Monday, July 13, 2026
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‘जाने भी दो यारों’ के निर्देशक कुंदन शाह का निधन

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बॉलीवुड निर्देशक कुंदन शाह का गत शनिवार की सुबह निधन हो गया> 19 अक्टूबर 1947 को जन्मे कुंदन शाह 69 वर्ष के थे। बताया जा रहा है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से निर्दशन की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कॉमेडी “जाने भी दो यारों” से 1983 में अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की। इस फ़िल्म के वो सहायक पटकथा लेखक भी थे।

शाह इसके बाद टेलीविजन की दुनिया की ओर मुड़ गए। वहां उन्होंने “ये जो है ज़िंदगी” से शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने नुक्कड़ (1986), मनोरंजन (1987) और आर के लक्ष्मण के कार्टून आम आदमी पर आधारित वागले की दुनिया (1988) जैसे यादगार सीरियल बनाए।

कई टीवी सीरियल को बनाने के बाद कुंदन शाह ने सिनेमा से सात साल का ब्रेक लिया। इसके बाद 1993 में उन्होंने “कभी हां, कभी ना” से वापसी की. इसकी पटकथा भी उन्होंने लिखी। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी जीता।

इसके बाद उनकी 1998 में बनाई गई “क्या कहना” भी हिट रही। लेकिन, इसके बाद की सभी फ़िल्में “हम तो मोहब्बत करेगा”, “दिल है तुम्हारा”, “एक से बढ़कर एक” औऱ 2014 में आखिरी फ़िल्म “पी से पीएम तक” बॉक्स ऑफ़िस पर औंधे मुंह गिरी।

सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाएं

कुंदन शाह के निधन की ख़बर शनिवार सुबह मीडिया में आई। इसके बाद सोशल मीडिया में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया। फ़िल्म निर्देशक हंसल मेहता ने लिखा, ”जाने भी दो यारों, कुंदन शाह की आत्मा को शांति मिले. दुखी करने वाली ख़बर।”

विक्रम भट्ट ने ट्वीट किया, ”जाने भी दो यारों जैसी अविस्मरणीय फ़िल्म देने वाला आदमी हमें छोड़कर चला गया। वो चला गया लेकिन वो अब भी ज़िंदा है।”

संकेत भोसले नाम के ट्विटर यूज़र ने लिखा, ”आपकी आत्मा को शांति मिले। मेरी पसंदीदा फ़िल्म ‘कभी हां, कभी ना के लिए शुक्रिया।

 

राजनीतिक दलों को आरटीआई कानून के दायरे में लाने के लिये याचिका

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय में एक नयी याचिका दायर कर राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के दायरे में लाने की मांग की गयी है। यह याचिका राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाने और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से दायर की गयी है। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में केंद्र को भ्रष्टाचार और सांप्रदायीकरण के खतरे से निपटने के लिये कदम उठाने का निर्देश देने की भी मांग की गयी।

याचिका में कहा गया, ‘‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(एच) के तहत एक ‘लोक प्राधिकार ’ घोषित किया जाये। जिससे उन्हें लोगों के लिये पारदर्शक और जवाबदेह बनाया जा सके और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाया जा सके।’’ जनहित याचिका में निर्वाचन आयोग से आरटीआई अधिनियम और राजनीतिक दलों से जुड़े अन्य कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने के लिये निर्देश देने की मांग की गयी। याचिका में यह भी मांग की गयी है कि अगर वे इनका पालन करने में विफल रहते हैं तो उनका पंजीकरण रद्द कर दिया जाये।

विश्वविद्यालयों में बम खतरे, परिसर में गोलीबारी से बचाव पाठ्यक्रम को शामिल किया जाएगा : यूजीसी

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नयी दिल्ली : यूजीसी ने देश भर के विश्वविद्यालयों से कहा है कि वे आपदा प्रबंधन पाठ्यक्रम की शुरुआत करें जिसमें बम हमले के खतरे, परिसर में गोलीबारी और आतंकवादी हमले जैसे विषय शामिल किए जाएं।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कहा कि पाठ्यक्रम को आवश्यक बनाया जाना चाहिए। इसने हाल में विश्वविद्यालयों को लिखे पत्र में कहा कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को दुर्घटनाओं के साथ ही हमले और खतरे से बचाना है।
पत्र में कहा गया है, ‘‘सभी विश्वविद्यालयों को आपदा प्रबंधन पर आवश्यक रूप से विचार करना चाहिए जिसमें बम हमला, विस्फोट, भूकंप, खतरनाक सामग्री उत्सर्जन, परिसर में गोलीबारी, आतंकवादी हमले, वित्तीय आपातकाल शामिल किए जाने चाहिए।’’ सरकार ने 2015 में ‘‘विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा’’ पर दिशा-निर्देश जारी किए थे।

