मुम्बई : दीपिका पादुकोण ने एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में अवसाद पर बात की है। दीपिका ने कहा, मानसिक स्वास्थ्य का इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कितने सक्सेसफुल हो। दीपिका 2014 में इसकी शिकार हो चुकी हैं। दीपिका ने आगे कहा,’2014 में मेरी जिन्दगी में बहुत कुछ हो रहा था,लोगों को लगता था कि प्रोफेशनली वो मेरे कॅरियर का सर्वश्रेष्ठ दौर था। मैं सफलता के चरम पर थी लेकिन अवसाद में भी थी। इसके कोई वार्निंग साइन मुझे कभी महसूस नहीं हुए थे। ये किसी को भी घेर सकता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके पास कितना पैसा है और आप कितने कामयाब हो।’ दीपिका ने अवसाद से निकलने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव किए और मेडिकेशन का सहारा लिया। इस दौरान कई लोग मेरे पास आए और कहा कि उन्हें देखकर कई उन लोगों के मन से आत्महत्या के ख्याल निकल गए। उन्होंने देखा कि मैं इससे कैसे उबर पाई और फिर उन्होंने इसे अपनी जिन्दगी में आजमा कर अवसाद से मुक्ति पा ली और यही मैं चाहती थी इसलिए मुझे ख़ुशी है कि मैंने अवसाद के बारे में खुलकर बात की जो सब करने से बचते हैं। अपना दर्द समझते हुए दीपिका ने उन लोगों की मदद का जिम्मा उठाया जो अवसाद के शिकार हैं। उन्होंने ऐसे लोगों के लिए 2014 में लिव लव लाफ फाउंडेशन खोला। उन्होंने यहां आए लोगों के साथ अपने अनुभव साझा किये ताकि वह भी उससे उबर सकें। दीपिका ने इस साक्षात्कार में 2015 के आंकड़े भी गिनाए। उन्होंने बताया भारत में सिर्फ 2015 में ही अवसाद से जूझ कर आत्महत्या करने वाले युवक-युवतियों की संख्या 50000 थी।
हिन्दी-बांग्ला की काव्य धारा में झलके कबीर
कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद के तत्वावधान में कबीर जयंती के मौके पर आयोजित काव्य लहरी – 2 की छठी गोष्ठी में महान कवि संत कबीर को याद किया गया । काव्य लहरी की विशिष्टता है कि इस आयोजन में प्रत्येक बार हिंदी भाषा के साथ अन्य किसी एक क्षेत्रीय भारतीय भाषा का समागम होता है । इस बार यह आयोजन हिंदी की व्यापकता के साथ अपने साथ समेट लाई थी बांग्ला भाषा की मिठास। कवयित्री कामायनी संजय ने निराला जी लिखित सरस्वती वंदना “वर दे वीणा वादनी” का सस्वर पाठ किया। तत्पश्चात सुशील कान्ति ने कबीर के गीतों का सुरीला पाठ किया। सुकान्त कर्माकर ने बांग्ला भाषा और साहित्य पर अपना विचार रखे ।
काव्य गोष्ठी की शुरूआत हिंदी के कवि विजय शर्मा विद्रोही ने अपने धधकती शब्दों से ओत-प्रोत देश भक्ति कविता से की। कल्याण गंगोपाध्याय एवं सुकान्त कर्माकर ने बांग्ला कविताओं का पाठ किया । वागर्थ के सह संपादक सुशील कान्ति ने अपनी बूढ़े शीर्षक रचना तथा गजल का पाठ किया। शिव प्रकाश दास ने अपनी सारगर्भित कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता दामोदर वैली कॉर्पोरेशन के चेयर मैन प्रबीर मुखोपाध्याय ने की तथा मंच का कुशल संचालन कवि तथा काव्य लहरी के संयोजक व संचालक गिरिधर राय ने किया। अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रबीर मुख्योपाध्याय ने अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ ही अपनी बांग्ला कविताओं का पाठ किया। भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने आमंत्रित सभी कवियों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया । वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती प्रेम शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
सम्मानित की गयीं राजकुमारी सहारिया
