Thursday, July 9, 2026
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अवसाद का पैसे और सफलता से कोई रिश्ता नहीं है : दीपिका

मुम्बई : दीपिका पादुकोण ने एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में अवसाद पर बात की है। दीपिका ने कहा, मानसिक स्वास्थ्य का इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कितने सक्सेसफुल हो। दीपिका 2014 में इसकी शिकार हो चुकी हैं। दीपिका ने आगे कहा,’2014 में मेरी जिन्दगी में बहुत कुछ हो रहा था,लोगों को लगता था कि प्रोफेशनली वो मेरे कॅरियर का सर्वश्रेष्ठ दौर था। मैं सफलता के चरम पर थी लेकिन अवसाद में भी थी। इसके कोई वार्निंग साइन मुझे कभी महसूस नहीं हुए थे। ये किसी को भी घेर सकता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके पास कितना पैसा है और आप कितने कामयाब हो।’ दीपिका ने अवसाद से निकलने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव किए और मेडिकेशन का सहारा लिया। इस दौरान कई लोग मेरे पास आए और कहा कि उन्हें देखकर कई उन लोगों के मन से आत्महत्या के ख्याल निकल गए। उन्होंने देखा कि मैं इससे कैसे उबर पाई और फिर उन्होंने इसे अपनी जिन्दगी में आजमा कर अवसाद से मुक्ति पा ली और यही मैं चाहती थी इसलिए मुझे ख़ुशी है कि मैंने अवसाद के बारे में खुलकर बात की जो सब करने से बचते हैं। अपना दर्द समझते हुए दीपिका ने उन लोगों की मदद का जिम्मा उठाया जो अवसाद के शिकार हैं। उन्होंने ऐसे लोगों के लिए 2014 में लिव लव लाफ फाउंडेशन खोला। उन्होंने यहां आए लोगों के साथ अपने अनुभव साझा किये ताकि वह भी उससे उबर सकें। दीपिका ने इस साक्षात्कार में 2015 के आंकड़े भी गिनाए। उन्होंने बताया भारत में सिर्फ 2015 में ही अवसाद से जूझ कर आत्महत्या करने वाले युवक-युवतियों की संख्या 50000 थी।

हिन्दी-बांग्ला की काव्य धारा में झलके कबीर

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद के तत्वावधान में कबीर जयंती के मौके पर आयोजित काव्य लहरी – 2 की छठी गोष्ठी में महान कवि संत कबीर को याद किया गया । काव्य लहरी की विशिष्टता है कि इस आयोजन में प्रत्येक बार हिंदी भाषा के साथ अन्य किसी एक क्षेत्रीय भारतीय भाषा का समागम होता है । इस बार यह आयोजन हिंदी की व्यापकता के साथ अपने साथ समेट लाई थी बांग्ला भाषा की मिठास। कवयित्री कामायनी संजय ने निराला जी लिखित सरस्वती वंदना “वर दे वीणा वादनी” का सस्वर पाठ किया। तत्पश्चात सुशील कान्ति ने कबीर के गीतों का सुरीला पाठ किया। सुकान्त कर्माकर ने बांग्ला भाषा और साहित्य पर अपना विचार रखे ।
काव्य गोष्ठी की शुरूआत हिंदी के कवि विजय शर्मा विद्रोही ने अपने धधकती शब्दों से ओत-प्रोत देश भक्ति कविता से की। कल्याण गंगोपाध्याय एवं सुकान्त कर्माकर ने बांग्ला कविताओं का पाठ किया । वागर्थ के सह संपादक सुशील कान्ति ने अपनी बूढ़े शीर्षक रचना तथा गजल का पाठ किया। शिव प्रकाश दास ने अपनी सारगर्भित कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता दामोदर वैली कॉर्पोरेशन के चेयर मैन प्रबीर मुखोपाध्याय ने की तथा मंच का कुशल संचालन कवि तथा काव्य लहरी के संयोजक व संचालक गिरिधर राय ने किया। अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रबीर मुख्योपाध्याय ने अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ ही अपनी बांग्ला कविताओं का पाठ किया। भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने आमंत्रित सभी कवियों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया । वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती प्रेम शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