लिटरेरिया 2017 : हिमाकत के चार दिन और आसमान नीला करता नीलांबर

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कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

बस पत्थर तो उछाला जा चुका है और आसमां में भी एक दिन सुराख कर दिया जाएगा। आसमान की कालिख को जरा सा हल्का कर करके उसे नीला कर दिया जाएगा और ये आसमान है हमारे साहित्य का, संस्कृति का और हमारी उम्मीदों का। आसमान में सुराख करने के लिए ये पत्थर नीलांबर ने उछाला है। दु:स्साहस है यह….बगैर किसी भारी – भरकम अनुदान के, बगैर किसी सरकारी प्रश्रय के कुछ युवाओं और मुट्ठी भर लोगों ने यह दु:स्साहस कर डाला….वो भी बगैर किसी अकादमिक संस्थान की जी –हजूरी किए…बगैर किसी भारी – भरकम संस्था का चक्कर काटे….? मगर परवाह किसे है। साहित्य को नये सिरे से परिभाषित करते उसे तकनीक और आधुनिकता से जोड़ देना और कवियों का परिचय किसी सेलिब्रिटी की तरह देना और हिन्दी के कवियों को सेलिब्रिटी की तरह पेश करना हिमाकत ही तो है मगर नीलांबर ने जड़ता की ताबूत में एक कील ठोक दी है…..मठाधीशों…..जो उखाड़ना है, उखाड़ लो….हम तो बढ़ेंगे।

छोटे – छोटे कार्यक्रम करते हुए कभी कविता की साँझ को लाल किया तो कभी कहानियाँ कह डालीं और कभी कविताओं का कोलाज बना डाला और बीच मैदान में बैठकर कविता पाठ करवा दिया….हद है…बड़े कवि कभी इस तरह कविता पढ़ते हैं….क्या समझ रखा है…उफ…मगर ये क्या? राह चलते लोग खड़े हो गये… अंत तक सुनते रहे….और संशोधन भी करते रहे…ये क्या कर रहे हो भाई…कविता को आम आदमी तक पहुँचा रहे हो…अरे….उसे कैद करने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं और तुम हो कि फेसबुक पर फैज…को ला दे रहे हो…। नीलांबर! ये हिमाकत है….लो एक और हिमाकत कर डाली….अरे….इसे तो लाइक पर लाइक मिल रहे हैं…कारवां है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा है……लो अब तो हम चार दिन की ताजा हिमाकत करेंगे….। तो लीजिए नीलांबर साहित्य और संस्कृति की दुनिया में अंगद के पैर की तरह जमने के लिए तैयार हो गया है…..इस बार नीलांबर कोलकाता, पेश कर रहा है……लिटरेरिया कोलकाता 2017…….।

12 अक्टूबर को होगा उद्घाटन और 15 अक्टूबर तक साहित्य और संस्कृति के जगमगाते सितारों से सजेगा .शहर…शारदोत्सव के बाद लिटरेरिया उत्सव 2017।अगर प्रोफेसरों के धरने और शिक्षकों की धमकियों से कान पक गए हों तो भारतीय भाषा परिषद में 12 अक्टूबर को समालोचना पर्व में आ जाना…नन्ही आहना अपना नृत्य प्रस्तुत करेंगी…इसके बाद होगा समालोचना पर्व….जिसकी अध्यक्षता करेंगे डॉ. शम्भुनाथ….हम दावा करते हैं….एक बार सुन लिया इनको तो गुस्सा गुलाब जल बन जाएगा…और अपनी कुर्सियों से हिलोगे नहीं।  इसके बाद पंकज चतुर्वेदी, आशीष त्रिपाठी, वेदरमण, राहुल सिंह भी हैं और संयोजक हैं संजय राय…अरे वही जिनकी मारक कविताएँ तुम सुनते ही रहते हो।

चार दिनों के इस मेधा सारस्वत  उत्सव में देश भर से साहित्यकार आ रहे हैं…कुछ युवा तो कुछ वरिष्ठ और कुछ अपनी कविताओं से तुम्हारी नाक में दम कर जड़ता को चरमरा देने वाली महिलाएँ….भी। एक राष्ट्रीय संगोष्ठी….नाटक और कहानी भी…..एकदम साहित्यिक…..मोबाइल पर प्रोफाइल फोटो अपलोड करते –करते थक गए हो…बसों में कंडक्टर खुदरा नहीं देता और उसका सिर फोड़ने को जी चाहे तो ऐसा मत करना, बस 13 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से आ जाना शरत सदन….एकदम टकाटक कविताएँ सुनने को मिलेंगी….इतनी टकाटक कि भूल जाओगे कि मल्टीप्लेक्स में जाकर एक सड़ी हुई फिल्म देखकर पैसे गंवा आए हो….एकदम ताजा जैसे पसीने से गंधाती बस एसी के नीचे आ गयी हो….बस आ जाना…दिल खुश हो जाएगा…।