कोलकाता : स्वास्थ्य होलिस्टिक हेल्थिंग सेंटर की संस्थापक राजकुमारी सहारिया को मास्टर ट्रेनर इन ऑरा एंड रेडिकल हीलिंग का पुरस्कार मिला है। उन्हें यह पुरस्कार इन्स्पायर -स्पिरिचुअल हॉलिस्टिक वेलनेस विजनरी पुरस्कार 2018 में प्रदान किया गया। पुरस्कार अभिनेत्री रिमी सेन और दिव्या दत्ता ने प्रदान किया। वे पिछले 10 साल से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए प्रेरणा है और उनको यह बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करेगा।
महानगर में मनायी गयी वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती
कोलकाता : महानगर के राष्ट्रीय पुस्तकालय के एनएलकेए सभागार में वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की जयंती पूरे उत्साह के साथ मनाई गयी। एसपी के नाम से मशहूर सुरेंद्र प्रताप सिंह धर्मयुग, रविवार और नवभारत टाइम्स के अलावा आज तक और इंडिया टुडे जैसे संस्थानों में उन्होंने बतौर फीचर सम्पादक, संपादक और स्तंभकार के रुप में अपनी सेवा दी थी। उनके नेतृत्व में कोलकाता से प्रकाशित रविवार ने हिंदी पत्रकारिता में एक नयी धारा को जन्म दिया था। इस अवसर पर वक्ताओं ने एसपी के बारे में लोगों को अधिक से अधिक जानकारी प्रदान करने की जरुरत पर बल दिया। कोलकाता की धरती से एसपी ने एक इतिहास रचा था। जो बाद में आज तक जैसे इलेक्ट्रानिक मीडिया के रुप में उभरा। आंनद बाजार पत्रिका समूह ने भी उस समय एसपी के नेतृत्व में हिंदी की ताकत को पहचाना था और इस पत्रिका ने केवल दस सालों से भी कम समय में पूरे देश में राजनीतिक पत्रिका के रुप में अपनी पहचान स्थापित की थी।

एसपी का नहीं होना हिंदी ही नहीं भारतीय पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड के बाद उनको खबर पढते समय हृदयाघात हुआ और उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहीं उनका 27 जून, 1997 को निधन हुआ था। इस समारोह का आयोजन एनएलकेए और महानायक स्मृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था। कार्यक्रम को सफल बनाने में अजय कुमार झा, रमेश द्विवेदी, राजीव चक्रवर्ती, अंशुमान भारती, पल्लव घोष, कुणाल रायचौधरी, राकेश हेला, नम्रता पांडे, रमाकांत पांडा, श्यामल साहा,शीर्षेंदू सिन्हा, रामवृक्ष राम आदि की मुख्य भूमिका थी।
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शिक्षा में अनुशासन आवश्यक, शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है: निवेदिता भिड़े

निवेदिता भिडे समाजसेवा के क्षेत्र में एक नाम है जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए अर्पित कर दिया। जब वे स्कूल में पढ़ती थी उसी वक्त से उनके अन्दर भाव जगा था कि उन्हें देश और समाज के लिए कुछ करना है। बार-बार पिता से जिद करती थीं कि उन्हें समाज के लिए कार्य करना है। पिता को भी लगा था कि थोड़ी बड़ी होगी तो उसकी इच्छा में परिवर्तन आ जाएगा इसलिए उसे आश्वस्त किया था कि जैसे ही वह स्नातक करेगी उसे सेवा के क्षेत्र में जाने की इजाजत दे दी जाएगी। यह बात कच्चे मन में बैठ गई। समय बीता पर उसके साथ मन में बैठी इच्छा और अधिक बलवती हो गई। जिस दिन स्नातक स्तर का अन्तिम पर्चा देकर घर पहुंची तो सीधे जाकर कहा कि अब मुझे ले चलो। उसकी जिद के कारण उसे विवेकानन्द केन्द्र कन्या कुमारी से जुड़ीं। एकनाथ रानाडे ने उनकी प्रतिभा पहचान ली थी। समय के साथ ही उनका ग्रामीण क्षेत्रों में काम किया। उनके सेवा कार्य को मान्यता देते हुए उनका नाम पद्मश्री के लिए घोषित किया गया। इसके बाद कोलकाता में आई निवेदिता से वरिष्ठ पत्रकार वनिता वसन्त ने बातचीत की…पेश हैं प्रमुख अंश –