सम्मानित की गयीं राजकुमारी सहारिया

कोलकाता : स्वास्थ्य होलिस्टिक हेल्थिंग सेंटर की संस्थापक राजकुमारी सहारिया को मास्टर ट्रेनर इन ऑरा एंड रेडिकल हीलिंग का पुरस्कार मिला है। उन्हें यह पुरस्कार इन्स्पायर -स्पिरिचुअल हॉलिस्टिक वेलनेस विजनरी पुरस्कार 2018 में प्रदान किया गया। पुरस्कार अभिनेत्री रिमी सेन और दिव्या दत्ता ने प्रदान किया। वे पिछले 10 साल से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए प्रेरणा है और उनको यह बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करेगा।

महानगर में मनायी गयी वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती

कोलकाता : महानगर के राष्‍ट्रीय पुस्‍तकालय के एनएलकेए सभागार में  वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की जयंती पूरे उत्‍साह के साथ मनाई गयी। एसपी के नाम से मशहूर सुरेंद्र प्रताप सिंह धर्मयुग, रविवार और नवभारत टाइम्‍स के अलावा आज तक और इंडि‍या टुडे जैसे संस्‍थानों में उन्‍होंने बतौर फीचर सम्पादक, संपादक और स्‍तंभकार के रुप में अपनी सेवा दी थी। उनके नेतृत्‍व में कोलकाता से प्रकाशि‍त रवि‍वार ने हिंदी पत्रकारि‍ता में एक नयी धारा को जन्‍म दिया था। इस अवसर पर वक्‍ताओं ने एसपी के बारे में लोगों को अधिक से अधिक जानकारी प्रदान करने की जरुरत पर बल दिया। कोलकाता की धरती से एसपी ने एक इति‍हास रचा था। जो बाद में आज तक जैसे इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के रुप में उभरा। आंनद बाजार पत्रिका समूह ने भी उस समय एसपी के नेतृत्‍व में हिंदी की ताकत को पहचाना था और इस पत्रिका ने केवल दस सालों से भी कम समय में पूरे देश में राजनीति‍क पत्र‍िका के रुप में अपनी पहचान स्‍थापि‍त की थी।

एसपी का नहीं होना हिंदी ही नहीं भारतीय पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। दिल्‍ली के उपहार सिनेमा कांड के बाद उनको खबर पढते समय हृदयाघात हुआ और उन्‍हें दि‍ल्‍ली के अपोलो अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। वहीं उनका 27 जून, 1997 को निधन हुआ था। इस समारोह का आयोजन एनएलकेए और महानायक स्‍मृति संस्‍थान के संयुक्‍त तत्‍वावधान में किया गया था। कार्यक्रम को सफल बनाने में अजय कुमार झा, रमेश द्विवेदी, राजीव चक्रवर्ती, अंशुमान भारती, पल्‍लव घोष, कुणाल रायचौधरी, राकेश हेला, नम्रता पांडे, रमाकांत पांडा, श्‍यामल साहा,शीर्षेंदू सिन्‍हा, रामवृक्ष राम आदि की मुख्‍य भूमिका थी।

आपके सहयोग की जरूरत है

संस्था हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी कुछ बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान करेगी।10 वीं में उतीर्ण विद्यार्थियों का तो छात्रवृति मिलने वाली आर्थिक सहयोग से काम चल जाता है।लेकिन साइंस स्ट्रीम से पढ़ने वाले विद्यार्थियों का ग्रेजुएशन में आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।कॉपी,किताब और फीस के अलावे भी कई खर्च होते है।।आज ऐसे ही एक विद्यार्थी का यथाशक्ति संस्था ने आर्थिक सहयोग किया।
संस्था के अध्यक्ष डॉ. एस. सिंह अमित साव को मैथ आनर्स में दाखिले के लिये आर्थिक सहयोग के तौर पर चेक देते हुए
यदि आप सभी भी थोड़ा सहयोग कर दे तो कई विद्यार्थियों के शिक्षा में आर्थिक रुकावट नहीं आ पायेगी और उनकी पढ़ाई सुचारू रूप से चलेगी। यदि आप सहयोग करना चाहते है तो बैंक डिटेल और संस्था का पेटीएम नंबर नीचे दिया हुआ।आपके छोटे से सहयोग से कई चेहरों पर मुस्कान ला सकते है।
पेटियम_नम्बर
9123098071