वन डे खेला है….या देखा है तो…ये कविता का वन डे है और खिलाड़ी इतने हैं कि नाम लिखते – लिखते ही हाथ थक जाए तो इनके नाम इनकी शक्ल के साथ देख लो…तबीयत हरी हो जाएगी। संयोजक अपने ही शहर की निर्मला तोदी और आनंद गुप्ता हैं। अरे, वही आनंद जो दिखते ही सीरियस हैं मगर हैं नहीं…अच्छा लगेगा….पक्का। 13 अक्टूबर को ही कोलाज, माइम, और एक रोज नाटक भी है और ये सब है हावड़ा मैदान के शरत सदन में।

14 अक्टूबर को गोर्की सदन में शाम 4 बजे एक साँझ कहानी की होगी और कहानीकार चंदना राग तथा चंदन पांडेय कहानी पाठ करेंगे। इसके बाद शाम 5.30 बजे भोपाल के विहान ड्रामा वर्क्र्स का नाटक हास्यचूड़ामणि होगा।

15 अक्टूबर रविवार है, छुट्टी रहेगी…आ जाइए शरत सदन में शाम 4 बजे रश्मि बंद्योपाध्याय का नृत्य, सुशांत दास का अ टेल ऑफ फिश नामक माइम देखने।

अमृता प्रीतम की रचना पर बना पिंजर देखा है तो अब उनकी जिन्दगी और आत्मकथा रसीदी टिकट पर आधारित नाटक अमृता देखना न भूलना जिसे भोपाल का विहान ड्रामा वर्क्स पेश करेगा। हाल ही में रंगकर्मी रवि दवे जी का देहांत हो गया। उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन किया है,जैसे गोदान, हानूष। नाटकों के लिए उनके समर्पण और इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए नीलांबर कोलकाता उनकी स्मृति में ‘रवि दवे स्मृति सम्मान’ की घोषणा करता है।

वर्ष 2017 का यह सम्मान कोलकाता की ‘लिटिल थेस्पियन’ संस्थान को दिया जाएगा। इस संस्था ने कोलकाता में हिन्दी रंगमंच को नई पहचान दी! यह सम्मान समारोह 15 अक्टूबर 2017 को शरत सदन में होगा! 4 दिन तक एकदम कविता, कहानी, माइम, कोलाज और नाटक….और क्या चाहिए…और ये सब कर रहा है नीलाबंर।

तो नीलांबर के लिए एक बड़ा सा शुक्रिया तो बनता ही है….तो अपराजिता की तरफ से नीलांबर की पूरी टीम को ढेर सारी शुभकामनाएँ….हिमाकत करते चलिए…..आसमान नीला करते रहिए…आसमान नीला ही अच्छा लगता है और उसकी कालिख को बस धोना बन्द न करना…..बढ़े चलो साथियों….हम सब साथ हैं….

 

संग्रहालय के गोदाम में कैद थे बापू और शास्त्री के अस्थि कलश

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बापू और शास्त्री के अस्थि कलश संग्रहालय के गोदाम में कैद हैं। ये अस्थि कलश संग्रहालय में इसलिए रखे गए थे कि यहां आने वाले पर्यटक इन महान विभूतियों से जुड़ी स्मृतियां संजो सकें और कलशों को देख सकें।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के अस्थि कलश अब भी मथुरा के राजकीय संग्रहालय में रखे हुए हैं, लेकिन इनके दर्शन यहां आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग नहीं कर पा रहे हैं। ये संग्रहालय के गोदाम में रखे हुए हैं। दरअसल, दोनों महापुरुषों की अस्थियां यहां यमुना में प्रवाहित की गई थीं।

ये अस्थि कलश संग्रहालय में इसलिए रखे गए थे कि यहां आने वाले पर्यटक इन महान विभूतियों से जुड़ी स्मृतियां संजो सकें और कलशों को देख सकें। संग्रहालय प्रशासन इन्हें महज कलश ही समझता रहा। यही वजह है कि इन्हें गोदाम में कैद करके रखा है। राष्ट्रपिता का अस्थि कलश 12 फरवरी 1948 को आया था। इसे तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास रखा गया था।