नारी शिक्षा और देश का विकास
नारी शक्ति का प्रतीक है। नारी सशक्तिकरण की बात कहते है वह स्वयं ही शक्ति स्वरूपा है उसको शक्ति देने वाले हम कौन ? हमें केवल उसको सही शिक्षा में आ रही अड़चनों को दूर करना है। उनके अन्दर के सारे गुण के विकास के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर करना है। बस हमारा काम इतना ही है। उसके अन्दर की शक्ति अपने आप प्रकट होगी। यह कहना है विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की उपाध्यक्षा पद्मश्री निवेदिता भिडे का। कुछ बातें साझा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि महिलाओं का विकास ही राष्ट्र और समाज के विकास की सीढ़ी है। उनको छोडक़र न घर चल सकता है और न देश। निवेदिता ने कहा कि महिलाएं सिर्फ व्यक्ति नहीं है वह किस परिवार व समाज का अंग, किसी राष्ट्र का अंग है। ऐसे में यदि वह सोचती है कि मैं, मेरा विकास या मैं जीवन में आगे बढ़ू तो क्यों बढ़ूँ इसलिए बढ़े ताकि परिवार का, मेरे समाज का मेरे राष्ट्र का अच्छा करने के लिए आगे बढ़ूं पर दुखद है कि यह भाव मन में नहीं आता। हम अभी माई च्वाएश की तर्ज पर आगे बढ़ रहे है यानी मैं चाहे यह करु मैं चाहे वह करु मेरी मर्जी। चाहे वह कपड़े पहनने हो, खाना हो या फिर संबंध बनाना हो सिर्फ इच्छा पर केन्द्रित हो गया है। ऐसा आत्मकेन्द्रित व्यक्ति भोगवाद को जन्म देता है। भोगवाद से हम अपने ही इंद्रियों के गुलाम बन कर रह जाते हैं। इससे जीवन में जो योगदान वह कर सकते थे वह नहीं कर पाते। शिक्षा हो या नारी सशक्तिकरण दोनों ही परिपेक्ष्य में चिन्तन होना चाहिए वैसा हो नहीं रहा है।
शिक्षा व उसका परिवेश
हर एक व्यक्ति के अन्दर जो श्रेष्ठता है, अच्छाई है उसका प्रकटीकरण ही शिक्षा है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मनुष्य को स्वयं पर नियन्त्रण करने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे विवेकानन्द कहते है प्रत्येक आत्मा सुप्त ईश्वरत्व है। उसका प्रकटीकरण करना अनुभूति करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसलिए शिक्षा में अनुशासन आना चाहिए। हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए वह आना चाहिए। चाहे लडक़ी हो चाहे लडक़ा हो दोनों को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है। आज के समय के शिक्षण में नियन्त्रण, अनुशासन आता ही नहीं है। ज्यादा से ज्यादा स्वयं का विचार करो, स्व केन्द्रित बनो। मेरा क्या है, मेरा विकास तक ही सोच रहे है। यदि हम एक बार यह विचार करे की हम इस परिवार का, समाज का, राष्ट्र का, देश का अंग है। उसके प्रति भी हमारा कत्वर्य है। मैं समाज में रहता हूं तो हमारे व्यवहार खुद बु खुद अच्छा ही होगा क्योंकि यदि हम उसे अंग मान रहे है तो समाज की बुराई के लिए कुछ गलत कदम नहीं उठाएंगे। यदि समाज का अंग हूं और यदि मैं गलत करता हूं तो समाज बिगड़ेगा और समाज बिगड़ेगा तो मैं उसका अंग होने के नाते हमारा जीवन भी कही न कही प्रभावित होगा।
पाठ्यक्रम में बदलाव