शिक्षा में अनुशासन आवश्यक, शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है: निवेदिता भिड़े

वनिता वसन्त

निवेदिता भिडे समाजसेवा के क्षेत्र में एक नाम है जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए अर्पित कर दिया। जब वे स्कूल में पढ़ती थी उसी वक्त से उनके अन्दर भाव जगा था कि उन्हें देश और समाज के लिए कुछ करना है। बार-बार पिता से जिद करती थीं कि उन्हें समाज के लिए कार्य करना है। पिता को भी लगा था कि थोड़ी बड़ी होगी तो उसकी इच्छा में परिवर्तन आ जाएगा इसलिए उसे आश्वस्त किया था कि जैसे ही वह स्नातक करेगी उसे सेवा के क्षेत्र में जाने की इजाजत दे दी जाएगी। यह बात कच्चे मन में बैठ गई। समय बीता पर उसके साथ मन में बैठी इच्छा और अधिक बलवती हो गई। जिस दिन स्नातक स्तर का अन्तिम पर्चा देकर घर पहुंची तो सीधे जाकर कहा कि अब मुझे ले चलो। उसकी जिद के कारण उसे विवेकानन्द केन्द्र कन्या कुमारी से जुड़ीं। एकनाथ रानाडे ने उनकी प्रतिभा पहचान ली थी। समय के साथ ही उनका ग्रामीण क्षेत्रों में काम किया। उनके सेवा कार्य को मान्यता देते हुए उनका नाम पद्मश्री के लिए घोषित किया गया। इसके बाद कोलकाता में आई निवेदिता से वरिष्ठ पत्रकार वनिता वसन्त ने बातचीत की…पेश हैं प्रमुख अंश –

नारी शिक्षा और देश का विकास
नारी शक्ति का प्रतीक है। नारी सशक्तिकरण की बात कहते है वह स्वयं ही शक्ति स्वरूपा है उसको शक्ति देने वाले हम कौन ? हमें केवल उसको सही शिक्षा में आ रही अड़चनों को दूर करना है। उनके अन्दर के सारे गुण के विकास के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर करना है। बस हमारा काम इतना ही है। उसके अन्दर की शक्ति अपने आप प्रकट होगी। यह कहना है विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की उपाध्यक्षा पद्मश्री निवेदिता भिडे का। कुछ बातें साझा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि महिलाओं का विकास ही राष्ट्र और समाज के विकास की सीढ़ी है। उनको छोडक़र न घर चल सकता है और न देश। निवेदिता ने कहा कि महिलाएं सिर्फ व्यक्ति नहीं है वह किस परिवार व समाज का अंग, किसी राष्ट्र का अंग है। ऐसे में यदि वह सोचती है कि मैं, मेरा विकास या मैं जीवन में आगे बढ़ू तो क्यों बढ़ूँ इसलिए बढ़े ताकि परिवार का, मेरे समाज का मेरे राष्ट्र का अच्छा करने के लिए आगे बढ़ूं पर दुखद है कि यह भाव मन में नहीं आता। हम अभी माई च्वाएश की तर्ज पर आगे बढ़ रहे है यानी मैं चाहे यह करु मैं चाहे वह करु मेरी मर्जी। चाहे वह कपड़े पहनने हो, खाना हो या फिर संबंध बनाना हो सिर्फ इच्छा पर केन्द्रित हो गया है। ऐसा आत्मकेन्द्रित व्यक्ति भोगवाद को जन्म देता है। भोगवाद से हम अपने ही इंद्रियों के गुलाम बन कर रह जाते हैं। इससे जीवन में जो योगदान वह कर सकते थे वह नहीं कर पाते। शिक्षा हो या नारी सशक्तिकरण दोनों ही परिपेक्ष्य में चिन्तन होना चाहिए वैसा हो नहीं रहा है।
शिक्षा व उसका परिवेश
हर एक व्यक्ति के अन्दर जो श्रेष्ठता है, अच्छाई है उसका प्रकटीकरण ही शिक्षा है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मनुष्य को स्वयं पर नियन्त्रण करने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे विवेकानन्द कहते है प्रत्येक आत्मा सुप्त ईश्वरत्व है। उसका प्रकटीकरण करना अनुभूति करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसलिए शिक्षा में अनुशासन आना चाहिए। हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए वह आना चाहिए। चाहे लडक़ी हो चाहे लडक़ा हो दोनों को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है। आज के समय के शिक्षण में नियन्त्रण, अनुशासन आता ही नहीं है। ज्यादा से ज्यादा स्वयं का विचार करो, स्व केन्द्रित बनो। मेरा क्या है, मेरा विकास तक ही सोच रहे है। यदि हम एक बार यह विचार करे की हम इस परिवार का, समाज का, राष्ट्र का, देश का अंग है। उसके प्रति भी हमारा कत्वर्य है। मैं समाज में रहता हूं तो हमारे व्यवहार खुद बु खुद अच्छा ही होगा क्योंकि यदि हम उसे अंग मान रहे है तो समाज की बुराई के लिए कुछ गलत कदम नहीं उठाएंगे। यदि समाज का अंग हूं और यदि मैं गलत करता हूं तो समाज बिगड़ेगा और समाज बिगड़ेगा तो मैं उसका अंग होने के नाते हमारा जीवन भी कही न कही प्रभावित होगा।