वर्ष 1970 में इसे संग्रहालय में रखा गया, जबकि शास्त्री का अस्थि कलश 1966 में आया था। संग्रहालय के निदेशक डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि गांधीजी, शास्त्रीजी की अस्थियां यमुना में प्रवाहित की गईं थीं, इसके बाद खाली अस्थि कलश संग्रहालय में रख दिए गए। सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें अभी गैलरी में नहीं रखा जा सकता, इसलिए ये गोदाम में रखे हुए हैं।

इनके लिए अलग से गैलरी तैयार की जा रही है। इनको अब सामने लाया गया है। गौरतलब है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का अस्थि कलश भी संग्रहालय में रखा है। यह 12 जून 1964 में संग्रहालय में रखा गया था।

पुरुष बैडमिंटन रैंकिंग के शीर्ष 20 में पांच भारतीय

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नयी दिल्ली : बीडब्ल्यूएफ बैडमिंटन पुरुष एकल रैकिंग के शीर्ष 20 खिलाड़ियों में पांच भारतीय शामिल है जिसमें सबसे ज्यादा फायदा पिछले सप्ताह जापान ओपन के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाले एच.एस. प्रणय को हुआ।

प्रणय रैंकिंग में चार स्थान के छलांग के साथ 15वें स्थान पर पहुंच गये जबकि जापान ओपन के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करने वाले दूसरे भारतीय किदाम्बी श्रीकांत आठवीं रैंकिंग बरकरार रखा है। वह पुरुष एकल रैंकिंग में शीर्ष भारतीय है।

अजय जयराम पिछले सप्ताह की तरह 20वें और बी साई प्रणीत 17वें स्थान पर बने हुये है। समीर वर्मा भी दो स्थानों के सुधार के साथ 19वें स्थान पर आ गये।

महिला एकल में पी.वी. सिंधू और सायना नेहवाल ने अपनी पिछली रैंकिंग क्रमश: दूसरे और 12वें स्थान पर बरकरार है। दोनों खिलाड़ियों जापान ओपन के दूसरे दौर में हार का सामना करना पड़ा था।

सिक्की रेड्डी और प्रणव जैरी चोपड़ा की मिश्रित युगल जोड़ी को जापान ओपन के सेमीफाइनल में पहुंचने का फायदा हुआ और यह जोड़ी दो स्थानों के सुधार के साथ 17वें स्थान पर आ गयी।

 

नहीं रहे दिग्गज अभिनेता टॅाम ऑल्टर

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मुंबई – रंगमंच, टीवी और फिल्म के दिग्गज अभिनेता का 67 साल की उम्र में निधन हो गया। ऑल्टर को ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘जुनून’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों में बेतहरीन अदाकारी के लिये जाना जाता है। प्रसिद्ध अभिनेता और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता त्वचा कैंसर से पीड़ित थे। उनकी यह बीमारी चौथे चरण में पहुंच चुकी थी और कल रात अपने घर में उनका निधन हो गया।

अभिनेता के त्वचा कैंसर की पहचान पिछले साल की गयी थी और उसका उपचार किया जा रहा था, लेकिन इस माह की शुरूआत में वह फिर से बीमार पड़ गये और उन्हें सैफी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
ऑल्टर के पुत्र जैमी ने प्रेट्र से कहा, ‘‘उनका अंतिम संस्कार बुधवार को किया जाएगा। उनका अंतिम संस्कार ईसाई प्रथाओं के अनुसार एक चर्च में होगा।’’ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभिनेता के निधन पर उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की हैं। राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया ट्वीटर पर लिखा, ‘‘वयोवृद्ध अभिनेता टॉम ऑल्टर के निधन के बारे में सुनकर दुख हुआ है। फिल्म प्रेमी उन्हें हमेशा याद रखेंगे। उनके परिवार के लिये संवेदना।’’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऑल्टर के निधन पर शोक व्यक्त किया और फिल्मों एवं थियेटर में उनके योगदान को याद किया।

प्रधानमंत्री के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल पर लिखा गया, ‘‘प्रधानमंत्री श्री टॉम ऑल्टर के निधन पर शोक व्यक्त करते हैं और फिल्मों एवं रंगमंच में उनके योगदान को याद करते हैं। उन्होंने श्री टॉम ऑल्टर के परिवार और प्रशंसकों के लिए संवेदना व्यक्त की हैं।’’ ऑल्टर अमेरिकी मिशनरी माता-पिता के पुत्र थे। उनका जन्म 1950 में मसूरी में हुआ था। उन्होंने मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल में और बाद में पुणे के फिल्म और टेलीविजन संस्थान में पढ़ाई की। ऑल्टर ने हरियाणा के जगाधरी के एक विद्यालय में अध्यापन किया था। राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘‘अाराधना’’ देखने के बाद उन्होंने अभिनय करने का फैसला किया।
इसके बाद वह पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में दाखिल हो गये, जहां उन्होंने 1972 से 1974 तक अभिनय की बारीकियां सीखीं और गोल्ड मैडल से स्नातक की उपाधि हासिल की। ऑल्टर ने साल 1976 में रामानंद सागर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘चरस’ से अभिनय की शुरूआत की। इस फिल्म में धमेन्द्र और हेमा मालिनी ने मुख्य भूमिकायें निभायी थीं। इस फिल्म में ऑल्टर मुख्य कस्टम अधिकारी बने थे।