पाठ्यक्रम में बदलाव लाने से बदलाव आएगा ऐसा मुझे नहीं लगता। पर बदलाव से सब ठीक हो जाएगा यह जरूरी नहीं है। क्योंकि घर का वातारण भी योग्य होना चाहिए। हमारा पाठ्यक्रम सही नहीं था फिर भी समाज काफी हद तक चल रहा है उसका कारण हमारे घर के संस्कार थे। लेकिन वह भी कम होते जा रहे हो तो पाठ्यक्रम ठीक करने से कुछ होगा नहीं। मान लीजिए पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप की कहानी है जिसे शिक्षक बेमन से पढ़ा रहा है उसमें महाराणा प्रताप के हृदय में प्रति भाव नहीं है वह भाव वह बच्चों तक प्रसारित नहीं करेगा। वह सिर्फ जानकारी प्रेषित करेगा। हमारे समाज में ऐसे भी शिक्षक है जो पूरे मनोयोग और पूरे भाव के साथ बच्चों को पढ़ाते है पर हमारे समाज में उनको एक्नोलेज, सम्मान नहीं किया जाता। उनको समझा नहीं जाता। ऐसे शिक्षिक जो मूल्य बोध देते है उन्हें आगे लाना और पाठ्यक्रम में थोड़ा बदलाव लाया जा सकता है। परिवेश और संस्कार ठीक रहे तभी शिक्षा अपने आप में सम्पूर्ण होगी।
मानव जीवन का लक्ष्य
मानव जीवन को पशु जीवन से ऊपर उठना फिर मानव जीवन से खुद को उससे ऊपर उठाना यानी फिर दैवीय व ईश्वरीय स्तर तक ऊपर उठाना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है तभी तो हम विकास की ओर जाएगा जिसे हम आत्मविश्वास कहते है मनुष्य में थोड़ा उच्च प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है। इंस्टीग्टि बेस नहीं है। मनुष्य इंटेलिक्ट बेस है। तर्क से अपने जीवन का प्रयोजन समझते समझते वह जो कार्य करता है जिससे आखिर उसमें अन्तप्रेरणा भी आती है। तो वह अन्तरप्रेरणा जागृत करना भी शिक्षा का भी इम्पावरमेंट का गी हेतू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते है जिस दिन हम उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर जोर देंगे उस दिन समाज की बहुत सारी समस्याएं खत्म हो जाएगी। जब हम राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है उसका अर्थ है कि राष्ट्र मैं सभी को सही शिक्षा, भोजन, मेडिकल आदि की मूलभूत अवसरंचना हो। यदि सिर्फ बाहरी विकास पर ही ध्यान देना है तो राष्ट्र को राष्ट्र ही है बोल नहीं कह सकते है। जैसे ग्रीस है पुराने पुरखो की ही पीढिय़ां है। अवसंरचना है पर ग्रीस संस्कृति नहीं है। इसलिए पुरातन राष्ट्र चला गया। राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है तो स्वामीजी तो उसका आशय यह है कि हर राष्ट्र का कोई विशेषता होती है। जो सारे मानव समाज के विकास के लिए आवश्यक होती है। हर राष्ट्र को कुछ न कुछ योगदान करना है। हमारे राष्ट्र को आत्मीयता पर आधारित परिवार कैसे होता है, समाज कैसा होता इसी आत्मीयता के कारण ही विविधता के कारण ही एक साथ रहने की एक साथ कैसे रह सकते है। यह हमारा ही राष्ट्र सीखा सकता है क्योंकि यह ताकत हमारे राष्ट्र में है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि विविधता के साथ कैसे एक साथ होकर रहा जा सकता है तो वह केवल भारत ही सीखा सकता है। यह सत्य है।
शिक्षा को वास्तविकता से जोड़िए, जबरन सरलीकरण समाधान नहीं बल्कि घातक है
दाखिले का मौसम बस चल ही रहा है..मेधा का आधार परीक्षाओं में प्राप्त अधिकतम अंक ही रह गये हैं। नतीजा यह है कि मेधावी विद्यार्थी भी अब 98 प्रतिशत पाकर भी असन्तुष्ट हैं। अधिक से अधिक अंक बटोरने के चक्कर में उनका जीवन अब स्कूल और कोचिंग के बीच सिमटता जा रहा है मगर इसका नतीजा क्या हो रहा है, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इस बीच जिन बच्चों को अच्छे अंक नहीं मिले हैं, उनके बारे में सोचिए…माता – पिता से लेकर रिश्तेदारों और शिक्षण संस्थानों और बोर्ड तक ने यह माहौल बना दिया है जैसे उनको जीने का अधिकार ही नहीं है। बच्चे यही समझ भी रहे हैं और इसलिए बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ने वाले बच्चों को मौत जिन्दगी से अधिक प्यारी लग रही है मगर सोचिए तो क्या ये बच्चों का दोष है? ऐसे ही बच्चे तो नशे की चपेट में आते