पाठ्यक्रम में बदलाव
पाठ्यक्रम में बदलाव लाने से बदलाव आएगा ऐसा मुझे नहीं लगता। पर बदलाव से सब ठीक हो जाएगा यह जरूरी नहीं है। क्योंकि घर का वातारण भी योग्य होना चाहिए। हमारा पाठ्यक्रम सही नहीं था फिर भी समाज काफी हद तक चल रहा है उसका कारण हमारे घर के संस्कार थे। लेकिन वह भी कम होते जा रहे हो तो पाठ्यक्रम ठीक करने से कुछ होगा नहीं। मान लीजिए पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप की कहानी है जिसे शिक्षक बेमन से पढ़ा रहा है उसमें महाराणा प्रताप के हृदय में प्रति भाव नहीं है वह भाव वह बच्चों तक प्रसारित नहीं करेगा। वह सिर्फ जानकारी प्रेषित करेगा। हमारे समाज में ऐसे भी शिक्षक है जो पूरे मनोयोग और पूरे भाव के साथ बच्चों को पढ़ाते है पर हमारे समाज में उनको एक्नोलेज, सम्मान नहीं किया जाता। उनको समझा नहीं जाता। ऐसे शिक्षिक जो मूल्य बोध देते है उन्हें आगे लाना और पाठ्यक्रम में थोड़ा बदलाव लाया जा सकता है। परिवेश और संस्कार ठीक रहे तभी शिक्षा अपने आप में सम्पूर्ण होगी।
मानव जीवन का लक्ष्य
मानव जीवन को पशु जीवन से ऊपर उठना फिर मानव जीवन से खुद को उससे ऊपर उठाना यानी फिर दैवीय व ईश्वरीय स्तर तक ऊपर उठाना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है तभी तो हम विकास की ओर जाएगा जिसे हम आत्मविश्वास कहते है मनुष्य में थोड़ा उच्च प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है। इंस्टीग्टि बेस नहीं है। मनुष्य इंटेलिक्ट बेस है। तर्क से अपने जीवन का प्रयोजन समझते समझते वह जो कार्य करता है जिससे आखिर उसमें अन्तप्रेरणा भी आती है। तो वह अन्तरप्रेरणा जागृत करना भी शिक्षा का भी इम्पावरमेंट का गी हेतू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते है जिस दिन हम उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर जोर देंगे उस दिन समाज की बहुत सारी समस्याएं खत्म हो जाएगी। जब हम राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है उसका अर्थ है कि राष्ट्र मैं सभी को सही शिक्षा, भोजन, मेडिकल आदि की मूलभूत अवसरंचना हो। यदि सिर्फ बाहरी विकास पर ही ध्यान देना है तो राष्ट्र को राष्ट्र ही है बोल नहीं कह सकते है। जैसे ग्रीस है पुराने पुरखो की ही पीढिय़ां है। अवसंरचना है पर ग्रीस संस्कृति नहीं है। इसलिए पुरातन राष्ट्र चला गया। राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है तो स्वामीजी तो उसका आशय यह है कि हर राष्ट्र का कोई विशेषता होती है। जो सारे मानव समाज के विकास के लिए आवश्यक होती है। हर राष्ट्र को कुछ न कुछ योगदान करना है। हमारे राष्ट्र को आत्मीयता पर आधारित परिवार कैसे होता है, समाज कैसा होता इसी आत्मीयता के कारण ही विविधता के कारण ही एक साथ रहने की एक साथ कैसे रह सकते है। यह हमारा ही राष्ट्र सीखा सकता है क्योंकि यह ताकत हमारे राष्ट्र में है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि विविधता के साथ कैसे एक साथ होकर रहा जा सकता है तो वह केवल भारत ही सीखा सकता है। यह सत्य है।