उनकी अगली और सबसे मशहूर फिल्मों में सत्यजीत रे की ‘‘शतरंज के खिलाड़ी’’ (1977) थी, जो मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की छोटी कहानी पर आधारित थी।
इसके बाद उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘‘जूनून’’ (1979), मनोज कुमार की ‘‘क्रांति’’ (1981) और राज कपूर की ‘‘राम तेरी गंगा मेली’’ (1985) में काम किया।

उनकी बेहतरीन अभिनय वाली फिल्मों में ‘‘आशिकी’’, ‘‘परिंदा’’, ‘‘सरदार पटेल’’ और ‘‘गांधी’’ शामिल हैं। हालांकि ऑल्टर अपने समय के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक थे, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें बार-बार ब्रिटिश पुरुष के किरदार के रूप में ही दिखाया गया। उन्होंने अपने अभिनय की शुरूआत 1977 में कन्नड़ फिल्म ‘‘कन्नेश्वर रामा” के साथ की। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, असमिया, गुजराती, तमिल और कुमांऊनी फिल्मों में भी काम किया। उन्होंने ‘‘जुनून’’ ‘‘जबान संभाल के’’, ‘‘भारत एक खोज’’ ‘‘शक्तिमान’’, ‘‘कैप्टन व्योम’’ और ‘‘यहां के हम सिकन्दर’’ जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों में काम किया था।
आखिरी बार वह इस समय चल रहे धारावाहिक ‘‘रिश्तों का चक्रव्यूह’’ में दिखाई दिये थे। ऑल्टर अपने करियर के दौरान रंगमंच से करीब से जुड़े रहे। उन्होंने 1979 में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और गिलानी के साथ मोटली प्रोडक्शंस की स्थापना की थी। ऑल्टर की प्रमुख रंगमंच प्रस्तुतियों में करीब ढ़ाई घंटे का एकल उर्दू नाटक ‘‘मौलाना’’ ‘‘बाबर की औलाद’’, ‘‘लाल किले का आखिरी मुशायरा’’, ‘‘गालिब के खत’’, ‘‘तीसवीं शताब्दि’’, ‘‘कोपेनहेगन’’, ‘‘दिल्ली में गालिब’’ और विलियम डेलरिम्पल के नाटकीय रूपांतरण ‘‘सिटी ऑफ डिजिन्स’’ शामिल है।
ऑल्टर एक खेल पत्रकार भी थे। वह टीवी के लिये सचिन तेंदुलकर का साक्षात्कार करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कला और सिनेमा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2008 में ऑल्टर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उनकी आखिरी फिल्म ‘‘सरगोशियां’’ थी, जिसमें उनके साथ आलोकनाथ और फरीदा जलाल ने काम किया था। यह फिल्म इस साल मई में रिलीज हुयी थी।
आॅल्टर के परिवार में पत्नी कैरोल, बेटा जेमी और बेटी अफसान हैं।

 

इतिहास के पन्नों में हाशिए पर रह गयीं कस्तूरबा : नीलिमा

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रायपुर – कस्तूरबा को भी जब भी इतिहास के आइने में देखा गया तो वो गांधी जी की कठपुतली के रूप में ही दिखीं। उनकी हां में हां और ना में ना मिलाते हुए ही जीवन बिता दिया। पर उनके त्याग और तपस्या की चर्चा तो ऐतिहासिक पन्नों से गायब ही हो गई। क्या किसी ने सोचा कि जीवन पर दर्द सहकर, उपेक्षित होकर बा ने मोहनदास को लोगों की नजरों में महात्मा बना दिया। दरअसल एक संपन्न परिवार में जन्मीं बा ऐसी नहीं थीं।

कलम दैनिक भास्कर संवाद में शामिल होने रायपुर पहुंचीं नीलिमा ने कस्तूरबा के जीवन पर एक काल्पनिक किताब ‘द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा’ लिखी है। इसका हिंदी अनुवाद “कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’ के नाम से जारी किया गया है। नीलिमा ने बताया कि यह किताब ऐतिहासिक तथ्यों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। इसे कस्तूरबा की डायरी की शैली में लिखा गया है। एक साइकोलॉजिस्ट, स्त्री और मां होने के लिहाज से मैंने कस्तूरबा को उस दौर के लिहाज से जीने की कोशिश की है और उसी आधार पर बातें लिखी हैं।