हैं, अवसादग्रस्त होते हैं और कई बार अपराध की राह पर निकल पड़ते हैं। कहने को हमें सन्तोष और परिश्रम को धन मानना सिखाया गया है मगर खुद से पूछिए क्या आपकी जिन्दगी का हिस्सा हैं या ये सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह गये हैं? अगर आप अपना हर छोटा काम बनाने के लिए पहुँच, सिफारिश, रिश्वत और ताकत का सहारा ले रहे हैं तो क्या आपको अधिकार है कि आप बच्चों से नैतिकता और विश्वास की उम्मीद करें। अपने बोर्ड को बेहतर बनाने के चक्कर में हर एक बोर्ड, यहाँ तक कि राज्य स्तर के बोर्ड भी परीक्षाओं का अत्यधिक सरलीकृत कर रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि बच्चों को अधिक से अधिक अंक मिले मगर यह उनकी चिन्ता का विषय नहीं है कि बच्चा क्या सीख रहा है और जीवन की लम्बी दौड़ में ये अंक इस गलाकाट प्रतियोगिता में कहाँ तक साथ दे रहे हैं या दे सकते हैं। हर साल टॉपर आते हैं, जाते हैं मगर कुछ समय बाद वे कही नहीं दिखायी देते। बच्चा बस्ते का बोझ लेकर घूम रहा है मगर उसे जानकारी और व्यावहारिक ज्ञान न के बराबर मिल रहा है। स्कूलों में शिक्षक कई बार बगैर सिखाए मुश्किल प्रोजेक्ट देते हैं तो कहने की जरूरत नहीं है कि ये प्रोजेक्ट भी अभिभावक ही पूरा करते हैं। बच्चे ने कुछ नहीं सीखा…एक समय था जब 40 प्रतिशत अंक पाकर भी जीने की लालसा और कुछ करने की उम्मीद बनी रहती थी क्योंकि हमारा जोर सीखने और सिखाने पर रहता था। कक्षा में प्रथम आने वाले छात्र – छात्राएँ कुछ दिनों तक भले ही अकड़ में रहें मगर बात जब गतिविधियों की होती थी तो उनको भी साथ आना पड़ता था। टॉपर न रहने पर भी तब लिखना सिखाया जाता था, बड़े प्रश्न लिखने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। हिन्दी में शत – प्रतिशत अंक कभी नहीं मिले मगर फिर भी लिखना आ गया…आज शत – प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी यह दावा नहीं कर सकते है कि वे लिखना जानते हैं या उनसे त्रुटियाँ नहीं होंगी। वे अपने विषय की पूर्ण जानकारी होने का दावा नहीं कर सकते।

रटन्त विद्या से वे भले ही प्रोजेक्ट प्रदशर्नियों में रटकर सुना दें मगर क्या उनमें समझाने, समूह में सबको साथ लेकर चलने और असफलता को सफलता में बदलने का गुण हैं? क्या आपकी शिक्षा पद्धति अनजाने ही उनको मशीन में नहीं बदल रही है, क्या उनको इतना कमजोर नहीं बना रही है कि वे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की बजाय नशे और अवसाद की चपेट में आ रहे? सब जानते हैं कि अंक जीवन की दौड़ में बहुत दूर तक साथ नहीं देते..अगर ऐसा होता तो पढ़े – लिखे युवा अवसाद की चपेट में नहीं आते। अन्ततः आपका आत्मबल ही जीवन में आपका साथ देता है, अंक नहीं देते तो फिर क्यों शिक्षा प्रणाली का जबरन सरलीकरण किया जा रहा है जो घातक है…इससे किसी बोर्ड का भला हो सकता है मगर न तो ये विद्यार्थी के हित में है और न ही देश के भविष्य के लिए फायदेमंद हैं। जरूरी है कि शिक्षा को जड़ों से जोड़ा जाए…हमारी परम्परागत कलाओं और हस्तशिल्प को पाठ्यक्रम में फैशन के लिए ही न रखें…बच्चों को खेत और जंगल दिखाएँ..कारखाने दिखाएँ….। आज कई शिक्षित युवाा अपनी डिग्री को लेकर इतने अधिक मोहग्रस्त होते हैं कि कोई और काम करना उनको अपनी तौहीन लगता है मगर वह ये नहीं जानते कि ऐसा करके वे अवसरों को अपनी सीमा बना रहे हैं जो बाद में उनको एकाकी और हताश ही करेगा। शिक्षा ऐसी हो जो हमारे पारम्परिक क्षेत्रों को मजबूत बनाएँ जिससे किसी किसान को आत्महत्या न करनी पड़े जो मजदूरी को सुरक्षित बनाए और सम्मान बनाए। कारीगर न हों तो कोई भी उद्योग नहीं चल सकता तो श्रम का सम्मान देना भी आवश्यक है और यह शिक्षा प्रणाली के सरलीकरण से नहीं होगा। पढ़ाई के साथ उनके पास विकल्प हो जिससे अगर उनको नौकरी न मिले तो भी उनके लिए रोजगार का अभाव समस्या न बनें। ताकि वे जीवन की वास्तविकता समझें वरना शिक्षा का सरलीकरण घातक ही साबित होगा।
