी देने के लिए निकल पड़ते हैं तो कभी दासिया नाम के एक दलित के हाथ से नारियल उठा लेते हैं। महाप्रभु जगन्नाथ के सामने न कोई जाति होती है न कोई धर्म जो भी भगवान जगन्नाथ को भक्ति से पुकारता है भगवान उस के भक्ति पर खड़े उतरते हैं।
ऐसी है भक्त सालबेग की कहानी
ऐसी ही एक कहानी भक्त सालबेग की है जो धर्म से तो मुस्लिम थे, लेकिन प्रभु जगन्नाथ का सबसे बड़े भक्त बन गये थे। भक्त सालबेग के पिता मुस्लिम और माता ब्राह्मण थी. सालबेग का पिता मुगल सेना में सैनिक थे। अपने पिता की तरह सालबेग भी मुगल सेना मे रहे। एक बार युद्ध के दौरान सालबेग पूरी तरह घायल हो गए। जब सभी को लगा था कि सालबेग ठीक नहीं हो पाएंगे तब सालबेग के मां ने प्रभु जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए कहा।
जगन्नाथ के आर्शीवाद से सालबेग पूरी तरह ठीक हो गए और प्रभु जगन्नाथ के बहुत बड़े भक्त बन गए. सालबेग जगन्नाथ के भक्ति में कई सारे भक्ति कविताएँ भी लिखीं। एक बार सालबेग प्रभु जगन्नाथ से मिलने के लिए पुरी गए, लेकिन वह मुसलमान होने के वजह से उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। फिर हर साल सालबेग रथ यात्रा के दौरान पूरी जाते थे और प्रभु जगन्नाथ की दर्शन करते थे।
सालबेग को दर्शन देने के लिए रूक गया रथ 
एक बार रथयात्रा के दिन सालबेग पुरी से बाहर थे। उन्हें लगा कि समय पर रथ यात्रा देखने के लिए पुरी पहुंच नहीं पाएंगे। फिर सालबेग ने प्रभु जगन्नाथ से विनती की, कि उनके पहुंचने तक वह इंतजार करें। फिर क्या हुआ भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त का बात मान ली। रथ जहां खड़ा था वहीं रुक गया आगे नहीं गया। लाखों भक्त भगवान के रथ को आगे ले जाने के लिए कोशिश कर रहे थे। भक्तों की कई कोशिशों के बावजूद रथ आगे नहीं जा रहा था।
जैसे ही सालबेग पुरी पहुंचे और भगवान की दर्शन कर लिए, तब रथ आगे जाने लगा। इसके बाद भक्त सालबेग की भक्ति के बारे में सभी को पता चला। फिर सालबेग पुरी में रहने लगे।  उनके देहांत के बाद उनकी समाधि पुरी के उस जगह पर बनाई गई जहां वह रहते थे। इस समाधि के रास्ते में प्रभु जगन्नाथ रथ हर साल जाती है और जब रथ इस जगह पर पहुंचता है तो कुछ समय के लिए रूक जाता है।

 

ऑटो चालक ने बना डाला ‘कूलर वाला ऑटो’

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भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है। यहां जमकर कर सर्दी भी पड़ती है और जला देने वाली गर्मी भी। अगर आप बड़े शहरों में रहते हैं, बड़े से मतलब क्षेत्रफल में बड़े तो आपको एक जगह से दूसरे जगह में जाने के लिए ऑटोरिक्शा का सहारा लेना पड़ता है। हां, अब एसी वाली कैब सर्विसेज भी खूब आ गई हैं, लेकिन कई बार वो काफी मंहगी होती हैं या समय पर नहीं मिल पातीं। ऐसे में कहीं आने-जाने के लिए ऑटो रिक्शा ही आपके लिए अंतिम विकल्प बच जाता है।