शिक्षा को वास्तविकता से जोड़िए, जबरन सरलीकरण समाधान नहीं बल्कि घातक है

दाखिले का मौसम बस चल ही रहा है..मेधा का आधार परीक्षाओं में प्राप्त अधिकतम अंक ही रह गये हैं। नतीजा यह है कि मेधावी विद्यार्थी भी अब 98 प्रतिशत पाकर भी असन्तुष्ट हैं। अधिक से अधिक अंक बटोरने के चक्कर में उनका जीवन अब स्कूल और कोचिंग के बीच सिमटता जा रहा है मगर इसका नतीजा क्या हो रहा है, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इस बीच जिन बच्चों को अच्छे अंक नहीं मिले हैं, उनके बारे में सोचिए…माता – पिता से लेकर रिश्तेदारों और शिक्षण संस्थानों और बोर्ड तक ने यह माहौल बना दिया है जैसे उनको जीने का अधिकार ही नहीं है। बच्चे यही समझ भी रहे हैं और इसलिए बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ने वाले बच्चों को मौत जिन्दगी से अधिक प्यारी लग रही है मगर सोचिए तो क्या ये बच्चों का दोष है? ऐसे ही बच्चे तो नशे की चपेट में आते हैं, अवसादग्रस्त होते हैं और कई बार अपराध की राह पर निकल पड़ते हैं। कहने को हमें सन्तोष और परिश्रम को धन मानना सिखाया गया है मगर खुद से पूछिए क्या आपकी जिन्दगी का हिस्सा हैं या ये सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह गये हैं? अगर आप अपना हर छोटा काम बनाने के लिए पहुँच, सिफारिश, रिश्वत और ताकत का सहारा ले रहे हैं तो क्या आपको अधिकार है कि आप बच्चों से नैतिकता और विश्वास की उम्मीद करें। अपने बोर्ड को बेहतर बनाने के चक्कर में हर एक बोर्ड, यहाँ तक कि राज्य स्तर के बोर्ड भी परीक्षाओं का अत्यधिक सरलीकृत कर रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि बच्चों को अधिक से अधिक अंक मिले मगर यह उनकी चिन्ता का विषय नहीं है कि बच्चा क्या सीख रहा है और जीवन की लम्बी दौड़ में ये अंक इस गलाकाट प्रतियोगिता में कहाँ तक साथ दे रहे हैं या दे सकते हैं। हर साल टॉपर आते हैं, जाते हैं मगर कुछ समय बाद वे कही नहीं दिखायी देते। बच्चा बस्ते का बोझ लेकर घूम रहा है मगर उसे जानकारी और व्यावहारिक ज्ञान न के बराबर मिल रहा है। स्कूलों में शिक्षक कई बार बगैर सिखाए मुश्किल प्रोजेक्ट देते हैं तो कहने की जरूरत नहीं है कि ये प्रोजेक्ट भी अभिभावक ही पूरा करते हैं। बच्चे ने कुछ नहीं सीखा…एक समय था जब 40 प्रतिशत अंक पाकर भी जीने की लालसा और कुछ करने की उम्मीद बनी रहती थी क्योंकि हमारा जोर सीखने और सिखाने पर रहता था। कक्षा में प्रथम आने वाले छात्र – छात्राएँ कुछ दिनों तक भले ही अकड़ में रहें मगर बात जब गतिविधियों की होती थी तो उनको भी साथ आना पड़ता था। टॉपर न रहने पर भी तब लिखना सिखाया जाता था, बड़े प्रश्न लिखने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। हिन्दी में शत – प्रतिशत अंक कभी नहीं मिले मगर फिर भी लिखना आ गया…आज शत – प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी यह दावा नहीं कर सकते है कि वे लिखना जानते हैं या उनसे त्रुटियाँ नहीं होंगी। वे अपने विषय की पूर्ण जानकारी होने का दावा नहीं कर सकते।