रईस कपाड़िया परिवार में सबसे छोटी थीं वो

इस किताब के अंशों को पढ़ते हुए नीलिमा ने कहा कि ये कहानी है उस महिला की, जिसने मोहन दास को महात्मा गांधी बनाया। दुनिया में ‘कस्तूर’ को खुशबू के लिए जाना जाता है, उसका नाम इसी पर रखा गया था। वह रईस कपाड़िया परिवार में सबसे छोटी थी। वो कपाड़िया परिवार जो विदेशों में कपड़े, अनाज और कपास के कारोबार का स्थापित घराना था। पूरी दुनिया उन्हें कस्तूरबा के नाम से पहचानती है, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो उन्हें वाकई में जानते हैं। वह ऐसे व्यक्ति की पत्नी थी, जिसे शांति के दूत के रूप में दुनियाभर में सम्मान प्राप्त हुआ। जिसे लोग राष्ट्रपिता और बापू जैसे संबोधन देते हैं। वो दुनिया के लिए जैसे थे, अपनी पत्नी और बेटे के लिए वैसे बिल्कुल नहीं थे। कस्तूरबा ने उनके साथ रहकर कई दुख सहे। अगर उनकी जिंदगी को एक शब्द में बयां करने कहें तो मैं उन्हें “व्यथा’ कहूंगी।

दोहरा चरित्र था गांधी जी का

नीलिमा ने कहा, एक तरफ गांधी जी कपोल कल्पना के आधार पर बा को चरित्रहीन कहते हुए सड़क पर फेंक देने की बात कहते हैं तो दूसरी ओर ब्रह्मचर्य के प्रयोग में 18-20 साल की लड़कियों को शामिल करते थे। एक पत्नी के लिए ये घोर मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था। वे जैसे दुनिया के लिए थे, घरवालों के लिए वैसे नहीं थे।

जब दो लड़कियों की चोटी खुद गांधी ने काटी

नीलिमा ने एक किस्सा शेयर किया, उन्होंने बताया महात्मा गांधी के बेटे मणिलाल काे लंबे बालों वाली एक युवती बेहद पसंद थी। वे घंटों बैठकर बातें करते थे। एक दिन मणिलाल ने अंजाने में किसी दूसरी लड़की के कंधे पर पीछे से हाथ रख दिया। वो शिकायत करने गांधी तक पहुंच गईं। उन्होंने मणिलाल और दोनों युवतियों को कक्ष में बुलाया। मणिलाल से पूछा- तुमने ऐसा क्यों किया? उन्होंने जवाब दिया- मुझे उसके लंबे बाल पसंद हैं, अंजाने में मुझसे ये गलती हो गई। गांधीजी ने कहा, यानी सारे फसाद की जड़ बाल हैं। इसके बाद उन्होंने दोनों युवतियों के बाल खुद काट दिए। मणिलाल को भी सजा दी ।

गांधीजी ने लिखा चौकाने वाला खत

नीलिमा ने एक वाकया साझा करते हुए कहा कि एक बार कस्तूरबा बीमार थीं, उन्हें गांधी की जरूरत थी। वो नहीं आए, लेकिन जो खत भेजा वो चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि अभी मैं आने की स्थिति में नहीं हूं। अगर यही नियति है कि तुम्हारी मृत्यु हो तो तुम्हारे लिए वही बेहतर होगा कि तुम मुझसे पहले जाओ। मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूं कि तुम्हारी मृत्यु के बाद मैं दूसरी स्त्री से शादी नहीं करूंगा। वहीं, दूसरी तरफ जब गांधीजी खुद बीमार पड़े तो उन्होंने तब कोलकाता में रह रही कस्तूरबा को बुला लिया।  बीमारी की खबर सुनते ही वो दौड़ी-दौड़ी आ गईं। गांधीजी इतने बीमार थे कि अगर कस्तूरबा उनका ख्याल नहीं रखती तो उनका बच पाना मुश्किल था।