अनसुलझी समस्याओं को छोडऩे का नतीजा अतिवाद : प्रो.अरुण त्रिपाठी
कोलकाता : भारत सहित समूचे विश्व में अतिवाद हावी होता जा रहा है और इसकी उत्पत्ति अनसुलझे सामाजिक, आर्थिक और दूसरी मौलिक समस्याओं से हुई हैं। ये बातें महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रोफेसर अरुण त्रिपाठी ने कहीं। इस मौके पर पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने पत्रकारिता में तथ्य और संतुलित नजरिया अपनाने की सलाह दी। दोनों विनय तरुण स्मृति समारोह में अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद विषय पर बोल रहे थे।
दस्तक की ओर से आयोजित समारोह में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हर युग, कालखंड में अतिवाद रहा है। सभ्यताओं के संघर्ष और वैश्वीकरण से दुुनिया में अतिवादी हावी होता रहा। भारत में इसके अलावा जाति संघर्ष और गरीबी ने अतिवाद को जन्म दिया है, जो इन दिनों हावी है। उन्होंने कहा कि अतिवाद एक रूप में खत्म होता है तो दूसरे नए रूप में पैदा हो जा रहा है। इन दिनों महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित दूसरे महापुरूषों के आदर्शों को अपनी तरह से व्याख्या कर नए नए अतिवाद को जन्म दिया जा रहा है। व्यक्तिगत और तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाई जा रही है। सुजात बुखारी जैसे पत्रकार की हत्या कर दी गई। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में उदारता खत्म होती जा रही है और उसकी जगह अतिवाद स्थान ले रहा है। ऐसे में वैकल्पिक रास्ता ढ़ंूढना पत्रकारों की जिम्मेदारी है और यह महात्मा गांधी के सत्याग्रह आदर्श के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। वजह गांधी खुद में समवन्य के दौर हैं। इससे पहले पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने कहा कि महात्मा गांधी सबसे बड़ा पत्रकार थे। उन्होंने सत्य और अङ्क्षहसा की राह पर चलने का उपदेश दिया था। भारतीय पत्रकारिता में भी अतिवाद प्रवेश कर गया है। समाचार चैनल और कुछ अखबार सिर्फ सरकार के खिलाफ लिखते हैं तो कुछ सिर्फ उसके पक्ष में लिखते हैं।
इस मौके पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध से संवाद खत्म करने से लोकतंत्र ध्वस्त हो जाता है और दुराचार व अतिवाद पैदा होता है। इन दिनों देश में अतिवाद और तर्कहिंसा का दौर चल रहा है। पत्रकारिता से उसका मूल चरित्र प्रतिवाद करना ही खत्म हो गया है। इसका अंत और सत्य की वापसी संभव है। इस मौके पर डॉ. सुधांशु कुमार की पुस्तक नारद कमीशन का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अखिलेश्वर पाण्डे ने किया और मौके पर दिवंगत पत्रकार विनय तरुण के सहपाठी उपस्थित थे।
हिंदी और हावड़ा के गौरव थे पत्रकार राजकिशोर