रटन्त विद्या से वे भले ही प्रोजेक्ट प्रदशर्नियों में रटकर सुना दें मगर क्या उनमें समझाने, समूह में सबको साथ लेकर चलने और असफलता को सफलता में बदलने का गुण हैं? क्या आपकी शिक्षा पद्धति अनजाने ही उनको मशीन में नहीं बदल रही है, क्या उनको इतना कमजोर नहीं बना रही है कि वे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की बजाय नशे और अवसाद की चपेट में आ रहे? सब जानते हैं कि अंक जीवन की दौड़ में बहुत दूर तक साथ नहीं देते..अगर ऐसा होता तो पढ़े – लिखे युवा अवसाद की चपेट में नहीं आते। अन्ततः आपका आत्मबल ही जीवन में आपका साथ देता है, अंक नहीं देते तो फिर क्यों शिक्षा प्रणाली का जबरन सरलीकरण किया जा रहा है जो घातक है…इससे किसी बोर्ड का भला हो सकता है मगर न तो ये विद्यार्थी के हित में है और न ही देश के भविष्य के लिए फायदेमंद हैं। जरूरी है कि शिक्षा को जड़ों से जोड़ा जाए…हमारी परम्परागत कलाओं और हस्तशिल्प को पाठ्यक्रम में फैशन के लिए ही न रखें…बच्चों को खेत और जंगल दिखाएँ..कारखाने दिखाएँ….। आज कई शिक्षित युवाा अपनी डिग्री को लेकर इतने अधिक मोहग्रस्त होते हैं कि कोई और काम करना उनको अपनी तौहीन लगता है मगर वह ये नहीं जानते कि ऐसा करके वे अवसरों को अपनी सीमा बना रहे हैं जो बाद में उनको एकाकी और हताश ही करेगा। शिक्षा ऐसी हो जो हमारे पारम्परिक क्षेत्रों को मजबूत बनाएँ जिससे किसी किसान को आत्महत्या न करनी पड़े जो मजदूरी को सुरक्षित बनाए और सम्मान बनाए। कारीगर न हों तो कोई भी उद्योग नहीं चल सकता तो श्रम का सम्मान देना भी आवश्यक है और यह शिक्षा प्रणाली के सरलीकरण से नहीं होगा। पढ़ाई के साथ उनके पास विकल्प हो जिससे अगर उनको नौकरी न मिले तो भी उनके लिए रोजगार का अभाव समस्या न बनें। ताकि वे जीवन की वास्तविकता समझें वरना शिक्षा का सरलीकरण घातक ही साबित होगा।