बा के चरित्र पर भी करने लगे थे संदेह

कार्यक्रम में बतौर मॉडरेटर मौजूद बृजेश उपाध्याय के सवालों के जवाब में नीलिमा ने वो वाकया शेयर किया जब करमचंद की मौत के बाद मोहनदास एकदम बदल गए। जिस कस्तूरबा के बिना वो एक पल भी दूर नहीं रह सकते थे उनके चरित्र पर संदेह करने लगे। वो इसलिए क्योंकि वो प्यार करने के लिए उनसे पहल कर बैठीं। नीलिमा ने कहा कि कस्तूरबा का निधन गांधी से पहले हो चुका था, लेकिन मैंने उन्हें किताब में तब तक जिंदा रखा है जब तक गांधीजी थे। प्रभा खेतान फाउंडेशन के इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता श्री सीमेंट थे। काशी मेमोरियल सोसाइटी सहभागी थी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी

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जीवन में तकनीक का महत्व है और युवाओं के लिए रोजगार का। एक समय था जब तकनीक को अपनाने में हिचक होती थी और आज भी कई शिक्षक शिक्षण कार्यों के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

दूसरी तरफ कुछ शिक्षक और शिक्षिकाएँ ऐसी हैं जिन्होंने इस नयेपन का स्वागत किया और अपने साथ विद्यार्थियों को भी प्रोत्साहित कर रही हैं। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार उनको एक अलग पहचान दे रहा है। ऐसी ही एक शिक्षिका हैं केन्द्रीय विद्यालय, बालीगंज की वरिष्ठ शिक्षिका चन्द्रप्रभा भाटिया, जिनसे अपराजिता ने बात की…आप भी कीजिए मुलाकात –

आज की शिक्षा में कौशल विकास का महत्व बढ़ा है

शिक्षा का अर्थ है अध्ययन तथा ज्ञान ग्रहण करना। शिक्षा चेतन या अचेतन रूप से मनुष्य की योग्यता को बढ़ाती है। सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार स्वतंत्रता देकर सर्वांगीण विकास करना ही वास्तविक शिक्षा है। आज शिक्षा जीवन की चुनौतियों का सामना करना सिखाती है और आज कौशल विकास का महत्व भी आधुनिक शिक्षा में बढ़ गया है।

विद्यार्थिय़ों के साथ शिक्षकों के लिए भी जरूरी है तकनीक

तकनीकी शिक्षा आज बहुत महत्वपूर्ण है। कई देशों में शिक्षण संस्थान ऑनलाइन हो गये हैं, उनके पाठ्यक्रम इंटरनेट पर उपलब्ध हैं और मल्टीमीडिया को स्कूलों में प्रोत्साहन मिल रहा है। ये बहुत आवश्यक है। विद्यार्थिय़ों के साथ शिक्षकों के लिए भी जरूरी है। वे विद्यार्थियों में सोचने की क्षमता, प्रक्रिया को बढ़ाकर उसे स्वतंत्र बना रहे हैं और ये छात्र 21वीं सदी के छात्र बन रहे हैं। कक्षा में इसे लाया जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के लिए रोचक है। मैं खुद न सिर्फ तकनीक इस्तेमाल करती हूँ बल्कि आज भी माइक्रोसॉफ्ट और इन्टेल जैसी अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों से जुड़ी हूँ।

निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी

सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षा मौलिक अधिकार है। निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी। मेरा मानना है कि शिक्षा पर सभी का अधिकार होना चाहिए और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि यह गुणवत्तापरक पाठ्यक्रम और पाठ्यसामग्री व अन्य सुविधाएँ प्रदान करे। हम पीपीपी मॉडल की बात कर रहे हैं मगर मुझे लगता है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है। बड़ों की शिक्षा प्रदान करने की दिशा में समुचित कदम उठाए जाने चाहिए।

2007 से लेकर अब तक कई पुरस्कार और सम्मान मिले

2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया था। मुझे 2009 में गुरुकुल अवार्ड्स, 2015 का माइक्रोसॉफ्ट इनोवेटिव एडुकेटर एक्सपर्ट, 2016 को आईडीए टीचिंग अवार्ड्स समेत कई पुरस्कार मिले हैं। 2014 में कौमी एकता मंच पुरस्कार मिला। तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए और कक्षाओं में नयापन लाने के लिए कई बार सम्मानित किया जा चुका है और कई बार विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया है। अब तक बहुत से राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं।

उसे कभी न भूलें या जिसने आपको जीवन में कुछ सिखाया हो

मैं अब भी अपने शिक्षकों को बहुत याद करती हूँ। हिन्दी की शिक्षिका बीजू रानी पाल से लगाव था और मुझे लगता है कि हम अपने जीवन में अगर कुछ बन पाते हैं तो उसे कभी न भूलें या जिसने आपको जीवन में कुछ सिखाया हो।