कोलकाता : देश के प्रतिष्ठित पत्रकार राजकिशोर हिंदी के एक कुशल गद्यकार, राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक थे। उनके पाठकों का एक बड़ा समुदाय था। वे कवि और उपन्यासकार होने के अलावा अपने युवा काल में विभिन्न आंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं। हावड़ा उनकी जन्मभूमि और लंबे समय तक कोलकाता कर्मभूमि थी। कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक ‘रविवार’ में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय देते हुए दिल्ली के ‘नवभारत टाइम्स’ में छह साल तक थे। वे गांधी और लोहिया के विचारों से प्रभावित थे। सही अर्थों में स्वतंत्र पत्रकार और हिंदी के प्रायः सभी बड़े अखबारों के स्तंभ लेखक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में एक कीर्तिमान स्थापित किया है।
राजकिशोर की 71 साल की अवस्था में दिल्ली में निधन के बाद लालबाबा कॉलेज, बेलूड़ में आयोजित एक स्मरण सभा में हिंदी लेखकों और समाजसेवियों ने अपने प्रिय लेखक को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उनकी जीवन-यात्रा पर सौमित्र जायसवाल ने एक सुंदर डिजिटल प्रस्तुति की। राजकिशोर के विद्यार्थी जीवन के सखा डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि राजकिशोर की सहज, चुटीली और तार्किक भाषा ने हिंदी पत्रकारिता का एक आदर्श खड़ा किया है। उन्होंने विचारों और मूल्यों के लिए जीवन में कभी समझौता नहीं किया। दिल्ली में उनकी अंत्येष्टि तक बहुत सादगी से हुई, जैसा वे चाहते थे। अभावों तथा शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए 50 सालों तक बिना थके वे लिखते रहे। लेखन ही राजकिशोर का जीवन था। राजकिशोर ने भारतीय भाषा परिषद द्वारा आठ खंडों में शीघ्र प्रकाश्य ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ के भाषा संपादक के रूप में भी काम किया है।
एमएसटीसी के महाप्रबंधक और लेखक मृत्युंजय ने उन्हें याद करते हुए कहा कि राजकिशोर बड़े सहज, मिलनसार और खुशदिल इन्सान थे। वे सच्चे अर्थों में बौद्धिक रूप से स्वतंत्र पत्रकार थे। विद्यासागर विश्वविद्यालय के प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि उनका छल कपट से रहित पारदर्शी व्यक्तित्व और उनके विचार नई पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे। राजकिशोर के मित्र और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी महेश जायसवाल ने कहा कि वे अपने निजी दुखों से ज्यादा देश-दुनिया की चिंता करते थे।
लालबाबा कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.संजय कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि हावड़ा ने अपना एक बड़ा साहित्यिक रत्न खो दिया। स्मरण सभा में शंकर कुमार सान्याल, शैलेंद्र, प्रो.आशुतोष सिंह, बिहारी लाल चौधरी, शिवनारायण गुप्त, चंद्रिका प्रसाद अनुरागी, मंजू बैज, श्रद्धांजलि सिंह, यशवंत सिंह, पूजा गुप्ता, सेराज खान बातिश, जितेंद्र सिंह, ब्रजमोहन सिंह, प्रो.ललित कुमार झा आदि ने अपने भावोद्गार व्यक्त किए। श्रद्धांजलि देन वालों में थे- डॉ.शिवनाथ पांडेय, विष्णु गोस्वामी, जितेंद्र जितांशु, रघुनाथ सिंह, रामजी प्रसाद, काली प्रसाद गुप्त और राजकिशोर के परिवार के अशोक साव, सोनालाल साव आदि।
आदि शिव…अनादि शिव….आदि योगी ….नृत्य के प्रणेता…..अनन्त शिव
भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। शिव ही आदि योगी हैं। कहते हैं कि इन्होंने ही कृष्ण को योगेश्वर बनाया। इनकी मुद्राओं से ही नृत्य की उत्पत्ति हुई। कैलाश पर्वत पर इनका वास है और कहते हैं कि इनके ही त्रिशूल पर काशी टिकी है। भारत के प्रत्येक काल खंड में शिव विविध रूपों में रहे हैं। शिव सिर्फ कल्पना नहीं है क्योंकि देश के कई हिस्सों में इनके पदचिह्न हैं…शिव भारत का विश्वास हैं। शिव से सम्बन्धित रहस्य हैं –


35.शिव हर काल में : भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे।