अनसुलझी समस्याओं को छोडऩे का नतीजा अतिवाद : प्रो.अरुण त्रिपाठी

कोलकाता : भारत सहित समूचे विश्व में अतिवाद हावी होता जा रहा है और इसकी उत्पत्ति अनसुलझे सामाजिक, आर्थिक और दूसरी मौलिक समस्याओं से हुई हैं। ये बातें महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रोफेसर अरुण त्रिपाठी ने कहीं। इस मौके पर पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने पत्रकारिता में तथ्य और संतुलित नजरिया अपनाने की सलाह दी। दोनों विनय तरुण स्मृति समारोह में अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद विषय पर बोल रहे थे।
दस्तक की ओर से आयोजित समारोह में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हर युग, कालखंड में अतिवाद रहा है। सभ्यताओं के संघर्ष और वैश्वीकरण से दुुनिया में अतिवादी हावी होता रहा। भारत में इसके अलावा जाति संघर्ष और गरीबी ने अतिवाद को जन्म दिया है, जो इन दिनों हावी है। उन्होंने कहा कि अतिवाद एक रूप में खत्म होता है तो दूसरे नए रूप में पैदा हो जा रहा है। इन दिनों महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित दूसरे महापुरूषों के आदर्शों को अपनी तरह से व्याख्या कर नए नए अतिवाद को जन्म दिया जा रहा है। व्यक्तिगत और तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाई जा रही है। सुजात बुखारी जैसे पत्रकार की हत्या कर दी गई। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में उदारता खत्म होती जा रही है और उसकी जगह अतिवाद स्थान ले रहा है। ऐसे में वैकल्पिक रास्ता ढ़ंूढना पत्रकारों की जिम्मेदारी है और यह महात्मा गांधी के सत्याग्रह आदर्श के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। वजह गांधी खुद में समवन्य के दौर हैं। इससे पहले पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने कहा कि महात्मा गांधी सबसे बड़ा पत्रकार थे। उन्होंने सत्य और अङ्क्षहसा की राह पर चलने का उपदेश दिया था। भारतीय पत्रकारिता में भी अतिवाद प्रवेश कर गया है। समाचार चैनल और कुछ अखबार सिर्फ सरकार के खिलाफ लिखते हैं तो कुछ सिर्फ उसके पक्ष में लिखते हैं।

इस मौके पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध से संवाद खत्म करने से लोकतंत्र ध्वस्त हो जाता है और दुराचार व अतिवाद पैदा होता है। इन दिनों देश में अतिवाद और तर्कहिंसा का दौर चल रहा है। पत्रकारिता से उसका मूल चरित्र प्रतिवाद करना ही खत्म हो गया है। इसका अंत और सत्य की वापसी संभव है। इस मौके पर डॉ. सुधांशु कुमार की पुस्तक नारद कमीशन का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अखिलेश्वर पाण्डे ने किया और मौके पर दिवंगत पत्रकार विनय तरुण के सहपाठी उपस्थित थे।

हिंदी और हावड़ा के गौरव थे पत्रकार राजकिशोर

कोलकाता : देश के प्रतिष्ठित पत्रकार राजकिशोर हिंदी के एक कुशल गद्यकार, राजनीतिक विश्‍लेषक और चिंतक थे। उनके पाठकों का एक बड़ा समुदाय था। वे कवि और उपन्यासकार होने के अलावा अपने युवा काल में विभिन्न आंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं। हावड़ा उनकी जन्मभूमि और लंबे समय तक कोलकाता कर्मभूमि थी। कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक ‘रविवार’ में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय देते हुए दिल्ली के ‘नवभारत टाइम्स’ में छह साल तक थे। वे गांधी और लोहिया के विचारों से प्रभावित थे। सही अर्थों में स्वतंत्र पत्रकार और हिंदी के प्रायः सभी बड़े अखबारों के स्तंभ लेखक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में एक कीर्तिमान स्थापित किया है।
राजकिशोर की 71 साल की अवस्था में दिल्ली में निधन के बाद लालबाबा कॉलेज, बेलूड़ में आयोजित एक स्मरण सभा में हिंदी लेखकों और समाजसेवियों ने अपने प्रिय लेखक को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उनकी जीवन-यात्रा पर सौमित्र जायसवाल ने एक सुंदर डिजिटल प्रस्तुति की। राजकिशोर के विद्यार्थी जीवन के सखा डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि राजकिशोर की सहज, चुटीली और तार्किक भाषा ने हिंदी पत्रकारिता का एक आदर्श खड़ा किया है। उन्होंने विचारों और मूल्यों के लिए जीवन में कभी समझौता नहीं किया। दिल्ली में उनकी अंत्येष्टि तक बहुत सादगी से हुई, जैसा वे चाहते थे। अभावों तथा शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए 50 सालों तक बिना थके वे लिखते रहे। लेखन ही राजकिशोर का जीवन था। राजकिशोर ने भारतीय भाषा परिषद द्वारा आठ खंडों में शीघ्र प्रकाश्य ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ के भाषा संपादक के रूप में भी काम किया है।
एमएसटीसी के महाप्रबंधक और लेखक मृत्युंजय ने उन्हें याद करते हुए कहा कि राजकिशोर बड़े सहज, मिलनसार और खुशदिल इन्सान थे। वे सच्चे अर्थों में बौद्धिक रूप से स्वतंत्र पत्रकार थे। विद्यासागर विश्‍वविद्यालय के प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि उनका छल कपट से रहित पारदर्शी व्यक्तित्व और उनके विचार नई पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे। राजकिशोर के मित्र और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी महेश जायसवाल ने कहा कि वे अपने निजी दुखों से ज्यादा देश-दुनिया की चिंता करते थे।
लालबाबा कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.संजय कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि हावड़ा ने अपना एक बड़ा साहित्यिक रत्न खो दिया। स्मरण सभा में शंकर कुमार सान्याल, शैलेंद्र, प्रो.आशुतोष सिंह, बिहारी लाल चौधरी, शिवनारायण गुप्त, चंद्रिका प्रसाद अनुरागी, मंजू बैज, श्रद्धांजलि सिंह, यशवंत सिंह, पूजा गुप्ता, सेराज खान बातिश, जितेंद्र सिंह, ब्रजमोहन सिंह, प्रो.ललित कुमार झा आदि ने अपने भावोद्गार व्यक्त किए। श्रद्धांजलि देन वालों में थे- डॉ.शिवनाथ पांडेय, विष्णु गोस्वामी, जितेंद्र जितांशु, रघुनाथ सिंह, रामजी प्रसाद, काली प्रसाद गुप्त और राजकिशोर के परिवार के अशोक साव, सोनालाल साव आदि।