आसमान जब आग बरसा रहा हो, पारा चालीस के भी पार चला गया हो और आप दिल्ली में रहते हैं तो गर्मी आपके लिए जानलेवा साबित हो जाती है और ऑटो में लू के थपेड़े खाते हुए सफर करना आपकी सेहत के लिए खतरनाक अटेम्ट बन जाता है। लेकिन इसी गर्मी और मजबूरी के बीच दिल्ली के एक ऑटोवाले ने गजब का जुगाड़ निकाला है। इस ऑटोवाले का नाम है दिनेश भंडारी।

दिल्ली के दिनेश भंडारी ने अपनी ऑटो को इस तरह मॉडीफाई किया है, कि वो एक कूलरवाला ऑटो बन गया। दिनेश पहले एक दूकान चलाते थे। लेकिन दिल्ली सरकार की एक पहल से उन्हें ऑटो रिक्शा मिल गया। उस ऑटो रिक्शा ने उनकी जिंदगी बदल दी, क्योंकि उन्होंने उस ऑटो को ही बदलकर रख दिया। अॉटो ऐसा बना दिया कि आज उनकी चर्चा हर जगह है।

दिनेश बताया, ‘मुझे जुलाई 2015 में सरकार की तरफ से ऑटो मिला था। मैं 1 दिन अपना ऑटो रिक्शा लेकर दिल्ली में चला रहा था, मुझे एक सवारी मिली। मुझे उसे उसके घर पर छोड़ना था। उस वक्त सूरज मानो आग उगल रहा था। अचानक से सवारी की तबीयत खराब हो गई। मैंने जल्दी-जल्दी सवारी को उसके घर पर छोड़ा। घर आकर मैंने निश्चय किया कि कोई ऐसा तरीका निकालूंगा, कोई ऐसा कूलर बनाऊंगा जिससे सवारी और ड्राइवर दोनों को ठंडी हवा लग सके। सो मैंने उसका सामान जुटाना शुरू किया। काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। किसी ने भी मेरी मदद तक नहीं की। सब मेरा मजाक उड़ाते थे। मेरे पड़ोसी ताने मारते थे और कहते थे कि ऐसा ना कभी हुआ है न कभी होगा, लेकिन एक दिन मेरी मेहनत रंग लाई। मैंने अपनी ऑटो रिक्शा को कूलर वाला ऑटो रिक्शा बना ही डाला।’

कबाड़ से जुगाड़

दिनेश ने टुकड़ा टुकड़ा जोड़कर ये भानमती का कुनबा जोड़ा है, मतलब इस कूलर वाले ऑटो को बनाने के लिए उन्होंने छोटी सी आरी से लेकर टिन की चादर को इधर-उधर से जुगाड़ा है। कहीं से एक मोटर ले आए, कहीं से एक पंखा। टिन की चादर को काटकर कूलर की बॉडी बनाई। जुगाड़ से उसे ड्राइवर और सवारी की सीट पर फिट किया जिससे दोनों को ही ठंडी हवा लगती रहे। कूलर में पानी की आवाजाही के लिए उन्होंने प्लास्टिक का डिब्बा काटकर उसमें पाइप लगा दिया और इस पाइप को कूलर से जोड़ दिया। कूलर के पानी को बार-बार बदलना पड़ता था। इसलिए दिनेश ने अपनी इस कूलर वाले ऑटो को दोबारा मॉडीफाई करने की ठानी। अब उनके ऑटो में लगा हुआ कूलर भी बाहर से नहीं दिखता और पानी की व्यवस्था भी बिल्कुल उनके मनमुताबिक हो गई है। साथ ही सबसे अच्छी बात ये है, कि दिनेश के अॉटो में पानी की खपत काफी कम होती है और पानी बरबाद नहीं होता।

दिनेश बताते हैं, ‘ऑटो रिक्शा में लगे कूलर से सवारी और ड्राइवर दोनों को ठंडी हवा लगती है जिससे उन्हें गर्मी का एहसास कम होता है। पानी टंकी से होता हुआ कूलर तक आता है नीचे लगे बॉक्स में जमा हो जाता है। जमा पानी जैसे ही भरता है उसमें लगा अलार्म बज जाता है। जिसके द्वारा पानी वापस टंकी में चला जाता है पानी बेकार नहीं जाता।’

(साभार – योर स्टोरी)