उत्पीड़न और पक्षपात लड़कियों का ही नहीं, लड़कों का भविष्य भी नष्ट करेगा

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भारत में देवियों के पूजन की परम्परा है और स्त्रियों को सम्मान देने की बातें तो हमारे ग्रन्थों में भी विद्यमान हैं मगर हालात और हकीकत दोनों कुछ और ही बयान कर रहे हैं। शायद, एक भी दिन ऐसा न हो जब महिलाओं के प्रति अपराध की खबर पढ़ने को न मिले मगर हमारी सोच और संस्कार दोनों की शिकायत आजकल मीडिया और सोशल मीडिया कर देते हैं।

हम हमेशा से दोहरेपन के शिकार रहे हैं और इसे स्वीकार नहीं करते। नवरात्रि पर कुआँरी कन्याओं को पूजने वाले इस देश में गर्भ में ही कन्याओं को मार डाला जाता है और नवरात्रि के दौरान ही छेड़छाड़ का विरोध कर रही छात्राओं को केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीटा जाता है और पूरी घटना को लेकर राजनीति करने की कोशिश दोनों तरफ से होती है…अगर आपको लगता है कि ऐसी घटनाओं का असर सिर्फ लड़कियों पर पड़ रहा है तो आपको एक बार फिर सोचने की जरूरत है। बीएचयू बड़ा नाम है और यहाँ आने वाली लड़कियाँ कई अलग राज्यों से अपने हिस्से का संघर्ष लिए आती हैं।

घर के बाहर भी वे खुद को पूरी तरह आजाद नहीं कर पातीं…उनके पीछे उनका घर, समाज, सहेलियाँ, रिश्तेदार सब चलते हैं और ऐसी घटनाएँ उनके सपनों को कुचलने का काम कर रही हैं मगर इस बार लड़कियाँ लड़ीं….जमकर लड़ीं। आप गौर कीजिए तो पाएंगे कि जैसे –जैसे लड़कियाँ बाहर निकल रही हैं, उनके साथ अपराध भी बढ़ रहे हैं और यही सामन्तवादी मानसिकता को दर्शाता है जिसकी नजर में हर आगे निकलने वाली पीढ़ी उसे टक्कर दे रही है और यही उसे स्वीकार नहीं है।

यह नँगई कुछ और नहीं घबराहट और असुरक्षा का प्रतीक है…और बनारस की जड़ता को इन लड़कियों ने झकझोर दिया है जिससे यहाँ की रूढ़िवादी मानसिकता तिलमिला उठी है। लड़के जब ऐसा करते हैं तो वे लड़कियों से ज्यादा नुकसान अन्य लड़कों को पहुँचाते हैं जो बगैर किसी अपराध के मनचलों की श्रेणी में रख दिये जाएँगे….और उनको लेकर संशय खड़ा होगा…अगली बार जब भी आप बीएचयू के छात्र से मिलेंगे तो उसका पूरा समय खुद को ऐसे छात्रों से अलग साबित करने में बीतेगा…कि वे इस लम्पट परम्परा से नहीं आते और इसका असर उनके भविष्य पर भी पड़ना तय है।

अब सवाल यह है कि आखिर इस सोच पर अब तक लगाम क्यों नहीं लगी तो इसकी जिम्मेदार भी स्त्रियाँ ही हैं जो अपनी सुरक्षा के आवरण के नीचे दबी अपने घर में कभी बेटी तो कभी बहनों और भाभियों को दबाने के लिए उन पर हो रहे अन्याय का परोक्ष समर्थन करती हैं।

सच तो यह है कि स्त्री को बेटे, पति, भाई और पिता समेत अन्य पुरुषों से सुरक्षा चाहिए, आर्थिक निभर्रता है,एक भय का घेरा है और एक अन्धा प्रेम भी जो कभी सवाल नहीं करने देता। अपना घर बचाने के चक्कर में वह इनकी तमाम गलतियों पर परदा डालती हैं, ऐसी स्थिति में अगर ऐसे मर्द पूरी दुनिया को सल्तनत और हर औरत को अपनी सम्पत्ति समझें तो यह पुरुषों से अधिक स्त्रियों का दोष है।

मूर्ति को पूजो और जीवित बेटियों को जला दो, हवस का शिकार बनाओ और सार्वजनिक मंचों पर गालियाँ दो…….यह मानसिकता मर्दों को कभी आगे नहीं बढ़ने देगी और परम्परा के नाम पर रूढ़ियों को अपनाना इस देश को और पीछे ले जाएगा….।

इस घटना का असर पड़ा है और बहुत गहराई से पड़ा है…बीएचयू ही नहीं पूरे बनारस की छवि धूमिल हुई है। व्यक्ति की मानसिकता ही देश का भविष्य और उसकी प्रगति की दिशा तय करती है…अब यह इस देश को तय करना है कि वह आए जाए या पीछे रहकर कुंठा में जीए।