आदि शिव…अनादि शिव….आदि योगी ….नृत्य के प्रणेता…..अनन्त शिव

भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। शिव ही आदि योगी हैं। कहते हैं कि इन्होंने ही कृष्ण को योगेश्वर बनाया। इनकी मुद्राओं से ही नृत्य की उत्पत्ति हुई। कैलाश पर्वत पर इनका वास है और कहते हैं कि इनके ही त्रिशूल पर काशी टिकी है। भारत के प्रत्येक काल खंड में शिव विविध रूपों में रहे हैं। शिव सिर्फ कल्पना नहीं है क्योंकि देश के कई हिस्सों में इनके पदचिह्न हैं…शिव भारत का विश्वास हैं। शिव से सम्बन्धित रहस्य हैं  – 

1. आदिनाथ शिव
सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है।
2. शिव के अस्त्र-शस्त्र
शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।
3. शिव का नाग
शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।
4. शिव की अर्द्धांगिनी
शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।
5. शिव के पुत्र
शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।
6. शिव के शिष्य
शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।
7. शिव के गण
शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। शिवगण नंदी ने ही ‘कामशास्त्र’ की रचना की थी। ‘कामशास्त्र’ के आधार पर ही ‘कामसूत्र’ लिखा गया।
8. शिव पंचायत
भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
9. शिव के द्वारपाल
नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
10. शिव पार्षद
जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।
11. सभी धर्मों का केंद्र शिव
शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।
12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।
13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव
भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।
14. शिव चिह्न
वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।
15. शिव की गुफा
शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा ‘अमरनाथ गुफा’ के नाम से प्रसिद्ध है।
16. शिव के पैरों के निशान
श्रीपद– श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।
रुद्र पद– तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे ‘रुद्र पदम’ कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।
तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।
जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।
रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर ‘रांची हिल’ पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को ‘पहाड़ी बाबा मंदिर’ कहा जाता है।
17. शिव के अवतार
वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।
18. शिव का विरोधाभासिक परिवार
शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।
19. ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।
20.शिव भक्त : ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।
21.शिव ध्यान : शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।
22.शिव मंत्र : दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।
23.शिव व्रत और त्योहार : सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।
24.शिव प्रचारक : भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
25.शिव महिमा : शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।
26.शैव परम्परा : दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।
27.शिव के प्रमुख नाम : शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।
28.अमरनाथ के अमृत वचन : शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।
29.शिव ग्रंथ : वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।
30.शिवलिंग : वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।
31.बारह ज्योतिर्लिंग : सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग’ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश’। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है। दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।
32.शिव का दर्शन : शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

33.शिव और शंकर : शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं– शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।
34.देवों के देव महादेव : देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

35.शिव हर काल में : भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे।

(साभार – वेबदुनिया)